Category: कुण्‍डलियॉं

अमित के कुण्डलिया ~ 26 जनवरी

001~ तिरंगा झंड़ा
धजा तिरंगा देश के, फहर-फहर फहराय।
तीन रंग के शान ले, बैरी घलो डराय।
बैरी घलो डराय, रहय कतको अभिमानी।
देबो अपन परान, निछावर हमर जवानी।
गुनव अमित के गोठ, कभू झन आय अड़ंगा।
जनगण मन रखवार, अमर हो धजा तिरंगा।

002~ भारत
भुँइयाँ भारत हा हवय, सिरतों सरग समान।
सुमता के उगथे सुरुज, होथे नवा बिहान।
होथे नवा बिहान, फुलय सब भाखा बोली।
किसिम किसिम के जात, दिखँय जी एक्के टोली।
गुनव अमित के गोठ, कहाँ अइसन जुड़ छँइयाँ।
सबले सुग्घर देश, सरग कस भारत भुँइयाँ।

कन्हैया साहू “अमित”
शिक्षक~भाटापारा (छत्तीसगढ़)
संपर्क~9200252055

जस गीत : कुंडलिया छंद

काली गरजे काल कस,आँखी हावय लाल।
खाड़ा खप्पर हाथ हे,बने असुर के काल।
बने असुर के काल,गजब ढाये रन भीतर।
मार काट कर जाय,मरय दानव जस तीतर।
गरजे बड़ चिचियाय,धरे हाथे मा थाली।
होवय हाँहाकार,खून पीये बड़ काली।

सूरज ले बड़ ताप मा,टिकली चमके माथ।
गल मा माला मूंड के,बाँधे कनिहा हाथ।
बाँधे कनिहा हाथ,देंह हे कारी कारी।
चुंदी हे छरियाय,दाँत हावय जस आरी।
बहे लहू के धार,लाल होगे बड़ भूरज।
नाचत हे बिकराल,डरय चंदा अउ सूरज।

घबराये तीनो तिलिक,काली ला अस देख।
सबके बनगे काल वो,बिगड़े ब्रम्हा लेख।
बिगड़े ब्रम्हा लेख, देख रोवय सुर दानँव।
काली बड़ बगियाय,कहे कखरो नइ मानँव।
भोला सुनय गोहार,तीर काली के आये।
पाँव तरी गिर जाय,देख काली घबराये।

काली देखय पाँव मा,भोला हवय खुँदाय।
जिभिया भारी लामगे,आँखी आँसू आय।
आँखी आँसू आय,शांत काली हो जाये।
होवय जय जयकार,फूल देवन बरसाये।
बंदव माता पाँव,बजाके घंटा ताली।
जय हो देबी तोर,काल कस माता काली।

जीतेंद्र वर्मा”खैरझिटिया”
बाल्को (कोरबा)


सज्जन के संग : कोदूराम दलित के कुण्‍डलियॉं





सेवा दाई ददा के रोज करत तुम जाव
मानो उनकर बात ला अऊर सपूत कहाव
अऊर सपूत कहाव, बनो तुम सरबन साँही
पाहू आसिरवाद तुम्हर भला हो जाही
करथंय जे मन सेवा ते मन पाथंय मेवा
यही सोच के करौ ददा-दाई के सेवा।

धरती ला हथियाव झन, धरती सबके आय
ये महतारी हर कभू ककरो संग न जाय
ककरो संग न जाय, सबो ला धरती देवौ
करौ दान धरती के पुण्य कमा तुम लेवौ
देवौ येला भूमिहीन भाई-बहिनी ला
सिरजिस हे भगवान सबो खातिर धरती ला।

संगत सज्जन के करौ, सज्जन सूपा आय
दाना-दाना ला रखय, भूंसा देय उडा़य
भूंसा देय उडा़य असल दाना ला बाँटय
फून-फून के कनकी, कोंढा़ गोटी छांटय
छोडौ़ तुम कुसंग, बन जाहू अच्छा मनखे
सज्जन हितवा आय, करो संगत सज्जन के।

कोदूराम दलित



छन्द के छ : कुण्डलिया छन्द

चेत

हरियर रुखराई कटिस, सहर लील गिन खेत
देखत हवैं बिनास सब, कब आही जी चेत
कब आही जी चेत , हवा-पानी बिखहर हे
खातू के भरमार , खेत होवत बंजर हे
रखौ हवा-ला सुद्ध , अऊ पानी-ला फरियर
डारौ गोबर-खाद , रखौ धरती ला हरियर

कवि के काम

कविता गढ़ना काम हे, कवि के अतकी जान
जुग परिबर्तन करिस ये, बोलिन सबो सियान
बोलिन सबो सियान , इही दिखलावे दरपन
सुग्घर सुगढ़ बिचार, जगत बर कर दे अरपन
कबिता – मा भर जान, सदा हे आगू बढ़ना
गोठ अरुन के मान, मयारू कबिता गढ़ना ।।

छत्तीसगढ़ के संस्कृति

छत्तीसगढ़ के संस्कृति, एक समुन्दर जान
डबरा के भिन्दोल मन , सदा रहीं अंजान
सदा रहीं अंजान , मनेमन – मा भरमाहीं
घूमें तीनों लोक , कहाँ अइसन सुख पाहीं
ढाई आखर बाँच, अकड़ झन पोथी पढ़ के
एक समुन्दर जान, संस्कृति छत्तीसगढ़ के |

कुण्डलिया छन्द

डाँड़ (पद) – ६, ,चरन – १२, पहिली २ डाँड़ दोहा अउ बाद के ४ डाँड़ रोला होथे. माने कुण्डलिया छन्द हर १ दोहा अउ १ रोला ला मिला के बनाये जाथे.

तुकांत के नियम – दोहा के पहिली २ डाँड़ मा दोहा के नियम अउ बाद के ४ डाँड़ मा रोला के नियम के पालन होथे.

हर डाँड़ मा कुल मातरा – २४ दोहा अउ रोला के नियम अनुसार.

यति / बाधा – दोहा अउ रोला के नियम अनुसार

खास– कुण्डलिया छन्द मा बहुत अकन खास बात हे. येखर सुरुवात माने दोहा वाले पहिली चरन के सुरुवात के सबद या सबद समूह या आगू-पीछू करके सबद समूह ला कुण्डलिया के आखिरी मा माने रोला के ८ वाँ चरन के आखिरी मा आना जरूरी होथे. माने कि कुण्डलिया छन्द के मुड़ी- पूँछी एक्के जइसन होना चाहिए. इही पाय के एला कुण्डलिया कहिथें. अइसे लागथे मानों कोन्हों साँप हर कुण्डली मार के बइठे हे अउ ओखर मुड़ी- पूँछी एक्के बरोबर दिखथे.

कुण्डलिया छन्द के दूसर खासियत ये हे कि दोहा के ४ था चरन हर, रोला के पहिली चरन बने.

हरियर रुखराई कटिस, सहर लील गिन खेत (दोहा के पहिली डाँड़)
देखत हवैं बिनास सब, कब आही जी चेत (दोहा के दूसर डाँड़)
कब आही जी चेत , हवा-पानी बिखहर हे (रोला के पहिली डाँड़)
खातू के भरमार , खेत होवत बंजर हे (रोला के दूसर डाँड़)
रखौ हवा-ला सुद्ध , अऊ पानी-ला फरियर (रोला के तीसर डाँड़)
डारौ गोबर-खाद , रखौ धरती ला हरियर (रोला के चउथा डाँड़)

एमा पहिली दू डाँड़ “दोहा” हे. बाद के चार डाँड़ रोला हे.
दोहा के चउथा चरन “कब आही जी चेत’ रोला के सुरुवात मा आय हे. दोहा के पहिली सबद “हरियर” रोला के आखिर मा आय हे. कुंडलिया के दोहा वाले हिस्सा मा दोहा के नियम लागू होय हे, अउ रोला वाले हिस्सा मा रोला के नियम के पालन होय हे.

अरुण कुमार निगम
एच.आई.जी. १ / २४
आदित्य नगर, दुर्ग
छत्तीसगढ़