Category: सार

सार छंद

हरियर लुगरा पहिर ओढ़ के, आये हवै हरेली।
खुशी छाय हे सबो मुड़ा मा, बढ़े मया बरपेली।

रिचरिच रिचरिच बाजे गेंड़ी, फुगड़ी खो खो माते।
खुडुवा खेले फेंके नरियर, होय मया के बाते।
भिरभिर भिरभिर भागत हावय, बैंहा जोर सहेली।
हरियर लुगरा पहिर ओढ़ के, आये हवै हरेली—-।

सावन मास अमावस के दिन,बइगा मंतर मारे।
नीम डार मुँहटा मा खोंचे, दया मया मिल गारे।
घंटी बाजै शंख सुनावय, कुटिया लगे हवेली।
हरियर लुगरा पहिर ओढ़ के, आये हवै हरेली-।

चन्दन बन्दन पान सुपारी, धरके माई पीला।
टँगिया बसुला नाँगर पूजय, भोग लगाके चीला।
हवै थाल मा खीर कलेवा, दूध म भरे कसेली।
हरियर लुगरा पहिर ओढ़ के, आये हवै हरेली-।

गहूँ पिसान ल सान मिलाये, नून अरंडी पाना।
लोंदी खाये बइला बछरू, राउत पाये दाना।
लाल चिरैंया सेत मोंगरा, महकै फूल चमेली।
हरियर लुगरा पहिर ओढ़ के, आये हवै हरेली।

बेर बियासी के फदके हे, रंग म हवै किसानी।
भोले बाबा आस पुरावय, बरसै बढ़िया पानी।
धान पान सब नाँचे मनभर, पवन करे अटखेली।
हरियर लुगरा पहिर ओढ़ के, आये हवै हरेली—।

जीतेन्द्र वर्मा “खैरझिटिया”
बाल्को (कोरबा)
9981441795



कस्तूरी – छत्तीसगढ़ के हरियर चाँउर

छत्तीसगढ़ के हरियर चाँउर, होथे सबले बढ़िया
एखर बारे मा नइ जाने, सब्बो छत्तीसगढ़िया ।।

दुरुग अउर धमतरी जिला मा, एखर खेती होथे
फेर अभी कमती किसान मन, एखर बीजा बोथे।।

सन् इकहत्तर मा खोजिन अउ नाम रखिन कस्तूरी
छत्तीसगढ़ महतारी के ये, हावय हरियर चूरी।।

वैज्ञानिक मन शोध करत हें, कइसे बाढ़े खेती
कस्तूरी के फसल दिखय बस, जेती जाबो तेती।।

हर किसान ला मिलै फायदा, ज्यादा मनखे खावँय
छत्तीसगढ़ के कस्तूरी के, गुन दुनिया मा गावँय।।

ग्लुटेन एमा नइ चिटिको, रखे वजन साधारण
कैंसर के प्रतिरोधक क्षमता, क्लोरोफिल के कारण।।

फाईबर प्रोटीन सुनव जी, ये चाँउर मा भारी
जेखर कारण नइ हो पावय, लीवर के बीमारी।।

धान कटोरा छत्तीसगढ़ के, चाँउर सबले बढ़िया
कस्तूरी चाँउर के मालिक, जग मा छत्तीसगढ़िया।।

अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग
छत्तीसगढ़



सार छंद : पूछत हे जिनगानी

घर के बोरिंग बोर सुखागे, घर मा नइ हे पानी।
टंकर कतका दिन सँग दीही, पूछत हे जिनगानी।

नदिया तरिया बोरिंग मन तो, कब के हवैं सुखाये।
कहूँ कहूँ के बोर चलत हे, हिचक हिचक उथराये।

सौ मीटर ले लइन लगे हे, सरलग माढ़े डब्बा।
पानी बर झींका तानी हे, करलाई हे रब्बा।

चार खेप पानी लानत ले, माथ म आगे पानी।
टंकर कतका दिन सँग दीही, पूछत हे जिनगानी।

सोंचे नइ हन अतका जल्दी, अइसन दिन आ जाही।
सोंच समझ मा होगे गलती, अब करना का चाही।

बारिश के पानी ला रोकन, डबरी बाँध बनाके।
सागर मा जावन झन पावै, नरवा नदिया पाके।

पानी रइही तभे निकलही, बोली आनी-बानी।
टंकर कतका दिन सँग दीही, पूछत हे जिनगानी।

भुँइया भीतर के पानी ला, बउरन चेत लगाके।
गलगल गलगल झन बहवावन, फिल्मी गाना गाके।

रुखराई सरलग सिरजावन, भुँइया हर हरियावै।
जनता सँग सरकार घलो हा, आके हाँथ बँटावै।

बिन पानी कइसे चल पाही,चतुरा चतुर सियानी।
टंकर कतका दिन सँग दीही,पूछत हे जिनगानी।

सुखदेव सिंह अहिलेश्वर “अँजोर”
गोरखपुर, कवर्धा (छ.ग.)

विश्व जल संरक्षण दिवस : सार छंद मा गीत – पानी जग जिनगानी

पानी जग जिनगानी मनवा, पानी अमरित धारा।
पानी बिन मुसकुल हे जीना, पानी प्रान पियारा।

जीव जगत जन जंगल जम्मो, जल बिन जर मर जाही।
पाल पोस के पातर पनियर, पानी पार लगाही।
ए जग मा जल हा सिरतो हे, सबके सबल सहारा।
पानी जग जिनगानी मनवा, पानी अमरित धारा।1

तरिया नँदिया लहुटय परिया, धरती दाई रोवय।
रुख राई हा ठुड़गा ठुँठवा, बादर बरसा खोवय।
मनखे के हे ए सब करनी, भोगय जग संसारा।
पानी जग जिनगानी मनवा, पानी अमरित धारा।2

राहत भर ले सेखी मारे, भर भर उलचे भारी।
खोर गली मा रेला माते, सरथे कोला बारी।
एक्के चुरुवा पानी खातिर, फिरबो आरा पारा।
पानी जग जिनगानी मनवा, पानी अमरित धारा।3

जिवरा जरही जल बिन जौंहर, पानी सबो सिराबो,
मुसकाही ए जिनगी काली, पानी आज बचाबो।
साव चेत तैं हो जा मितवा, समझव ईश इशारा।
पानी जग जिनगानी मनवा, पानी अमरित धारा।4

छेंकव रोकव आवव संगी, बिरथा बरसा जल ला।
जतके जरुरत हावय जल के, खोलव थोरिक नल ला।
सोंच समझ के पानी बउरव, चलही तभे गुजारा।
पानी जग जिनगानी मनवा, पानी अमरित धारा।
पानी बिन मुसकुल हे जीना, पानी प्रान पियारा।5

कन्हैया साहू “अमित”
शिक्षक- भाटापारा
जिला- बलौदा बाजार (छग)
संपर्क- 9753322055
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कका के बिहाव : सार-छंद

कका बता कब करबे शादी, देख जवानी जाथे !
बइठे रोथे दादी दादा, संसो घानी खाथे !!1!!

ढ़ींचिक-ढ़ींचिक नाचत जाबो, बनके तोर बराती !
पागा-पगड़ी माथ बँधाये, देखे राह घराती !!2!!

गँड़वा-डीजे जेन लगाले, नागिन पार बजाबो !
बुड़हा-बुड़ही रंग जमाही, सबला खींच नचाबो !!3!!

दाई कइही जी देरानी, घर अँगना के रानी!
आव-भाव मा देवी रइही, देही सबला पानी !!4!!

रोजगार के करले जोखा, करथच रोज बहाना !
गाँव गली मा सुनथे बाबू, देथैं कतको ताना !!5!!

नवा-नवा तो कपड़ा लाबे, बनबे बढ़िया राजा !
इसनो अबरख साज लगाबे, दिखबे सुघ्घर ताजा !!6!!

काकी पाबो भाग जगाबो, मया दया तो देही !
पइधे रइबो हमतो रोजे, चूमा-चटका लेही !!7!!

अटकन-चटकन वो खेलाही, हार-जीत के खेला !
ठोंस सजा हे चीपो-लादो, पाही रोज झमेला !!8!!

केंउ मेंउ के पारी आही, हमतो कान बचाबो !
काकी लमरत दौंड़ लगाही, ओला तेज भगाबो !!9!!

पत्तो कइही आरा-पारा, तोरे सोर उड़ाही !
कइबे तँयहर चटनी पीसे, बोलत साठ गुड़ाही !!10!!

गाहीं बढ़िया गीत भड़ौनी, सुनबो कान दबाके!
खाबो पींयर भात अघाके, लाडू खास चबाके !!11!!

देख कका तँय करले शादी, देख-ताक के आजा !
जाबो आँसो हमन बराती, लान लगाबो बाजा !!12!!

असकरन दास जोगी
ग्राम : डोंड़की, पोस्ट+तह : बिल्हा,
जिला : बिलासपुर (छ. ग.)
मो. नं. : 9340031332
www.antaskegoth.blogspot.com

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कान्हा मोला बनादे : सार छंद

पाँख मयूँरा मूड़ चढ़ादे,काजर गाल लगादे|
हाथ थमादे बँसुरी दाई,मोला किसन बनादे |

बाँध कमर मा करधन मोरे,बाँध मूड़ मा पागा|
हाथ अरो दे करिया चूड़ा,बाँध गला मा धागा|

चंदन टीका माथ लगादे ,ले दे माला मूँदी|
फूल मोंगरा के गजरा ला ,मोर बाँध दे चूँदी|

हार गला बर लान बनादे,दसमत लाली लाली |
घींव लेवना चाँट चाँट के,खाहूँ थाली थाली |

दूध दहीं ला पीयत जाहूँ,बंसी बइठ बजाहूँ|
तेंदू लउड़ी हाथ थमादे,गाय चराके आहूँ|

महानदी पैरी जस यमुना ,कदम्ब कस बर पीपर |
गोकुल कस सब गाँव गली हे ,ग्वाल बाल हे घर घर |

बाग बगीचा लगे मधूबन,हे जंगल अउ झाड़ी|
बँसुरी धरे रेंगहूँ मैंहा ,भइया नाँगर डाँड़ी|

गोप गुवालीन संग खेलहूँ ,मीत मितान बनाहूँ|
संसो झन तैं करबे दाई,सँझा खेल के आहूँ|

पहिरा ओढ़ा करदे दाई ,किसन बरन तैं मोला|
रही रही के कही सबो झन,कान्हा करिया मोला|

पाँव ददा दाई के परहूँ ,मिलही मोला मेवा |
बइरी मन ला मार भगाहूँ,करहूँ सबके सेवा|

कदम्ब बिरवा मा चढ़ दाई ,बँसुरी मीठ बजाहूँ |
दया मया ला बाँटत फिरहूँ ,सबके भाग जगाहूँ|

जीतेंद्र वर्मा “खैरझिटिया”
बालको (कोरबा )


भोले बाबा : सार छंद

डोल डोल के डारा पाना ,भोला के गुन गाथे।
गरज गरज के बरस बरस के,सावन जब जब आथे।

सोमवार के दिन सावन मा,फूल दूब सब खोजे।
मंदिर मा भगतन जुरियाथे,संझा बिहना रोजे।

कोनो धरे फूल दसमत के ,केसरिया ला कोनो।
दूबी चाँउर छीत छीत के,हाथ ला जोड़े दोनो।

बम बम भोला गाथे भगतन,धरे खाँध मा काँवर।
भोला के मंदिर मा जाके,घूमय आँवर भाँवर।

बेल पान अउ चना दार धर,चल शिव मंदिर जाबों।
माथ नवाबों फूल चढ़ाबों ,मन चाही फल पाबों।

लोटा लोटा दूध चढ़ाबों ,लोटा लोटा पानी।
सँवारही भोले बाबा हा,सबझन के जिनगानी।

गाँजा धतुरा भाये तोला,साँप साथ मा तोरे।
आये हवँव शरण मा भोला,आस पुरादे मोरे।

जीतेन्द्र वर्मा”खैरझिटिया”
बाल्को(कोरबा)


सावन बइरी (सार छंद)

चमक चमक के गरज गरज के, बरस बरस के आथे।
बादर बइरी सावन महिना, मोला बड़ बिजराथे।

काटे नहीं कटे दिन रतिहा, छिन छिन लगथे भारी।
सुरुर सुरुर चलके पुरवइया, देथे मोला गारी।

रहि रहि के रोवावत रहिथे, बइरी सावन आके।
हाँस हाँस के नाचत रहिथे, डार पान बिजराके।

पूरा छंद ये कड़ी म पढ़व..

सार – छंद : चलो जेल संगवारी





अपन देश आजाद करे बर, चलो जेल संगवारी,
कतको झिन मन चल देइन, आइस अब हमरो बारी.

जिहाँ लिहिस अउंतार कृष्ण हर, भगत मनन ला तारिस
दुष्ट मनन-ला मारिस अऊ भुइयाँ के भार उतारिस
उही किसम जुरमिल के हम गोरा मन-ला खेदारीं
अपन देश आजाद करे बर, चलो जेल संगवारी.

कृष्ण-भवन-मां हमू मनन, गाँधीजी सांही रहिबो
कुटबो उहाँ केकची तेल पेरबो, सब दु:ख सहिबो
चाहे निष्ठुर मारय-पीटय, चाहे देवय गारी.
अपन देश आजाद करे बर, चलो जेल संगवारी.

बड़ सिधवा बेपारी बन के, हमर देश मां आइस
हमर – तुम्हर मां फूट डार के, राज-पाट हथियाइस .
अब सब झन मन जानिन कि ये आय लुटेरा भारी
अपन देश आजाद करे बर, चलो जेल संगवारी.

देख लिहिस जब हमर तुम्हर कमजोरी अऊ ढिलाई
मुसवा साहीं बघवा- मन ला चपकिस भूरी बिलाई
अभी भागिही, सब्बो झिन मिल के ओला ललकारीं
अपन देश आजाद करे बर, चलो जेल संगवारी.

काम-बूता सब छोड़ इंकर, अब एक बात सुन लेवव
माते ह्वय लड़ाई ते माँ, मदद कभू झिन देवव
इनकर पाछू पड़ जावो, धर-धर के तेज तुतारी
अपन देश आजाद करे बर, चलो जेल संगवारी.

उनकर मन के बम, बन्दूक, तोप, लौड़ी अऊ डंडा
सब हमार सत्याग्रह के, आगू पड़ जाही ठंडा.
होवत हें बलिदान देश खातिर कतको नर-नारी
अपन देश आजाद करे बर, चलो जेल संगवारी.

जनकवि कोदूराम ‘दलित’
छत्तीसगढ़
(प्रस्‍तुति श्रीमती शकुन्‍तला शर्मा)