Category: नाटक

विष्णु सखाराम खांडेकर कहानी के एकांकी रूपांन्तरण : सांति

दिरिस्यः 1
घना करिया बादर ले सूरुज नरायन भगवान धीरे धीरे उअत हावय। ओला देखके-
कबि:- कल संझा समे मा, सागर मा बूड़े सोन कलस हाथ मा लेके उए होही, फेर सागर के तरी मा कलस के खोज करत करत ओकर हीरा मोती लगे गहना कहूंॅ छूट गे होही, ओला खोजे बर फेर एक घा सागर के तरी मा गे होही, ता देखिस, ये सोन कलस लहरमन के भान ले लहरावत हावय।
लइका:- नंदनबन के कोन्हो सुग्घर आमारूख ले गदराय आमा गिरत हावय, जेहर ढुलत ढुलत भिंया मा आत हावय।
सियान:- जवानी के मीठ अउ मताय सपनामन मा फंसे मनखे के आत्मा, आप सचेत होके सुध रुप मा परकट होत हावय।
साधु:- नदी के धारा मा अर्द्धदान अरपित करत अउ गायत्री मंतर के जाप करत-
हे परभू! तैंहर उज्जर हावस, तोर किरपा ले इ धरती के अंधियार के बिनास होवत हावय, फेर ओइ धरती मा रहोइया परानीमन के मन मा जे अंधियार छाय हावय, वोला तैंहर कब खतम करबे? परानीमन मा रहोइया भगवान के ओमनके परिचय कब होही, हे दयानिधान! इ संसार मा भभकत असांति के आग ला तुंहर सिवा कोन बुताही, मोर तन ले लेवा, सुख ले लेवा, मोर सरग ले लेवा, फेर कुछु इसने कर देवा, पूरा संसार मा सांति के राज होवय, सिंह के पीठ मा खरगोस बिना डर के खेले, गरुन के कोरा मा सांप सूते, आर्यमन ले अनार्यमन गला मिले, बस अतकीच मोर कामना हावय।

दिरिस्य:2
चील आपन चूजा के चोंच मा चोंच मिलावत हावय, चील ओई सूरुजनरायन ला निहारत हावय।
चील:- राजा बेटा! आप तोर बर खाना लाने बर बाहिर जाय के समे आ गे हावय, काल तैंहर घारा ले बाहिर जाय बर उतियारा हो गे रेहे, फेर मैंहर घरि घरि बरजतों, बाहिर झन जाबे, तोर पांख आभी दुरबल हावय, एकठन अउ बात ये जो नीला अगास दिखत हावय, ओमा एकठन दुस्ट चुड़ैल लुकाय बइठे हावय, तोर जइसने लइकामला भुलवाके वोहर घारा ले बाहिर ले जाथे। कभू ओहर गीद गात हावय, कभू बादरमन के हाथी घोड़ा मा चढ़ाहा कहके ललचात हावय। फेर सूरता राख, वोहर नान नान लइका मला मार के ओकर मांस खवइया सैतान हावय। तोला मोर कसम हावय, कुछु हो जाय फेर आपन घारा ले बाहिर झन जाबे। मैंहर आपन लइका बर का लानहिया जानत हस, एकठन सुग्घर सांप के पीला।
चूजा:- पीला।
चील:- हां पीला ! सांप के पीला के मांस कतका मीठाथे, सबदमन ले नी कहा जा सकाय, तैंहर खाबे ता जानबे।
चूजा:- सांप के ओ पीला के दाई होही ना?
चील:- हां
चूजा:- ओकर पीला ला तैंहर मार के ले आबे, ता ओहर रोही नीही?
चील:- मोर लइका कतका भोलवा हावस, मोर लइका सांप के आने जात होत हावय, हामर आने जात होत हावय, हामर अउ सांप मा बइरी हावय।
चूजा:- बइरी माने?
चील:- चील सांप की दुस्मन हावय समझे।
चूजा:- फेर दुस्मन काला कइथे?
चील:- जेला हामनला मारे बर हावय, ओला दुस्मन कइथे।
चूजा:- फेर ओला काबर मारे बर हावय?
चील:- खाय बर।
चूजा:- हामन आने कुछु खाबो।
चील:- बइहा हस तैंहर! हामर जंगल मा जे साधु रइथे, ओकर लइका होके तोला जन्मना रिहिस। गलती ले तैंहर मोर इहांॅ जनम ले ले।
बड़ मया ले आपन चोंच ला ओकर चोंच मा छुआ के घारा ले बाहिर निकल जाथे, मानों सरग ले झूपत झपत कोन्हो बिमान धरती मा उतरत होवय।

दिरिस्य:3
सिकारी अउ ओकर बेटा एक दूसर ला चूमत हावय।
सिकारी:- बेटा काल तैंहर रंग बिरंग फूल टोड़त धूरिहा चल दे रेहे, आज फेर ओ गलती झन करबे। जंगल मा आनि बानि के परानी रइथे। कब हमन मा झपट परही केहे नी जा सकाय।
बेटा:- फेर बोबा!
सिकारी:- फेर वेर कुछु नीही, घर मा खेलत रह, काल तैंहर अगास मा उड़त चील ला देखके कहत रेहे ना, मोला ओकर मेर खेले बर हावय, ता तोर खेले बर मैंहर चील के पीला ले आहा, पहिली चील के पीला, पीछू सिकार करे जाहां।
बेटा:- ओ पीला के दाई होही ना?
सिकारी:- अरे बइहा! इ धरती मा दाई के बिना काकर जनम होइस हावय।
बेटा:- फेर मोला ओकर पीला नी ले बर हावय, तैंहर ओकर लइका ला धर के लानबे ता ओकर दाई उहां रोत रीही, काल मैंहर कुछु देर बर भटकगे रेहे, ता तैंहर कतकाकन रोय रेहे।
सिकारी:- लइका के मुड़ी ला सहलात। -हामर जंगल मा जे साधु रइथे, ओकर लइका होके तोला जन्मना रिहिस, गलती ले मोर जइसने सिकारी घर मा जनमगे। अरे बइहा! चिरईमन के जात आने अउ मनईमन के जात आने। जा आपन धनुस लेके खेल।
फेर ए घ लइका ला चूम के वोहर झाला ले निकल गिस। आपन धनुसबान तानके लंबा लंबा पांव भरत वोहर आघू जात गिस, मानों आपन मातृभूमि के रक्छा बर रनभूमि मा जात वोहर कोन्हों बीर सिपाही होवय।

दिरिस्य:4
सांपिन आपन संपोला संग बतियात हावय।
सपोला:- दाई देख घाम कतका बाढ़ गे हावय। चल ना आपन बिल मा सूतबो।
सांपिन:- रीस करत- नीही, अतका जल्दी नीही, थोरकुन अउ रुक, वो सिकारी हर रोज इ डहर मा जाथे, जब तक जी भरके डस नी लिहा, मोर मन ला चैन नी मिले।
सपोला:- फेर दाई! काल ओ सिकारी के पांय गलती ले तोर उपर परे रिहिस, ओला काबर दिल मा लेत हावस?
सांपिन:- बइहा रे बइहा! मोर भोलवा, जंगल मा जे साधु रइथे ना, ओकरे बेटा होना रिहिस तोला, गलती ले मोर घर मा जन्मगे तैंहर।
सपोला:- अगर तैंहर ओ सिकारी ला मार देबे, ता ओकर लइका हर रो रो के मर जाही।
सांपिन:- मरन दे हमन ला का? सांप के जात आने अउ मनखे के जात आने, मैंहर जल्दी आत हावों, आपन आप ला संभाल, इ झुरमुट ले बाहिर झन आबे।
सांपिन हर सपोला ला गला लगाइस, अउ बाहिर निकलगिस, मानों सागर कोति बोहात बलखात कोन्हों नदी होवय।

दिरिस्य:5
धुरिहा अगास मा चील उढ़ियात हावय, सिकारी के अता पता नीए, सांपिन रीस मा फंुफकारत खोजत हावय, ओकर पीला ओकर पीछू पीछू आत हावय, फेर ओला पता नीए, सिकारी के बेटा घलो आपन ददा के पीछू पीछू झाला ले आत हावय, चील के पीला घलो उढ़ियाय के मोह नी छांॅड़ नी सकीस। वोहर घलो उढ़ियात उढ़ियात घारा ले धुरिहा आ गे हावय। दई ददा उपदेस देत रहंय, अउ ओला लइका अनसुना कर छुछिन्दा आचरन करय। जिनगी के निरंतर रीति बन गे हावय। सिकारी चील के पीला मा निसाना साधिस, ओतकी बेर सांपिन हर सिकारी के पांय ला चाब दिस, ओतकी बेर चील सांप के पीला उपर झपट परिस।

दिरिस्य:6
साधु कुटिया मा लहुंटत रहय, सिकारी के बेटा के करुन आवाज ओला सुनाई दिस, साधु ओ दिसा मा गिस, अद्भुत दिरिस्य देखिस-
कोन्हो समाधि मा रहय योगी साही चील ध्यानमगन रिहिस, अउ ओकर आघू मा एकठन सांपिन कोन्हों सुग्घर मूरती साही रिहिस, आपन बैर भाव भुलाके सबो परानी भाईचारा भाव से रेहे, ओकर ये भावना भगवान हर पूरी करिस, ओ दुनों के तीर मा एकठन लइका रहय।
साधु:- सांप ला चील ले डर नी लागे, मनखे ला सांप ले डर नी लागे, अउ मनखे ला देख के चील नी डराय, कतका सुग्घर दिरिस्य हावय, ये सब हर मोर साधना के फल हावय, परभु! तुंहर लीला धन्य हावय।
साधु आघू कति गिस, ता तीन लाश देखिस, एकठन मनखे के, एकठन चील के पीला के, अउ एकठन सांप के पीला के। ओकर हाथ ले कमंडल छूट गिस, गरदन तरी करे वोहर धरती ला निहारत हावय, ओकर आंखि ले आंसू झरत हावय।

सीताराम पटेल

बिरहा के आगी

जान – चिन्हार
1ः- रत्नाकर – एकठन कबि
2ः- किसन – परम आत्मा
3ः- उधव – किसन के सखा
4ः- राधा – किसन के सखी
5ः- ललिता – राधा की सखी
6:- अनुराधा – राधा की सखी

दिरिस्य: 1
रत्नाकर – गोपीमन अउ किसन के बिरह के पीरा के कथा अकथनीय हावय। अथहा हावय, जेला नापा नी जा सकाय। ओ बियथा के बरनन ला चतुर अउ बने कबि ला कहत नी बनय। मैंहर तो आम आदमी हावंव। जइसने बरज के गोपी मनला संदेस दे बर उधव ला समझाय लागिस, वइसने ओकर गला भर आइस। मया अचानक उमड़के चंचल पुतली ले आंॅसू के रूप मा बोहाय लागिस। थोरकुन बवन ले किहिस, जादा आंकर आंॅखि हर कह दिस। रही सही बात रिहिस ओला हिचकी हर कह दिस।

दिरिस्य:2
किसन अउ उधव मंच मा आथें
किसन – रोत कइथे- गोपीमन के हिरदे ले मोर मया ला निकालबे अउ ओमा बरह्म गियान ला भरबे। ता मैंहर स्वीकार कर लिंहा, निरगुन बरह्मा के उपदेस आनंद के निधि हावय। मया के ठौर मा गियान ला मान्यता दिंहा, ता फेर चन्दरमुखी गोपीमन के धियान ला आंसू ले धो लिंहा। गोपीमन के मया ला आपन हिरदे ले निकालके भूला दिंहा। मैं बरह्म के जोत ला जला लिंहा। एक घ तैंहर गोकुल के गलीमन के धुर्रा लेके आबे, ता मैंहर इ बरह्म बिचार के बिसवास ला धर लिंहा, स्वीकार कर लिंहा। मन ले, हिरदे ले, कान ले , सिर ले, आंॅखि ले, उधव तोर सीख ला भीख साही ले लिंहा।

दिरिस्य: 3
रत्नाकर – बिरज के गांव मा उधव के आय के समाचार गोपीमन पाइन, ता आपन मनभावन के भेजे समाचार ला सुने बर गोपीमन झूंड के झूंड कूदत कूदत नंदबाबा के अंगना मा आय बर लागिन, उचक उचक के आपन पांय के कमल साही पंजा के बल ठाढ़ होके भेजे पाती ला आपन छाती मा छुआय बर लागिन, अउ सबो कहे बर लागिन हामर बर का लिखे हावय, हामर बर का लिखे हावय, हामर बर का लिखे हावय, इसने कहके सिरीकिसन के संदेस जाने बर आतुर हो गिन।

दिरिस्य: 4
गोपीमन अउ उधव मंच मा आथे।
राधा:- हे उधव! तैं मथुरा ले योग के बात सिखाय बर आय हावस, ता हामन ला किरपा करके किसन बियोग के बचन झन बता, दया करके हमनला दरसन दे हावस, बियोग के बात करके हामर दुख दरद के ताप ला जादा झन बढ़ा, हामर मन रूपी दरपन कुटी कुटी हो जाही, एमा आपन कड़ा बानी रूपी पथरा झन मार। एके मनमोहन हर बसके हामनला उजाड़ दिस हावय, हिरदे मा कतका मनमोहन झन बसा।
ललिता – कान्हा के दूत बनके पधारे हस या फेर बरह्मा के दूत बनके, तोर परिचय सफ्फा पी हावय। बिरजबाला मन के बुध ला फेरे बर परन धारन करे हावस, तैंहर मया के रीत नी जानत हस, नीति लेके अनीति लाने बर ठानत हस, तैंहर इ डहर के अनारी हस, फर हामन तोर बात मान लेन, जे किसन अउ बरह्मा ला एके कथस, हमनला अनियायी के भाव नी ीाात हवय, पानी के बूंद के मिले ले महासागर के कुछु नी बिगड़े, पर बिबस होके बेचारी बूंद महासागर मा मिल जाथे।
अनुराधा – हे उधव! तैंहर आपन गियान के गौरव ला आपनेच तीर संभाल के राख। काबर कि तोर अवई, निराकार बरह्मा के उपदेस देवई, हामर मन ला बने नी लागे, तैं बियर्थ के टांय टांय झन कर, इहें कोन्हों तोर बात ला नी सुने। काबर कि सबो मुंहचढ़े हावें। हे उधव! तेर योग गियान के उपदेस ढंग के नी हावय। तैंहर एकर छांड़ के अउ कोन्हो बने उपाय बता दे, तोर बरह्म गियान सांस रोके के साही हावय। तोर गियान के उपदेस कुटिल कटारी हावय, तोर संग जमुना नदी के तरंग हावय, जे आपन तेज बोहाय मा सबो ला बोहा के ले जाथे।

दिरिस्य: 5
रत्नाकर – गोकुल आय के पीछू उधव मया के मद मा सराबोर हो गिन, आंेकर पांव ऐती तेती परत हावय, ओकर सरीर थक गे रिहिस, आंखि सिथिल हो गे रिहिस, उधव इसने जात रिहिन, मानो वो भुलाय भावना ला सूरता करे के परयास करत रिहिन, वो गोपीमनला निरगुन बरह्म के उपदेस दे बर आय रिहिन, फेर ओ गोपीमन के मया ले लबालब भरे बात ला सुन के आपन गरब चमर चमर हो गिस, बरज ले जात समे ओकर एक हाथ मा माता जसोदा के दे माखन सुसोभित होत रहय, अउ दूसर हाथ मा राधा के दे बंसरी रिहिस। इ दोनों भेंट ला जादा आदर भाव के सेती भुंइया मा नी राखत रिहिस, मया के जादा होय के सेती ओकर आंखि ले बोहात आंसूमन ला आपन कुरता ले बांहां करा पोंछत रिहिन। उधव के इ अपूरब दसा के बरनन नी करे जाय सकय। येहर गियान मा मया के जीते के रूप् रिहिस।
उद्धव प्रसंग – जगन्नाथ प्रसाद रत्नाकर से

सीताराम पटेल सीतेश
07697110731

पुरुस्कार – जयशंकर प्रसाद

जान-चिन्हार
महाराजा – कोसल के महाराजा
मंतरी – कोसल के मंतरी
मधुलिका – किसान कइना, सिंहमित्र के बेटी
अरुन – मगध के राजकुमार
सेनापति – कोसल के सेनापति
पुरोहित मन, सैनिक मन, जुवती मन, पंखा धुंकोइया, पान धरोइया

दिरिस्य: 1

ठान: बारानसी के जुद्ध।
मगध अउ कोसल के मांझा मा जुद्ध होवत हावय, कोसल हारे बर होवत हावय, तभे सिंहमित्र हर मगध के सैनिक मला मार भगाथे। कोसल के महाराजा खुस हो जाथें।

महाराजा – तैंहर आज मगध के आघू मा कोसल के लाज राख ले सिंहमित्र।
सिंहमित्र – सबो तुंहर किरपा हावय महाराज।

दिरिस्य: 2

ठान: राजमहल के गली।

आदरा नछत्तर, अगास मा करिया करिया बादर घुमड़त हावय। जेमा देवतामन के नगाड़ा के अवाज। पूरब के एकठन सुन्ना कोन्टा मा सोन पुरुस डोंगत हावय। दिखे बर लागिस महाराजा के सवारी। परबत माला के अंॅचरा मा समतल बहरा भुंइया ले सोंधी कहरत हावय। नगर तीर जयकारा होइस। भीड़ मा हाथी के सोंड़ ठाढ़े दिखिस। मजा अउ उछाह के सागर हिलोर मारत आघू बाढ़त हावय। बिहनिया के सोन किरन ले रचाय नानु नानु बूंॅदी के एकठन झोंका सोन मोती साही बरसिस। मंगल सूचना ले मनखेमन मजा के मारे नरियाइन।

दिरिस्य: 3

ठान: मधुलिका के खेत।

रथ, हाथी अउ घोड़ामन के लाइन। देखोइया मन ले खचाखच भरे हावय।

हाथी मा बइठ के महाराजा आइन। हाथी बइठ गिस। महाराजा मिसेनी ले उतरिन। सुहागिन अउ कुमारी मन के दू दल। आमपान ले सोभित मंगल कलस अउ फूल, कुमकुम अउ लाई ले भरे थारी। मीठ गीद गात आघू बढ़िन। महाराजा के मुंहू मा मीठ मुसकान रिहिस। सोन धराय नागर के मूठ धरके महाराजा हर फंदाय सुघ्घर बइलामन ला रेंगे बर किहिन। बाजा बाजे बर लागिस। किसोरी कुमारी मन लाईमन अउ फूलमन के बरसा करिन।

सूत्रधार – कोसल के येहर परसिध तिहार हावय। एकदिन बर महाराजा ला किसान बने बर परथे। इ दिन इन्दर पूजा बड़ घूमधाम ले मनाय जाथे। नगरीमन ओ पहरी भुंइया मा मजा ले मनाथे। हर साल खेती के ये तिहार उछाह ले होथे। दूसर राज के जुवराज मन घलो ऐला देखे बर आथे। मगध के राजकुमार आपन रथ मा चढ़े चढ़े ऐला देखत हावय। इ खेत हर मधुलिका के हावय। जेला इ साल खेती करे बर चुने गिस हावय। एकरे सेती बीज दे के मान मल्लिका ला मिले हावय। वोहर कुमारी हावय अउ सुघ्घर घलो हावय। गेरुवा रंग के बासन ओकर सरीर ले लहरात ओहर सुघ्घर दिखत हावय। वोहर कभू ओला ठीक करय, कभू आपन चूंदी ला।

बीज ला थारी मा धरे कुमारी मधुलिका महाराजा के तीर हावय। बीज बोय बर महाराजा जब हाथ करथे ता मधुलिका ओकर आघू मा थारी कर देथे। किसान कइना के सुघ्घर कपार मा पछीना के कमी नीए, वोमन बिरइन मन मा समा जात हावय। फेर महाराजा ला बीज देबर कोताही नी करत हावय। सबझन महाराजा ला नांगर जोतत देखत हावय, अचरज ले, कुतुहल ले। अउ अरुन देखत हावय किसान कइना मधुलिका ला। अहा!कतका सुघ्घर हावय। कतका सरल मन।

महाराजा हर मधुलिका के खेत ला पुरुस्कार दिस। थारी मा कुछु सोन मुदरा। येहर राजा के नियम रिहिस। मधुलिका हर थारी ला आपन माथा मा लगाइस। फेर ओ सोन के मुदरा मला महाराजा के उपर चढ़ात बीछ दिस। मनखेमन अचरज ले देखे बार लागिन। महाराजा के टेपरा तनगिस।

मधुलिका – देवता! येहर मोर ददा बोबा के भिंया हावय। ऐला बेचे हर अपराध हावय। एकरे बर दाम लेहर मोर सामरथ ले बाहिर हावय।

मंतरी – कड़कत- अबोध! का बकत हावस। राजा के नियम के तिरस्कार। तोर भिंया के चैगुना दाम हावय। फेर कोसल के येहर बनाय नियम हावय। तैंहर आज ले राजा के रच्छन पाय के अधिकार पाय। इ धन ले आपन ला तैंहर सुखी बना।

मधुलिका – राजा के रच्छन पाय के अधिकार जमो मनखे मनला हावय। महाराजा ला भिंया दे मा मोला कोन्हों बिरोध नी रिहिस, आभी घलो नीए। फेर दाम मैंहर नी लेवंव।

महाराजा – कोन हावय ये छोकरी।

मंतरी – देवता! बरानसी जुद्ध के महान बीर सिंहमित्र के एकझन बेटी हावय।

महाराजा – सिंहमित्र के बेटी । जेहर मगध के आघू मा कोसल के लाज राखिस। ओई बीर के मधुलिका बेटी हावय।

मंतरी – हांॅ देवता।

महाराजा – इ तिहार के नियम का हावय, मंतरी।

मंतरी – देवता! नियम हर सधारन हावय। कोन्हों बने भिंया ला इ तिहार बर चुनके ओला नियम अनुसार पुरुस्कार मा ओकर दाम दे जाथे। वो दाम हर ओकर चैगुना रइथे। ओ खेती ला ओइच हर साल भर देखथे। वोला राजा के खेत कइथे।

मनखेमन – महाराजा के जय। महाराजा के जय। महाराजा के जय।

सबो चल देथे। मधुलिका आपन खेत के पार मा बड़खा महुआ पेड़ के तरी कलेचुप बइठे रइथे।

दिरिस्य: 4

ठान: बिसराम भवन

तिहार अब बिसराम लेत हावय। राजकुमार अरुन जागत हावय। ओकर आंॅखी मा नींद नीए। पूरब मा जिसने गुलाली उअत हावय। वोई रंग ओकर आंॅखी मा रिहिस। आघू देखिस ता मुंडेर मा परेविन एक गोड़ मा ठाढ़ होके पांख खोलके टर्रात हावय। अरुन ठाढ़ होइस। मुहटा मा सजाय घोड़ा हावय। वोहर देखते देखत नगर के तीर पहंॅुच गिस। सैनिक मन उंॅघात रिहिस। घोड़ा के गोड़ के अवाज सुनके चमकिन। राजकुंमार तीर साही निकल गिस।

दिरिस्य: 5

ठान: मधुलिका के खेत।

सिंधु देष का घोड़ा बिहनिया के हवा साही खुस होवत हावय। घूमत घूमत अरुन ओइ महुआ पेड़ के तरी आइस। जिहांॅ मधुलिका आपन हाथ मा मुंड़ी धरके सूतत रिहिस। अरुन हर देखिस एक महुआ डार परे हावय। फूल फूले हावय, भंवरा सांत हावय। अरुन आपन घोड़ा ला मुक्का रहे बर किहिस। ओ सुघ्घरता ला देखे बर, फेर कोयली कूकिस। जेला सुनके मधुलिका के आंॅखि खोलिस। ओहर देखिस, एकझन अनचिन्हार छोकरा। वोला लाज लागिस।

अरुन – देवी! तैंहर काल के तिहार के संचालन करोइया रेहे।

मधुलिका – तिहार! हाहो! तिहारेच रिहिस।

अरुन – काल ओ सम्मान।

मधुलिका – काबर तोला काल के सपना सतात हावय। आप मोला तैंहर इ अवस्था मा संतोख नी रहन दस।

अरुन – मोर हिरदे तोर ओ छवि के भगत बन गे हावय देवी।

मधुलिका – मोर ओ नाचा के, फेर मोर दुख के। आह! मनखे कतका निरदय हावय। अनचिन्हार, छमा करबे, जा अपन डहर।

अरुन – सरलता के देवी। मैंहर मगध के राजकुमार। तोला पाना चाहत हवौं, मोर हिरदे के भाव बंधना मा रेहे नी जाने। ओला आपन—।

मधुलिका – राजकुमार ! मैंहर किसान कइना हवौं। आप नंदनबिहारी अउ मैंहर कमोइया। आज मोर मया के भ्ंिाया मा ले मोर अधिकार छीन ले हावय। मैंहर दुख ले बियाकुल हवौं, मोर हंसी झन करा।

अरुन – मैंहर कोसल महाराजा ले तोर भिंया देवा दिंहा।

मधुलिका – नीही! येहर कोसल राज के नियम हावय। मैंहर ओला बदलना नी चाहत हवौं, चाहे ओमे मोला कतको पीरा होवय।

अरुन – ता तोर रहस का हावय?

मधुलिका – ये रहस मनखे हिरदे के हावय। मोर नी हावय। राजकुमार नियम ले यदि मनखे के हिरदे बंधाय रथिस ता आज मगध के राजकुमार के हिरदे कोन्हों राजकुमारी कोति नी तीराके एक किसान छोकरी ला अपमान करे नी आथिस।

चोंट खाके राजकुमार लहुंॅट गिस। किरन ले ओकर रतन मुकुट चमकिस। घोड़ा दउंॅड़त हावय। मधुलिका इसने कहके खुद आहत होइस। वोहर सजल आंॅखि ले उड़त धुर्रा ला देखे बर लागिस।

दिरिस्य: 6

ठान: मधुलिका के खेत के पान के झाला।

मधुलिका हर राजा के सोन मुदरा नी लिस। वोहर दूसर के खेत मा काम करथे अउ चैथा पहर रूखा सूखा खाके परे रइथे। महुआ पेड़ तरी नानकन पान के झाला रिहिस। सूख्खा डार के दीवार रिहिस। मधुलिका के ओई आसरम रिहिस। कठोर मेहनत ले जे रूखा सूखा मिलथे, ओकर सांस ला बढ़ाय बर अबड़ रिहिस। पतली होय मा घलो ओकर सरीर मा तपसिया के कांति रिहिस। आसपास के किसान ओकर आदर करे। वोहर बढ़िया छोकरी रिहिस। दिन हप्ता महिना अउ साल बीते बर लागिस।

दिरिस्य: 7

ठान: मधुलिका के खेत के पान के झाला।

ठंढा रतिहा, बादर भरे अगास, जेमा बिजुरी कूदत हावय। मधुलिका के झाला चुहत हावय। ओढ़े बर नीए। वोहर ठिठुर के एकठन कोन्टा मा बइठे हावय। मधुलिका आपन अभाव ला बढ़ा के सोचत हावय। आज ओला राजकुमार के सुरता आत रिहिस। का कहत रिहिस?

पानी गिरत हावय।

अरुन – कोन हावय इहांॅ? पथिक आसरा चाहत हवौं।

मधुलिका हर डार के फइरका खोल दिस। बिजुरी चमकिस। ओहर देखिस एकझिन मनखे घोड़ा के डोर धरे ठाढ़े हावय।

मधुलिका – राजकुमार।

अरुन – मधुलिका।

मधुलिका – अतका दिन बाद फेर।

अरुन – कतका समझाय फेर।

मधुलिका – अउ आज तुंहर का दसा हावय?

अरुन – मैंहर मगध के बिदरोही हवौं, देस ले निकाल दे गे हवौं। कोसल में जीविका खोजे बर आय हवौं।

मधुलिका – मगध के बिदरोही राजकुमार के सुआगत करे, एकझन बिना दई ददा के छोकरी। इ कइसे दुरभाग हावय। ता फेर मैंहर सुआगत करे बर तियार हवौं।

दिरिस्य: 8

ठान: पहरी गुफा के दुआर मा बर पेड़ के तरी।

मधुलिका – तैंहर अतका गरीब हावस ता अतका सैनिक राखे के का जरूरत हावय।

अरुन – मधुलिका, बाहुबल हर बीरमन के आजीविका हावय। येमन मोर जीवन मरन के संगी हावय। भला मैंहर इमनला कइसे छांड़ देवंव। अउ का करथे?

मधुलिका – काबर? हामन मेहनत ले कमाथेन अउ खाथेन ता तैंहर।

अरुन – भुला झन । मैंहर आपन बाहुबल मा भरोसा करथों। नवा राज बना सकत हवौं। निराष काबर हो जाओं।

मधुलिका – नवा राज। ओहो! तोर उछाह हर कम नी होइस। भला बता कइसे। कोन्हों ढंग के बतावा। ता मैंहर घलो कलपना के आनंद ले लों।

अरुन – कलपना के आनंद नीही, मधुलिका। मैंहर तोला रानी साही सिंघासन में बैठांहा। तैंहर आपन छीने खेत के चिंता करके झन डराव।

मधुलिका – मैंहर आज तक तोर इंतजार करत रेंहे राजकुमार।

अरुन – ता मोर भरम रिहिस। तैंहर सिरतोच मोला पिंयार करत हस। तोर चाह होही ता मैंहर परान लगाके तोला इ कोसल सिंघासन मा बैठा दिंहा। मधु अरुन के तलवार के आतंक देखबे।

मधुलिका – का।

अरुन – सच मधुलिका, कोसल राजा तभू ले तोर बर चिंता करत हावय। ये मैंहर जानत हौं, तोर सधारन बिनती ला वोहर नी मानिही। अउ मोला पता हावय, कोसल के सेनापति अबड़ सैनिकमला लेके दस्युमला दमन करे बर बड़ दूरिहा चल दिन हावय। — तैंहर बोलत नीहस।

मधुलिका – जे कइबे ओला करिहांॅ।

दिरिस्य: 9

ठान: राजमहल

सोन के मंच मा कोसल राजा आंखि मूंदे हावय। एकझन छोकरी पंखा धूंॅकत हावय। एकझन छोकरी पान धरे मूरति साही ठाढ़े हावय। कमिया आथे।

कमिया – जय हो देवता। एक झन छोकरी तुंहर मेर मिले बर आय हावय।

महाराजा – छोकरी। आन दे।

कमिया जाथे अउ मधुलिका ला लेके आथे।

मधुलिका – जय हो देवता।

महाराजा – तोला कहूंॅ देखे हवौं।

मधुलिका – तीन बच्छर होगिस देवता। मोर भिंया ला खेती बर ले गे रहिस।

महाराजा – ओह! तैंहर अतका दिन कस्ट मा बिताय। आज ओकर दाम मांॅगे आय हावस। ठीक ठीक, कमिया।

मधुलिका – नीही महाराजा। मोला दाम नी चाहत हों।

महाराजा – मुरुख फेर का चाहत हावस।

मधुलिका – ओतनेच भिंया। दुरुग के रक्सहू नाला के तीर मा जंगली भ्ंिाया। उहांॅ मैंहर आपन खेती करिहांॅ। मोला एकझन संगी मिलगे हावय। वोहर बइरीमन ले मोर सहायता करिही। भिंया ला समतल बनाय बर होही।

महाराजा – किसान कइना। वोहर अबड़ उबड़ खाबड़ भिंया हावय। तेमा वोहर दुरुग के तीर सैनिक महता राखथे।

मधुलिका – का मैंहर फेर निरास लहुंॅट जांव।

महाराजा – सिंहमित्र की बेटी। मैंहर का करौं? तोर ये बिनती?

मधुलिका – देवता! जइसने तुंॅहर आग्या।

महाराजा – जा तैंहर ओमा कमिया लगा। मैंहर अमात्य ला आग्या पत्र देबर आग्या देवत हवौं।

मधुलिका – जय हो देवता।

मधुलिका चल देथे।

दिरिस्य: 10

ठान: दुरुग के रक्सहू नाला के तीर के जंगली भ्ंिाया।

अरुन अउ मधुलिका बइठे हावय।

अरुन – चार पहर अउ बिसराम कर। बिहनिया तोर जुन्ना कलेवर कोसल राज के राजधानी श्रावस्ती मा तोर अभिसेक होही अउ मैंहर मगध के भगोइया कोसल के राजा होंहा।

मधुलिका – भयानक, अरुन तोर साहस देख के मैंहर चकित होवत हवौं, सिरिफ सौ सैनिक ले तैंहर—।

अरुन – रतिहा के तीसर पहर मा मोर बिजय यात्रा होही।

मधुलिका – ता तोला इ बिजय यात्रा मा बिस्वास हावय।

अरुन – अवस्य। तैंहर आपन झाला मा ये रतिहा बिता, बिहनिया तो राजमंदिर तोर लीलाघर होही। अच्छा अंधियार जादा होगिस। आभी तोला दुरिहा जाय बर हावय। अउ मोला परान पन ले इ अभियान ला आधा रतिहा पूरा करना हावय। ता रात भर बर बा बिदा।

मधुलिका उठिस अउ आपन झाला कोति गिस।

दिरिस्य: 11

ठान: कांॅटा ले भरिस डगर

मधुलिका के आत्मा – अरुन अगर सफल नी होइस ता।

मधुलिका – वोहर काबर सफल होही? श्रावस्ती दुरुग एक बिदेसी के अधिकार मा काबर जाही? मगध कोसल के चिर बइरी। ओह ओकर बिजय। कोसल राजा का कहे रिहिस- सिंहमित्र की कइना! सिंहमित्र कोसल रच्छक बीर, ओकर कइना, आज का करे जात रेहे। नीही नीही।

सिंहमित्र की आत्मा – मधुलिका मधुलिका।

सैनिक – कोन हस।

मधुलिका –

सेनापति – तैंहर कोन हावस छोकरी? कोसल के सेनापति ला तुरत बता।

मधुलिका – बांध लेवा मोला। मोर हतिया करा। मैंहर इसने अपराध करे हवौं।

सेनापति – पगली हावय।

मधुलिका – पगली नी हवौं। पगली होथें ता अतका बिचार बेदना काबर होथिस मोला। सेनापति मोला बांध लेवा। राजा के तीर ले चला।

सेनापति – का हावय? सफफा बता?

मधुलिका – श्रावस्ती के दुरुग एक पहर मा दस्युमन ले लिहीं। रक्सहू नाला के तीर ओमन हमला करिही।

सेनापति – तैंहर का कहत हावस।

मधुलिका – मैंहर सच कहत हवौं। तुरत करा।

सेनापति – अस्सी सैनिक तुमन नाला कोति जावा। मंगल तैंहर इला आपन संग बांध ले।

दिरिस्य: 12

ठान: दुरुग के दुआर

जब थोरे घुड़सवार आके रुकिन। ता दुरुग के जोगोइया चैंकिन।

जोगोइया – सेनापति तैंहर।

सेनापति – हांॅ अग्निसेन! दुरुग मा कतका सैनिक होही।

जोगोइया – सेनापति जय हो। दू सौ होही।

सेनापति – ओमन ला बला, फेर बिना बात करे। सौ मनला लेके तैंहर तुरत दुरुग के रक्सहू कोति जाबे। परकास अउ बात करे बर नी होय।

सेनापति हर मधुलिका कोति देखिस, वोला छोर दिन। ओला आपन पाछू आय बर किहिस।

कमिया महाराजा ला सचेत करिस।

सेनापति – जय हो देवता। इ छोकरी के सेती मोला इ बेरा आय बर लागिस हावय।

महाराजा – सिंहमित्र की बेटी। फेर इहांॅ काबर आय हावस। का तोर खेत हर नी बनत हावय? कोन्हों बाधा। सेनापति, मैंहर एला रक्सहू नाला के तीर के भिंया ला दे हवौं, का ओकरे संबंध मा तैंहर कुछू कहना चाहत हावस?

सेनापति – देवता! कोन्हों गुपुत बइरी हर ओई कोति ले आज रतिहाकन दुरुग मा अधिकार कर ले के परबंध करे हावय। अउ इ छोकरी हर मोला रस्दा मा इ संदेस बताय हावय।

महाराजा – मधुलिका येहर सच हावय?

मधुलिका – हां देवता।

महाराजा – सिंहमित्र की बेटी, तैंहर ए घ फेर उपकार करे हावस। ये सूचना देके तैंहर पुरुस्कार के कारज करे हावस। अच्छा तैंहर इहांॅ ठहर। पहिली ओ आतंकवादी मन के परबंध कर लों।

दिरिस्य: 13

ठान: सभा मंड़वा

अरुन ला बंदी बनाय गे हावय।

मनखेमन – एकर बध करा।

महाराजा – परानदंड देवत हवौं। मधुलिका ला बलावा।

मधुलिका पगली साही ठाढ़ हो जाथे।

महाराजा – मधुलिका तोला जे पुरुस्कार लेना हावय मांॅग ले।

मधुलिका –

महाराजा – मोर जतका खेती हावय मैंहर सबला तोला देवत हावौं।

मधुलिका एक घ बंदी अरुन कोति देखिस।

मधुलिका – मोला कुछू नी चाही।

अरुन हांॅसथे

महाराजा – नीही! मैंहर तोला खच्चित दिंहा। मांग ले।

मधुलिका – ता मोला घलो परानदंड मिलय।

अतकी कहके वोहर बंदी अरुन तीर ठाढ़ होगिस।

एकांकी रूपांतरण- सीताराम पटेल सीतेष

छत्तीसगढ़ी नाटक – मतदान बर सब्बो झन होवव जागरूक

(चुनाव के बुता म लगे शिक्षक घर-घर जा के मतदाता मन के सूद लेथे अउ मतदान करे बर सब्बो ल जागरूक करत हे)
शिक्षक रददा म रेंगत जात रहिथे त ओखर भेंट एक पागल मनखे ले हो जाथे,
पागल- जय हिंद गुरुजी कहाँ जात हास।
शिक्षक- जय हिंद, चुनाव अवइया हे भाई, तेखर सेती मतदाता मन ल जागरूक करे म लगे हौ, सब्बो मतदाता मन ल चुनाव के पहली जगाना हे।
पागल-कोनों फायदा नइ हे गुरु जी जगाए के जगाये तो सुते मनखे ल जाथे, फेर इंहा तो सब मर गे हे इमन ल का जगाबे तै,
शिक्षक- हँसथे फेर कइथे, हा तोरो बात ठीक हे फेर मतदाता मन ल जागरुक करना मोर काम हे तेला तो मैं करहु अऊ तै अपन काम ल कर, फेर तोर ले बात करना घलोक बेकार हे तभो ले एक बात सुन ले, एक शिक्षक कभु हार नइ मानय, काबर की सब ल सिखाये के जिम्मेदरी शिक्षक के रहिथे।
(शिक्षक फेर अपन काम ले आघु बढ़थे)
(शिक्षक सबले पहली किसान के घर जाथे)
शिक्षक- कोनो हावव का घर मा,
किसान- हव गुरुजी आत हव रुकहु थोड़ कन (बाहिर आये के बाद) कइसे का होंगे बताओ गुरुजी,
शिक्षक- ये बार तुहर घर म जतका मतदाता हे सब्बो मतदान दे बर जाहु, सब्बो काम बुता ल छोड़ के, पहली मतदान करू, अपन मुखिया चुने के अधिकार हे तुमनला,
किसान- हमन अपन काम बुता ल छोड़ के जाबो त हमन ल हमर एक दिन के रोजी कोन दिही गुरुजी, कमाथन तभे खाथन, अउ हमर एक झन मनखे के वोट नइ डाले ले का हो जही,
शिक्षक- कइसे जी खाना-कमाना त ऊमर भर हे, तोर एक झन के वोट नइ दे ले अइसे प्रत्याशी भी चुन के आ सकथे, जेन तोर बोली भाखा ल नइ समझे अऊ तोर कुछु विकास नइ करही, त फेर तै 5 साल तक कुछु नइ कर सकस,
तहि एक ठन बता बता मोला बता, तोर करा खेत हे ओला जोते बर कतना ठोंक हल चलाथस, एके ठोंन हल चलात होबे न, त एक हल ह तोर पूरा खेत ल जोत देथे, ता तोर एक वोट ले तै सरकार नइ बना सकस क, बस अपन मतदान के अधिकार ल जान अउ ये बार के चुनाव म मतदान जरूर करबे।
किसान- ले हव गुरुजी ये बार वोट दे ल जरूर जाहु अउ सब्बो झन ल संग म ले के जाहु।
(शिक्षक फेर आघु बढ़थे अउ युवा संगी मन के तीर म पहुचथे)
बेरोजगार युवा अउ कॉलेज के पढ़इया लईका
(मोबाइल म वीडियो गेम खेलत रहिथे )
शिक्षक- ये बार के चुनाव म आप सब्बो झन ल मतदान करना जरूरी हे, आपे मन ये दरी के चुनाव के दिशा ल बदलहु, आप मन ल पता ये ये दरी चुनाव कोन दिन हे कब हे?
एक युवा- का करबो जान के गुरुजी चुनाव कब हे, जब होही तब गूगल में सर्च कर के देख लेबो, हमन ल येखर ले का फायदा कोन जीतथे अउ कोन हारत हे,
(बाजू में ही रोजगार की तैयारी में लगे युवा)
हमन ल तो बस रोजगार चाही,
शिक्षक- सुनव संगवारी हो सब्बो झन ऐति आओ, सरकार के काम बुता का हे तुमन ल पता हे? सरकार के काम हे तुमन बर रोजगार के अवसर प्रदान करना, युवा संगवारी मन के विकास में सहयोग प्रदान करना, अउ तुमन अपन मत के उपयोग ले बने सरकार बना सकथव,अउ नइ बनाहू त तुमन ल बने रोजगार कइसे मिलही तुहर विकास कइसे होही, अपन मत के उपयोग कर के अपन बर बने सरकार बनना हे के दूसरे के चुने सरकार ल अपनाना हे, अब का फैसला हे तुहर हाँथ म हे।
युवा संगी – हव यार गुरुजी हा सही कहत हे, हमर पास तो अपन पसंद के सरकार बनाये के अधिकार हे तेला जानना जरूरी हे।
अउ हमन जेला चुनबो वही हमर विकास करही।
शिक्षक- हा अपना प्रतिनिधि चुनना तुमन के अधिकार हे अउ ओखर सही उयोग करव,
युवा- हा गुरुजी इस बार हम सब मतदान करेंगे, अउ ये दरी पहली बार मतदान करे के मौका हमू ल मिलही,
शिक्षक, किसान, युवा सब एक संग
आप सब्बो झन चुनाव के दिन जा के मतदान जरूर करहु, अपन मत के सकती ल पहिचाने, अउ कोनो भी लालच म आके अपन वोट के सवदा झन करहु।
जय भारत, जय छत्तीसगढ़ ।

अनिल कुमार पाली
तारबाहर बिलासपुर छत्तीसगढ़
प्रशिक्षण अधिकारी आई.टी.आई मगरलोड धमतरी

किसना के लीला : फणीश्वर नाथ रेणु के कहानी नित्य लीला के एकांकी रूपांतरण

जान चिन्हार: सूत्रधार, किसना- योगमाया, जसोदा, नंदराजा, मनसुखा, मनसुखा की दाई
राधा, ललिता, जेठा, अनुराधा, सलोना बछवा

दिरिस्य: 1
जसोदा के तीर मा राधा, ललिता, जेठा, अनुराधा ठाढ़े हवय, किसना आथे।
जसोदा: एकर जवाब दे, ले एमन का कहत हवय? लाज नी आय रे किसना? छिः छिः समझा समझा के मैंहर हार गयेंव।
किसना:- गायमला अउ बछवामला साखी देत कइथे-
धौली ओ मोर बात सही हावय ना।
धौली कोठा ले हुंकारी देथे हूँक-हूँ।
सलोना बछवा घलो इच कहथ हवय,
सलोना बछवा: हूँक- हू।
किसना: सुनत हस दाई, सफ्फा सफ्फा लबारी मारत हवय, बोल दाई पसु बेचारामन काकरो बर काबर लबारी मारहीं। आं।
राधा, ललिता, जेठा, अनुराधा जोर से हॉंसथे, नंदराजा आके कड़कथें।
नंदराजा: काबर एक निरदोस ला रोज रोज दोस लगाथा?
राधा, ललिता, जेठा, अनुराधा हॉंसी ला रोक के भागथें।

दिरिस्य: 2
एक कोति किसना हवय अउ दूसर कोति सलोना हवय। सलोना डंहकथे ता ओकर घंटी टिनिंग टिनिंग बाजथे।
सलोना: उं-यां-यां।
किसना: ओ-ले! आ जा।
किसना आपन हाथ आघू कर दिस, सलोना ओकर हाथ ला एक मुड़ी मारिस।
किसना: काबर भाग आय।
जसोदा दीया जलाय जात हावय, सलोना मया मा अहू ला मुड़ी मा मारिस। घी के दीया छलक गिस।
जसोदा: आः सलोना! कन्हाई!
जसोदा धूप दीया देथे, संख बजाय खानि सलोना ओकर सूर मा सूर मिलाथे।
सलोना: उं-यां-यां।
किसना: ए! संख के मुंहू चिढ़ात हावस तैंहर अउ गारी खाहॉं मैंहर।
जसोदा: संख मा पानी पखारत- थोरकुन हॉंसके- मुंहू नी चिढ़ाय, संख के संग ओ रोज जयध्वनि करथे।
जसोदा दुनों के मुंहू मीठ करथे।
जसोदा: चल जलपान कर ले।
किसन: आपन घुंघरालू चूंदी ला झटकत – दाउ ला घलो आन दे।




दिरिस्य: 3
जसोदा डेहरी मा बइठ के जरीबूटी के झोली ले कुछू निकालथे।
किसना: बाबा के दाढ़ा मा दरद हवय का?
जसोदा: —–।
किसना: सुन ले दाई मैंहर आज ले गोरस नी पीवों। हॉं।
जसोदा: जरी खोंटत- ये तो रोज सुनथों, का बात हवय?
किसना: काबर? बतांहा, ये तोर गुनधर सलोना कभू मुंहू दांत धोथे, कभू भूल ले घलो मुंहू मा माटी नी लगाय।
जसोदा: मुंहू धोय के बहाना कभू माटी खा नी पाय।
किसना: मुंहू हर अतका गंधाथे कोन्हो एकर तीर मा बइठे नी सकय। एकर दाई के थन मा एकर थूक लार सबो लगे रइथे। — उवाक्।
सलोना: उं-यां-यां।
किसना: अमरित घलो काबर रहे, मैंहर एकर दाई के गोरस नी पीवों।
किसना झट के सलोना के मुंहू ला धर लीस।
किसना: एती देख दाई, आज जमुना कछार के माटी ले दांत ला एकर रगड़ दे हावों मैंहर, कतका चमकत हावें। फेर मुंहू हर आभी ले गंधात हावय।
सलोना: उं-यां-यां।
किसना अउ सलोना लड़े बर लागिन।
किसना: आजकाल मोर मेर हमेसा लड़ना चाहत हस, छोटे छोटे सींगमन मा अतका गुमान? वाह रे लड़ोइया।
सलोना दू घ मुंड़ी मा मार के जसोदा के लुगरा मा लुका जाथे।
सलोना: उं-यां-यां।
किसना: हारा हारा!
जसोदा: सलोना रिसागे हवय बेचारा!
बड़ लाड़ ले सलोना ला चुमकार के हॉंसिस।
जसोदा: बड़ आय हावस, एकर मुंहू धोवोइया, गंगा जमुना के माटी ले, ए-हे, गोरस नी पीये
एकर दाई के अउ पूतना रक्छसिन के बेटा मन केसर ले मुंहू धोवत रिहिन ? मुंहू हर गंधात हवय! मुंहू मा मुंहू जोर के सूतथस रतिहा भर ता बन जाथे।
किसना आपन बंसरी के बेधा ला देखे बर लागिस, जसोदा दवा कूट डारे रिहिस, उठे के पहिली किहिस।
जसोदा: देख देख सलोना मोर कान मा का कहत हावय धीरे धीरे सुने तैंहर? कहत हावय मैंहर तो नंदी बाबा हावों, किसना आपन काली कमरी कोपीन कछनी लंगोटी अउ पीताम्बरी आपन तीर राखे। इहॉं कोन्हों ला लाज नी आय जाय।
किसना लजा गिस, जसोदा मोहाके किसना के रूप ला एकटक देखत हावय। पीढ़ा ले उठत किसना किहिस।
किसना: काल ले कोठा मा गेरवां मा बांध दिंहा।
जसोदा: अउ दिन भर इहॉं उहॉं सलोना उं-यां-यां करत रिहि।
किसना: ता का करों? बन मा कभू चैन ले रइथे इहॉं, झाड़ी झुरमुटमन मा दिन भर कोन ढूढ़त फिरय, एती खेदबे ता ओती जाके जमुना मा कूदे बर तियार, जानत हस दाई, जमुना के कछार मा ठाढ़ होके अजरज देखत रइथे, फेर आपन छांय ला देख के भड़कथे, भाग आथे।
जसोदा: ओकर का कसूर? संग दोख–।
बाहिर ले मनसुखा नरिया के कइथे।
मनसुखा: तोर गाय आइस ओ रे किसना।
किसना कूदके बाहिर आइस।
मनसुखा: बलदाउ मौसी के घर गिस आवय।
किसना उदास हो गिस, दाउ घलो आज नीए।
गायमन रंभात आइन, फेर किसन ला सूंघ सूंघ के चुप हो गिन, सलोना के ढेंटू के घंटी बाजत हवय, टिनिंग टिनिंग। राधा, ललिता, जेठा, अनुराधा गुमसुम किसना ला देखके लहंुटगिन।
राधा, ललिता, जेठा, अनुराधा: सांवरिया ला आज डांट परे हावय, छन मा सारा गांव उदास हो गिस।
सूत्रधार: नंद जसोदा के इ लाडला ला बिरज के एकेक झन आपन दे नांव ले बुलाथे, करिया, बिलवा, सांवरिया, मोहन, कन्हैया, गोपाल, केसव, मुरारी, चोर, छिछोर, बटमार, बनमाली, हरि—। हरि के हजार नांव।

दिरिस्य: 4
मनसुखा की दाई लाठी टेकत आथे- ओ बांके! बांकेबिहारी-ई-ई!
किसना: इसारा करत बताथे- आज इहॉं सबो के सिर मा दांत मा दाढ़ा मा आंखि मा कान मा दरद हवय। दरद।
मनसुखा के दाई: दरद नीही गरग! वे बूढ़वा पंडित फेर आय रिहिस आज। मैंहर मंझनिया आय रेंहे ता सबो फुसुर फुसुर गोठियात रिहिन। यों तो कान ले कम सुनथों, फेर पीठ पाछू बांके के नाम ले कोन्हों अउ मैंहर नी सुनिहा भला! वो गरग पंडित कहत रिहिस कतको घलो लाड़ मया करा किसना काकरो नी होय। काकरो नी होय।
किसना: कान के तीर मा- अउ का का कहत रिहिस?
मनसुखा के दाई: अउ ना जाने का का इरिंग विरिंग बतात रिहिस ओ भिथि के ओधा मा। सो घलो इ कान ले का समझों, इकरे सेती कइथों कोन्हों दवा दारू हे, इ कान के हे तोर करा। काबर सबो कइथे बांके बैइद घलो हावय, बने बात, दवा नी सही, तैंहर मोर कान के तीर मा फुसफुसा के कछु कह। या फेर वो गरग पंडित के बात हर ठीक हावय।
किसना ने मनसुखा के दाई के कान के तीर बंसरी राख फूंक दिस- सी-ई-ई-ई!
मनसुखा की दाई: हॉं रे बांके! इ कान ले कुछू कुछू सफ्फा सुनात हवय, कोनहों दिन अहू कान मा घलो।
जसोदा बाहिर आइस ता मनसुखा के दाई हर किसना ला कनखी ले समझाइस- गरग के बात पूछत मोर नांव झन लेबे।
बानी बदल के कइथे- मोर मनसुखा इसने नी रिहिस बांके, तोर संग रहके मोर मनसुखा घलो चैपट हो गिस। कन्हों ला खीख लागे या बने मनसुखा के दाई चापलुसी नी करय। जे अपन दाई ददा के नी होईस वोहर काकरो नी होय।
जसोदा: का बके बर आय हस संझा के बेरा?
मनसुखा के दाई: हॉं हॉं मैंहर बकथों।
नंदराजा: मनसुखा की दाई-ई-ई।
मनसुखा के दाई लाठी टेकत चल देथे।
जसोदा: तैंहर दाउ बर बैठे हस इहॉं अउ दाउ उहॉं मौसी के आंखि मा जाके समा गिस हावय। चल कुछू खा ले मोहना!
किसना: ना ना ना।
सलोना: उं-यां-यां।
जसोदा: कुंवर चल आभी आभी दही बना के राखे हवौं मैंहर।
किसना: गरग पंडित मेर काबर नी भेज दे गघरी भर?
जसोदा: आ बेचारा बाम्हन!
किसनाः सबो बेचारा हावें, एक मैंहर हवौं अवारा, मोर कोन्हो विसवास नीए।
जसोदाः कोन कहत हावय?
सलोना हर किसना ला एक मुड़ी मारथे।




दिरिस्यः 5
रात मा उठके किसना कहत हावय।
किसना: दाई का होइस? रोवत काबर हस? मुंड़ी मा दरद हवय जादा? ला लगर दिंहा।
जसोदा: कलाई ला धर के- ना ना मैंहर रोवत नी ओं। सपना देखत रेंहे, तैंहर सूत जा। आ।
धक धक धक धक किसना आपन दाई के धड़कन ला सफ्फा सुनत हावय, सांसमन के तरी उपर ला देखत हावय, दरद बड़ गहियर बाजत हावय, कोख के पीला बर दाई के मन नी तरसही, नी रोही, ता का सिरतो किसना के आपन कोन्हों नीए।

दिरिस्य: 6
ठान: गोकुल के गली
योगमाया: कोनहों बताहा मोला, नंदमहर के हवेली ला कोन कोती जाहॉं?
राधा: अरी काहॉं के गोरी आय हावस, गुमान ला भरके, अतकी जाबी छोकरी के बोली सुना, कइसने बीख भरे हावय, कोनहो इसने रस्दा घाट पूछत हावय भला। आपन नांव गांव नी बतात हावय।
ललिता: इसने टेड़गी बात काबर करत हस रे, तोर संग कोन्हों मरद नीए?
योगमाया: ना भइया, देखत हवौं, इहॉं के मनखे मन तन के नीही मन के घलो करिया हावें। कइसने हावय गोकुल गांव रे भइया?
जेठा आथे
जेठा: सुनत हावो एकर बोली, का हावय? काबर इहॉं भीड़ करे हावा?
योगमाया: हां-ए! तुमन आपन बहु बेटी मनला इ कइसने सीख दे हावा कि कोन्हों भुलाय भटकके परदेसिन मनला रस्दा घलो नी बताय कोन्हों? नंदराजा के डेहरी कती हावय।
जेठा: अउ तैंहर कोन राजा के बेटी हावस, कि परदेस मा आके टेड़गी मेड़गी गोठियात फिरत हावस, आपन नांव गांव काबर नी बतात हस?
योगमाया: मैंहर मथुरा ले आत हावौं, बसुदेव राजा के बेटी अउ महाराजा कंस के भांची हावों।
राधा, ललिता, जेठा, अनुराधा सबो चिंचयाइन- भांची कंस की-ई-ई।
योगमाया: काबर?
अनुराधा: येहर कंस के भेजे कोन्हों डाकिनी हावय रे! कंस की भांची।
राधा: कोन्हो बलावा यदुराई ला, कूदा मुरारी-ई-ई-ई।
योगमाया: एकेझन काबर जमोझन मिल के बलावा। कहूँ सूतिस होही?
योगमाया गठरी राख के बइठ गिस – देखत हवौं, वो छोकरा ठीक कहत रिहिस।
जेठा: कोन छोकरा? सुन रे ललिता, आप कोन छोकरा के बात कहत हावय?
योगमाया: वो करिया कलूटा, घटवार के बेटा होही।
ललिता: करिया कलूटा? घाट के इ पार या ओ पार?
योगमाया: घाट के ओ पार के मन करिया नी होंय अउ भैंसिन साही कोन्हों जानवर पोसे, डोंगा लेके कूदत आइस मोर तीर। मैंहर काबर ओकर डोंगा मा पांय रखिहा, जमुना पार करे बर डांेगा के का काम? हां हां मैंहर रेंग के नदी पार करके आय हावों, पूछिहा आपन घटवार
के बेटा ले।
राधा: ता ओ लइका ह का किहिस?
योगमाया: का किही भला? कुछू मिनमिना के किहिस, मैंहर सुना दें मैंहर कंस के भांची हावों। रस्दा घाट मा छोकरी मनला छेड़ोइया मन के सूरत देख के जान लेथें मथुरा के छोकरीमन। हॉं-आं।
ललिता: आभी तैंहर बताय ना, ठीक कहत रिहिस ओहर, का किहिस ओहर?
योगमाया: ओ-हो! वोहर तुंहर गांव के छोकरीमन के चाल-चरित्तर के बारे मा कहत रिहिस, गोकुल गांव मा जरा होसियारी ले जाहा, उहॉं दूझन इसने चोट्टी हावें, बात बात मा झगरा करके आंखि के आघू ले माल गायब कर देथे।
जेठा: चोट्टी? नांव बताय रिहिस काकरो?
योगमाया: का नांव भला? हॉं बिरिसभानु के बेटी अउ ओकर सखी दूसर।
जेठा अउ अनुराधा: राधा अउ ललिता।
राधा अउ ललिताः सुनत हन।
जेठा अउ अनुराधा: येहर लबारी मारत हावय, किसना इसने बात कभू नी करे। अच्छा ओहर आपन नांव घलो बताइस?
योगमाया: हॉं! बताइस, किहिस मोर नांव बंसरीवाला हावय, मोला आपन बंसरी बजाके रोकना चाहत रिहिस, जइसने मैंहर ओकर पीं-पीं-रीं-रीं सुने बर गोकुल आय हावों।
योगमाया गठरी बोहके चलत चलत कइथे- कहत रिहिस बेचारा बंसरीवाला के बंसरी ला कतका घ इसने चोराय रिहिन।
सबो चुप हावय, राधा अउ ललिता के आंखि मा आंसू निकलत हावय।
मनसुखा के दाई: अरी ओ छोकरी! तोर गठरी मा का हावय, कोनहो जरी बूटी राखथस कान के? काहां जाबे? नंदमहर के हवेली? चल मैंहर ले चलत हावौं।
दुनों चल देंथे।
जेठा: जाके किसना मेर पूछी काबर इसने छिछोर बात करथे। इ बार जो किही ओ लबरा ला।
सबो आपन आपन बेंटरी अउ गघरी लेके चलिन घाट कोति।




दिरिस्य: 7
जसोदा ला योगमाया दाई कहके पांय परथे, जसोदा ठगाय ठाढ़े हावय।
योगमाया: दाई री! आपन बेटी ला नी चीन्हत हस। आपन कोख के बेटी ला नी चीन्हत हस। मैंहर हवौं योगमाया।
जसोदा: योगमाया ? काहां ले आय हावस?
योगमाया: काबर? मथुरा ले, ओ मैंहर समझ गे दाई, झूठमूठ बात उढ़ियात उढ़ियात इहॉं घलो आ गिस हावय, कोनहों किहिन होही अगास मा उढ़िया गिस, कोनहों किहिन होही कंस हर मार दिस, मैंहर जानत हवौं, मथुरा मा एकझन पंडित हावय गरग, वोहर ऐती आथे का? ओकर परतीत झन करे कभू। मोर हाथ ला देख के का का कह दिस दाई करा। ओ दिन ले दाई मोला।
जसोदा के ढेंटू मा हाथ डालके- दाई तैंइहर मोर दाई हावस, होस ना, बोल ना।
जसोदा – ——।
राधा बाहिर ले नरियात हावय- कंस के भांची आय हावय, होसियार रिहा, कंस हर भेजे हावय।
जसोदा: तोला कंस हर भेजे हावय, बता कोन हस तैंहर राक्छसीन?
योगमाया: ओ दाई! तैंहर दूसर के बात ला सच अउ आपन बेटी के बात ला लबारी समझत हस, कंस के भांचा तुंहर घर मा पलत हवय, ओकर बर अतका दरद, न जाने कोन घरी मा मोर जनम होइस कि जनम ले आज तक सबो दुरदुरात हावें।
योगमाया रोवत हावय, नंदराजा आथे।
नंदराजा: गोपाल के दाई।
योगमाया: चैंकके- बाबा चीन्हत हस मैंहर कोन हवौं, तैंहर झन बताबे दाई।
जसोदा: सरकी बिछात- कहत हवै मैंहर योगमाया हवौं।
योगमाया: योगमाया नीही, बिंधबासिनी घलो, मथुरा के दाई मोला बिंधा कहके बोलाय।
योगमाया नंद के कोरा मा बइठ गिस, नंद हर आप मुंहू ओकर लंग कर दिस।
जसोदा: कइसने कइसने अजगुत बात बोलत हावय, येहर कइथे, जतकी बात फैलिस हावय सब लबारी हावय।
योगमाया नंद के मन ला थाह डारिस, नंद के दाढ़ी ला छुअत छुअत किहिस।
योगमाया: एकठन बात पहिली कह दों, मैंहर मथुरा ले भाग के आय हावों, देवकी बसुदेव के घर मा आप पांय नी रखों आप, बाबा। रोवत- बाबा गरग जोतसी अउ नारद के बात सुन सुन
के मथुरा के दाई मोला रोज कोसथें। मथुरा के बाबा तो आप बेटी कहके घलो नी बलाय, कहत हावय काकर बेटी, बेटी नीही टेटी। काहां ले आ गिस।
नंदराजा: काहां ले आगिस, मोर सो भेंट होही ता पूछिंहा।
जसोदा: आखिर काबर कब ले इसने बिहवार करत हवय ओमन?
योगमाया नंदराजा के ढेटूं के कंठी गने बर लागिस।
नंदराजा: तैंहर काबर इकर लंग आंखि बटेरत हस, का कहत हे जरा सूझे के कोसिस कर ठंडे दिल ले। हॉं कह बेटी, गरग पंडित हर जरूर कुछू किहिस होही?
योगमाया: सिरिफ कुछू, अतकी बात, इ छोकरी के खातिर भीख मांगे बा परही, फूहड़ दाई ददा के बेटी जरूर जग मा हंसाई करवाही। सोन जइसने लइका के बदला मा माटी के पुतरी।
नंदराजा: सुनत हस हामन फूहड़ हन।
योगमाया: आप बात बात मा ठोना देंथे, दही बेचे जाबे ओ छेनावाली, एक दिन किहिस मोर बेटा ले चरवाही करवाथें, तोर ले बगीचा के जोगवारी नी होय, दाई मैंहर भाग आय।
योगमाया जशोदा के ढेंटू मा लपट गिस। जसोदा ओकर पीठ मा हाथ फेरत किहिस।
जसोदा: बने करे बेटी।
योगमाया: दाई मोला वापिस झन भेजबे।
नंदराजा: कभू नीही, आय तो कोन्हों, आप बइठे का करत हस गोपाल के दाई, हाथ धोवाके बेटी ला कलेवा दे। न जाने कब ले भूखी पियासी हावय।
नंदराजा बाहिर गिस, जसोदा योगमाया ला पाके भीतरी गिस।
योगमाया: एकठन बात कहों दाई, किसना ला मथुरा वापिस भेज दे।
जसोदा के करेजा धड़क गिस, हाथ ढिल्ला होगिस, योगमाया गिर गिस।
योगमाया: दाई-ई-ई।
जसोदा: इसने बात फेर झन कइबे बेटी।
जसोदा योगमाया का पांय छुए बर लागिस।
योगमाया: फेंके ला एक घ नीही दस घ फेंका कोरा ले। फेर आपन कुंवर कन्हाई ला एक पल बर घलो मन ले दूरिहा नी करस काबरकी?
जसोदा: सुन बेटी, तैंहर कुंवर ला देखे नी अस, एक घ देख लेबे, ता कुछू कहिबे, ओला
कइसे दूरिहा कर सकत हन, चल उठ, आ जा कोरा मा।
योगमाया: राख आपन कोरा, ये कोरा तोर किसना बर हावय, मैंहर पूछत हवौं कभू किसना ला कभू इसने कोरा ले फेंके हावस।
जसोेदा: —-।
योगमाया: मैंहर काबर देखिहां किसना ला, इहॉं किसना के राज, उहॉं किसना के राजधानी, उहॉं घलो किसना के हजार नांव सुनत रहेंव, इहॉं सबो बिरज किसनमय हावय, वाह रे भाग! रंग पंड़रा नी होइस, नीही ता, आप मोर देंहे के रंग के बात ले लेवा, मैंहर पंड़री हावों, मोर दाई ददा पंड़री पंड़रा हावय, मोर का कसूर? मोर पड़री के सेती मोला उहॉं धंवरी गाय कइथे सबो। रहय इहॉं किसना हर। मैंहर तो फेंके होय हों, मरी होय हों, अगास मा उढ़ियाय हवौं, जेहर उढ़ियात आइस अउ जुरगिस हावय ओकर पांय के पूजा होथे अउ आपन देंहे के संतान ला ठुकराय जाथे।
जसोदा: योगमाया बेटी पहिली कुछू जलपान कर ले।
योगमाया: काकरो जूठा माखन मिसरी मैंहर नी खावों, इहॉं सुनत हवौं, बिना किसना के जुठाए कोनहो कुछू सूंघे नीही। कइसे खीख आदत हावय।
जसोदा: मनेमन सोचथे। सिरतो कुछू घलो तो जूठा नी होय किसना के खातिर, सबो गांव मन काकरो घर के गोरस जूठा हो, इसने आसा नीही।
बाहिर मा गोपीमन नरियात हावय।
योगमाया: मोर चिन्ता झन कर दाई, किसना के घर लहुंटे के बेरा होगिस हावय, ओकर बर कलेवा तियार कर, मैंहर आपन बर खिचड़ी रांध डारिहॉं। उहॉं घलो इच मिलत रिहिस, सिरिफ नांव दूसर रिहिस, खिचड़ी नीही खेचरान्न।
योगमाया डेहरी के तीर ठाढ़ होगिस, गोपीमन अचानक ठाढ़ होगिस।
योगमाया: इस तरह मुंड़ मा उठात काबर आत हावा, का होइस? इ धरती रिहि कि बूड़ही?
राधा: का री, कंस की भांची, काहॉं हावय बंसरीवाला।
योगमाया: अहा-हा! हाय री बंसरीवाला, वाली रे ! दरद देखा तो, दाई ले जादा दरद मौसी ला। पूछत हवौं, कोन ला पूछ के संझा के बेरा पूछ के आय हावा? इहॉं कोन्हों मंडिर नी होय, जिहॉं रोज दीया बाती अउ आरती के पाछू मिठाई बंटही। इस घर के छोकरा के भविस्य ला हंस के पांख साही उज्जर कर दे हावा तुमन। का समझ ले हावा इ घर मा धीया बेटा नीए।
जसोदा कूद के आथे- का होइस?
ललिता: कि किसना कनहों लंग नीए, ना जमुना के तीर, ना कदंब तरी, ना बिरन्दावन मा।
घाट बाट मा कन्हों लंग नीए। सबो खोजत हवें, बलदउ किहिस हवे, नंदबाबा काहां हावें।
राधा: अउ ए कंस के भांची इहॉं काबर आय हावय, जब ले आय हावय, गांव मा कौंआ नरियात हावय।
जसोदा जोर ले रोना कहत रइथे फेर चुप हो जाथे। ——–।
राधा: योगमाया मेर लिपट के- बता रे सखी, तैंहर बंसरीवाला ला काहॉं देखे रेहे।
योगमाया दूरिहा भाग जाथे।
योगमाया: ए-हे! एला मिरगी उरगी तो नी आय, इसने थरथर काबर कांपत हावय।
नंदराजा आथें।
सबोझन: बाबा! किसना नी मिलत हवय। दाउ केंहे हें बाबा ला जलदी भेजा।
नंदराजा चल देंथे।
योगमाया: बाबा।
जसोदा: पाछू ले झन बला।
योगमाया: अतकी अधीर होय के का बात हावय, आभी संझा परे हावय, सुनत हवौं, लुकौवल ओहर रोज खेलत हवे। ये घलो हो सकत हवे, इहॉं आके सबले जादा रोवत हे ओकरे घर मा लुकाय होही। इ छोकरी मनला लुकौवल खेले के कइसने खीख आदत हवे।
मनसुखा आपन संगी के संग मा निकलथे – चला चला।
राधा घलो आपन गिंया मन के संग मा निकलथे – चला चला खोजी खोजी।
सबो डंडा मसाल लेके खोजत हवें। योगमाया खिचड़ी बनात हावय, जसोदा जाय बर होथे, ता योगमाया टोंकथे।
योगमाया: तैंहर काहॉं जात हावस इ अंधियारी मा एकेझिन, बस खिचड़ी चूरे मा जतका देरी लागही, खा पी के चल दिंहा दाई री। एकर ले तो देवकी दाई बढ़िया, कभू भूख भूख कहके रोय नीओं मैंहर। मैंहर भूख ला नी सहे सकों।
बाहिर किसना को हजार नांव ले सबो नरियात हावें, योगमाया खिचड़ी उतार के परोसे बर बइठिस।
योगमाया: कोन्हों बरतन भाड़ा घलो नीए, मैंहर पूछत हवौं इ घर मा बरतन भाड़ा मन घलो किसना ला खोजे बर चलदिन हे का। खा पी के चल दिंहा दाई ओ।
जसोदा पथरा के मूरती साही ठाढ़े हावय, योगमाया कराही ला पटकथे, ता होस आथे।
योगमाया: कराही मा खांव का?
जसोदा: आघू मा पथरोटा हवय बेटी।
योगमाया: ओमा कुंवर कनहाई के नांव लिखे हावय।
बाहिर मा सबो किसना के हजार नांव ल नरियात हावें, योगमाया जोर जोर ले रोथे।
योगमाया: अरी दाई! मैंहर भूख ले बिलबिलात हवौं, मोर अंगठी जर गिस खिचड़ी मा।
जोर जोर ले रोथे, ओकर रोवाई मा अगास पताल एक हो जाथे।
जसोदा: रो झन बेटी।
बड़ देरी ले कोरा मा मया करथे।
योगमाया: दू मा एक ला जाय बर लागही मन ले, किसना ला या फेर योगमाया ला।
जसोदा कछू बेरा बर किसना ला भुला गिस, खिचड़ी परोस के खवाय बर बैठिस।
योगमाया: उहॉं देवकी दाई ला खवाय बिना मुंहू मा कौरा नी डारत रेंहे। खा ना दाई।
जसोदा के होंठ के तीर मा कौंरा गिस किसना के सूरता आगिस। किसना भूखाय होही। भूखा किसना के दाई मुंहू मा कौरा डारही कइसे।




दिरिस्य: 8
जसोदा योगमाया ला सुतात हवय।
योगमाया: जेती किसना सूतय ओती नी सूतंव, गोरसाइन गंधाय हर मोला बने नी लागे, अउ एकेझिन नी सूतंव, आदत नीए, दाई के गोड़ लगरे बिना मोला नींद नी आय।
योगमाया सूत जाथे।
जसोदा: सोचत हावय- जे कहा, देवकी दाई हर एला बने सीख दीस हावय, बेटी के बिना घर के हालत कइसे होथे, येला मैंहर पहिली बार आंखि ले देखत हवौं, आप वोहर आपन दाई के हाथ पांव हलाय नी दिही, बेटी हर दाई के सेवा कर सकत हावय सचमन ले, बिना बेटी के दाई के दुरदसा ओहर देखत हावय, सिरतो योगमाया हर ओला लगर के इसने सुता दिस दू पहर रतिहा के पाछू नींद खुलिस।
योगमाया: सपना मा बड़बड़ात हावय- हॉं हॉं वो आपन दाई देवकी के छाती मा सट के सूतित होही पलंग मा। तैंहर काबर?
जसोदा: कुंवर कन्हाई ओ ओ।
योगमाया: जागथे- दाई बस दू घंटा के बात हावय, अउ दू घंटा आपन तीर सूतन दे, जे
मैंहर इसने जानथें, ता खा पी के संझा के चल देंथे।
योगमाया आपन बांहा मा हाथ समारथ कइथे- तोर किसना के देंहे के रंग झरथे का? देख तो कइसने करिया करिया धब्बा पर गिस हावय।
जसोदा देखत हावय, सलोना सूंघत आथे अउ पलंग के तीर ठाढ़ हो जाथे। योगमाया के बांहा ला चाटे बर जीभ निकालथे।
योगमाया: दाई के छाती मा संटके- गाय बछरू ला बड़ डराथों।
योगमाया के बांहा ला सलोना जीभ मा फेर चाटथे।
योगमाया: दाई ओ।
जसोदा: चल भाग।
सलोना नी भागे अउ पीताम्बरी ला चाबे बर लागथे।
योगमाया: गिस गिस मोर पीताम्बरी के कलेवा।
योगमाया पलंग ले कूद परिस, ओकर चुनरी गोड़ा ले संटाके छूट गिस, चूंदी सबो छिछरागिस।
सलोना: उं-यां-यां।
जसोदा: चोर किसना, योगमाया, बिंधा, लीलाधर।
गायमन नरियाइन, जै-हो, जै-हो। बां-आं-य। सबो सुनिन किसना लहुंट के आगिस हे। राधा अउ ललिता देखत हावें, सलोना चाट चाट के किसना के समरई ला सफ्फा करत हावय।
जसोदा: दाई ले घलो छल छलिया।
राधा अउ ललिता – देखंव सखी रोज लीला—– हरि हरि बोल।
जसोदा घलोक गाय बर लागिस, जसोदा देखत हावय, जे किसना, वो राधा, वो अनुराधा, वहीच सलोना, खुद जसोदा घलोक किसना। सबो आके गात हावें।
किसना किसना किसना किसना कह जसोदा दाई किसन के कथा।
किसना चोर साही आंखि तरी करके चोर साही ठाढ़े हावय, गठरी मा हावय राधा के रेसमी चुनरी, ललिता के कंगन, जेठा के बाजूबंद, अनुराधा के सांटी।
सलोना सबो के चारों ओर गुल्ला घूमत हावय- टिनिंग-टिनिंग-उं-यां-यां।
(फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी नित्य लीला से)

एकांकी रूपांतरण- सीताराम पटेल सीतेश

चिरई चिरगुन (फणीश्वरनाथ रेणु के कहानी आजाद परिन्दे)

जान चिन्हार –
हरबोलवा – 10-11 साल के लइका
फरजनवा – हरबोलवा के उमर के लइका
सुदरसनवा – हरबोलवा के उमर के लइका
डफाली – हरबोलवा के उमर के भालू के साही लइका
भुजंगी – ठेलावाला
हलमान – भाजीवाला
करमा – गाड़ीवाला
मौसी – हरबोलवा की मौसी
हलधर – सुदरसनवा के ददा
चार लइका – डफाली के संगीमन
चार लइका – सुदरसनवा के संगीमन




दिरिस्य: 1
खोर मा भुजंगी अउ हलमान लड़त हवंय, हरबोलवा देखत हवय।
भुजंगी – साला तोर बहिनी ला धरों।
हलमान – बोल साला, ठड़गी के डउका।
लड़त लड़त भाग जाथें।
हरबोलवा – नावा गारी वाह, ठड़गी के डउका।
अतकी बेरा करमा गाड़ी चलात आथे, हरबोलवा ओकर पाछू मा लटके रइथे, कोर्रा मा मारत गारी देथे।
करमा – उतर! हरामी के पिला!
थोरकुन धूरिया जाय के पाछू उतरथे, हरबोलवा घलो गारी देथे।
हरबोलवा – साला! ठड़गी के डउका।
करमा कसमसा के रह जाथे। करमा चल देथे। हरबोलवा जात जात स्कूल करा हबरते।
चपरासी आथे अउ कइथे।
चपरासी – साला तोला चीन्हत हों, तइंच हावस ना ओ दिन मोर छेरी ला धर के दूहत रेहे।
सबजीबाग के कसाई गली मा रथस ना, साला, इहांॅ का करे बर आय हस।
हरबोलवा – ए! गारी काबर देवत हस, मैंहर इहांॅ गली मा ठाढ़े हवौं, काकरो कुछु लेवत हौं।
चपरासी – साला! मुंॅहू लगत हस फेर, नाक के हाड़ा टोड़ दिहांॅ, मारो साला एक दू झापड़, साला इहांॅ नाली मा छोकरीमन तीन मिलट करथें, तेला देखत रथस। भाग साला, नीही ता दिहांॅ, एक दू झापड़।
ओ करा ले हरबोलवा भाग जाथे, चपरासी घलो भीतिरीया जाथे, हरबोलवा जात रथे ता फरजनवा ला भेंटथे। फरजनवा के मुंॅहू लटके हावय।
हरबोलवा – यार काबर मुंॅहू लटकाय हावस।
फरजनवा – मोर मोमा मोला बिहनिया बेरा के नास्ता बंद कर दिस हवय।
हरबोलवा – अरे यार, तोला तो एक दिन के नास्ता नी दीन हावैं अउ तैंहर हिम्मत हार गे, मोर तो कभू कभू दिन भर के खाना गोल कर देथें, उपर ले मार अउ गारी झन पूछ, ले सुन तोला मैंहर तीन मिलट के मायने बताहांॅ।
फरजनवा – ये तीन मिलट का हावय?
हरबोलवा तुर्री मार के मूतथे अउ कइथे।
हरबोलवा – समझे, तीन मिलट के मायने, — हे हे हे हे।




दिरिस्य: 2
हरबोलवा जात हावय, आज इतवार हावय, स्कूल के छुट्टी हावय, स्कूल तीर नाली करा जाथे, ओ सब सूरता करथे, इ तीर छोकरीमन मूतथे, अहू ओकरा मूतिहा कइथे, पेंट के चैन ला निकालिहांॅ कइथे कि ओला चपरासी के सूरता आ जाथे, ओहर बंद कर देथे।
हरबोलवा – ऐती आ गें हावों, ता मौसी घर जाथों, ठड़गी के डउका! ठड़गी के डउका! ठड़गी—।
एक करा लइकामन गधा के पूछी मा टीपा बांॅधत हावय, गधा रिहिस चालाक, पूछी ला चिपकाय रिहिस, हरबोलवा आपन पेंट के जेब ले तार के हुक निकालिस अउ ओमन के बिन मांॅगे मदद करिस।
हरबोलवा – अजी उसने नी होय, ला इ हुक ऐला डोर मा बांधके, पूछी मा लपेट दा, फेर हुक ला खोंच देवा।
फेर उसने करदिन, गधा भागत हे, टीपा बाजत हे , लइकामन जमो हांसत हवय, सुदरसन ओकर यार बन गिस।
सुदरसनवा – ऐन मउका मा तैंहर आ गे भला, काहांॅ रथस?
हरबोलवा – कसाई गली मा रइथों।
सुदरसनवा – बाप का करथे?
हरबोलवा – खलासी हावय।
सुदरसनवा – दाई हावय?
हरबोलवा – हावय।
सुदरसनवा – भाई बहिनी?
हरबोलवा – दू भाई तीन बहिनी। तोर दाई हावय?
सुदरसनवा – हांॅ हावय, सउत दाई हावय, फेर मोला अबड़ मया करथे, फेर मोर ददा कसाई हावय। असल मा मोर ददा हर हवय सउत ददा। माने नी समझे, मोर असली ददा मर गिस, ता मोर इ ददा हर मोर दाई ला फुसलाके एक दिन आपन घर बुलाइस, फइरका दे के सेन्दूर भर दिस मांॅग मा जबरदस्ती। दाई रोइस, फेर रोय ले का होही, सेन्दूर भर दिस एक घ ता, आखिरी मा मोर दाई इ सरत मा राजी होइस, सुदरसन ला आपन बेटा के साही राखबे, ता मैं तोर सुआरी, नीही ता–।
हरबोलवा – ए! सुदरसनवा, इ कोति तोर ददा आत हावय।
सुदरसनवा – आन दे।
हरबोलवा – मैंहर जात हवौं यार! मोला मौसी के घर जाय बर हावय।
सुदरसनवा – रूक यार!
हलधर – कस बे सूरा! बारह बज गिस ना अउ तैंहर सड़क मा खचड़इ करत हावस।
सुदरसनवा – आज छुट्टी हवय दुकान मा।
हलधर – छुट्टी हवय ता आभी ले घर काबर नी गे हावस, साला एक दिन तोर पीठ के चमड़ी उधेड़े ले बनही, जा घर जा।
अतकी कह के चल देथे।
हलधर भागिस ता सुदरसनवा आपन चेहरा ला पोंछिस फेर किहिस।
सुदरसनवा – तैंहर काहांॅ जात हावस?
हरबोलवा – मौसी के घर।
सुदरसनवा – काहांॅ रइथे तोर मौसी?
हरबोलवा – पगलखनवा के तीर मा। अउ तोर घर कति हवय, कोन दुकान मा काम करथस?
सुदरसनवा – इच खोर मा, पीर साहेब के मजार देखे हावस, ओकरे तीर। —चली यार! देखिहा तोर मौसी के घर, चली।
हरबोलवा – तैंहर? तैंहर मोर मौसी के घर काबर जाबे?
हरबोलवा ओला नी ले जांव कहत हावय तभू ले सुदरसनवा जोंक जइसने चपकगे हावय। एक करा के पानी के बंबा बिगड़े देख के दुनों खुसी ले उछल जाथें।
सुदरसनवा – पानी के फव्वारा! नहाबे?
हरबोलवा – अउ तैंहर?
सुदरसन पेंट छोर के नहाय बर लागिस। हरबोलवा आघू पाछू के बात सोचे बर लागिस।
आपन जेब ले साबुन के कुटी फेंकत कइथे।
हरबोलवा – जरा पाजामा सफ्फा कर ले।
दुनों झन नंगरा नहात हावय। बीच बीच मा नल ला चिमक के पिचकारी बनात हवय। डफाली अउ ओकर संगीमन नरियात कूदथे।
संगीमन – धरा धरा साला मला धरा।
हरबोलवा डरा गिस, फेर सुदरसनवा लापरवाही ले कुल्ला करत रिहिस।
डफाली – काहांॅ रथस बे? इहांॅ नंगरा होके नहाय बर आय हावस खचड़े।
हरबोलवा हर आपन आधा सुखाय पजामा ला जल्दी जल्दी पहिर लिस। सुदरसनवा हांॅसिस।
डफाली – ये साला बड़ चालू मालूम होत हावय, होसियार रिहा।
सुदरसनवा – तोर नांव डफाली हावय ना?
डफाली के मुड़ी के लिटी के चूंदी ठाढ़ होगिस, आंॅखि गुल्ला होगिस।
डफाली – तैं, तैंहर काहांॅ रथस? तैं कोन? तैंहर मोर नांव कइसे जाने?
सुदरसनवा – तोर दाई तोला लेके एक दिन हकीम साहेब के दवाखाना मा गे रिहिस ना?
डफाली – हांॅ।




सुदरसनवा हांॅसत रहय।
डफाली – जान चिन्हार के हावय रे! चली जाई।
सबो भाग जाथें।
सुदरसनवा – जानत हस, अतका बड़खा होगिस ना अउ दसना मा मूत दारथे।
हरबोलवा – हांसत किहिस – एकरे बर ससूर भागिस।
दिरिस्य: 3
ठौर – मौसी के घर।
हरबोलवा अउ सुदरसनवा जाथें, मौसी ओमनाला देख के एकोरच खुस नी होय।
मौसी – अउ इ कोन हावय? दिदिया तोला पीटथे, ता फेर ठीके करथे, दुनिया भर के लुच्चा लफंगामन के संग ऐती ओती मटरगस्ती करत रइबे ता एक दिन जेल जाबे। जा घर जा।
दुनों लहुंटे बर लागथे। हरबोलवा ला कुछु समझ नी आइस, आज मौसी इसने बिगड़ काबर गिस।
दिरिस्य: 4
सुदरसनवा – यार, वो झोपड़ी के भीतरी मा कोन बइठे रिहिस? ओहर तोर मौसा हावय?
हरबोलवा – मौसा? नीही तो, मौसा हर बरौनी मा रइथे।
सुदरसनवा – फेर वो लाल कमीजवाला कोन रिहिस?
हरबोलवा – कती?
सुदरसनवा – अरे, मैंहर झांॅक के देखे रेंहे, ऐकरे सेती तोर मौसी झटपटाके झोपड़ी ले बाहिर आय रिहिस अउ तोला डांॅटत रिहिस।
हरबोलवा – ओ!
सुदरसनवा – एकठन बात किंहा बुरा तो नी मानबे, तोर मौसी छिनाल हावय।
हरबोलवा – धत्त।
सुदरसनवा – धत्त का? मैंहर झांॅक के देखे रेंहे।
सुदरसनवा हांॅसे बर लागिस, हरबोलवा के मुंॅहू डफाली साही होगिस, मानों अहू हर दसना मा मूत दारथे।
हरबोलवा – तैंहर कोन चीज के दुकान मा काम करथस?
सुदरसनवा – दफ्तरी के दुकान मा, साला सड़े बासी लासा के गंध के मारे तोर दिमाग फाट जाही। करबे काम।
हरबोलवा – कतका मिलथे?
सुदरसनवा – मोट पंदरा रूपया।
हरबोलवा – बस।
सुदरसनवा – ता कागज मा लासा लगाय के अउ कतक मिलही सौ रूपया? बोल काम करबे?
मखनियांॅ कुंॅआ के नुक्कड़ मा कुछू होय रिहिस, ओमन कूदत कूदत जाथें, जब ओमन पहुंॅचथे ता खेल खतम हो जाय रेहे, स्कूटर अउ रिक्सा के एक्सीडेंट मा आदमी घायल होय रिहिन अउ दुनों अस्पताल चल दे रिहिन। दुनों पछताइन, हरबोलवा पाछू करके देखिस, सुदरसनवा बिड़ी के दुकान मा ठाढ़े होइस, बिड़ी छपचा के हरबोलवा के तीर आइस।
सुदरसनवा – बिड़ी पीबे?
हरबोलवा – मैंहर बीड़ी नी पीवंव।
हरबोलवा आपन मुहल्ला कोति जाय बर लागिस, सुदरसन के दिल बुता गिस। हरबोलवा ला नरियाइस।
सुदरसनवा – ऐ! सुन ना।
हरबोलवा – का हावय?
सुदरसनवा – तुंॅहर घर जांव, तोर संग मा?
हरबोलवा – नीही। बेकार मा मोर दाई तोला गारी दिही।
सुदरसनवा – तैंहर काम करबे?
हरबोलवा – ददा ला पूछिंहा? मोला बेला होवत हावय मैंहर जात हावौं।
सुदरसनवा – रूक ना जरा यार, सच्ची, लागत हावय तोर ले बड़ दिन ले जान पहचान हावय।
हरबोलवा हांसिस, ओकर हांॅसी हा सुदरसनवा ला मोह डारिस।
सुदरसनवा – तैंहर लकरी के कोयला के मंजन करथस।
हरबोलवा – हांॅ।
सुदरसनवा – महूंॅ घलो करिहांॅ।
हरबोलवा जाय बर लागिस।
सुदरसनवा – कहा सुना माफ करबे भाई।
सुदरसनवा के आंॅखि मा ना जाने का दिखिस कि हरबोलवा के दिल उमड़ आइस, वोहर रूक गिस।
हरबोलवा – का होइस?
सुदरसनवा – साला आज अबड़ मार परही।
हरबोलवा – तोला।
सुदरसनवा – जब तक मूच्छा नी जामही, तब तक हामन बालिग नी हो सकन, अउ जब नाबालिग रइबो, रोजेच लत्तम-जुत्तम! साला घर जाय के जी नी करत हावय। कहूंॅ भाग जाय के मन करत हावय। जब तक बालिग नी हो जान, रोजेच लत्तम-जुत्तम सहे बर परही, साला! सुन एक काम करबे? सलीमा मा टनटन भाजा बेचबे?
हरबोलवा – सलीमा मा टनटन भाजा?
सुदरसनवा – लोन सलीमा के तीर एकठन टनटन भाजा कंपनी हावय, ओमा मोर कतका संगवारीमन काम करथे, खूबेच मजा के काम हावय, यार! फेर जमानतदार नी मिले कोन्हो, अउ ददा साला काहे चाहिही कि ओकर बेटा टनटन भाजा बेचके पैसा जमा करिही। बीस रूपया महीना, एकदम अजादी के काम अउ उपर ले फोकट मा सिनेमा देख। मोर ददा किहिस टनटन भाजा कंपनी का मालिक एक सौ रूपया के पेशगी दिही? दफ्तरी हर दो सौ रूपया एडवांस दिस हावय।
हरबोलवा के खांॅध मा हाथ रखके बड़ मया ले पूछिस- बोल ना यार, टनटन भाजा कंपनी मा काम करबे?
हरबोलवा – फेर जमानतदार?
सुदरसनवा – ओकर इंतजाम हो जाही।
हरबोलवा – काहांॅ?
सुदरसनवा – हामर मुहल्ला मा एकझन अमजद मिस्तरी हावय, फेर अबड़ खचड़ा हावय।
सुदरसनवा थूंकत किहिस
यार एक घा कोन्हों जमानतदार हो जाही, एक घा टनटन भाजा कंपनी म नौकरी मिल जाय। फेर कोन ददा धरके ले जाही घर अउ कोन साला मारिही? फेर अमजद मिस्तरी साला अबड़ खचड़ा हावय।
हरबोलवा – खचड़ा हावय, ता जमानत कइसे–?
सुदरसनवा – खचड़ा हावय ऐकरे सेती तो जमानतदार होही।
सादी के ढोल बाजत हावय। दूनों झन ल्रबा सांस लीन।
हरबोलवा – इ साल खूबेच लगन हावय, तुंहर मुहल्ला मा कोन्होें सादी नी होइस? हामर गली मा एक रात मा पांॅच।
सुदरसनवा – मारो यार गोली! सादी ला! जब तक मुच्छा दाढ़ी नी जामही, साला, नाबालिग रबो हामन। चली अमजद मिस्तरी के घर चली।
हरबोलवा ला लागिस, सुदरसनवा ओकर सब कुछ हावय, सुदरसनवा के सिवाय इ दुनिया मा ओकर कोन्हों नी ए। ओकर दुख के समझोइया इ सुदरसनवा।
हरबोलवा – सुदरसनवा के हाथ ला धर के कइथे – फेर मोला डर लागत हावय।
सुदरसनवा – का के डर।
हरबोलवा – ददा।
सुदरसनवा – अरे एक घ कंपनी मा घूसन तो दे फेर देखबे इ ददामन ला। ए देख ऐती, ऐमा तेल लगाही, आके तोर अउ हामर ददा दाई, मौसा मौसी सबो, समझे।
हरबोलवा – खांध मा हाथ राखके – ता मिल जाही नौकरी?
सुदरसनवा – अमजद मिस्तरी ला तेल लगाय बर परही।
हरबोलवा – लगाबो, कंपनी के नौकरी बर जे करना रिहि करबो, आप लहुंट के घर नी जायबर हावय। थूकत हन घर ला।
सुदरसनवा – पक्का।
हरबोलवा – पक्का।

फणीश्वरनाथ रेणु के कहानी आजाद परिन्दे से।
एकांकी रूपान्तरण – सीताराम पटेल



पान के मेम

जान चिन्हार
सूत्रधार, दाई, बप्पा,बिरजू, चंपिया, मखनी फुआ, जंगी,जंगी के पतो, सुनरी, लरेना की बीबी
दिरिस्य: 1
बिरजू:- दाई, एकठन सक्करकांदा खान दे ना।
दाईः- एक दू थपड़ा मारथे- ले ले सक्कर कांदा अउ कतका लेबे।
बिरजू मार खाके अंगना मा ढुलगत हवय, सरीर भर हर धुर्रा ले सनात हवय।
दाईः- चंपिया के मुड़ी मा घलो चुड़ैल मंडरात हावय, आधा अंगना धूप रहत गे रिहिस, सहुआइन के दुकान छोवा गुर लाय बर, सो आभी ले नी लहुंॅटे हवय, दीया बाती के बेरा होगिस, आही तो आज लहुंॅट के फेर।
बागड़ बोकरा के देंहे मा कुकुरमाछी झूमत रहिन, एकरे सेती बिचारा बागड़ रह रहके ऐती ओती कूदत फांदत रिहिस, बिरजू के दाई बागड़ बर रीस खोज डारे रिहिस, पीछू के मिरचा के फूले गाछ, बागड़ के सिवाय अउ कोन खाय होही, बागड़ ला मारे बर वोहर माटी के छेाटे ढेला धरे रिहिस।
मखनी फुआ आथे
मखनी फुआ:- का बिरजू के दाई, नाचा देखे नी जास का?
दाईः- बिरजू के दाई के आघू नाथ अउ पीछू पगहिया रिहि तब न फुआ।
गरम रीस मा बुताय बात फुआ के देंहे मा गड़ गिस अउ बिरजू के दाई ढेला ला तीरेच मा फेंक दिस, बिरजू हर बागड़ ला सूते सूते एक डंडा मार दिस।
दाईः- रूक, तोर ददा हर तोला बड़ हथछुट्टा बना दिस हवय, बड़ हाथ चलात हस मनखेमन मा, रूक।
मखनी फुआः- पनिहारिन मन करा- थोरकुन देखा तो, इ बिरजू के दाई ला, चार मन पटवा के पैसा का होगिस हवय, भिंया मा पांव नी परत हवय, इनसाफ करा, खुदेच आपन मुंॅहू ले आठ दिन पहिली सबो गांव के अलीन गलीन मा कहत फिरत रिहिस, हांॅ इ दारी बिरजू के ददा किहिन हवय, बैलागाड़ी मा बैठाके बलरामपुर ला नाचा देखाय ले जाहूंॅ। बइला आपन घर मा हावय, ता हजार गाड़ी मंगनी मिल जाही। सो मैंहर आभी टोंक दें, नाचा देखोइया सबो औन पौन तियार होवत हवय, रसोई पानी करत हवय, मोर मुंॅहू मा आगि लगे, काबर मैंहर टोंके गे रहेंव, सुनत हौ, का जवाब दिस बिरजू के दाई हर, अर–र्रे हांॅ! बि र जू के मइया के आघू नाथ अउ पीछू पगहिया नी हो तब ना।
जंगी की पतोः- फुआ सरबे सित्तलमिंटी के हाकिम के बासा मा फूलछाप किनारीवाली साढ़ी पहन के यदि तहू भंटा के भंेट चढ़ाथे, ता तोरो नांव घलो दु तीन बीघा धनहर जमीन के परचा कट जाथिस, फेर तोरो घर मा आज दसमन सोनाबंग पटवा होथिस, जोड़ा बैला बिसाथा, फेर आघू नाथ अउ पीछू सौठन पगहिया झूलत रथिस।
सूत्रधार:- जंगी के पतो, मुंॅहजोर हवय, रेलवे टेसन के तीर के टुरी हवय, तीन महीना पहिली गौना के नवा बोहो होके आय हावय अउ सबो कुरमाटोली के रेंधिन सासमन ले एक आधा मोरचा ले चुकिस हवय, ओकर ससुर जंगी नामी दागी चोर हवय, सी किलासी हवय, ओकर डउका रंगी कुरमाटोली के नामी लठैत, एकरे सेती हमेसा सिंग खुजियात फिरत रइथे जंगी के पतो।
दाई:- अरे चंपिया ! आज लहुंॅटही ता मुंॅड़ी ला मुरकेट के आगि मा दे दिंहा, दिन रात बेचाल होवत जात हवय, गांव मा आप तो ठेठर बैसकोप के गीत गवोइया पतो सबो आय बर लागिन हवय, कहूंॅ बइठ के बाजे न मुरलिया सिखत होही ह-र-जा-ई-ई। अरी चंपि-या-या-या।
जंगी के पतोः- कन्हिया मा मटका धरथे- चला ददिया चला! इ मोहल्ला मा पान के मेम रइथे, नी जाने दुपहर दिन अउ चैपहर रतिहा बिजली के बत्ती भक भक के जरत हवय।
सबो हांॅसथे
मखनी फुआ:- सैतान के मोमादाई।
सूत्रधारः- बिरजू के दाई के आंॅखि मा मानो कोन्हों तेज टारच के रोसनी डार के चैंधिया दिस, भक भक बिजली बत्ती, तीन साल पहिली सरवे कैंप के पाछू गांव के जलनडाही मइलोग मन एकठन कहानी गढ़ के फैलाय रिहिन, चंपिया के दाई के अंगना मा रतिहा भर बिजली बत्ती भुक भुकात रहे, चंपिया के अंगना मा नाक वाले पनही के छाप, घोड़ा के टाप साही। दाईः- जला जला अउ जला, चंपिया के अंगना मा चांदी जइसने पटवा सूखात देखके जलोइया सबो कोठार मा सुतओइया मईलोगमन धान के बोझा ला देख के भांटा के भुरता हो जाहा।
चंपिया गुर ला चाटत आथे, दाई थपड़ा मारथे।
चंपिया:- मोला काबर मारत हस, सहुआइन जल्दी सौदा नी दे एंे ऐं ऐं।
दाई:- सहुआइन जल्दी सौदा नी दे के मोमादाई, एक सहुआइन के दुकान मा मोती झरत हवय, जो जेरी जमा के बइठे रेहे। बोल ढेंटू मा लात देके नेरवा टोड़ दिहांॅ हरजाई, जो कभू बाजे न मुरलिया गात सुने, चाल सीखे बर जात हावस, टेसन के छोकरी मन सो।
बिरजूः- ए मइया एक उंगली गुर दे ना, दे ना मइया एक रत्ती भर।
दाईः- एक रत्ती काबर, उठाके बरतन ला फेक आत हों पिछवाड़ा मा, जाके चाटबे, नी बनही गुरतुर रोटी, गुरतुर रोटी खाय के मन होवत हवय।
उसनाय सक्करकांदा के सूपा ला चंपिया के आघू मा राखत,
बइठ के नींछ, नी ता आभी।
चंपिया:- मनेमन- दाई गारी दिही, पांय पसार के बइठे हर बेलज्जो।
बिरजूः- दाई महू हर बइठ के सक्करकांदा नीछों।
दाई:- नीही, एकठन सक्करकांदा नीछबे अउ तीन ठन ला पेट मा, जाके सिद्धू के बोहो ला कह, एक घंटा बर कराही मांॅग के लेगे हे, फेर लहंुटाय के नाम नी लेत हे, जा जल्दी जा।
चंपिया दाई ले नजर बचाके एकठन सक्करकांदा बिरजू कोति फेंक देथे। बिरजू जाथे।
दाई:- सूरूज नारायन बूड़गिन, दीयाबाती के बेरा हो गिस। आभी ले गाड़ी–।
चंपिया:- कोयरीटोला के मन कोन्हों गाड़ी नी दिन मइया, बप्पा किहिस हे तोर दाई ला कइबे, सबो ठीक ठाक करके तियार रिही, मलदहिया टोली केे मियाजान के गाड़ी लाय बर जात हवौं।
दाई:- कोयरीटोला के मन कोन्हों गाड़ी मंगनी नी दिन, ता फेर मिलगिस गाड़ी, जब आपन गांव के मनखेमन के आंॅखि मा पानी नीए, मलदहिया टोली के मियाजान
के का भरोसा, ना तीन मा , ना तेरह मा, का होही सक्करकांदा नींछ के। राख दे उठाके, इ मरद नाचा दिखाही, बैलागाड़ी मा बइठा के नाचा देखाय ले जाही, बइठ गे बैलागाड़ी मा, देख दारें जी भर के नाचा, रेंगोइया मन पहुंॅचके जुन्ना होगिन होही।
बिरजू:- कराही ला मुड़ी मा राखत- देख दिदिया, मलेटरी टोपी, ऐमा दस लाठी मारे मा कुछू नी होय।
चंपियाः- चुप।
दाईः- बागड़ ला भगात- काल तोला पंचकौड़ी कसाई के हवाले करत हवौं राक्षस तोला, हर चीज मा मुंॅहू लगाही, चंपिया बांध दे बगड़ा ला। छोर दे ढेंटू के घंटी ला, हमेसा टुनुर टुनुर, मोला एको नी सुहाय।
बिरजूः- झुनुर झुनूर बइला मन के झुनकी, तैंहर सुने–।
चंपिया:- बागड़ के ढेंटू के झुनकी छोरत- बिरजू बक बक झन कर।
दाईः- चंपिया, डार दे चुल्हा मा पानी, बप्पा आही ता कइबे, आपन उड़नजहाज मा चेघके नाचा देखे जाय, मोला नाचा देखे के सौक नीए, मोला जगाहा झन कोन्हों, मोर माथा पीरात हे।
बिरजू:- का दीदी, नाचा मा उड़नजहाज घलो उढ़ियाही।
चंपिया:- इसारा करत- चुपेचाप रह, मुफत मा मार खाही बिचारा।
बिरजूः- चुपेचाप- हामन नाचा देखे नी जान। गांव मा एकोठन चिरई घलो नी ए, सबो चल दिन ना।
चंपिया:- पलक मा आंसू आत हे, एक महीना पहिली ले मइया कहत रिहिस, बलरामपुर के नाचा के दिन गुरतुर रोटी बनही, चंपिया छींट के साढ़ी पहनही, बिरजू पंेट पहनही, बैलागाड़ी मा चेघके–।
बिरजूः- गाछ के सबले पहिली भांटा, जिन बोबा, आप मा चढ़ाहा, जल्दी गाड़ी लेके भेज दिहा जिन बोबा।
दाईः- पहिली ले कोन्हों बात के मंसूबा नी बांधना चाही कोन्हों ला, भगवान मंसूबा ला टोड़ दिस, ओला अबले पहिली भगवान ले पूछे बर हवय, ये कोन बात के फल देत हावा भोलेबाबा, आपन जीयत ओ कोेन्हों देवी देवता पित्तर के बदना नी
बांचे हवय, सरवे के समे जमीन बर जतका बदना बदे रिहिस। ठीक ही तो, महाबीर के बदना बांचे हावय, हाय रे देव, भूल चुक माफ करा बाबा, बदना दुगुनी करके चढ़ाही बिरजू के दाई, चोरी चमारी करोइया के बेटी नी जरही, पांच बीघा जमीन का हासिल करे हवय बिरजू के बप्पा हर, गांव के भईखई मन के आंॅखि मा कचरा पर गिस हवय, खेत मा पटवा लगे देखके, गांव के मनखेमन के छाती फाटत हवय, भुंइया फोर के पटवा लगिस हवय, बैसाखी बादर साही घूमड़त आत हे पटवा के पौधामन, ता अलान ता फलान, अतकी आंॅखि के धार भला फसल सहही, जिहांॅ पंदरामन पटवा होय बर रिहिस, उहांॅ दसेमन होइस, फेर तोल मा ओजन होइस रबीभगत के इहांॅ, इमांॅ जरे के का बात हवय, बिरजू के बप्पा हर तो पहिली कुरमाटोली के एकेक मनखेमला समझा क केहे रिहिस, जिनगी भर मजूरी करत रह जाहा, सरवे के समे आत हे, सो गांव के कोन्हों पुतखौकी के भतार सरवे के समे बाबू साहेब के खिलाफ खांॅसीस नीही, बिरजू के बप्पा ला कम सहे बर पड़िस हावय, बाबू साहेब रीस मा सरकस नाचा के बघवा साही हुमड़त रह गिस। आखिर बाबू साहब आपन सबले छोटे लइका ला भेजिस, मोला मौसी कहके बोलाइस, ये जमीन ददा हर मोर नांव ले बिसाय रिहिस, मोर पढ़ाई लिखाई ओई जमीन ले चलथे, अउ घलो कतका बात, खूबेच मोहेबर जानथे ओतका बड़ लइका, जमींदार के बेटा हवय, — चंपिया बिरजू सूत गिस का? इहांॅ आ जा बिरजू अंदर, तहूंॅ घलो आ जा चंपिया, भला मइनसे आही तो इ दारी,
दुनों आथे
चिमनी बुता दे, बप्पा बोलाही ता झन सुनिहा, खपच्ची लगा दे, भला मइनसे रे भला मइनसे, मुंॅहू देखा थोरकुन इ मरद के, बिरजू के दाई दिन रात साथ नी देथीस ता ले चुकिस जमीन, रोज आके माथा धरके बइठ जांय, मोला जमीन नी लेबर हवय बिरजू के दाई, मजूरी हर बने हवय, छांॅड़ दो जब तोर करेजा हर थिर नी रिही, ता का होही, जोरू जमीन जोर के, नीही ता कौनहों अउर के, बिरजू के ददा ला बड़ तेज ले रीस चघथे, चघत जात हवय, बिरजू के दाई के भाग खराब हवय, जे इसने गोबर गनेस गोसान पांय, कोन सोख मौज दिस हवय ओकर मरद हर, घानी के बैला साही खटत सबो उमर काट दें इकर इहांॅ, कभू एक पैसा के जलेबी बिसाके दिस हवय ओकर डउका हर, पटवा के दाम भगत ले लेके, बाहिरेच बाहिर बइला बाजार चल दिन। बिरजू के दाई ला एको घा नमरी लोट देखे घलो नी दिस आंॅखि ला, बैला बिसा लानिस, ओइदिन गांव मा ढिंढोरा पीटे लागिस, बिरजू के दाई इ दारी बैलागाड़ी मा चेघके जाही नाचा देखेबर। दूसर के गाड़ी के भरोसा नाचा देखाही।
अपने आप ले
अहू खुद घलो कुछू कम नीए, ओकर जीभ मा आगि लगे, बैलागाड़ी मा चेघके नाचा देखे के लालसा कोन कुसमे मा ओकर मुंॅहंॅू ले निकले रिहिस, भगवान जाने, फेर आज सुबे ले दूपहर तक कोन्हो न कोन्हों बहाना अठारा घ बैलागाड़ी मा नाचा देखाय जांहा किहिस हावय, ले खूब देखा नाचा, वाह रे नाचा, कथरी के तरी दुसाला के सपना, काल बिहनिया पानी भरे बर जब जाही, पतली जीभ वाली पतोमन हांॅसत आही अउ हांॅसत जाहीं, सबो जरत हवे इकरले, हांॅ भगवान दाढ़ीजार घलो, दू लइका के महतारी होके जस के तस हवय, ओकर गोसान ओकरे बात मा रइथे, वो चुंदी मा गरी के तेल डारथे, ओकर आपन जमीन हवय, काकरो करा एक घूर जमीन नीए इ गांव मा, जरही नीही, तीन बीघा धान लगे हवय अगहनी, मनखेमन बिख देबर बांचे तब ता।
बाहिर मा बैलामन के घंटी के आवाज आइस।
आपनेच बैलामन के घंटी हवय, का रे चंपिया?
चंपिया अउ बिरजू:- हूंॅ उंॅ उंॅ।
दाईः- चुपा, फेर गाड़ी घलो हवय, घड़घड़ात हे न?
चंपिया अउ बिरजू:- हूंॅ उंॅ उंॅ।
दाई:- चुपा, गाड़ी नी ए, तैं कलेचुप देखके आ तो चंपिया, भाग के आ चुपंचाप।
चंपिया:- हांॅ मइया, गाड़ी घलो हावय।
बिरजू हड़बड़ात उठ बैठिस, दाई ओला सुतादिस, बोले मत कहके, चंपिया गोदरी तरी सूत गिस, बाहिर मा बैलागाड़ी ला ढिले के आवाज आइस।
बप्पाः- हांॅ हांॅ, आगेन घर, घर आय बर छाती फाटत रिहिस। चंपिया बैलामनला ला कांदी दे दे, चंपिया।
बिरजू पांच मिनट ले खांॅसत रइथे।
बिरजू, बेटा बिरजमोहन, मइया रीस के मारे सूत गिस का, अरे, आभी तो मइनसे मन जातेच हवे।
दाईः- मनेमन- नी देखन नाचा, लहुंॅटा देवा गाड़ी।
बप्पाः- चंपिया उठत काबर नीअस, ले धान के पंचसीस राख दे,
धान के बालीमन ला ओसारे मा राखथे
दीया बारा।
दाईः- डेढ़ पहर रात के गाड़ी लाय के का जरूरत रिहिस। नाचा तो आप खतम होत होही।
बप्पाः- नाचा आभी सुरू नी होय होही, आभी आभी बलरामपुर के बाबू के कंपनी गाड़ी मोहनपुर होटल बंगला ले, हाकिम साहेब ला ले बर गे हावय, इ साल के आखिरी नाचा हावय, पंचसीस मिंयार मा खोंच दे, हामर खेत के हावय।
दाईः- हामर खेत के हावय, पाकगिस ना धान।
बप्पाः- नीही, दस दिन मा अगहन चढ़त चढ़त लाल होके नय जाही, सबो खेत के बाली मन। मलदहिया टोली मा जात रेंहे, हामर खेत के धान देखके आंॅखि जुरा गिस, सच कहत हों, पंचसीस टोरत मोर अंगठी कांॅपत रिहिस।
बिरजू हर एकठन धान ला लेके मुंॅहू मा डार दिस।
दाईः- कइसे लुक्कड़ हस रे, इ बैरीमन के मारे कोन्हों नेम धरम जो बांचे।
बप्पाः- का होइस, कड़कत काबर हस?
दाईः- नवा खाय के पहिली नवा धान ला जुठार दिस, देखत नीआ।
बप्पाः- अरे, इमन के सबो कुछू माफ हावय, चिरई चिरगुन ये येमन। हामन दुनों के मुंॅहू मा नवा खाय के पहिली नवा अन झन परे।
चंपिया:- धान ला दांत मा चाबके- अतका गुरतुर चाउर।
बिरजूः- अउ कहरत घलो हवय नी रे दिदिया।
बप्पाः- रोटी ओटी तियार हो गिस ना।
दाई:- नीही, जाय के ठीक ठिकाना नीए अउ रोटी बनाथे।
बप्पा:- वाह खूब ह, तुमन, जेकर मेर बैला हवय, ओला गाड़ी मंगनी नी मिलही का भला, गाड़ीवाला मनला कभू बैला के जरूरत होही, पूछिहांॅ, फेर कोयलीटोला मनला, ले जल्दी रोटी बना ले।
दाई:- बेर नी होही।
बप्पा:- अरे, टोकरी भर रोटी तैंहर पलक मारत बना लेथस, पांच रोटी बनाय मा कतका बेर लागही?
बिरजू:- मइया बेकार रीस करत रिहिस ना।
दाईः- चंपिया, जरा धौलसार ले ठाढ़ होके मखनी फुआ ला आवाज दे ना।
चंपिया:- फुआ- आ, सुनत हस फुआ, मइया बलात हवय।
मखनी फुआः- हांॅ, फुआ ला काबर गुहारत हस, सबो ओला मा एकेझिन फुआभर तो हवय बिना नाथ पगहिया वाली।
दाईः- अरी फुआ, ओ बेरा बुरा मान गे रेंहे, नाथ पगहिया वाले ला आके देखा, दूपहर रात मा गाड़ी लेके आय हावय, आ जाना फुआ, मैंहर गुरतुर रोटी बनाय नी जानों।
मखनी फुआः- खांॅसत आथे- एकरे बर घरी पहर दिन रहत पूछत रहेंव, नाचा देखे जाबे का? केहे रइथे ता पहिली ले आपन अंगीठी छपचा दे रइथे।
दाईः- घर मा अनाज दाना बगैरह ता कुछू नीए, एक बागड़ हवय अउ कुछू बरतन भाड़ा, सो रात भर बा इहांॅ तमाखू राख जाथों, आपन हुक्का ले आने हस ना फुआ।
मखनी फुआः- फुआ ला तमाखू मिल जाही ता रात भर का, पांच रात ले बइठ के जाग सकत हों। ओ हो हाथ खोलके तमाखू राखे हे, बिरजू के दाई हर, वो सहुआइन, राम कहा, ओ रात अफीम के गोली साही, एक मटर भर तमाखू राख के चल दिस गुलाब बाग के मेला मा अउ केहे रिहिस डिब्बा भर तमाखू हवय।
बिरजू के दाई चुल्हा छपचाय लागिस, चंपिया सक्करकांदा ला पिचकोले लागिस, बिरजू मुड़ी मा कराही ला राख के आपन ददा ला देखाथे।
बिरजूः- मलेटरी टोपी, एमा दस लाठी मारिहा तभू ले कुछू नी होय।
सबो हांॅसथे।
दाईः- तसका मा तीन चार बड़खा सक्करकांदा हावय, दे दे बिरजू ला चंपिया, बिचारा संझा ले –।
चंपियाः- बिचारा झन कह, मइया, खूबेच सचारा हावय, तैं का जानबे, कथरी के तरी
मुंॅहू काबर चलत रिहिस बाबू साहब के।
बिरजूः- ही ही ही बिलेक मारटिन मा पांच सक्करकांदा खा डारेन, हा हा हा।
सबो हांॅसथे।
दाईः- एकठन कनवा गुड़ हवय, आधा दांे फुआ?
मखनी फुआः- अरी सक्करकांदा तो अतका मीठा रइथे, अतका काबर डारबे?
बैलामन दाना कांदी खाके एक दूसर के देंहे ला चाटत हें, बिरजू के दाई तियार हो गिस, चंपिया छींट के साढ़ी पहनीस, बिरजू बटन नीए ऐकर सेती पटवा के डोर मा बंॅधवाय बर लागिस।
दाई:- अतका बेर का रेंगोइयामन रूके होही।
बिरजू के बप्पा बिरजू के दाई ला एकटक देखत हावय, मानो नाचा के पान के मेम। गाड़ी मा बैठिस ता बिरजू के दाई के देंहे मा अजीब गुदगुदी लागे बर लागिस।
दाई:- गाड़ी मा आभी बड़ जगह हावे, थोरे जवनी सड़क ले गाड़ी ला ले जाहा।
बिरजूः- उड़नजहाज साही उढ़िया बप्पा।
बप्पा:- रोवत सुनके- अरे जंगी भाई कोन रोवत हे अंगना मा?
जंगीः- का पूछत हस, रंगी बलरामपुर ले नी लहुंटिस हे, पतो नाचा देखे कइसे जाय, आसरा देखत देखत ओती गांव के जमो मइलोग चल दिन।
दाईः- अरी टीसनवाली तैं काहे रोवत हस, आ जा झट ले कपड़ा पहिरके, सारी गाड़ी परे हावय, बिचारी आ जल्दी आ।
सुनरी:- गाड़ी मा जगहा हावे, मैंहर घलो जाहांॅ।
लरेना के बीबी घलो आथे।
दाईः- जे बांचे हावा सबो आ जावा जल्दी।
तीनों झन आथे, बैला हर पीछू के पांय फेंकथे।
बप्पाः- साला, लात मारके खोरी बनाबे पतो ला।
सबो हांॅसथे।
दाई:- रोटी देत – खा लेवा एकेक करके, सिमराहा के सरकारी चुंआ मा पानी पी लिहा, अच्छा आप एक बैसकोप के गीत गा तो चंपिया, डरात हस काबर, जिहांॅ भूला जाबे, बगल मा मास्टरनी बैठिस हावे।
बप्पाः- चल भइया, अउ जोर ले, गा रे चंपिया, नीही ता बैला मनला धीरे धीरे रेंगे बर किंहा।
चंपिया:- चंदा की चांदनी—-।
बिरजू के दाई जंगी के पतो ला देख के सोचत हवय, गौना के साढ़ी ले एक खास किसिम के गंध निकलत हवय।
दाईः- मनेमन- ठीके तो किहिस हे ओहर, बिरजू के दाई बेगम हावे, येहर तो कोन्हों बुरी बात नीए, हांॅ वोहर सिरतोच पान की मेम हवय।
बिरजू के दाई के मन मा आप कोन्हों लालसा नीए, ओला नींद आवत हवय।

फणीश्वर नाथ रेणु की लालपान की बेगम कहानी से
एकांकी रूपान्तरण:- सीताराम पटेल

सिरीपंचमी का सगुन

जान चिन्हार
सिंघाय कहारः- किसान
माधोः- सिंघाय कहार का बेटा
जसोदा:- सिंघाय कहार की घरवाली
कालू कमार:- एक लोहार
कमला:- कालू कमार की घरवाली
गंॅजेड़ियाः- बूढ़ा रेलवे मिस्त्री
धतुरियाः- जवान रेलवे मिस्त्री
कोटवारः- हांॅका लगोइया
हरखूः- गांॅव का किसान
मनखे 1,2,3,4,5,ः- सभी किसान
गांॅजा, बिड़ी, सिगरेट और शराब पीना स्वास्थ्य बर हानिहारक हावय।
दिरिस्यः 1
ठौर:- सिंघाय के घर
अनमना मन ले सिंघाय आथे, कौंआ बोलथे- कांव कांव
सिंघायः- असुभ, असगुन बोली कौंआ के, टेड़गा फाल, टेड़गा भाग।
माधोः- ददा आगिस, ददा आगिस, सबले पहिली मोर ददा आगिस, मोर बर नानकुन रांॅपा बनवाय ददा, देखों काहांॅ हावय मोर रांॅपा।
सिंघाय अंगना के बरत चुल्हा मा फाल ला फेंक देथे, हा हा करत जसोदा आथे।
जसोदा:- तोर मति मारा गिस हे का? का होगिस हे तोला?ऐन सिरीपंचमी के दिन फाल ला कोन्हों चुल्हा मा फेंकथे?
सिंघाय:- ठीक करेे हों। फालेच ला नीही, आभी नागर ला घलो चूंॅद के।
जसोदाः- चुपे रहा, अलच्छन कुलच्छन बात ला जुबान मा झन लावा। का होइस हे, बोलत काबर नी आ?
सिंघाय:- इसने खेती बारी के।
माधो रोवत हवय, माधो बबुआ, एती आ, रो झन।
जसोदाः- बबुआ ला चुप परात हावस अउ खुदे कलपत हावस,बोलत काबर नीअस, माधो के बापू, बोलत काबर नीअस।
सिंघायः- आप हामन खेती नी करन, माधो के दई,मैंहर तय करे हावौं, आज कालू कमार हर दस झिन के आघू मा मोला बेपानी कर दिस, फाल टेड़गा कर दिस।
जसोदाः- फाल टेड़गा कर दिस?
सिंघायः- दस डेढ़े पंदरा मन धान मैंहर नी दे हवौं, तेकर सेती, अउ दिहां काहांॅ ले पंदरा मन धान, बाप रे।
जसोदा बांॅस के पोंगी से फाल ला निकालत हे।
जसोदाः- खैन धान के बात नी होइस, असल कारन मैंहर जानत हवौं, ओ दिन कालू के घरवाली कमला हर हामर खेत ले एक बोझा कुसियार चूंॅद के ले जात रिहिस, मोर ले गरमा गरम बतकही हो गिस, लइका बर, एक डांॅग नीही चार डाॅंग कुसियार ले जाथिस, कोनहों बात नी रिहिस? फेर बोझाभर कुसियार, बिना पूछे चूंॅद के, ता फेर का कहा जाय, कड़कके कुसियार फेंक दिस, ओई दिन मैंहर समझे रेहें ओ पतलजीभी ला।
सिंघाय:- कब ? कोन दिन?
जसोदा:- इ पांॅच सात दिन होइस हावय।
सिंघायः- तैंहर मोला केहे काबर नीही? अउ कुसियार ला का करे? काहांॅ दे आय?
जसोदा हुक्का बर चिलम बनाय बर लागिस।
जसोदाः- चिलम मा माखुर डारत, — केहे के का बात रिहिस, मइलोग मन मा इसने झगरा होवत रइथे, कुसियार ला मैंहर हाट मा बेंच दें।
सिंघायः- सिरीपंचमी के पहिली काबर झगरा करे बेकार, आप इ टेड़गा फाल ले सिरीपंचमी के नांगर कइसे ठाढ़ करबो।
जसोदाः- जान बूझके झगरा मोल लेय बर आय रिहिस, कालू के घरवाली, ओकर पेट मा बड़ पहिली ले बदमासी पलत रिहिस, आप समझे असल कारन।
सिंघायः- असल कारन, मईलोग मनला सबो कारन मालूम हो जाथे सबा ले पहिली, माधो बबुआ!
जसोदाः- आप ता गलती हो गिस।
सिंघायः- उदास झन हो माधो के दाई।
जसोदाः- उदास नी होवत हों सोचत हावौं, रूकजा।
सिंघाय:- आज सिरीपंचमी के दिन कोन खाही, परेवा काबर निकालत हस माधो के दाई।
जसोदाः- सबर करा, भगवान हर चाही ता, खिचड़ी के पानी उतार दों या फेर तैंहर रांॅधबे।
सिंघाय:- तैंहर जात काहांॅ हस?
जसोदा आधा सेर गोरस, सेर भर अरवा चउर, मंूंॅग के दार धरिस।
सिंघाय:- काहांॅ जात हावस, हाट मा, कहत हवौं, दुनिया के कोन्हों नही छुअय तोर टेड़गा फाल।
जसोदाः- माधो के ददा, तैंहर बइला मनला धो, मैं आभी आत हवौं, पाव कोस भ्ंिांया जात जात जतका बेरा लागिही।
जसोदा चल देथे
सिंघाय:- काहांॅ गिस, भगवान जाने!
माधोः- दई मोर बर रांपा लेबर गिस हावय।
दिरिस्य:2
ठौर:- लुहार सार
कालू कमार फाल बनात हावय, चार पांॅच मइनसे अउ बइठे हवे, एकठन फाल ला जानबूझ के टेड़गा करदिस।
सिंघायः- अच्छा, तैंहर मोर फाल ला टेड़गा कर दे, कालू
कालू कमारः- ता का करथें? ता का करथें? एक नीही दू नीही, पूरा पांॅच साल के खैन बांॅचे हावय, न अगहनी फसल मा ऐ चुटकी धान अउ न रबी फसल मा एक मुट्ठी चना, खैन खातिर कछेरी मा नालिस करे बर तो नी जांॅव, का करथे?
सिंघाय:- ऐन सिरीपंचमी के दिन।
कालू कमार:- ऐन केन बतकही पंचइती बुलाके करबे, सिंघाय, बइठे हवे इहांॅ जुआर भर ले किसान, छोटे बड़े। इमन मेर बिचार कराव।
फाल ला टोकरी मा धर के चल देथे।
सबोझन:- मियाद के घलो एक ठन हद होवत हवय।
दिरिस्य: 3
ठौर:- रेलवे पुल के तीर
जसोदा ले कहानी सुन के गंजेड़िया कइथे।
गंजेड़ियाः- सिरीपंचमी के सगुन लेके आय हस, माधो के दाई।
धतुरियाः- एमा सोचे बिचारे के का बात हवय, मास्टर, पीट देवा फाल।
गंजेड़ियाः- पाछू कोन्हों झंझट करिही गांववाला मन ता।
धतुरिया:- तहूंॅ घलो किसे गोठियाथा मास्टर! रेलवही के हद मा कोन झंझट करे आही, तेमा देहात के मनखे।
गंजेड़ियाः- जसोदा ला देख के मनेमन सोचत हवय- दुपहरिया फूल! बढ़िया बात! बइठ, बइठ आराम ले बइठ।
जसोदाः- जरा जल्दी मिस्त्री जी, सगुन के बेरा मा आप देर नीए।
गंजेड़ियाः- काहांॅ हे टेड़गा फाल?
जसोदा टेड़गा फाल ला देथे, गंजेड़िया ओला आगि मा डारथे, लाली होय के पाछू हेरथे,
धतुरियाः- सौ चोट लुहार के ता एक चोट सरकार के।
लाली टेड़गा फाल ला हेरके निहाई मा राखथे, ठनांग ठनांग ठनांग
जसोदा के मुड़ी के ओनढा घरि घरि सरक जाथे, फाल के पाछू भोथरी रांपा हेरथे।
धतुरियाः- ओनढा मा लुकाके अउ का का राखे हावय, न जाने अउ का का।
जसोदाः- लजात- बस इच रांपा हवय, अउ एकठन नानकन रांपा बना देथा ता, हंॅसिया ला मैंहर सिल मा टें लिंहा।
गंजेड़ियाः- बना दे धतुरिया, बना दे जो जो कहत हे सबो बना दे, रांपा के बेंट हामर मेर नी बनही।
धतुरियाः- अहू हर हो जाही, बड़खा बाकस मा कतकाकन जुन्ना बेंट हावय, धरा दिंहा।
गंजेड़ियाः- गांजा के दम लगात- धरा दे, धरा दे, तैंहर छांॅय मा बइठ गोरसवाली, बना दिही सबो ला, बना दे रे धतुरिया।
सबो बनाय के पाछू जसोदा कइथे।
जसोदाः- काल ले सिरीपंचमी के परसाद दिहां, केला अधपक्का हावय घर मा, गरीब हावन हामन।
गंजेड़िया:- कोन अमीर हे कोन गरीब हे, तोर गोसैंया भला गरीब हे, बस दस दिन हामन इहांॅ रबो, चाय बर पाव भर गोरस लागथे, परदेसी हन।
जसोदाः- पाव भर काबर, रोज मैंहर आधा सेर दे दिहांॅ।
धतुरिया बीड़ी छपचात, जसोदा के आघू मा एकठन बीड़ी फेंक दिस।
ज्सोदा:- मैंहर बीड़ी माखुर नी पीयों भइददा।
जसोदा जात हवय, गंजेड़िया ओला देखत हवय।
दिरिस्य:4
ठौरः- सिंघाय के घर
सिंघाय कंबल ओढ़ के सूतत हावय, पिंवरा धोती पहिर के माधो घुमत हवय।
जसोदाः- बबुआ तोर रांपा।
माधो खुस हो जाथे अउ आपन ददा ला बतात हवय।
माधोः- ददा, जल्दी बइलामला धो, दाई फाल ला सिद्धा करवा लीस हवय,
तोर रांपा मा घलो अंगरेजी बेंट हावय।
सिंघाय:- ऐं! माधो अउ रांपा ला छू के देखथे,- अरे माधो के दाई।
जसोदाः- इसने नींद हे तुंॅहर, अउ इसने का देखत हावस।
सिंघाय हड़बड़ात उठिस, जसोदा अंचरा मा लुकाय टोकरी आघू मा कर दिस।
सिंघाय:- फाल, अरे वाह, इसने धार, अउ ये तोर हंॅसिया, अउ मोर रांॅपा मा अंगरेजी बेट, माधो के दाई, अब आप का कहों, सचमुच तैंहर जादू जानथस।
जसोदाः- रहन दा, घंटा भर मा पांच घ मिजाज बदलथे मरद के, तुरत आंॅखि लालि करके लाठी चलात लाज अउ न दांत निपोरत , दूम हिलात लाज, गांव के मन नागर-बइला धर के निकलत हवय अउ तूंॅ सूतत हावा।
सिंघाय:- तियार होत हों तुरत।
दिरिस्यः 5
ठौर:- भांठा भिंया
कोटवारः- चला– चला– नांगर धरा चला— ए ए ए–हो –ओ ओ ओ —
गांव के जुन्ना रीत हवय, का बारा नांगर जोतोइया बड़खा अउ का एक नांगर जोतोइया छोटे, सबो किसान एक संग नांगर ठाढं करिही।
मनखे1ः- नंगरिहा सबो आगिन, सिंघाय ला छांॅड़के।
मनखे2ः- सिंघाय ला छूटेच समझा।
मनखे3ः- आवत हे, सिंघाय घलो आवत हे।
मनखे4ः- टेड़गा फाल ले सिरीपंचमी करही, टेड़गा फाल ले।
सिंघायः- खांॅध ले नांगर ला उतार के- भगवान के नजर टेड़गी झन होय, फेर फाल ता फाल, सिंघाय के बाल ला घलो टेड़गा नी करे सके कोन्हों।
मनखे1ः- सिरतोच, फाल घलो सिद्धा हावे अउ रांपा के बेंट, बेंट मा पालिस हे, ओकर बेटा के रांपा हर तो अउ फेंसी हवय, लाली बेट, अंगरेजी बेंट।
सिंघाय:- अंगरेजी नीही, जरमनियांॅ, पूजा के पहिली कोन्हों झन छुआ भई, हामन गरीब मनखे काहांॅ ले अंगरेजी बेंट लाबो।
जसोदाः- पूजा करे बर बइठे हावा ता, पूजा करा, अंगरेजी फारसी पीछू छांॅटिहा।
सिंघाय हर पूजा करिस, नांगर जोते के पाछू, जसोदा अठन्नी अउ आमा पान बांधिस, जसोदा अठन्नी साही चमकत हावय, सिरीपंचमी की रात मा होरी गात सिंघाय के ढेंटू में सबो ले जादा रस हवय।
दिरिस्यः6
ठौरः- गांॅव के खोर
मनखे1ः- सगुन सुभ कइसे होइस?
मनखे2ः- माधो के दाई मा नवा चोली बिसाय हवय।
मनखे3ः- माधो के कुरता बाघ छाप कपड़ा के हवय।
मनखे4ः- माधो के दाई चार घंटा ले बइठे रइथे, मिस्त्री मन करा।
मनखे1ः- जेहर बिगड़े सगुन सुभ करिस, ओकर मन राखे बर परे होही।
मनखे2ः- आधा सेर गोरस के दाम तीन घंटा मा मिलथे का? सिंघाय बेखबर हवय।
मनखे3ः- कड़ा पानी के फाल हावे ओकर हर, खूबेच गहियर जोतथे।
मनखे4ः- खेत मा कड़ा होय ले का? घर मा तो माटी के लोंदा होत हवय सिंघाय।
दिरिस्यः 7
ठौरः- लुहारसार
कालू कमारः- आप तो इ गांव मईलोग मन फाल पिटवायबर जात हावय। रेलवे के लुहार के इहांॅ।
मनखे5ः- मइलोग मला झन कहा, एकझन के चलते सबोझन ला बदनाम झन करा, सबो के मईलोग मन हाट बाजार मा सौदा बेचत बिसात हावय, अकारन कोन्हों ला दोख झन देवा, सिंघाय ले कुछू ले दे के निपटारा कर लेवा कालू।
कालू कमार कलेचुप लोहा ला लाली करत हवय।
दिरिस्य:8
ठौरः- खेत के पार
सिंघायः- कुकुर साला! नी देखत हस, मोर खेत मा तोर बइला चरत हवय।
हरखूः- सिंघाय जरा धीरे बोल, जान बूझ के मैंहर, तोर खेत मा नी छांॅड़े हावों, जनावर हे हारा चारा के लालच लगीस होही तरी मा उतर गिस।
सिंघायः- पर तैंहर का करत रेहे रे कुकुर साला।
हरखूः- चुप रह सिंघाय, ये रेलवे के गरमी बड़ देर नही रहय तोर।
रेलवे के गरमी सुन के सिंघाय कठवा साही हो गिस, ओकर बात ओकर दिल मा लग गिस।
दिरिस्य:9
ठौर:- सिंघाय के घर
जसोदाः- सिरीपंचमी के सगुन तो होगिस, एकोदिन मिसतरी मन ले भेंट कर आथे।
आजेच कहत रिहिन मिसतरीमन।
सिंघाय:- आज अबेर मा खैनी तमाखू देबर हवय मिसतरी मला।
जसोदाः- आप अबेर कुबेर के मैंहर तो नी जांव खैनी तमाखू लेके।
सिंघाय:- आज मंॅइच हर जात हवौं, देखंव तोर रेलवे मिसतरी मनला।
हरखू के बात ठीक हवय की तोर, आजेच देखे बर हवय, माधो काहांॅ गिस हे, तैंहर आज उदास काबर हस माधो के दाई, एती सुन तो जरा।
जसोदा मुचमुचाथे।
दिरिस्य:10
ठौरः रेलवे पुल के तीर
सिंघायः- राम राम मिसतरीजी, मैंहर माधो के ददा हावों।
गंजेड़ियाः- राम राम , माधो के ददा।
धतुरियाः- गोरसवाली के घरगोसैंया?
गंजेड़ियाः- ओ ओ, गोरसवाली के घरगोसैंया? टेड़गा फालवाला। बइठा बइठा का नांव हे तोर।
सिंघाय:- मोर नांव सिंघाय कहार हवय।
गंजेड़ियाः- ओ ओ, पर सिंग रहत घलो, ओ ओ, कहार न हो, तोर गांव के कमार के का नांव हे, कालू कमार, ओ ओ, बस एके लइका, पहिला बेटवा, ओ ओ, भैंसिन तोर दुधारी हावय, दू सेर दूध देथे, ओ ओ, कुसियार के घलो खेती करथा।
सिंघायः- मनेमन- बड़ रसिया हवय, डोकरा मिसतरी हर, गोरसवाली।
चाहा पिलाथें, सिंघाय पहिली घ चाहा पिअत हे, पहिली पीते पिअत हांेठ हर जर जाथे। दूनों हांसथे।
गंजेड़ियाः- ओ ओ, फूंॅक के पिया, देखत हवौं तोर ले हुसियार तोर गोसानिन हर हावय।
तीनों झन गांजा पीथे।
सिंघायः- हामन सधारन किसान नी होवन, राज कहार अन, हामर पुरखा मन राजा रानी ला ढोंय डोली मा, मैंहर आइ साल ले अखाड़ा के माटी ला मोर देंहे मा पचोय हवौं, भैंसिन के गोरस–।
गंजेड़ियाः- ओ ओ, बड़खा बड़खा अखाड़ा के पहलवान घलो मईलोगन के फेर मा परके, एक साल मा चित पर जाथे, समझे, मईलोग का हवय लोहा ला गला देथे।
धतुरियाः- भैंसिन के गोरस अउ अखाड़ा के माटी के मुंॅहूजबानी बयान खूब सुनेन, दू हथोड़ा चलाहा ता जानबो।
सिंघाय मुड़ी मा पागा बांध के हथोडा चलाय बर लागिस।
गंजेड़ियाः- ओ ओ, संभाल के ए ए ए।
धतुरिया के हाथ ले संड़सी सहित लोहा छूटके छिटक जाथे, बाल बाल बांचथे सिंघाय के जवनी गोड़।
गंजेड़ियाः- ओ ओ, ऐसी देह वाले का फाल टेड़गा कर देत हवय, गांव के कमार लुहार, का धरिस हवय, गांव मा, सहर मा तोर जइसने मनखे कमा के साल मा मगरमस्त हो जाथे। हामर साहब अबड़ बढ़िया मनखे हावंे, ओकर तोर जइसने बड़ जवान मला नौकरी दिलाय हवय, तैंहर गांव मा आपन हाड़ा बेकार गंवात हावस, तैंहर सोच बिचार के देख, घर बाहिर मिलाकर राय बात करे।
सिंघायः- कइसने राय बात, गांव छांॅड़े के, माधो के दाई ले, सहर जाय के बात घर मा सुनाके घर मा झगरा कोन मोल लेय, एक तो मोर गोसानिन, सहर अउ सहरवाला मन ले चिढ़े रइथे। दूसर हामन ठहरेन गांव गंवई के मनखे, खेत कोठार मा बेकार परे रइबो ता कोन्हों बात नीए, सहर मा तो–।
धतुरियाः- तोर गोसानिन तो कहत रिहिस, गांव ले बाहिर नी जाय मोर गोसैंया।
सिंघायः- सहर के आदमी के का परतीत, हांॅस हांॅस के बात करिही, करेजा भीतर हाथ धरिही, गांव के बहू बेटी का जाने?
गंजेड़ियाः- ओ ओ गोरसवाली।
सिंघायः- गोरसवाली झन कहा, बड़ खीख लागथे सुने मा।
सिंघाय घर लहुंॅटत राम राम कहे बर भूला गिस।
धतुरियाः- काल ले जल्दी भेज देबे गोरस लेके।
सिंघायः- कल गोरस नी होय।
दिरिस्य: 11
ठौर:- लुहारसाय
कालू कमार काम करत हावय, सिंघाय कहार आथे।
कालू कमार:- मैंहर घलो तोर मेर मिलके बात करे बर चाहत रेंहे। फेर तोर घर के बोहो हर कुसियार छीन के बेपानी कर दिस मोर गोसानिन ला। नीही ता तइंच कह, कभू खैन के तकाजा करे हवौं।
कमलाः- अहा हा, सिंघाय ला दोख झन देवा कोन्हों, मनखे नीही मिसरीकंद हे, फेर आप जान द का कहों, कतक झन कतक बात करथें, रेलवे मिसतरी मन के का ठिकाना।
कालू कमार:- फेर एक लइकावाली मइलोग, डोकरी नीही। जवान जहान के मति हवय आभी, फेर तोर गोसानिन तो लछमी हवय, लछमी।
कमलाः- लछमी सिंघाय ल लेके सहर उड़े बर कल कांटा ठीक करोइया बोहो।
कमला जाथे।
सिंघाय:- एकठन बात हावय, आपन लइका के सपथ खा के कहत हवौं, काकरो सो नी कइबे, रेलवे के बात हवय, इकरे खातिर थोरकुन डरात हवौं, पुल के तरी पानी मा लोहे के नान नान टूटे ला डाल देथे काम करत करत।
कालू कमार:- काहांॅ पुल के तरी, पानी मा, जरूर वो लोहा हाट के लुहार के पेट मा जाही, कब तक काम चलही इहें।
सिंघायः- बस काल तक। रात के वोमन माइल घर मा चल देथें। मोर बर एक ठन टंगिया बना देबे कालू भईददा।
कालू कमारः- एकठन टंगिया, चल पहिली कुछू खा पी ले, फेर बात करबे।
कमला खाना परोसथे।
कमला:- तोर ले खैन धान कोन मांॅगत हवय, हमनला हिरदे के भूख हवय।
दिरिस्य: 12
ठौर:- लोहार सार
रेलवे ले दुनों लोहा चोरी कर घर लाथंे।
कालू कमार:- तैंहर हथौड़ा चला देबे ता चार भाग मा एक भाग तोर हो जाही, लकरी के बूता मा मोर दुनों लइका के देंहे खराब होगे हे, चार हथौड़ा नी पीट सकें, कोयला मोर घर मा बड़ हवय।
सिंघाय मान गिस, दुनों बूता करे लागिन।
कालू कमार:- वाह सिंघाय भई, आप आज रहन दे, बिहान पहा गिस, तोर गोसानिन सिरतोच लछमी हावय, ओहर का जतन ले तोर देहे ला पालीस हावय, इहांॅ तो साली–।
सिंघाय:- चिलम तियार करत- का बिहनिया मइलोगमन के बात लेके सुरू कर दे, घटरमेन!
कालू कमार:- नीही सिंघाय भईददा, मईलोगमन के बात मा परके मैंहर तोर सो मनमुटाव कर लें, अउ मइलोग हर तोर बिगड़े सगुन ला सुधार दिस, मइलोग मइलोग के बात हवय।
सिंघायः- पहिली अंदाज बताव कि कतका हिसाब बनिही?
कालू कमार:- तैंहर निस्चिन्त होके आप जा घर, आराम कर, तोर गोसानिन रात भर नी सूते होही।
दिरिस्य:13
ठौर:- सिंघाय के घर
सिंघाय आथे, जसोदा सूतत हवाय, जगाथे।
जसोदाः- हे भगवान! खूब हस तैंहर, संझा के तारा उगे ले बिहनिया के तारा के बूड़े तक टकटकी लगाय बइठे हवौं, माधो भूख मरत सुत गिस, काहांॅ रहा माधो के ददा रतिहा भर।
माधोः- सपनात हवय – मोर रांपा कोन्हों झन लिहा।
सिंघाय:- चुप रे।
जसोदाः- तोर देंहे ले लोहाइन गंध आत हावय, गोड़ मा जिहां तिहां खोमचाय हवय, हाथ हे राम, हाथ मा अतका फोरा कइसे हावय।
कुकरा बासिस, सिंघाय के नाक बाजिस।
दिरिस्य: 14
ठौर:- सिंघाय के घर
सिंघायः- माधो के दई, बइठ, तोर जी गांव मा नी लागत हवय, सहर जाय बर चाहत हस, बोल इहांॅ का धरिस हवय? कह ना सबो कुछू?
जसोदाः- का होगिस तोला, कह ना, कइसने अलच्छन भरे बात करत हावा, सहर जाय बर रथिस ता सिरीपंचमी के सगुन काबर? मोला का लक्का परेवा समझत हावा, उढ़ियाय बर छटपटात हवय जी मोर, माधो के ददा, इसने मोर कोति झन देखा आप, सच कहत हावों सिल मा माथा कूट के मर जाहांॅ मैंहर, मोला चार लाठी मार लेवा, फेर इसने बात झन करा।
सिंघायः- हांॅस के – कालू तोला ठीक जानिस हावय।
जसोदा:- दूसरमन के बात मा परके–।
सिंघाय जसोदा के गरदन ला धरके झिंझोड़िस, जसोदा के चूंदी बिछागिस।
सिंघायः- मोर का आपन आंखी नीए बही, एती सुन तो–।
सिंघाय जसोदा के मुंॅहू ला निहारत रहय।
जसोदा:- छिः माधो के ददा, का होगिस तुंहला, रोत काबर हावा?
माधो रांपा ले तुलसी के एकठन बिरवा उखान लानिस हावय।
माधो के ददा, एती देखा, माधो ला देख के कहा, आप कभू इसने काम नी करों, तैंहर सोच, तैंहर बने करे हस।
सिंघायः- तैंहर फेर बिहनिया, गोरस देबर गे रेहे पुलिया के तीर।
जसोदाः- हांॅ गे रेंहे, उहांॅ कोन गोरस लेथिस आज, दुनों मिसतरी के मूंॅहू सुखाय रिहिस, मोला डोकरा मिसतरी हर पूछिस, कालू कमार ले तोर गोसैंया के मेल होगिस का?
सिंघायः- तैंहर का कहे?
जसोदा:- मैंहर का जानो?
सिंघायः-ओ ओ।
जसोदाः- फेर तोला बताय बर परही, बोला फेर इ रस्दा मा गोड़ झन धरिहा, माधो के ददा।
सिंघाय हर तुलसी के बिरवा हाथ मा लिस, माधो ला कोरा मा लेके किहिस।
सिंघायः- बबुआ, तैंहर फाल रांपा छांॅड़, सिलेट पिसिल धर, हामन बइला सही रेहेन, बइला के बुद्धि।
माधो:- आज तुलसी ला जगान दे पहिली ददा।

सिरीपंचमी के सगुन – फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी से
एकांकी रूपान्तरण- सीताराम पटेल

ठेंसा

जान चिन्हार:
सूत्रधार, सिरचन, बेटा, दाई, नोनी, बड़की भौजी, मंैझली भौजी, काकी, मानू
दिरिस्य:1
सूत्रधारः- खेती बारी के समे, गांॅव के किसान सिरचन के गिनती नी करे, लोग ओला बेकार नीही बेगार समझथे, इकरे बर सिरचन ला डोली खेत के बूता करे बर बलाय नी आंय, का होही ओला बलाके? दूसर कमियामन डोली जा के एक तिहाई काम कर लीही, ता फेर सिरचन राय रांॅपा हलात दिखही, पार मा तौल तौल के पांय रखत, धीरे धीरे, मुफत मा मजूरी दे बर होही, ता अउ बात हावय।——- आज सिरचन ला मुफतखोर, कामचोर, चटोर कह ले कोन्हों, ओकरो एक दिन समें रिहिस, फेर ओकर कुरिया तीर बड़खा बड़खा बाबूमन के सवारी बंॅधे रहय, ओला मनखेमन पूछतेच नी रिहिन, ओकर खुसामद घलो करें।——– अरे! सिरचन भाई! आप तो तुंहरेच हाथ मा ये कारीगरी रह गे हावय, इलाका भर मा, एको दिन समे निकाला, काल बड़खा ददा के चिट्ठी आय हावय सहर ले, सिरचन करा ले ऐ जोेड़ा चिक बना के भेजिहा।
दिरिस्य: 2
ठौर: हवेली
दाईः- जा बेटा, सिरचन ला बला के लानबे।
बेटाः- भोग मा का का लागही?
दाईः- हांॅसके कइथे – जा जा बेचारा मोर काम बर पूजा भोग के बात नी करय कभू।
बेटाः- नीही दाई, बाम्हनटोली के पंचानंद चैधरी के छोटे लइका ला एक घ मोर आघू मा बेपानी करे रिहिस सिरचन हर, तोर भौजी नख ला खोंटके तरकारी परोसते अउ अमली के रस डाल के कढ़ी ला तो हामन कहार कुम्हार के घरवाली बनात हे, तोर भौजी काहांॅ ले बनाईस।
दिरिस्य: 3
सूत्रधार:- मोथी घास ले औ पटवा के रंगीन सीतलपाटी, बांॅस के तीली ले झिलमिलाती चिक, सातरंग के डोर के मोढ़े, भूसी चुन्नी राखे बर मूंॅज की डोरी के बड़खा बड़खा जाला, नंगरिहा मन बर ताल के सूख्खा पान के छतरी टोपी अउ इसने बड़ काम हावय जेला सिरचन के छांॅड़ कोन्हों नी जानय, ये दूसर बात हावय आप गांव मा इसने काम ला बेकाम के काम समझथे, बेकाम के काम जेकर मजूरी मा अनाज अउ पैसा दे के कोन्हों जरूरत नी ए, पेट भर खवा देवा, काम पूरा होय मा एकाध जून्ना फून्ना कुरता देके बिदा करा, वो कुछू नी कहय, कुछू नी किही इसने बात घोलो नी ए, सिरचन ला बलाइयामन जानत हावय, सिरचन बात करे मा घलो सिरचन हावय, मोर बात हर कोन्हों बिस्वास नी आत होही ता देखा।
दिरिस्य: 4
नोनीः- रूक! मैंहर दाई ला कहत हों, अमका बड़खा बात।
सिरचनः- बड़खा बात हावय, बेटी! बड़खा लोगमन के बातेच हर बड़खा होथे, नीही ता दू पटेर के पाटीमन के काम सिरिफ खेसारी के सत्तू खवाकर कोन्हों करवाथे भला? येला तोर दाई हर करवा सकत हावय बबूनी!
दिरिस्य: 5
दाईः- सिरचन ला देखके,- आवा सिरचन आवा, आज माखन मथथ रेंहे, ता तुंहर सूरता आगिस, घी के करोनी के संग चिवरा तुंहला अबड़ पसंद हावे ना, अउ बड़खा बेटी हर ससूराल ले किहिस हावय, ओकर नंनद रिसाय हावय, मोथी के सीतलपाटी बर।
सिरचनः- मूंहू ले लार ला ढोंकत- घी के कहरई सूंघ के आय हावों काकी!नीही ता इ सादी बिहा के मौका मा दम मारे के घलो फुरसत काहांॅ मिलत हावय?
दिरिस्य: 6
सूत्रधार:- सिरचन जाति के कारीगर हवय, मैंहर घंटों बइठ के ओकर काम करे के ढंग देखे हावों, एक एक मोथी बउ पटेर को हाथ मा लेके बड़े जतन ले ओकर कुच्ची बनाथे, फेर कुच्चीमन के रंगे ले सुतली सुलझाय मा पूरा दिन खतम, काम करत बेरा ओकर लगन मा थोरकुन बाधा पड़ही ता गहुंॅआ सांॅप जइसने फुंॅकारही, फेर दूसर ले काम करवा लेवा!सिरचन मूंॅहजोर हावय, कामचोर नी होय। बिना मजूरी के पेटभर भात मा काम करवइया कारीगर! गोरस मा गूर नी मिलही कोनें बात नीए, फेर बात मा थोरे झार वोहर बरदास्त नी करे सके, सिरचन ला लोगबाग चटोर घलो कइथे, तली बघारी तरकारी, दही के कढ़ी, साढ़ीवाला गोरस, ये सबो ला ले आनबे, फेर सिरचन बलावा, दूम हिलात हाजिर हो जाही, खाय पीये मा चिक्कन मा कमी होही, ता काम के सबो चिकनाई खतम। काम आधा करके उठ जाही, आज तो आप अधकपारी ले माथा छनछनात हावय। थोरकुन बांॅचे हावय, कोन्हों अउ दिन आके पूरा कर दिंहा, — कोन्हों दिन माने कभू नीही।
दिरिस्य: 7
बड़की भौजीः- मानू नंनद खत आय हावय।
मानूः- काहां ले?
बड़की भौजीः- काहांॅ ले , के का मतलब, तोर ससूराल ले दुल्हा हर लिखे हावे, मानू के संग मिठाई नी आही, कोन्हों बात नीए,
मानूः- जल्दी जल्दी पढ़ा न, अउ का लिखें हें।
बड़की भौजीः- धीरज धरा महारानी, लिखें हें, तीन जोड़ी फेसनेबल चिक अउ पटेर की दू सीतलपाटी के बिना मानू आही ता बैरंग वापस।
दिरिस्य: 8
दाईः- देख सिरचन! इ दारी नावा धोती दिहां। असली मोहरछाप के धोती। मन लगाके इसने काम करा कि देखेवइया मन देखत रह जांय।
सिरचन:- काकी हामर काम मा कभू खोट नी मिलय, मैंहर काम ला तन मन लगाके करथों।
दाई चल देथे, सिरचन काम मा लग जाथे, डेढ़ हाथ के बिनाई ला देखके मनखेमन समझगिन कि इ बेरा एकदम नावा फैसन के चीज बनत हावय, जो आघू कभू नीं बनीस हे।
मैंझली भौजीः- पहिली इसने जाने रइथे मोहरछाप के धोती दे ले बढ़िया चीज बनथे ता महूंॅ मोर भईददा ला कह देथें।
सिरचनः- मोहरछाप धोती के संग रेसमी कुरता देय मा घलो इसने चीज नी बने बोहरिया, मानू दीदी काकी के छोटे बेटी हवय, मानू दीदी घर के दामाद अफसर हवय।
काकीः- काकर मेर गोठियात हस बोहरिया? मोहरछाप धोती नीही, मूंॅगिया लड्डू! बेटी के बिदाई के बेरा रोज मिठाई खाय बर मिलही, नी देखत हस।
दिरिस्य: 9
बेटाः- दाई आज दूसर दिन चिक के पहिली पांॅति मा सात तारा जगमगात हावें सात रंग के। सतभैया तारा, आज सिरचन ला कलेवा कोन दे हवय, सिरिफ चिंवरा अउ गुर।
दाई:- मैंहर एकेझिन काहांॅ काहांॅ काला काला देखों, अरी मैंझली सिरचन को बुंॅदिया काबर नी देत हस?
सिरचनः- मूंॅहू मे चिंवरा भरे, बुंॅदिया मैंहर नी खांव काकी!
मैंझली भौजी कड़कड़ात आके मूट्ठी भर बुंॅदिया सूपा मा फेंक के चल देथे।
सिरचनः- पानी पी के,- मैंझली बोहरिया, आपन मइके ले आय मिठाई ला इसने हाथ खोल के बांॅटथस का?
मैंझली भौजी रोवत हवय, काकी दाई करा जाके चबाथे।
काकीः- छोटे जात के मुंॅहू घलो छोटे होथे, मुंॅहू लगाय मा मुंड़ी मा चेघथे। काकरो मइके ससुराल के गोठ काबर करिही ओहर?
दाईः- कड़कके- सिरचन तैंहर काम करे बर आय हस काम कर, बोहरिया मन करा बतकुट्टी करे के का जरूरत। जे चीज के जरूरत हे मोर करा कह।
दाई चल देथे, सिरचन के मुंॅहू लाल हो गे, ओहर कोन्हों जवाब नी दीस, बांॅस मा टांॅगे आधा चिक मा फान्दा डाले लागिस।
मानूः- पान के बीड़ा देत,- सिरचन बोबा, काम काज के घर! पांॅच किसिम के लोग पांॅच किसिम के बात करिही, तैंहर काकरो गोठ मा कान झन देबे।
मानू चल देथे।
सिरचन:- छोटी काकी, थोरकुन आपन डिबिया के गमकौआ माखुर तो खवाबे, बड़दिन होगिस–
काकीः- मसखरी करथस? तो बाढ़े जीभ मा आगि लगे, घर मा घलो पान अउ गमकौआ माखुर खाथस? चटोर काहांॅ के!
सिरचन आपन सबो कुछू ला धर के अंगना से बाहिर निकल गे।
काकी:- ददा रे ददा! अतकी खरखर! कोन्हों मुफत मा काम नी करय, आठ रूपया मा धोती आथे। इ मुंॅहझौंसे के मुंॅहूंॅ मा लगाम हे ना आंॅखि मा सील। पैसा खरच करे ले सैकड़ो चिक मिलही, बातरटोली के मईलोगन मन मुंॅड़ी मा गट्ठर बोहके खोल खोल घूमत हवय।
मानू कुछू नी किहिस, कलेचूप आधा चिक ला देखत रिहिस।
दाईः- जान दे बेटी, जी छोटे झन कर मानू! मेला ले बिसाके भेज दिंहा।
दिरिस्य: 10
बेटाः- सिरचन बोबा चला!
सिरचन:- बबुआजी आप नीही! कान धरत हों आप नीही! मोहरछाप धोती लेके का करिहांॅ, कोन पहिनीही। ससुरी खुद मरीस, बेटा बेटीमला घलो ले गिस, बबुआ मोर घरवाली जिन्दा रथिस ता मैंहर इसने दुरदसा भोगथें, ये सीतलपाटी ओकरे बिने हावय, इ सीतलपाटी ला छू के कहत हों, आप ये काम नी करांे, गांव ीार मा तुंॅहरे हवेली मा मोर कदर होत रिहिस,आप का?
बेटाः- मने मन- समझ गें कलाकार के दिल मा ठेंसा लगे हवय, वोहर नी आय।
दिरिस्य: 11
बड़की भौजी:- आधा चिक मा रंगीन छींट के झालर लगात- ये घलोक बेजा नी दिखत हवय मानू?
मानू कुछू नी किहिस
बेटाः- काकी अउ मैंझली भौजी के नजर नी लाग जाही ऐमा घलो।
दिरिस्य: 12
ठौर: टेसन
सिरचनः- बबुआ जी!
बेटा:- का हे?
सिरचन:- पीठ मा लादे बोझा ला उतार के, – कूदत आय हावों, दरवाजा खोला,
मानू दीदी काहांॅ हावय, एक घ देखों।
मानूः- सिरचन बोबा!
सिरचनः- येहर मोर लंग ले हवय, सबो चीज हवय दीदी, चिंक अउ एक जोड़ी आसनी कुश ।
मानू दाम देबर धरथे, सिरचन हर जीभ ला दांॅत मा काट के दूनों हाथ ला जोड़ दिस, मानू किल्ला किल्ला के रोवत हे, बेटा बंडल ला छोरके देखथे, इसने कारीगरी, इसने बारीकी, रंगीन सुतलीमन के फान्दा के काम, पहिली बार देखत रिहिस।
परदा गिरथे।

ठेस कहानी- फणीश्वर नाथ रेणु
एकांकी रूपान्तरणः- सीताराम पटेल