Category: छंद

छत्‍तीसगढ़ी गद्य में छंद प्रयोग

आमा के अथान – चौपई छन्द (जयकारी छंद )

अब अथान आमा के खाव,आगे गरमी कम हे भाव।
झोला धर के जाव बजार,*लानव आमा छाँट निमार।

मेथी संग मा सरसों तेल,येकर राखव सुग्घर मेल। *
मेथी अउ सरसों के दार,चिटिक करायत होथे सार। 2

पीसे हरदी बने मिलाव,लहसुन डारे झने भुलाव।
जीरा के येमा हे खेल,नापतौल के डारव तेल। 3

मिरचा सिरतो कमती खाव,स्वाद देख के नून मिलाव।
थोरिक अदरक घलो मिलाव,दू दू दिन मा बने हिलाव। 4

गोही ला झन फेंकव हेर,लेव स्वाद खाये के बेर।
अब्बड़ मिठाथे गोही जान,आमा सँग मा बनय अथान। 5

राखव कुछ दिन येकर ध्यान, सुग्घर बनही आम अथान।
सब के मुँह मा पानी आय,रोज बिहनिया अथान खाय। 6

घर मा जे दिन नइ हे साग,सब अथान के गावय राग।
दूसर घर के बने अथान,अबड़ मिठाथे सब ला जान। 7

घेरी भेरी कहय मितान,देबे महूँ ल आम अथान।
पारा भर के जी ललचाय,रोज रोज माँगे ला आय। 8

बाँटत बाँटत जी करलाय,मोर सुवारी रार मताय।
निसदिन वोला मैं समझाँव,बाँट बाँट के येला खाव। 9

बिहना बासी के संग खाव,दिनभर घूमव मौज मनाव।
पाचक होथे आम अथान। बात गजब के येला जान। 10

अजय अमृतांशु
भाटापारा
मोबा. 9926160451

सिंहावलोकनी दोहा (गरमी)

गरमी हा आ गे हवय,परत हवय अब घाम।
छइँहा खोजे नइ मिलय,जरत हवय जी चाम। ।

जरत हवय जी चाम हा,छाँव घलो नइ पाय।
निसदिन काटे पेंड़ ला,अब काबर पछताय। ।

अब काबर पछताय तै,झेल घाम ला यार।
पेंड़ लगाते तैं कहूँ,नइ परतिस जी मार। ।

नइ परतिस जी मार हा,मौसम होतिस कूल।
हरियाली दिखतिस बने,सुग्घर झरतिस फूल। ।

सुग्घर झरतिस फूल तब,सब दिन होतिस ख़ास।
हरियाली मा घाम के,नइ होतिस अहसास। ।

नइ होतिस अहसास जी,रहितिस सुग्घर छाँव।
लइका पिचका संग मा,घूमें जाते गाँव। ।

घूमे जाते गाँव तै ,रहितिस संगी चार।
गरमी के चिंता बिना,मिलतिस खुशी अपार। ।

अजय अमृतांशु
भाटापारा