Category: आल्हा

बंदौ भारत माता तुमला : कांग्रेस आल्हा

खरोरा निवासी पुरुषोत्तम लाल ह छत्तीसगढ़ी म प्रचार साहित्य जादा लिखे हे। सन 1930 म आप मन ह कांग्रेस के प्रचार बर, ‘कांग्रेस आल्हा’ नाम केे पुस्तक लिखेे रहेव। ये मां कांग्रेस के सिद्धांत अऊ गांधी जी के रचनात्मक कार्यक्रम के सरल छत्तीसगढ़ी म वरनन करे गए हे। कांग्रेस आल्हा के उदाहरन प्रस्तृत हे –

वंदे मातरम्
बंदौ भारत माता तुमला, पैंया लागौं नवा के शीश।
जन्म भूमि माता मोर देबी, देहु दास ला प्रेम असीस।।

विद्या तुम हौ धरम करम हौ, हौ सरीर औ तुम हौ प्रान।
भक्ति शक्ति तुम ही हौ माता, सुखदाता तुम हौ भगवान।।

नइ जानन हम देबी देवता, तुम हौ पूजा के आधार।
कमल सिहांसन में तुम बइठे, हमला देवत हो आहार।।

तुम्हर गोद मां है मां दुर्गे, सब पूतन के है कल्यान।।
करजा तुम्हर चुकाये खातिर, हो बो मोका में बलिदान।।

जैसन हमला पोसे पाले, वैसन आबो एक दिन काम।
बन्धन ले मुक्ता के तुमला, करबो कोटि बार परनाम।।

हमर देस
जौन देस में रहिथन भैया, ये ला कहिथन भारत देस।
मति अनुसार सुनावौं तुमला, येकर कछु सुंदर सन्देस।।

उत्ती बाजू जगन्नाथ हैं, बुढती में दुवारिका नाथ।
बदरी धाम भंडार बिराजे, मुकुट हिमालय जेकर माथ।।

सोझे सागर पांव धोत हैं, रकसहूं रामेश्वर तीर।
बंजर झाड़ी फूल चड़ावें, कोयल बिनय करे गंभीर।।

जो ये देह हमार बने है, त्यारे अन्न इहें के जान।
लंह हमार इहें के पानी, हवा इहें के प्रान समान।।

रोंवा रोंवा पोर पोर ले, कहं तक कहाँ बात समझाय।
थोरेको नइये हमर कहेबर, सब्बों ये भारत के आय।।

धुर्रा माटी खेल खेलके, हम सब बने भुसुन्डाण्वान।
बुढ़वा होके मरजाबों तो, हमला देहैं यें असथान।।

दसरथ, हरिसचंद, युधिष्ठिर, सतधारी थे राजाराम।
जोगेश्वर, श्रीकृष्ण, जनक थे, अर्जुन भीष्म कर्ण बलधाम।।

धुरुव, प्रहलाद, लव, कुश, अभिमन्यु ऐसन बालक इहें रहिन,
सीता, गौरी औ अनुसूया, पतिव्रत के कष्ट सहिन।।

गौतम वशिष्ट नारद कनाद, शुक्र, व्यास, कपिल मुनिराज।
इही देश के हैं सब जनमें, इनकर हुए धरम के काज॥

कीरति पताका फर हावत है, धन धन गावत सकल जहान।
इनकर रस्ता, इनकर करनी, पढ़ सुन चलथे लोग पुरान ।।

मनखे डउकी जुमला मिलके, हम होथन करौड़ चौतीस,
बड़ भागी अन हम सब लोगन, देइस जन्म इहां जगदीश।।

हमर देस है हम ला प्यारा, करबोन कोटि कोटि परनाम।
काम करैं तन मन धन देके, रह जावे भारत के नाम।।

पुरुषोत्तम लाल

आल्हा छंद – नवा बछर के स्वागत करलन

बिते बछर के करन बिदाई,दे के दया मया संदेश।
नवा बछर के स्वागत करलन,त्याग अहं इरखा मद द्वेष।

आज मनुष्य हाथ ले डारिस,विश्व ज्ञान विज्ञान समेट।
नवा बछर मा हमू खुसर जन,खोल उही दुनिया के गेट।

हंसी खुशी मा हर दिन बीतय,हर दिन होवय परब तिहार।
सदा हमर बानी ले झलकय,सदाचरण उत्तम व्यवहार।

अंतस मा झन फोरा पारन,हिरदे मा झन देवन घाँव।
मिले बखत हे चार रोज के,रहलन दया मया के छाँव।

पूर्वाग्रह के चश्मा हेरन,अंतस मा सम भाव जगान।
पूर्वाग्रह के कारण संगी,मानवता हावय परसान।

छोड़ अलाली के संगत ला,महिनत के सँग नाता जोड़।
नेक सोच के नेव धरन जी,गड़े गोठ नइ हेरन कोड़।

आवव एक परन हम लेवन,नवा बछर के आघू ठान।
सदा हमर कथनी करनी ले,पावय देश राज घर मान।

सुखदेव सिंह अहिलेश्वर
गोरखपुर,कवर्धा छत्तीसगढ़

आल्हा छंद : झाँसी के रानी

बरस अठारा में रानी ने, भरिस हुंकार सीना तान।
भागय बैरी ऐती तेती, नई बाचय ग ककरो प्राण।
गदर मचादिस संतावन में, भाला बरछी तीर कमान।
झाँसी नई देवव बोलीस, कसदिच गोरा उपर लगाम।
राव पेशवा तात्या टोपे, सकलाईस जब एके कोत।
छोड़ ग्वालियर भगै फिरंगी, ओरे ओर अऊ एके छोर।
चना मुर्रा कस काटय भोगिस, चक रहय तलवार के धार।
कोनों नई पावत रिहिस हे, झाँसी के रानी के पार।
चलय बरोड़ा घोड़ा संगे, त धुर्रा पानी ललियाय।
थरथर कांपय आँधी देखत, कपसे बैरी घात चिल्लाय।
मारे तोला अब मरन नहीं, चाहे अब काही हो जाय।
जन्मभूमि के रक्षा खातिर, परान घलो अब हमरो जाय।
रानी के बचन सुन सैनिक, घात पै घात करते जाय।
जंगहा तीर कमान ह तको, लाश पै लाश बिछात जाय।
मार काट आगू बढ़त रिहिस, घोड़ा नाला देख डराय।
आगिस शत्रु आगू पीछू ले, सिंहनी वीर गति को पाय।
बुझिस दिया झाँसी के जभे, डलहौजी के मन मुस्काय।
तेईस के उमर में रानी, अईसन इतिहास बन जाय।

विजेंद्र वर्मा अनजान
नगरगाँव (धरसीवां)



24 मई -जेठ दसमी : वीर आल्हा जयंती, आल्हा चालीसा (आल्हा छंद में)

जेठ महीना दसमी जनमे, आल्हा देवल पूत कहाय।
बन जसराज ददा गा सेउक,गढ़ चँदेल के हुकुम बजाय।~9

ददा लड़त जब सरग सिधारे,आल्हा होगे एक अनाथ।
दाई देवल परे अकेल्ला, राजा रानी देवँय साथ।~10

तीन महीना पाछू जनमे, बाप जुद्ध में जान गवाँय।
बीर बड़े छुट भाई आल्हा,ऊधम ऊदल नाँव धराय।~11

राजा परमल पोसय पालय, रानी मलिना राखय संग।
राजमहल मा खेंलँय खावँय, आल्हा ऊदल रहँय मतंग।~12

सिक्छा-दीक्छा होवय सँघरा, लालन-पालन पूत समान।
बड़े बहादुर बलखर बनगे, लागँय राजा के संतान।~13

बड़े लड़इया आल्हा ऊदल, जेंखर बल के पार न पाय।
रक्छक बन परमाल देव के, आल्हा ऊदल जान लुटाय।~14

आल्हा संगी सिधवा मितवा, नइहे चोला एको दाग।
थरथर कापँय कपटी खोड़िल,बैरी बर बड़ बिखहर नाग।~15

बन चँदेल राजा के सेउक, अपन हँथेरी राखँय प्रान।
*नित चँदेल हो चौगुन चाकर, दुनिया भर मा बाढ़य शान।~16

‘अमित’ महोबा के बलवंता, आल्हा आगू कोन सजोर।
बाढ़त नदियाँ पूरा पानी, पुन्नी कस चन्दा अंजोर।~17

झगरा माते बात-बात मा, मार काट अउ हाहाकार।
पोठ लहू के होरी होवय, पवन सहीं खड़कय तलवार।~18

काँही तो नइ भावय इनला, रास रंग अउ तीज तिहार।
फड़फड़ फरकय भक्कम भुजबल, रहँय जुद्ध बर बीर तियार।~19

सुते नींद नइ आवय दसना, बड़ बज्जर बलखर बलबीर।
लड़त-लड़त बीतय दिन रतिहा, दँय झट बैरी छाती चीर।~20

राजपाट राजा रज रक्छक, आल्हा नइ तो चिटिक अबेर।
कुकुर कोलिहा सौ का करहीं, आल्हा ऊदल बब्बर शेर।~21

सतरा बछर उमर मा होवय,आल्हा के शुभ लगन बिहाव।
नैनागढ़ नेपाली राजा, बेटी मछला संग हियाव।~22

राजकुमारी मछला जानय, जादू के जब्बर जर ग्यान।
नाँव सोनवा मछला जानव, रहय एक नइ इँखर समान।~23

बीर बहादुर बघवा बेटा, मछला आल्हा के संतान।
बाप कका कस बड़ बलवंता, इंदल बरवाना बलवान।~24

आल्हा के पराक्रम

राग रागिनी नइ तो भावय, राजमहल अब नइच सुहाय।
बोल बचन सुन महतारी के, बेटा बाघ मार घर लाय।~25

आज बाघ कल बैरी मारव, तब छतिया के दाह बुताय,
बिन अहीर के मैं नइ मानँव, दाई ताना इही सुनाय।~26

जेखर बेटा कायर निकले, महतारी रो-रो पछताय।
सुनव दुनों तुम आल्हा ऊदल, असल पूल जे बचन निभाय।~27

कुकुर बछर बारा बस जीयय, जीयय सोला साल सियार।
बरिस अठारा छत्री जीये, आगू के जिनगी बेकार।~28

मूँड़ टँगागे बाप कका के, माँडूगढ़ बर रुख के डार।
अधरतिया के अध बेरा मा, मूँड़ी बड़ पारय गोहार।~29

आवव आल्हा ऊदल आवव, मोर लड़ंका लठिया लाल।
बँच के आहू माँडूगढ़ मा, बन बघेल के जी के काल।~30

खूब लड़इया लहुआ आल्हा, दूसर ले देवी बरदान।
भगत भवानी सारद माँ के,जइसे सीया के हनुमान।~31

बइठ बछर बारा बन तपसी, मैहर माई के दरबार।
मूँड़ काट अरपन देवी ला, होय अमर आल्हा अवतार।~32

आल्हा ऊदल चलथें अइसे, जइसे रामलखन चलि जाय।
भुजबल भारी भक्कम भइगे, आँखी भभका कस भमकाय।~33

आल्हा ऊदल सिरतों सेउक,समझँय येला अपन सुभाग।
धरम करम हे राजपूत के, लड़त-लड़त दँय प्रान तियाग।~34

धरम धजा कस उड़े पताका, नाँव धराये हे अलहान।
सूरुज बूड़य बुड़ती बेरा, नइ बूड़े आल्हा के शान।~35

जीत-जीत के जिनगी जीयँय, जउँहर जोद्धा जय जयकार।
जेखर बैरी जीयँत जागय, ओखर जिनगी हा बेकार।~36

रन मा आल्हा करँय सवारी, पुष्यावत हाथी के नाँव,
खदबिद-खदबिद घोडा़ दउँड़े, कहाँ थोरको माढ़य पाँव।~37

देशराज बर खाये किरिया, आल्हा जोरय जम्मों जात।
एकमई सब राहव काहय, भेदभाव के छोड़व बात।~38

सबके हितवा आल्हा ऊदल, परहित मा ये भरँय हुँकार।
रक्छक बहिनी महतारी के, बैरी के कर दँय सरी उजार।~39

आल्हा ऊदल बड़ बलिदानी, राज महोबा के बिसवास।
करनी अइसन करें तियागी, अमर नाँव लिखगे इतिहास।~40

कन्हैया साहू “अमित”
शिक्षक ~भाटापारा (छ.ग)
संपर्क ~ 9200252055

वीर महाराणा प्रताप : आल्हा छंद

जेठ अँजोरी मई महीना,नाचै गावै गा मेवाड़।
बज्र शरीर म बालक जन्मे,काया दिखे माँस ना हाड़।

उगे उदयसिंह के घर सूरज,जागे जयवंता के भाग।
राजपाठ के बने पुजारी,बैरी मन बर बिखहर नाग।

अरावली पर्वत सँग खेले,उसने काया पाय विसाल।
हे हजार हाथी के ताकत,धरे हाथ मा भारी भाल।

सूरज सहीं खुदे हे राजा,अउ संगी हेआगी देव।
चेतक मा चढ़के जब गरजे,डगमग डोले बैरी नेव।

खेवन हार बने वो सबके,होवय जग मा जय जयकार।
मुगल राज सिंघासन डोले,देखे अकबर मुँह ला फार।

चले चाल अकबर तब भारी,हल्दी घाटी युद्ध रचाय।
राजपूत मनला बहलाके,अपन नाम के साख गिराय।

खुदे रहे डर मा खुसरे घर ,भेजे रण मा पूत सलीम।
चले महाराणा चेतक मा,कोन भला कर पाय उदीम।

कई हजार मुगल सेना ले,लेवय लोहा कुँवर प्रताप।
भाला भोंगे सबला भारी,चेतक के गूँजय पदचाप।

छोट छोट नँदिया हे रण मा,पर्वत ठाढ़े हवे विसाल।
डहर तंग विकराल जंग हे, हले घलो नइ पत्ता डाल।

भाला धरके किंजरे रण मा, चले बँरोड़ा संगे संग।
बिन मारे बैरी मर जावव,कोन लड़े ओखर ले जंग।

धुर्रा पानी लाली होगे,बिछगे रण मा लासे लास।
बइरी सेना काँपे थरथर,छोड़न लगे सलीम ह आस।

जन्मभूमि के रक्षा खातिर,लड़िस वीर बन कुँवर प्रताप।
करिस नहीं गुलामी कखरो,छोड़िस भारत भर मा छाप।

जीतेन्द्र वर्मा “खैरझिटिया”
बाल्को (कोरबा)
9981441795


आल्हा छंद : भागजानी घर बेटी होथे

भागजानी घर बेटी होथ, नोहय लबारी सच्ची गोठ I
सुन वो तैं नोनी के दाई, बात काहते हौ जी पोठ I1I
अड़हा कहिथे सबो मोला, बेटा के जी रद्दा अगोर I
कुल के करही नाव ये तोर, जग जग ले करही अंजोर I2I
कहिथव मैं अंधरा गे मनखे, बेटी बेटा म फरक करत I
एके रूख के दुनो ह शाखा, काबर दुवा भेदी म मरत I3I
सोचव तुमन बेटी नई होय, कुल के मरजाद कोन ढोय I
सुन्ना होय अचरा ममता के, मुड़ी धरके बईठे रोय I4I
आवव एक इतिहास रच दव, जिनगी के राह गढ़ दव I
दुनिया दारी के बेड़ी से, आजे तुमन अजाद कर दव I5I
बेटी पढ़ाव बेटी बढ़ाव, बेटी के तुम सनमान कर I
दुनो कुल के मान ये बेटी,सपना म ऊकर उड़ान भर I6I

विजेंद्र वर्मा अनजान
नगरगाँव(धरसीवां)
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आल्हा छंद : वीर शिवाजी के शान

वीर शिवाजी जयंती 19 फरवरी

वीर शिवाजी जनमे जग मा, शेर सँही ए राखिन शान।
धन्य-धन्य महतारी ऊँखर, जनमीं जेमन पूत महान।।1

ददा शाहजी जीजा दाई, जनम धरे शिवनेरी धाम।
नाँव छत्रपति जेखर अम्मर, कोटि-कोटि करँव प्रनाम।।2

नान्हें पन ले आज्ञाकारी, गुरू ददा दाई ला मान।
देश भक्ति नस-नस मा दँउड़े, हाजिर राहँय धरके जान।।3

धरम-करम मा अघुवा आगर, सिक्छा-दिक्छा पुन्य प्रताप।
सिक्छक माता सकल भवानी, सबले जादा छपगे छाप।।4

छदर-बदर सब हिन्दू परजा, करके सुन्ता सकला साथ।
भारत भुँइयाँ भूसन राजा, तोर अमित हा लागय माथ।।5

कन्हैया साहू “अमित”
शिक्षक~ भाटापारा
9200252055
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मैं वीर जंगल के : आल्हा छंद

झरथे झरना झरझर झरझर,पुरवाही मा नाचे पात।
ऊँच ऊँच बड़ पेड़ खड़े हे,कटथे जिँहा मोर दिन रात।

पाना डारा काँदा कूसा, हरे मोर मेवा मिष्ठान।
जंगल झाड़ी ठियाँ ठिकाना,लगथे मोला सरग समान।

कोसा लासा मधुरस चाही,नइ चाही मोला धन सोन।
तेंदू पाना चार चिरौंजी,संगी मोर साल सइगोन।

घर के बाहिर हाथी घूमे,बघवा भलवा बड़ गुर्राय।
आँखी फाड़े चील देखथे,लगे काखरो मोला हाय।

छोट मोट दुख मा घबराके,जिवरा नइ जावै गा काँप।
रोज भेंट होथे बघवा ले, कभू संग सुत जाथे साँप।

लड़े काल ले करिया काया,सूरुज मारे कइसे बान।
झुँझकुर झाड़ी अड़बड़ भारी,लगे रात दिन एक समान।

घपटे हे अँधियारी घर मा,सूरुज नइ आवै गा तीर।
बघवा भलवा हाथी सँग मा,रहिथौं मैं बनके गा बीर।

रेंग सके नइ कोनो मनखे,उँहा घलो मैं देथौं भाग।
आलस जर जर भूँजा जाथे,हरे खुदे तन मोरे आग।

गरब गठैला तन के करथौं,चढ़ जाथौं मैं झट ले झाड़।
सोना उपजाथौं महिनत कर,पथरा के छाती ला फाँड़।

उतरौं चढ़ौ डोंगरी घाटी ,तउरौं मैं नँदिया के धार।
कतको पीढ़ी इँहिचे खपगे,मानन नहीं कभू जी हार।

डर नइ लागे बघवा भलवा,डर नइ लागे बिखहर साँप।
मोर जीव हा तभे कापथे,जब होथे जंगल के नाँप।

पथरा कस छाती ठाहिल हे,पुरवा पानी कस हे चाल।
मोर उजाड़ौ झन घर बन ला,झन फेकव जंगल मा जाल।

जीतेन्द्र वर्मा”खैरझिटिया”
बाल्को(कोरबा)
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मैं वीर जंगल के : आल्हा छंद

झरथे झरना झरझर झरझर,पुरवाही मा नाचे पात।
ऊँच ऊँच बड़ पेड़ खड़े हे,कटथे जिंहा मोर दिन रात।

पाना डारा काँदा कूसा, हरे हमर मेवा मिष्ठान।
जंगल झाड़ी ठियाँ ठिकाना,लगथे मोला सरग समान।

कोसा लासा मधुरस चाही,नइ चाही मोला धन सोन।
तेंदू पाना चार चिरौंजी,संगी मोर साल सइगोन।

घर के बाहिर हाथी घूमे,बघवा भलवा बड़ गुर्राय।
आँखी फाड़े चील देखथे,लगे काखरो मोला हाय।

छोट मोट दुख मा घबराके,जिवरा नइ जावै गा काँप।
रोज भेंट होथे बघवा ले, कभू संग सुत जाथे साँप।

लड़े काल ले करिया काया,सूरुज मारे कइसे बान।
झुँझकुर झाड़ी अड़बड़ भारी,लगे रात दिन एक समान।

घपटे हे अँधियारी घर मा,सूरुज नइ आवै गा तीर।
बघवा भलवा हाथी सँग मा,रहिथौं मैं बनके गा बीर।

रेंग सके नइ कोनो मनखे,उँहा घलो मैं देथौं भाग।
आलस जर जर भूँजा जाथे,हरे खुदे तन मोरे आग।

गरब गठैला तन के करथौं,चढ़ जाथौं मैं झट ले झाड़।
सोना उपजाथौं महिनत कर,पथरा के छाती ला फाँड़।

उतरौं चढ़ौ डोंगरी घाटी ,तउरौं मैं नँदिया के धार।
कतको पीढ़ी इँहिचे खपगे,मानन नहीं हमन हा हार।

डर नइ लागे बघवा भलवा,डर नइ लागे बिखहर साँप।
मोर जीव हा तभे कापथे,जब होथे जंगल के नाँप।

पथरा कस छाती ठाहिल हे,मोर हवा कस हावय चाल।
मोर उजाड़ौ झन घर बन ला,झन फेकव जंगल मा जाल।

जीतेन्द्र वर्मा”खैरझिटिया”
बाल्को(कोरबा)

छत्तीसगढ़ के वीर बेटा – आल्हा छंद

महतारी के रक्षा खातिर,धरे हवँव मैं मन मा रेंध।
खड़े हवँव मैं छाती ताने,बइरी मारे कइसे सेंध।

मोला झन तैं छोट समझबे,अपन राज के मैंहा वीर।
अब्बड़ ताकत बाँह भरे हे , रख देहूँ बइरी ला चीर।

तन ला मोर करे लोहाटी ,पसिया चटनी बासी नून।
बइरी मन ला देख देख के,बड़ उफान मारे गा खून।

नाँगर मूठ कुदारी धरधर , पथना कस होगे हे हाथ।
अबड़ जबर कतको हरहा ला,पहिराये हँव मैंहा नाथ।

कते खेत के तैं मुरई रे, ते का लेबे मोला जीत।
परही मुटका कसके तोला,छिन मा तैं हो जाबे चीत।

आँखी कहूँ गड़ाबे बइरी,देहूँ मैं खड़ड़ी ओदार।
महानदी अरपा पइरी मा,बोहत रही लहू के धार।

उड़ा जबे बइरी तैं दुरिहा ,कहूँ मार परहूँ मैं फूँक।
खड़े खड़े बस देखत रहिबे,होवे नहीं मोर ले चूक।

मोर झाँक के आँखी देखव,गजब भरे हावय अंगार।
पाना डारा कस बइरी ला,एके छिन मा देहूँ बार।

हाथ गोड़ हा पूरे बाँचे ,नइ चाही मोला हथियार।
अपन राज के आनबान बर,खड़े हवँव मैं सदा तियार।

ललहूँ पटको कमर कसे हँव,चप्पल भँदई हावय पाँव।
अड़हा झन तैं कभू जानबे,छिन मा तोर बुझाहूँ नाँव।

भाला बरछी गोला बारुद ,भेद सके नइ मोरे चाम।
दाँत कटर देहूँ ततकी मा,मेटा जही सबो के नाम।

हवे हवा कस चाल मोर जी,कोन भला पाही गा पार।
चाहे कतको हो खरतरिहा,होही खच्चित ओखर हार।

जब तक जीहूँ ए माटी मा,बनके रइहूँ बब्बर शेर।
डर नइ हे मोला कखरो ले,का करही कोलिहा मन घेर।

जीतेन्द्र वर्मा “खैरझिटिया”
बाल्को(कोरबा)