Category: फिलमी गोठ

उल्‍हुवा पान : फिल्‍म समीक्षा – छत्तीसगढ़ी फिलिम राजू दिलवाला

फिलिम के हीरो प्रकाश अवस्थी जी के पहचान फिलिम में एक अलगे अंदाज म होइस हवे। ये फिलिम म धरम और जात बिरादरी ऊंच नीच के भावना ले दुरिहा पियार अउ मया के जेन रूप होथे तेन ला दिखाय गे हवे, अउ ये फिलिम म हमर स्वच्छ भारत अभियान के जेन मिशन हे तेखर बारे में भी बने किसम से समझाय गे हवे। फिलिम के गाना मन हर मज़ेदार हे अउ जेन लोकेशन हे तेहु भारी सुघ्घर हवे। फिलिम म मनाली के बर्फीला घाटी के जेन सीन दिखाय हे ते सीन मन फिलिम के रौनकता ला भारी बढा दे हवे। फिलिम के जम्मो कलाकार मन अपन अपन रोल म बहुत जँचत रहिन फेर फिलिम म हीरोइन के पिताजी (पुष्पेंद्र जी) के जेन रोल रहिस तेन जतका दमदार होना रहिस तेखर ले कुछ कम दिखिस, ये रोल हर भी फिलिम के मेन किरदार रहिस तेखर हिसाब से ज्यादा मज़ा नई आइस, लेकिन फिलिम हर हंसी, प्यार अउ मार धाड़ ले भरे हावय।




फिलिम म मोला सबले ज्यादा मज़ा हीरो के जेन संगी रहिस न जेन हर हर बात म कहय के ऐ समस्या के काय समाधान हे। तेखर रोल हर लगिस अउ फिलिम के हीरो के हीरोइन (शिखा चितांबरे जी) के घर जाके ओखर मन के घर म राउत नाचना हर लागिस। लेकिन फिलिम में एक बाप हर अपन बेटी ल जानसुधा मार सकत हे ता ओखर मयारू घर गोसाइयाँ के जिंदा बाहचना समझ म नई आइस। मोला लागथे के बंदूक म गोली ह एके ठक बहाचे रहिस या ये हर फिलिम के दूसर भाग बने के ओर संकेत देत हे। लेकिन कुल मिलाके फिलिम हर मया दुलार ले बने हे, जेन हर हमन ला सब धरम ले सम्मान करे ला सिखाथे।

रिंकू अग्रवाल
चांपा, छत्‍तीसगढ़
मो. 909822237


राजा छत्तीसगढ़िया 2 म हवय आज के कहानी

फिलिम के कहानी म एक परदेसिया अपन परिवार सहित छत्तीसगढ़ म आथे, इंहा आके छत्तीसगढ़िया किसान मेर गिड़गिड़ाथे नौकरी के भीख मांगथे। छत्तीसगढ़िया किसान ओकर दुःख ल देखे नई सकय, काबर कि छत्तीसगढ़िया मन सिधवा, भोला अउ दयालू रहिथेंं। ओ किसान ओ परदेसिया ल अपन घर म राख लेथे।




धीरे-धीरे ओ परदेशिया ह पूरा गांव के भोला-भाला छत्तीसगढ़िया मन के विश्‍वास ल जीतथे अउ ओ गांव के सरपंच बन जाथे। थोरकेच दिन म विधायक बन जाथे। अपन परदेशिया संगी मन संग मिल के ओ ह धीरे-धीरे गांव के सबो किसान मन के जमीन ल बिसा-बिसा के अपन डहर कर डारथे। जब ओ किसान ल पता चलथे की जेन ह ओ परदेशिया ल रहे-खाये बर आसरा देहे रहिस उहि ह नमक हरामी करत हे तब ओ ह परदेसिया के विरोध करथे। ओ परदेशिया ह ओ किसान के पीठ म छुरा भोंग देथे जउन वोला दुख म सहारा देहे रहिथे।




उनखरे राज चारो-मुड़ा छा जाथे, परदेशिया मन के सरकार चलेे लागथे अउ छत्तीसगढ़िया मन गुलामी अउ जी हुजूरी करेे लागथे।
ये फिलिम के जईसे छत्तीसगढ़िया मन ल अब अपन सिधवापन-भोलापन-दयाभाव ल सोच-समझ के देखाए ल परही नही त जानत तो हव सिधवा लकड़ी ह पहली कटाथे टेड़गा ल कोई नई काटे। जइसे फिलिम के कहानी हे ओसनहा छत्तीसगढ़ म होवत भी हे।
मैं तो कहत हंव के जम्मो मोर छत्तीसगढ़िया भाई बहिनी दाई ददा आपो मन एक बार जरूर जा के देखव। बोलथे न कवि जैसे देखते वैसे लिखथे अउ जनता संग जैसे घटना घटथे, डायरेक्टर ओसन्हे फिलिम बनाथे।
जय जय छत्तीसगढ़ महतारी
जय जय छत्तीसगढ़िया
सूरज निर्मलकर




जयंत साहू के गोठ बात : फिल्म सिनेमा एवार्ड बोहागे धारे-धार

छत्तीसगढ़ी सिनेमा म घलो अब पराबेट संस्था समूह डहर ले इनाम बांटे के प्रचलन सुरू होगे। बिते बखत पेपर म पढ़े बर मिलीस की छत्तीसगढ़ी सिने एवार्ड दे जाही। कोन कोन ह सम्मान के हकदार होही तेकर चुनई करे बर जुरी बने हे। जुरी म चुरी पहिनईया मन नही बल्कि पढ़े लिखे कलमकार मन हाबे। ये बात के गम पायेव त मन ल संतोश होइस की निर्णय सही-सही होही। काबर की सही निर्णायक के नइ रेहे ले इनाम ल अपने चिन पहिचान के आदमी ल देके परयास घलो रिथे। कभु कभु तो अइसे भी होथे की आयोजक के दबाव म निणर्य हो जथे। अब देखना हे कि ये एवार्ड ह जुरी के झलेरा म धारे धार बोहाथे या आयोजक के झलेरा म।
अब सज्जन आदमी के हैसियत ले काहवं त जुरी अउ आयोजक मन से गलत भी हो जही त उंकर कायच कर लेबो भइ अपन खुषी ले बाटत हे सही आदमी ल देवे चाहे करिया चोर ल देवेय आखिर अपने थइली झर्रा के देवथे। एवार्ड दे के पाछु सोच कुछू भी राहय फेर ओमन सिनेमा वाला कलाकार मनके मेहनत ल चिनहीस इही ल संहरावा। ईहा तो वोतको करइया नइये।
सुरू म षासन ह घलो इनाम बांट के सम्मान करे के बोहनी करे रिहीस। एक पइत लाहर लगा के हकर गे। कलाकार मन दुसरईया बरस फेर ओइसने आयोजन के अगोरा करत रिहीस। काबर ते ऊंकर मन के आगोरा के दिन पुरबे नइ करिस। अगोरत अगोरत जोजन परगे। सरकार करा चिज बस के खंगता नइये फेर काबर ए कोती धियान नइ देवथे तेला उही मन जाने। चलव कोनो होय धियान तो दिस अउ अपने थइली ल अलहोर के इनाम बांटे के परयास करिस।
निर्माता-निर्देषक संग कलाकार के मन म खुसी हमागे कि ओकर मेहनत के परछो दिखही। सुरवाती दौर म जब एको दू ठी फिलिम बनत रिहीस त लोगन मन बने मन करके देखत रिहीन। फिलिम ले आगु गाना के सीडी ह बजार म सुने बर मिल जवत रिहीस। कोनो कोनो निर्माता मन तो गाना के केसिट बेच के आधा पइसा वसूल डरे। अब वइसमन बखत नइ रइगे, फिल्मी गोठबात करइया मन बताथे कि निर्माता मन के लागत ह लेदे के निकलथे त कमई के बात तो दुरिहा हे। जब अतका नुकसान म रहे बाद भी ढर्रा ले फिलीम बनत हाबे त ओ निर्माता मन ह सम्मान के हकदार हे।
वो मन सिरिफ मनोरंजन के जरिया नइ बनावथे बल्कि छत्तीसगढ़ी सिनेमा ल स्थापित करे म अपन योगदान देवथे। दर्षक मन के नजर म छत्तीसगढ़ी फिलीम ल रहना जरूरी हे तभे वो मन ह ये तनि लोरहकही। अभी तक दर्षक म बने रकम ले छत्तीसगढ़ी फिलीम देखे बर टाकीज कोती आवत नइये। तब अइसन म एवार्ड वाले मन निर्माता-निर्देषक अउ कलाकार के हौसला बढ़ाय के काम करत हे। जेन मन सिरतोन म सम्मान के लायक हे उही मन ल मिलही तव तो उंकर मन के परयास बर साधूवाद अउ कहू वो मन अपन अपन मन पसंद ल इनाम धरा दिही तब तो अइसन एवार्ड के कार्यक्रम नइ होतिस तिही बने।
छत्तीसगढ़ी सिनेमा एवार्ड के दिन जेन कलाकर ल अपन कलाकारी म अजम रिहीस तेन मन सम्मान पाय के आस धरे पहुचे रिहीस। कतकोन झन ल तो पक्का जानकारी रिहीस की इनाम म ओकरे नाम लिखाय हे। कतको मन देखेच के नाव लेके गे रिहीस। छत्तीसगढ़ी सिने एवार्ड देना कोनो छोटे मोटे काम नाहे। गजब बारिके ले देखे अऊ परखे बर परथे तब जाके निर्णय निकलथे। अब जेन मनखे ल मंजीरा धरे बर नइ आवे तेहा सर्व श्रेश्ठ संगीत निर्देषक के चुनाव कइसे करही। गीत के भाव, रस, छंद, सुर, ताल अउ मात्रा के गियान नइये तेन मनखे ल सबले अच्छा गीत के चुनाव करे बर किबे त भला कइसे फबही। गीत अउ संगीत ल तो वोकर जानकार मन ही बता सकथे कि कते ह बने हे अउ कते हा गिनहा। अइसे नही कि आंखी मंुद के कोनो भी एक ठन केसिट ल छू देबे अउ उही ल सबले अच्छा गीत संगीत हे किके फैसला सुना देबे।
अच्छा हे त का खातिर अच्छा हे अउ खराब हे त का खातिर खराब लागिस इहू बात के जवाब होना चाही। गाए बजाए के तो थोक बहुत साध सबे ल रिथे। अइसन साधे साध के सतनच्चा ल सुर ताल के पक्का नइ माने जा सके त उंकर निर्णय ल अच्छा कइसे माने जाही। अब अभिनेता अउ अभिनेत्री के विसय म गोठ निकालबो त फेर उही बात सामने आही कि अभिनय के बारिकी ल जानने वाला ही सबले बने ल बता सकथे। अब फाइटमास्टर के चुनाव करे बर कोनो जोक्कड़ ल थोरे रख देबे। रखी देबे त देखइया मन कही देखना संभु के नचकार टुरा ह खैरखा म कभु लउठी भांजे नइये अउ अखरा डाढ़ म ओसताजी करे बर भिड़े हे। केहे के मतलब ओ विधा के जानकार व्यक्ति ह सर्वश्रेश्ट के चुनाव करे त इनाम बर अगवइया ल खुषी होही अउ पिछवईया ल घलो अपन कमजोरी के पता चलही।
दू दरजन एवार्ड ल आधा दरजन जुरी ह निर्णय दे दिस ये हा जुरी मन बर एक उपलब्धी आय। एमा संस्था वाला ल घलो सोहलियत होइस होही काबर की अलग-अलग विधा बर अलग-अलग काहा ले निर्णायक खोजतिस। सभे भार ल उही जुरी मन ल बोहा दे गे रिहीस। चुन चुन के महानुभव मन ल जुरी चुने रिहीस ऊहू जुरी मन चुन चुन इनाम बाटिस। इनाम झोकइया मन अभी तक असमंजस म हे कि कोन फिलीम बर एवार्ड दिये गे हाबे।
कहइया के मुह ल थोरे धरे सकबे। इनाम देवइया ल गुनगान के गुनी मन से फैसला कराना चाही। छत्तीसगढ़ी फिल्म सिनेमा एवार्ड कोनो भी संस्था देवय थोकन अपन अउ थोकन ओकर महत्ता ल धियान राखे। काबर की इनाम ह अइसन हांसी दिल्लगी के चिज नोहे जेला एक बार देके फेर मांग लेबे। बल्कि इनाम से ही ओला सर्व श्रेश्ठ मान लिये जाथे। कोनो अपन खुषी ले इनाम बाटत हाबे त हम काबर हस्तक्षेप करबो फेर जेन ह एक कलाकार के काम के सही अउ बहुत सही के मुल्यांकन करत हाबे त वो मुल्यांकन करइया के मनः fस्थाती के मनन तो करे सकत हन। का वो सस्ंथा ह एवार्ड ल निस्पक्ष रूप ने दिये हे या वो जुरी म मुल्यांकन करे के काबलियत रिहीस। ये सब बात ल हमर संग कहु जम्मो कला के मर्मग्य अउ कलाकार मन मनन करही त हो सकथे अवइया साल के सिने एवार्ड धारे धार बोहाय के बजाय खुद अपन धरा म धार बनाए के परयास करही।
 
जयंत साहू
ग्राम-डुण्डा, पो. सेजबाहर,
रायपुर छ.ग. (492015)

मितान के मया देखे बर उमड़िस भीड़

‘मितान’ परंपरा ला अपन छत्तीसगढ़ी फिलिम ‘मितान 420’ मा संघारत फिलिम बनाए हे। ओखर बाते अलग हे। पहिली च दिन सिनेमा ला देखे बर अतका भीड़ उमिड़स कि देखइया-सुनइया के संग फिलिम के कलाकार, गीतकार, संगीतकार, अउ जम्मो छत्तीसगढ़ी सिनेमा ले जुड़े लोगन गदगद होगे। फिलिम के मनभावन गीत घलो चर्चा मा हे। जेमा से खास गीत हे- कुहुक, कुहुक बोले काली कोयरिया, मन के मंजूर नाचे संगी मोर….। उछाह अउ उमंग भरे गीत सुनके मन मगन हो जथे। दूसरइया गीत हे जादू चलाए वो, बइहा बनाए ना तोर खोपा मा गुंथे गजरा…। एखर संगे-संग हंसी-ठट्ठा वाला गीत ला घलो देखइया मन बहुतेच पसंद करिन। गीत के बोल रहिस , मोर दिल के कुकरा बोलय वो…।
सबले बढ़िया बात ये रहिस कि इहां के परिवेश इहां के संस्कार अउ ग्रामीण जनजीवन ल ला संघारत फिलिम मा करमा , ददरिया के बहुतेच सुग्घर प्रस्तुति सुनके आनंद आगे। अब लगिस भई कि इहां के माटी, इहां के लोक जीवन अउ गुरतुर छत्तीसगढ़ी भाखा मा अइसनेच सिनेमा बनही त गांव-अउ शहर ले लोगन अपन बीच के कलाकार अउ उनखर कलाकारी ला देखे बर जरूर पहुंचही। प्रभात टाकीज मा सिनेमा देखइया के अब्बड़ भीड़ ला देखके हीरो करन खान, हीरोइन सीमा सिंग के संग जम्मो कलाकार बड़ खुश दिखीन। ऐती भिलाई मा घलो आज ए फिलिम के खूबेच चर्चा होय हे। कहानी के सार बात ऐ रहिस कि हमर छत्तीसगढ़ मा मितान कहत लागय। सबो नता-रिश्ता ले बड़ के कहूं कोनो नता हे त ओहे मितान। उहू मितान कहूं लबरा या फेर लंदी-फंदी निकलगे त का मितान के का गति होथे। परिवार अउ समाज मा एखर ले का परभाव पर सकथे। मितान याने भरोसा के दूसर नाम आय। आज भी हमर छत्तीसगढ़ मा मितान बदे के परंपरा हे। ए बात ला इहां के लोकगीत, संगीत के जानकार उत्तम तिवारी हा अपन फिलिम मा बताए हें।



राजधानी के प्रभात टाकीज अउ भिलाई, दुरूग, धमतरी, राजनांदगांव मा आज पहलीच दिन सिनेमा देखे बर भीड़ उमड़िस। निर्माता अशोक श्रीवास्तव(गरियाबंद) अउ दुर्ग जिला के कलाधर्मी सुरेन्द्रनाथ सिरसात के मिले जुले कोसिल ले प्रिया फिल्मस के बैनर तले बने छत्तीसगढ़ी फिल्म ‘मितान 420’ मां छत्तीसगढ़ी फिल्म के सुपरस्टार करन खान, लोकेश देवांगन, सीमा सिंह व मनमोहन ठाकुर,दिग्गज कलाकार हेमलाल कौशल, शिवकुमार दीपक, शैलेश साव, संतोष निषाद व शैलेन्द्र भट्ट के कलाकारी देखेच के लइक हे। ए मा करन खान एक नवा अंदाज मा रंग जमा दिस। ओखर उपर फिल्माय गे फिलिम के शीर्षक गीत (टाइटल सांग) ये जिनगी के .. बहुतेच पसंद करे गिस। करन खान रंगमंच ले जुड़े कलाकार आए अउ अभी के हिसाब से नंबर वन हीरो घलो केहे जाथे। सबले जादा काम ओखरे पास हे। मेहनती कलाकार करन जउन हिसाब से अपन कलाकारी मा निखार लाए बर दिन-रात मिहनत करथे ओखरे परसादे पूरा छत्तीसगढ़ मा ओखर नाव होवत हे। लोकेश देवांगन घलो हमर छत्तीसगढ़ के गुनी कलाकर हे। फेर ओखर परख करे मा थोरिक देरी होइस। ए फिलिम मा ग्राफिक के अच्छा काम घलो देखे बर मिलीस। हंसी-ठट्ठा ले भरपूर ‘मितान 420’ देखे बर पहुंचे लोगन के कहना हे कि गोटारन, अउ भगत पहाटिया ला देख के मजा आगे। कोतवाल(शिवकुमार दीपक ) घलो बने काम करे हे। कुल मिलाके कहन ता सबो कलाकार के काम बने हे। कुछ जगा मारधाड़ जादा देखाए गेहे, ओहा ठीक नई लगिस। बम्बइया स्टाइल मा एक दू जगा अइसे फिल्मी मसाला डारे गेहे जेन हा भीड़ सकेले बर आय।
पटकथा अउ गीत लक्ष्मीनारायण कुंभकार हा जउन हिसाब से लिखे हे ओहा सराहे के लइक हे। कला, नृत्य अउ निर्देशन की जिम्मेदारी विलास राउत, दिलीप बैस, आलेख चौधरी हा बने हिसाब से निभाय है। छायांकन के काम तोरन राजपूत, सिद्धार्थ सिंह ला देय गेहे उंखर काम मा कोनो कमी नई दिखय।
फिल्म के सबसे बड़ी खूबी ये है कि जम्मो कलाकार छत्तीसगढ़ के हें। दुर्ग जिले के नेवनारा, निकुम, भिलाई, रायपुर जिले के गरियाबंद, राजनांदगांव जिले के टेडेसरा अउ धमतरी जिले मा मितान 420 का के शूटिंग होय हे। अपन गांव के झलक एमा देख-देख के इहां के कला प्रेमी मगन दिखीन।

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फिल्मी गोठ : छत्तीसगढ़ी फिलीम म बाल कलाकार

एक-एक ईंटा, एक-एक पथरा, रेती-सीमेंट अउ बड़ अकन मकान बनाए के जीनीस ले मिस्री ह एक सुग्घर मकान, भवन, महल के निर्माण करथे। ठीक वइसने एक फिलीम के निरमान म नान-नान जीनीस अउ कई झन व्यक्ति के सहयोग ले होथे। फिलीम म बाल कलाकर मन के भूमिका ल घलो छोड़े नई जा सकय। चाहे वो फिलीम मुंबइया हो, बंगाली हो, दक्षिण भारतीय हो उड़िया हो या फेर हमर छत्तीसगढ़िया हो। छत्तीसगढ़िया फिलीम के बाल कलाकार ले मोर भेंट होईस त मोला लागिस कि छत्तीसगढिया फिलीम घलो बाल कलाकार के बिना अधूरा है। फिलीम ‘महूं दीवाना तहूं दीवाना’ के टीम के साथ मंच हा भेंट करेंव त वो फिलीम के बाल कलाकार आयूष चतुर्वेदी के जोश ल देख के मैं समझगेंव कि छत्तीसगढ़ के लइका मन घलो प्रतिभा के मोहताज नईहे। मैं ये दावा के संगे कहि सकथंव कि कोनो वो लइका हा ये कला के साधना म लगे रही त निश्चित रूप से छत्तीसगढ़ी फिलीम म अपन सुग्घर भूमिका ले पहचान बनाही। धीरे-धीरे छत्तीसगढ़ी फिलीम उद्योग के रचयिता मन, लेखक मन गीतकार मन छत्तीसगढ़ी बाल फिलीम कोती घलो धियान देके इहां के प्रतिभा मन ला मंच देवयं अउ शासन ल घलो चाही कि अइसन उदिम करइया मन ला सहयोग देवंय। लइका मन के बाल मन म ही कला हा संचरके अउ उही कला हा एक दिन धूम मचा के राज देश के नांव चलाथे। छत्तीसगढ़ी फिलीम एलबम के माध्यम ले कतकोन लइका मन अपन कला के लोहा मनवाए हें। ये बेरा आयूष के पारी हे। ‘महूं दीवाना तहूं दीवानी’ फिलीम ल देख के बाल कलाकार के उत्साहवर्धन करना चाही। कोनों कविमन इंखर मन बर कतक बढ़िया बात कहे हें कि-
का जानही दुनियां ल ये मन, कि इहां कइसन चरित्तर होथे।
लइका मन तो कच्चा माटी अस जेन बनाबे तेन बनथे॥
चम्पेश्वर गोस्वामी

फिल्मी गोठ: फिलमी लेखक अउ पारिश्रमिक 8 नव

छत्तीसगढ़ के फिलीम उद्योग म पटकथा अउ पटकथा लेखक मन बर उदासीनता दिखाई देथे। मानदेय के कमी या फेर फोकट म पटकथा लेना लेखक मन ल निरास कर दे हावय। बने लेखक अउ बने पटकथा के कमी के कारन इही आय।
बने मानदेय के घोसना होय ले पटकथा पटा जही और छालीवुड म फिलीम के सुग्घर पंक्ति खड़ा हो जही।
जब फिलीम हा परदा म दिखथे, हीरो नाचथे, हिरवइन झूमथे, खलनायक हा मार खाथे, गीत हा हिरदे म छा जाथे बाजा हा बढ़िया-बढ़िया बाजथे त सिरतोन म मजा आ जाथे। फेर का हमन कभू वो लेखक मन के बारे म सोचे हन जउन मन बइठके अपन कल्पना के घोड़ा ला दउड़ाके एक-एक ठन घटना एक-एक सीन उतार-चढ़ाव मनोरंजन हास्य सबो ला रचथे जिंखर लक एक प्लाटिंग ले फिलीम के निरमान होथे। एक क्रम होथे फिलीम के सूटिंग शुरू होये के पहिली जइसे पहिली कथा आकार लेथे तहान पटकथा हा विस्तार लेथे तेखर बाद संवाद के बौछार होथे। का आघू कैमरा परही का पाछू कैमरा परही कब मुड़ म कैमरा आही अउ कब-कब कइसन-कइसन चित्रन हा फरिहाही ये सबो बुता हा एक लेखक के होथे जिंखर योजना अऊ लिखावट ही फिलीम के जान होथे। तेखर बाद बाकी के नम्बर आथे। एक योग्य फिलीमकार हा अपन कृति खातिर बिलकुल भी ‘रिस्क’ नइ लेवय अऊ वो मन सबले पहिली टाइट स्क्रिप्ट कहे जाथे। फिल्मी भासा म तेखर अपन पहिली गंभीरता ले धियान देथे। सबो बात बने हे फेर एक बात अभी भी तने के तने हे कि का आज छत्तीसगढ़ी फिलीम म पटकथा अउ पटकथा लेखक बर फिलीमकार मन गंभीर हें ये मोला थोरिक भुसभुसहा लागथे। काबर कि अब तक मोर करा ले कई झन निर्माता निर्देशक मन पारिश्रमिक के नाव ले भागगे हे। अइसन म एक लेखक के गुजारा कइसे चलही सोचे के बात हे। जादातर बालीवुड के छत्तीसगढीक़रण म बनत फिलीम हा लेखक कम अनुवादक जादा पैदा करत हें अउ सबले दु:ख के बात ये हरय कि कोनों ला उचित अउ उपयोगी मानदेय नई मिलत हे। आज जरूरत हे कि लेखक गीतकार अनुवादक मन ला एक बढ़िया पारिश्रमिक मिलय तबहे छत्तीसगढ़ी फिलीम म लेखक मन उहु मा स्तरीय अऊ मौलिक कवि गीतकार मन श्रेष्ठ कृति के रचना खातिर अघवाही अऊ छत्तीसगढ़ी फिलीम हा उही दिन राष्ट्रीय पुरस्कार पाही। निर्माता निर्देशक कलाकार मन के कथनी के हमरो फिलीम हा ऑस्कर जइसन पुरस्कार बर नामांकित होवय। ये जरूर सच होही।
चम्पेश्वर गोस्वामी

फिल्मी गोठ : छत्तीसगढ़ी फिलीम म बाल कलाकार

एक-एक ईंटा, एक-एक पथरा, रेती-सीमेंट अउ बड़ अकन मकान बनाए के जीनीस ले मिस्री ह एक सुग्घर मकान, भवन, महल के निर्माण करथे।
ठीक वइसने एक फिलीम के निरमान म नान-नान जीनीस अउ कई झन व्यक्ति के सहयोग ले होथे। फिलीम म बाल कलाकर मन के भूमिका ल घलो छोड़े नई जा सकय। चाहे वो फिलीम मुंबइया हो, बंगाली हो, दक्षिण भारतीय हो उड़िया हो या फेर हमर छत्तीसगढ़िया हो। छत्तीसगढ़िया फिलीम के बाल कलाकार ले मोर भेंट होईस त मोला लागिस कि छत्तीसगढिया फिलीम घलो बाल कलाकार के बिना अधूरा है। फिलीम ‘महूं दीवाना तहूं दीवाना’ के टीम के साथ मंच हा भेंट करेंव त वो फिलीम के बाल कलाकार आयूष चतुर्वेदी के जोश ल देख के मैं समझगेंव कि छत्तीसगढ़ के लइका मन घलो प्रतिभा के मोहताज नईहे। मैं ये दावा के संगे कहि सकथंव कि कोनो वो लइका हा ये कला के साधना म लगे रही त निश्चित रूप से छत्तीसगढ़ी फिलीम म अपन सुग्घर भूमिका ले पहचान बनाही। धीरे-धीरे छत्तीसगढ़ी फिलीम उद्योग के रचयिता मन, लेखक मन गीतकार मन छत्तीसगढ़ी बाल फिलीम कोती घलो धियान देके इहां के प्रतिभा मन ला मंच देवयं अउ शासन ल घलो चाही कि अइसन उदिम करइया मन ला सहयोग देवंय। लइका मन के बाल मन म ही कला हा संचरके अउ उही कला हा एक दिन धूम मचा के राज देश के नांव चलाथे। छत्तीसगढ़ी फिलीम एलबम के माध्यम ले कतकोन लइका मन अपन कला के लोहा मनवाए हें। ये बेरा आयूष के पारी हे। ‘महूं दीवाना तहूं दीवानी’ फिलीम ल देख के बाल कलाकार के उत्साहवर्धन करना चाही। कोनों कविमन इंखर मन बर कतक बढ़िया बात कहे हें कि-
का जानही दुनियां ल ये मन, कि इहां कइसन चरित्तर होथे।
लइका मन तो कच्चा माटी अस जेन बनाबे तेन बनथे॥
चम्पेश्वर गोस्वामी

फिल्मी गोठ : फिलीम अउ साहित्य

को नों भी सुग्घर अउ महान फिलीम म या कहन कि जनप्रिय अउ मनप्रिय फिलीम म साहित्य के इसथान कहूं न कहूं जरूर रहिथे अउ कोनो फिलीम म साहित्य हे त निश्चित रूप ले वो महान कृति बन जाथे।
हम बालीवुड के गोठ करन तब तो अइसन बड़ अकन फिलीम हा जुबान म आ जाथे, लेकिन जब हम छालीवुड माने छत्तीसगढ़ी फिलीम के बात ल लाथन त एक दू ठन फिलीम ला छोड़के अउ मोला फिलीम नइ दिखय जऊन म कोनो भी रूप म साहित्य के दर्शन होथे। साहित्य समाज के दरपन होथे अउ फिलीमकार मन इही दरपन ला टोर-फोर के सत्यानास कर देथे ये ऊंखर मन के सबले बड़े नदानी आय जउन एला अपन फिलीम म इसथान नइ देवय इहां तक देखे म मिलत हे कि फिलीम के नामकरन तको म साहित्यिक नई राहय अरे भई कम से कम नांव ल तो बने राखतीन। एक मन फिलीम निरमान के दूसरइया चरन माने ‘छइहां-भुइयां’, ‘झन भूलौ मां बाप ला’, ‘मयारू भौजी’, ‘मोर संग चलव’ जइसन फिलीम के शीर्षक हा बड़ दरसक ला अपन डाहर तीरथे। फेर अब देखथन कि अतेक अकन फिलीम हा आवत हे। आवत तो हे, फेर कोनो भी फिलीम हा अपन नांव संग तालमेल नइ बइठा पावत हे। पूरा नाव हा अन्ते-तन्ते रखावत हे। एक लेखक के किताब के शीर्षक ले ही वो लेखक के किताब के अनुमान लगाए जा सकत हे। अनुमान न सही, फेर कम से कम पेज ल पलटाये जा सकत हे। ठीक उही परकार ले एक फिलीम के नाव ले दरसक टिकीस बिसाके टाकीज के भीतर तो जा सकत हे। बाकी हा फिलीमकार के प्रस्तुति हे कि वो हा अपन फिलीम म कतेक दरसक ला तीर सकत हे अउ कतेक बेरा तक दरसक ला बइठा सकत हे। फिलीम म साहित्य के दखल होना जरूरी हे। बने भासा, परम्परा अउ समाज के वर्तमान परिदृश्य ल चित्रित करना घलो जरूरी हे। एक फिलीमकार ल ये बात ल जरूर सोचना चाही कि वोमन दरसक ल जादा दिन तक बइकूफ नइ बना सकय। नेता मन पांच साल म बदल जाथे। अउ दरसक के आंखी म धुर्रा छिंचइया फिलीमकार मन एक नजर म। एखर सेती छत्तीसगढ़ी फिलीम उद्योग म अभी सुग्घर ईमानदारी के प्रस्तुतिकरण जरूरी हे अउ बने साहित्य के संग म।
चम्पेश्वर गोस्वामी

फिल्मी गोठ : झन मारव गुलेल

ये बछर ह छत्तीसगढ़ राज बने के दसवां बछर आय। फेर ये दस बछर ह छत्तीसगढ़ी फिलिम के माध्यम ले छत्तीसगढ़िया मन के दस किसम के गति कर डारे हे। निश्चित रूप ले अइसन दृश्य ले बाहिर निकले के जरूरत हे। हम ये बात ल ठउका जानथन के बरसा के पानी ह तुरते उपयोग के लायक कभू नई राहय।
छत्तीसगढ़ी भाखा के पहिली फिलिम ‘कहि देबे संदेश’ ले चले फिलिम यात्रा ह आज कई कोस के सफर तय कर डारे हे, फेर जस-जस वोकर यात्रा के सफर बाढ़त हे, तस-तस वो ह अपन भाखा संस्कृति ले अलगियावत जावत हे, एकर खातिर आरूग व्यावसायिक मनखे-मनखे मन जतका दोषी हे, वतकेच अधकचरा लेखक-निर्देशक मन घलोक दोषी हें। ये बीच म संहराए के लाइक ए बात घलोक होवत हे, के मुम्बई म बइठे बड़का फिलिम निर्माता मन इहां के भाखा अउ गीत मन ला सुग्घर ढंग के सजा के राष्ट्रीय अउ अंतर्राष्ट्रीय मंच म परोसत हें। ए हर इहां बइठ के जतर-कतर बनइया मन के मुंह म ‘तमाचा’ बरोबर हे।
अभी हाल म जेन ‘पीपली लाइव’ बने हे, तेकर आरूग छत्तीसगढ़ी गीत- ‘चोला माटी के राम’ पारम्परिक शैली म हे जेमा मांदर के सुर मोहनी बरोबर लागथे। ‘छालीवुड’ के ‘छछान बैरी’ कस गीत ल सुन-सुन के मवाद भरे कान ल ये हर अड़बड़ नीक लागिस। ठउका इही किसम डेढ़ बछर पहिली ‘दिल्ली-6’ म ‘ससुराल गेंदा फूल’ घलोक आए रिहीसे। उहू ह आम जनमानस ल गजब सुहाए रिहीसे। ये बात अलग हे के कुछ ‘ठेकादार’ किसम के लेखक- कलाकार मन एकर रायल्टी अउ मूल स्वरूप के नांव म चिचियाइन-बोंबियाइन। फेर ये बात सब जानथें के ‘पारम्परिक’ गीत ह काकरो बपौती नइ होवय। वोला नवा रूप धड नवा शब्द दे के अच्छा बनाए जा सकथे। जेला ए.आर. रहमान अउ प्रसून जोशी ह ठउका पूरा करे रिहीसे।
”पीपली लाइव” अउ ”दिल्ली-6” के ये दूनो गीत ह पहिली आकाशवाणी ले ‘सुर सिंगार’ आवय तेकर सुरता देवा दिस। फेर अब न तो आकाशवाणी ह गुरतुर लागय न प्रसारण नवा रूप धरे ‘एलबम’ मन सुहावय। वोमन ल देख-सुन के लागथे के ये मन ल ‘सी ग्रेड’ मुंबइया फिलिम मन ले रूपांतरित कर दे गे होही। तभे समधीन के ‘झटका, टूरी नं. 1’ जइसे फिलिम अउ एलबम देखे-सुने ले मिलथे। फिलमी गीत के शुरूआत ह ‘झमकत नंदिया बहिनी लागय, परबत मोर मितान। गोंदा फूलगे मोर राजा। झन मारव गुलेल।’ जइसन मनभावन अऊ मन म गरब के भाव पैदा करने वाला गीत ले होए रिहीसे, वो ह अब ‘खटिया म आबे रात के’ जइसन गीत मन के श्रेणी म आगे हवय। ये हर हमर भाखा, साहित्य अउ संस्कृति के विकास धांय ते विनास, ये बात ल सबो जान अउ समझ सकथें। जबकि आज तकनीकी रूप ले फिलिम के निर्माण ह जादा आसान अउ अच्छा होगे हवय। लोगन चाहतीन त एकर अच्छा उपयोग कर सकत रिहीन हे, फेर लागथे के छालीवुड म सिरिफ ‘छीछालेदर’ किसम के मन भरे परे हें। जेन कुंआ के मेचका कस सिरिफ अपने तक सीमित हे उन न तो अच्छा लेखक-निर्देशक डहर देखयं न उनला जानय पहिचानय। साहित्यकार के नांव म कुछ गम्मतिहा किसम के लोगन उंकर मापदण्ड बनगे हवंय। जेकर मन के उद्देश्य इहां के भाखा संस्कृति के गौरव नहीं भलुक सिरिफ पइसा अउ प्रसिध्दि होथे ओकर मन ले कुछु उम्मीद कइसे करे जा सकथे।
ये बछर ह छत्तीसगढ़ राज बने के दसवां बछर आय। फेर ये दस बछर ह छत्तीसगढ़ी फिलिम के माध्यम ले छत्तीसगढ़िया मन के दस किसम के गति कर डारे हे। निश्चित रूप ले अइसन दृश्य ले बाहिर निकले के जरूरत हे। हम ये बात ल ठउका जानथन के बरसा के पानी ह तुरते उपयोग के लाइक कभू नई राहय। फेर जइसे-जइसे वो थिरावत जाथे, उड़ेरा पूरा के चिखला-माटी मन खाल्हे म बइठत जाथे, तइसे- तइसे पानी ह सुग्घर अउ उार दिखे लागथे। वोकर सेवाद ह गुरतुर लागे लगथे। ठउका अइसने छत्तीसगढ़ी फिलिम के दिन घलोक लहुटही इही आशा अउ भरोसा हे। ये क्षेत्र के सक्रिय लोगन ले बस अतके कहना हे, के अपन भाखा-संस्कृति ल तो कम से कम गुलेल गोली म झन टीपव।
सुशील भोले
41-191, डॉ. बघेल गली
संजय नगर, टिकरापारा रायपुर

अश्लीलता के सामूहिक विरोध जरूरी हे

फिलमी गोठ

आधा-आधा कपड़ा पहिरे टुरी मन के दृश्य के बहिष्कार होना चाही। अभी एखर बर कुछु नई करेन त ये मान लन कि ये बाढ़ हा हम सब ला बोहा के ले जाही। हमर मन बर बताए अउ देखाए बर कुछ नई रहहि, ऊटपटांग लिखना फिलिम के कहानी म मौलिकता के अभाव दिखना, दृस्य म अस्लीलता के प्रभाव बढ़ना ये सब छत्तीसगढ़ बर बने नोहय।
हमर छत्तीसगढ़ी फिलिम उद्योग म अइसन खतरनाक-खतरनाक प्रयोगवादी मन आ गे हें कि अब तो अइसे लागत हे जइसे आम दरसक अउ खास दरसक संगे-संगे लइका ले लेके जवान अउ सियान तक के मति के भ्रष्ट होना तय हे। एखर मन के दुस्साहस हा धीरे-धीरे बाड़हत हे, अउ सबले अचरज के बात ये हावय के जम्मो छत्तीसगढ़ हा चुपेचाप येला साहत हे। मोर ख्याल से जब कोनो फिल्मी टुरी हा अपन आधा-आधा कपड़ा पहिरथे त दरसक ल घलो बने लागत होही।
इही कारण पत्रकार ले साहित्यकार, साहित्यकार ले लेके गांव के आम मनखे तक, इहां तक हमर भाषण झड़इया नेता तक मन चुप हें। एखर सामूहिक बहिष्कार होना जरूरी हे। अभी एखर बर कुछु नई करेन त ये मान लन कि ये बाढ़ हा हम सब ला बोहा के ले जाही हमर मन बर बताए अउ देखाए बर कुछ नई रहहि, ऊटपटांग लिखना फिलिम के कहानी म मौलिकता के अभाव दिखना, दृस्य म अस्लीलता के प्रभाव बढ़ना ये सब छत्तीसगढ़ बर बने नोहय। जउन मन ला हम योग्य फिलिमकार कहिथन, योग्य कलाकार कहिथन तेखरे कोती ले अइसन विध्वंसक पहल करना निंदनीय हे। कलाकार मन ला ये फिलिम उद्योग म समझौता करे ला परत हे, समझौता नइ करत हे त काम छूटत हे काबर कि अउ लइका म खडे फ़ोकटइया कलाकार हे जउन मन कैमरा म दिखे के लालच म अउ परसिध्दि के झूठा चकाचउंध म कलाकार मन के पेट मारे बर तियार खड़े हें। कलाकार मन ला घलो अपन कीमत बनाए ला लागही अपन शर्त राखे ल लागही उही रकम ले सबो विद्या के कलाकार मन ल अपन मापदण्ड तय करे ल लागही। तब एखर मन के मनमानी ले जम्मो छत्तीसगढ़ी फिलिम उद्योग हा बांच सकही। अनुज शर्मा, मनमोहन ठाकुर मन कहिथें कि हमन अपन पारिश्रमिक से अउ अपन रोल से कभु भी समझौता नइ करन। बस, अइसनहे सबो कलाकार हो जावंय तब मजा आही। खैर, वर्तमान म हमर इच्छा हे कि छत्तीसगढ़ी फिलिम घलो सामान्य टाकीज ले मल्टीप्लेक्स तक के सफर तय करय। फेर अश्लील दृश्य ले दुरिहा राहय अउ ए मन तभे चेतही जब हम छत्तीसगढ़िया मन अश्लीलता के सामूहिक रूप ले विरोध करबोन।

चम्पेश्वर गोस्वामी

आरंभ में पढ़ें : –
रौशनी में आदिम जिन्दगी : भाग 1
रौशनी में आदिम जिन्दगी : भाग 2
रौशनी में आदिम जिन्दगी : भाग 3
रौशनी में आदिम जिन्दगी : भाग 4