छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल

आँसू के कीमत तैं का जनाबे। प्रेम- मोहब्बत तैं  का  जानबे। झगरा हावै धरम अउर जात के, हे असल इबादत तैं का जानबे। आँसू  पोंछत  हावै  अँछरा  मा, दुखिया के हालत तैं का जानबे। सटका बन के  तैं  बइठे  हावस, हे जबर Read More

छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल

सोंचत-सोंचत रहिगेन हमन भूकत,  उछरत,  घूमत  हावै,  गाँव  के  मतवार  मन, लाँघन, भूखन बइठे हावै, कमिया अउ भुतियार मन। राज बनिस नवा-नवा, खुलिस कतको रोजगार  इहाँ, मुसवा कस मोटागे उनकर, सगा अउ गोतियार  मन। साहब, बाबू, अगुवा मन ह, छत्तीसगढ़ ल चरत Read More

का जनी कब तक रही पानी सगा

का जनी कब तक रही पानी सगा कब तलक हे साँस जिनगानी सगा आज हाहाकार हे जल बूँद बर ये हरय कल के भविसवाणी सगा बन सकय दू चार रुखराई लगा रोज मिलही छाँव सुखदाई हवा आज का पर्यावरण के माँग हे Read More

गजल : दिन कइसन अच्छा

दिन कइसन अच्छा आ गे जी। मरहा खुरहा पोक्खा गे जी ।। बस्ती बस्ती उजार कुंदरा महल अटारी तना गे जी ।। पारै हाँका हाँसौ कठल के सिसका सिसका रोवा गे जी ।। पीए बर सिखो के हमला अपन सफ्फा खा गे Read More

हमला तो गुदगुदावत हे, पर के चुगली – चारी हर : छत्‍तीसगढ़ी गज़ल

1 जंगल के तेंदू – चार नँदागे, लाखड़ी, जिल्लो दार नँदागे। रोवत हावै जंगल के रूख मन, उनकर लहसत सब डार नँदागे। भठगे हे भर्री – भाँठा अब तो, खेत हमर, मेंढ़ – पार नँदागे। का-का ला अब तैं कहिबै भाई, बसगे Read More

बलदाऊ राम साहू के छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल

1 जेकर हाथ म बंदूक भाला, अउ हावै तलवार जी, उन दुसमन के कइसे करबोन, हमन हर एतबार जी। कतको झन मन उनकर मनखे, कतको भीतर घाती हे, छुप – छुप के वार करे बर, बगरे हे उनकर नार जी। पुलवामा म Read More

छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल

1. जब भट्टी मा आथे मनखे। जीयत ओ मर जाथे मनखे। अब गाँव उजर गे शहर खातिर, का खाथे का बँचाथे मनखे। लालच के चारा ला देख के, मछरी कस फँस जाथे मनखे। समय निकलथे जब हाथ ले, माथा पीट पछताथे मनखे। Read More

बसंत उपर एक छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल

आ गे बंसत कोयली गात घलो नइ हे। संगी के गोठ अब , सुहात घलो नइ हे। सेमर न फूले हे, न परसा ह डहकत हे, आमा के माऊर हर, भात घलो नइ हे। हाथ मा हाथ धर, रेंगे जउन मोर संग, Read More

छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल

1 कर दे घोषना एक राम जी। पाँचों साल आराम राम जी। दावत खा ले का के हे चिंता। हमरे तोला सलाम राम जी। हावै बड़का जी तोर भाग ह, पढ़ ले तैं हर, कलाम राम जी। आने के काम म टाँग Read More

ग़ज़ल छत्तीसगढ़ी

भैया रे, तै हर नाता, अब हमर ले जोड लेबे, जिनगी के रद्दा उलटा हे, सँझकेरहा मोड़ लेबे। पहती सुकवा देखत हावै, सुरुज अब उगइया हे, अँधियारी संग तै मितानी, झप ले अउ छोड़ देबे। बिन छेका-रोका हम पर घर आबोन-जाबो जी, Read More