गीत ग़ज़ल ल गावत हावस, का बात हे? सच दुनिया के जानत हावस, का बात हे? अंतस मा तो पीरा हावै गजब अकन, पीरा ला समझावत हावस, का बात हे? पाप के दहरा मा बुड़े मनखे मन ला, गंगा पार लगावत हावस, का बात हे? कुंभकरन कस सुते हावैं, इहाँ जउन मन, हाँक पार जगावत हावस, का बात है? साँप बरोबर मेरड़ी मारे हावै जउन, उनला दूध पियावत हावस, का बात है? बलदाऊ राम साहू 1,गजब अकन=बहुत 2. दहरा=नदी का गहरा भाग 3. बूड़े=डूबे 4. मनखे=मनुष्य 5.मेरड़ी= कुंडली
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गजल : कतको हे
भाई भाई ल,लड़इय्या कतको हे। मीत मया ल, खँड़इय्या कतको हे। लिगरी लगाये बिन पेट नइ भरे, रद्दा म खँचका करइय्या कतको हे। हाथ ले छूटे नही,चार आना घलो, फोकट के धन,धरइय्या कतको हे। रोपे बर रूख,रोज रोजना धर लेथे, बाढ़े पेड़ पात ल,चरइय्या कतको हे। जात – पात भेस म,छुटगे देश, स्वारथ बर मरइय्या कतको हे। दूध दुहइय्या कोई,दिखे घलो नहीं, फेर दुहना ल,भरइय्या कतको हे। पलइया पोंसइया सिरिफ दाई ददा, मरे म,खन के,गड़इय्या कतको हे। जीतेन्द्र वर्मा “खैरझिटिया” बाल्को(कोरबा)
Read Moreबलदाऊ राम साहू के गज़ल
गोरी होवै या कारी होवै। सारी तब्भो ले प्यारी होवै। अलवा-जलवा राहय भले जी एकठन हमर सवारी होवै। करन बड़ाई एक दूसर के काकरो कभू झन चारी होवै। राहय भले घर टुटहा-फुटहा तब्भो ले ओ फुलवारी होवै। बेटा कड़हा – कोचरा राहय मंदहा अउ झन जुवारी होवै। ‘बरस’ कहत हे बात जोख के, जिनगी म कभु झन उधारी होवै। तब्भो = तो पर भी, अलवा-जलवा= समान्य, चारी= निंदा, कड़हा-कोचरा =अनुत्पादक, मंदहा =मद्यपान सेवन करने वाला, मन मा जब तक अहसास हावै जी। अंतस मा सब उल्लास हावै जी। कब तक…
Read Moreसुरूज नवा उगइया हे : छत्तीसगढ़ी गज़ल संग्रह
अपनी बात साहित्य में गज़़ल का अपना एक विशिष्ट स्थान है। उर्दू साहित्य से चल कर आई यह विधा हिंदी व लोकभाषा के साहित्यकारों को भी लुभा रही है। गज़़ल केवल भाव की कलात्मक अभिव्यक्ति मात्र नहीं है, बल्कि यह जीवन के सभी पक्षों को स्पर्श करती चलती है। सामाजिक सरोकारों के अतिरिक्त युगीन चेतना विकसित करने का भी यह एक सशक्त माध्यम है। निश्चय ही परंपरावादी विद्वानों ने गज़़ल के संबंध में कहा है कि गज़़ल औरतों से या औरतों के बारे में बातचीत करना है,परंतु वर्तमान परिप्रेक्ष्य में…
Read Moreछत्तीसगढ़ी गज़ल
एक बेर मदिरालय मा, आ जातेस उप्पर वाले। दरुहा मन ल बइठ के तैं समझातेस उप्पर वाले। जिनगी के बिस्वास गँवागे ऊँकर मन म लागत हे, मिल-बइठ के अंतस मा,भाव जगातेस उप्पर वाले। हरहिंसा जिनगी जीये के भाव कहाँ समझथे ओमन, सुख-दुख संग जीये के तैं आस बँधातेस उप्पर वाले। तँही हर डोंगहार अउ डोगा के चतवार तँही हस, बुड़त मनखे ला तैं हर, पार लगातेस उप्पर वाले। दरुहा =शराबी, गँवागे =गुम गया, हरहिंसा =निश्चिंत; चतवार=पतवार, हस= हो, डोंगहार =नावीक, डोंगा= नाव, बुड़त =डूबते हुए। बलदाऊ राम साहू
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घर-आँगन मा दिया बरे, तब मतलब हे। अँधियारी के मुँहू टरे, तब मतलब हे।। मिहनत के रोटी हर होथे भाग बरोबर, जम्मो मनखे धीरज धरे, तब मतलब हे। दुनिया कहिथे ओ राजा बड़ सुग्घर हे, दुखिया मन के दुख हरे, तब मतलब हे। नेत-नियाव के बात जानबे तब तो बनही अतलंग मन के बुध जरे, तब मतलब हे। सबके मन मा हावै दुविधा ‘बरस’ सुन ले, सब के मन ले फूल झरे, तब मतलब हे। बड़=बहुत;नेत-नियाव =नीति, अतलंग=उपद्रवी, बुध=बुद्धि। बल्दाउ राम साहू [responsivevoice_button voice=”Hindi Female” buttontext=”ये रचना ला सुनव”]
Read Moreछत्तीसगढ़ी गीत-ग़ज़ल-छंद-कविता
होगे होरी तिहार होगे – होगे होरी के, तिहार गा। कखरो बदलिस न,आदत ब्यवहार गा। करु बोली मा,अउ केरवस रचगे। होरी के रंग हा, टोंटा मा फँसगे। दू गारी के जघा, देय अब चार गा। कखरो बदलिस न,आदत ब्यवहार गा। टेंड़गा रेंगइया हा,अउ टेंड़गा होगे। ददा – दाई ,नँगते दुख भोगे। अभो देखते वो , मुहूँ फार गा। कखरो बदलिस न,आदत ब्यवहार गा। पउवा पियइया हा,अध्धी गटक दिस। कुकरी खवइया हा,बोकरा पटक दिस। टोंटा के कोटा गय , जादा बाढ़ गा। कखरो बदलिस न,आदत ब्यवहार गा। घर मा खुसर के,बरा-भजिया…
Read Moreदेख कइसे फागुन बउरात आत हे
लुका झन काहत बड़ ठंडी रात हे, देख कइसे फागुन बउरात आत हे! झराके रुखवा चिरहा जुन्ना डारापाना, नवा बछर म नवा ओनहा पहिरात हे! रति संग मिलन के तैय्यारी हे मदन के कोयली ह कइसे रास बरस मिलात हे! मउहा कुचियाके बांधे लगिन दिन बादर, फुलके परसा सरसो महुर मेंहदी रचात हे! फगुवा के राग म निकले तियार बराती, बनके लगनिया आमा मउर चढ़ात हे! माते पुरवाई झुमरत बन के बंडोरा, सुनावत सब ल सरसर बधाई गात हे! ललित नागेश बहेराभांठा(छुरा) [responsivevoice_button voice=”Hindi Female” buttontext=”ये रचना ला सुनव”]
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बदलगे तोर ठाठबाट अउ बोली,गोठियात हे सब झन ह मंदरस कहां ले बरसय ,करेला कस होगे हे जब मन ह पोत के कतको कीरिम पवडर,सजा ले अपन बाना ल नइ दिखय सुघ्घर मुरत तोर, जब तड़के रइही दरपन ह! चारों खुंट लाहो लेवत हे, बड़े बड़े बिखहर बिछुरी सांप संगत म अब सुभाव देख,बदले कस दिखत हे चंदन ह भोकवाय गुनत रही जाबे, देख नवा जमाना के गियान सियानी धराके नान्हे हांथ कलेचुप बुलकत हे ननपन ह बिरथा हो जाही पोसे तोर,मन म अकल के घोड़ा घमंड सुधबुध सबो गंवा…
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कतेक करबे इंहा तै बईमानी जिनगी एक दिन ए जरूर होही हलाकानी जिनगी! जब कभु टुट जाही मया ईमान के बंधना संतरा कस हो जाही चानी चानी जिनगी! चारी लबारी के बरफ ले सजाये महल सत के आंच म होही पानी पानी जिनगी! घात मेछराय अपन ठाठ ल हीरा जान के धुररा सनाही तोर गरब गुमानी जिनगी ! सुवारथ के पूरा म बहा जाही पहिचान बचा, बिरथा झन होय तोर जुवानी जिनगी! जब कभु उघारय कोनो किताब इतिहास के हरेक पन्ना म मिलय तोरे कहानी जिनगी! ललित नागेश बहेराभांठा (छुरा)…
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