Category: गज़ल

छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल

आँसू के कीमत तैं का जनाबे।
प्रेम- मोहब्बत तैं  का  जानबे।
झगरा हावै धरम अउर जात के,
हे असल इबादत तैं का जानबे।
आँसू  पोंछत  हावै  अँछरा  मा,
दुखिया के हालत तैं का जानबे।
सटका बन के  तैं  बइठे  हावस,
हे जबर बगावत  तैं  का जानबे।
हावै फोरा जी जिनकर  पाँव  मा,
उन झेलिन मुसीबत तैं का जानबे।
सटका= बिचौलिया, फोरा=फोड़ा,
बलदाऊ राम साहू

छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल

सोंचत-सोंचत रहिगेन हमन
भूकत,  उछरत,  घूमत  हावै,  गाँव  के  मतवार  मन,
लाँघन, भूखन बइठे हावै, कमिया अउ भुतियार मन।
राज बनिस नवा-नवा, खुलिस कतको रोजगार  इहाँ,
मुसवा कस मोटागे उनकर, सगा अउ गोतियार  मन।
साहब, बाबू, अगुवा मन ह, छत्तीसगढ़ ल चरत हावै,
चुचवावत सब बइठे हे, इहाँ  के  डेढ़  हुसियार  मन।
पर गाँव ले आये  हे, उही  चिरई  मन  हर  उड़त  हे,
पाछू-पाछू म  उड़त  हावै,   इहाँ  के  जमीदार  मन।
सोंचत-सोंचत रहिगेन हमन, कते बुता ल करन हम।
धर ले हें  जम्मो  धंधा  ल,  अनगइहाँ  बटमार  मन।
बलदाऊ राम साहू

का जनी कब तक रही पानी सगा

का जनी कब तक रही पानी सगा
कब तलक हे साँस जिनगानी सगा

आज हाहाकार हे जल बूँद बर
ये हरय कल के भविसवाणी सगा

बन सकय दू चार रुखराई लगा
रोज मिलही छाँव सुखदाई हवा

आज का पर्यावरण के माँग हे
हव खुदे ज्ञानी गुणी ध्यानी सगा

सोखता गड्ढा बना जल सोत कर
मेड़ धर परती धरा ला बोंत कर

तोर सुख सपना सबे हरिया जही
हो जही बंजर धरा धानी सगा

तोर से कुछ होय कर कोशिश तहूँ
कुछ नही ता नेक कर ले विश तहूँ

प्रार्थना सुनही ग बादर देव हा
कोन हे ओखर सहीं दानी सगा

सुखदेव सिंह अहिलेश्वर
गोरखपुर कबीरधाम छत्तीसगढ़

गजल : दिन कइसन अच्छा

दिन कइसन अच्छा आ गे जी।
मरहा खुरहा पोक्खा गे जी ।।
बस्ती बस्ती उजार कुंदरा
महल अटारी तना गे जी ।।
पारै हाँका हाँसौ कठल के
सिसका सिसका रोवा गे जी ।।
पीए बर सिखो के हमला
अपन सफ्फा खा गे जी।।
हमला देखावै दरपन उन
मुँह जिन्कर करिया गे जी ।।
कोन ल इहां कहिबे का तै
जम्मो अपनेच लागे जी ।।
बाते भर हे उज्जर निर्मल
तन मन मुँह बस्सागे जी ।।

धर्मेन्द्र निर्मल
9406096346

हमला तो गुदगुदावत हे, पर के चुगली – चारी हर : छत्‍तीसगढ़ी गज़ल

1

जंगल के तेंदू – चार नँदागे,
लाखड़ी, जिल्लो दार नँदागे।

रोवत हावै जंगल के रूख मन,
उनकर लहसत सब डार नँदागे।

भठगे हे भर्री – भाँठा अब तो,
खेत हमर, मेंढ़ – पार नँदागे।

का-का ला अब तैं कहिबै भाई,
बसगे शहर, खेती-खार नँदागे।

गाड़ी हाँकत, जावै गँवई जी,
गड़हा मन के अब ढार नँदागे।

गाँव के झगरा-झंझट मा जी,
नेवतइया गोतियार नँदागे।

2

नइ चले ग अब पइसा दारू,
नेता मन के तिपही तारू।

कौनो संग गंगा जल बधो,
कौनो संग तुम गंगा बारू।

सबके नस-नस हम जानत हन,
कइसे करहू कारू – नारू।

बटन चपकबोन सोच-समझ के
कहत हे, सुखिया अउ बुधारू।

कारू-नारू = जादू-टोना/ छेड़-छाँड़।

3

बिरबिट करिया दिखत हावै, रतिहा के अँधियारी हर,
उत्ती डहर कब बगरही, सुरूज के उजियारी हर।

घर-घर मा बैर बँधा के, मन के बात कइसे काहौं,
खुदे ला चिन्हावत नइ हे, अपने अँगना – दुवारी हर।

असल ल पतियावन नहीं, एकरे चिंता मन मा हावै।
सपना म लहलहावत हे, गाँव के नरवा – बारी हर,

का सच हे अउर झूठ का हे, मन मा एला बिचारौ ,
हमला तो गुदगुदावत हे, पर के चुगली – चारी हर।

धरम-जात के खाँचा खानेन, ओला कइसे पाटन,
आपस मा तो लड़त हावै, साहू अउर तिवारी हर।

-बलदाऊ राम साहू

बलदाऊ राम साहू के छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल

1

जेकर हाथ म बंदूक भाला, अउ हावै तलवार जी,
उन दुसमन के कइसे करबोन, हमन हर एतबार जी।

कतको झन मन उनकर मनखे, कतको भीतर घाती हे,
छुप – छुप के वार करे बर, बगरे हे उनकर नार जी।

पुलवामा म घटना होईस, फाटिस हमार करेजा हर,
बम फेंक के बदला लेयेन , मनाये सुघर तिहार जी।

कायर हे, ढ़ीठ घलोव हे, माने काकरो बात नहीं,
जानथे घलो हर बखत, होथे हमरे मन के हार जी।

जिनकर हाथ गौरव लिखे हे, उनला तुमन नमन करौ,
देस खातिर परान दे बर, हे सैनिक हमर तइयार जी।

अभिनंदन के अभिनंदन हे, कहि के खुसी मनावत हन,
पाक के नापाक इरादा, अब हो गे बंठाधार जी ।

जेकर=जिनके, करबोन=करेंगे, ना,=बेल, करेजा= कलेजा, हर बखत=हर बार, बंठाधार =बंटाधार।

2

अगुवा नाँगर जेकर हाथ मा, धरे हे तुतारी ला,
हमला तो सुधारे परही, बिगड़े धुरवा-बारी ला।

जउन मन करथे सोच समझ के,आगू उही बढ़थे,
खेलथे भैया उही मन हर, दूसर नवा पारी ला।

अपन काम म धियान देवौ जी, पाछू ल बिसराओं तुम,
कौन पतरी मा छेद करीन हे, छोड़ो निंदा-चारी ला।

काम करथ हो बने-बने, ओकर मन मा खुसी हावै।
एके चिंता मन मा हे, कइसे छुटबो उधारी ला।

भीतरी म का-का होत हे, ‘बरस’ कइसे जानबे तैं,
सुरुज कहत हे एके घुट म, पी जाबोन अँधियारी ला।

3

दू टप्पा बोल लेतेस, भाखा अमोल हे।
अलग-अलग देस के, अलग तो भूगोल हे।

किंजर-फीर के पंछी , उही डारा आथे,
उहिचे हे दाना-पानी, रहे बर खोल हे।

मइके के मया हर, कब्भू भूलाये नहीं ।
संगे-सँगवारी के, मीठ अ ड़बड़ बोल हे।

परदेसी के बात ल, कइसे पतियावन हम,
जतर-कतर रेंगत हे, नियत डाँवाडोल हे।

दू टप्पा =दो शब्द, किंजर फीर के =घूम फीर कर, उहिचे =वहीं, डा,=डाल, कब्भू =कभी भी, पतियावन =विश्वास करें, जतर-कतर =इधर-उधर , रेंगत हे =आते-जाते हैं

4

कतको करे सरकार हर,
हपट के मरे सरकार हर।

हमर बर बगबग बरे जी,
सब दुख हरे सरकार हर।

करजा छुटे, चँऊर बाँटे,
सब ले लड़े सरकार हर।

हमला का करना हे जी,
सरे कि जरे सरकार हर।

हम बइठे-बइठे खावन,
जम्मो करे सरकार हर।

बलदाऊ राम साहू

छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल

1.

जब भट्टी मा आथे मनखे।
जीयत ओ मर जाथे मनखे।

अब गाँव उजर गे शहर खातिर,
का खाथे का बँचाथे मनखे।

लालच के चारा ला देख के,
मछरी कस फँस जाथे मनखे।

समय निकलथे जब हाथ ले,
माथा पीट पछताथे मनखे।

अपन दुख काकर संग बाँटे,
पीरा ला भुलियाथे मनखे।

भुलियाथे=सांत्वना देता है

2.

मनखे ला धकिया ले दाऊ।
पुन तैं गजब कमा ले दाऊ।

धरती मा तो रतन गड़े हे,
अपनो धन गड़िया ले दाऊ।

छत्तीसगढ़िया सिधवा हावै,
उनला तैं भरमा ले दाऊ।

जेकर भाग म बिपत लिखे हे,
थोरिक तहुँ थपरा ले दाऊ।

करम गजब तैं कर दुनिया मा,
अंत काल पछता ले दाऊ।

मान ‘बरस’ के कहना ला तैं,
संग गहूँ रँमजा ले दाऊ।

मनखे = मनुष्य (सज्जन व्यक्ति) पुन = पुण्य, गहूँ = गेहूँ, रँमजा ले = पीस जा।

3.

मनखे गजब अलाली करथे।
बइठे – बइठे जुगाली करथे।

फुर्सत मा हे लागथे मोला,
आज करना हे, काली करथे।

बूता कौनो जोंग दे तहने ,
झट ले ओ हर उदाली करथे।

चौकीदार हर चोर कहा गे,
का चोर मन रखवाली करथे?

थोरच्च दिन के जिनगी हे जी
पर, काकर बर हमाली करथे।

बूता = कार्य, जोंग दे = निर्देशित कर दो, तहने=तो, उदाली = विरोध/अवमानना, काकर बर = किसके लिए

बलदाऊ राम साहू

बसंत उपर एक छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल

आ गे बंसत कोयली गात घलो नइ हे।
संगी के गोठ अब , सुहात घलो नइ हे।

सेमर न फूले हे, न परसा ह डहकत हे,
आमा के माऊर हर, भात घलो नइ हे।

हाथ मा हाथ धर, रेंगे जउन मोर संग,
का होगे ओला, बिजरात घलो नइ हे।

मनखे ले मनखे दुरिहावत हावै संगी,
मीत अउ मितान आत-जात घलो नइ हे।

अड़बड़ सुग्घर हे ‘पर’ गाँव के टूरी हर,
भौजी हर काबर, अब लुहात घलो नइ हे।

बलदाऊ राम साहू

छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल

1

कर दे घोषना एक राम जी।
पाँचों साल आराम राम जी।

दावत खा ले का के हे चिंता।
हमरे तोला सलाम राम जी।

हावै बड़का जी तोर भाग ह,
पढ़ ले तैं हर, कलाम राम जी।

आने के काम म टाँग अड़ाना,
हावै बस तोर काम राम जी।

चारी – चुगली ह महामंत्र हे,
सुबह हो या हो शाम राम जी।

2

नँगरा मन हर पुचपुचाही , तब का होही?
अगुवा मन जब मुँहलुकाही, तब का होही?

पनियर-पातर खा के हम हर जिनगी जिथन,
धरती हर बंजर हो जाही, तब का होही?

सिरजन बर धरती के, हम जाँगर टोरेन,
आने मन ह मजा उड़ाही, तब का होही?

नेता अउ अफसर ल हुम चुहाये बर परथे,
चोर-चोर जब चोर चिल्लाही, तब का हो ही?

‘बरस’ सोंच ले कर, तैं हर कहे के पहली,
नदिया हर पानी पी जाही , तब का होही?

बलदाऊ राम साहू

नँगरा= छोटे लोग, पुचपुचाही=आगे-आगे होंगे, मुँह लुकाही = मुँह छुपायेगा, पनियर= पातर रूखा-सूखा, जाँगर टोरेन = मेहनत किए,
आनेमन= दूसरे लोग, हुम चुहाये बर परथे = कुछ समर्पण करना पड़ता है।

ग़ज़ल छत्तीसगढ़ी

भैया रे, तै हर नाता, अब हमर ले जोड लेबे,
जिनगी के रद्दा उलटा हे, सँझकेरहा मोड़ लेबे।

पहती सुकवा देखत हावै, सुरुज अब उगइया हे,
अँधियारी संग तै मितानी, झप ले अउ छोड़ देबे।

बिन छेका-रोका हम पर घर आबोन-जाबो जी,
बड़का मन ल करे पैलगी, कहिबोन बबा गोड़ देबे।

कइसनो राहय सरकार इहाँ, हमला का करना हे,
समरसता लाये बर संगी, जम्मो डिपरा कोड़ देबे।

कौनो परोसी निंदा करथे, अपने घर में आ के,
मन हर कहिथे भाई संग, तैं ह नाता तोड़ देबे।

बलदाऊ राम साहू

संझकेरहा=शीघ्रतापूर्वक, पहती सुकवा=सुबह का शुक्रतारा, पर=दूसरे, गोड़ = पाँव, झप ले=शीघ्र, आबोन-जाबो=आएँगे-जाएँगे, डिपरा=ऊँचा भाग, कोड़= खोद

भैया रे, तै हर नाता, अब हमर ले जोड लेबे,
जिनगी के रद्दा उलटा हे, सँझकेरहा मोड़ लेबे।

पहती सुकवा देखत हावै, सुरुज अब उगइया हे,
अँधियारी संग तै मितानी, झप ले अउ छोड़ लेबे।

कइसनो राहय सरकार इहाँ, हमला का करना हे,
समरसता लाये बर संगी, जम्मो डिपरा कोड़ लेबे।

कौनो परोसी निंदा करथे अपने घर में आ के,
मन हर कहिथे भाई संग, तैं ह नाता तोड़ लेबे।

बलदाऊ राम साहू

संझकेरहा=शीघ्रतापूर्वक, पहती सुकवा=सुबह का शुक्रतारा, पर=दूसरे, झप ले=शीघ्र, लेबे=लेना, डिपरा=ऊँचा भाग, कोड़= खोद,