Category: छत्तीसगढ़ी भाखा

छत्तीसगढ़ी भाषा का मानकीकरण : कुछ विचार

डॉ. विनय कुमार पाठक और डॉ. विनोद कुमार वर्मा की पुस्तक ‘छत्तीसगढ़ी का संपूर्ण व्याकरण’ पढ़ने को मिली। इसमें देवनागरी लिपि के समस्त वर्णों को शामिल करने की पुरजोर वकालत की गई है। यह भी ज्ञात हुआ कि डॉ. वर्मा और श्री नरेन्द्र कौशिक ‘अमसेनवी’ की पुस्तक ‘ छत्तीसगढ़ी का मानकीकरण : मार्गदर्शिका’ भी शीघ्र प्रकाशित होने वाली है।

यहाँ मैं ‘छत्तीसगढ़ी का संपूर्ण व्याकरण’ पुस्तक पर अपने कुछ सवाल और विचार रखना चाहता हूँ। क्या व्यक्तिवाचक संज्ञा के लिए ही देवनागरी लिपि के सभी वर्णों को स्वीकार किया गया है? क्योंकि प्रशासनिक शब्दकोश खण्ड में हिन्दी के बहुत से शब्दों को अपभ्रंश रूप में लिखा गया है। यथा- आकास, अनुसासन, अब्दकोस, असासकीय, आचरन, सीघ्रलेखक, आदेस, रास्ट्र, वरिस्ठ, वेधसाला, कार्यसाला,संदेस, सिफारिस, अनुसंसा, गियापन, ससर्त, अकुसल, सुल्क, सून्य, सपथपत्र, विसय, सारनी, उपसीर्स, संदेस आदि।
शब्दकोश खण्ड में इसारा, इस्लोक, ईसान आदि।





संधि खण्ड में विसम, विसाद, सुसमा, प्रनाम, भूसन, निस्फल, निस्चिंत, दुस्सासन, मन-अभिलासा आदि। इस प्रकार श, ष, ज्ञ और ण की छुट्टी कर दी गई है।

‘व’ की जगह ‘ब’ के प्रयोग से बचने का सुझाव तो है लेकिन बकालत, बिसय, बिस्तार, बित्तीय, बिदेसी, बिधान, बिबेक, बिक्रय, बिभाग, साबधानी आदि को बेखटके इस पुस्तक में स्थान देने का क्या अर्थ निकाला जाए? पुस्तक शुद्ध छत्तीसगढ़ी की बात करते-अपभ्रंश छत्तीसगढ़ी की चपेट में दिखता है। कुछ उदाहरण और जो छंद खण्ड से लिए गए हैं-

बरम्हा, धरम, परान, इंदिरावती, दुरुग, करन, नकसान, परबत, बिनास, निरासा, लछमी, लछमन, आसुतोस, नियारी, पियारी, रक्छा, गनेस आदि।
नरेन्द्र कौशिक ‘अमसेनवी’ जी भी ‘छत्तीसगढ़ी का मानकीकरण’ पुस्तक से जुड़े हैं। उनका कहना है कि अर्ध ‘र’ की जगह पूर्ण ‘र’ लिखकर हम ‘प्रदेश’ को ‘परदेश’ बना लेते हैं। हम लोग ‘प्रभाव’ को ‘परभाव’ लिखेंगे तो इसका अर्थ पर का भाव (दूसरे का भाव) हो जाएगा। इसे छत्तीसगढ़ी शब्द का हिन्दी अर्थ निकालना कहा जाएगा। यह सुविज्ञात तथ्य है कि शब्द का केवल एक ही अर्थ हो यह कोई जरूरी नहीं है। एक शब्द के कई अर्थ होते हैं। वहीं छत्तीसगढ़ी में ‘श्रम’ या ‘परिश्रम’ लिखने की जरूरत ही नहीं है। क्योंकि इसके लिए छत्तीसगढ़ी में मिहनत शब्द है। धरम, करम, गरम, मरम, गरभ, सरम, करन, को गलत कहना कहाँ तक उचित है? धर्म, कर्म, गर्म, मर्म, गर्भ, शर्म, कर्ण आदि के आधे ‘र’ को पूर्ण ‘र’ करना कहीं से भी अनुचित नहीं है।





अर्ध ‘र’ कहाँ जरूरी है इसका उदाहरण देखिए- ‘कार्य’ यदि इसे कोई ‘कारय’ लिखता है तो गलत है।
अब हम क्रम, प्रण, प्रकार, प्रभाव, प्रणाम, प्रचार, प्रपंच, प्रबंध, प्रमाण आदि को देखें तो इन शब्दों में प्रथम वर्ण ही आधा है और ‘र’ पूरा है। इसमें प्रथम वर्ण को पूर्ण बनाकर आदिकाल से आजतक छत्तीसगढ़ी में सहजता से बोला जाता है।
यथा- करम, परन, परकार, परभाव, परनाम, परचार, परपंच, परबंध, परमान आदि। यहाँ करम और परभाव जैसे कुछ शब्दों के दो-दो अर्थ बताने होंगे।

ङ, ञ का प्रयोग तो हिन्दी में भी बंद हो चुका है। ऋ का महत्व भी सिर्फ मात्रा लगाने तक सीमित हो गया है। अतः हिन्दी में प्रयुक्त होने वाले सभी वर्णों के छत्तीसगढ़ी में प्रयोग से कोई ऐतराज न होने के बावजूद मतभेद मुख्यतः ष, श, ण, और संयुक्ताक्षर क्ष, त्र, ज्ञ को लेकर होता है। छत्तीसगढ़ी में इन वर्णों का उच्चारण नहीं होता। क्योंकि छत्तीसगढ़ी न तो इनसे शुरू होनेवाले शब्द हैं न ही अन्य किसी शब्द में इनका प्रयोग होता है। इसलिए सभी वर्णों को शामिल करने का मुख्य कारण अन्य भाषा के शब्दों को जस का तस स्वीकारना भर है। दूसरी समस्या है अर्द्ध अक्षरों को किस सीमा तक पूर्ण बनाकर प्रयोग किया जाए। जैसे धर्म- धरम, कर्म- करम ( आधा र को पूर्ण र करके) दोनों का प्रयोग सही है। क्रम- करम, प्रण- परन, प्राण- परान (आधा क और प को पूर्ण करके) यहाँ भी दोनों प्रयोग सही है। अत: अपभ्रंश को गलत मानना हमेशा उचित नहीं है। छत्तीसगढ़ी भाषा पर कई महत्वपूर्ण पुस्तकों के लेखक डॉ. सुधीर शर्मा की टिप्पणी एकदम सही है- “अपभ्रंश शब्द छत्तीसगढ़ी की एक बड़ी विशेषता है।” अपभ्रंश से परहेज करे तो कविता लिखना बंद हो जाए।

“मोर छुटगे ‘परान’
जीव होगे हलाकान
मैं बेटी अटल कुवाँरी
मइके म रहितेंव वो…”

“मोर कतका सुग्घर गाँव
जइसे ‘लछमी’ जी के पाँव।”

-दिनेश चौहान

महतारी भाखा के मान करव




मनखे हा जनम धरे के बाद जउन भाखा पहिली सीखथे उही हा ओखर महतारी भाखा कहाथे। इही महतारी भाखा हा वो मनखे के जीयत-मरत समाजिक चिन्हारी होथे, एखर बिन वो हा अधूरा रथे। महतारी भाखा हा मनखे के असल अउ मउलिक पहिचान होथे। महतारी भाखा के जघा ला अउ कोनो दुसर भाखा हा नइच ले सकय। जइसे गाय के दूध हा कभू दाई के दूध नइ बन सकय वइसने महतारी भाखा के बरोबरी कोनो नइ कर सकय।

मनखे के सरी बिचार,बेवहार अउ बिकास के जरी ओखर अपनेच महतारी भाखा मा होथे। अपन महतारी भाखा मा एकमई अउ सँघरा सुमता मा रहे के गुरतुर गुन होथे। नान्हें लइका मन के पढ़ई-लिखई अउ सिक्छा हा ओखर महतारी भाखा मा होय ले लइका ला सरल,सहज अउ सहुलियत मिलथे अउ अपनेच लागथे। घर-परवार अउ सिक्छा के भाखा एकेच होथे ता कोनो लइका मन ला कोनो प्रकार के कोनो परशानी नइ होवय। लइका जउन ला दिन-रात,खेलत-खावत, रोवत-हाँसत,सोवत-जागत,देखत-सुनत हावय ओही ला सीखे-समझे मा सिध्दो परथे। जादा जलदी सीखथे घलाव। लइका के घर के भाखा अउ इस्कूल सिक्छा के भाखा एकमई होय ले सुफल होय के मउका हा जादा होथे। जब घर अउ इस्कूल के भाखा आने-ताने हो जाथे तब पढ़इया लइका मन ला अब्बङ़ मुसकुल होथे। अइसन मा लइका हा ना तो इस्कूल के भाखा ला बरोबर बने ढ़ंग ले सीख पावय ना घर के भाखा ला बने ढ़ंग ले बोल पावय। एहा खिचरी भाखा बन जाथे अउ अइसन भाखा हा मनखे अउ समाज बर,देश अउ दुनिया बर खतरनाक होथे। अइसन सिक्छा के चक्कर मा संस्कार हा पछुवा जाथे। लइका हा जइसे-तइसे सिक्छित हो जाथे फेर सुग्घर संस्कारी कभूच नइ बन पावय।

लइका हा महतारी के पेट भीतरी अपन महतारी भाखा ले संस्कार पाथे अउ इही भाखा मा अपन बिकास के रद्दा बनाथे। महतारी भाखा सीखे मा, समझे मा अउ गियान पाय मा सबले सरल होथे। लइका हा जउन भाखा मा रोथे उही हा ओखर असल महतारी भाखा होथे अइसन कतको बिद्वान मन के कहना अउ मानना हावय। भाखा हा भाव ले अउ भाव ले भाखा हा जुरे रथे। एला एक दुसर ले अलग नइ करे जाय। हमर भारत भुँईयाँ के सभियता मा भाखा ला महतारी के दरजा मिले हावय। ए प्रकार मनखे के जिनगी मा तीन झिन महतारी होथे। पहिली महतारी ओखर जनमभूमि, दूसर महतारी ओखर भाखा अउ तीसर महतारी ओखर जनम देवइया महतारी। इही तीन महतारी मन के मनखे हा जिनगी भर करजा खाय बइठे रथे। इंखर करजा उतारना सबो मनखे मन के पहिलावत अउ असल धरम होथे। ए महतारी मन के करजा ला अपन जिनगी मा जीते जी उतार दँय इही सबके पहिली करतब्य होना चाही।




पढ़ई-लिखई मा घलाव घातेच महत्तम होथे मनखे के महतारी भाखा के। समे समे मा सिक्छा के माधियम हमर महतारी भाखा ला बनाय बर बइठक, गोस्ठी,सम्मेलन अउ सरी उदिम होथे। अइसन सबो उदिम हा पइसा अउ समे के निरमामूल बरबादी भर होथे अउ कुछू मिलय ना जुलय। सरकर हा सरी उदिम करे के प्रयास करथे महतारी भाखा के बिकास अउ बचाव बर। बङ़का-बङ़का ताम-झाम घलाव करथे महतारी भाखा के प्रति मया देखाय अउ जताय बर। हमर जत्तीसगढ़ राज के महतारी भाखा अउ राजभासा छत्तीसगढ़ी हा हरय। नवा राज बनते साठ छत्तीसगढ़ सरकार हा छत्तीसगढ़ी ला सरकारी कामकाज करे के भासा बनाय बर एला राजभासा बना दीस हे। छत्तीसगढ़ी राजभासा के रखवार छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग ला बना दीन हे सरकार हा। ए आयोग ला राजभासा के पालन-पोसन ला दाई-ददा बरोबर करे के जिम्मेदारी दे गे हावय। आयोग घलाव अपन समरथ हिसाब अपन छत्तीसगढ़ के जतन-पोसन मा लगे हावय। सरकार घलाव अपन सरी दल-बल ला छत्तीसगढ़ी भाखा के सेवा मा समरपित करे हावय। छत्तीसगढ़ी भाखा के बिकास के नाँव मा हर बच्छर करोङ़ो रुपिया ला पानी असन बोहावत हावँय।

छत्तीसगढ़ी भाखा के छतनार हा आज अतका सरकार के सरकारी उदिम ले घलाव कोचरावत हावय। ना कोनो विधानसभा मा,ना कोनो सरकारी सेवा ,ना कोनो दफतर मा छत्तीसगढ़ी भाखा ला मान-सम्मान मिलत हे। ना कोनो साहेब-बाबू,नेता-मंतरी मन अपन पोगरी बिचार अउ बेवहार ला राजभासा मा राखत हे। राजभासा हा हमर राज बर सादा हाथी बरोबर होगे हावय। एखर खरचा-पानी हा हर बच्छर सरलग सुरसा के मुहूँ बरोबर बाढ़तेच जावत हे। छत्तीसगढ़ी राजभासा आयोग बने ले थोरिक उमीद जागे रहीस हे के अब तो हमर महतारी भाखा के मान-मनउव्वल ला बाढ़ही। जउन उमीद ले एखर गठन ह़ोय रहीस हो वोहा आज आठ-नौ बच्छर मा घलाव पूरा होवत नइ दिखत हावय। ना कोनो कार्यालय मा, ना कोनो इस्कूल मा छत्तीसगढ़ी भाखा के बोलइया-बतइया हावँय। इस्कूल के पढ़ई-लिखई मा घलाव छत्तीसगढ़ी भाखा के ओतका महत्तम नइ हे जतका होना चाही। सरी देश अउ दुनिया भर मा प्राथमिक सिक्छा हा महतारी भाखा मा दे जाथे सिरिफ हमर ए राज मा छोङ़ के। कक्छा पहिली ले आठवी तक के एक ले चउदा बच्छर के लइकामन ला अपन सुरुवाती सिक्छा ला अपन महतारी भाखा मा पाये के मउलिक अधिकार हमर संविधान हा दे हावय। देश मा जइसन रास्ट्रभासा के हाल हा बेहाल हे वइसने हमर राजभासा के बुरा हाल हे। छत्तीसगढ़ी भाखा बर कोनो जीनिस के काँहीं कमी नइ हे। सासन हे, साधन हे अउ संसाधन घलाव हे फेर मन मा मान नइ हे अपनेच महतारी भाखा बर। सरी “सिस्टम” हा अंगरेजी के पिछलग्गा भागत हावय। अंगरेजी ला सफलता के गारन्टी बता के अंगरेजियत ला जबरन के मुङ़ पेलवा सरीक हमर मन के मुङ़ मा मङ़ावत देहें।

महतारी भाखा के मान-गउन बर सरकार हा नियम-अधिनियम बनाथे, अपन बिधायक अउ मंतरी मन ला छत्तीसगढ़ी मा गोठियाय बर चेताथे। राजभासा आयोग हा घलो साल मा दु-चार ठन सम्मेलन अउ बइठक कराथे,महतारी भाखा के किताब छपवाथे। इहां के दु-चार ठन समाचार पत्र मन हा हफ्ता मा एक दिन छत्तीसगढ़ी भाखा ला अपन मर गरजी हिसाब जघा देथे फेर एला पढइया अउ पोठ लिखइया नइ मिलय घलाव कहिथें। राजभासा आयोग हा प्राथमिक सिक्छा के पाठ्यक्रम ला छत्तीसगढ़ी मा लागू करे खातिर कक्छा पहिली ले आठवीं तक के किताब मन के हमर महतारी भाखा छत्तीसगढ़ी मा अनुवाद करे के झारा-झारा नेवता दे हावय। तभो ले ए सबो उदिम करे पाछू घलाव हमर राजभासा के मान-मरजाद हा दिनो-दिन गिरत जावत हे। हमर राजभासा ला हमर रास्ट्रभासा हिन्दी के नान्हें बहिनी अउ अंगरेजी के सउत अइसन मया मिलथे अपनेच राज मा फेर बाहिर के झिन पूछ। छत्तीसगढ़ी भाखा हा अपनेच घर मा बिरान असन बिमार परे हावय। एला ए दसा मा लाने के सबले जादा दोसी हमीं मन हा हरन। हमन अपन बोलचाल,बेवहार अउ बिचार मा अपन महतारी भाखा छत्तीसगढ़ी के प्रयोग करे मा ढेरियाथन। पढहे-लिखे लइका-सियान मन छत्तीसगढ़ी मा गोठियाय-बताय मा लजाथें। छत्तीसगढ़ी भाखा ला बने पढ़े-लिखे छत्तीसगढ़िया मन हा गाँव,गवँई अउ गवाँर के भाखा समझथें।




आज हमला हमर महतारी भाखा छत्तीसगढ़ी ला अपन अंतस मा इस्थान, मन मा मान देके खच्चित जरुरत हावय। सरकार के, मंतरी मन के, बिधायक मन के, साहेब-बाबू मन के, पढ़ई-लिखई अउ जन-जन के भाखा एकेच होना चाही। राजा अउ प्रजा के भाखा एकमई होना होही तभे बिकास के बूता हा सिध परही। घर के सियान ला अगर अपन घर में मान नइ मिलही ता पारा-गली,मोहल्ला मा वोला कोन पूँछही,मान देही? एखर सुरुवात हमला हमर ले ही करना परही। हमला अपन सरी काम-बुता,बिचार-बेवहार मा जादा ले जादा छत्तीसगढ़ी भाखा के प्रयोग करना चाही। हमला हमर महतारी भाखा के रुप मा राजभासा के अधिकार मिले हावय एला हमला हथियार बनाना हे अपन कमजोरी,लचारी नइच बनाना हावय। सिरिफ इच्छा सक्ति के जरुरत हावय। एखर सुरुवात सबला अपन-अपन घर मा गोठ-बात महतारी भाखा मा करके करना चाही। आज सबले जादा जरुरी जीनिस वाट्सअप अउ फेसबुक मा छत्तीसगढ़ी भाखा के नब्बे परसेन्ट उपयोग करना चाही। अपन भाखा मा मान हे, सम्मान हे अउ सरी संसार भर के सुख हे,सुबिधा हे। आज अपन भाखा मा लाज मरे के नही काज करे के जादा जरुरत हावय। इही हमर महतारी भाखा के मान अउ मरजाद के चिन्हारी हरय के हमन अपन बेवहार मा,अपन बिचार मा कतका बगराथन,वोला बउरथन।

-कन्हैया साहू “अमित”
शिक्षक
मोतीबाङी~भाटापारा (छ.ग)
संपर्क ~ 9200252055



छत्तीसगढ़ी भाखा हे : डॉ.विनय कुमार पाठक

एक हजार बछर पहिली उपजे रहिस हमर भाखा





छत्तीसगढ़ के भाखा छत्तीसगढ़ी आय जउन एक हजार बछर पहिली ले उपजे-बाढ़े अउ ओखर ले आघु लोकसाहित्य म मुंअखरा संवरे आज तक के बिकास म राज बने ले छत्तीसगढ़ सरकार घलो सो राजभासा के दरजा पाए हे। छत्तीसगढ़ी भाखा ल अपने सरूप रचे-गढ़े बर बड़ सकक्कत करे ल परे हे-

पीरा-कोख मा जन्मेे, मया- गोदी मा पले,
माटी महमई धरे अंचरा, छत्तीसगढ़ी भाखा हे।
महानदी लहरा, जेखर मुअखरा,
होंठ देरहौरी गाल बबरा,
छत्तीसगढ़ी भाखा हे।

छत्तीसगढ़ी ह ब्रज-सांही गुरतुर भाखा हे। पूर्वी हिंदी के बोली के रूप मा अवधी अउ बघेली के संग छत्तीसगढ़ी ल जघा दे गे हे। सुराज के पहिली तक एला बोली के रूप मा जानय फेर पचास-साठ बरिस आघू एखर मूल्यांकन होईस अउ एला उपभासा नइ तो विभासा के दरजा दे गईस। ये सब सोध होए ले अउ साहित्य पोठ होय ले माने गईस। काहे के एखर व्याकरन घलो जुन्ना हे अउ एमा पचास-साठ बरिस ले साहित्य-लेखन मा गति जरूर आईस हे। अलग राज बने के पाछू छत्तीसगढ़ सरल उदम बाढ़े लागिस। एला राज्य सरकार राजभासा के दरजा देईस अउ आयोग घलो बना दिस। अब ओहर भासा कहे गईस अउ राजकाज बर हिंदी के संग एखर उपयोग करे माने लिखई- पढ़ई अउ बोलई के भाखा मान लिए गईस। छत्तीसगढ़ ल दक्छिन कौसल अउ महाकौसल कहे जाथे, ए तरा माता कौसिल्या के अवतरे जघा ए आए-

बाल्मीकि, धरमदास, सबाले ल संवारे।
राम के गोड़ ल पटवारे, छत्तीसगढ़ी भाखा हे।

छत्तीसगढ़ी ल दू करोड़ ले जादा मन बोलथें अउ समझथें। एहर लोक व्यवहार के बोली ए अउ एक संग मातृभासा, लोकभासा, संपर्क भासा अउ सरकार डहर ले राजभासा के रूप मा माने के कारन राजभासा घलो मान लिए गे हे। इहां जउन भी बाहर ले आईन, इहां के हो के रहि गिन अउ जउन एखर लूट-खसोट करे बर आईन, उनला ए राज छोड़ के जाना परिस। जउन एला अपन धरती मानिस, ओला इहां के धरती अपन बेटा असन मया-दुलार दिस। एही कारन हे के इहां के संस्किरिति मा सब बर जघा हे, ठउर हे। इहां जउन आईन, मया पाके फिर हो गईन। इहां के भाखा घलोक दूसर भाखा ल चूड़ी पहिरा के, भात खवाके अपन जात मा मिला लिए हे। एही गुन इहां के लोगन मा देखे जा सकत हे तभे तो छत्तीसगढ़िया सब ले बढ़िया कहे गे हे।

छत्तीसगढ़ी सबो कोनो बोलथें अउ समझथें घलोक फेर एला बाहिर जाके दूसर मन मेर बोले मा लजाथे अउ ओ मेर उंकर लोक व्यवहार नंदा जाथे, ये बने बात नोहय। सब ल अपन मातृभासा उप्पर गरब करना चाही। ओही तो ओखर चिन्हारी आय। अंगरेजी सिक्छा के परचार हर पूरा देस मा छेत्रीय भासा, लोकभासा अउ बोली ल गंवाय अउ पिछड़ा बताए रहिस तभे तो हमन ला अपन-आप मा दीन हीन जिनगी बिताय अउ छत्तीसगढ़ीपन ल लुकाए के टकर परगे जउन सुराज के सत्तर बछर पाछू घलोक मन म पलत हे, ये बने बात नोहय। राजभासा बने के ये अरथ अब कारयालय मा हिंदी के संग छत्तीसगढ़ी मा कामकाज करे जाही। आयोग के पहिली अध्यक्छ ह एखर नींव डारिस अउ दूसर ह परसासनिक सब्दकोस बना दिस।




हाईकोर्ट के माननीय न्यायाधीश हर मन ल ए राज के मनखे के भावना ल समझत हुए छत्तीसगढ़ी मा फैसला करे के बिनती करे गईस हे। काहे के एखर पहिली माननीय न्यायमूर्ति फकरुद्दीन हर एक फैसला छत्तीसगढ़ी मा दे के इहां के लोगन के भावना के सुआगत करिन। एकरे साथ बेमेतरा के एक अर्जीनवीस हर बैनामा छत्तीसगढ़ी मा लिखके न्यायालय मा कामकाज करे के रसदा खोल दिए हे। परसिक्छन, कारयसाला, संगोस्ठी करके, छत्तीसगढ़ी भासा के ग्रंथ अउ सब्द सागर छापके, मंत्रालय अउ सचिवालय ले परसिक्छन के सुरूआत करके आयोग ह एक बछर मा छत्तीसगढ़ी मा चेतना जगाए हे जेखर ले पूरा परदेस मा एखर हलचल दिखत हे। राजभासा के कामकाज म जउन कमी अउ बाधा हे, तेला दूरिहाए बर आयोग काम करिही। आने वाला चुनाव छत्तीसगढ़ी ल लेके होही। कतकोन विदवान अउ भासाविद् घलो मन लोकभासा ल राजभासा के दरजा देए अउ आठवीं अनुसूची मा अंकवाए के उदिम ल हिंदी के बिकास अनुसूची मा अंकवाए के उदिम ल हिंदी के बिकास बर ठउके नइ मानय। अरे भाई हो? हिंदी के जतका सामरथ लोकभासा बनही, हिंदी ओतके पोठ बनही काहे के डारा-पाना अउ साखा के बढ़ोत्तरी रूख-राई के बढ़ोतरी ये। साखा पेड़ ले अलगियावत कहां हे? जब एखर जादा ले जादा साखा माने लोकभासा आठवीं अनुसूची मा आही तौ हिंदी अपने-अपन रास्ट्रभासा के गरिमा ल बढ़ोही? लोकभासा ल आठवी अनसूची मा नइ लेना सामरथ भाखा के बढ़ती अउ बिकासल रोकना कहे जाही। एखर बर सरकार ल पहल करना चाही, नइ तो राजनीति बलद जाही। आठवीं अनुसूची म अंकाय ले भासा हर जी जाही जउन आज के जुग के मांग हे।भासा- बोली के भेद ल नइ जानने वाला, राजभासा के करतब ल नइ समझने वाला जब नकारात्मक बात करके भासा के राजनीति करथे अउ सकारात्मक सोच कोती ले आंखी मुंद लेथे तौ अइसन मुड़पेलवा अउ अपन कुकरी के एक टांग तोड़ के अपन कहावत- ‘मोर मुरगी के एक टांग’ कहावत के डींग मरैया लोगन ल मालूम होना चाही के आयोग कोनो जादू के छड़ी नोहय जउन तुरते- फुरते सब कर डारय।

डॉ. विनय कुमार पाठक
अध्यक्छ, छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग, बिलासपुर

(भास्‍कर, बिलासपुर में प्रकाशित आलेख)



छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के वेबसाईट

CGRajbhashaayogभिलाई म छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के कार्यक्रम म मुख्यमंत्री डाॅ.रमन सिंह ह छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के वेबसाईट के उदघाटन करिन. येमा छत्तीसगढ़ी भाषा के सम्माननीय साहित्यकार मन के नाम संग, राजभाषा विधेयक, फोटू, समाचार पत्र, माईकोठी योजना, बिजहा कार्यक्रम, छत्तीसगढ़ी पकवान के सुघ्घर जानकारी हावय. येमा छत्तीसगढ़ी शब्दकोस के पाना घलो हावय फेर अभी येमा जानकारी नइ ये, येखर अगोरा हावय.

संचार साधन के होवत बिकास ला देखत हमला ये वेबसाईट के बड़ उछाह ले सुवागत करना चाही, राजभाषा आयोग ला ये सुघ्घर काम बर गुरतुर गोठ परिवार डहर ले कोरी कोरी बधई.

हमर भाखा – छत्तीसगढ़ी : श्रीमती हेमलता शर्मा

hemlata sharmaहमर भाखा छत्तीसगढ़ी के विकास बर अऊ ओला राजभाखा बनाए बर हम सब छत्तीसगढ़िया मन ला अऊ कतका रद्दा देखे बर परही, तेन हर एक ठन सोचे के बिसय आय।

छत्तीसगढ़ ला अलग राज बनाए बर भी हमन ला अब्बड़ मेहनत करे बर परे रहीस तइसने अब छत्तीसगढ़ी ला राजभाषा बनाए बर सबो झन ला एकजुट होए बर परही तभे कुछू रसता निकलही तइसे लागथे।

छत्तीसगढ़ के सब ले बड़े दुरभाग ऐ खुद छत्तीसगढि़या मन ऐला बोले मा लजाथे, अउ पढ़े मा घलो अलकरहा लागथे अइसे मन बना ले हें, फेर लिखना तो अभी अउ दुरिहा के बात ऐ। अउ ऐ सब मुसकिल ला दुरिहा करे बर हमन ला अपन भाखा मे सिकछा के नियम ला बनाए बर परही।

हमर गॉंधी बबा हर घलो इही बात ला कहे रहिस की लइका मन के प्राथमिक सिकछा हर अपन भाखा मा होना चाहि तभे लइका के पूरा बिकास होही, काबर एक लइका ला ओखर मातृ भाखा मा पढ़े ले रोकना भी पापेच आए। फेर वाह रे दुरभाग, गांधी बबा के नाम के माला ला नेता मन रोज जपथे, फेर ओखर बताए सही रद्दा अउ नियम ला नई मानय।

हमर सरकार हर सिकछा मा एक बिसय छत्तीसगढ़ी ला राखय फेर पाठ्यकरम मा सामील करे ले कुछु नई होवय। काबर गुरूजी मन खुदे ओ बिसय ला वइसन चेत लगा के ना तो पढ़ंय अऊ ना पढ़ावंय। ऐ दिसा मा थोरकन अउ मेहनत करे के जरूरत हावय। सरकार के नियम ह कागजे भर म मत रहय ओ हर जन-जन मेर पहुंचय नई तो सासन हर कड़ाई से पालन करे के आदेस दय तभे रद्दा बनही।

अउ मीडिया ला घलो एकर बर अपन सहयोग देना चाही, ओखर जिम्मेदारी हर तो सब ले जादा हे, अपन भाषा म समाचार पत्तर अउ सबे जगह के टीबी मा अपन भाषा मा समाचार चलय तभेच मनखे मन जागही। अउ हमर भासा छत्तीसगढ़ी हर अपन ओ मान-सम्मान ला पाही जेकर ओ हर हकदार हे।

‘‘अइसन गुतुर भासा, अइसन गुतुर गोठ।
बोलइया अऊ सुनइया के मनला सनतोस’’

श्रीमती हेमलता शर्मा
शिक्षिका, सरस्वती शिशु मंदिर, कुसमुण्डा (कोरबा)

काम काजी छत्तीसगढ़ी, स्वरूप, अउ संभावना

Sharma

शुरूवात ला पहिले देखे जाये तो छत्तिसगढ़ ला अलग राज बनाये खतिर बहुत पसीना बहाइन, जउन मन मेहनत करीन अपन सब काम काज, घर गृहस्थी के व्यवस्था ला छोड़-छोड़ के। आखिर सफल होइन अउ छत्तिसगढ़ राज्य बना के दम लेइन।

अब ध्यान गेइस राज भाषा बनना चाही, उहू हमर सियान मन के प्रयास से आखिर बन गे। इहॉं तक कि छत्तिसगढ़ राजभाषा आयोग छत्तिसगढ़ शासन के गठन भी होगे। ऐ हर तो ओखर दर्पण जैसे स्वरूप बन के तैय्यार होगे।

स्वरूप के दर्पन ला खाली देखे में काम नई चलय, ऐखर सच्चा स्वरूप ला लाय बर प्रचलन अउ व्यवहार बर बहुत मेहनत करे बर परही सुरूवात कैसे कइसे करबो? पहला गुरू मा होथे। लइका मन ला नान पर से घर में छत्तिसगढ़ी बोल-बोल के आदत डाले बर परही। काबर के बहुत झन दाई ददा मन गांव से शहर घर ले हाबय कोनो काम काज, नौकरी खातिर तो सियान मन, नाती पोता के दुलार सेती। लइका पढ़ावत हे अंग्रेजी स्कूल, में। रहात हे शहर में बोलत हैं अंग्रेजी अउ हिन्दी। छत्तिसढ़ी भाशा गवा गे। तो पहली बात घर में दाई-ददा ला छत्तिसगढ़ी बोलना है। दूसरी बात जब भी हमन आपस में बात करबो ऑफिस में, बाजार में, मोबाइल में तब हमन राजभाषा छत्तिसगढ़ी में गोठियाबो, लोक लाज या अपन झिझक ला भूला के। एक नवा प्रतिज्ञा या जवाबदारी समझ के। आप देखत हो हू कि मराठी, तेलगू, पंजाबी, सिन्धी भाई मन एक दूसर से अपने भाषा में गोठ बात करथे। अउ हमन बोकोर-बोकोर ओखर डाहर देखत रहिथन। यहॉं तक कि मैं अपन नौकरी मे समय में देखेव बी.आर.पी. भिलाई में कुछ उद्घाटन के कार्यक्रम रहिस ओमा रूस के पहुना आय रहिस ओ हा अपन भासन रूसी भाषा में देवय अउ संगे-संगे एक जन भाई लोग हा हिन्दी, अंग्रेजी में ओला समझावत जाय। ऐ ला कइथे भाषा प्रेम, वो हर चाहतीस तो अंग्रेजी या हिन्दी में भी बोल सकत रहिस हे। तौ स्वरूप ला सुंदर बनाय खातिर बोलना, संभव होइस तो लिखना अउ ऐखर गहराई में शब्द कोश, हाना, ददरीया, सूआगीत, गौरा गीत बिहाव गीत, समधीगारी ऐला प्रचलन में लाय बर परही। अब तो प्रचार प्रसार बर मिडिया, समाचार पत्र, केसिड सबो आ गेहे।

आयोग ला अपन काम करन दौ। हमन तो ओखर हाथ पाव अन, हमी मन सुन के, पढ़ के सुत जबो तो पिछड़ जबो। माला ला बनाय बर एक-एक फूल ला गूथना पड़ थे। वैसनहा हम सब के प्रयास हो ही तब छत्तिसगढ़ी भाषा के सुंदर स्वरूप ला चमक लगही। बत आगे संभावना बढ़त जाही। ओड़िस में मैं देखेव कछेरी में ऑफिस में ओड़िया भाषा में अक्षर ला देखेव तो सीधा जलेबी अउ उल्टा जलेबी असन लिखाय रहाय नोट शीट, अउ सबो कागज ओड़िया भाषा मा लिखा पढ़ी हो थे। हमरो इहॉं धीरे धीरे छत्तिसढ़ी भाषा में काम-काज हो ही। अउ प्रचलन मा आही। जब प्रचलन में आ जही तब ऐखर स्वरूप ला जगमगावत देखे बर मिलिही। शुरू में सब काहय येखर शब्द कोश नई ये, ऐखर प्रचलन में व्यवहारिक कठनाई हाबय अब लौ शब्द कोश बन गे। अब कोनो ला बोले के मौका नईये।

जब आगे कोनो ला बोले के मौका नईये। जब आगे-आगे छत्तिसढ़ी भाषा के सरकारी काम-काज साथ मा गैर सरकारी संस्था में प्रयोग, हमन मन के लेख, पत्र कारिता, बोल चाल, हा गति पकडही तब येखर संभावना के भंडार हा समझ में आ ही संभावना के सागर में अभी तो शुरूवात ये। आगू-आगू जाव सफलता के जोत हा कतका अंजोर हो ही। तब सब कहहीं – छत्तिसढ़ीया – सब ले बढ़ीया।

रामनारायण शर्मा
मैनेजर (मॉडर्न मेडिकल इंस्टिट्यूट, रायपुर)
क्वार्टर नंबर 14/बी,स्ट्रीट – 18 सेक्टर 7
भिलाई नगर, भिलाई
फोन नं. – 0788 – 2222348

छत्तीसगढ़ी के मानकीकरन अउ एकरूपता : मुकुन्द कौशल

Mukund Kaushalबिलासा कला मंच कतीले सन् दू हजार एक म छपे, डॉ पालेश्वरशर्मा के लिखे छत्तीसगढ़ी शब्दकोश के भूमिका म छत्तीसगढ़ी के बैंसठ मानक शब्द मन के मायने अउ ओकरे सँग वर्ण /संज्ञा/वचन/सर्वनाम/विशेषण/क्रिया अउ कृदन्त ले संबंधित ब्याकरन के गजब अकन जानकारी, डॉ. रमेशचंद्र मेहरोत्रा जी ह अगुवा के लिख डारे हवैं।

डॉ. चित्तरंजनकर अउ डॉ. सुधीर शर्मा के सँधरा किताब “छत्तीसगढ़ी भाषा, स्वरूप और संभावनाएँ” जउन सन् दू हजार म छप चुके हे, ते मा घलो ये बिसय उपर बनेकन अँजोर डारे गे हवै।

हकीकत म मानकीकरन ह, छरियाए बोली मन मा समानता लाने के उदिम आय। मानकीकरन ह, पहिली लिखई म अ़ँवतरथे ओकर बाद बोलब मा। मानकीकरन के मतलब, भासा के कोनो एक मुँहरन ला स्वीकार करना तहवै, फेर दूसर मुहरनमन के अस्वीकार बिल्कुल नोहै। मानकीकरन मा सबो कती के सुग्घर-सुग्घर शब्द अउ बोले बताए के शैली ला मिंझार के, एकमई करके ओला सहज बनाना हवै। ओला फरियाना हवै। काबर के बोली ले भासा बनथे, भासा ले बोली नइ बनै। बोली मन नँदिया हे त भासा समुद्र हवै। साखी बर हिन्दीच्च् ला ले लौ। आज हम जतकापान सुग्घर हिन्दी लिखत-पढ़त-बोलत हन, ओतकापान सीखेबर, उहाँतक पहुँचेबर हमला दू सौ बछर के अगोरा करे बर परे हे।

मानकीकरण ला लेके घेरीबेरी एक सवाल उचाए जाथे के जिहाँ -कवर्धाई, काँकेरी, खैरागढ़ी,गोरो, डंगचघा, गौरिया, देवरिया, धमधी, नदगाँही, पारधी, बहेलिया, बिलासपुरी, लरिया, बैगानी, रतनपुरी, रायपुरी, सिकारी अउ सतनामी के संगेसंग कमारी खल्टाही, पनकी, मरारी, नागवंशी, पंडो, सदरी-कोरवा, सरगुजिया, ललंगा, बिंझवारी, कलंजिया, भूलिया, अड़कुरी, चंदारी, जोगी, धाकड़, नाहटी, बस्तरिहा, मिरगानी, मेहरी, गोंड़ी अउ हल्बी असन कतकोन, किसम-किसम के बोली बोले जाथे उहाँ भासा म एकरूपता कइसे आही ? अउ अतेक अकन बोली बोलइया प्रान्त मा छत्तीसगढ़ी के मानक रूप कइसे गढ़े जाही ?

कहे जाथे के “कोस-कोस म पानी बदलै, चार कोस म बानी ” ये कहावत सबो-जघा लागू होथे। जाहिर हवै के भारत भर म आने-आने बोली-भासा होए के बाद घलो, हिन्दी ला जइसे सबो कती के मन समझ जाथें तइसने छत्तीसगढ़ी ला घलो पूरा प्रदेशभर के रहइयामन समझथें। नंदिया ह जे मेरन समुद्र मा अमाथे ते मेरन पहुँच के वो ह थिरा नइ जावै बल्कि ओकर जोरहा प्रवाह ह समुंदर म गजब दुरिहा तक भितरी तक ओइल जाथे। वइसने बोली ह घलो अपन सरहद्दी म जाके थिरा नइ जावै, वोह दूसर बोली भीतर, गजब दुरिहा तक धँस के ओकर संग घुरमिल जाथे अउ वो सरहद्दी मेरन एक नवाच्च किसम के मिंझरा बोली के निर्मान होए लगथे। इही ह मानकीकरन के क्षेत्रीय प्रक्रिया हवै। मानकीकरन के अइसने क्षेत्रीय प्रक्रिया, जब प्रांतीय स्तर म होए लगही, तब्भे मानकीकरन के सुरूआत माने जाही।

इहाँ समझे के एक ठिन खासबात ये हर हवै के जब मानक भासा तैयार हो जाथे त वोह लिखे पढ़े के काम आथे। बोले बताए के माध्यम त बोलीच्च बने रहिथे। अउ ये मानकीकरन-घंटा दू घंटा, दू-चार दिन या साल दू साल के काम नोहै।

कथे निही? के “हथेरी म दही नइ जामै ।” तइसने कोनो भासा के मानकीकरन खातिर घलो गजब समे लागथे। भासा ह बनत-बनत बनथे। अभिन त हमरे कती के छत्तीसगढ़ी म एकरूपता नइये। भासा विज्ञानी मन गोहार पार-पार के काहात हें के “येदे अइसन लिखो भइया हो”, फेर लिखइयामन घेपैं तब? कोनो इन्कर ला इन्खर /उन्कर ला उन्खर, इँकर ला इँखर अउ उँकर ला उँखर लिखत हें त कोनों इही मेर, उही मेर ला /इही मेरन-उही मेरन लिखत हें। कोनो जावत हे ला सही कथे, त कोनो -जावत हवै ला, अउ कोनो जावत हावै ला।

कोनो “वइनस बात” ला “वइसनाहा बात” लिखत हे त कोनो “कहे जावत हे ” ला “केहे जात हे”लिखत हें आनी -बानी के हरहिंछा शब्द प्रयोग हमन अपन लिखई म करत हवन। एक छत्तीसगढ़ी पत्रिका त भासा के खन्तीच्च खन डारे हे। वोह आवत हवै-जावत हवै के बल्दा आवा थाबे/जावा थाबे/खावाथाबे अउ लीखाथाबे असन घोर अलकरहा शब्द प्रयोग करथे। लिखइया-पढ़इया भाई-बहिनीमन ले मैं ह गेलौली करके कहत हौं के एक पइत छत्तीसगढ़ी के ब्याकरन संग मानक छत्तीसगढ़ी के अध्ययन अउ अभ्यास कर लेवैं, तेकरबाद उन जउन लिखहीं, जइसन लिखहीं वो म एकरूपता के संभावना बाढ़ जाही। मैं फेर काहात हौं के अभिन त हमरे क्षेत्र के भासा म एकरूपता नइये त हम प्रदेस भर के भासा के मानक स्वरूप कइसे गढ़े सकब़ो?

सवाल येहू हवै के अभिन हमर मेर, छत्तीसगढ़ी के कतका अकन गद्य साहित्य मौजूद हे? अभिन त हमर गद्य साहित्य ह दूध पियत लइका हे। मड़िया के रेंगना चालूच्च करे हे। अपन गोड़भार खड़े घलो नइ हो पाए हे।

छत्तीसगढि़या हिन्दी साहित्यकार मन घलो दू-भाखा छत्तीसगढ़ी लिखब म थथमरा जावत हें। अच्छा-अच्छा मन के पछीना छूटत हे। छत्तीसगढ़ी भासा के नंदिया मा अभिन गजब पातर धार चलत हे। लिखे बर त जियान परते हे, फेर लिखी लेबे, त पढ़े नइ पावत हें।

काहात हें – “छत्तीसगढ़ी में फ्लो नइ आता है यार….” हमर भासा ह अभिन बिकास के रद्दा मा रेंगत हे। अउ अचरज ये बात के होथे के छत्तीसगढ़ी म एकरूपता लाएबर जऊन बिद्वानमन अउ संपादक मन मानक निर्धारित करत हें तउने मन लिखत खानी अपने सिरजाए मानक के पालन नइ करैं। ये कहब अउ पतियाए म हमला कोनो किसम के उजर नइ होना चाही, के हमर छत्तीसगढ़ी एक समरथ भासा होए के बाद घलो अभिन येमा अतका ताकत नोहै के हिन्दी के पँदौली बिना अपन सबो बिचार ला फरिया के गोठियाए जा सकै। इही परेसानी के कारन जे मन ला छत्तीसगढ़ी लिखे के बनेकन अभ्यास नइये, उन मन अपन छत्तीसगढ़ी गद्य मा अतका जादा हिन्दी शब्द मिंझार देथें के आरूग क्रियाच्चभर छत्तीसगढ़ी रहि जाथे। भासा के कते रूप ला, कते मुँहरन ला स्कूल-कालेज मा पढ़ाए जाना चाही, ये बिसय घलो ओतका सहज नोहै जतका दिखथे। अइसन बेरा हमला चाही के पहिली त हम अपने लिखई म एकरूपता लानन, कारन के एकरूपताबर अउ मानकीकरन खातिर पहिली साहित्य के सरलग सिरजन जरूरी आय।

मुकुन्द कौशल
एम. -५१६, कौशल विला, साहित्य पथ, पद्मनाभपुर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)

छत्तीसगढ़ी के पीरा अउ छत्तीसगढ़िया : डॉ.(श्रीमती) हंसा शुक्ला

Hansa Shukla41 नवम्बर 2000 के छत्तीसगढ़ राज बनीस त सबो छत्तीसगढ़िया मन अब्बड खुस होगे, एकर पाऐ नही कि छत्तीसगढ़ राज बनगे बलकि एकर पाऐ कि अब छत्तीसगढ़ी ह राजभाषा बनही अउ जम्मों छत्तीसगढ़ म आदर के साथ इही भाखा में काम होही। सरकार बनीस अऊ उम्मीद बनिस की सरकारी घोषणा के बाद हर सरकारी दफ्तर, पंचायत, स्कूल, दुकान मन में छत्तीसगढ़ी में सूचना अऊ पत्र लिखे जाही त हमर काम काज के भाखा छत्तीसगढ़ी हो ही।

नेता मन सब आसवासन तो दिन कि छत्तीसगढ़ म काम घलव छत्तीसगढ़ी म करे जाही, भले एखर बर थोरकुन समय लाग ही। ‘घुरवा के दिन बहुरथे फेर छत्तीसगढ़ी के नई बहुरिस,’ थोरकुन कहत-कहत होगे फेर छत्तीसगढ़ी ऊहें के ऊहें। अइसे नई ये कि सरकार ह कोसिस नई करत हे, फेर कोसिस म जब तक सबोझन जुरके काम नई करबों तब तक हमर भाखा के पहचान नई बने। छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग एखर बर सरलग परयास करथ हे, फेर कहिथे न ‘अकेल्ला चना भाड नइ फोरय’ तइसे आयोग भर के करे ले कुछु नई होवए, हमन ल तक छत्तीसगढ़ी म बोले म अऊ काम करे म गरब समझे बर परही, तभे दूसर मन तको छत्तीसगढ़ी के आदर करहीं।

छत्तीसगढ़ी ल काम-काज के भाखा बनाऐ बर शुरूआती स्तर म एखर शिक्षा दे बर परही, जेखर से लइका मन शुरूच ले छत्तीसगढ़ी ला समझयं अऊ बोलयं। अऊ बाहर के आऐ अधिकारी अऊ करमचारी मन ला एखर बर ट्रेनिंग तको दे बर परही जेकर से उहु मन अपन ऑफिस म छत्तीसगढ़ी म काम कर सकय। बड़े स्कुल अऊ कॉलेज म भी एक विसय छत्तीसगढ़ी के रखना होही तेखर से बड़े लईका मन छत्तीसगढ़ी म खुद अपन रचना लिखे बर आगे आवंय। छत्तीसगढ़ी के लिपि देवनागिरी लिपि आए, तेखर सेती एला पढ़े म ज्यादा परेसानी नई होए। छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग छत्तीसगढ़ी से छत्तीसगढ़ी-हिन्दी शब्दकोश, अऊ छत्तीसगढ़ी-अंग्रेजी शब्दकोश बनाइस, जेखर से हिन्दी अंग्रेजी जनवईया मन ये शब्दकोश ल पढ़ के छत्तीसगढ़ी ल तको समझय।

आजकल मोबाइल म अऊ रेल्वे स्टेसन म छत्तीसगढ़ी म हॉंका पारथें, दूसर राज के भाई-बहिनी मन तको कहिथे, कतेक मीठ बोली हे फेर थोर-थोर समझाथे। जब सबो जघा छत्तीसगढ़ी म काम होय लगही त अऊ घीरे-घीरे हमर भाखा ला दूसर मन तक समझहीं।

अभी कम्प्यूटर के जमाना हे, अऊ हमन ल घलव छत्तीसगढ़ी के वेबसाइट बना के, आयोग के सबो गतिविधि ला अऊ सूचना मन ला अऊ छत्तीसगढ़ी साहित्य ल समय-समय म इंटरनेट म डाले बर परही। फेर एखर भाषा ला सरल रखे बर पड़ही, तभे सबोझन एला समझ ही कामकाज के भाषा ह जतका सरल होही ततके जल्दी एमा काम करना आसान होही। भाषाज्ञानी मन छत्तीसगढ़ी के साहित्य रूप ला अपनाये बर जादा जोर देथें, फेर कविता कहानी अऊ साहित्य के बात अलग होथे अऊ कामकाज के बात अलग।

पहली पेपर रेडियो अऊ टी.वी. से भाखा के विकास होत रहिस फेर अब ये सबके संग कम्प्यूटर तकों ले हम हमर भाखा ला देस अऊ विदेस म पहुंचा सकत हन। फेर देस-विदेस के गोठ ला सोचे के पहिली, एक बात हमन ला सोचे बर परही के हम अपन भाखा ला कतका बोलत हन अऊ एमा कतका काम करत हन, तभे हम दूसर ला छत्तीसगढ़ी बोले बर अऊ काम करें बर कहि सकत हन।

छत्तीसगढ़ी के स्थिति हिन्दी असन हावे, हिन्दी ह तको आज तक राष्ट्रभाषा नई बन पाऐ हे काबर, जेन मेर हिन्दी बोलना चाहिए उहें हम अंग्रेजी बोले म गरब समझथन तइसे जेन मेर छत्तीसगढ़ी म बोलना चाही तिहां हम हिन्दी बोलथन। इही हमर भाखा के दुरभाग ये। तमिल, मराठी, बंगाली, अऊ भाषा के भाई-बहिनी मन मिलथे त अपन भाषा म गोठियाथें। फेर हमन कोनो ल देख के छत्तीसगढ़ी म बोले ल बंद कर देथन, एखर सेती जरूरी हे की हमन कोनो मेर रहन फेर बोलन अपन भाखा म अइसे लगथे कि सबोझन मिल के छत्तीसगढ़ म काम करके बचन लेबो अऊ काम तको करबो तभे छत्तीसगढ़ी ह, आठवी अनुसूची में आही अऊ छत्तीसगढ़ में तको फलही-फूलही।

‘दू दिन चलिस, अढ़ई कोस’ हाना असन हमन ला धीरे-धीरे नहीं, बल्कि तुरथ-फुरथ ओ सबो साधन ला अपनाना चाहिए कि हमर भाषा संबिधान के आठवॉं अनुसुची म आवय अऊ राजभाषा बनय। एखर बर हम सबला प्रण ले बर परही के हमन अपन गोठ, काम, मैसैज, ब्लाग सब म छत्तीसगढ़ी के ही परयोग करबो। अऊ गरब से कहिबो ….।

‘‘छत्तीसगढ़िया सब ले बढ़िया’’, हमर काम, हमर भाखा म अऊ बढ़िया।

डॉ.(श्रीमती) हंसा शुक्ला
प्राचार्य
स्वामी श्री स्वरूपानंद सरस्वती महाविद्यालय
हुडको, भिलाई (छ.ग.)

छत्तीसगढ़ी राजभासा कामकाज के भासा कब बनही

छत्तीसगढ़ी ला राजभासा के दरजा तो मिलगे फेर अब तक ले कामकाज के भासा नई बन पाय हे। कामकाज के भासा बनाए बर छत्तीसगढ़ भर बिदवान मन चिंता फिकर करत हें। आखिर छत्तीसगढ़ी कामकाज के भासा कइसे बनय।
छत्तीसगढ़ी राजभासा कामकाज के भासा कब बनहीछत्तीसगढ़िया मन के छत्तीसगढ़ राज के सपना ल पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ह पूरा करिस। छत्तीसगढ़ ल छत्तीसगढ़ के प्रथम मुख्यमंत्री अजीत जोगी अउ डॉ. रमन सिंह ह हरियइस। छत्तीसगढ़ी ल राजभासा बनाए के श्रेय मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ल जाथे। छत्तीसगढ़ी ल राजभासा के दरजा तो मिलगे फेर अब तक ले कामकाज के भासा नई बन पाय हे। कामकाज के भासा बनाए बर छत्तीसगढ़ भर बिदवान मन चिंता फिकर करत हें। आखिर छत्तीसगढ़ी कामकाज के भासा कइसे बनय।
बिलासपुर ले 12 साल से छपत छत्तीसगढ़ी त्रैमासिक पत्रिका के 51वां अंक ‘लोकाक्षर’ (लोकाक्छर) मिलिस। लोकाक्छर के संपादक नंदकिशोर तिवारी ह राज भासा ल कामकाज के भासा बर अपन बिचार एदइसन करे हे सब ले बडे बात भासा के पेट संग जुड़ना होथे। पेट ल पोसे बर उद्यम चाही। कोनो भी उद्यम छत्तीसगढ़ी भासा संग नई जुरै। जब छत्तीसगढ़ी ल राजभासा मान लिए गै हे तौ प्रदेश के जम्मो व्यावसायिक परीक्छा, राज्य सेवा आयोग के परीक्छा प्राथमिक सिक्छा के माध्यम छत्तीसगढ़ी भासा बनै अउ राजकाज छत्तीसगढ़ी म होवै तो छत्तीसगढ़ी भासा मन के विकास घलो होही। लोकाक्छर के 50वां अंक के लोकारपन के संग ‘छत्तीसगढ़ी भासा परिवार के भासा: विसय अउ साझेदारी’ बिसय म सगोष्ठी घलो होइस। कार्यक्रम के माई पंहुना छत्तीसगढ़ राजभासा आयोग के अध्यक्छ पं. श्यामलाल चतुर्वेदी ह किहिस-अब छत्तीसगढ़ी ह धार धर लिए हे। वोकर विकास अब कोनो के रोके नई रूकै। अपन संस्मरण ल सुनात उन कहिन के एक पइत मैं प्रयाग गे रेहेंव। उहां सुमित्रा नंदन पंत केहे रहिन के हिन्दी भासा म अड़बड़ कन नवा-नवा सब्द देखेम आ गे हे। जम्मो ल आवन दौ। जउन सब्द म प्रान सक्ति होही तउन भासा म ठहर जही। कार्यक्रम के अध्यक्छ डॉ. चितरंजन कर, सेवा निवृत्त अध्यक्छ भासा विज्ञान विभाग, पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर ह अपन संस्मरण सुनावत कहिन-मैं रांची विश्वविद्यालय परीक्छा ले बर गे रेहेंव। मैं देखेंव के उहां के भासा ‘नागपुरी’ म स्वतंत्र विभाग हे। नागपुरी पढ़े अउ पढ़ाय जाथे। छत्तीसगढ़ म येकर अभाव ह खलथे। हम जानथन के चार कोस म पानी बदले। आठ कोस म बानी। ठीक वइसने छत्तीसगढ़ी के हे। बोले के वोकर रूप ह बदलथे। फेर आत्मा ह एकेच हे। हमर बोलचाल, छत्तीसगढ़ी के रूप, रचना अउ प्रवृत्ति अलग-अलग हो के भी एक भासा परिवार के उन सहोदरा ये। नंदकिशोर तिवारी छत्तीसगढ़ी के मुताबिक-कवर्धा, कांकेरी, खैरागढ़ी, गोरो, गौरिया, डँगचगहा, देवरिया (देवार), धमदी, नाँदगारी, पारधी, बहेलिया, बिलासपुरी, बैगानी रतनपुरी, रायपुरी, सिकारी, कमारी, खल्टाही, पनकी, मराठी, नागवंसी, पंडो, सदरी, सरगुजिहा, कलंग, कलेजिया, चमारी, बिंझवारी, भूलिया, लुरिया, अड़कुरी, चंदारी, जोगी, धाकड़, बस्तरी (बस्तरिया), भिरगानी, मेहरी (मुहारी), हलबा, भतरी अउ गोड़ी ह छत्तीसगढ़ी भासा परिवार के सदस्य आय।
छत्तीसगढ़ी भासा के असली सवाल सोझ-सोझ बात (छत्तीसगढ़ी लोकाक्षार, अंक 51, पेज 76) म दिनेश चौहान लिखे-कोनो भी भासा के सबले खास पहिचान ओकर वर्णमाला आय। बियाकरन तो 125 बछर पहिली बन गेहे अइसे बड़का बिदवान मन के कहना हे। फेर उही बिद्वान मन वर्नमाला म भ्रमित हें, जान पड़थे। अइसन काबर हे? वर्नमाला तो बियाकरन देखे हवं ओमा देवनागरी लिपि के ङ ञ ण ष श क्ष त्र ज्ञ अउ ऋ अक्छर सामिल नई हे। इही पाय के जब छत्तीसगढ़ी के एक रूपता के बात होथे तव छत्तीसगढ़ी के अधिकृत वर्णमाला के बात घला होना चाही। ये बिसय म भासाविद् मन ल अपन विचार ल सार्वजनिक करना चाही।
सब्द के परयोग म एकरूपता आना चाही। वइसने बात ल डॉ. चितरंजन कर घला ह ‘मड़ई’ 20 दिसम्बर 2010 के अंक म करे हवै- के व्यक्ति वाचक नाव अउ परिभासिक सब्द ल जस के तस लिखे जाय। दिनेश चौहान कहिथें के उन ल मैं पूछना चाहत हंव के भासा, सुध्दि, सब्द, सच्छम कारन आदि लिखे के कारन का ए? इही न के छत्तीसगढ़ी म श ष क्ष ण के उच्चारन नई होय। तिही पाय के जुन्ना विद्वान मन ये वर्न मन ल वर्णमाला म सामिल नई करिन अउ छत्तीसगढ़ी वर्नमाला म ये वर्न मन हइच नई हे। तौ, शंकर, सुरेश लिखना कइसे संभव होही। इहां तक के छत्तीसगढ़ी के जम्मो बोली मन म घला ये वर्न मन गैर हाजिर हें। तौ ये वर्न मन ला जब मन लगिस सामिल कर लौ अउ जब मन लगिस छंटिया दव। ये नीति ल ठीक नई केहे जा सकय। हां, यदि सब बिद्वान मन हिन्दी के वर्णमाला बर बिना बदलाव के एक मत होज य तब बात दुसर रइही। तब अइसन म सब्द के दोहरा परयोग ले बांचे ल परही। जइसे-भासा, राजभासा, सब्द, सिक्छा, कक्छा, परीक्छा पाठसाला, छेत्र, सच्छम, कारन आदि लिखे के का जरूरत रहि जाही? ताहन व्यक्ति वाचक नाव अउ पारिभासिक सब्द ल जस के तस लिखे के तर्क घलो सहीं हो जही। जइसे बोले जाथे वइसे लिखे नइ जाय अउ जइसे लिखे जाथे वइसे बोले नइ जाय अउ जइसे लिखे जाथे वइसे लिखे नई जाय। वइसनेच लिखे भी जाथे। ये हा छत्तीसगढ़ी के घलो पहचान आय। अइसने छत्तीसगढ़ी म उच्चारन भेद घलो ओकर पहिचान आय। छत्तीसगढ़ी म हिन्दी के तुलना म मात्रा कभू दीर्घ तौ कभू लघु हो जथे। यहू कोती ध्यान देना जरूरी हे- जइसे 1. राष्ट्रपति ह राष्ट्रपति, ऋषि ह रिसी, मुनि ह मुनी, साधु ह साधू, हरि ह हरी, विष्णु ह बिस्नू, लिपि ह लिपी आदि हो जथे। 2. मूर्ति ह मुरती, मालूम ह मालुम, शीतला ह सितला, दीदी ह दिदी, रघु ह रघू, नीति ह नीती हो जथे।
सब ले पहिली सवाल हे के पहिली छत्तीसगढ़ी के अधिकृत वर्नमाला तय करे जाय अउ प्रायमरी इस्कूल म ओकर विधिवत् पढ़ाई कक्छा पहिली ले चालू करे जाय। तब सही मायने म छत्तीसगढ़ी के भलई होही। अइसन नई होय ले छत्तीसगढ़ी ह साहित्यकार के भासा तो बन सकथे फेर वोहा जन-जन के प्रयोग के भासा नई बन सकय। जन- जन के भासा बनाय बर छत्तीसगढ़ी लोकाक्षर (लोकाक्छर) ह लेखक मन सो निवेदन करथे। छत्तीसगढ़ी लोकाक्षर बर हमन छत्तीसगढ़ी लेखन म एकरूपता, मितव्ययिता अउ तार्किकता लाय बर कुछ एक मानक निर्धारित करे हन जउन ए तरा हे-
1. ‘छत्तीसगढ़ी लोकाक्षर’ म निम्नलिखित वरन मन के उपयोग होही-
स्वर: अ आ इ ई उ ऊ ए ऐ ओ औ
व्यंजन-
क ख ग घ
च छ ज झ
ट ठ ड ढ ड़ ढ़
त थ द ध न
प फ ब भ म
य र ल व
स ह
अनुस्वार- -ं
अनुनासिक- -ॅ -ँ
छत्तीसगढ़ी के बोलचाल (उच्चारण) म श ष ज्ञ क्ष त्र ऋ बरन के उपयोग नई होवय, ते पाय के इन बरन मन के छुट्टी। श ष बर ‘स’ (यथा शेष-सेस)
ज्ञ बर ग्य (यथा- ज्ञान,ग्यान) ए बर अइ (यथा अइसन), त्र बर त्र (यथा नेत्र बर नेत्र) ऋ बर रि (यथा ऋतु बर रितु) के प्रयोग ह वैग्यानिक प्रयोग आय।
2. (अ) विभक्ति मन के अक्छर मन ला अलग-अलग लिखे जाय जइसे- राम हर, खुर्सी म, तोर करा, मोर करा, तोर मेर।
(ब) सर्वनाम मन के विभक्ति मन ला मिला के लिखे जाय जइसे-वोह, ऊँकर, हमर ले।
(स) जउन सर्वनाम के अंत म ‘ही’ अउ ‘ई’ होय।
ऊंकर विभक्ति मन ल अलग-अलग लिखे जाय जइसे- तुँहीच ल उॅहीच ल।
(द) पूर्ण कालिक क्रिया मन के ‘के’ ल अलग-अलग लिखे जाय जइसे -खा के, आ के, जा के।
3. संयुक्त क्रिया मन के दूनो भाग ल अलग-अलग लिखे जाय जइसे आ गइस, चले गिस, जा ही, हो सकिस, आ गै, गंवा गै, आवत रहिस।
4. ला, मा परसर्ग मन ला अलग-अलग लिखे जाय जइसे- लइका, ला, घर मा,
5. गंवइहा, भइया, गइया, अइसन, ओइसन ही स्वीकारे जाही, न कि ”गवैंहा, भैयाभइयागय्या एसनयेसन वोइसनवैसन।”
6. ला, मा, उवा-उवा परिसर्ग अलग लिखे जाय जइसे- ‘मो ला, लइका ला, घर मा।’
7. ‘ मैं, तै’ ही स्वीकारे जाही न कि मेंमंयतंय
8. ‘अउ’ (औ अऊ नहीं) इही तरा ‘नइ’ मान्य हो ही ‘नई’ नहीं।
9. गै रिहिस, खाए रिहिस मान्य हो ही न ‘गे रिहिस’, ‘खाय रिहिस’ नहीं।
10. ‘जाथौं, खाथौं, लिखथौं’ माने जाही। ‘जावथौंजाथवं’ नहीं।
11. ‘खाहौं, जाहौं’ माने जाही। खाहू खाहां, खइहौ नहीं।
12. ‘जातिस’ ठीक हे जतिस नहीं।
13. ‘जाबो, खाबो’ मान्य ‘जाबो, खाबोन’ अमान्य।
14. ‘जान दे, खान दे, आन दे’ मान्य, ‘जावन दे, आवन दे’ अमान्य।
15. ‘करा, मे,’ के प्रयोग मान्य, जइसे ‘तोर करा एक ठन काय रहिस’ या ‘तोर मोर एक ठन काम रहिस’, ‘तोर करामेर’ के जघा ‘तोर से’ अमान्य होही।
16. ‘एकर, ओकर, काकर, जेकर,’ मन मान्य होहीं, ‘एखर, ओखर, काखर, जेखर’ अमान्य हो ही।
17 अनुस्वार (-ं) अउ अनुनासिक (-ँ) के प्रयोग करे जाय जइसे-
अनुस्वार अनुनासिक
अंग ऍंगना
चंदा चँदैनी
रंग रँगना
छत्तीसगढ़ी साहित्य के लेखक मन करा बिनती हवय के उन अपन लेखन म उपरोक्त नियम के पालन करय। संपादक (छत्तीसगढ़ी लोकाक्षर) संपादक सिरी नंदकिसोर तिवारी जी एक डाहर एकरूपता के बात करथें दूसर डाहर खुदे पालन नइ करयं। जब छत्तीसगढ़ी वर्नमाला म ‘क्ष’ ह नइ हे त त्रैमासिक पत्रिका के नाव छत्तीसगढ़ी लोकाक्षर काबर लिखे जात हे। लोकाक्षर ल लोकाक्छर काबर नहीं।
छत्तीसगढ़ी राज बासा ल काम काज के भासा बनाए बर छत्तीसगढ़ी राजभासा आयोग, छत्तीसगढ़ सासन डहर ले दुरुग म मुकुंद कौसल के संयोजन म गोस्ठी रखे गे रिहिसे जेकर बिसय रिहिस- हमर छत्तीसगढ़ी जनभासा ले राजभासा तक। मोला अइसे लागथे राजभासा ल काम काज के भासा बनाय बर जादा अड़चन नइहे जे दिन भासा वैग्यानिक अउ सरकार ह चाही ओ दिन छत्तीसगढ़ी ह काम काज के भास बन जाही। परिचर्चा के माई पहुना डॉ. परदेसीराम वर्मा ह छत्तीसगढ़ी राज भासा ल काम काज के भासा बनाए बर जोर दिस। परिचर्चा के सियानी करत पं. दानेस्वर सर्मा बतइस की महात्मा गांधीजी ह केहे रीहिसे कि अपन राज के काम काज ह जनपदीय भासा म होना चाही। छत्तीसगढ़ी राजभासा ल कामकाज के भासा बनाए बर अउ भासा के एकरूपता बर एसो के छत्तीसगढ़ी साहित्य सम्मेलन म घलो चिंतन होईस।

दुरगा परसाद पारकर
केंवट कुंदरा
प्लाट-3, सड़क-11, आशीष नगर (पश्चिम)
भिलाई छ.ग.

समय मांगथे सुधार,छत्तीसगढ़ी वर्णमाला एक बहस

एक डहर हम चाहथन के छत्तीसगढ़ी ल चारों मुड़ा विस्तार मिलय, अउ दूसर डहर लकीर के फकीर बने रहना चाहथन। कुआं के मेचका बने रहना चाहथन, त बात कइसे बनही?
आज ले सौ-पचास साल पहिली हमर पुरखा मन नानकुन पटका पहिर के किंजरय, आज अइसना पहिरइया मन ला अशिक्षित अउ पिछड़ा कहे जाही। वइसने आज भासा के दर्जा प्राप्त छत्तीसगढ़ी ल ‘बोली’ के मापदण्ड म लिखबो तभो पिछड़ा अउ अशिक्षित माने जाबो।
कोनो भी मनखे ह अपन अंतस के भाव ल कोनो दूसर मनखे ल समझाय खातिर जेन भासा के उपयोग करथे, उही ल हम भासा कहिथन। अउ जब उहीच भासा ल माध्यम बना के बहुत झन मनखे अपन भाव ल परकट करथें त फेर वोला एक निश्चित रूप दे खातिर लिपि के, वोकर मानक रूप के अउ आने जम्मो जरूरी जिनीस मन के बेवस्था करथन। छत्तीसगढ़ी खातिर घलोक अइसन किसम के बुता कतको बछर ले चलत हे। जिहां तक व्याकरन अउ लिपि के बात हे त एमा तो सबो एकमत दिखथे, फेर वर्णमाला के उपयोग खातिर नवा अउ पुराना पीढ़ी म मतभेद दिखथे। खासकर कुछ अक्षर मन के उपयोग खातिर।
छत्तीसगढ़ी लेखन के शुरुआत के बेरा म हिन्दी भासा अस्तित्व म नइ आ पाए रिहिसे, एकरे सेती वो समय छत्तीसगढ़ी सहित अउ कतको लोकभासा म श, व, क्ष, त्र, ज्ञ, ऋ जइसन अक्षर मन के उपयोग नइ होवत रिहिसे। फेर स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जब हिन्दी ल ये देश के राजभासा बना दिए गीस, एकर माध्यम ले चारों खुंट लिखई-पढ़ई होए लागिस, तब लोकभासा ले परिष्कृत करे हिन्दी म नागरी लिपि के जम्मो वर्ण मन के उपयोग होए लागिस। एकर संगे संग छत्तीसगढ़ी सहित अउ आने लोकभासा होए लागिस। एकरे सेती आज नवा अउ पुराना पीढ़ी के लेखन म अइसन किसम के अंतर देखे जावत हे। मोला लागथे के अब अइसन किसम के अंतर दिखना जरूरी घलोक होगे हावय।
हिन्दी अब विश्व भासा बनगे हवय, एकरे संग येला लिखे जाने वाला लिपि, ‘नागरी’ घलोक ल अब पूरा दुनिया भर म जाने अउ पहचाने जावत हे। अइसन म हम छत्तीसगढ़ी ल जुन्ना लोकभासा के मापदण्ड म लिखबो त निश्चित रूप ले येला हमर कमजोरी अउ अशुध्दता माने जाही।
हां, आज कहूं हम छत्तीसगढ़ी ल अपन खुद के लिपि म लिखतेन त बात आने रिहीसे। फेर जब हम एकर खातिर ‘नागरी’ लिपि ल स्वीकार करे हावय त ये जरूरी हो जाथे के हम वोकर जम्मो वर्ण ल घलोक स्वीकार करन।
दुनिया के ये रिवाज आय के जब कोनो ल बड़का बनना होथे त वो बड़े सोचथे, चारों खुंट के अच्छाई अउ बड़ाई ल धरथे, सकेलथे अउ संगे-संग अपन कमजोरी, अपन कमी मन म सुधार करथे। हमूं मन छत्तीसगढ़ी के संबंध म अइसन काबर नइ सोचन? एक डहर हम चाहथन के छत्तीसगढ़ी ल चाराें मुड़ा विस्तार मिलय, अउ दूसर डहर लकीर के फकीर बने रहना चाहथन, कुआं के मेचका बने रहना चाहथन, त बात कइसे बनही? आज ले सौ-पचास साल पहिली हमर पुरखा मन नानकुन पटका पहिर के किंजरय, आज अइसना पहिरइया मन ला अशिक्षित अउ पिछड़ा कहे जाही। वइसने आज भासा के दर्जा प्राप्त छत्तीसगढ़ी ल ‘बोली’ के मापदण्ड म लिखबो तभो पिछड़ा अउ अशिक्षित माने जाबो। एकर खातिर जरूरी हे, के छत्तीसगढ़ी लेखन म अब गुणात्मक सुधार होवय, जेन नागरीलिपि ल हम आत्मसात करे हवन वोकर जम्मो वर्ण के शुध्द रूप म प्रयोग करे जाय। तभे दूसर मन घलोक हमला, हमर भासा ल स्वीकार करहीं। उहू मन एमा लिखे-पढ़े के उदिम करहीं। ये बात तो निश्चित हे, के कोनो भी मनखे ह अपन भासा ल बिगाड़ के दूसर के भासा ल न सीखे न धरय।
सुशील भोले