Category: व्यंग्य

मोर गांव म कब आबे लोकतंत्र

अंगना दुवार लीप बोहार के डेरौठी म दिया बार के अगोरय वोहा हरेक बछर। नाती पूछय कोन ल अगोरथस दाई तेंहा। डोकरी दई बतइस ते नि जानस रे अजादी आये के बखत हमर बड़ेबड़े नेता मन केहे रिहीन के जब हमर देस अजाद हो जही त हमर देस म लोकतंत्र आही। उही ल अगोरत हंव बाबू। नाती पूछिस ओकर ले का होही दाई ? डोकरी दई किथे लोकतंत्र आही न बेटा त हमर राज होही हमर गांव के बिकास होही। मनखे मनखे में भेद नि रही। हमर गांव के गरीबी मेटा जही जेकर पेट म एक ठिन दाना निये तहू खावत खावत अघा जही। जेकर करा पहिरे बर चेंदरा निये तेहा लुगरा ओढ़ना म लदा जही। गली खोर म रथिया बितइया मनखे बर सुघ्घर सुघ्घर घर कुरिया छवा जही। कोन्हो लड़ही भिड़ही निही। जम्मो मनखे ल जिये के एके बरोबर अधिकार मिलही। एके बरोबर नियाव घला पाहीं जम्मो। गली गली म रमायन के चौपाई कुरान के आयात सबद कीरतन के गीत संगीत सुनई दिही।
नाती पूछिस वोला अगोरे बर दिया बारे के काये जरूरत हे दाई ? डोकरी दई किथे हतरे भकाड़ू कहींच नि जानस रे। इही दिया के अंजोर म लोकतंत्र ह रसता अमरही। दिया नि बारहूं त बपरा ह कइसे जानिही के कते गांव म समसिया हे कतिंहा खुसरना हे कतिहां के बिघन बाधा ल हरना हे। नाती बताये लगिस जउनला तैं अगोरत हावस न दाई तेहा तोर गांव म कभू नि आवय। डोकरी दई बिसबास ले किहीस काबर नि आही बेटा ? हमर करांतीकारी नेता मन केहे हे ते लबारी थोरेन होही। अभू के नेता मन कस ओमन लबरसट्टा नि होय बाबू । देस बर जान देवइया मनखे मन थोरेन लबारी मारही तुंहर गांव म लोकतंत्र आही कहिके। बड़ बिसवास रहय वोला। कोन्हो बछर नि छूटे डोकरी दाई हरेक छब्बीस जनवरी के लोकतंत्र ल अगोरत अपन डेरौठी म दिया बारके बइठे रतिस। ओकर नाती ओला रंग रंग के समझाये फेर वोहा गांठ बांध डरे रहय के छब्बीस जनवरी आही तहंले लोकतंत्र आही हमन राज करबोन हमर भुंइया के भाग जागही।
डोकरी दई ल फेर चुलकइस नाती हा दाई तेंहा बिसवास नि करस या। दिल्ली म उही दिन ले आगे हे लोकतंत्र ह फेर इहां आये के नाव नि लेवत हे। डोकरी दई मुहुं ला फार दिस ? दिल्ली म आगे हे उही समे ले। देखे बाबू में केहे रेहेंव न हमर करांतीकारी मन लबारी नि मारय। “ फेर इहां काबर नि हमाथे वोहा “ डोकरी दाई सोंचे लागिस। कोन्हों लोकतंत्र ल ओकर गांव म आये बर छेंकथे का ? तभे लोकतंत्र ओकर गांव कोती निहारत निये। हमर दिया के अंजोर कमती हो जथे का ? तेकर सेती ओला दिखय निही। उही दिन ले गली गली म अतका कस दिया जलाये के उदिम सुरू कर दीस के जगमग दिया के अंजोर म लोकतंत्र ला रसदा दिख जाय। अभू सुरहुत्ती कस दिया बरे लागिस चारो मुड़ा। मने मन बुड़बु‌डाय लगिस अब कइसे नि दिखही रे लोकतंत्र मोर गांव के रद्दा ह तोला। फेर नि अइस लोकतंत्र। नहाक गे वहू बछर। नाती फेर चुट ले कहि दीस लोकतंत्र अंधरा हे दाई तेंहा कतको कस दिया बार ओला काये फरक परही। दई किथे हत रे बैरी। पहिली नि बताये रहिते अंधरा हे लोकतंत्र कहिके काबर जगजग ले दिया बार के अगोरतेंन। जाथंव दिल्ली देखहूं कइसना करिया हे के गोरिया हे लोकतंत्र तेला। गांव आये बर नरियर पान सुपारी धरके मनाहूं लानत बनही त लानहूं निच मानही त डेना ल हचकार के धरहूं ईंचत लानहूं। दई चल दिस दिल्ली लंक कस टूटत। न पता जानय न ठिकाना कोन ल अउ कइसे पूछय। सुरता अइस उंखर नेता रिथे इहां उही जानत हे लोकतंत्र ल उही मिलवाही मोला। पहुंचगे नेता तिर। बड़ हांसिस नेता। नेता सोंचिस अतका दूरिहा ले आहे ममादाई एकर मांग पूरा करे लागही।“ इही लोकतंत्र हरे कहिके ” भेंट करा दीस एक झिन ले। डोकरी दाई ओकर दरसन करके बड़ खुस रिहीस। बड़ सुंदर रहय ओहा। दग दग ले सफेद सुंदर बाजर कपड़ा लत्ता पहिरे ओढ़े बइठे रहय। दाई सोंचत हे “ लोकतंत्र के आंखी निये अंधरा हे ओहा “ कहिके नाती टूरा कइसे लबारी मारिस तेला। लेकतंत्र के तीर म जाये के पहिली अपन देहें म महर महर सेंट ल गदगद ले रिको डरिस। दई सोंचत रहय ममहाहूं तंहले मोरे कोती आघू देखही तहन गोठियाहूं अऊ अपन गांव आये के नेवता दूहूं। जइसे गिस तीर म तइसे लोकतंत्र उठे लागिस दाई गोठियातेच हे वोहा दूसर डहर अपन थोथना ल टेकाये मुचुर मुचुर करत टुंग ले उठिस डोकरी दाई ल धकियावत कते कोती मसक दिस। हबरस ले उलंडगे डोकरी दाई। डोकरी दई अपन नाती के सुरता करत हे तेंहां सिरतोन केहे रेहे का रे। येहा फकत अंधराच नोहे भैरा अऊ नकटा घला आय कस लागथे। भैरा हे तभे सुनिस निही मोर एको गोठ अऊ बिन नाक के घला हे अतका कस सेंट म एको कनिक ओकर नाक म नि खुसरिस। अपन कस मुहूं करे लहुंट दिस।
वापिस लहुटतेच साठ बड़ गारी बखाना करीस डोकरी दाई। मोर अतका बछर के तपसिया भोसा गे। में जाने रहितेंव अइसने रिथे लोकतंत्र ते कभू ओकर रद्दा नि जोहतेंव। नाती बड़ हांसिस अऊ बतइस तेंहा जेकर तीर गे रेहे न दाई तेहा लोकतंत्र नोहे। अभू तें देखे कहां हस लोकतंत्र ल। वोहा कन्हो मनखे थोरे आय दाई। डोकरी दई किथे अई मेंहा मनखे हरे लोकतंत्र ह कहत रेहेंव बेटा। दाई के भरोसा फेर जागगे। मने मन गारी बखाना के सेती पछतावत रहय। अपन कलपना के लोकतंत्र ल देवता समझे अभू घला अऊ कहय मोर लोकतंत्र ल आवन दव तंहले बताहूं रे तूमन ल। मोला धकिया हस तेकर भुगतना ल भुगता के रहूं।
समे नहाक गे। डोकरी दाई निच्चट सियान होगे। बिमार परगे। “ तैं कब आबे लोकतंत्र मोर गांव म “ खटिया म पचत रहय फेर उइसनेच रटय दिन भर। पान परसाद खवा डरीन। बेटा मन किहीन राम राम बोल दाई राम राम। फेर ओकर मुहूं ले कहां निकलय राम नाम के गोठ ओकर मुहूं म फकत लोकतंत्र बसे रहय उहीच ल रटय। बुड़बुड़ावय – तैं आते मोर जान बचाते महू ल कुरसी म बइठारते मोर गांव के भाग जगाते। गीता के इसलोक सुनत डोकरी दाई खटिया म उदुप ले उठ के बइठगे। जम्मो झिन सुकुरदुम होगे दाई कइसे करथे ? जोर जोर से केहे लगिस दई – अभू तोला फुरसुत मिलिस लोकतंत्र मोर गांव म आये के। मोर जाये के पहरो म आये तें। में काला देखहूं। पहिली आते त महूं थोरकुन तोर मजा ले लेतेंव। तोर संग हांस लेतेंव गोठिया लेतेंव ददरिया गातेंव झूम लेतेंव नाच लेतेंव। मोर गांव के चिखला रद्दा म डामर के रंग चढ़ जतिस मोर लइका बालामन बर इसकूल खुल जतिस। मोर पारा म कुआं खना जतिस मोर गांव के तरिया नदिया के दिन लहुंट जतिस। मोर नाव के रासन कारड बन जतिस। मोर धान के किम्मत अऊ मोर मेहनत के इज्जत बाढ़ जतिस। मोर गांव म मंदीर बन जतिस मज्जिद के अजान सुन लेतेंव।
नाती सोंचिस दाई पगला गेहे लोकतंत्र के पाछू। जावत समे एकर भरम ल टोरना हे लोकतंत्र के असलियत ल बताना हे तभे येहा जाये के बेरा राम राम बोलही। नाती केहे लागिस तेंहा दिल्ली गे रेहे न दाई त जेन मनखे ले तोर भेंट होये रिहीस तउने लोकतंत्र आये दाई। तोर भरोसा झिन टूटे कहिके तोर करा झूठ बोलेंव। वोहा सहीच म अंधरा कनवा अऊ नकटा आये। इही लोकतंत्र के सेती तोर गांव म पक्का सड़क नाली इसकूल नि बन सकिस। भसकहा कुआं बनइया बिन सरोत के तरिया खनवइया नदिया म फुटहा भोंगरा पार बनवइया तोला मुखिया बनाके रासन कारड बना के तोला मुरूख बनइया तोर धान कस तोर मेहनत के किस्मत बिगड़इया तोर देस के सफ्फा नुकसान करइया इही लोकतंत्र आये दाई। ये लोकतंत्र गरीब बर नोहे दाई तैं फोकट ओकर अगोरा करत रेहे। जे लोकतंत्र के सपना सतनतरता सेनानी मन तोला देखाये रिहीन वोला जनम लेतेच साठ बइरी मन मुसेट के मार डरे रिहीस। ये अमीर मन के लोकतंत्र आय दाई। तभे झाड़ू कका अजादी के अतका बछर पाछू धान के कटोरा धरे दाना दाना बर लुलवावत हे। कपड़ा बिनइया चैती काकी के लइका नंगरा घूमत हे गली खोर म। दूसर बर घर बनइया खोरबाहरा रामबाड़ा के परसार म सुते बर मजबूर हे। अऊ तेंहा समझथस येहा तोर इलाज करवातिस कहिके। इही लोकतंत्र के इलाज म हमर बबा के आंखी फूटे रिहीस। तोर बेटी के कोख हरागे रिहीस। इही लोकतंत्र के सेती तोर गांव के बांधा फूट गे रिहीस कतको एक्कड़ फसल बोहागे रिहीस। अऊ ऐकरेच सेती तोर जगा भुइंया म बने बांध के मुअउजा अभू तक नि मिलीस तोला। सिरीफ ऐकरेच सेती माचिस के काड़ी चोराये के इलजाम म तोर ममा जेल गे रिहीस अऊ पूरा गांव के विकास के पइसा हजम करइया सरपंच अभू बिधायक अऊ मंत्री बन के भुकर भुकर के खावत किंजरत हे। ये लोकतंत्र तोर देस ल बेंचत हे दाई। बने करीस तोर तीर म नि ओधीस निही ते तहूं ल बेंच देतीस तहन हमन “ डोकरी दाई “ कोन ल कतेन। तेंहा ये लोकतंत्र के मोहो ल छोड़ अभू जाये के बेरा आगे राम राम बोल दाई राम राम …….। जइसे दाई ल हलइस दाई ल नि पईस। दाई के जीव कोन जनी कतेक बेर उड़ियागे। डोकरी दाई चल दिस। अइसने कतको झिन जावत जावत अमरावत हे लोकतंत्र ला। जियत जियत पाये के आसा म हमेसा धोका खावत हे। फेर दिया बार के मिले के आस म अभू तक अगोरत हे गांव हा अपन सपना अऊ कलपना के लोकतंत्र ल।
हरिशंकर गजानंद देवांगन
छुरा

बियंग: निरदोस रहे के सजा

बहुत समे पहिली के बात आय। जमलोक बिलकुलेच खाली होगे रहय। यमदूत मन बिगन बूता काम के तनखा पावत रहय। बरम्हाजी ला पता चलिस त ओहा चित्रगुप्त उपर बहुतेच नराज होइस। चित्रगुप्त ला बरम्हाजी हा अपन चेमबर म बलाके, कमरटोर मंहंगई अऊ अकाल दुकाल के समे म, बिगन बूता के कन्हो ला तनखा देबर मना कर दिस। चित्रगुप्त किथे – पिरथी म पाप करइया मनखे कमतियागे हे तेमा यमदूत मनके काये दोस हे। येमन ला कतिहांच भेज डरंव तिहीं बता भलुक। बरम्हा किथे – अइसे होइच नी सकय, तोर हिसाब किताब म गड़बड़ी हे, मनखे मन पिरथी म जाथेच पाप करे बर …… अऊ तैं कहिथस के पापी के संखिया कमतियागे हे …….. में कइसे पतियांवव। कहूं अइसे तो निही के पाप करइया मन, तोर बिभाग के बाबू मनला घूस दे के पटा डरत हे अऊ अपन पाप ला कटवा डरत हे। चित्रगुप्त किथे – मोर बिभाग म एको करमचारी हा मनखे नोहे बरम्हाजी जेमन थोकिन पइसा के लालच म जमीर बेंच देथे। बरम्हाजी ला चित्रगुप्त उपर उइसने बिसवास नी होइस जइसे नेता हा, अपन अधिकारी अऊ सचिव उपर बिसवास नी करय। चित्रगुप्त किथे – तैं पतियावस निही त चल पिरथी लोक, असलियत अपने आप पता लग जही। बरम्हाजी किथे – एक सरत म जाहूं, मोर दौरा के सूचना कन्हो ला झिन दे, उदुपले कहूं तिर छापा मारे कस उतरबो।
चित्रगुप्त हा बरम्हाजी संग अपन बिमान म येती वोती किंजरे लगिन। चित्रगुप्त जे तिर उतरे बर कहय, बरम्हाजी हा मना कर देवय, बरम्हाजी ला लगय के, ये तिर के मनखे मन, चित्रगुप्त के करमचारी मनके सिखाये पढ़हाये होही तेकर सेती, इही तिर उतरे के जिद करत हे। एक जगा म बड़ भीड़ भड़क्का देखिस तिही मेर बिमान ला उतरवा दिस। खोर ले कुरिया तक बड़ लमभरी लइन लगे रहय। दुनो झिन लइन म लगगे। सरपंच के दफतर रिहीस ओहा अऊ उहां रासन कारड बनत रहय। गांव के भुंइया के नाप जोख बर हिसाब कितब चलत रहय। सरकार के कलयानकारी जोजना के परचार परसार अऊ पात्र मनला तुरते लाभ दे के बूता होवत रहय। जम्मो पात्र मनखे के काम बिगन कन्हो लेनदेन अऊ भेदभाव के तुरते होवत रहय। अपात्र मन अपन बूता ला पइसा म करवाये के परयास म भारी फटकार सुनिस। बरम्हाजी बिगन पाप के होवत बूता देख चुपचाप खसक दिस। थोकिन अऊ आगू बढ़िस, राज्य के राजधानी म अमर गिस। उहां पता चलिस के एक झिन प्रदेस इसतर के नेता हा अपनेच पारटी के कच्चा चिट्ठा ला जनता म उजागर कर दिस, सरकार गिरगे फेर ओहा अपन इमान ले नी डिगिस। दुनों झिन देस के राजधानी म पहुंचगे। उहां रासटीय नेता मन तिर पहुंचगे। जनता हा ये नेता मनला इमानदारी के सेती जितवाय रहय। इही गुन के सेती, येमन मनतरी तको बन जाय रहय। फेर अतेक दिन मनतरी रेहे के बावजूद, न तोप खइस, न चारा, न स्प्रेक्ट्रम चघलिस, न कोयला हबरिस। अऊ तो अऊ जे खाये के कोसिस करिस तेकर नाव बता दिस। येकर सेती सरकार के बहुतेच बदनामी होइस। दूसर बेर सत्ता बर लाले परगे। बरम्हाजी माथ धर लिस। चित्रगुप्त किथे – अतेक मुफत म मिलत माल म तको हाथ नी डारिस बिया मन। न खुद खइस न कन्हो ला खावन दिस। अइसन ला काये सजा देबो भगवान। कहींच पाप नी करे कहिके, अइसन मनला सजा दे भी देतेन भगवान, फेर येमन अपन करनी के सजा इंहींचे पागे। भगवान किथे – देखा कइसे सजा पइन अइसन मन। चित्रगुप्त हा अपन समययंत्र ला कुछ बछर बढ़हा दिस। बरम्हाजी देखिस – अतेक बछर नेतागिरी करे के बाद भी बुढ़हारी म, अइसन मनला भीख मांगे बर परत रिहीस।
बरम्हाजी किथे – वापिस चल। सरग म कोन कोन ला राखे हस तेकर जांच करहूं। सरग म पहिली वो मनखे के जांच करिस जेमन पिरथी म करमचारी रिहीस। ओकर मनके पूरा रिकाड निकालिस। कमपूटर के बटन ला जइसे चपकिस, एक झिन मनखे के नाव गांव पता अऊ ओकर सरी रिकाड आगू आगे। पहिली मनखे हा नानुक पटवारी रिहीस बपरा हा। जिनगी भर दूसर के भुंइया ला दूसर के नाव नी चघइस। नकसा खसरा बनाये बर पइसा नी मांगिस। चहा पानी पिये बर कन्हो ला नी पदोइस बलकी अपन जेब ले किसान मनला खवइस पियाइस। बरम्हाजी हा दूसर मनखे के प्रोफाइल खोलिस। ये दारी एक झिन गुरूजी के फाइल खुलगे। यहू कइसन गुरूजी रिहीस, रोज समे म इसकूल जावय, एकेक लइका ला धियान देके पढ़हावय। पास करे बर काकरो महतारी बाप ले पइसा नी मांगिस। मध्यान्ह भोजन म कभू घपला नी करिस। दूसर के फाइल खोलिस। ये इनजीनियर रिहीस। बरम्हाजी ला लगिस ये जरूर पकड़ाही। रिकाड म पता चलिस, येकर बनाये घर म नानुक खरोंच तक निये, सड़क बनइस तेहा कतको टरेफिक के बावजूद भी जस के तस चमकत हे, अतेक दिन म बांध म नानुक टोंड़का नी होइस ……. जबकि ये इनजीनियर के दूसर पारी के समे लकठियागे रिहीस। माऊस ला इसकराल करिस। एक झिन कलेकटर के फाइल खुलगे। बापरे अतेक इमानदार तो जिनगी म नी देखे रिहीस बरम्हाजी हा। काकरो काम रूकत नी रहय। येकर इमानदारी म छेत्र के नेता मन परेसान रहय। थोकिन अऊ आगू के फाइल खनगालिस त डाकटर के नाव दिखगे। वो डाकटर हा जिनगी भर अतेक अपरेसन करिस फेर, न काकरो आंखी फोरिस, न काकरो गरभासय ला जबरन निकालिस, न काकरो किडनी बेंचिस न कन्हो ला पइसा के लालच म असपताल के चक्कर कटवइस। अपन बिमारी के इलाज ला बपरा हा पइसा के अभाव म नी करवा सकिस अऊ घिंसट घिंसट के तड़प तड़प के मरिस। बहुत दरदनाक मऊत पढ़हे के बाद कमपूटर ला बंद करे बर चपके के पहिली एक झिन दरोगा के फाइल दिखगे। बड़ अजीब किसिम के दरोगा रिहीस। न अवेध सराब बनावन दिस न बेंचन। दिन रात किंजर किंजर के लूट चोरी डकैती म अतेक अनकुस लगा दिस के सरी लुटेरा मन भूख मरे बर लग गिन। चित्रगुप्त केहे लगिस – निरदोस निरपराध मनला चरपा के चरपा भूख म झिन मरे लागय कहिके, बहुत मुसकिल ले ओमन ला, सनसद बिधानसभा नगरपालिका अऊ गराम पंचइत म एडजस्ट करें हंव। बिपकछी मनला यहू म चैन नी परिस, उहों येमन ला ठीक से जियन खावन नी देवत हे भगवान। कुछ अइसन मनला मनदिर देवाला तक म एडजस्ट करे बर लाग गिस।
भगवान सोंचिस, चित्रगुप्त लबारी मारत हे। बिगन बूता करे मनखे के पेट भर जावत हे माने कहूं न कहूं तिर गड़बड़ी हे। भगवान हा चित्रगुप्त ला बिगन बताये पिरथी म फेर अमरगे। भगवान देखिस, किराना के दुकान म दुकानदार हा न तो तउल म कांटा मारत रहय, न मिलावट करत रहय न काकरो ले मनमाने किम्मत वसूलत रहय, न काकरो मजबूरी के फायदा उठावत रहय। उदयोगपति के आपिस के कुरिया म निंगगे भगवान हा। उदयोगपति हा न टेक्स के चोरी करत रहय, न लइसेंस बर गलत तरीका अपनावत रहय अऊ तो अऊ अपन कमपनी म होवत फायदा ला जादा से जादा अपन करमचारी मनला देवत रहय।
भगवान ला समझेच म नी आवत रहय के अइसे कइसे हो सकत हे के कन्हो अपराध करत नी दिखत रहय। ओला लगिस अइसन म इहां के कछेरी अदालत बंद होगे होही। रेंगत रेंगत उदुपले एक ठिन नियाय के मनदीर दिखगे। भूत बंगला ले कम नी रहय। कछेरी भितरी पहुंचगे। उहां मरे रोवइया नी दिखिस। न ओकील न मुवक्किल। नियावधीस के दफतर म एक ठिन फाइल नी दिखीस। माछी मारत अरदली चपरासी अऊ उंघावत नियावधीस मिलीस।
भगवान सोंचिस, अखबार वाले मनला पता रहिथे के कोन कोन काये काये गलत काम बूता म लगे हे, ओकरे मन तिर चल दिस। पहिली सोंचिस, सीधा पूछहूं त कोनेच बताही। एक दू झिन ला पइसा के लालच दिस। कोई कुछ नी बतइस बलकी भगवान के नाव म रिपोट लिखाये बर पुलिस ला फोन लगा दिस। भगवान झम्मले गायब होगे त बांचिस।
चार दिन तक बरम्हा के गायब होये ले सरग म हाहकार माते रहय। बरम्हाजी के खोजाखोज माते रहय तइसने म बरम्हाजी दम्म ले अपन खुरसी म बइठगे। हफरत रहय बपरा बरम्हाजी हा। चित्रगुप्त ला तिर म बलइस अऊ केहे लगिस – मनखे ला अपराधेच करे बर बनाथन अऊ बिया मन देवता कस सरीफ बनके किंजरत हे तेकर सेती हमर नरक के यातनासिविर जुच्छा परगे हे। जतेक यातनासिबिर के खाली बइठे जमदूत हे तेमन ला, मनखे बनाके पिरथी म भेजव। चित्रगुप्त सन खाके पटवा म दतगे। डोकरा पगला गेहे सोंचे लगिस। फेर बरम्हा के बात के अरथ ये आय के जे कहि दिस तेला होनाच हे। जमदूत मनला पिरथी म भेजे के पलानिंग कर डरिस। यमराज तक बात पहुंचगे। बरम्हा के बात काट सकना समभव नी रिहीस त ओहा चित्रगुप्त तिर अपन बात रखिस के, मोर जतेक दूत मन जाही तेमन ला ओतके सुख मिलना चाही जइसे हमर लोक म पावत हे। चित्रगुप्त घला बिगन सोंचे समझे हव कहि दिस।
कुछ बछर पाछू …………..। पिरथी ला सरी जमदूत मन कबजिया दरिन। पंचइत से सनसद तक, चपरासी से सचिव तक, अरदली से नियावधीस तक, हाकर से समपादक तक इही मन छागे। अऊ जे मनखे मन बहुत सरीफी झाड़त रिहीन तेमन ला आम जनता बना दिस। इही आम जनता मन, ईमानदारी अऊ सत्य बचन के करम दंड भोगत, भूख गरीबी अऊ बेकारी के सिकार होये लगिन। पूरा पिरथी म लूट अतियाचार अऊ आतंक के राज छागे। कुछ अऊ बछर बीते के पाछू, यमदूत मनके आदत ला, आम जनता के बीच के कुछ मन सीखे लागिन तब जमराज हा जमदूत मनला वापिस करे के गोहार पारिस। तब जमदूत मन वापिस जमलोक जाये बर मना कर दिन। अऊ तो अऊ जमदूत मन अपन अतेक अकन सनतान बिया डरिन के, जेती देख तेती उहीच उही मन दिखय। बरम्हाजी तक बात पहुंचगे के जमदूत मन वापिस आये ले मना करत हे तब जमदूत मनला तलब करे गिस। जमदूत मन अपन कतको अकन संगठन बना डरे रहय। इंकर परतिनिधि मंडल हा बरम्हाजी से मुलाखात म बतइस के, हमन ला वापिस नरक जाये के कन्हो आवसकता निये। नरक के यातनासिविर ला चुमुकले बंद कर दव। हमन ला जे बूता नरक म करना चाही तेला इन्हींचे करत हन। बरम्हा किथे – का करत हव तूमन। यमदूत मन किथे – टेड़गा बहुरुपिया मन ला अपन संग संघेर के, सिधवा इमानदार मनखे ला आम जनता बनाके, नरक के यातना ला इंहे भोगवावत हन। बरम्हा के गलत निरनय ला, निरदोस मनखे, जनता बनके, आज तलक भुगतत हे।

हरिशंकर गजानंद देवांगन
छुरा.