बुधारू के जीवन

बूढ़त काल में खेती ल रेंढ़त हस। ते हमला कहिबे न ददा, जा बेटा बुधारू भारा करपा खेती-खार मे परे हे, गाड़ा पीढ़ा खोज के लान डार अऊ धान-पान ल मिंज डार। हमन तो नी जा सकन ददा। चाहे कोनो चोराय, चाहे कोनो लुकाय। बुधारू अपन बाप ल खिसिया-खिसिया के काहत रथे। बुधारू के पुर्रू ददा ह खेती खार ल परे डरे देखे त ओकर मन ल रोआसी आ जथे। अतका खरचा पानी करके धान-पान ल बोए हन अउ आए दिन में दूसर मन ह लेग जही- चोरा लीही त…

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लोक कहिनी : ठोली बोली

छकड़ा भर खार पीये के जिनिस देख के सबे गांव वाला मन पनछाय धर लिन कब चूरय त कब सपेटन। ए क ठन गांव म नाऊ राहय। बड़ चतुरा अऊ चड़बांक। तइहा पइंत के कंथ ली आय। जाने ले तुंहरेच नी जाने ले तुंहरेच, गांव भर के हक-हुन्नर, मगनी, बरनी, छट्ठी, बरही अऊ कोनो घला चरझनियां बुता बर छड़ीदार राहय। घरो-घर नेवता जोहारे अऊ ओट्टिंट (आघात) ले झारे-झार जेवन सपेटे। अक तहा घला झोंकावय। घर लेगय। ओकरो घर एक झन टूरा पिला होइस। त कोनो-कोनो ओलियांय। ‘कइसे मर्दनिया तै सबके…

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कहिनी : बेर्रा टूरा बेर्रा टूरा

सहदेव गुरूजी के ओ दिन इसकूल में पहिली दिन रहीस। ओहा पहिली कक्षा में लइका मन के हाजिरी लेवत रहीस। ओतके बेरा इसकूल में लइका मन गोहार पारे बर धर लीन। ”बेर्रा टूरा बेर्रा टूरा अपन दाई बर जठाथे पैरा” कहीके। गुरूजी कक्छा ले बाहिर निकल के देखीस तव उहां एक झन सोगसोगवान गड़हन के लइका अपन महतारी संग कक्षा के बाहिर खड़े रहीस। गुरूजी हा लइका मन ला दपकार के चुप करइस। लइका हा तो सुसक सुसक के रोवत रहीस। ओकर महतारी के आंखी हा घलो डबडबा गे रहीस।…

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कहिनी : लछमी

मास्टर ह रखवार ल कथे- चल जी मंय तोला परमान भीतरी दूंहू आ कहिके रखवार अऊ रऊत संग गुरुजी ह भीतरी म जाथे, गरूआ मन ओला देख के बिदके ल लगथे एती-ओती भागे ल धरथे त रखवार ह हांसथे- ले जम्मो तो तोला देखके भीतरी म भागथे बड़ा गाय वाला बनथस। मास्टर कथे अभी देख न जी परमान ल अऊ मास्टर ह हूंत कराथे- अरे सुकवारो, लछमी गायत्री, बुधियन्तीन, सुक्रती, सुती आओ लछमी दाई हो। गाय मन ओरी पारी आगे मास्टर के चारो कोती झूम जथे। भभगवान ह सिरीस्टी ल…

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कहिनी : ममता

ममता एक झन ल पूछिस जेहा गाड़ी म बइठे रीहिस। का होगे? कइसे लागत हे एला ओ मनखे ह थोरिक ढकेलहा कस जुबान दिस मोर गोसईन हरे। कालीचे भात रांधत-रांधत लेसागे। उही ल अस्पताल लाने हावन। म मता नांवेच ल सुनके पता चल जथे कि कतिक मया ल समोय हे अपन भीतरी। ममता अऊ मया के अगम दहरा हरे ममता बेटी के अंतस ह। नपन ले पढ़ई-लिखई म गजब हुसियार। अइसन गुणवंतीन बेटी ल काकरो नजर झन लग जाय कहिके घेरी-बेरी काजर आंजे ओकर दाई रमोतिन ह। फेर करिया काजर…

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जयंत साहू के कहिनी : मनटोरा

चइत बइसाख के महिना तो बर बिहाव के सिजन आय। जेती देखबे तेती गढ़वा बाजा ह बाजत रइथे। किथे न मांग फागुन मे मंगनी जचनीए चइत बइसाख म बर बिहाव अउ काम बुत न उरका के सगा घर लाड़ू बरा बर रतियाव। चडती मंझनीया के बेरा आमा बगइचा के तिरे तिर दु तिन ठन बइला गाड़ी आवत रिहीस। गाड़ी ह गजब सजे धजे रिहीस। बइला के सिंग म चकमकी रंग लगायए पीठ म मखमल के लादना लदाय अउ टोटा म कांसा के बड़े बड़े घांघड़ा पहिराय। टोटा के घांघड़ा अउ…

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लहुटती बसंत म खिलिस गुलमोहर : कहिनी

स्वाति ह मां ल पोटार के रोय लगिस। थोरिक बेरा म अलग होके कथे। मां मेंहा तोर दुख ल नइ देख सकंव। मेंहा तोर बेटा अंव। तोर पीरा तोर दुख अउ पहार कस बिपत ल समझथंव। बाबूजी ह अब कभू नइ लहुटय। ये जिनगी ह सिरिफ सुरता म नइ कटय ओ अम्मा। जिनगी म सबो ल हर उमर म कोनो साथी के सहारा के जरूरत परथे। जिनगी के एक-एक छन सहारा ह भगवान के दे हुए वरदान ये। ये ल हांसे जिए बर चाही। तैंहा परकास अंकल ल अपन साथी…

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लाली चूरी

तुलसी ह अंगना के धुर्रा ल रपोट रपोट के परदा रुंधे। पारा भर के लोग लइका सेकला के घरघुfधंया खेले। एक झन नोनी के दाइ बने एक झन बाबू के दाई। सुघ्घर पुतरी पुतरा के बिहाव ल रचै। लइकुसहा उमर के लइकुसहा नेंग जोग। उही बरतीया उही घरतीयाए उही लोकड़हीन उही बजनीया। नान नान पोरा चुकिया म साग भात चुरय। कमचिल के मड़वा म तेल हरदी चड़हय अउ भांवर परय। टूरा मन कनिहा म नंगारा बांधे। रोंगो बती अउ पानवाला बाबू गाना गा गा के गुदंग गुदंग नाचे। ये ठट्ठा…

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कहिनी : करनी दिखथे मरनी के बेरा

सुकवारो अब बस्ती में किंजर-किंजर के साग-भाजी बेचय अउ कुरिया में राहय। ओला एक बात के संतोष रहीस कि ओकर दूना लइका मन ओकर आंखी के आघु में हावय। ओहा अपन लइका मन के खाय पीये ले लेके कपड़ा लत्ता तक के खरचा उठाय बर धरलीस। ओ दिन मेहा पटेवा बाजार म गिंजरत रहेंव ओतके बेरा मोर सुखदेव भइया संग भेंट होगे। राम रमउवा होय के बाद मेहा ओला पूछ परेंव बने बने गा सुखदेव भइया। अतका ला सुनीस अउ सुखदेव भइया जोर जोर से रोय बर धर लीस। मै…

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दाई अउ बबा के वेलेन्टाइन डे – कहिनी

”सुफेद बबा हा अतेक सुंदर बंसरी बजावय कि ओकर सोर दस कोस ले बगरे रहीस। का रामायन मण्डली, का नाचा मण्डली, कीर्तन, राम सप्ताह सबे जगह ले बबा बर बुलावा हा आवय। एती दाई ला बबा के बंसरी नई सुहावय। वइसने बबा ला घलो दाई के घेरी-बेरी दखल देवई हा नई सुहावय। दाई हा तो रीस के मारे बबा के बंसरी ला एक बेर चुल्हा म जोर घलो डारे रहीस। ये झगरा के मतलब ए नई रहीस कि दूनो के बिल्कुल नई बनत रहिस हे।” झगरा तो सबो झन होथें…

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