Category: गीत

छत्तीसगढ़ी बाल गीत

सपना

कहाँ-कहाँ ले आथे सपना।
झुलना घलो झुलाथे सपना।

छीन म ओ ह पहाड़ चढ़ाथे,
नदिया मा तँऊराथे सपना।

जंगल -झाड़ी म किंजारथे,
परी देस ले जा जाथे सपना।

नाता-रिस्ता के घर ले जा के,
सब संग भेंट करथे सपना।

कभू हँसाथे बात-बात मा,
कभू – कभू रोवाथे सपना।

कभू ये हर नइ होवै सच,
बस, हमला भरमाथे सपन।

-बलदाऊ राम साहू

छत्तीसगढ़ी नवगीत : पछतावत हन

ओ मन आगू-आगू होगे
हमन तो पछवावत हन
हाँस-हाँस के ओ मन खावय
हमन तो पछतावत हन।
इही  सोंच मा हमन ह बिरझू
अब्बड़ जुगत लखायेन
काँटा-खूँटी ल चतवार के
हम रद्दा नवा बनायेन।
भूख ल हमन मितान बनाके
रतिहा ल हम गावत हन।
मालिक अउ सरकार उही मन
हमन तो भूमिहार बनेन
ओ मन सब खरतरिहा बनगे
हमन तो गरियार बनेन।
ढोकर-ढोकर के पाँव परेन
मुड़ी घलो नवावत हन।
उनकर हावै महल अँटारी
टूटहा हमर घर हे
उनकर छाती जब्बर हे चाकर
देह हमर दुब्बर हे।
ओ मन खावय भूँकर भूँकर के
हमन तो मिमियावत हन।
बलदाऊ राम साहू 
94507650458