Category: चौपाई

मतदान : चौपई छंद (जयकारी छंद)

देश करत हावय अह्वान।
बहुत जरूरी हे मतदान।

मतदाता बनही हुँशियार।
लोक स्वप्न होही साकार।

लोकतंत्र के जीव परान।
मतदाता मत अउ मतदान।

मत दे बर झन छूटँय लोग।
कहिथे निर्वाचन आयोग।

उम्मर हो गय अठरा साल।
मतदाता बन करव कमाल।

वोटिंग तिथि के रखलौ ध्यान।
खच्चित करना हे मतदान।

काज जरूरी हे झन टार।
वोट, बूथ मा जा के डार।

सीयू बीयू वी वी पेट।
बिस्वसनी चौबिस कैरेट।

एक बात के राखन ध्यान।
शान्ति पूर्ण होवय मतदान।

पाँच साल मा आय चुनाव।
सुग्घर जनमत दे लहुटाव।

सुखदेव सिंह अहिलेश्वर”अँजोर”
गोरखपुर,कवर्धा छत्तीसगढ़
मोबा-9685216602
sukhdev.singh.ahileshver31@gmail.com

गहना गुरिया : चौपाई छंद

जेवर ये छत्तीसगढ़ी, लिखथे अमित बखान।
दिखथे चुकचुक ले बने, गहना गरब गुमान।
नवा-नवा नौ दिन चलय, माढ़े गुठा खदान।
चलथे चाँदी सोनहा, पुरखा के पहिचान।।

पहिरे सजनी सुग्घर गहना,
बइठे जोहत अपने सजना।
घर के अँगना द्वार मुँहाटी,
कोरे गाँथे पारे पाटी।~1

बेनी बाँधे लाली टोपा,
खोंचे कीलिप डारे खोपा।
फिता फूँदरा बक्कल फुँदरी,
कोरे गाथें सुग्घर सुँदरी।~2

कुमकुम बिन्दी सेन्दुर टिकली,
माथ माँग मोती हे असली।
रगरग दमदम दमकै माथा,
कहत अमित हे गहना गाथा।~3

लौंग नाक नग नथली मोती,
फुली खुँटी दीया सुरहोती।
कान खींनवा लटकन तुरकी,
बारी बाला झुमका लुरकी।~4

गर मा चैन संकरी पुतरी,
गठुला गजरा गूँथे सुतरी।
सिरतो सूँता सूर्रा सुतिया,
भुलका पइसा रेशम रुपिया।~5

बहुँटा पहुँची चूरी ककनी,
बाँहा मरुआ पहिरे सजनी।
कड़ा नागमोरी बड़ अँइठे,
सजधज सजनी सुखिया बइठे।~6

कुची टँगनी रेशम करधन,
ए सब होथे कनिहा लटकन।
लाल पोलखा लुगरा साया,
गहना गुरिया फभथे काया।~8

सोन मुंदरी चाँदी छल्ला,
पहिर अंगरी झनकर हल्ला।
छल्ला सोना तांबा पीतल,
सजथे तन, मन होथे शीतल।~9

पाँव पैरपट्टी अउ पैरी,
बिन जोंही लागे सब बैरी।
साँटी टोंड़ा बिछिया लच्छा,
गोड़ सवाँगा सबले अच्छा।~10

पाँव मूँड़ नख गहना भारी,
दिखथे बढ़हर उही सुवारी।
महुँर मेंहदी अउ मुँहरंगी,
सोहागिन के ये सब संगी।~11

बाँधय घुँघरु घंटी पायल,
अलहन ले झन होवय घायल।
ठुआ टोटका मानय सतरा,
पहिरे ताबिज कठवा पखरा।~12

तइहा मा पर रुचि सिंगारी,
अब तो हे फेशन चिन्हारी।
फभित गवाँ गे,आने-ताने,
नकल सवाँगा हे मनमाने।~13

आज चैन सुख बनगे सोना,
बहुते हवय तभो ले रोना।
काखर मन ला सोन अघाथे,
सोन-सोन जप जग बउराथे।~14

सुग्घर सच्चा सोनहा, सोहागिन सिंगार।
सरी अंग हा बोलथे, गहना मया अपार।

कन्हैया साहू “अमित”
शिक्षक~भाटापारा (छ.ग)
संपर्क ~ 9200252055.

व्‍हाट्सएप म छत्‍तीसगढ़ के गहना मन के ये फोटू अड़बड़ दिन ले गिंजरत रहिस। ये फोटूला बनाए के दावा कई झिन करथें फेर कोन बनाए हे एकर बारे म हमला पता नइ हे। अपन पाठक मन के सुविधा बर व्‍हाट्सएप म फइले फोटू ल हम इहां लगावत हवन.

धरती मँइयाँ : चौपाई छन्द

नँदिया तरिया बावली, भुँइयाँ जग रखवार।
माटी फुतका संग मा, धरती जगत अधार।।

जल जमीन जंगल जतन, जुग-जुग जय जोहार।
मनमानी अब झन करव, सुन भुँइयाँ गोहार।।

पायलगी हे धरती मँइयाँ,
अँचरा तोरे पबरित भुँइयाँ।
संझा बिहना माथ नवावँव,
जिनगी तोरे संग बितावँव।~1

छाहित ममता छलकै आगर,
सिरतों तैं सम्मत सुख सागर।
जीव जगत जन सबो सुहाथे,
धरती मँइयाँ मया लुटाथे।~2

फुलुवा फर सब दाना पानी,
बेवहार बढ़िया बरदानी।
तभे कहाथे धरती दाई,
करते रहिथे सदा भलाई।~3

देथे सबला सुख मा बाँटा,
चिरई चिरगुन चाँटी चाँटा।
मनखे बर तो खूब खजाना,
इहें बसेरा ठउर ठिकाना।~4

रुख पहाड़ नँदिया अउ जंगल,
करथें मिलके जग मा मंगल।
खेत खार पैडगरी परिया,
धरती दाई सुख के हरिया।~5

धरती दाई हे परहितवा,
लगथे बहिनी भाई मितवा।
जींयत भर दुनिया ला देथे,
बदला मा धरती का लेथे।~6

आवव अमित जतन ला करबो,
धरती के हम पीरा हरबो।
देख दशा अपने ये रोवय,
धरती दाई धीरज खोवय।~7

बरफ करा गरमी मा गिरथे,
मानसून अब जुच्छा फिरथे।
छँइहाँ भुँइयाँ ठाड़ सुखावय,
बरबादी बन बाढ़ अमावय।~8

मतलबिया मनखे मनगरजी,
हाथ जोड़ के हावय अरजी।
धरती ले चल माफी माँगन,
खुदे पाँव झन टँगिया मारन।~9

बंद करव गलती के पसरा,
छदर-बदर झन फेंकव कचरा।
दुखदाई डबरा ला पाटव,
रुखराई मत एको काटव।~10

करियावय झन उज्जर अँचरा,
कूड़ादानी डारव कचरा।
कचरा के करबो निपटारा,
चुकचुक चमकै ये संसारा।~11

लालच लहुरा लउहा लाशा,
धरती सँउहें खीर बताशा।
महतारी कस एखर कोरा,
काबर सुख के भूँजन होरा।~12

पेड़ मीठ फर पथरा परथे,
हुमन करे मा हँथवा जरथे।
धरती के भरपुरहा कोरा,
दशा देख झन दाँत निपोरा।~13

सँइता सुख के सुग्घर सिढ़िया,
बाँटव बाढ़व राहव बढ़िया।
साहू अमित करय हथजोरी,
धर रपोट झन बनव अघोरी।~14

आवव राजा आवव परजा,
उतारबो धरती के करजा।
उड़ती बुड़ती उँचहा उज्जर,
दिखही दुनिया बहुते सुग्घर।~15

देथे धरती जिनगी भर जी,
झन सकेल,तैं सँइता कर जी।
बाँटे मा मिलथे सुख गहना,
एकमई सब हिलमिल रहना।~16

रोकव राक्छस परदुसन,धरती करय पुकार।
पुरवाही फुरहुर बहय, अमित दवा दमदार।।

कन्हैया साहू “अमित”
शिक्षक~भाटापारा (छ.ग)
संपर्क~9200252055

किसानी के पीरा

खेत पार मा कुंदरा, चैतू रखे बनाय ।
चौबीसो घंटा अपन, वो हर इहें खपाय ।।

हरियर हरियर चना ह गहिदे । जेमा गाँव के गरूवा पइधे
हट-हट हइरे-हइरे हाँके । दउड़-दउड़ के चैतू बाँके

गरूवा हाकत लहुटत देखय । दल के दल बेंदरा सरेखय
आनी-बानी गारी देवय । अपने मुँह के लाहो लेवय

हाँफत-हाँफत चैतू बइठे । अपने अपन गजब के अइठे
बड़बड़ाय वो बइहा जइसे । रोक-छेक अब होही कइसे

दू इक्कड़ के खेती हमरे । कइसे के अब जावय समरे
कोनो बांधय न गाय-गरूवा । सबके होगे हरही-हरहा

खूब बेंदरा लाहो लेवय । रउन्द-रउन्द खेत ल खेवय
कइसे पाबो बिजहा-भतहा । खेती-पाती लागय रटहा

ओही बेरा पहटिया, आइस चैतू तीर ।
राम-राम दूनों कहिन, बइठे एके तीर ।।1।।

चैतू गुस्सा देख पहटिया । सोचय काबर बरे रहटिया
पूछत हवय पहटिया ओला । का होगा हे आजे तोला

कइसे आने तैं हा लागत । काबर तैं बने नई भाखत
तब चैतू हर तो बोलय । अपने मन के भड़ास खोलय

भोगत हन हम तुहर पाप ला । अउ गरूवा के लगे श्राप ला
गरूवा ला तुमन छेकव नही । खेती-पाती ल देखव नही

देखव देखव हमर हाल ला । गाय-गरूवा के ये चाल ला
अपन प्राण कस राखे म घला । कतका बाचे हे देख भला

गुजर-बसर अब कइसे होही । अइसन खेती कोने बोही
कहूं बनी-भूती ला करबो । कइसनो होय पेटे भरबो

करब कहूं आने बुता, खेती-पाती छोड़ ?
धान-पान आही इहां, बादर छप्पर तोड़ ??2??

सुनत पहटिया चैतू गोठे । अंतस भीतर घाते सोचे
फेर धीर धरके ओ बोलय । अपने अंतस ला तो खोलय

कका सुनव गा गोठे मोर । सिरतुन हे बाते तोरे
फेर तुमन अब देखव गुन के । सही-गलत मा एके चुन के

कोने मेरा परिया-चरिया । बाचे हे का एको हरिया
कती गाय-गरूवा ल चराबों । घूम फीर के केती जाबो

हमन हाथ मा घाव करे हन । लालच कोठी हमन भरे हन
अब ये पीरा कोने सहिही । अपने दुख काखर ले कहिही

आनी-बानी मशीन आये । कोने अब गरूवा ला भाये
बइला ला तो टेक्टर खागे । पाकिट मा अब दूध ह आगे

बेटा तोरे गोठ हा, नो हय झूठ लबार ।
फेर सबो सुविधा इहां, खेती बिन बेकार ।।3।।

चैतू बोलय धीरज धर के । अपने भीतर साँसे भर के
मशीन चाउर-दार बनाही । जेमा हमर पेट भर जाही

सोच पहटिया कइसे होही । धान-पान बिन दुनिया रोही
चल बेटा मंत्री कर जाबो । अपने मन के हाल सुनाबो

रोक-छेक गरूवा मा होवय । बेंदरा घला बड़ बिट्टोवय
चरिया-परिया जेने छेके । अब तो ओमन घुटना टेके

संग पहटिया चैतू जावय । ओती ले एक पंच आवय
बीच डगर मा तीनों जुरथे । जय जोहार सबोझन करथे

आत कहां ले हव दूनोंझन । जात कहां हव गा अपने मन
पंच ठाड़ होके पूछय जब । चैतू अघुवा के बोलय तब

धान-पान पइली पसर, होइस ना ये साल ।
गाय चना ला हे चरत, का कहि अपने हाल ।।4।।

दिन-दुकाल मा धान लेसागे । हमर भाग ले ओल ह आगे
तेहू मा गरूवा-गाय पदोवय । संग बेंदरा बड़ बिट्टोवय

चिंता झन कर कका अभे तैं । पंच कहय अब बात कहँव मैं
दिन दुकाल के पइसा मिलही । सरकार खजाना ला ढिलही

सूखा राहत हमन ह पाबो । अब नुकासानी अपन भुलाबो
करजा-बोड़ी माफी करही । सरकारे हा पीरा हरही

सुनत गोठ ये चैतू सोचय । अपने मन ला अपने नोचय
बईमान अब हमन कहाबो । बिना मेहनत पइसा पाबो

छोटे ला दू पइसा देही । अपने कोठी खुद भर लेही
अही छूट हा लूट कहाथे । तभे देश गड्ढ़ा मा जाथे

फोकट मा कुछ बांटना, होवय नही निदान ।
बिपत मिटय जड़-मूल ले, अइसे कुछ सिरजान ।।5।।

कहय पंच ले चैतू खुल्ला । गरूवा काबर रहिथे ढिल्ला
सूखा राहत का सिरजाही । रोक-छेक का अब हो जाही

ये राहत के सुख चरदिनया । फेर ओही संझा-बिहनिया
करजा-बोड़ी फेरे लेबो । इही हाल मा कइसे देबो

बड़ दुकाल हर साल परत हे । तेमा गरूवा-गाय चरत हे
का हमला सरकार पोसही । खेती-पाती कहां बोजही

खेत-खार बिन काम चलय ना । फोकट मा ये पेट भरय ना
खेत-खार जब रहिथे चंगा । तभे कठौती दिखथे गंगा

खातू-माटी पानी चाही । तभे किसानी हाही-माही
सबले भारी हे रखवारी । सुन लौ गा पंच संगवारी

चलव करब मिलके हमन, कोनो एक उपाय ।
खेती हा होवय बने, पीरा सबो सिराय ।।6।।

रूख-राई ला काटे मनखे । महल बनाये घाते तनके
चरिया-परिया ला छांट-छांट के । बसे आदमी बांट-बांट के

छेद-छेद के धरती छाती । सब़ अलहन करे आत्मघाती
दिन-बा-दिन दुकाल अब परथे । धरती के छाती हा जरथे

पल्लो बर तो पानी चाही । पानी-कांजी कइसे आही
बोर भरोसा होय ना खेती । धरती सूख्खा तेखर सेती

पानी अउ रखवारी चाही । तभे इहां तो सुराज आही
अइसे कोनो उपाय करबो । अउ दुनिया के पेटे भरबो

चैतू अइसे कहत रहय जब । अउ किसानगन संघरगे तब
मने लगा के गोठ सुनत हे । अपने भीतर सबो गुनत हे

मोहन मंडल हा कहय, सुग्घर तोरे गोठ ।
चैतू तोरे सोच हा, मोला लागे पोठ ।।7।।

सिरतुन के ये बात तोर हे । आजे रतिहा काल भोर हे
कइसे होही पोठ किसानी । कहव-कहव गा गोठ सियानी

राम-राम कहि चैतू बोलय । अपन सोच के परदा खोलय
मोहन मंडल, मोला लगथे । सरकार सबो हमला ठगथे

फोकट मा तो बांट-बांट के । जात-पात मा छांट-छांट के
हमला तो अलाल करथे । स्वाभिमान ला हमरे हरथे

काम-बुता तो हमला चाही । जेखर ले दू पइसा आही
होही हमरे पोठ किसानी । येमा का के हे हैरानी

सरकार हमर ठेका लेवय । खेती बर तो पानी देवय
चरिया-परिया खाली छोड़य । वोट-बैंक के मोहे तोड़य

मोहन मंडल पूछथे, कइसे बाबू पंच ।
चैतू के ये गोठ हा, हे का सिरतुन रंच ।।8।।

पंच कहय ये गोठ बने हे । आज कका हा बने तने हे
अभी समस्या हे रखवारी । पाछू पानी के हे बारी

चरिया-परिया के छोड़े मा । बरदि-पहट के तो जोरे मा
गाये-गरूवा हा छेकाही । तब खेती हमरे बच जाही

कइसे पहटिया खोरबहरा । बरदी मा देबे ना पहरा
चरिया-परिया हमला चाही । जिहां पहट-बरदी हा जाही

तब हमला का के दुख होही । ऐखर ले खेती उलहोही
कहय खोरबहरा हा हँस के । खेती काबर रहिही फँस के

गोठ सबोझन ला जचगे तब । सोचत हे हम का करबो अब
सबो कसम खाइन जुरमिल के । हम खेती करबो हिलमिल के

हम छोड़ब-छोड़ाब अब, बेजाकब्जा गाँव ।
चरिया-परिया छोड़बो, छोड़ब रूखवा छाँव ।।9।।

जुरमिल के सब हामी देइन । मिलके सरपंच करा गेइन
गोठ बतावय ओला जम्मा । कइसे किसान होत निकम्मा

बेजाकब्जा जभे सिराही । तभे गाँव मा सुराज आही
होय गाँव मा अब पाबंदी । अइसे तो करव लामबंदी

चरिया-परिया हम छोड़ाबो । बने-बने तब खेत कमाबो
बरदी मा गरूवा मन चरही । छंदाही सब हरहा हरही

एक बुता अउ करतेन हमन । खेती बर पानी के होय जतन
पानी-कांजी अउ रखवारी । खेती बर होय संगवारी

कइसे करबो कइसे होही । ये विचार ला कोन समोही
विचार कइसे पूरा होही । हमरे डोंगा कोने खोही

पूछथ हावे सरपंच हा, कइसे करब निदान ।
सुझ-बुझ देखावव अपन, संगी हमर मितान ।।10।।

जुरमिल मंत्री करा चलव सब । हमरे निदान हा होही तब
मोहन मंडल अउ चैतू कहिथे । जब सबझन मन सोचत रहिथे

मंत्री मेरा सबझन गेइन । अपन बात आघू रख देइन
तब मंत्री पूछय ऊंखर ले । कहत रहँय जी तेखर ले

कोने उपाय हम सिरजाई । अपन किसानी पोठ बनाई
कइसे पानी के लइ गारंटी । खन-खन बोलय हमरे अंटी

सोच समझ के चैतू कहिथे । जे पीरा ला सहिते रहिथे
दूइ बात हे हमर किसानी । जेखर ले करना हे मितानी

रखवारी के झंझट टूटय । अउ पानी के भुलका फूटय
बेजाकब्जा ला छोड़े मा । गाँवे ले नाता जोड़े मा

होवय हमरे पोठ किसानी । काम-बुता तब होय सियानी
एक बुता हम अइसे करबो । जुरमिल के सब पीरा हरबो

मनरेगा के काम ले, बनातेन हम बांध ।
गाँव-गाँव हर खार ला, नहर-नहर ले छांद ।।11।।

छोटे-छोटे बांध बनाके । छोटे-छोटे नहर खनाके
गाँव-गाँव मा पानी भरबो । खेत-खार के पीरा हरबो

बरसा के पानी बांधे रोकब । बोर खनब ला सबझन टोकब
कुॅवा बावली तरिया भरही । तभे खेत हा हमरे भरही

नदिया-नरवा चाकर करबो । बरसा पानी जेमा भरबो
जे परिया हा उतारू लागय । जिहां-जिहां ले पानी भागय

ओमा सुग्घर बांध बनाबो । नदिया-नरवा बांध मिलाबो
गाँच-गाँव मा होवय पानी । जइसे टोटा होवय बानी

खार-खार मा पेड़ लगाबो । बरखा ला तो हमन रिझाबो
गाँव-गाँव मा बांध बनाबो । बरसा पानी जेमा पाबो

संग प्रकृति के हम रहब, तब होही सब काम ।
खेती-पाती लगही बने, लगही सुग्घर धाम ।।12।।

रमेशकुमार सिंह चौहान
मिश्रापारा, नवागढ़
जिला-बेमेतरा (छ.ग.)

दानलीला कवितांश

जतका दूध दही अउ लेवना।
जोर जोर के दुध हा जेवना।।
मोलहा खोपला चुकिया राखिन।
तउन ला जोरिन हैं सबझिन।।
दुहना टुकना बीच मढ़ाइन।
घर घर ले निकलिन रौताइन।।
एक जंवरिहा रहिन सबे ठिक।
दौरी में फांदे के लाइक।।
कोनो ढेंगी कोनो बुटरी।
चकरेट्ठी दीख जइसे पुतरी।।
एन जवानी उठती सबके।
पंद्रा सोला बीस बरिसि के।।
काजर आंजे अंलगा डारे।
मूड़ कोराये पाटी पारे।।
पांव रचाये बीरा खाये।
तरुवा में टिकली चटकाये।।
बड़का टेड़गा खोपा पारे।
गोंदा खोंचे गजरा डारे।।
पहिरे रंग रंग के गहना।
ठलहा कोनो अंग रहे ना।।
कोनो पैरी चूरा जोड़ा।
कोनो गठिया कोनो तोंड़ा।।
कोनों ला घुंघरू बस भावे।
छम छम छम छम बाजत जावें।।
खनर खनर चूरी बाजै।
खुल के ककनी हाथ विराजे।।
पहिरे बहुंटा और पछेला।
जेखर रहिस सौंख हे जेला।।
दोहा-
करधन कंवर पटा पहिर, रेंगत हाथी चाल।
जेमा ओरमत जात हे, मोती हीरा लाल ।।

पं.सुन्‍दर लाल शर्मा


(श्री राकेश तिवारी जी द्वारा सन् 1996 म प्रकाशित छत्‍तीसगढ़ी काव्‍य संग्रह ‘छत्‍तीसगढ़ के माटी चंदन’ ले साभार)

उत्तर कांड के एक अंश छत्तीसगढी म

अब तो करम के रहिस एक दिन बाकी
कब देखन पाबों राम लला के झांकी
हे भाल पांच में परिन सबेच नर नारी
देहे दुबवराइस राम विरह मा भारी
दोहा –
सगुन होय सुन्दर सकल सबके मन आनंद।
पुर सोभा जइसे कहे, आवत रघुकुल चंद।।
महतारी मन ला लगे, अब पूरिस मन काम
कोनो अव कहतेच हवे, आवत बन ले राम
जेवनी आंखी औ भूजा, फरके बारंबार
भरत सगुन ला जानके मन मां करे विचार
अब तो करार के रहिस एक दिन बाकी
दुख भइस सोच हिरदे मंगल राम टांकी
कइसे का कारण भइस राम नई आईन
का जान पाखंडी मोला प्रभु विसराईन
धन धन तै लक्ष्मिन तै हर अस बड़भागी
श्रीरामचंद्र के चरन कवल अनुरागी
चीन्हिन अड़बड़ कपटी पाखंडी चोला
ते कारन अपन संग नई लेईन मोला
करनी ला मोर कभू मन मा प्रभू धरही
तो कलप कलप के दास कभू नई तरही
जन के अवगुनला कभू चित नई लावै
बड़ दयावंत प्रभु दीन दयाल कहावै
जी मा अब मोर भरोसा एकेच आवै
झट मिलहि राम सगुन सुभ मोला जनावै
बीते करार घर मा परान रह जाही
पापी ना मोर कस देखे मां कहूं आही
दोहा –
राम विरह के सिन्धु मां, भरत मगन मत होत।
विप्र रूप धर पवन सुत, पहुंचिन जइसे पोत।।

पद्मश्री डॉ.मुकुटधर पाण्‍डेय

(श्री राकेश तिवारी जी द्वारा सन् 1996 म प्रकाशित छत्‍तीसगढ़ी काव्‍य संग्रह ‘छत्‍तीसगढ़ के माटी चंदन’ ले साभार)

महतारी दिवस विशेष : दाई

दाई

(चौपई छंद)

दाई ले बढ़के हे कोन।
दाई बिन नइ जग सिरतोन।
जतने घर बन लइका लोग।
दुख पीरा ला चुप्पे भोग।

बिहना रोजे पहिली जाग।
गढ़थे दाई सबके भाग।
सबले आखिर दाई सोय।
नींद घलो पूरा नइ होय।

चूल्हा चौका चमकय खोर।
राखे दाई ममता घोर।
चिक्कन चाँदुर चारो ओर।
महके अँगना अउ घर खोर।

सबले बड़े हवै बरदान।
लइका बर गा गोरस पान।
चुपरे काजर पउडर तेल।
तब लइका खेले बड़ खेल।

कुरथा कपड़ा राखे कॉच।
ताहन पहिरे सबझन हाँस।
चंदा मामा दाई तीर।
रांधे रोटी रांधे खीर।

लोरी कोरी कोरी गाय।
दूध दहीं अउ मही जमाय।
अँचरा भर भर बाँटे प्यार।
छाती बहै दूध के धार।

लकड़ी फाटा छेना थोप।
झेले घाम जाड़ अउ कोप।
बाती बरके भरके तेल।
तुलसी संग करे वो मेल।

काँटा भले गड़े हे पाँव।
माँगे नहीं धूप मा छाँव।
बाँचे खोंचे दाई खाय।
सेज सजा खोर्रा सो जाय।

दुख ला झेले दाई हाँस।
चाहे छुरी गड़े या फाँस।
करजा छूट सके गा कोन।
दाई देबी ए सिरतोन।

बंदव तोला बारम्बार।
कर्जा दाई रही उधार।
कोन सहे तोरे कस भार।
बादर सागर सहीं अपार।

जीतेन्द्र वर्मा “खैरझिटिया”
बाल्को(कोरबा)

महतारी दिवस विशेष : महतारी महिमा

महतारी महिमा

(चौपई/जयकारी छन्द 15-15 मातरा मा)

ईश्वर तोर होय आभास,
महतारी हे जेखर पास।
बनथे बिगङी अपने आप,
दाई हरथे दुख संताप।।१

दाई धरती मा भगवान,
देव साधना के बरदान।
दान धरम जप तप धन धान,
दाई तोरे हे पहिचान।।२

दाई ममता के अवतार,
दाई कोरा गंगा धार।
महतारी के नाँव तियाग,
दाई अँचरा बने सुभाग।।३

काशी काबा चारों धाम,
दाई देवी देवा नाम।
दाई गीता ग्रंथ कुरान,
मंत्र आरती गीत अजान।।४

भाखा बोली हे अनमोल,
दाई मधुरस मिसरी घोल।
महतारी गुरतुर गुलकंद,
दाई दया मया आनंद।।५

दाई कागज कलम दवात,
महतारी लाँघन के भात।
मेटय सबके भूँख पियास,
दाई चिन्हथे सरी उदास।।६

दाई थपकी लोरी गीत,
महतारी संग हार हा जीत,
दाई पुरखा पबरित रीत,
दाई सुग्घर सुर संगीत।।७

दाई आँखी काजर कोर,
गौरैय्या कस घर भर सोर।
दाई तुलसी चौंरा मोर,
दाई बिन हिरदे कमजोर।।८

जननी तैं जिनगी के मूल,
महतारी तैं पूजा फूल।
माँफी करथे सबके भूल,
चंदन तोर पाँव के धूल।।९

महतारी बिन अमित अनाथ,
काबर छोंङे दाई साथ।
सुन्ना होगे जग संसार,
कोन पुरोही तोर दुलार।।१०

कन्हैया साहू “अमित”
भाटापारा