Category: दोहा

सिंहावलोकनी दोहा (गरमी)

गरमी हा आ गे हवय,परत हवय अब घाम।
छइँहा खोजे नइ मिलय,जरत हवय जी चाम। ।

जरत हवय जी चाम हा,छाँव घलो नइ पाय।
निसदिन काटे पेंड़ ला,अब काबर पछताय। ।

अब काबर पछताय तै,झेल घाम ला यार।
पेंड़ लगाते तैं कहूँ,नइ परतिस जी मार। ।

नइ परतिस जी मार हा,मौसम होतिस कूल।
हरियाली दिखतिस बने,सुग्घर झरतिस फूल। ।

सुग्घर झरतिस फूल तब,सब दिन होतिस ख़ास।
हरियाली मा घाम के,नइ होतिस अहसास। ।

नइ होतिस अहसास जी,रहितिस सुग्घर छाँव।
लइका पिचका संग मा,घूमें जाते गाँव। ।

घूमे जाते गाँव तै ,रहितिस संगी चार।
गरमी के चिंता बिना,मिलतिस खुशी अपार। ।

अजय अमृतांशु
भाटापारा

बाहिर तम्बू छोड़ के, आबे कब तैं राम

गली गली मा देख लव,एके चरचा आम ।
पाछु सहीं भुलियारहीं ,धुन ये करहीं काम ।

अाथे अलहन के घड़ी,सुमिरन करथें तोर ।
ऊंडत घुंडत माँगथे ,हाथ पाँव ला जोर ।

मतलब खातिर तोर ये ,दुनिया लेथे नाँव ।
जब बन जाथे काम हा, पुछे नही जी गाँव ।

कहना दशरथ मान के ,महल छोड़ के जाय ।
जंगल मा चउदा बछर ,जिनगी अपन पहाय ।

तुम्हरो भगत करोड़ हे, बाँधे मन मा आस ।
राम लला के भाग ले, जल्द कटय बनवास ।

फुटही धीरज बाँध ये, मानस कहूँ निराश ।
आही परलय जान ले ,होही गंज बिनाश ।

लेके तोरे नाँव ला , सजा डरिन निज धाम ।
बाहिर तम्बू छोड़ के , आबे कब तैं राम ।।

ललित नागेश
बहेराभॉठा (छुरा)
४९३९९६

दोहा गजल (पर्यावरण)

रुख राई झन काटहू, रुख धरती सिंगार।
पर हितवा ये दानियाँ, देथें खुशी अपार।~1

हरहिंछा हरियर *अमित*, हिरदे होय हुलास।
बिन हरियाली फोकला, धरती बंद बजार।~2

रुखुवा फुरहुर जुड़ हवा, तन मन भरय उजास।
फुलुवा फर हर बीज हा, सेहत भरे हजार।~3

डारा पाना पेंड़ के, करथें जीव निवास।
कखरो कुरिया खोंधरा, झन तैं कभू उजार।~4

धरती सेवा ले *अमित*, सेउक बन सुखदास।
खूब खजाना हे परे, बन जा मालगुजार।~5

रुखराई के होय ले, पानी बड़ चउमास।
जंगल झाड़ी काटबो, सँचरहि अबड़ अजार।~6

सिरमिट गिट्टी रेत ले, बिक्कट होय बिकास।
पुरवाही पानी जहर, ये कइसन निस्तार।~7

घर के कचरा टार के, करदव दुरिहा नास।
गोबर खातू डार के, खेत करव गुलजार।~8

पूरा पानी हा करय, बहुँते सरी बिनास।
बस्ती के बस्ती बुड़ै, मरघट होय मजार।~9

सावचेत सेवा करन, धरती सरग बिलास।
सुग्घर सिधवा सब बनै, काबर कोन बिजार।~10

कन्हैया साहू “अमित”
-भाटापारा (छत्तीसगढ़)
संपर्क~9200252055



निषाद राज के छत्तीसगढ़ी दोहा

माता देवी शारदा, मँय निरधन लाचार।
तोर चरन में आय हँव, सुन दाई गोहार।।

माता तोरे रूप के, करहूँ दरशन आज।
पाहूँ मँय आशीष ला, बनही बिगड़े काज।।

हे जग जननी जानले, मोरो मन के आस।
पाँव परत हँव तोर ओ, झन टूटै बिसवास।।

दुनिया होगे देखले, स्वारथ के इंसान।
भाई भाई के मया, होंगे अपन बिरान।।

आगू पाछू देखके, देवव पाँव अगार।
काँटा कोनो झन गड़य, रद्दा दव चतवार।।

xxx

काँटा गड़गे पाँव मा,माथा धरके रोय।
मनखे गड़गे आँख मा,दुख हिरदय मा होय।

मन मंदिर मा राखले,प्रभु ला तँय बइठाय।
सदा तोर मन खुश रही,घर बन सब हरसाय।।

बड़े फजर भज राम ला,जिनगी कर उद्धार।
मन ला पबरित कर चलव,होही डोंगा पार।।

जय जय सीता राम के,करुना के हे खान।
अवध राज महराज हे,कृपा सिंधु भगवान।।

राम लखन अउ जानकी,गए रहिन बनवास।
सोना मिरगा देख के,सीता  मन  उल्लास।।

शब्दार्थ:- गड़गे=चुभना,तँय=तुम,तोर= तुम्हारा,बड़े फजर=सुबह,पबरित=पवित्र,
डोंगा=जीवन की नाव,मिरगा=हिरण।

बोधन राम निषाद राज
व्याख्याता पंचायत “वाणिज्य”
सहसपुर लोहारा, कबीरधाम (छ.ग.)

13 मई विश्व मातृ दिवस : दाई के दुलार (दोहा गीत)

महतारी ममता मया, महिमा मरम अपार।
दाई देवी देवता, बंदव चरन पखार।

महतारी सुभकामना, तन मन के बिसवास।
कोंवर कोरा हा लगै, धरती कभू अगास।
बिन माँगे देथे सबो, अंतस अगम अभास।
ए दुनिया हे मतलबी, तोर असल हे आस।
महतारी आदर सहित, पायलगी सौ बार।।1
महतारी ममता मया, महिमा मरम अपार।

मीठ कलेवा मोटरा, मधुरस मिसरी घोल।
दाई लोरी गीत हा, लगय कोइली बोल।
सरधा सिरतो सार हे, सरन सरग अनमोल।
महतारी के मया ला, रुपिया मा झन तोल।
करजा हर साँसा चढ़े, जिनगी तोर उधार।।2
महतारी ममता मया, महिमा मरम अपार।

रद्दा काँटा ले भरे, दाई मखमल फूल।
गलत करे लइका गजब, छमा करय सब भूल।
सबले पहिली गुरु तहीं, तोर सिखोना स्कूल।
माँथ मुकुट सोभा बनय, तोर पाँव के धूल।
बने रहँव मैं दुलरवा, दाई “अमित” दुलार।।3
महतारी ममता मया, महिमा मरम अपार।
दाई देवी देवता, बंदव चरन पखार।

कन्हैया साहू “अमित”
शिक्षक भाटापारा (छ.ग)
संपर्क 9200252055
9753322055


सिंहावलोकनी दोहा : गरमी

गरमी हा आ गे हवय,परत हवय अब घाम।
छइँहा खोजे नइ मिलय,जरत हवय जी चाम।।

जरत हवय जी चाम हा,छाँव घलो नइ पाय।
निसदिन काटे पेंड़ ला,अब काबर पछताय।।

अब काबर पछताय तै,झेल घाम ला यार।
पेंड़ लगाते तैं कहूँ,नइ परतिस जी मार।।

नइ परतिस जी मार हा,मौसम होतिस कूल।
हरियाली दिखतिस बने,सुग्घर झरतिस फूल।।

सुग्घर झरतिस फूल तब,सब दिन होतिस ख़ास।
हरियाली मा घाम के,नइ होतिस अहसास।।

नइ होतिस अहसास जी,रहितिस सुग्घर छाँव।
लइका पिचका संग मा,घूमें जाते गाँव।।

घूमे जाते गाँव तै ,रहितिस संगी चार।
गरमी के चिंता बिना,मिलतिस खुशी अपार।।

अजय अमृतांशु
भाटापारा


आज काल के लइका : दोहा

पढ़ना लिखना छोड़ के, खेलत हे दिन रात ।
मोबाइल ला खोल के, करथे दिन भर बात ।।

आजकाल के लोग मन , खोलय रहिथे नेट ।
एके झन मुसकात हे , करत हवय जी चेट ।।

छेदावत हे कान ला , बाला ला लटकात ।
मटकत हावय खोर मा , नाक अपन कटवात ।।

मानय नइ जी बात ला , सबझन ला रोवात ।
नाटक करथे रोज के, आँसू ला बोहात ।।

महेन्द्र देवांगन माटी
पंडरिया (कवर्धा )
छत्तीसगढ़



निषाद राज के दोहा

माने ना दिन रात वो, मानुष काय कहाय।
ओखर ले वो पशु बने, हात-हूत मा जाय।।

भव ले होबे पार तँय, भज ले तँय हरि नाम।
राम नाम के नाव मा, चढ़ तँय जाबे धाम।।

झटकुन बिहना जाग के, नहा धोय तइयार।
घूमव थोकन बाग में, बन जाहू हुशियार।।

कहय बबा के रीत हा, काम करौ सब कोय।
करहू जाँगर टोर के, सुफल जनम हा होय।।

जिनगी में सुख पायबर, पहली करलौ काम।
कर पूजा तँय काम के, फिर मिलही आराम।।

रात जाग के का करे, फोकट नींद गँवाय।
दिन होवत ले नींद हा, परही चेत हराय।।

सुघ्घर लय तुक बन्द ले, बनथे सुघ्घर गीत।
भजन लिखव या लिख गज़ल, बढ़िया हो संगीत।।

जनम गँवा झन फोकटे, मिलथे एके बार।
काम कुछू अइसन करव, होवय नाम तुंहार।।

मनखे अइसन जात तँय, हो उपकार सहाय।
काम करव परमार्थ के, दुनिया तोला भाय।।

बिरथा मानुष नाम ला, झन करबे बदनाम।
जनम धरे हस सोच ले, सोच समझ कर काम।।

बोधन राम निषाद राज
व्याख्याता पंचायत “वाणिज्य”
सहसपुर लोहारा, कबीरधाम (छ.ग.)


किसानी के पीरा

खेत पार मा कुंदरा, चैतू रखे बनाय ।
चौबीसो घंटा अपन, वो हर इहें खपाय ।।

हरियर हरियर चना ह गहिदे । जेमा गाँव के गरूवा पइधे
हट-हट हइरे-हइरे हाँके । दउड़-दउड़ के चैतू बाँके

गरूवा हाकत लहुटत देखय । दल के दल बेंदरा सरेखय
आनी-बानी गारी देवय । अपने मुँह के लाहो लेवय

हाँफत-हाँफत चैतू बइठे । अपने अपन गजब के अइठे
बड़बड़ाय वो बइहा जइसे । रोक-छेक अब होही कइसे

दू इक्कड़ के खेती हमरे । कइसे के अब जावय समरे
कोनो बांधय न गाय-गरूवा । सबके होगे हरही-हरहा

खूब बेंदरा लाहो लेवय । रउन्द-रउन्द खेत ल खेवय
कइसे पाबो बिजहा-भतहा । खेती-पाती लागय रटहा

ओही बेरा पहटिया, आइस चैतू तीर ।
राम-राम दूनों कहिन, बइठे एके तीर ।।1।।

चैतू गुस्सा देख पहटिया । सोचय काबर बरे रहटिया
पूछत हवय पहटिया ओला । का होगा हे आजे तोला

कइसे आने तैं हा लागत । काबर तैं बने नई भाखत
तब चैतू हर तो बोलय । अपने मन के भड़ास खोलय

भोगत हन हम तुहर पाप ला । अउ गरूवा के लगे श्राप ला
गरूवा ला तुमन छेकव नही । खेती-पाती ल देखव नही

देखव देखव हमर हाल ला । गाय-गरूवा के ये चाल ला
अपन प्राण कस राखे म घला । कतका बाचे हे देख भला

गुजर-बसर अब कइसे होही । अइसन खेती कोने बोही
कहूं बनी-भूती ला करबो । कइसनो होय पेटे भरबो

करब कहूं आने बुता, खेती-पाती छोड़ ?
धान-पान आही इहां, बादर छप्पर तोड़ ??2??

सुनत पहटिया चैतू गोठे । अंतस भीतर घाते सोचे
फेर धीर धरके ओ बोलय । अपने अंतस ला तो खोलय

कका सुनव गा गोठे मोर । सिरतुन हे बाते तोरे
फेर तुमन अब देखव गुन के । सही-गलत मा एके चुन के

कोने मेरा परिया-चरिया । बाचे हे का एको हरिया
कती गाय-गरूवा ल चराबों । घूम फीर के केती जाबो

हमन हाथ मा घाव करे हन । लालच कोठी हमन भरे हन
अब ये पीरा कोने सहिही । अपने दुख काखर ले कहिही

आनी-बानी मशीन आये । कोने अब गरूवा ला भाये
बइला ला तो टेक्टर खागे । पाकिट मा अब दूध ह आगे

बेटा तोरे गोठ हा, नो हय झूठ लबार ।
फेर सबो सुविधा इहां, खेती बिन बेकार ।।3।।

चैतू बोलय धीरज धर के । अपने भीतर साँसे भर के
मशीन चाउर-दार बनाही । जेमा हमर पेट भर जाही

सोच पहटिया कइसे होही । धान-पान बिन दुनिया रोही
चल बेटा मंत्री कर जाबो । अपने मन के हाल सुनाबो

रोक-छेक गरूवा मा होवय । बेंदरा घला बड़ बिट्टोवय
चरिया-परिया जेने छेके । अब तो ओमन घुटना टेके

संग पहटिया चैतू जावय । ओती ले एक पंच आवय
बीच डगर मा तीनों जुरथे । जय जोहार सबोझन करथे

आत कहां ले हव दूनोंझन । जात कहां हव गा अपने मन
पंच ठाड़ होके पूछय जब । चैतू अघुवा के बोलय तब

धान-पान पइली पसर, होइस ना ये साल ।
गाय चना ला हे चरत, का कहि अपने हाल ।।4।।

दिन-दुकाल मा धान लेसागे । हमर भाग ले ओल ह आगे
तेहू मा गरूवा-गाय पदोवय । संग बेंदरा बड़ बिट्टोवय

चिंता झन कर कका अभे तैं । पंच कहय अब बात कहँव मैं
दिन दुकाल के पइसा मिलही । सरकार खजाना ला ढिलही

सूखा राहत हमन ह पाबो । अब नुकासानी अपन भुलाबो
करजा-बोड़ी माफी करही । सरकारे हा पीरा हरही

सुनत गोठ ये चैतू सोचय । अपने मन ला अपने नोचय
बईमान अब हमन कहाबो । बिना मेहनत पइसा पाबो

छोटे ला दू पइसा देही । अपने कोठी खुद भर लेही
अही छूट हा लूट कहाथे । तभे देश गड्ढ़ा मा जाथे

फोकट मा कुछ बांटना, होवय नही निदान ।
बिपत मिटय जड़-मूल ले, अइसे कुछ सिरजान ।।5।।

कहय पंच ले चैतू खुल्ला । गरूवा काबर रहिथे ढिल्ला
सूखा राहत का सिरजाही । रोक-छेक का अब हो जाही

ये राहत के सुख चरदिनया । फेर ओही संझा-बिहनिया
करजा-बोड़ी फेरे लेबो । इही हाल मा कइसे देबो

बड़ दुकाल हर साल परत हे । तेमा गरूवा-गाय चरत हे
का हमला सरकार पोसही । खेती-पाती कहां बोजही

खेत-खार बिन काम चलय ना । फोकट मा ये पेट भरय ना
खेत-खार जब रहिथे चंगा । तभे कठौती दिखथे गंगा

खातू-माटी पानी चाही । तभे किसानी हाही-माही
सबले भारी हे रखवारी । सुन लौ गा पंच संगवारी

चलव करब मिलके हमन, कोनो एक उपाय ।
खेती हा होवय बने, पीरा सबो सिराय ।।6।।

रूख-राई ला काटे मनखे । महल बनाये घाते तनके
चरिया-परिया ला छांट-छांट के । बसे आदमी बांट-बांट के

छेद-छेद के धरती छाती । सब़ अलहन करे आत्मघाती
दिन-बा-दिन दुकाल अब परथे । धरती के छाती हा जरथे

पल्लो बर तो पानी चाही । पानी-कांजी कइसे आही
बोर भरोसा होय ना खेती । धरती सूख्खा तेखर सेती

पानी अउ रखवारी चाही । तभे इहां तो सुराज आही
अइसे कोनो उपाय करबो । अउ दुनिया के पेटे भरबो

चैतू अइसे कहत रहय जब । अउ किसानगन संघरगे तब
मने लगा के गोठ सुनत हे । अपने भीतर सबो गुनत हे

मोहन मंडल हा कहय, सुग्घर तोरे गोठ ।
चैतू तोरे सोच हा, मोला लागे पोठ ।।7।।

सिरतुन के ये बात तोर हे । आजे रतिहा काल भोर हे
कइसे होही पोठ किसानी । कहव-कहव गा गोठ सियानी

राम-राम कहि चैतू बोलय । अपन सोच के परदा खोलय
मोहन मंडल, मोला लगथे । सरकार सबो हमला ठगथे

फोकट मा तो बांट-बांट के । जात-पात मा छांट-छांट के
हमला तो अलाल करथे । स्वाभिमान ला हमरे हरथे

काम-बुता तो हमला चाही । जेखर ले दू पइसा आही
होही हमरे पोठ किसानी । येमा का के हे हैरानी

सरकार हमर ठेका लेवय । खेती बर तो पानी देवय
चरिया-परिया खाली छोड़य । वोट-बैंक के मोहे तोड़य

मोहन मंडल पूछथे, कइसे बाबू पंच ।
चैतू के ये गोठ हा, हे का सिरतुन रंच ।।8।।

पंच कहय ये गोठ बने हे । आज कका हा बने तने हे
अभी समस्या हे रखवारी । पाछू पानी के हे बारी

चरिया-परिया के छोड़े मा । बरदि-पहट के तो जोरे मा
गाये-गरूवा हा छेकाही । तब खेती हमरे बच जाही

कइसे पहटिया खोरबहरा । बरदी मा देबे ना पहरा
चरिया-परिया हमला चाही । जिहां पहट-बरदी हा जाही

तब हमला का के दुख होही । ऐखर ले खेती उलहोही
कहय खोरबहरा हा हँस के । खेती काबर रहिही फँस के

गोठ सबोझन ला जचगे तब । सोचत हे हम का करबो अब
सबो कसम खाइन जुरमिल के । हम खेती करबो हिलमिल के

हम छोड़ब-छोड़ाब अब, बेजाकब्जा गाँव ।
चरिया-परिया छोड़बो, छोड़ब रूखवा छाँव ।।9।।

जुरमिल के सब हामी देइन । मिलके सरपंच करा गेइन
गोठ बतावय ओला जम्मा । कइसे किसान होत निकम्मा

बेजाकब्जा जभे सिराही । तभे गाँव मा सुराज आही
होय गाँव मा अब पाबंदी । अइसे तो करव लामबंदी

चरिया-परिया हम छोड़ाबो । बने-बने तब खेत कमाबो
बरदी मा गरूवा मन चरही । छंदाही सब हरहा हरही

एक बुता अउ करतेन हमन । खेती बर पानी के होय जतन
पानी-कांजी अउ रखवारी । खेती बर होय संगवारी

कइसे करबो कइसे होही । ये विचार ला कोन समोही
विचार कइसे पूरा होही । हमरे डोंगा कोने खोही

पूछथ हावे सरपंच हा, कइसे करब निदान ।
सुझ-बुझ देखावव अपन, संगी हमर मितान ।।10।।

जुरमिल मंत्री करा चलव सब । हमरे निदान हा होही तब
मोहन मंडल अउ चैतू कहिथे । जब सबझन मन सोचत रहिथे

मंत्री मेरा सबझन गेइन । अपन बात आघू रख देइन
तब मंत्री पूछय ऊंखर ले । कहत रहँय जी तेखर ले

कोने उपाय हम सिरजाई । अपन किसानी पोठ बनाई
कइसे पानी के लइ गारंटी । खन-खन बोलय हमरे अंटी

सोच समझ के चैतू कहिथे । जे पीरा ला सहिते रहिथे
दूइ बात हे हमर किसानी । जेखर ले करना हे मितानी

रखवारी के झंझट टूटय । अउ पानी के भुलका फूटय
बेजाकब्जा ला छोड़े मा । गाँवे ले नाता जोड़े मा

होवय हमरे पोठ किसानी । काम-बुता तब होय सियानी
एक बुता हम अइसे करबो । जुरमिल के सब पीरा हरबो

मनरेगा के काम ले, बनातेन हम बांध ।
गाँव-गाँव हर खार ला, नहर-नहर ले छांद ।।11।।

छोटे-छोटे बांध बनाके । छोटे-छोटे नहर खनाके
गाँव-गाँव मा पानी भरबो । खेत-खार के पीरा हरबो

बरसा के पानी बांधे रोकब । बोर खनब ला सबझन टोकब
कुॅवा बावली तरिया भरही । तभे खेत हा हमरे भरही

नदिया-नरवा चाकर करबो । बरसा पानी जेमा भरबो
जे परिया हा उतारू लागय । जिहां-जिहां ले पानी भागय

ओमा सुग्घर बांध बनाबो । नदिया-नरवा बांध मिलाबो
गाँच-गाँव मा होवय पानी । जइसे टोटा होवय बानी

खार-खार मा पेड़ लगाबो । बरखा ला तो हमन रिझाबो
गाँव-गाँव मा बांध बनाबो । बरसा पानी जेमा पाबो

संग प्रकृति के हम रहब, तब होही सब काम ।
खेती-पाती लगही बने, लगही सुग्घर धाम ।।12।।

रमेशकुमार सिंह चौहान
मिश्रापारा, नवागढ़
जिला-बेमेतरा (छ.ग.)

दोहा छंद म गीत

काँटों से हो दोस्ती, फूलों से हो प्यार।
इक दूजे के बिन नहीं, नहीं बना संसार।।
काँटों से हो दोस्ती………………..

कठिन डगर है जिंदगी, हँस के इसे गुजार।
दुनिया का रिश्ता यहीं, निभता जाये यार।।
काँटों से हो दोस्ती………………..

दुख हो सुख हो काट लो, ये जीवन उपहार।
राम नाम में जोड़ लो, साँसों का ये तार।।
काँटों से हो दोस्ती………………..

धूप छाँव बरसात हो, मिले ग़मों की मार।
हँसता हुआ गुलाब ज्यों, छाये सदा बहार।।
काँटों से हो दोस्ती…………………

खो जाओ मजधार में, चलता हुआ बयार।
हरि का मनमें नाम लो, थामो निज पतवार।।
काँटों से ही दोस्ती…………………

बोधन राम निषाद राज
सहसपुर लोहारा,कबीरधाम (छ.ग)