Category: रोला

बेटी : रोला छन्द

बेटी हावय मोर, जगत मा अब्बड़ प्यारी।
करथे बूता काम, सबो के हवय दुलारी।
कहिथे मोला रोज, पुलिस बन सेवा करहूँ।
मिटही अत्याचार, देश बर मँय हा लड़हूँ।

अबला झन तैं जान, भुजा मा ताकत हावय,
बैरी कोनों आज, भाग के नइ तो जावय।
बेटा येला मान, कभू अब नइहे पाछू।
करथे रौशन नाम, सबो मा हावय आघू।

महेन्द्र देवांगन माटी
पंडरिया (कवर्धा)
छत्तीसगढ़

#रोला_छन्द

गर्मी छुट्टी (रोला छंद)

बन्द हवे इस्कूल,जुरे सब लइका मन जी।
बाढ़य कतको घाम,तभो घूमै बनबन जी।
मजा उड़ावै घूम,खार बखरी अउ बारी।
खेले खाये खूब,पटे सबके बड़ तारी।

किंजरे धरके खाँध,सबो साथी अउ संगी।
लगे जेठ बइसाख,मजा लेवय सतरंगी।
पासा कभू ढुलाय,कभू राजा अउ रानी।
मिलके खेले खेल,कहे मधुरस कस बानी।

लउठी पथरा फेक,गिरावै अमली मिलके।
अमरे आमा जाम,अँकोसी मा कमचिल के।
धरके डॅगनी हाथ,चढ़े सब बिरवा मा जी।
कोसा लासा हेर ,खाय रँग रँग के खाजी।

घूमय खारे खार,नहावय नँदिया नरवा।
तँउरे ताल मतंग,जरे जब जब जी तरवा।
आमाअमली तोड़,खाय जी नून मिलाके।
लाटा खूब बनाय,कुचर अमली ला पाके।

खेले खाय मतंग,भोंभरा मा गरमी के।
तेंदू कोवा चार,लिमउवा फर दरमी के।
खाय कलिंदर लाल,खाय बड़ ककड़ी खीरा।
तोड़ खाय खरबूज,भगाये तन के पीरा।

पेड़ तरी मा लोर,करे सब हँसी ठिठोली।
धरे फर ला जेब,भरे बोरा अउ झोली।
अमली आमा देख,होय खुश घर मा सबझन।
कहे करे बड़ घाम,खार मा जाहू अबझन।

दाइ ददा समझाय,तभो कोनो नइ माने।
किंजरे घामे घामे,खेल भाये ना आने।
धरे गोंदली जेब,जेठ ला बिजरावय जी।
बर पीपर के छाँव,गाँव गर्मी भावय जी।

झट बुलके दिन रात,पता कोई ना पावै।
गर्मी छुट्टी आय,सबो मिल मजा उड़ावै।
बाढ़े मया पिरीत,खाय अउ खेले मा जी।
तन मन होवै पोठ,घाम ला झेले मा जी।

जीतेन्द्र वर्मा “खैरझिटिया”
बाल्को(कोरबा)

मजबूर मैं मजदूर

करहूँ का धन जोड़,मोर तो धन जाँगर ए।
गैंती रापा संग , मोर साथी नाँगर ए।
मोर गढ़े मीनार,देख लमरे बादर ला।
मिहीं धरे हौं नेंव,पूछ लेना हर घर ला।

भुँइयाँ ला मैं कोड़, ओगथँव पानी जी।
जाँगर रोजे पेर,धरा करथौं धानी जी।
बाँधे हवौं समुंद,कुँआ नदियाँ अउ नाला।
बूता ले दिन रात,हाथ उबके हे छाला।

सच मा हौं मजबूर,रोज महिनत कर करके।
बिगड़े हे तकदीर,ठिकाना नइ हे घर के।
थोरिक सुख आ जाय,बिधाता मोरो आँगन।
महूँ पेट भर खाँव, पड़े हावँव बस लाँघन।

घाम जाड़ आसाड़, कभू नइ सुरतावँव मैं।
करथों अड़बड़ काम,फेर फल नइ पावँव मैं।
हावय तन मा जान,छोड़हूँ महिनत कइसे।
धरम करम हे काम,पूजथँव देबी जइसे।

जुन्ना कपड़ा मोर,ढाँकथे करिया तन ला।
कभू जागही भाग,मनावत रहिथों मन ला।
रिहिस कटोरा हाथ, देख ओमा सोना हे।
भूख मरँव दिन रात,भाग मोरे रोना हे।

जीतेंद्र वर्मा”खैरझिटिया”
बालको(कोरबा)
9981441795

छन्द के छ : रोला छन्द

मतवार

पछतावै मतवार , पुनस्तर होवै ढिल्ला
भुगतै घर परिवार , सँगेसँग माई-पिल्ला
पइसा खइता होय, मिलै दुख झउहा-झउहाँ
किरिया खा के आज , छोड़ दे दारू-मउहाँ

रोला छन्द

डाँड़ (पद) – ४, ,चरन – ८
तुकांत के नियम – दू-दू डाँड़ के आखिर मा माने सम-सम चरन मा, १ बड़कू या २ नान्हें आवै.
हर डाँड़ मा कुल मातरा – २४ ,
यति / बाधा – बिसम चरन मा ११ मातरा के बाद अउ सम चरन मा १३ मातरा के बाद यति सबले बढ़िया माने जाथे, रोला के डाँड़ मा १२ बड़कू घला माने गे हे ते पाय के १२ मातरा या १२ ले ज्यादा मातरा मा घला यति हो सकथे. एकर बर कोन्हों बिसेस नियम नइ हे.
खास- डाँड़ मन के आखिर मा १ बड़कू या २ नान्हें आना चाहिए

पहिली डाँड़ (पद)

पछतावै मतवार – पहिली चरन (१+१+२+२)+(१+१+२+१) = ११
पुनस्तर होवै ढिल्ला – दूसर चरन (१+२+१+१)+(२+२)+(२+२) = १३

दूसर डाँड़ (पद)

भुगतै घर परिवार- तीसर चरन (१+१+२)+(१+१)+(१+१+२+१) = ११
सँगेसँग माई-पिल्ला – चउथा चरन (१+२+१+१)+(२+२)+(२+२) = १३

बिसम चरन के आखिर मा पहिली डाँड़ मा (“वार”/ “वार”) माने बड़कू,नान्हें (२,१) अउ सम चरन के आखिर मा दूसर डाँड़ मा बड़कू आय हे.

तुकांत– दू-दू डाँड़ के आखिर मा माने सम-सम चरन मा (ढिल्ला / पिल्ला) आय हे.

अरुण कुमार निगम
एच.आई.जी. १ / २४
आदित्य नगर, दुर्ग
छत्तीसगढ़