Category: सरसी

13 मई विश्व मातृ दिवस : महतारी महिमा (सरसी छंद)

महतारी महिमा भारी हे,
ममता मया महान।
हाँथ जोर मैं बंदव दाई,
जग बर तैं बरदान।1

जगजननी तैं सब दुखहरनी,
कोरा सरग समान।
दाई देवी सँउहें हावच,
कतका करँव बखान।2

दया धरम के चिन्हा दाई,
जप-तप के पहिचान।
दुख पीरा मा रेंगत दाई,
लाथच नवा बिहान।3

लछमी दुरगा देवी दाई,
सारद के अवतार।
समता सुमता सादर सरधा,
दाई जगत अधार।4

जिनगी के पतझर मा दाई,
सबले आस बहार।
भँवरजाल भवसागर भय मा,
महतारी पतवार।5

सगुन सुवारी संगी सिरतों,
अँचरा अमित अपार।
महतारी बेटी बहिनी बिन,
सुन्ना हे संसार।6

जनम करम हे तोरे करजा,
जिनगी तोर उधार।
पहिली पूजा महतारी के,
सुमिरँव बारंबार।7

कन्हैया साहू “अमित”
शिक्षकभाटापारा (छ.ग)
संपर्क9200252055


परम पूज्य बाबा गुरु घासीदास : सरसी छंद

जेखर जनम धरे ले भुँइया,बनगे हे सत धाम।
उही पुरष के जनम दिवस हे,भज मनुवा सतनाम।।1।।

बछर रहिस सतरह सौ छप्पन,दिवस रहिस सम्मार।
तिथि अठ्ठारह माह दिसम्बर,सतगुरु लिन अँवतार।।2।।

तब भुँइ मा सतपुरुष पिता के,परे रहिस शुभ पाँव।
बालक के अविनाशी घासी,धरे रहिन हे नाँव।।3।।

वन आच्छादित गाँव गिरौदा,छत्तीसगढ़ के शान।
पावन माटी मा जनमे हे,घासीदास महान।।4।।

महँगू अमरौतिन बड़ भागी,दाई ददा महान।
गोदी मा मानव कुल दीपक,पाइन हे संतान।।5।।

घोर तपस्या करे रहिन हे,गुरु सतखोजन दास।
सँग मा संत समाज सबोझिन,करे रहिन उपवास।।6।।

माँग रहिस एक्के ठन सब के,मिलके करिन गोहार।
आवव पुरुष पिता धरती मा,हंसा लेव उबार।।7।।

वाँणी गूँजे रहिस गगन मा,छाइस पूँज प्रकाश।
चौदह पीढ़ी मा सतखोजन,आवत हँव मै खास।।8।।

उही बात ला ददा मेदनी,महँगू ला समझाय।
तहीं हमर चौदहवा पीढ़ी,सुन ले कान लगाय।।9।।

बालक पन ले बाबा घासी,गजब रहिस गुनवान।
का हे सच अउ झूठ काय हे,देवत रहिस प्रमान।।10।।

बाबा घासी करत रहिन हे,सदा प्रमाणिक बात।
विकृत सोच सबो सँउहे मा,खात रहिन हे मात।।11।।

मनखे के दुख दरद हरे बर,मानवता के नाम।
बाबा घासीदास चलाइन,आंदोलन सतनाम।।12।।

मानवता के होय भलाई,अंतस रख के चाह।
ब्याँलिस वाणी सात सँदेशा,धर निकलिन सत राह।।13।।

बाबा घासी कहे रहिन हे,मनखे मनखे एक।
सत्य अहिंसा प्रेम दया के,रस्ता होथे नेक।।14।।

सुखदेव सिंह अहिलेश्वर “अँजोर”
गोरखपुर, कवर्धा
मोबा- 9685216602
sukhdev.singh.ahileshver31@gmail.com
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सरसी छंद : जनकवि कोदूराम “दलित” जी

धन धन हे टिकरी अर्जुन्दा,दुरुग जिला के ग्राम।
पावन भुँइया मा जनमे हे,जनकवि कोदूराम।

पाँच मार्च उन्नीस् सौ दस के,होइस जब अवतार।
खुशी बगरगे गाँव गली मा,कुलकै घर परिवार।

रामभरोसा ददा ओखरे,आय कृषक मजदूर।
बहुत गरीबी रहै तभो ले,ख्याल करै भरपूर।

इसकुल जावै अर्जुन्दा के,लादे बस्ता पीठ।
बारहखड़ी पहाड़ा गिनती,सुनके लागय मीठ।

बालक पन ले पढ़े लिखे मा,खूब रहै हुँशियार।
तेखर सेती अपन गुरू के,पावय मया दुलार।

पढ़ लिख के बनगे अध्यापक,बाँटय उज्जर ज्ञान।
समे पाय साहित सिरजन कर,बनगे ‘दलित’महान।

तिथि अठ्ठाइस माह सितम्बर,सन सड़सठ के साल।
जन जन ला अलखावत चल दिस,एक सत्य हे काल।

छत्तीसगढ़ी छंद लिखइया,गिने चुने कवि होय।
तुँहर जाय ले छत्तीसगढ़ी,तरुवा धर के रोय।

अद्भुत रचना तुँहर हवै गा,पावन पबरित भाव।
जन जन ला अहवान करत हे,अब सुराज घर लाव।

समतावादी दृष्टि रही तब,उन्नत होही सोच।
छोड़व इरखा कुण्ठा मन ला,आय पाँव के मोच।

विकसित राष्ट्र बनाये खातिर,मिलजुल हो परयास।
झन सोवय कोनो लाँघन गा,चेत लगावन खास।

दूरदरश मानवतावादी,जिन्खर कृति के मूल।
उँखर चरन मा अरपित हावय,श्रद्धा के दू फूल।

सुखदेव सिंह अहिलेश्वर”अँजोर”
गोरखपुर,कवर्धा

रचनाकार द्वारा इस रचना को अपने ब्‍लॉग में भी यहां प्रकाशित किया गया है। हमें गुरतुर गोठ में प्रकाशन के लिए इस रचना को रचनाकार के द्वारा ही मेल किया गया था अत: इसे प्रथम प्रकाशन मानते हुए प्रकाशित कर दिया गया है।



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खुमरी : सरसी छंद

बबा बनाये खुमरी घर मा,काट काट के बाँस।
झिमिर झिमिर जब बरसे पानी,मूड़ मड़ाये हाँस।

ओढ़े खुमरी करे बिसासी,नाँगर बइला फाँद।
खेत खार ला घूमे मन भर,हेरे दूबी काँद।

खुमरी ओढ़े चरवाहा हा, बँसुरी गजब बजाय।
बरदी के सब गाय गरू ला,लानय खार चराय।

छोट मँझोलन बड़का खुमरी,कई किसम के होय।
पानी बादर के दिन मा सब,ओढ़े काम सिधोय।

धीरे धीरे कम होवत हे,खुमरी के अब माँग।
रेनकोट सब पहिरे घूमे, कोनो छत्ता टाँग।

खुमरी मोरा के दिन गय अब,होवत हे बस बात।
खुमरी मोरा मा असाड़ के,कटे नहीं दिन रात।

लइका कहाँ अभी के जाने,खुमरी कइसन आय।
दिखे नहीं अब कोनो मनखे,खुमरी मूड़ चढ़ाय।

जीतेन्द्र वर्मा”खैरझिटिया”
बाल्को(कोरबा)