Category: पर्यटन

भोरमदेव – छत्तीसगढ़ के खजुराहो

हमर देश में छत्तीसगढ़ के अलग पहिचान हे। इंहा के संस्कृति, रिती रिवाज, भाखा बोली, मंदिर देवाला, तीरथ धाम, नदियां नरवा, जंगल पहाड़ सबके अलगे पहिचान हे।
हमर छत्तीसगढ़ में कोनों चीज के कमी नइहे। फेर एकर सही उपयोग करे के जरुरत हे। इंहा के परयटन स्थल मन ल विकसित करे के जरुरत हे।
बहुत अकन परयटन स्थल के विकास अभी भी नइ होहे। जब तक सरकार ह एकर ऊपर धियान नइ दिही तब तक एकर विकास नइ हो सके।
कबीरधाम जिला में एक जगा हे भोरमदेव एला छत्तीसगढ़ के खजुराहो भी कहे जाथे। काबर कि जइसे खजुराहो के मंदिर में चित्रकला उकेरे गेहे ओइसने चित्रकला इंहा के मंदिर में भी देखे बर मिलथे।
भोरमदेव ह कवर्धा से 17 कि. मी. दूर घना जंगल के बीच में स्थापित हे।इंहा जाय बर पक्की सड़क बन गेहे अऊ मोटर गाड़ी के बेवस्था घलो हे। आजकाल जंगल भी कटा गेहे त जंगली जानवर के उतना डर नइहे ।
पहिली के सियान मन बताथे कि भोरमदेव के तीर में जाय बर आदमी मन डरराय। काबर कि उंहा घनघोर जंगल रिहिसे अऊ जंगली जानवर शेर भालू के डेरा रिहिसे। अब मनखे के आना जाना बाढ़गे अऊ जंगल ह कटागे त जानवर मन के भी अता पता नइ चले।
प्राचीन मंदिर — भोरमदेव मंदिर ह बहुत प्राचीन मंदिर हरे। मंदिर के अंदर में शिवलिंग स्थापित हे। इंहा के मूरतीकला अऊ सुंदरता ह देसभर में परसिद्ध हे।
एहा जैन, वैष्णव, शैव सबो मत के आदमी के तीरथधाम हरे। इंहा सब परकार के मूरती लगे हुए हे।
ये मंदिर ल नागवंशी राजा देवराय ह 11 वीं सताब्दी में बनवाय रिहिसे।

भोरमदेव नाम कइसे परीस — भोरमदेव नाम के पिछे कहे जाथे कि गोंड राजा मन के देवता शिवजी हरे, जेला बूढ़ादेव, बड़ेदेव अऊ भोरमदेव भी कहे जाथे । एकरे सेती एकर नाम भोरमदेव परीस ।

कला शैली — मंदिर के मुंहू पूर्व दिसा के डाहर हे। ए मंदिर ह नागर सैली के सुंदर उदाहरन हरे। मंदिर में तीन तरफ से परवेस करे जा सकथे। एला पांच फूट ऊंचा चबूतरा में बनाय गेहे। अइसने मंदिर बहुत कम देखे बर मिलथे।
मंडप के लंबाई ह 60 फूट अऊ चौड़ाई ह 40 फूट हे। मंडप के बीच में चार खंभा अऊ किनारे में 12 खंभा बनाय गेहे। जेहा मंदिर के छत ल सम्हाल के रखे हे। सब खंभा में बहुत ही सुंदर चित्र बनाय गेहे।
मंडप में लछमी बिसनु अऊ गरुड़ के मूरती रखे गेहे। भगवान के धियान में बइठे एक राजपुरुस के मूरती भी रखे हुए हे।

गर्भगृह — मंदिर के गर्भगृह में बहुत अकन मूरती रखे गेहे अऊ एकर बीच में शिवलिंग स्थापित करे गेहे।
पंचमुखी नाग अऊ गनेस जी के मूरती भी रखाय हे।

बाहरी दीवार — मंदिर के चारो डाहर बाहरी दीवार में शिव, चामुंडा, गनेस, लछमी, बिसनु, वामन अवतार आदि के मूरती लगे हुए हे।

मड़वा महल — भोरमदेव मंदिर से एक किलोमीटर के धुरिहा में एक ठन अऊ शिव मंदिर हे जेला मड़वा महल या दूल्हा देव मंदिर के नाम से जाने जाथे।
ए मंदिर के निरमान ल 1349 ई. में फनी नागवंशी शासक राजा रामचंद्र देव करवाय रिहिसे।
कहे जाथे ए मंदिर के निरमान ल अपन बिहाव के उपलक्छ में करवाय रिहिसे। माने ओकर बिहाव ह इही जगा में होय रिहिसे।
मड़वा के मतलब होथे मंडप। जेला बिहाव के समय में बनाय जाथे। स्थानीय बोली में एला मड़वा कहे जाथे। एकरे पाय एला मड़वा महल के नाम से जाने जाथे।
मड़वा महल के बाहरी दीवार में 54 ठन कामसूत्र के मूरती उकेरे गेहे। एकर माध्यम से समाज में स्थापित गृहस्थ जीवन के अंतरंगता ल दरसाय गेहे।

छेरकी महल — भोरमदेव मंदिर के दक्षिन पश्चिम दिशा में एक किलोमीटर के धुरिहा में एक अऊ मंदिर हे जेला छेरकी महल के नाम से जाने जाथे। ए मंदिर के निरमान भी फनी नागवंशी राजा के शासन काल में होहे।
अइसे बताय जाथे कि ए मंदिर के निरमान ल बकरी चरवाहा मन के लिये बनाय गे रिहिसे। ताकि बकरी चरात चरात इंहा बइठ के सुरता सके।
छत्तीसगढ़ी में बकरी ल छेरी कहे जाथे। एकरे पाय ए महल के नाम छेरकी महल परे हे।

भोरमदेव महोत्सव
— भोरमदेव के विकास करे बर सरकार ह हर संभव परयास करत हे। इंहा के सुंदरता ल बढ़ाय खातिर अऊ परयटक मन ल आकरसित करे बर चैत मास में भोरमदेव महोत्सव के भी आयोजन करे जाथे। जेमे छत्तीसगढ़ अऊ बाहिर के कलाकार मन ह आके अपन कला के परदरसन करथे।

आवासीय सुविधा — इंहा परयटक मन के लिए रुके के भी बेवस्था करे गेहे। लोक निरमान विभाग ह विसराम घर भी बनाहे ।जिला मुख्यालय कवर्धा में भी विसराम घर, होटल अऊ लाज के बेवस्था हे।

पहुंचे के रास्ता — भोरमदेव रायपुर से 135 किलोमीटर के दूरी में हे। दुरुग भिलाई से भी लगभग ओतकीच धुरिहा परही।
इंहा जाय बर पक्की सड़क अऊ यात्री बस के सुविधा हे।

महेन्द्र देवांगन “माटी”
गोपीबंद पारा पंडरिया
जिला – कबीरधाम (छ. ग)
पिन- 491559
मो.- 8602407353
Email -mahendradewanganmati@gmail.com

भोलेनाथ के गुफा चैतुरगढ़़






गरमी के मउसम आते मन होथे चलव कहूं घूमे-फिरे, सैर-सपाटा बर। सुद्ध, सांत वातावरन अउ परदूसन मुक्त प्रकृति के तीर धर्मिक, ऐतिहासिक या सुघ्‍घर जगा म। आवव त आपमन ल परिवार समेत अइसने आनंदमयी, प्रकृति के धरोहर जगा म ले चलथन। फेर इहां जाय के पहिली एकठिन बात के खिलाय रखे बर परही भई। न कचरा-परदूसन फइलावन न कोनो ल फइलावन दन। समझ गेंव न, त फेर चलव।
पौरानिक कथा – भस्मासुर राक्‍छस ह भगवान भोलेनाथ के अराधना करके, औघड दानी ल परसन्न करके बरदान म भस्म कंगन लेके तीनों लोग म अखंड राज करहूं कहिके ठानिस। बरदान मिलिस तहां नियत बदल गे अउ वोहा भोलेनाथ ल भस्म करे बर दउडिस। भगवान आगू-आगू, पीछू-पीछू। ऐला देखके भगवान बिसनू ह पारवती दाई के मोहनी रूप धरके दूनो के बीच म आइस। भस्मासुर ह मोहनी तीर आइस तहां भगवान भोलेनाथ के एक ठिन गुफा म खुसर गे। मोहनी के नृत्यकला म पड़़के भस्मासुर भस्म होगे।
भगवान भोलेनाथ जेन गुफा म खुसरे रिहिस उही जगा ह चैतुरगढ ए। चैतुरगढ म भस्मासुर-संकर गुफा हे। इहां मां महामाया के दरसनीय मंदिर घलो हे। तीर म पहाडी हे। पहाडी के ऊपर तरिया हे। ये जगा ह धरम अउ कला के अद्वितीय संगम हे।
कइसे पहुचंय – बिलासपुर ले पाली 50 बिचुहचै अउ पाली ले चैतुरगढ 30 किलोमीटर दूरिहा हे। चैतुरगढ म ऐतिहासिक मंदिर हे। इहां बइसाख, जेठ म जाय सकथव। दिनभर रहि सकथव। उहां रात रुके बर बनबिभाग के रेस्ट हाउस घलो हे, फेर पहिली ले इजाजत ले बर परथे। ब्लाक मुख्यालय पाली म रुके बर रेस्ट हाउस, होटल, धरमशाला हे। इहां ले बिहनिया नौ बजे निकल के सांझकुन पांच बजे लहुट सकथव। इहां जाय बर पराइवेट टेक्सी मिलथे। चैतुरगढ ह अब्बड सुष्घर जगा हे।

शीतल प्रसाद पाटनवार
शिवाजी नगर, बिलासपुर





हिन्‍दी में पढ़ें ललित शर्मा के ब्‍लॉग में – चैतुरगढ: मैं कहता हौं आँखन की देखी — ललित शर्मा
पंकज सिंह जी पाली शिवमंदिर वाला चित्र भी ललित शर्मा जी के ब्‍लॉग से साभार



पर्यटन : माण्डूक्य ऋषि के तपोभूमि ‘मदकू द्वीप’




शिवनाथ नदी के सुघ्‍घर धार ले घेराय बीचो-बीच लगभग आधा कि.मी. के दायरा म फइले मदकू द्वीप “श्री हरिहर क्षेत्र केदार मदकू द्वीप” के नाम से प्रसिद्ध हवय। पुरातात्वीय अवशेष अउ रमणीक पर्यटल स्थल ‘मदकू द्वीप’ के स्तर जमाव ले प्रागैतिहासिक कालीन विविध पाषाण उपकरण के श्रृंखला मिलथे। इंहाँ 11 वीं सदी के स्थापत्य कला के अवशेष अउ प्रतिमा मन विद्यमान हवय। पारिस्थितिकी जैव विविधता पुरातात्वीय अवशेष अउ पर्यटन के संभावना ले भरपूर मदकू द्वीप ह जल दुर्ग सरीक आभासित होथे। अपन प्राकृतिक सौंदर्य अउ धार्मिक मान्यता के कारण ‘मदकू द्वीप’ पर्यटक मन बर आकर्षक के केन्द्र बने हवय।

शिवनाथ नदी के धार ले घेराय सुघ्‍घर द्वीप पारंपरिक रूप ले माण्डूक्य ऋषि के तपोभूमि होये के सेती “मदकू द्वीप के नाम से विख्यात अपन नाम ल सार्थक करथे। “मदकू द्वीप” ल आदिकाल ले पवित्र स्थल माने जात रहे हवय काबर की इंहा आके शिवनाथ नदी के धारा ईशान कोण में बहे लगे, ये दिशा ह वास्तु शास्त्र के नियम ले पबरित दिशा माने जाथे। शुरू म इंहा प्राचीन प्रतिमा जइसे -नंदी, राजपुरूष, योद्धा, आमलक अउ कलश आदि मिले रहिस हे वोकरे आधार म ये द्वीप म अनेक प्राचीन मंदिर के दबे होये के संकेत मिलत रहिस। इंहा के पुरातात्विक धरोहर ल उजागर करे खातिर पुरातत्व विभाग छ.ग.शासन ह सन् 2011 म खनन सुरू करीस।

खनन म बलुआ पथरा ले बने कुल 19 मंदिर के कतार अउ कई ठन पथरा के मूर्ति मिलिस जेकर तिथि लगभग 11 वीं ले 14 वीं सताब्दी आंके गईस जेन हा कल्चुुरी शासक मन के शासनकाल आय। एक मंदिर उमामहेश्वर अउ एक मंदिर ह गरूड म बईठे लक्ष्मीनारायण के आय। बीच के मंदिर ह सब ले बडका हवय जेकर मुह पश्चिम दिशा डहर हवय। बडका मंदिर के दूनो डहर 9-9 मंदिर के कतार हवय जेन आकार म छोटे होवत गे हवय इंकर मुंह पूरब दिशा डर हवय। अधिकांश मंदिर के गर्भगृह म योनी पीठ अउ स्मार्तलिंग स्थापित हवय। इंहा ले मिले मूर्ति म वेणुवादक कृष्ण, अम्बिका, नृत्य गणेश, महिषासुर मर्दिनी, उपासनारत राजपुरूष, योद्धा आदि उल्लेखनीय हावय। ये जघा के सबले विशिष्ट विशेषता 12 स्मार्त लिंग के मिलना आय जेकर ले ये सिद्ध होथे कि ये जा है स्मार्त पूजा के महत्वपूर्ण केन्द्र होये के संगे-संग धार्मिक सद्दिष्णुता के जीवंत उदाहरण रहिस। मंदिर मन बलुआ पथरा के बने स्थापत्य कला के अद्भुत उदाहरण हे। मंदिर के आघू म राजपुरूष मन के उपासक मुद्रा में मूर्ति हवय जेकर ले अइसन महसूस होथे कि रतनुपर के कलचुरि शासक के वंशज मन इंहा के मंदिर ल बनवाय हवय। इहां राजा प्रताप मल्लदेव (ई.सन1198 से 1218 ) के तांबा के एक ठन सिक्का घलो मिले हवय । खनन ले जानकारी मिलिस कि जम्मो पुराना मंदिर ह नदिया म आये बाढ के कारण ध्वस्त हो के दब गे रहिस।




नदिया मा बारहो महीना पानी रहिथे। छेरछेरा पुन्नी के दिन इंहा हिंदू मन के बडा भारी मेला भराथे जेमा सम्पूर्ण छ.ग.ले पर्यटक मन आथे। द्वीप के भीतर म अलग-अलग समाज के मन अपन-अपन इष्ट देव के मंदिर बनवाये हवय जेकर पूजा अर्चना छेरछेरा पुन्नी म करथे। वइसने फरवरी के महीना मा मसीही समुदाय के विशाल मेला इंहा भराथे जेमा देश के दूसर जघा ले मसीही समुदाय के श्रद्घालु मन आथे। मसीही समुदाय के मेला 100 बछर ले ज्यादा होगे हवय, अब द्वीप के दूनों डाहर शिवनाथ नदी म एनीकट के निर्माण होगे हवय जेकर ले पर्यटक मन वाहन सहित आसानी ले द्वीप के भीतरी म आ-जा सकथे। आधा कि.मी.म फइले द्वीप म चारो डहर रूख-राई उगे हे जेकर ले हरियाली अउ छाव के कमी नई हे। नदिया के पार म खड्डा होके द्वीप ल निहारना अद्भुत अनुभव कराथे। बेरा-बेरा म स्कूल और कालेज के पढईया लइका मन शैक्षणिक भ्रमण खातिर छ.ग.के विभिन्न हिस्सा ले आथे अउ ‘मदकू द्वीप’ के इतिहास ले परिचित होथे ।

पहुंचे के रद्दा :- छत्तीसगढ के राजधानी रायपुर अउ न्यायधानी बिलासपुर राष्‍ट्रीय राजमार्ग म स्थित बैतलपुर ले 4 कि.मी. दक्षिण-पूर्व दिशा, रायपुर-बिलासपुर रेल मार्ग म स्थित भाटापारा रेलवे स्टेशन ले 8 कि.मी. उत्तर-पूर्व दिशा म मदकू द्वीप स्थित हवय। ‘मदकू द्वीप’ में बारहों महीना बिना तकलीफ के बाईक से घलो पहुंचे जा सकथे। अब आवश्यकता ये बात के हवय के छत्तीसगढ सरकार ये द्वीप ल पर्यटन स्थल के रूप म पूर्ण रूप ले विकसित करय ताकि “मदकू द्वीप” छ.ग. के पर्यटन मानचित्र के संगे-संग राष्‍ट्रीय मानचित्र म अपन जघा सुनिश्चित कर सकय।

अजय ‘अमृतांशु’