Category: महाकाव्‍य

गरीबा महाकाव्य (दसवां पांत : राहेर पांत)

जब समाज मं शांति हा बसथय शांति पात जिनगानी।
दुख शत्रुता अभाव भगाथय उन्नति पावत प्रानी।।
मारपीट झगरा दंगा ले होवत कहां भलाई।
मंय बिनवत हंव शांति ला जेहर बांटत प्रेम मलाई।।
लगे पेड़ भर मं नव पाना, दसमत फूल फुले बम लाल
लगथय – अब नूतन युग आहय, क्रांति ज्वाल को सकत सम्हाल!
अब परिवर्तन निश्चय होहय, आत व्यवस्था मं बदलाव
पर मंय साफ बात बोलत हंव – नइ दुहरांव पूर्व सिद्धान्त.
याने महाकाव्य मं मंय हा, होन देंव नइ हत्या खून
जीवन जीयत बड़ मुश्किल मं, तब बढ़ जाय ऊन के दून.
रस वीभत्स लहू शव हत्या, यदि देखे बर किरिया खाय
पढ़ लव रामायण महाभारत, आत्मा ला कर लव संतुष्ट.
दू ठन विश्व युद्ध देखे हन, मुड़सरिया मं तीसर युद्ध
हत्या कथा फेर यदि लिखिहंव, देहूं कहां शुद्ध साहित्य?
बर्लिन के दीवार हा टूटिस, तब मंय घलो रखत विश्वास-
क्रांति हा शांति ला धर के आहय, ककरो जीव हानि नइ होय.
धनसहाय हा मन मं सोचत – नौकर मन हा छोड़िन काम
मोर दुवारी तक नइ झांकत, दूर ले देख के मुंह टेंड़ियात.
परे खार मं सब बिरता हा, फल मन हा पक के तइयार
बिना श्रमिक कोन लू के लानय, खार मं अन्न हा होत खजार.
अपन स्वार्थ के पूर्ति करे बर, मंय हा चलव एक ठक चाल
अगर झुके ले काम सधत हे, एमां कहां कटत हे नाक !
तुरुत गरीबा ला बलवाथय, अ‍ैस गरीबा ओकर पास
धनवा ओकर स्वागत करथय, मुंह मं प्रसन्नता ला लान.
कहिथय -“”बइठे बर नइ आवस, हम अउ तुम बचपन के मीत
हवय तोर बर हिरदे फरिहर, मोर बात पर कर परतीत.”
परिस गरीबा हा अचरज मं – धनवा हा शोषक बटपार
कुकुर असन पर ला दुतकारय, खेदय तुरुत डेरौठीपार.
कइसे गिरगिट अस रंग बदलत, मिट्ठी मधु अस ढिलत जबान
लगथय – एमां स्वार्थ घुसे हे, तभे मोर होवत सम्मान.
“”जीवन भर मं अभी अचानक, कइसे करे मोर तंय याद
काय बात हे खोल के फुरिया, एको कनिक कपट झन राख.”
रखिस गरीबा वाक्य कड़ा अस, ताकि वजह हा सम्मुख आय
धनवा के दिल बान हा परगे, पर बोलत हे स्थिर बुद्धि-
“”नौकर मन ला उभरा के तंय, काम छोड़ा के बइठा देस
मोर विरुद्ध चाल रेंगत हस, काबर करत मोर संग रार ?
परे खार मं ठाहिल बिरता, गरुवा मन राहिद उड़ियात
वन के पशु बिरता पर घोण्डत, चिरई घलो खावत हें फोल.
याने जेन अन्न सकलातिस, कतको झन के रखतिस प्राण
तेहर ख्वार खार मं होवत, एहर कहां बुद्धि के काम !”
“”लाख बखत समझाएन तोला, लेकिन कहां देस तंय ध्यान
जहां क्रांति के आगी बरथय, सहना परत बहुत नुकसान.
मितवा, मोर सलाह मान तंय, सुम्मतराज ला कर स्वीकार
ओकर तिरस्कार नइ होवय, मंझनकुन जे आवत लौट.”
“”तुम्हर असन यदि मिहनत करिहंव, रहन सहन यदि आम समान
मोर कोन इज्जत ला करिहय, पल पल मं पाहंव अपमान ?”
“”मानव मानव भेद कहां कुछ, धनवा तंय चल सबके साथ
समता सिवा राह नइ दूसर, विश्व शांति बर औषधि एक.
कर पतियारो बिगर उदेली, तज हुम्मसही झगड़ा रार
वरना तोर घलो उहि दुर्गति – जइसे क्रूर जार परिवार.”
धनवा करत विचार अपन मन – यदि ओरझटी करत मंय खूब
तब नुकसान मोर खुद खत्तम, तेकर ले मंय अब नंव जांव.
जब विपरीत वक्त हा आवय, मानव सहय वक्त के मार
समय खराब सरक जावय तंह, अपन बात राखे इंसान.
“”एक के का चलिहय सौ सम्मुख, चलिहंव तुम सुझाय जे राह
बिरता ला सकेल के लानव, राखव खावव एक सलाह.
तंय समझाय मरत ले मोला, अंतस भींगगिस सब बात
सुम्मत राज ला मंय स्वीकारत, मोर बात पर कर विश्वास.”
धनवा हा जब अइसे बोलिस होत प्रसन्न गरीबा ।
सोचत – लउठी नइ टूटिस पर मरगे बिखहर डोमी ।।
ओतिर ला अब तजत गरीबा, कहिथय ग्रामीण मन के पास-
“”एको कतरा लहू गिरे बिन, होगिस सफल जमों उद्देश्य.
धनवा रजुवा गिस सामिल बर, चहत कमाना सब संग जूट
खार के बिरता कार बोहावय, चलव अन्न ला लानव काट.
ओला मींजन कूटन सब मिल, तंहने रखन सुरक्षित ठौर
जे मनसे ला होय जरुरत, ओहर अन्न लेग के खाय.”
अब ग्रामीण फसल काटे बर, झाराझार होत तैयार
तभे करेला के सांवत हा, अ‍ैस गरीबा तिर तत्काल.
कहिथय -“”शुभ संदेश देत हंव – नेवता नेवते बर मंय आय
दसरूके शादी हा निश्चित, अब संबंध टूट नइ पाय.
मरिस अंजोरी तेला जानत, ओकर बहिनी दुकली जेन
ओकर जोड़ जमत दसरूसंग, तंय हा समझ गोठ ला साफ.
दसरूतुंगतुंगाय पहिलिच ले, पर दुकली हा परगे सोच –
“”मंय हा सदा शहर मं रहिथंव, खटक पाय नइ कुछुच अभाव.
याने जेन जिनिस आवश्यक, जमों जिनिस के तुरुत प्रबंध
आवागमन दवई अउ शिक्षा, सब के पूर्ति यने सब टेम.
लेकिन गांव अभाव मं जीयत, नइ पावन आवश्यक चीज
आवागमन दवई अउ शिक्षा, इंकर कमी देवत तकलीफ.
पर आखिर दुकली हा सोचिस – गांव रथय तेहू इंसान
उंकर साथ जिनगी ला काटंव, दुख ला समझ के सुख भण्डार.
मोर राह पर पर तक चलिहय, तंह परिवर्तन आहय गांव
हमर उंकर मिहनत ले होही, नरक असन हा सरग समान.”
कथय गरीबा ला सांवत हा -“”दुकली हा करलिस स्वीकार
अपन वाक्य पर कायम रहिहय, दिही सदा दसरू ला साथ.
जमों भार हे तोरे ऊपर, दसरू के नइ अन्य सियान
चट मंगनी पट शादी करके, लहुट जबे तंय अपन निवास.”
परिस दुसन्धा बीच गरीबा, हां या नइ – उत्तर नइ देत
आखिर अपन चलिस सांवत संग, सनम के मुड़ बोझा ला खाप.
बोलिस -“”देख सनम तंय जानत – धनसहाय हे स्वार्थी जीव
अपन काम ला पूर्ण कराथय, ठेंगवा ला देखात हे बाद.
तंय हा जागरुक अस रहिबे, आय सुरक्षित जमों अनाज
एकोकनिक हानि झन होवय, रखत जुंड़ा ला खांद मं तोर.”
जहां सनम हा स्वीकृति देइस, होत गरीबा हा निÏश्चत
ओहर जावत नवा करेला, सांवत घलो चलत हे साथ.
एमन जब दसरू घर पहुंचिन, आमा लीम के मड़वा छाय
घर के आगू बांस गड़े हे, छेना अरसा राखे गूंथ.
दिखत बरत अस घर कुरिया हा, पंड़री पिंवरी छुही पोताय
कतको चित्र खिंचे मिथिया भर, होवत ग्रामीण संस्कृति गान.
दसरू के तिर गीस गरीबा, दसरूहोवत खुश अंधेर
“अड़े काम कइसे निपटावन ? सुम्मत बांधत दुनों मितान.
जमों भार मितवा पर गिस – अब दसरूदुलहा राजा ।
दिन बुड़गे तंह चुलमाटी गिन संग धर दफड़ा बाजा ।।
माटी कोड़त मार के साबर, चिंता अपन परानी साथ
बेलबेलही टूरी मन हंस हंस, भड़त जंहुरिया के धर खांध-
“”तोला साबर धरे ला
तोला साबर धले ला नइ आवय मीत, धीरे धीरे
धीरे धीरे अपन तोलगी ला तीर, धीरे धीरे
तोला माटी कोड़े ला
तोला माटी कोड़े ला नइ आवय मीत, धीरे धीरे
धीरे धीरे अपन मेंछा ला तीर, धीरे धीरे
तोला माटी जोरे ला
तोला माटी जोरे ला नइ आवय मीत, धीरे धीरे
धीरे धीरे अपन पागा ला तीर, धीरे धीरे
तोला माटी बोहे ला
तोला माटी बोहे ला नइ आवय मीत, धीरे धीरे
धीरे धीरे अपन कनिहा ला तीर, धीरे धीरे…”
जहां इहां के रुसुम हा उरकिस, वापिस होथंय बार मसाल
भितरी “चोरहा तेल’ चढ़ाइन “मुड़ा लाय’ के थोरिक बाद.
“तेल मैन’ होथय दूसर दिन, दुलहा नहा लीस जल साफ
पर्रा पर बइठार किंजारिन, मितवा मन दुलहा सम्हरात.
मुड़ पर “मौर’ झूल दरपन के, गला मं सुंतिया – काजर आंख
अदक नवा कुरता अउ धोती, मन चोरात हे वर के रुप.
दुलहा सजा के इज्जत देवत, खड़ा करिन एक परछिन ठौर
दिया बरत करसी ला लानिन, तिरिया मन संउपत हें सौर –
“”पहिरव दाई ओ सोना कइ कपड़ा
ओ सोना कइ कपड़ा
संउपउ दाई मोर हंसी के मौर.
हमरे दाई हा बड़े ओ अजूबिन
दाई बड़े ओ अजूबिन
मंगथे ओ दाई दूध के धार
दे तो दाई- दे तो दाई अस्सी ओ रुपिया
के सुन्दरी बिहन बर जाऊं
तोर बर लाहूं दाई रंधनी – पोरसनी
के मोर बर लाहंव जनम सिंगार
गोबर हेरइबे दाई पानी भरइबे
छूट जही दाई के दूध के उधार
सुंदरी सुंदरी दाई तुम झन रटिहव
के सुंदरी के देसे बड़ दूर
चढ़े बर कथे दाई लिली हंसा घोड़वा
के सुंदरी ला लानव बिहाव
एक गोड़ मारो बेटा रइया रतनपुर
कि दुइ गोड़ मारो बेटा दिल्ली सहर
खड़े खड़े पांव पिरागे, पिरागे माथे के मौर
धोतियन फिलगे न कुरथन फिलगे माथे के मौर
पहिरव दाई – पहिरव दाई
ओ सोना कइ कपड़ा – ओ सोना कइ कपड़ा
संउपउ दाई मोर हंसी के मौर…।।
अब तड़तड़ी बरतिया जाये, कपड़ा सम्हर होत तैयार
वृद्ध युवक बालक मन जावत, सब के मन मं बड़ उत्साह.
नांदगांव मं गीस बरतिया, देखे बर जुटगे भिड़भाड़
बाजा सुन घेरिन चंवतरफा, लोरत गिद्ध मांस के पास.
शहर के बेलबेलहा टूरा मन, इंकर बुगई चुटचुट खन दीन
युवती मन हा तंग करे बर, नंगत भड़त मुड़ी ला जोर –
“”आमा पान के बीजना हालत डोलत आये रे ।
किसबिन के बेटा हा बरात लेके आये रे ।।
करिया करिया दिखथस बाबू
काजर कस नइ आंजे रे
दाई ददा ऊपर चल दिन
घर घर बासी मांगे रे.
तरिया तिर के पटुवा भाजी
पटपट पटपट करथय रे
गांव करेला के टूरा मन
मटमट मटमट करथंय रे
आती गाड़ी जाती गाड़ी
गाड़ी मं लानेंव सूत रे
हमर दुलहा डउका ला
ले जाये कउनो धर के…।।
इही मंझोत अ‍ैस बइसाखू, गोठियावत दसरू के साथ –
“”दुखम सुखम निपटा लेबे भइ, बपरी दुकली दीन अनाथ.
एकर भाई जेन अंजोरी, जेकर जीव व्यर्थ चलदीस
यदि एला कुछ विपदा मिलिहय, तंहने दुख मं वृद्धि अपार.”
दसरू कथय -“”एल झन मोला, मंय खुद हा नइ जीव विशेष
हम अउ दुकली अन एके अस, एक दुसर के करबो मान.
दुकली के सलाह मंय सुनिहंव, ओकर बर हे साफ विचार
अगर बीच कुछ खट्टा पांजी, करबो खतम सतम ला पूछ.”
इंकर बीच मं अ‍ैस गरीबा, बइसाखू ला कहिथय हांस –
“”दसरू के मन उड़त रुई अस, लुकलुकात हे करे बिहाव.
तंय उमंग मं बाधा झन बन, मंय हा ठेलहा अस निÏश्चत
मोर साथ तंय गोठिया मन भर, मोर प्रश्न के उत्तर लान-
अपन कथा फुरिया थोरिक अस, कइसे चलत तोर परिवार
नांदगांव के मुख्य खबर तक, टैड़क चइती के कहि हाल ?”
बइसाखू हा उत्तर देथय -“”बढ़िया चलत मोर परिवार
अपन नौकरी फिर पाये हंव, जमों जुरुम ले मंय आजाद.
चइती टैड़क नंदले जेमन, मरत ले भोगिन आर्थिक कष्ट
ओमन काम चलावत संघरा, मुद्रणकल के ऊंकर पास.
जतका लाभ प्रेस मं आवत, जमों श्रमिक मन खावत बांट
उहें छपिस मेहरू के पुस्तक, रुके काम पूरा हो गीस.
ग्राम के लेखक मरथंय रुरघुर, उंकर नाम जग ले मिट जात
ओमन ला अब करे प्रकाशित, करत इहिच संस्था हा काम.
ओहर सब तन पता लगाथय, लेखक मन के करथय खोज
उंकर सरत रचना सहेजथय, पुस्तक छाप करत उद्धार.”
धन्यवाद अब देत गरीबा -“”भूखा ला जेवन मिल जाय
मरत बिमरहा ला औषधि अउ, झुक्खा खेत ला जल के धार.
चइती मन जे काम करत हें, ठंउका मं ओहर उपकार
गांव के लेखक अब उत्साहित, उंकर कलम धरिहय रफ्तार.”
मेहरू के पुस्तक जे छपगे- क्रांति से शांति हे जेकर नाम
ओकर प्रति बइसाखू तिर हे, दीस गरीबा ला झप हेर.
बोलिस -“”तंय मेहरूला कहिबे – ओकर पुस्तक छपगे जेन
पुस्तक के मंय करत समीक्षा, चिभिक लगाके लिखिहंव लेख.
यदि रचना के स्तर उत्तम, तर्क साथ करिहंव तारीफ
यदि रचना के स्तर नीचे, मंय हिन के लिख दुहूं विरुद्ध.
पर मेहरू विचलित झन होवय, पक्ष विपक्ष तभो ले लाभ
बीज छिंचत सीधा या टेड़गा, मगर भूमि ले जामत पेड़.”
चुटपुट चुटपुट करत गरीबा, बइसाखू तिर रखिस सवाल-
“”मींधू ला पढ़ाय हस तंय हा, जीवनकथा ला जानत साफ.
पहिली गलत राह पर रेंगिस, बाद बनिस हे थानेदार
तंय निर्दाेष आस नभजल अस, तेला बेली तक पहिरैस.
पर हठील अस जन दुश्मन संग, मींधुच हा टक्कर ला लीस
अउ समाज के हित के खातिर, निज जीवन ला करिस शहीद.
अतका बढ़ा कथा मंय बोलत, एकर अर्थ समझ ले साफ
मंय हा कठिन प्रश्न लानत हंव, तंय उत्तर ला ढिल निष्पक्ष-
मींधू नेक- कर्म के उत्तम, नायक अस गुण अनुकरणीय ?
या ओकर सब काम गलत हे, खलनायक दुर्गण के खान ?”
बइसाखू हा सोच मं परगे, फिर देवत हे उत्तर ठोस-
“”मींधू पहिली जनता के अरि, मगर बाद जनता के मित्र.
चलिस काव्य मं गलती धारा – नायक बनिस एक झन व्यक्ति
ओकर होय प्रतिष्ठा पूजा, कवि मन लिखिन गीत यशगान.
दूसर व्यक्ति बनिस खलनायक, ओकर करिन बुराई खूब
पर ए लेखन दोष से लबलब, होत दिग्भ्रमित भावी वंश.
सच मं हर मनसे हा होथय – गुणी अवगुणी योग्य अयोग्य
कर्म वक्त स्थान परिस्थिति, परिवर्तन इनकर अनुसार.
एक व्यक्ति नायक नइ होवय, ना सदगुणी न मानव श्रेष्ठ
ओकरो तक मं दोष बुराई, आलोचना के लाइक काम.
दूसर खलनायक नइ होवय, ना अवगुणी न नीच खराब
ओकरो तक मं गुण अच्छाई, तारिफ लाइक ओकर काम.”
पैस गरीबा प्रश्न के उत्तर, ओकर जिज्ञासा हा शांत
मिहनत करिन दूनों झन मन मिल, तेकर मिलिस उचित परिणाम.
बातचीत हा सरलग रेंगत, तेमां परगे फट ले आड़
बाहिर तन मनखे चिल्लावत, ओतन भागत पल्ला छोड़.
एमन सोचत – मनखे मन काबर चिल्लावत भारी ।
चलव वास्तविक पता लगावन काय होत अनहोनी ।।
चलिन गरीबा अउ बइसाखू, पहुंचिन एक जगह बिन बेर
उहां मुख्यमंत्री हा हाजिर, ओहर फंसे कष्ट के बीच.
ओकर चारों तन हें मनखे, ओमन करत बिकट घेराव
मनखे मन हा क्रोधित नंगत, डेंवा उनकर मुखिया आय.
उहां हवय उद्योगी मंगलिन, घना बगस अउ बाबूलाल
पत्रकार अधिकारी जनता, हाजिर शहराती ग्रामीण.
डेंवा किहिस मुख्यमंत्री ला -“”तुम नेता मन धोखाबाज
अपन मान धन पद राखे बर, बोलत रथव रटारट झूठ.
छेरकू मंत्री ला जानत हस, ओहर करिस वायदा एक
बांध बनाय दीस आश्वासन, लेकिन अब तक काम अपूर्ण.”
शांति साथ मुख्यमंत्री बोलिस -“”छेरकू हा निकलिस गद्दार
देश के गुप्त रहस्य ला बेचिस, करे हवय विश्वास के घात.
ओकर पोल हा टकटक खुलगे, जब आइस पकड़ाय के टेम
छेरकू दूसर देश भगागे, कहां बसत तेहर अज्ञात.”
डेंवा भभक जथय गुस्सा मं, रोष बढ़ा के कहिथय जोर –
“”तुम नेता मन स्वार्थी होथव, अपन लाभ बर बेचत देश.
जनता ला तुम उभरावत हव – काम करव रख सत ईमान
पर खुद गलत राह रेंगत हव, कथनी करनी मं कइ भेद.”
शांति साथ मुख्यमंत्री बोलिस -“”जे मनसे पर हे सब दोष
ओहर इहां उपस्थित नइये, तोर बात जावत बेकार.
तंय हा गारी देवत हस भिड़, उग्र करत हस अपन दिमाग
एकर ले सब काम हा बिगड़त, आय समस्या हल नइ होय.
तुम्मन बांध बनाये चाहत, एकर बर हम करन उपाय
शासन ले देवात मंय रुपिया, अपन कोष के रुपिया देत.
मनखे प्रमुख इहां पर हाजिर, धन ले सक्षम जे इन्सान
ओमन घलो मदद ला देवंय, उंकर पास मं जतका शक्ति.
जतका अस ग्रामीण पधारे, सब झन करव अर्थ सहयोग
एकर बर टरके झन बेरा, काम करव तुम तातारोस.”
“चेक’ मुख्यमंत्री हा फाड़िस, पहिली शुभ मुहूर्त कर दीस
ओकर पाछू सब झन रेंगिन, रुपिया दीन शक्ति अनुसार.
रुपिया दिस उद्योगी मंगलिन, एकर बाद किहिस रहि धीर –
“”हम्मन हा उन्नति पाये बर, रुपिया जोड़त हन दिन रात.
जनता हमर नमूसी करथय, बना देत शोषक गद्दार
स्वार्थी – खून चुसइया – लुटेरा, करत हमर पर कइ आक्षेप.
बात शत्रुता के सुनथन तब, हमला घलो चढ़त हे रोष
तंहने श्रमिक हा भूख मरय कहि, हम्मन करत क्रूर अस काम.
तुम्मन अभी मदद मांगे हव, हम कर देन अर्थ के दान
हमर साथ यदि मधुर मिलापा, हम हा तुम्हर अभिन्न मितान.
तुम मनसे अव – हम मनसे अन, मन ला बांट के राखन प्रेम
आज असन यदि मिट्ठी कहिहव, तुम्हर मांग हम करबो पूर्ण.”
तभे मुख्यमंत्री हा देखिस, बाबूलाल हे दुखी उदास
ओला अपन पास बलवाथय, करिस निलम्बन रद्द तड़ाक.
बोलिस -“”तंय हा रेहे निलम्बित, मगर अपन पद पर फिर बैठ
बांध के काम ला पूरा करवा, लेकिन एक बात रख याद-
भ्रष्टाचार भूल झन होवय, सब रुपिया के सद उपयोग
अगर काम हो जात सफलता, हमर तुम्हर जस होहय खूब.”
बाबूलाल कथय हर्षित मन – तोर बात मोला स्वीकार
मंय-डेंवा-ग्रामीण जतिक अस, मिलजुल के करबो सब काम.
एमां सबके अर्थ लगत हे, सब के तिर मं रहय हिसाब
तब फिर गलत काम नइ होवय, बांध बने के काम हा पूर्ण.”
जावत हे मुख्यमंत्री वापिस, डेंवा चलिस गांव के ओर
पलटिन बइसाखू अउ गरीबा, ओमन गिन शादी के ठौर.
किहिस गरीबा, बइसाखू ला -“”हम नेता पर डारत दोष
पर सब नेता एक असन नइ, होथय अंतर उंकरो बीच.
छेरकू मंत्री स्वार्थ पूर्ति बर, बेचिस देश के इज्जत शान
जे जनता देइस ऊंचा पद, छेरकू उही ला धोखा दीस.
मगर मुख्यमंत्री ला देखव – उहू व्यक्ति हा नेता एक
रुके काम ला पूर्ण करावत, जनता ला देवत हे साथ.”
बइसाखू सच तथ्य ला राखिस -“”नेता ला कहिथन बइमान
लांछन डार निकालत गल्ती, करत बुराई अवगुण खान.
नेता मंत्री जनप्रतिनिधि मन, होथंय शांत धीर गंभीर
उंकर बुराई निंदा होथय, पर ओमन देवंय नइ ध्यान.
ओमन ला बेकलाम कहव अउ, जाव मदद बर नेता पास
लेकिन ओमन नइ दुतकारंय, देवत मदद रंज ला भूल.”
इंकर बात मं आड़ परत अब, बढ़त चलत मनखे के भीड़
दूल्हा ला मोहाय अस देखत, ओमन ला नइ घर के याद.
जमों बरतिया ला परघाइन, दिन जेवनास उंकर धो – गोड़
सारी हा “लाल भाजी’ खवाइस, भांटो हा हारिस सब होड़.
फेर बरतिया मन जेवन लिन, पतरी पर रख खाद्य पदार्थ
रीति रिवाज चलत सादा अस, सुघ्घर अक बिहाव के नेंग.
वर वधु ला बइठारिन संघरा, अपन शक्ति तक टिकत टिकान
पंखा झलत मांई लोगन मन, गाना गावत उंकर जबान-
“”हलर हलर मड़वा हालय ओ दाई
खलर खलर दाइज परय
सुरहिन गैया के गोबर मंगइले दाई
खूंटी धर अंगना लिपइ ले ओ
गजमोतियन कर चौंके पुरइ ले ओ दाई
सोने के कलश जलइ ले ओ
कोन देवथे धेनु गाय ओ
कोन टिकथे कनक थारी ओ
दाई तोर टिकथे अचहर पचहर
दाई भइया देवथे धेनु गाय ओ
ददा टिकथे मोर लिली हंसा घोड़ा दाई
दीदी भौजी टिकथे कनक थार ओ…।।
वर वधु मन अब भांवर किंजरत, दुकली रेंगत चांटी चाल
दसरू मांग भरिस दुलहिन के, सात बचन ला हृदय सम्हाल.
वर वधु के कारण मं होगिस, गांव शहर मं मधुर मिलान
इंकर बीच मं प्रेम मिलापा, देश के सरलग मान विकास.
दुकली हा ससुरारे जावत, ओकर बिदा के आगे टेम
हितू पिरीतू मन हा कलपत, रोवत हें आंसू ला ढार.
उहां करुण रस स्वयं उपस्थित, सुख के अवसर तक हे साथ
दुकली सुसकत मइके त्यागत, पति के साथ चलत ससुरार.
नांदगांव ले छुटिन बरतिया, रुकथंय पहुंच करेला गांव
बचे रिवाज ला तड़के निपटा, कुटुम मीत मन वापिस गीन.
कथय गरीबा हा दसरूला -“”तुंगतुंगाय तंय करे बिहाव
तंय अउ दुकली एका होए, तुम्मन अब सितराव जुड़ाव.
यदि मंय अंड़ के रुक जावत हंव, तुम्हर प्रेम मं परिहय आड़
तेकर ले मंय लहुट के जावत, उंहचो अड़े गंज अक काम.”
पप्ची-करी के लाड़ू-अरसा, दसरू लैस बांध उरमाल
दीस गरीबा ला हर्षित मन, मित्र ला एल्हत खुलखुल हांस-
“”जेन कलेवा मंय अभि देवत, तंय रखबे दुखिया के हाथ
तंय बिहाव मं डंट खाये हस, रोटी झन जाये मुंह तोर.”
हवय गरीबा के मन हा खुश रेंगिस धर के रोटी ।
सुन्तापुर मं पहुंचिन तंहने आवत हे थर्रासी ।।
सब ग्रामीण दउड़ के आइन, सब तन घेर के होथंय ठाड़
ओमन धरे अस्त्र धरहा कइ, क्रोध ले कांपत लदलद देंह.
आंख लाल पुतरी मन किंजरत, ऊपर तरी बिरौनी नाक
भीड़ बीच ले कातिक आथय, दीस गरीबा ला रट मार.
बग ले बरिस गरीबा आंखी, संख असन उड़गे बुध चेत
करा अउ कीरा हा कर देथय, हरियर खेत ला चरपट नाश.
“”मोला उमंझ आत नइ थोरको, तुम काबर हव खूब नराज
मोर दोष का- काय कुजानिक, फोर देव तुम बिल्कुल साफ ?”
मंगिस गरीबा सच उत्तर तंह, ग्रामीण मन होथंय कुछ शांत
हगरूहा गुस्सा मं धधकत, तेहर फोरत साफ रहस्य –
“”तंय गोल्लर अस छेल्ला किंजरत, बर बिहाव के लड़ुवा खास
सुन्तापुर मं जे बांचे हन, बिना अन्न जल करन उपास !
हमर भलाई ला करबे कहि, माने हवन तोर विश्वास
पर कर्तव्य भूल के किंजरत, लगथय – एमां कपट के दांत.
तंय अनुपस्थित ते बेरा मं, धनवा करिस काम बेकलाम
अपन भविष्य के खुशियाली बर, हमर भविष्य ला करदिस नाश.
धनसहाय के खेत गेन हन, बिरता ला हम लाय सकेल
मींजकूट के अन्न सिधोये, पर ए बीच झपागे आड़.
धनवा हा कोतल संग धमकिस, झटक के लेगिस जमों अनाज
ओकर कब्जा अन धन पर हे, हम बइठे हन जुच्छा हाथ.
धनवा हा मेंछा ला अंइठत, डकहर सुखी हें ओकर साथ
बाड़ा अंदर छुपे सुरक्षित, अन्न झटक के भोगत राज.”
सनम हा गरीबा ला बोलिस, मीठ शब्द पर जहर समान –
“”मानव ला कुकर्म करना तब, निज चरित्र के करत सुधार.
जब विश्वास सबो तन जमथय, तंहने चलत कुचाल के राह
खुद ला रक्षित अस राखे बर, पर हा गिरे रचत षड़यंत्र.
जनता होय दिग्भ्रमित कहिके, तंय जोंगे जनहित के काम
पर अब भक ले धोखा देवत, पर परखे हन तोर कुनीत.
खुद के दोष छिपाये बर तंय, मोला बनवा देस सियान
तंय निर्दाेष प्रमाणित होवत, बद्दी हा चढ़गे मुड़ मोर.
खेल कबड्डी गदबद होवत, दू दल “चंदा सूरज’ नाम
चन्दा दल हा खेल ला हारत, उहां बचे सुकलू बस एक.
सुकलू हा खुडुवाये जावत, सूरज दल के अंदर गीस
पकड़िन सूरज दल के मनखे, तंह सुकलू गिर गीस जमीन.
सुकलू घंसलत आगू बढ़थय, पहुंचिस मांई डांड़ के पास
खब ले मांई डांड़ ला छूथय, ओतको बखत चलत हे सांस.
जतका सूरज दल के मनखे, तेमन मर के हारिन खेल
चन्दा दल हा विजयी होगे, जेहर पहिली पावत हार.
हम्मन खेलत हवन कबड्डी, पर धोखा आखिर छिन पाय
विजय पाय बर रखे भरोसा, तेकर गला हार के हार.
जे धनवा हा खेल ला हारत, तेहर गप ले अमरिस जीत.
आखिर छन मं भूल करे हन, ओकर दुष्फल भोगत आज.”
सुन बिखेद ललियात गरीबा, पर सम्हाल के रखिस विवेक
अपन साथ मं भीड़ ला धरथय, चलथय पूर्ण करे बर टेक.
करिस गरीबा वाकई गल्ती, ऐन वक्त पर डिगगे पांव
कतको सुदृढ़ तर्क ला राखत, पर ओहर बदरा अस धान.
सिरिफ काम हा बाचे हे अभि, जेन प्रमाणित करिहय सत्य
जब सब तर्क हार जाथय तब, मात्र कर्म हा आथय काम.
धनवा पास गीन एमन तब, धनवा बइठे ठसका मार
डकहर सुखी चिपट तिर बइठे, मानों आय हितू गोतियार.
कथय गरीबा हा धनवा ला -“”मोर पास तंय हुंकी भरेस
जतका चीज गांव मं हावय, ओमां सबके सम अधिकार.
लेकिन अपन बचन टोरे हस, जमों अनाज अपन घर लाय
अपन राज तंय फेर चला झन. चल वापिस कर सबो अनाज.”
धनवा रखे कलेचुप बोली, डकहर सुखी कूदगें बीच
धनवा ला बांचय कहि एमन, अपन वक्ष ला पहिले लात.
डकहर कथय -“”करिस धनवा हा, अपन चीज ला निज अधिकार
पर के चीज चोरा नइ लानिस, का अधिकार मंगे बर चीज ?”
बोलिस सुखी -“”अगर भूखा हव, तब तुम लेगव मांग अनाज
दान चहत तब तक ले जावव, या लेगव लागा बिन ब्याज.
पर धनवा के सब पूंजी पर, तुम्मन अगर चहत अधिकार
हमर रहत तक हे कठिनाई, मुश्किल काम हाथ झन लेव.”
धनवा के अनियाव ला जांहा, डकहर सुखी बताइन ठीक
मेहरू ओकर अर्थ समझगे, जानिस सब अंदर के भेद.
मेहरू सब ग्रामीण ला बोलिस -“”धनवा चलत गलत अस चाल
जतका दोष मात्र ओकर पर, दण्डित करव जउन मन होय.
लेकिन डकहर सुखी हें घालुक, देखत हवंय अपन भर स्वार्थ
धनसहाय ला दीन पलोंदी, जन्नविरुद्ध करा दिन काम.
लपटे रथय पेड़ पर बेला, पेड़ के ओहर रक्षक गार्ड
जलगस बेला पूर्ण सुरक्षित, पाये पेड़ अभय बरदान.
पेड़ कटाये यदि सोचत हव, बेला पर तुम करव प्रहार
बेला कटा अलग हो जाहय, तंहने पेड़ गिरा लव काट.
डकहर सुखी हवंय तलगस ले धनवा के दम दूना ।
यदि ओकर पर हमला होवत कोतल दिहीं पलोंदी ।।
पहिली डकहर सुखी ला झड़कव, उंकर हाल ला कर दव पश्त
तब धनवा पर वार ला मारव, निश्चय काम सफल निर्विघ्न.”
हवय गरीबा के तिर पुस्तक – क्रांति से शांति तक जेकर नाम
ओला मेहरू ला संउपिस अउ, हिरदे शुद्ध करिस तारीफ –
“”तंय जे नीति बताये हस अभि, ओहर हवय ठोस गंभीर
मंय इनाम मं पुस्तक देवत, तंय हर्षित मन कर स्वीकार.”
मेहरू जे रद्दा ला फोरिस, सब ग्रामीण समझगें अर्थ
ओमन डकहर सुखी के तिर गिन, कुचरे बर मुहरुत कर दीन.
जेहर पावत ओहर मारत, जे पावत ओमां रचकात
मारत तेहर हंइफो हंफरत, खावत मार के हाल खराब.
डकहर सुखी केंघरगे तंहने, बुतकू करिस उंकर तिर प्रश्न –
“”तुम जनता संग मरे जिये बर, किरिया खाय रेहेव प्रन ठोस.
लेकिन का आकर्षण खींचिस, धनवा पास फेर तुम आय
तुम्मन काय लाभ पावत हव, जे लेवत धनवा के पक्ष?”
गुनिस सुखी यदि भेद लुकावत, लिंही गंवइहा मन हा जान
तेकर ले सब तथ्य ला उगलन, अपन दुनों के जीव बचान.
किहिस सुखी -“”तुम सब जानत हव, धनवा से भागन हम दूर
ओकर ले नाता हा टूटिस, जनता संग जुड़गे संबंध.
पर धनवा पथभ्रष्ट करे बर, हमला दीस बहुत ठक लोभ
बोलिस – मोर पक्ष तुम लेवव, मंय देहंव कतको ठन लाभ.
मोर पास जतका चल अचला, लाये हंव जे उठा अनाज
सब ला बांट लेत हम तीनों, तुम दूनों तक हो हकदार.”
धनवा हा लालच दिस तंहने, सरन गिरे हन ओकर पांव
मगर लाभ मं कुछ नइ पावत, उलट परत थपरा भरमार.”
डकहर सुखी ला हगरूबोलिस -“”तुम दुर्गत अपमानित होय
पहिली के रद्दा पर चलिहव, या बदले बर रखत विचार !
हम सब अपन जमों पूंजी ला, फट कर देन गांव अधिकार
गांव के हम अन गांव हमर ए, मिटगे भेद गांव ग्रामीण.
तइसे तुमन हमर संग चलिहव, या फिर धरिहव दूसर राह
प्रश्न के उत्तर देव तड़ाका, ताकि लेन हम निर्णय ठोस.”
डकहर सुखी भविष्य ला समझिन, अंदर हृदय से हेरिन बात-
“”हमला गिधिया के झन पूछो, बात करे बर हम असमर्थ.
लेकिन हम अतका बोलत हन – हम ग्रामीण के लंहगर आन
जेन डगर ग्रामीण हा चलही, घिलर जबो हम अपने आप.
याने जन के साथ जिये बर, दूनों खड़े हवन तैयार
जे कानून गांव बर बनही, हम करबो हरदम सिवकार.”
डकहर सुखी निहू बन गिन तंह, सब ग्रामीण होत हें शांत
बन्जू राखे तथ्य लुका के, करना चहत बात ला साफ.
बन्जू बोलिस -“”मंय हा पहिली, निहू बने बर किरिया खाय
अर्पण करे अपन धन ला मंय, लेकिन आय दिखावा मात्र.
कपट विचार रखे रेहे हंव, यदि धनवा के दिखिहय जीत
जे धन ला सुपरित दे देहंव, ओकर करिहंव वापिस मांग.
पर स्पष्ट हाल देखत हंव – क्रांति सफल होवत ए वक्त
अब जनता हा विजय ला पावत, तब जनता ला देवंव साथ.
याने जे धन ला संउपे हंव, कभू करंव नइ ओकर मांग
सुम्मतराज समर्पित मंय हंव, अपन बचन मं खत्तम ठाड़.”
मेहरू बोलिस -“”हम जानत हन – तंय हा चले पूर्व जे चाल
तोर चाल ला नष्ट करे बर, हम जनता मन कड़क सतर्क.
लेकिन आज उचित जोंगे हस – रख ईमान देत हस साथ
एकर ले तंय दुख नइ पावस, सब मनसे मन हितवा तोर.”
बन्जू के रटघा हा टूटिस, आगू बढ़त क्रांति के पांव
धनसहाय पर रइ हा आवत, सब ग्रामीण खड़े हें घेर.
बोइर के गुठलू के अंदर, छुपे चिरौंजी हा चुपचाप
मगर चिरौंजी हा नइ निकलत, एकर बर बस इहिच उपाय.
पथरा ला गुठलू पर पटकव, गुठलू कइ कुटका बंट जाय
निकल चिरौंजी बार आवय, ओला झड़कव लेके स्वाद.
धनवा के मरुवा ला पकड़िन, दोंयदोंय झोरत ग्रामीण
धनवा लोझम परिस खाथंय खस, गिरगे दन्न ले बन बेहोश.
लेकिन धनवा हा मर जावत, चरपट होवत सब उद्देश्य
आखिर धनवा के रक्षा बर, अपने मन भिड़ करत उपाय.
धनसहाय के रक्षा होवत, देवत हवा छितत जड़ जूड़
लहू हा थम के दरद हा भागय, जोख के देवत दंवई निंघोट.
धनसहाय के चेत हा लहुटिस, सब तन देखत आंख नटेर
तब मनबोध ला लान गरीबा, रख दिस धनसहाय के गोद.
धनवा अपन पुत्र ला देखत, ओकर मुंह के “ऊंमा’ लेत
मानों – कभू पुत्र नइ देखिस, तइसे करत हृदय भर प्यार.
“”सब के साथ मरे जीये बर, खाके कसम करे स्वीकार
पर टेटका अस रंग बदले हस, अपन बात ला काटे कार.?”
किहिस गरीबा तंहने देखत धनवा फार के आंखी ।
अपन पुत्र के मुंह ला देखत देवत प्रश्न के उत्तर ।।
“”मोर ददा मोरे बर छोड़िस – घर भुंइया धन गरुवा गाय
अपन बिन्द बर मंय सकलत हंव, सोन मचुलिया मं सुत खाय.
यदि शत्रुता भंजाये चाहत, मोर देह के निछ लव चाम
पर बेटा ला सुखी बनाना, एक पिता के वाजिब काम.”
“”मानव के रिपु पुत्र हा होथय, करे हवय अध्यात्म बखान
छुद्र स्वार्थ के पूरा खातिर, पिता के सब यश सत्यानाश.
अपने अंश समझ सब झन ला, कर अर्पण अन धन बिन शोक
जीयत तोर मान पत होहय, मरे बाद गाहंय जस तोर.”
कई उल्थना गरीबा हा दिस, धनवा ला अड़बड़ समझैस
लेकिन नठे बुद्धि मं ओकर, एक शब्द तक घुस नइ पैस.
“”भगवत गीता शिक्षा देवत – अगर अधिक मन पावत लाभ
तब कमती के रांड़ बेचावय, अइसन काम मिलत हे पुण्य.”
बोल गरीबा हा मनसे संग, धनवा के लेवत हे जान
इही बीच फगनी हा आथय, बोलत सब तिर करुण जबान –
“”बन के निहू करत हंव बिनती – भले हमर अन धन ला लेव
मगर पुत्र एंहवात बचा दव, जीवन हमर अमर कर देव.”
फगनी जहां कल्हर के बोलिस, करिस गरीबा हा विश्वास
फगनी ले आश्वासन मांगत, खुद के पक्ष करे बर ठोस –
“”धनवा के जब लेत संरोटा, तंय हमरो सरियत ला मान
जतका अस आड़ी पूंजी हे, कर दव तुरुत गांव के नाम.
तुम्मन कहिके पल्टी खावत, तब अभि लिखव प्रतिज्ञा पत्र –
सबके संग तुम जीहव मरिहव, अपन सबो धन गांव ला देत.
लीस गरीबा उंकर हाथ के हस्ताक्षर ला लौहा ।
बनिन गवाह ग्रामवासी मन – ताकि होय झन नाही ।।
मनसे मन धनवा ला बोलिन – हम तोला देवत विश्वास
तोर भविष्य बिगड़ नइ पावय, ना कभु तोर फधित्ता होय.
जिये अभी तक जइसन जिनगी, ओकर ले स्तर हा ऊंच
तोर पुत्र मनबोध के सब हक, दूसर असन सुरक्षित जान.”
धनवा के अन धन जतका अस, होगे जमा गांव अधिकार
धनवा ला समझा के रेंगिन, बइठिन नइ मेड़्री ला मार.
मनखे मन उन्नति बर भिड़गें, तिरिया मरद करत हें काम
एकोकन कसरहिल मरत नइ, सबझन हर्षित खुशी मनात.
जतका ठक हे टेपरी डोली, ते मत्थम बहरा बन गीस
फूट जाय मुड़ मेड़ के कारन, पर अब रुकगे झगरा रार.
ट्रेक्टर गाड़ा कई ठक फांदे, भर भर पथरा मुरमी लात
ठंवठंव पटक चलावत धुम्मस, मुख्य सड़क अस गली बनात.
जे डोली हा जल बिन सुक्खा, होय सिंचइ कहि होत प्रबंध
जेन जगह मं रहय अंधेरा, उहां रगाबग होत प्रकाश.
सुन्तापुर के प्रगति हा होवय – मनखे सुंट बंध जोंगत काम
इंकर शक्ति ला जांचे खातिर, बेर तिपत कंस गड़िया खाम.
टिरटिर घाम फजर मं कहलत, भोंभरा तिपत लकालक झांझ
मृगतृष्णा जल बहत मंझनिया, लू के कारन व्याकुल सांझ.
थपथपाय मुड़ गोड़ पछीना, छिनछिन मं लग जावत प्यास
अबड़ दंद कपड़ा नइ भावत, गर्मी ऋतु हा करत हताश.
उठत भनन भन धुंका बंड़ोरा, धर के कागज कचरा धूल
उमठत रात नींद तंह छटपट, भुसड़ी चुटचुट चाब जगात.
दावाअगिन लगे जंगल भर, बांस घांस लकड़ी बर जात
वन्यजीव डर भड़भड़ भागत, आय उंकर बर दुख के टेम.
हगरू हा खपरा ला छावत, ओला धरथय खरीेअजार
कोथा फूलत देवत पीरा, तन फूलत जस कोंहड़ानार.
बुतकू ओकर हालत देखिस, मदद करे बर खब ले अ‍ैस
अउ कतको झन दउड़त पहुंचिन, काबर के नइ कुछ मिनमेख.
बला चिकित्सक ला करवाथंय – ओकर बने दवाई ।
हगरू उत्तम औषधि पाथय – रोग हा भागिस पल्ला ।।
हगरू हा बुतकू ला बोलिस -“”मंय कहना चाहत सच गोठ
जेन व्यवस्था हम लाये हन, ओकर पाय सुखद परिणाम.
पहिली असन व्यवस्था होतिस, मानव के रिपु पूंजीवाद
तब मरहा बर कोन हा करतिस – रुपिया दवइ समय बर्बाद !
सुम्मत राज हवय जनपोषक, मोला सत्य रुप अब भान
एकर थरहा जामे जग भर, सब झन पावंय सम सम्मान.”
बुतकू हा तरिया तन जावत, गरमी उखम करे बर शांत
ओकर संग मेहरूमिल जाथय, दूनों रेंगत हंस गोठियात.
अपन डेरौठी धनवा मिलथय, जेहर बइठे धर के गाल
ओहर चिंता मं चूरत हे, भूले हे बाहिर के दृष्य.
मेहरू मन तरिया मं पहुंचिन, बुतकू कहिथय हेरत मैल –
“”धनवा काबर हुंकय भुंकय नइ, जस रेंगय नइ जब्दा माल.
पहिली एकर राज चलय तब, पड़र पड़र मारय आदेश
दानी उपकारी पालक अस, करय दिखावा कई ठन ढोंग.
ओ मनखे ला अब का होगे, खुद विचार के अंदर खोय
हम्मन ला टकटक ले देखिस, लेकिन नइ हेरिस कुछ गोठ ?”
मेहरू हा उत्तर ला देवत -“”राज करिस जेकर आदेश
जेहर बाघ असन गुर्राये, खुद ला समझय पर ले ऊंच.
मगर व्यवस्था हा बदलिस तब, दूसर अक ओकर अधिकार
सामन्जस्य स्थापन मुश्किल, तब चिंतित बइठे गुम खाय.
ओकर घांस जहां मर जाहय, जीवन यापन अन्य समान
पहिली के हालत ला हंसही, वर्तमान के करही मान.”
दतुवन के चीरी ला बीनिन, साफ करिन आगी मेंे लेस
करिन साफ बहबिरित घंठोधा, जस साबुन मं धुलथय देंह.
फिर दूनों झन रगड़ नहाइन, घर तन लहुटिन तरिया छोड़
धनवा बइठे अब ले ओ तिर, अपन पुत्र मनबोध ला पाय.
मेहरूबुतकू तिर ले निकलिन, पर धनवा हा नइ दिस ध्यान
काबर के ओहर मनगभरी, सोच सिन्धु मं डुबकी लेत –
“”मंय जेला दपका के राखंव, धनवा नाम सुनत डर्राय
पर अब उल्टा धार बोहावत, उंकरो मान जतिक हे मोर.
मोर टुरा तक हे असुरक्षित, ओकर भावी हे अंधियार
तब दूसर मनखे के वंशज, काबर पावय सुख आनंद !
दुश्मन के निसनाबुत करिहंव, आगी ढिल के करिहंव राख
सुम्मतराज के लक्ष्य हा बरही, ओकर संग मं दुश्मन जेन.”
जब मनबोध के नींद हा परगे, पलंग सुता दिस चुम पुचकार
तंहने ओ कमरा मं जाथय – जिहां रखे घातक पेट्रोल.
धनवा हा पेट्रोल ला बोलिस -“”तंय हा थोरिक धीरज राख
तोर मदद मंय खत्तम लेहंव, होही पूरा मन के काम.
तोला सबके घर मं छिचिहंव, माचिस बार के ढिलिहंव आग
गांव के अन धन अउ दुश्मन मन, तोर कृपा ले जर के राख.
अधरतिया के बेरा आहय, मनसे देखत सपना मीठ
ऊंकर जीवन ला बारे बर, मंय हा करिहंव तोर प्रयोग.”
फगनी शौचकर्म ले लहुटिस, धनसहाय ला भोजन दीस
अपन घलो जेवन ला करथय, एकर बाद दुनों सुत गीन.
धनवा हा फगनी ला कहिथय -“”लउठी बम विध्वंशक चीज
जहर अस्त्र फांसी के फंदा, यद्यपि एमन हें निर्जीव.
पर मंय इनकर आंव प्रशंसक, एमन करत गजब उपकार
मनखे हा सजीव ताकतवार, मगर इंकर नइ पावत पार.”
फगनी हा अचरज मं कहिथय -“”जेन जिनिस के नाम गिनाय
ओमा नाश करे के ताकत, एमन मनसे के रिपु आंय.
लेकिन तंय हा करत प्रशंसा, तोर बुद्धि हा आज खराब
मोर पास तंय सत्तम फुरिया, तोर हृदय मं काय विचार ?”
धनसहाय हा हंस के रहिगे, उत्तर ला मन मं रख लीस
खुद हा सोय के ढचरा मारत, फगनी हा सच मं सुतगीस.
थोरिक रात निकल जाथय तंह, फगनी मरथय कंस के प्यास
ओहर पलंग ले उठके जावत, आधा नींद जगत हे आध.
धधमिंध उदुप उही कमरा गिस, जिंहा मड़े घातक पेट्रोल
घुप अंधियार हवय ते कारन, दिख नइ पावत हे कुछ चीज.
आखिर मं माचिस ला बारिस, तब होगे दुर्घटना एक-
बस पेट्रोल के तिर मं पहुंचिस, पकड़िस आग भभक्का मार.
“हाय दई अब जीव हा जाहय, यहदे धरिस भर्र ले आग’
फगनी चिल्ला बोम मचावत, संख असन उड़ियागे चेत.
ओतन धनवा हा जागत हे, अटपट घोखत दसना लेट-
“”बइरी मन सूरज नइ देखंय, ओकर पहिली मटियामेट.”
धनवा हा गोहार ला सुनथय, दउड़त गिस फगनी के पास
जहां उहां के हालत जांचिस, ओकर होगे सुन्न दिमाग.
धनवा हा फगनी ला पकड़िस, घर के बाहिर झप आ गीन
बोरोर बोरोर दुन्नों चिल्लावत, ताकि खबर फइलय सब ओर.
सुन ग्रामीण झकनका उठगें, परगे भंग परत जे नींद
छोड़ सुतई पागी ला सकलिन, धनवा के घर तिर मं अ‍ैन.
संइमो संइमो मनसे होवत, पेड़ ऊपर ऊगत कइ पेड़
एमन इहां खबर ला पूछत, ओतन बढ़त अगिन के रुप.
पूछिन -“”तुम काबर नरियावत, तुम पर आय कते तकलीफ
का दुर्घटना हा अभि घटगे, सुनन हमूं हा ठोंक बिखेद ?”
धनसहाय हा दीस इशारा – देखव तो घर कोती ।
आगी हा धक धक बाढ़त हे नभ ला छूवत जोती ।।
दुखिया बती घलो आये हे, फगनी तिर मं रखिस सवाल-
“”मंय हा सब झन ला देखत हव, पर अनुपस्थित हे बस एक.
तोर पुत्र मनबोध कहां हे, ओहर अभि नइ असलग तोर
ओला लान मोर तिर झपकुन, मंय हा देहंव मया सनेह.”
एला जब फगनी हा सुनथय, होगिस तुरुत सुकुड़दुम सांय
बेटा ला भूले हे अब तक, तेकर खब ले आइस याद.
हे मनबोध घरे के अंदर, ओकर हालत जानत कोन !
ओहर अब तक बचे सुरक्षित, या ओकर पर दुख के गाज !
“”हमर चाल मं कीरा परगे, घर मं छूटे हे प्रिय पुत्र
लकर धकर हम बाहिर आये, पर मनबोध के नइये ध्यान.”
बही असन फगनी हा बोलिस, दउड़त जावत अंदर ओर
धनवा घलो हाल जानिस तंह, पगला अस रोवत चिल्लात-
“”मोर पुत्र हा सुख ला भोगय, ओकर भावी हो आनंद
स्वार्थ पूर्ति बर करेंव लड़ाई, जग ला बना डरे हंव शत्रु.
उही पुत्र ला मंय भूले हंव, ओहर जूझत आग के बीच
मुंह देखाय के लाइक मंय नइ, ठंउका मंय अंव निष्ठुर क्रूर.”
धनवा हा अंदर पहुंचे बर, शक्ति लगावत उदिम जमात
मगर भीड़ हा पति पत्नी ला, अपन पास राखत हे रोक.
मनखे मन ला कथय गरीबा -“”धनवा के अभि व्यग्र दिमाग
अइसन मं यदि काम ला धरिहय, मिलिहय असफलता परिणाम.
सावधान रहि मंय घुसरत हंव, रखहू तभो मोर तुम ध्यान
मंय मनबोध ला लात सुरक्षित, एमां भले बिपत मंय पांव.”
दीस गरीबा पहिली इतला, जाय चहत हे भितर मकान
आगी ले भिड़ टक्कर लेतिस, तभे सनम आगुच मं अ‍ैस.
हाथ ला छितरा रद्दा रोकत -“”तंय जानत हस जमों बिखेद
मोर बाप के नाम फकीरा, सोनू हा धनवा के बाप.
धनसहाय के बाप हा लूटिस, मोर ददा ला सिधवा जान
दूसर वंश आय धनवा हा, शोषण करिस हमर श्रम बुद्धि.
तंय मनबोध के रक्षा चाहत, ओहर धनवा के औलाद
ओहर भावी वंश ला लुटिहय, पुत्र गली पर अत्याचार.
याने मंय सफ्फा बोलत हंव – होइस हमर आज तक लूट
हमर वंश अब होय सुरक्षित, ओकर शोषण हा रुक जाय.
मोला भले क्रूर समझस तंय – पर मनबोध के तिर झन जाव
ओकर अगर प्राण जावत हे, सुख पाहंय भावी संतान.”
सुनत गरीबा सांय हो जाथय लेकिन करत समीक्षा ।
वाजिब मरम ला समझिस तंहने तथ्य के पीयत मानी।।
किहिस गरीबा -“”मंय मानत हंव, करत हवस तंय बोली ठोंक
लेकिन मोर गोड़ नइ लहुटय, मंय जावत मनबोध बचाय.
यदि मनबोध के जान हा जावत, निश्चय होत कलंकित काम-
शांति के घर के दरवाजच मं, पुजवन होवत बाल अबोध.
हमर हाथ ले हिंसा होवत, अतिथि वंश धरही ओ राह
हिंसक उग्र आतंकी बनिहय, केंवरी हाथ गरम अस खून.
मंय मनबोध बचा के लाहंव, भावी वंश परय ए छाप –
कठिन प्रश्न के उत्तर लानय, शांति अहिंसा के रस मेल.
धनसहाय ला तंय झन घबरा, अब नइ करन सकय नुकसान
जमों डहर ले ओहर घिरगे, करन सकय नइ अत्याचार.
बुझत दिया हा अति तेजी बर, ओकर बाद चुमुक बुझ जात
धनवा हा अंतिम लाहो लिस, होत खतम ओकर वर्चस्व.
मोर बात ला तंय सुन ले- सबझन साथ बुता तंय आग
यदि आगी हा गांव मं बगरत, सब कलंक चढ़िहय मुड़ तोर.”
क्रांति के बाद शांति लाये बर, साथ देखाय अहिंसक नीति
चलत गरीबा आगी कोती, अंदर घर मं करिस प्रवेश.
आगी हा धधकत हे धकधक, कुहरा धुआं भरत हे नाक
देंह भुंजावत गिरत पसीना, मगर गरीबा शक्ति लगात.
कठिनाई संग लड़त गरीबा, अमरिच गे बालक के पास
पर मनबोध हिलत ना रोवत, परे खोंगस जइसे मृत लाश.
टप चिपोट धर हटिस गरीबा, बालक ला धरे प्राण समान
अड़चन टरिया पांव बढ़ावत, कतको बिपत सकिस नइ रोक.
भीड़ के तिर आ जथय गरीबा, गश खा गिरगे बालक साथ
मनखे दउड़ उठा लिन झटपट, ताकि बिपत हा झन बढ़ जाय.
तिरिया मन हा भिरे कछोरा, अगिन बुझावत जल ला लान
पानी हा यदि कमती होवत, कइ मनखे लानत हें दौड़.
सनम के मुंह ले बहत पछीना, देहं हा थक के चकनाचूर
लेकिन भिड़ के आग बुझावत, दूसर ला देवत उत्साह.
आखिर आगी चुमुक बुझागे बढ़ नइ पाइस ज्वाला ।
सुन्तापुर हा बचिस सुरक्षित तब खुश हें नर नारी ।।
अब मनबोध गरीबा मन के, जखम खतम बर चलत उपाय
अ‍ैस चिकित्सक खबर अमर के, करत दुनों झन के उपचार.
पात दवई मनबोध गरीबा, खावत दवई नियम के साथ
थोरिक दिन मं स्वास्थय हा लहुटिस, दरद खतम मिटगे सब घाव.
फगनी सत्य तथ्य ला जानिस, धनवा रखे रिहिस पेट्रोल
गांव साथ अरि ला भूंजे बर, रचे रिहिस षड़यंत्र कठोर.
फगनी हा धनवा ला बोलिस -“”ठंउका मं तंय अड़बड़ क्रूर
गांव नष्ट बर तंय सोचे हस, पर ए बात रखे हस याद-
इही गांव मं हम तक रहिथन, हम्मन साथ मं बर के राख
यदि पर बर खोधरा कोड़त हन, ओमा जाहय हमरो जान ?
मंय हा आग लगाये हंव तब, अ‍ैस कलंक मुड़ी पर मोर
मंय षड़यंत्र ला कुछ नइ जानंव, लेकिन मुड़ पर चढ़गे पाप.
पर ग्रामीण के कर्म ला परखव – जेला हम मानत हन शत्रु
ओमन मृत्यु के गाल मं जावंय, उंकर विरुद्ध चले हन चाल.
हमर पुत्र मनबोध ला ओमन, आगी ले रक्षा कर लैन
दुख के समय मदद ला बांटिन, ओमन आंय भला इंसान.
तंय हा क्रूर हठी मनखे अस, तोर मोर अब नइ संबंध
मंय मनबोध ला साथ मं लेगत, बासा करिहंव अन्ते ठौर.”
फगनी हा मनबोध ला पकड़िस, रेंगिच दिस धनवा ला छोड़
ओहर दुखिया के घर चलदिस, अपन बिपत ला फोरिस साफ.
दुखिया हा फगनी ला रख लिस, इज्जत देवत मीठ जबान
कुछ दिन हा इसने बीतिस तंह, फगनी मं आवत बदलाव.
एक रातकुन नींद ला लेवत, देखत हे सपना मं दृष्य-
धनवा आये हे ओकर तिर, पश्त दिखत हे जेकर हाल.
धनवा बोलिस -“”साथ अभी चल, मोर कुजानिक ला तंय भूल
तोर सलाह सदा मंय सुनिहंव, मंय तोला देवत विश्वास.”
फगनी हा झटकारिस तंहने, धनवा हा चलथय अउ चाल-
फट मनबोध ला कबिया लेथय, अपन साथ मं धर के जाय.
फगनी हा मनबोध ला झटकिस, ओला रखे स्वयं के पास
ऊपर दृष्य स्वप्न मं देखत, पर वास्तव मं घटना और. –
फगनी हा मनबोध ला पकड़े, कबिया रखे लगा के जोर
तब मनबोध कल्हर के रोवत, ओकर तन भर भरगे पीर.
दूसर कमरा मं दुखिया मन, दुखिया इहां दउड़ के अ‍ैस
फगनी ला हेचकार उठाइस, अउ मनबोध ला देवत स्नेह.
दुखिया हा फगनी ला पूछिस -“”रोवत कार तोर मनबोध
तंहू दिखत हस बेअकली अस, काय बात तंय फुरिया साफ ?”
फगनी मुंह ला करू बनाथय, फुरिया दिस सपना के हाल
कहिथय -“”जेकर संग नफरत हे – धनवा सपना मं दिख गीस.
मंय हा ओला छोड़ डरे हंव, टूटे हे अब ओकर साथ
ओकर ले मतलब नइ मोला, ओकर पास कभू नइ जांव.”
दुखिया थोरिक हंस के बोलिस -“”मोर बात झन मान खराब
धनवा साथ करत तंय झगरा, ओला मानत शत्रु समान.
पर धनवा हा तोरे दिल मं, ओकर करत सदा तंय याद
नर नारी मं जे आकर्षण, ओहर सत्य प्राकृतिक आय.
मोर सलाह समझ ले तंय हा – तुम धनवा संग फिर जुड़ जाव
पहली के गल्ती ला भूलव, एतन बरय प्रेम के दीप.
तुम दूनों मनबोध के पालक, ओहर जीवन मं सुख पाय
ओकर भावी हा बन जाये, तुम दूनों के करतब काम.
नेक सलाह दीस दुखिया हा, फगनी हा करलिस स्वीकार
धनवा तिर जाये रजुवागे, उंकर जुड़त हे फिर संबंध.
बड़े फजर हा खुशी ला लाथय, करत गरीबा उत्तम काम
फगनी अउ मनबोध ला धरथय, धनवा के घर मं चल दीस.
धनवा हा परिवार ला देखिस, हर्षित होत खुशी भरपूर
बनत गरीबा के आभारी, मानत हे ओकर उपकार,
कथय गरीबा हा धनवा ला -“”तुम्हरे से हे इरखा खूब
तुम्मन लड़ लेथव सोसन भर, तंहने फिर हो जाथव एक.
एक दुसर ले हटके रहिथव, तुम्हर बीच मं होत वियोग
पर खिंचाव आकर्षण रहिथय, आपुस बीच करत हव याद.
तंहने तुम्मन फिर मिल जाथव, होवत हवय मिलन संयोग
मन के कपट शत्रुता मिटथय, होवत नवा प्रेम संबंध.”
गीस गरीबा हा निज घर मं, दुखिया के करथय तारीफ-
“”तंय हा जे उपाय जोंगे हस, ओहर सच मं हित के काम.
धनवा ठीक राह पर लगगे, ओहर लीस अपन ला पांग
ओकर सब बकचण्डी उरकिस, बिख के दांत बिना हे सांप.
अब ओकर परिवार हा जुड़गे, एकर बर तंय करे प्रयास
धनवा अगर एक झन रहितिस, बदला बर रचतिस षड़यंत्र.
धनवा जिम्मेदारी पाइस, ओहर बिधुन अपन बस काम
अपन राह पर आहय जाहय, डिगन पाय नइ ओकर पांव.
वास्तव मं एहर सच होवत, फगनी धनवा मन हें एक
ओमन सब संग काम ला जोंगत, छोड़ दीन अब अंड़ियल टेक.
“ग्राम विकास समिति’ बनवाये, सुन्तापुर मं होत चुनाव
उम्मीदवार सबोतिर जावत, फोर बतात अपन सिद्धान्त.
आखिर मं चुनाव हा होथय, ओकर निकलिस सच परिणाम
जेन सदस्य विजय ला अमरिन, ओकर नाम निम्न अनुसार –
डकहर कातिक हगरू गरीबा, झरिहारिन केंवरी धनसाय
यद्यपि एमन विजय ला पाये, पर घमंड ला राखत दूर.
धनवा हा सदस्य निर्वाचित तब कातिक ला गुस्सा ।
धनवा खड़े कलेचुप लेकिन कातिक देवत गारी ।।
बखलिस -“”अब तक ले धनवा हा, राज करिस जनता ला डांट
ओकर पास चलिस नइ ककरो, सब मानिन ओकर आदेश.
पर अब सुम्मतराज के युग हे, नवयुग के स्वागत के टेम
नवा नियम कानून बनावव, राज चलाय नया सिद्धान्त.
याने जे मनखे मन पहिली, कष्ट झेल के प्राण बचैन
ओमन अब सुख सुविधा पावंय, कांटा गड़न पाय झन गोड़.
बनंय उही मन गांव के मुखिया, उंकरे चलय नियम कानून
बोली उंकर कटन झन पावय, खुशदिल बइठंय आसन ऊंच.
धनवा के चुनाव खारिज हो, ओकर पद हा होय समाप्त
हमर गोड़ मं धनवा बइठय, ओहर करय हमर सम्मान.”
मेहरू कथय -“”अनुभवी धनवा, ओकर गुन के मिलिहय लाभ
ओकर ठीक सलाह ला मानन, हम नइ मानन गलत सुझाव.
अपन राज हम पाये हन अभि, करत घमंड बतावत टेस
निर्णय गलत हमन ले सकथन, काम बिगड़ रुक जहय विकास.
जहां गलत निर्णय हम लेवन, धनवा हा मारय फट रोक
धनवा अउ हम सब दल दिल मिल, काटन गांव के बिपदा दोख”
नेक गोठ हा भींजिस तंहने, कातिक करिस तथ्य स्वीकार
नवा व्यवस्था के रक्षा बर, मिहनत करत देंह ला गार.
इही बीच मं पिनकू आथय, टहलू बोधनी संग मं अ‍ैन
हिरदे ले स्वागत होवत हे, एकोकन दुरछुर नइ होत.
पिनकू मेटाडोर ला लाये, जेहर ओकर खुद के आय
मेटाडोर मं बइठे अब तक, मुसकावत डकहर ला देख.
डकहर हंस पिनकू ला कहिथय -“”उतर भला तज मेटाडोर
भेंट होत हे कतको दिन मं, चल गोठियाबो दिल ला खोल.
अब हम तुम सब एके अस अन, कपट भेद दुश्मन अस दूर
अपन बिपत ला तंय हा फुरिया, कष्ट सुने बर हम तैयार.”
पिनकू मेटाडोर ले उतरिस, डकहर तिर जा हेरिस बोल-
“”मनसे हा कहुंचो रहि सकथय, खा पी सकथय महिनत जोंग.
मगर गांव मं बसना चाहत, अब नइ चहत जांव अउ ठौर
मोला इहां काम का मिलिहय, जेवन मिलिहय का भरपेट ?”
डकहर बोलिस -“”तंय शिक्षित हस, गांव चहत हे गुन ला तोर
अब हमला उन्नति करना हे, करबे मदद लगा के बुद्धि.”
पिनकू मेटाडोर बिसाये, शासन तिर ले लागा मांग
गांव पटाहय अब कर्जा ला, मेटाडोर गांव के होत.
टहलू बोधनी ठाढ़े ते कर केंवरी हा गिस लौहा ।
उंकर साथ हंस के बोलत हे बिसरे पूर्व के गुस्सा ।।
कथय बोधनी हा केंवरी ला -“”हम कमाय बर मुम्बई गेन
उहां कमाय गजब मिहनत कर, वास्तव मं कुहकुह थक गेन.
पर अब विवश हवन निर्बल अस, इहां बिलम सकथन कुछ माह
जे रुपिया गठिया लाये हन, ओमां हवय हमर अधिकार.
रुपिया फेंक अनाज बिसाबो, कुछ दिन मं सब नोट खलास
तंहने हम फिर मुम्बई जाबो, करबो उहां मरत ले काम.”
कथय बोधनी हा केंवरी ला -“”बचे हवय जतका अस उम्र
इंहचे रहि के जीना चाहत, हम नइ चहत जान अउ ठौर.
मगर हमर नइये घर डोली, ना मितवा न सहायक एक
तब हम वापिस मुम्बई जाबो, उंहचे छुटही हमर परान.”
केंवरी किहिस -“”अतिक रोवत हस, खुद ला समझत निहू लचार
तंय पहिली के व्यथा ला बोलत, शोषण भेद करय जब राज.
पर अब जनता राज चलावत, सब झन पाय अपन अधिकार
सुन्तापुर मं तुम्हरो हक हे, तुम बस सकथव खमिहा गाड़.
मुम्बई जाय जरुरत नइये, इंहचे कमा पेट भर खाव
फगनी दुखिया मन सुख पावत, ओतका सुख तुम्मन तक पाव.”
बोधनी टहलू पा आश्वासान, लग थिरबहा बिलमगें गांव
अपन काम ला पूरा जोंगत, लेत दुनों झन सुख के लाभ.
सुन्तापुर मं हांका होवत – सुन लव गांव के सब इंसान
तुम्मन खुद शासक जनता अव, करतब कर अमरव अधिकार.
जतका काम के भाग ला पावत, पूरा करव चिभिक के साथ
भ्रष्टाचार अगर तुम करहू, तब निश्चित पाहव दुख दण्ड.
जतका अस उत्पादन होवय, याने काम जतिक अस होय
ओतकिच के सच विवरण देवव, ताकि होय अवगत सच तथ्य.
अगर कागजी घोड़ा दउड़त, विवरण देवत निरवा झूठ
सुन्तापुर हा धोखा खाहय, ओकर लक्ष्य भविष्य हा नाश.
यदि आर्थिक स्थिति हा बदतर, तब फल हा मिल सकत खराब
श्रम कर सुम्मतराज ला लाये, अपन हाथ करिहव बर्बाद.”
अब कवि सुम्मत राज के बोलत बिल्कुल सत्य प्रशंस।
मनखे गांव उहिच हें लेकिन फूटत सुख के कन्सा ।।
उहां न शोषक अउ ना शोषित, ना पूंजीपति ना कंगाल
सब हक पाये एक बरोबर, जमों निभावत निज कर्तव्य.
भ्रष्टाचार कहां ले होवय, ओकर सब चुहरी हा बन्द
यदि चिटको अस घपला होवत, होत नियम मं तुरुत सुधार.
यदि मनखे पर रोग झपावत, ओकर हंसा ला चुन खाय
लेकिन तुरुत दवई मिल जावत, तंहने बच जावत हे जान.
शिक्षा पाय के मन नइ होवत, पर शिक्षा के उचित प्रबंध
सब मनखे मन कड़कड़ शिक्षित, तर्क रखत तेहर सच ठोस.
एको अदमी भूख मरत नइ, एको झन नइ बिगर मकान
सब कोई खाये बर पावत, सब झन घर मं करत निवास.
गांव बीच मं गउराचंंवरा, जे वाजिब मं पबरित ठौर
ओतिर बइठे हें मनखे मन, हेरत मन के जमों बिखेद.
धनवा अंतस खोल के बोलिस -“”मंय हेरत सच बोली।
मंय पहिली के पुंजलग मनखे खुद ला समझंव ऊंचा।।
सोचंव – सुम्मतराज हा आहय, गांव के हक मं सब धन मोर
तब नइ होवय मोर प्रतिष्ठा, सब सुख सुविधा तुरुत खलास.
पर शंका बादर अस छंटगे, सुम्मतराज जमों सुख देत
आवश्यक हा पूरा होवत, जीवन चलत सुखी निÏश्चत.
कातिक हगरू के संग बइठत, उंकर असन करथंव मंय काम
मोर देह हा पुष्ट जनाथय, श्रम ला देख भगत सब रोग.
पहिली अउ अभि मं जे अंतर, ओला मंय फोरत हंव साफ
उहिच आन मंय अउ दूसर मन, पर व्यवहार व्यवस्था भिन्न –
पहिली सब ला डर्हुवा धमका, अपन बात के स्वीकृति लेंव
पर अब वाजिब तर्क ला रखथंव, तब मनसे मन मानत तथ्य.
पहिली पर के हक ला लूटंव, पर के हक के अन ला खांव
पर अब अपन भाग पर रखथंव, राजबजन्त्री निज अधिकार.
भय ला देखा लबारी बोलंव, कपट चाल चल इज्जत पांव
निश्छल वाक्य प्रेम रखथंव अब, सद आदत ले पावत मान.
सुम्मतराज के नामे ला सुन, घृणा क्रोध कर हलय शरीर
पर अब ओकर जस गुन गावत, भ्रम के जल बहिगे धर धार.”
नेक गोठ हिरदे मं भींजिस, तंह ग्रामीण करिन स्वीकार
अपन व्यवस्था ला संहरावत, सुम्मत राज पात जयकार.
तब मुसकात गरीबा आथय, जेकर खांध गली मनबोध
एमन पुत्र सनम – धनवा के, पाठक याद करव सच शोध.
जेमन छत्तीस असन बइठतिन, लेकिन अब नइये कुछ भेद
रोटी बांट दुनों झन खावत, झींकत हें गरीबा के बाल.
भीड़ ला मुसकत कथय गरीबा -“”तुम्मन करत अपन तारीफ
मगर लगत कनुवासी मोला, सच के पता लगत कर देर.
हम्मन अभी काम जोंगन अउ देवत रहन परीक्षा ।
जब मनबोध गली बढ़ जाहंय – करहीं सत्य समीक्षा ।।
सुन्तापुर मं खुशी हे तइसे सुख पावंय हर प्राणी ।
दारभात हा चुरगे तब कवि छेंकत अपन कहानी ।।

१०. राहेर पांत समाप्त
एवं
गरीबा महाकाव्य की पूर्ण समाप्ति

गरीबा : महाकाव्य (नउवां पांत : गंहुवारी पांत) – नूतन प्रसाद शर्मा

शोषण अत्याचार हा करथय हाहाकार तबाही।
तब समाज ला सुख बांटे बर बजथय क्रांति के बाजा।।
करंव प्रार्थना क्रांति के जेहर देथय जग ला रस्ता ।
रजगज के टंटा हा टूटत आथय नवा जमाना ।।
गांव के सच वर्णन नइ होइस, फइले हे सब कोती भ्रांति
जब सच कथा प्रकाश मं आहय, तभे सफलता पाहय क्रांति.
लेखक मन हा नगर मं किंजरत, रहिथंय सदा गांव ले दूर
संस्कृति कला रीति जनजीवन – इंकर तथ्य जाने बस कान.
तब तो लबरइ बात ला लिखदिन, उंकर झूठ ला भुगतत आज
रुढ़ि बात मं संसोधन तब, ठीक राह चल सकत समाज.
एक व्यक्ति हा जेला लिख दिस, दूसर घलो धरिस ओ पांत
जग समाज परिवर्तन आईस, ओकर ले लेखक अनभिज्ञ.
याने गांव के नाम मं शोषण, खूब करिन साहित्यिक लूट
चलत पाठ्य पुस्तक मं रचना, जमिन विश्वविद्यालय खूब.
कई संस्था ले ईनाम झोंकिन, मरगें तभो अमर हे नाम
खुद ला मुंह मं छोटे बोलिन, लेकिन बड़े बड़े पद पैन.
“”होत गंवइहा भोला सिधवा, गांव बिराजत हे सुख शांति
ऊपर लिखित बात जे बोलिन, अमृत कल्पवृक्ष असझूठ.
देहाती मन मांग करंय झन, शासन के झन करंय विरोध
भूले रहंय प्रशंसा भर मं, भले यथार्थ कष्ट ला पांय.
गांव के दुख विपदा जे होथय, ओहर रोवत करुण अवाज
शासन ओकर बिपत सुनय नइ, कान मं राखे रुई ला गोंज.
गांव निवासी गिरा पसीना, जांगर टोर बजावत काम
पर भोजन घर कपड़ा कमती, बिना लहू के गुजगुज देह.
“वातावरण शुद्ध गुणकारी’ अइसन बात किहिन कवि सूम
मगर हवा भर जिया सकय नइ, जीवन यज्ञ अन्न के हूम.
गंदा राजनीति अगुवागे, शिक्षा ज्ञान हा पिछवा गीस
दुरमत गांव लड़त आपस मं, कइसे आवय प्रगति विकास !
गांव के पंचायत परपंछी, ओहर कंस शत्रुता बढ़ात
शासन गांव मं फूट करावत, अपन निघरघट राज चलात.
बिरता रुख राई हे हरियर, पर भीतर मन धधकत आग
मनसे मुश्किल मं दिन काटत, माली बसथय उजड़त बाग.
कुकरा बासत मुड़ी उठाके, कोलिहा गीस सुना के राग
पहती समय आलसी सोये, मिहनत करत मिहनती जाग.
भुकरुस भुकरुस ढेंकी बाजत, कूद कूद के कूटत धान
बाहिर बट्टा ले लहुटिन अउ, तिरिया घर मं मारत लीप.
जे बालक हा बिफड़ के रोवत, वृद्धा मन भुरियात मनात
बासी नून पिसान ला सानत, गांकर ला थोपत रख हाथ.
तंह मोहलैन पान मं मोड़त, अंगरा राख करत हे सेंक
गांकर ला कुटका मं टोरत, लइका मन ला देवत खाय.
खटिया त्याग सनम उठ जाथय, मुंह ला धोके चलदिस खेत
धरे कुदारी झौंहा रापा, आये नेत चिंड़ा उपकाय.
मेड़ पोचक खाल्हे बइठे हे, करना हवय मेड़ ला ऊंच
भूमि कन्हार भोंक होवत कइ, भोंक मुंदा के जल रुक जाय.
माटी कोड़ चढ़ावत ऊपर, मेड़ सजावत ढेला चाल
सुर्हलू रचत पिरामिड जइसे, जेमां झन खसलय कई साल.
सनम करिस नंगत अक महिनत, ओकर बाद छोड़दिस खेत
गांव मं झंगलू हा मिल जाथय, जेहर शाला जात पढ़ाय.
कतको झन ले ऋण मांगे हे, लेकिन पटा सकत नइ कर्ज
जीवन हा निकलत चंगुरे अस, साहूकार कहत- बइमान.
“शिक्षक आय राष्ट्र निर्माता’ मात्र छलावा झूठा गोठ
जब आर्थिक स्थिति ठसलग नइ, देश नेव बिन दरके कोठ.
सनम कथय -“”बिलमे बर कहिहंव, पर बिलमे बर करबे ढेर
हे तड़तड़ी जाय बर शाला, रुकबे अगर शिकायत होत.”
झंगलू कथय -“”ठीक बोलत हस, तंय जानत जनता के हाल
पटवारी ला मित्र बनाथय, पर शिक्षक के खींचत खाल.
पटवारी हा रुपिया लेथय, ऊपर करथय काम अवैध
ओकर कुछ बिगाड़ नइ होवय, ऊपर ले अमरात सलाम.”
झंगलू पहुंचिस समय मं शाला जिंहा हवंय विद्यार्थी ।
बइठे हें भुंइया ऊपर ऊंकर तिर कलम न पट्टी ।।
झंगलू पढ़ई करावत मरमर, रख दिस जोड़ घटाय सवाल
छात्र थुकेल थथमरा जाथय, ओकर तिर नइ कलम न स्लेट.
झंगलू हा गोंटी मंगवाइस, गोंटी गिनत हवंय अब छात्र
जोड़ घटाय के प्रश्न ला राखत, गोंटी ला गिन उत्तर देत.
शिक्षक किहिस -“”साठ ठक रुपिया, ओमां खर्च बीस ठन नोट
कतका रुपिया हाथ मं बांचत, एकर तुम सच उत्तर देव ?”
धरिस थुकेल साठठक गोंटी, गोंटी बीस अलग कर दीस
गोंटी शेष हवय चालीसा, ओला उत्तर मं ढिल दीस.
झंगलू हा देवत शाबासी -“”तुम्हर लगन हा खुश कर दीस
भले पाठ्य सामग्री कमती, पर तुम पढ़त बढ़ा के चाव.
जीवन मं अभाव हा आथय, ढचरा झन मारय इंसान
आय काम पूरा होवत तब, लक्ष्य पूर्ण पावत संतोष.”
तभे तीन ठक डाक आ जाथय, जेकर उत्तर मंगे तड़ाक
झंगलू हा पढ़ाय बर छोड़िस, डड्ढा खींचत रगड़ के नाक.
शिक्षक परेशान हे नंगत, आत नित्य शासन के डाक
अन्य काम हा समय ला खावत, पर शिक्षा बर समय अभाव.
शिक्षक डाक बनाय बिधुन हे, कूदत छात्र करत हें नाच
बाहिर भागत मांग के एक्की, सड़क डहर किलकत चिल्लात.
झंगलू हा सब छात्र ला बोलिस – “”तुम बालक मन चंचल खूब
एकोकन थिरथार रहव नइ, झगरा करथव चिलचिल कूद.
होत बालक्रीडा प्रतियोगिता, भर उत्साह लेव तुम भाग
स्पर्धा मं विजय अमर लव, मंय हा रखत तुम्हर पर आस.
पूर्वाभ्यास करव मिहनत कर, ऊंचीकूद अउ बोरादौड़
खेल करव या पल्ला दउड़व, पर सब होय नियम के साथ.”
लइका मन के मन हा आगर, जे चाहत ते खुद मिल गीस
खेल करे के साध मिटत हे, स्पर्धा बर पूर्वाभ्यास.
पहुंचिस गुहा हा झंगलू तिर मं, किहिस -“”इंहा शिक्षक दू ठोक
मगर कहां शिक्षिका जगौती, ओकर दर्शन तहु कर लेंव.
मंय थुकेल ला धर लेगत हंव, ओहर इंहा पढ़त नइ पाठ
ओला इंहा बिगाड़त हव तुम, होत छात्र के भावी नाश.”
कुरबुर करत गुहा हा मन मन, धरिस थुकेल के कंस के हाथ
शाला ले रकमिका के निकलिस, अउ आ गीस सड़क के पार.
गीस ग्रामपंचायत घर तिर, जिंहा कृषक मन हें सकलाय
देखत तहसीलदार के रद्दा, पर नइ आवत तहसीलदार.
बंजू मन हा खेत खरीदिन, होय रजिस्ट्री उंकर जमीन
मगर प्रमाणीकरण हा अटके, खाता मं लिखाय नइ नाम.
पटवारी, बंजू ला बोलिस -“”चहत प्रमाणीकरण हा होय
तुम्मन ओकर खरचा लानव, तंह मंय करिहंव तुम्हर सहाय.
साहब ला मंय रुपिया देहंव, ओहर दिही दस्तखत दान
पूर्ण प्रमाणीकरण के बूता, तुम्हर नाम चढ़ जहय जमीन.”
बंजू मन हा रुपिया गिन दिन, पटवारी पर हे विश्वास
घूंस लेत अउ देत उहां पर, पर कोई नइ करत विरोध.
अब किसान तिर काम हा नइये, शाला डहर ध्यान ला दीन
अब झंगलू के मजा चखाहंय, घोड़ा रोग बेंदरा पर गीस.
सुखी कोचक के उभरावत हे -“”मोर बात ला सब सुन लेव
झंगलू शिक्षक छात्र बिगाड़त, समय ला काटत गपशप मार.
शाला तनी दृष्टि ला फेंकव, खेलत छात्र पढ़इ ला त्याग
अंदर मं झंगलू हा सोवत, टेबल ऊपर रख के गोड़.
शिक्षक हा कर्तव्य ले भगथय, ओला गांव मं राखन कार !
ओकर स्थानांतर होवय, तभे छात्र मन के उद्धार.”
झंगलू के विरुद्ध मं लिख दिन, जमों किसान शिकायत पत्र
शिक्षक हा कर्तव्य निभावत, तब ले ओकर होत विरोध.
धनवा डकहर करत कुजानिक, ओकर झंगलू करत विरोध
सुखी अउ डकहर बल्दा लेवत, करत नमूसी कालिख नाम.
झंगलू जहां खबर ला पाइस, होवत मन मं दुखी उदास
छुट्टी बाद अपन घर जावत, मेहरूपहुंचिस ओकर पास.
कहिथय -“”एक बात सोचे हंव – कवि मन ला मंय चहत बलाय
कवि सम्मेलन गांव मं होवय, तंय रख सकथस अपन विचार.”
झंगलू कहिथय -“”मंय खुश होवत, बोले हवस बात तंय ठीक
मगर गांव के स्थिति नाजुक, मुड़ पर रुसी अस दुख राज.
साफ दृष्टि से यदि हम देखत, होय बंद धार्मिक त्यौहार
कवि मन ला यदि करत निमंत्रित, परिहय खूब खर्च के मार.
एक घांव सोनू हा लानिस, इहिच गांव मं कई विद्वान
सुन्तापुर के पुरिस ठिकाना, बिकगे बर्तन अन्न मकान.”
मेहरूकथय -“”जेन कवि आवत, ओमन नइ मांगत कुछ खर्च
मात्र पेट भर जेवन मांगत, अतका मं परिहय का फर्क!”
झंगलू हा स्वीकृति फट देथय -“”नेकी कर झन कर पुचपूच
लुकलुकात ग्रामीण सबो झन, पर ओमन ला पहिली पूछ.”
झंगलू पुन& कथय मेहरूला -“”हम राखे हन जे उद्देश्य
“सुम्मतराज’ गांव मं आवय, पांय सबो झन सुख आनंद.
धनवा हा विरोध मं जावत, ओकर बात उमंझ मं आत
पर विडम्बना हे एके ठन. ओला मंय फोरत हंव साफ-
गांव मं बन्जू अस अउ मनखे, जेकर जीवन हा कुछ ऊंच
ओमन सोचत- हम पूंजीपति, हम्मन आन अचक धनवान.
हवय जरुरत जिनिस हा पूरा, ककरो पास मंगन नइ भीख
हर प्रकार ले हम सक्षम हन, हमर ले बढ़के दूसर कोन !
हमर बाढ़ देखत कंगला मन, तंहने उंकर जलन बढ़ जात
हम्मन ला कंगला होवय कहि, कइ योजना बनावत रोज.”
झंगलू फेर कथय मेहरूला -“”मोर बात सुन बन गंभीर
बंजू मन हा पूंजीपति नइ, न ओमन धनवान विशिष्ट.
ओमन भ्रम रद्दा मं रेंगत, एकर ले सब लक्ष्य हा नाश
धनसहाय हा लाभ ला पाहय, जनता ला नंगत नुकसान.
सुम्मत राज लाय बर सोचत, एकर पूर्व होय ए काम
बंजू मन के भ्रम मिट जावय, ओमन करंय हमर सहयोग.”
मेहरूपैस सलाह बने अस, उहां हे हटथय छुट्टी मांग
थोरिक ओहिले मिलिस गरीबा, जेहर खसर खुजावत जांग.
मेहरूखलखल हंस के कहिथय -“”तोला कब के खजरी होय
एकर दवइ करा तंय झपकुन, काबर चुप बइठे कंजूस!”
“”बिन श्रम रचना पढ़ धन झोरत, भरत अपन घर देश ला लूट
तोला हरियर तगवा सूझत, तब तंय पर ला एल्हत खूब.
वन के पशु हा खेत मं घुसरत, बिरता के करथय खुरखेद
हम किसान पर आत मुसीबत, ओकर हिरक देखइया कोन !”
अभी गरीबा अउ ओरियातिस, मेहरूबीच मार दिस छेंक
सुनिस गरीबा तंह खुश होवत, करदिस हरहिंछा स्वीकार –
“”हमर गांव मं कवि मन आवत, ओमन देहंय नेक सलाह
भ्रम अंधियार के नसना टुटिहय, हम्मन धरबो उत्तम राह.”
मेहरूकिहिस गरीबा ला अउ -“”सुम्मत राज के लेवत पक्ष
एकर बीच बिघन हा आवत, तंय जासूस असन रख ध्यान.
भरे उच्चता बंजू मन मं, उंकर उच्चता होय समाप्त
पर ए काम बहुत कठिनाई, तंय कर पूर्ण बुद्धि के साथ”
कथय गरीबा -“”मोरो ला सुन, तंय हा जानत सब सिद्धान्त
पूंजीपति के परिभाषा अउ, ओकर जीवन कर्म विचार.
बंजू मन हा गलत दिशा पर, धोखा देखत धोखा खात
एमन ला तंय रद्दा पर कर, तोला नेमत समझ समर्थ.”
चना रखे बर चलत गरीबा हवय तड़तड़ी बेरा ।
ओहर अपन खेत मं पहुंचिस जानत उहां के चाला ।।
चना के फर हा फरे हे लटलट, अंदर के दाना हे पोख
पेटमंहदुर जब सक भर जेवत, पेट हा तनथय गोलमटोल.
पेड़ हा फर ला यदपि सम्हालत, मगर बोझ मं केंघरत खूब
पाना कुछ हरियर कुछ पिंवरा, तरी डहर खोंगसत हे डार.
झाला बने तिकोना एक ठक, जेमां टट्टा पत्ता छाय
कोदो पयरा बिछे हे अंदर, वातावरण गरम बन जाय.
झाला के तिर गीस गरीबा, आगू मं सिपचाथय आग
दरी बिछा के तिर मं बइठिस, थोरिक रहिके आगे रात.
होरा भूंज मुसुर मुस खावत, चना गंहू ला रंमजत फोर
जहां पेट हा दलगिरहा अस, तभे खवई ला करथय बंद.
गावत हवय ददरिया सुर कर, हो हो हात हात चिल्लात
आग बुझिस तंह जाड़ बियापत, उरसा दरी ला ओढ़िस खींच.
आवत जम्हई नींद हा चमकत, उसल गरीबा टहलत खेत
प्रेमचंद के “हल्कू’ नोहय, जे बूता तज सुतय बिचेत.
जे दिन कृषक हा मिटका सुतही, तज पुरुषार्थ काम ला छोड़
दुनिया धारोधार बोहाहय, जीवन चलत तेन हा लाश.
सीमा रक्षा करथय सैनिक, उसने ए बिरता रखवार
ओरखिस कुछ आवाज गरीबा, टंहकत टंच होत तैयार.
उरउर कर बरहा दल निंगतिस, राहिद उड़तिस ठाढ़े खेत
टोंटा फार गरीबा हांकिस, बरहा मन पर परय प्रभाव.
हुरहा डर के बरहा भागत, पर थमगे अंड़ियल नर एक
मुड़ ला निहरा तान के खीसा, बढ़िस गरीबा तन अरि देख.
भिम करिया ताकत फुर्तीला, बिकट निघरघट हिम्मत खान
दउड़ गरीबा ला पहटातिस, हटिस गरीबा जान बचाय.
बरहा दूर भाग के लहुटिस, ताकत लगा उधेनिस ताक
खेत के रक्षक बच नइ पाइस, ऊपर उड़के गिरिस दनाक.
उठिस गरीबा बरन चढ़ाके, जोश हा बाढ़त बाघ समान
झाला अंदर दउड़ के अमरिस, धरहा टंगिया ला धर लैस.
बरहा हा फिर तिर मं पहुंचिस, भिड़िस गरीबा बरहा साथ
टंगिया उठा के बल भर मारिस, होय शत्रु के बिन्द्राबिनास.
उद नइ जरा सकिस एक टंगिया, बरहा दउड़िस अउ कर जोम
तब फिर काबर हटय गरीबा, अपन देह ला देवत होम.
गदामसानी पटका पटकी, एक के ऊपर अन्य सवार
एकोकन अराम नइ लेवत, करत हवंय दुश्मन ला मात.
बरहा घायल घाव पिरावत, लहू गिरत अउ मरत थकान
आखिर जान बचा के भागिस, पीठ देखा के तज मैदान.
घायल होय गरीबा हा खुद, पल पल बाढ़त घाव के पीर
सांस हा धुंकनी असन फेंकावत, कहुंचो जाय खतम सब जोश.
रुकिस गरीबा बड़े फजर तक यद्यपि तन भर पीरा ।
बाद अपन घर जाथय तंहने दुखिया हा घबरागे ।।
पूछिस -“”तोला कोन दमोरिस, सुनंव भला दुश्मन के नाम
लहू चुहक के सेठरा करिहंव, रस चुहका सेठरावत आम.”
जब कई बखत पूछथय दुखिया, तंहा गरीबा सच कहि दीस-
“”दूसर ऊपर शंका झन कर, मंय हा स्वयं करे अपराध.
होय वन्य प्राणी हा रक्षित, ओकर पर झन होय प्रहार
शासन हा कानून बनाये, जमों व्यक्ति के इहिच विचार.
लेकिन मंय हा करे उदेली, बरहा ला घायल कर देंव
कथनी मं हम बनत संरक्षक, पर करनी मं हिंसक आन.
मगर मोर पर हमला करदिस, बदला मं मंय युद्ध करेंव
अपन सुरक्षा बर झगड़े हंव, एकर कारन मंय निर्दाेष.”
दुखिया घाव के रकत ला धोइस, खुद भिड़ के करथय उपचार
करिस गरीबा हृदय ला कट्टर, सहत हवय चुप दरद अपार.
दवई लगात दवई तक खावत, माड़त पीर भरत हे घाव
दुखिया अउर गरीबा, दूनों, गूढ़ रहस्य करते हें बात.
दुखिया बोलिस -“”तंय सच फुरिया – तुम धनवा के करत विरोध
तुम पूंजीपति मन ला देवत, अत्याचारी शोषक रुप.
ऊंकर सत्य चरित्र ला गोठिया – प्रतिभाहीन घृणित बेकार
अनुकरणीयहीन या स्वार्थी, खलनायक अस अवगुण खान ?”
कथय गरीबा -“”पूंजीपति मन, अपन लक्ष्य पर रखत इमान
मात्र कर्मनिष्ठ होथंय तब, आत सफलता ऊंकर हाथ.
महिनत करथंय उन्नति खातिर, असफलता ला शत्रु बनात
ओमन लफर लफर नइ लूवंय, कर्म बुद्धि ले बनथंय श्रेष्ठ.
जेहर बइठे ऊंचा पद पर, या फिर दूसर ले विख्यात
एकर अर्थ योग्य हे ओहर, अनुकरणीय हे ओकर काम.
लेकिन उंकर विरोध ला करथन, एकर कारन सुन ले साफ-
स्वार्थ पूर्ति बर पूंजीपति हा, पर के हित के करथय हानि.
मीठ बात कर दिग्भ्रम करथय, ताकि ढंकाय स्वयं के पोल
खुद ला आसमान तक लेगत, पर ला गाड़त नरख पताल.”
इही बीच धनवा हा पहुंचिस, जेकर मुंह पर मित्र के भाव
हाथ मिलात गरीबा के संग, हृदय कलुष के भाव ला फेंक.
ओकर स्वागत करत गरीबा, दुरिहा फेंकिस मन के रंज
सहपाठी हा खुद आए तब, बात करत दूनों झन हांस.
खेत के बात ला धनवा जानत, करत गरीबा के तारीफ-
“”तंय हिम्मती बुद्धिशाली अस, आत्म सुरक्षा ला कर लेस.
बिरता रक्षा काम कठिन हे, राहिद उड़ा देत पशु कीट
मनसे घलो चोरा के लेगत, तभे कृषक के जीव हताश.
मंय हा नौकर मन ला भेजत, फसल ला राखंय बन रखवार
चना गंहू के होरा खाथंय, हर्षित होथंय करके हानि.
जब मंय हा विश्वास करे हंव, नौकर बना के राखेंव पास
ओमन मोला धोखा देवत, मोर जिनिस ला चोरा के खात.”
निहू पदी बन कथय गरीबा -“”होरा ला नौकर मन खात
खाय जिनिस भर ला खावत हें, एहर कहां बड़े जक घात !
चोरी के तंय दोष ला डारत, लेकिन स्वयं आस तंय चोर
तंय चोराय हस परके हक ला, तब तंय चोर के मुखिया आस.
मोर सलाह मान ले मितवा- सब के हक ला वापिस बांट
सुम्मत के पीढ़ा पर बइठन, एकछत्र हा होय समाप्त.”
धनवा कथय -“”रचिस ईश्वर हा, कंगला पूंजीपति के भेद
यदि मिटाय बर कोशिश करथन, तब प्रतिक्रांति के बाजत शंख.
पूर्वजन्म मं पूण्य करे हन, तेकर फल ला पावत आज
हमर धनदोंगानी हा बाढ़त, एकोकन नइ होत अभाव.”
“”ईश्वर पर तंय दोष लगा झन, ओकर बर सब एक समान
अपन प्राकृतिक वस्तु ला देथय, करंय सबो झन सम उपयोग.
वाद विचार धर्म धन पूंजी, जतका किसम के होवत भेद
एमन ला मिलजुल के ढकलत, तंहा खतम हो जाथय भेद.”
धनवा अउर गरीबा जानत, दुनिया भर के हर सिद्धान्त
पर ईश्वर के नाम मं झगरत, इही वाद के कथा अगम्य.
जब दिग्भ्रमित करे बर होथय, तंह ईश्वर ला लानत बीच
वाजिब बहस नंदा जाथय तंह, खुद के जिद्द करत हें पूर्ण.
कथय गरीबा -“”अब तक राखे, अपन बहस मं छिछला तर्क
मगर ठोस चर्चा अब होवय, जेकर मिलय सुखद परिणाम.
तंय हा जमों वाद के ज्ञाता, जानत हस विकास के रुप
तब ले तोर मं जे शंका हे, मंय मेटत रख तर्क सटीक.
सुम्मत राज लाय बर सोचत, ओकर गुन योग्यता बतात
तंहू कान ला टेंड़िया के सुन, ताकि हृदय से कर स्वीकार.
सब के भावी पूर्ण सुरक्षित, सब झन पांय अपन अधिकार
ना नायक ना खलनायक हे, ऊंच नीच ना धनी गरीब.
जउन व्यवस्था लाने चाहत, समाजवाद ले अउ उत्कृष्ट
मनसे के वर्चस्व हा कायम, पर शोषण करे बर असमर्थ.”
धनवा कथय -“”जउन तंय बोलत, ओमां दिखत मोर नुकसान
मंय समाज मं उच्च प्रतिष्ठित, नीचे गिरिहय स्तर मोर.
गांव क्षेत्र मं जतका मनखे, ओमन निहू मोर ले आंय
मोर ले ओमन रुतबा कंसिहंय, मोर अतिक पाहंय पद मान.”
कथय गरीबा -“”भ्रम पाले हस, सुम्मत राज हा सुख के राज
जे वर्चस्व तोर अभि हावय, तंय पाबे अउ आसन ऊंच.
वर्तमान मं बनत हेरौठा, सब झन दिहीं हृदय ले मान
तोर पुत्र मनबोध जे हावय, ओकर तक भावी हा साफ.
जेन व्यवस्था मं जीयत हस, ओहर घेर रखे अंधियार
साफ दृष्टि ले तथ्य ला जांचव, कटिहय भ्रम के करिया रंग.”
धनवा कथय -“”दिखत हे धोखा, मंय नइ मानंव तोर सलाह
काम पूर्ण तक लालच देवत, तंहने कष्ट दुहू तुम बाद.”
“”तंय हा खुद ला धोखा देवत, दुख ला स्वयं निमंत्रण देत
जे मनसे हा रथय अजरहा, दवई ला मानत जहर समान.
सुघर व्यवस्था अस्वीकारत, पर जब परिहय खूब दबाव
कतको ताकत ले तंय लड़बे, लेकिन सुम्मत राज के जीत.
लाहो लेवइ बंद कर तंय हा, निकलत सदा दुखद परिणाम
घालुक रिहिस हठील तउन हा, बद्दी पाइस तन तक दीस.”
उंकर मंझोत पहुंचथय कातिक, बनके उग्र देखावत क्रोध
धनवा के छट्ठी ला गिनथय, सातो पुरखा पानी डार.
कहिथय -“”मोरेच बाप तिजऊ हा, खटिस तुम्हर घर मर के भूख
बिपत झेलना मुस्कुल होगे, करिस आत्महत्या खुद हाथ.
मंय हा सेवा तोर करे हंव, पर फल मं अभाव ला पाय
वाकइ तंय गरकट्टा घालुक, मोला देस मरत तकलीफ.
तोर नौकरी छोड़ डरे हंव, तोर ले अब लेहंव प्रतिशोध
खुंटीउजार तोर करिहंव तब, मोर हृदय ठंडक संतोष.”
धनवा हा बोकबोक देखत अउ, कथय गरीबा ला भर क्लान्त-
“”सुम्मत राज गांव ले बाहिर, मगर देखात रुप ला रौद्र.
तोर हाल ला मंय जाने बर, इहां आय हंव समझ मितान
पर कातिक ला खुद हा उचका, मोर हइन्ता ला करवात.
तोला जउन जिनिस आवश्यक, मोर पास तंय खत्तम मांग
मगर विरोध मोर झन होवय, एकर याद सदा बर राख.”
धनवा हा लालच देवत हे, ताकि पक्ष होवय मजबूत
मगर गरीबा हा कुछ छरकत, ताकि पूर्ण होवय उद्देश्य.
कथय गरीबा -“”जिनिस मांगहूं, लेकिन ओकर बर कुछ टेम
तोर मोर सब भेद मेटावय, एकर किरिया पहिली खान.”
धनसहाय हा उहां ले हटथय मन मं छुपे हे गुस्सा ।
कातिक के तेवर ठंडा तंह बोलत हवय गरीबा ।।
“”मुंह फरका गारी बक देना, ए नइ आय क्रांति के राह
शांत बुद्धि – मुंह ला चुप राखव, पहुंच सकत तब निज गंतव्य.
जेकर तिर नइ शक्ति लड़े बर, जेन निकम्मा कायर जीव
अपन दोष ला चुप दोबे बर, आंख लालकर क्रोध देखात.
असली भेद आज फोरत हंव, लेखक लिखिन गलत इतिहास-
देशभक्त मन उग्र लड़ंका, जोश मं उबलय ऊंकर खून.
गोरा मन हा देश ला छोड़ंय, दीन क्रांतिकारी मन धौंस
बम ला पटकिन जीवन ला लिन, तभे देश हो सकिस अजाद.
पर ऊपर के तर्क मं गल्ती, सच स्थिति फोरत मंय तेन-
रिहिन क्रांतिकारी मन ज्ञानिक, क्रोध उग्रता अति के शत्रु.
जेन बुता ला करना होवय, बइठक करंय शांत गंभीर
स्थिर बुद्धि पांव ला लेगिन, तब हो सकिस पूर्ण उद्देश्य.
अब जग मं परिवर्तन होवत, विश्वयुद्ध खतरा घटगीस
शांति बुद्धि हा महिनत जोंगिस, मानव ला दिस जीवन दान.
क्रोध के दृष्य दिखाना होथय, लिखना होत भयंकर युद्ध
लेखक शांत बुद्धि ला रखथय, तब वर्णन कर सकत सटीक.”
कातिक कथय -“”लुवत हस पुटपुट, मगर मदद बर मुंह ओरमात
मंय नौकरी छोड़ डारे हंव, बिन अनाज मंय पावत कष्ट.”
कथय गरीबा -“”सुख अमरे बर, करना परत बहुत बलिदान
मोर पास ले अन्न लेग अउ, जीवन सरका कर कम खर्च.
यद्यपि मदद देत हंव तोला, पर एकर ले दुष्परिणाम
गलत परम्परा कायम होथय, सुधर पाय नइ गिरे समाज.
हाथ लमाय जहां सीखत हे, झांकत हे बस पर के द्वार
काम करे बर जीव चोराथय, पर ला करत रथय बस तंग.
चोरहा मन के पक्ष ला लेवत, लेकिन यहू प्रथा निंदनीय
जुरुम करे बर साहस बाढ़त, नष्टभविष्य फंसड़ कानून.
एक दीन हा करत कुजानिक, पर दूसर हा फल ला पात
वाजिब दुखी मदद नइ पावय, मरत फसल तरसत बिन नीर.
यने एक ले धोखा खावत, सब ले उड़ जावत विश्वास
धोखादार सबो ला समझत, मदद करे बर झींकत हाथ.
सुन कातिक, मंय केंघर बतावत, एला झनिच समझ उपदेश
बन गंभीर बात ला पतिया, तथ्य हा गुरमटिया अस ठोस.
काबर के समाज के अरि हा, हवय धनी दानी विद्वान
गुन अवगुन छल निक सच झूठा, जमों चाल मन ओकर पास.
लालच फूट प्रेम भय दिखला, भ्रष्ट करे बर पूर्ण समर्थ
हर आकर्षण ले जब बचिहव, तब दुश्मन के चाल नकाम.
हमला ओहिले तन चलना हे, सफल बनाना हे उद्देश्य
सब तन टंहकत जासूसी कर, गलत चाल रेंगय झन पांव.”
दीस गरीबा हा कातिक ला अन्न एक भर बोरी ।
कातिक अन्न पकड़ के रेंगत सोचत भावी रद्दा ।।
उठना चहत गरीबा हा अब, तभे पहुंच गिन कई विद्वान
उंकर सुवागत करत गरीबा, मुंह मं वाजिब खुशी ला लान.
जीवनयदु अउ भीखमबैष्णव, रामेश्वरबैष्णव गोपाल
श्यामलाल अउ मुकुन्दकौशल, मिथिलेशशर्मा रमेश अधीर.
दानेश्वरशर्मा तक पहुंचिस, कवि हाजिर तेमन विख्यात
ऊंकर सादा नर्बदा जीवन, पर ऊंचा हे कर्म विचार.
मेहरूसब के परिचय देइस, होत गरीबा बहुत प्रसन्न
कवि मन के स्वागत हा होवत, मनसे मन पहुंचिन भन भन्न.
अलग जगा भीखम ला लेगिस, मेहरूमांगिस उचित सलाह-
“”तुम्हर खाय बर काय पकावन, अपन विचार साफ फुरियाव ?”
खांध हाथ रख भीखम बोलिस -“”हमला झन मानो मेहमान
जे मिलिहय खाबो हरहिन्छा, जमों जिनिस के करथन पान.”
सब ग्रामीण पास पहुंचिन तब, कवि मन ढीलत मीठ जबान
उंकर हाल ला कोड़ के पूछत, उबरे बर बतात हें राह.
कवि मन किंजरत खेत नार चक, जांच करत बिरता के हाल
भोजन चुरिस ज्ञात होथय तंह, अपन ठिंहा मं आथंय लौट.
सनम बिछावत टपटप पतरी, रखत गरीबा जल के ग्लास
मेहरूपरसत झपझप जेवन, कमी होत नइ ककरो पास.
जीवन यदु हा हांसत बोलिस -“”हम खावत कई किसम के चीज
पर सुन्तापुर मं आये हन, लान गांव के प्राकृतिक चीज.
सुक्सा भाजी – अमारी भुरका, करील चटनी – खोइला साग
घोंटो – गांकर – सुखड़ी खुटरी, बोबरा – चंउसिला – महुवा राब.
जेन जिनिस हम पहिली खावन, पर एमन दुर्लभ हें आज
यदि एकाध सहेज के राखे, देव खाव बर तज के लाज.”
परसइया मन मुरझुर होगिन, पर दुखिया के मुंह पर हर्ष
हेरिस तुरुत अमारी भुरका, पानी मं कर लिस झप गील.
मिरी नून लहसुन अउ धनिया, ओमां मेल करिस हे पीस
तंहने अमसुर चटनी बनगे, जेहर देवत सुघर सुगंध.
दुखिया अपन हाथ मं परसिस, कवि मन जेवत स्वाद के साथ
आत्मा जूड़ उदर भरगिस तंह, ठंव ले उसल के धोइन हाथ.
समाचार धनवा तिर पहुंचिस, बोलत हे बन्जू के पास-
“”हमर गांव मं जे कवि आये, इनकर कहां उच्च सिद्धान्त !
जे सपड़िस सोसन भर खालिन, हिन के जिनिस करिन नइ दूर
हवय गिदिरगादर अस जीवन, एमन भुखमर्रा कंगाल.
हमर ददा के पहरो पहुंचिन, ख्याति प्राप्त उद्भट विद्वान
ओमन ला परसेन खाये बर, स्वादिल जिनिस बहुत पकवान.
ओमन उत्तम चीज ला झड़किन, तब तो बता सकिन गुण ऊंच
जे उपदेश दीन मिहनत कर, उच्च समाज ग्रहण कर लीस.
पर अभि जे कवि आये तेमन, इनकर जीवन निम्न समान
कहां उच्च सिद्धान्त ला कहिहंय, कविता रखिहंय गलत विचार.”
बन्जू देवत हवय हुंकारू-“”धनवा, तंय बोलत हस ठीक
कवि आये हें तेमन रड़ हें, लीन अमारी भुरका बोज.
हमर पास यदि एमन आतिन, हमर पास पूरन सब चीज
ऊंकर मन के जेवन देतेन, अउ ऊपर रुपिया के दान.”
धनसहाय अउ बन्जू मन हा, कवि मन ला एल्हत हें खूब
ओतन कवि सम्मेलन हा अब, लुकलुकात होवय प्रारंभ.
मंच बने हे शाला के तिर, जेकर जगह बहुत मेल्लार
आमा लीम जाम पत्ता मं, मंच के ऊपर छिद्र ला छाय.
कविता ओरखे बर मनखे मन, उजरत खलक बढ़त हे भीड़
जगा ला पहिली हक लाने बर, खमखम जमिन बना के ठौर.
कवि मन जहां मंच पर पहुंचिन, हर्षित होवत ताली पीट
कवि मन हाथ उठावत ऊपर, ओमन व्यक्त करत आभार.
कवि मन के परिचय होइस तंह, बढ़गे आत्मीयता संबंध
अइसे लगत के परिचय जुन्ना, जानत एक दुसर ला खूब.
कविता पाठ शुरूहोवत हे, श्रोता के मुंह चुमचुम शांत
कविता सुनत कान ला टेंड़िया, अंदर मन मं रखत सम्हाल.
जीवनयदु खैरागढ़वासी, साहित्यिक जग मं विख्यात
ओहर गीत ला गावत लय धर, प्रस्तुत करथय ठोस विचार –
“”पखरा सहि काया मं आगी सही मन मांगत हे जुग मोर।
बेरा के गोड़ बंधाये सनीचर बेरा ला तंय झन अगोर।।
चुरुवा ले निथर नइ तो जाहय सबो जइसे दोना ले पातर झोर ।
अंगना ले निकल तंय हा आबे ते आहय मोहाटी के आगू मं खोर ।।
रक्सिन रथिया करियावय झन
तोर सुरुज ला छरियावय झन
पांचो अंगरी ला छांट के चल
खोचका डिपरा ला पाट के चल
तब हम सकबो जदुहा रक्सा मन के सब फांदा ला टोर ।।
बिन गोड़ मुंहू के सिकारी हवे
सब जोंख के इही चिन्हारी हवे
रसदा मं परे हवे घात लगा
कोकड़ा सहि बइठे हे दिही दगा
तंय चीन्ह चिन्हारी ला झन बिसरा गठिया लेबे पागा के छोर ।।
तोर हे कुरिया कुरिया काबर
कोनो मोठ हवे तोर ले आगर
होगे धोती हा तोर लिंगोटी काबर
होगे चांउर तोर जी गोंटी काबर
येला सोच बता कतका दिन खाबे तंय हा कनकी ला अल्होर ।।
आगी सिपचा आगी बरही
तोर हाथ भुंजाही बंहा जरही
अपनेच मरे ले सरग दिखथे
बेरा बिदवान कथा लिखथे
टपके नहीं कोनो अगास ले जी कोनो आवय नहीं भुंइया फोर।।
तोर मुंहू मं हवय भाखा बोली
दुखुवा के हवे जी इही गोली
झन बाप हा बेटा के घाती बने
अतका पथरा तोर छाती बने
हुंड़रा के मुंह झन जावन पाये जी गाय के पाछू कलोर।।
संग संगी केहे गंज आस मोला
तोला भूख तपे अउ पियास मोला
फेर काबर भीतर तंय हा हवस
लागे मोला तो बयरासू अस
धकियाबो चलो भुतहा खण्डहर बनके हम आंधी झकोर ।
पखरा सहि काया मं आगी सही मन मांगत हे जुग मोर ।।
भीखमबैष्णव श्रृंगारिक कवि, जउन करत खैरागढ़ वास
मन मोहे बर गीत ला गावत, निज आवाज बना के मीठ-
“”मोर सोन चिरैया – आंखी मं बसैया, मन ले बिसरे न।।
उदुक फुदुक के बैरी मैना, इहां उहां उड़ जाथय
गुरतुर भाखा बोले पैरी, सब के मन ला भाथय
बोली अइसन मीठ लागे, जस मंदरस घोरे रे ।।
कान मं अइरिन पहिरे बैरिन, मटके धर के गगरी
थिरा थिरा के पांव ला धरथय, नदिया अड़बड़ गहिरी
कहूं बिछलगे पांव, तंय हा गिर तो परबे न ।।
चूंदी कारी – झुंझकुर बारी, बादर अस भरमाथे
खोंचे कनिहा हरियर लुगरा, सुआ ददरिया गाथे.
मुचुक हंसाई देखे, मन के परेवा उड़गे न ।
मोर सोन चिरैया आंखी मं बसैया, मन ले बिसरे न।।
कवि गोपाल भण्डारपुर बसथय, सच मं ग्रामीण साहित्यकार
एकर रचना स्तर ऊंचा, पाठ करत हे धर के राग-
काकर करा हम जान कोन ला गा हम गोहरान?
ए डहर ओ डहर सबो डहर भैंसा अंधियार
जान डरिन सुन डरिन कोनो नइ कहय दीया ला बार
हुरहा अभर जाबे तब डोमी मारे हवय फुसकार
ढोंढ़िया असोढ़िया मुढ़ेरी सब के इही हे विचार
एमन सबे बदे फूल मितान।
तब काकर करा हम्मन जान…।।
खुर्सी मं बइठे बर एमन सबे किरिया ला खाइन
राम सरी हम राज चलाबो कहिके गा उभराइन
हुरहा खुरसी मं एहर बइठिस आगे एला उंघासी
उंघात उंघास खटिया पाइस सुतगे गा ए छैमासी
एकर खटिया मं छुटगे परान ।
तब काकर करा हम्मन जान ।।
सियान जान के पीढ़ा देन हमला उही पीढ़ा मं मारिस
दोंहदोंह ले अपन पेंट भरे बर ठंडका हमला ठगदिस
सियान जान के कुकरी पोइलिस नीयत एकर छूटिच गे
हुरहा एला मिठाइस संगी आंखी एकर फूटिच गे
गोपाल एमन हवंय बइमान ।
तब काकर करा हम्मन जान ।।
कवि मिथलेश रहत अर्जुन्दा, सम्मेलन मं रखथय धाक
रचना हेर पढ़त हे सुर धर, मन ला मोहत मीठ आवाज –
कौन जानता था कि ऐसा गजब हो जायेगा
पैगाम रोशनी का भी अंधकार लायेगा.
चिपका उदर नंगा बदन तू जीता रहा किसान
बोएगा तू काटेगा तू पर मान तू न पायेगा.
कोकिलोंे की लाश पट जायेगी अमराई भर
आम की हर डाल पर उलूक फाग गायेगा.
भाइयों पर भाइयों के देख मजबही सितम
नर्क में बैठा हुआ महमूद गजनवी शर्मायेगा.
रोशनी तम को पर चीर आयेगी – निसार
आज नहीं कल सही वह दिन जरुर आयेगा.
हे विद्वान रामेश्वरबैष्णव, हे रौशन साहित्य मं नाम
ओहर रचना ला हेरिस अउ, डारत हे श्रोता के कान –
आगी हा अमरित कस लागय वा रे अप्पत जाड़
डोकरा पानी देख के भागय वा रे अप्पत जाड़.
दांत मंजीरा बनगे होगे हूहू हूहू गाना
गोदरी ला छोड़े नइ भावय वा रे अप्पत जाड़.
स्वेटर कोट रजाई मं दिन रात लदे मनखे
कनचप्पी बिन पग नइ ढारय वा रे अप्पत जाड़.
लइका ला छेमाही परीक्षा के लदके हे भूत
तब ले भिनसरहे नइ जागय वा रे अप्पत जाड़.
झार मुहल्ला मन मं कइसन झगरा फदके हे
जउने तउने कूदय फांदय वा रे अप्पत जाड़.
अइसन मं कवि सम्मेलन के आए हे नेवता
बैष्णव जी गउकिन नइ जावय वा रे अप्पत जाड़.
कवि के नाम मुकुंदकौशल हे, शहर दुर्ग मं करत निवास
ओहर कविता ला हेरिस अउ, सुर के साथ करत हे पाठ-
“”हाथ मां अंइठी पांव मं पैरी, कनिहा मां चरलड़िया करधन
गरा मं पहिरे सुर्रा पुतरी, सूंता माला पांव मां पैजन
हाथ के अंगरी मन मां मुंदरी, बिछिया पांव के अंगरी मन मां
छत्तीस रंग के सुघ्घर लुगरा, फबै जेखर कंचन कस तन मां
छत्तीस गहना देंह मां साजे, छत्तीस चूरी खन खन बाजै
मांग मं सेंदुर छत्तीस बुकनी, मुड़ मं बोहे चांउर टुकनी
जेखर हे किरपा बड़ भारी, बंधुवा बेटा के महतारी
छत्तीस नदिया छत्तीस तरिया, छत्तीस ठिन मंदिर माढ़े हे
छत्तीस ज्ञानी ध्यानी पंडित, छत्तीस ठिन मंदिर माढ़े हे
जिंहा राम बड़का अउ छोटे लछमन, नान्हे मन बनवारी
महापुरुष मन के उपजइया, जै हो मोर भुंइया महतारी
इहां मयारुक गुरतुर गुरतुर, बोली के महिमा अड़बड़ हे
नांव घलो कतका सुंदर, मोर महतारी के छत्तीसगढ़ हे
देख सकै झन तोला, आंखी फार के कउनो बैरी
अम्मर हे तोर चूरी दाई, अम्मर हे तोर पैरी…।”
आये श्यामलाल चतुर्वेदी, बिलासपुर मं करत निवास
ओहर कविता ला हेरिस अउ, मुड़ ला हला करत हे पाठ-
जब आइस बादर करिया ।
तपिस बहुत दू महिना तउन सुरुज मुंह तोपिस फरिया ।।
जउन रंग ला देख समे के, पवन जुड़ाथे तिपथे
जाड़ के दिन मं सुर्रा हा, आंसू निकार मुंह लिपथे
गरम के महिना झांझ होय, आगी उलझय मनमाना
तउने फुरफुर सुघर चलिस, जइसे सोझुवा जनजाना
राम भेंट के सबरिन बुढ़िया कस मुखयाइस तरिया ।
जब आइस बादर करिया ।।
जमों देंह के नुनछुर, पानी बाला सोंत सुखागे
थारी देख नानकुन लइका, कस पिरथिवी भुखागे
मेंघराज के पुरुत पुरुत के, उझलत देखिन गुढ़ुवा
“हां ददा बांचगे जीव, कहिन – सब डउकी लइकन बुढ़ुवा
नइ देखेन हम कभू ऐसो कस, कुछुक न पुरखा परिया।
जब आइस बादर करिया ।।
रात कहय अब कोन दिनों मं, घपटय हे अंधियारी
करिया हंड़िया केरवंछहा कस, जमों कती अंधियारी
सुरुज दरस के कोनो कहितिन, बात कहां अब पाहा
हाय हाय के हवा गइस, चौंगिरदा ही ही हा हा
खेत खार मं जगा जगा सरसेत सुनांय ददरिया ।
जब आइस बादर करिया ।।
का किसान के सुख कइहा, बेटवा बिहाव होय जइसे
दौड़ धूप सरजाम सकेलंय, काल लगिन होय अइसे
नांगर बिजहा बइला जोंता, नहना सुघर तुतारी
कांवर टुकना जोर करंय, धरती बिहाव के त्यारी
बर कस बिजहा छांट पछिनय, डोला जेकर कांवर
गीद ददरिया भोजली के, गांवै मिल जोड़ी जांवर
झेंगुरा धरिस सितार बजाइस, मिरदंग बेंगवा बढ़िया
बजें निसान गरज बिजली, छुरछुरी चलाय असढ़िया
राग पाग सब माढ़ गइस हे, माढ़िस जम्मों घरिया ।
जब आइस बादर करिया ।।
हरियर लुगरा धरती रानी, पहिर झमक ले आइस
कोतरी बिछिया मुंदरी कस, फेर झुनुक झेंगुरा गाइस
कुंड़ के चौंक पुराइस ऐती, नेंग मा लगे किसानिन
कुछू पूछिहा बुता के मारे, कहिथें – हम का जानिन
खाली हाथ अकाम खड़े, अब कहां एको झन पाहा
फरिका तारा लगे देखिहा, जेकर घर तूं जाहा
हो गय हे बनिहार दुलम सब खोजय खूब सफरिया ।
जब आइस बादर करिया ।।
पहरी उप्पर जाके अइसे, बादर घिसलय खेलय
जइसे कल्लू पारबती संग, कर टेमचुल ढपलेय
मुचमुचही के दांत सही, बिजली चमकय अनचेतहा
जगम ले आंखी बरै मुंदावै, करय झड़ी सरसेतहा
तब करीब के कलकुत मातय छान्ही तरतर रोवय
का आंसू झन खंगै समझ अघुवा के अबड़ रितोवय
अतको मा मुखयावै ओहर, लोरस नवा सके के
अपन दुख के सुरता कहां? भला हो जाय जमे के
सुख संगीत सुनावै – तरि नरि ना मोरि ना अरि आ ।
जब आइस बादर करिया…।।
नाम “रमेश अधीर’ ए कवि के, जेहर बसथय कोण्डागांव
ओहर कविता ला पढ़थय तब, श्रोता करत प्रशंसा खूब –
कोठी भर भर जे छलकाइन, खोंची बर खड़े मुहाटी में ।
पसिया मांगत करन फिरत है, छत्तीसगढ़ के माटी में ।।
जुच्छा पेट सुन्ना अगास हे, जेमा भूख सुरुज के गोला
पीरा के जठना मं लांघन, अंगरा ओढ़े कोंवर चोला
करजा गर फांसी होगे, आगी लगगे घांटी में ।
पसिया मांगत करन फिरत हे, छत्तीसगढ़ के माटी में ।।
आस के चंदन धुर्रा बनगे, कांटा बांटा जिनगी के
चांउर नैन बर सपना होगे, दर्शन मिले न कनकी के
मनखे तन कठवा के पुतरी, बिपत के ढेरा आंटी में ।
पसिया मांगत करन फिरत हे, छत्तीसगढ़ के माटी में ।।
हंड़िया सुरता करके रो दिस, बीते दिन ला सीधा संग
राम लखन कुरिया ला छोड़िन, गांव ले निकलिन सीता संग
सांस के गठरी बांध के चल दिन, घर के दुख संग काठी में ।
पसिया मांगत करन फिरत हे, छत्तीसगढ़ के माटी में ।।
दानेश्वर शर्मा कवि ऊचा, बसथंय पद्यनाभपुर दुर्ग
कविता हेर पढ़त हे सुर धर, वाह वाह बोलत हें लोग.
मइके ल देखे होगे साल गा,
भइया तुमन निच्चट बिसार देव
बहिनी के नइये खियाल गा ।
कनकी अस कइसे निमार देव ।।
गंगा के धारा हा कइसे उलटिस भइया
लहू के नता हा कइसे टूटिस भइया
मया हा मोरेच बर कइसे खंगिस भइया
चिट्ठी के परगे अकाल गा ।।
दाई के खांसी हा माड़िस – नइ माड़िस गा
ददा के रोगहा जर छांड़िस – नइ छांड़िस गा
तोर छोटे बाबू हर बाढ़िस – नइ बाढ़िस गा
बस्ती के बता सबो हाल गा ।।
आंसों मोर गंगाजल तीजा रिहिस होही
फागुन मं ओकर पठउनी होइस होही
आहूं केहे रेहेंव, रद्दा देखिस होही
घुस्सा मं होइस होही लाल गा ।।
मोर सेती ददा के पैलगी कर लेबे
मयारुख दाई के आसिस मां तर लेबे
दूनों भतिजवा के चूमा तैं कर लेबे
भउजी के छूबे दूनों गाल गा ।।
कवि मन कविता पाठ खतम कर सब ले पैन प्रशंसा।
सुनत सुनावत टेम खसकगे तभो बुतत नइ हाही ।।
श्रोता जमे मंच के तिर मं, कुछ सुरता नइ खेत कोठार
कवि मन करिन प्रार्थना तंहने, श्रोता मन रेंगिन मन मार.
ग्रामीण चहत – देन हम रुपिया, पर कवि मन कर दिन इंकार
बोलिन – अपन गांव आये हन, काबर लेगन धर के कर्ज !
सुम्मत राज ध्येय जब पूरा, तभे मनाबो हम तिवहार
पेटमंहदुर बन कोंहकोंह खाबो, लहुट जबो धर कड़कड़ नोट.”
जय जोहार – कर कवि मन रेंगिन, मन गुप्ती मं धर के प्रेम
अपन अपन घर मनखे जावत, नव उमंग धर धर के रेम.
कुछ दिन बाद ओन्हारी पकगे, सुंट बंधगे मजदूर किसान
केन्द्रीय शक्ति बली होथय कहि, एक साथ भिड़ लगिन कमान.
चना गंहू अरसी ला काटिन, राखिन एक ठन जबर कोठार
फसल ला मींजत ओसरी पारी, बाद ओसाइन सूपा धार.
डुठरी ला कोटेला कुचरिन, तब घोटरे अन बाहिर अ‍ैस
घेक्खर बण्ड खात रहपट तब, सम्मुख ढिलथय वाजिब तथ्य.
बन्दबोड़ हे जंगल तिर मं, ओकर पास हवय बन्छोर
आय ऐतहासिक स्थल तब, नाम उदगरत हे विख्यात.
कई पथरा के मूर्ति उहां पर, एक मूर्ति हा भव्य विशाल
मनखे उंकर मान पूजा कर, पात अपन मन सुख संतोष.
डकहर सुखी घूम लिन जंगल, तेकर बाद गीन बन्छोर
देख निझाम जगह पबरित अस, बइठ दुनों झन करत सलाह.
डकहर कहिथय -“”जमों कृषक मन, राह चलत हें सुम्मत बांध
सब बिरता ला मींजिन कूटिन, एक जगह पर रखिन सकेल.
एकर मतलब साफ समझ तंय – होत संगठित सब ग्रामीण
धनवा पर अब धावा चढ़िहय, ओकर शासन करे समाप्त.”
बोलिस सुखी -“”उचित बोलत हस, धनवा के भावी अंधियार
यदि धनवा ला संग देवत हम, गंहू के संग मं कीरा जान.
धनवा पहिलिच ठोंक बता दिस – जब परिवर्तन अ‍ैस समाज
मध्यम वर्ग मरिस हे पहिली, बाद गिरिस शोषक पर गाज.
क्रांति के भेद समझ के अब हम नइ तो खावन माछी।
धनवा ले सम्बन्ध टोर के – जन के पीयन मानी ।।
जनता जइसन जेवन करिहय, हम्मन जेबो उहिच समान
ओकर तोलगी ला यदि धरबो, निश्चय बचा सकत हम प्रान.”
डकहर राखत प्रश्न सुखी तिर -“”पर शंका ला तंय कर दूर
हम धनवा के छांय असन अन, सदा रहत हन ओकर साथ.
पर अब ओकर संग ला छोड़त, हम दूसर के पकड़त बांह
सच मं हमर कोन – हम काकर, हमर कोन अरि – कोन मितान?”
किहिस सुखी -“”सिद्धान्त हमर सुन, आय हमर बर ओहर शत्रु
घाटा खतरा दण्ड ला देवत, यने हमर हित कर नइ पाय.
हमर मित्र हा हमला देवत – लाभ सुरक्षा स्वार्थ इनाम
यने हमर हित के रक्षक ला, हम मानत हन ईष्ट समान.
अब मंय निर्णय साफ देवत हंव – हम तुम दुनों पूर्व अस एक
पर धनवा ले दूर रहन हम, अब नइ देखन ओकर द्वार.”
दुनों सुंटी बंध – बात गुप्त रख, लहुट अ‍ैन सुन्तापुर गांव
धनवा के हालत ला देखिन, वास्तव मं होवत हे पश्त.
धनवा लरथराय बिन मनखे, कोनो नइ देवत सहयोग
नौकर काम करे बर छोड़िन, अब डांटत फिक्कर के रोग.
धनवा अन्य गांव जावत पर, ओमन ठेंगवा देखा भगात
एक देश के निज बाते पर, दखल करय नइ दूसर देश.
डकहर सुखी पक्षधर तेमन, मुंह कर करूभगत हे दूर
धनवा हीन हवय ऊंकर बिन, कनिहा टांठ परत हे लोच.
पता चलिस के अब दूनों झन, जनता साथ मिला लिन हाथ
क्रांति के बाजा बजा इही मन, सब झन ला करिहंय सावचेत.
पर बन्जू हा गर्व मं अंइठत, चेथी कोती रखे दिमाग
खुद ला पूंजीपति समझत हे, खुद ला समझत सब ले ऊंच.
मेहरूहा बन्जू ला बोलिस -“”कतको साफ करत हें खेत
पर बन दूबी हा बच जावत, ओहर फसल ला करथय नाश.
डकहर सुखी राह पर आगें, ओमन देत क्रांति ला साथ
पर तंय रहड़ा बन के कूदत, यदपि रखे हस भ्रम ला पाल.
तंय हा हमर ले धनवन्ता अस, पर तंय पूंजीपति नइ आस
पूंजीपति के व्याख्या करथंव, ओला तंय हा सुन कर चेत-
ओमन कतको खर्चा करथंय, पर नइ होय कभू कंगाल
बड़े रोग हा तन मं सपड़त, ऊंकर धन नइ होय समाप्त.
ओमन अप्रत्यक्ष ए शासक, शासक तक ला लेत खरीद
शिक्षित उच्च – बुद्धि ऊंचा मन, मंगत जीविका ऊंकर पास.
यद्यपि ओमन आर्थिक मुजरिम, पर नइ बनंय कभू अभियुक्त
दुनिया घूम करत हें खर्चा, पर धन वृद्धि ऊन के दून.”
मेहरूहा बन्जू ला बोलिस -“”मितवा, तंय अस जन सामान्य
हम सामान्य जीव अन तब तंय, हमर मदद ला कर बिन भेद.”
बन्जू के भ्रम हा मिट जाथय, कहिथय -“”तंय बोलत सच तथ्य
वास्तव मं हम पूंजीपति नइ, धन हा कभु हो जाहय नाश.
यदि अकाल मं फसल भुंजावत, शासन तिर हम मंगथन भीख
अपन पुत्र ला बांटा देवत, तंहने हम होवत कंगाल.”
बन्जू हा मेहरूला बोलिस -“”मोर पास जतका धन चीज
मंय हा गांव ला अर्पण करथंव, क्रांति ला मंय देवत हंव साथ.”
सुघर बात सुन मेहरूहर्षित, मिहनत आज सफलता पैस
बन्जू ठीक राह पर लगगे, निश्चय पूरा सब उद्देश्य.
हरहर हरहर हवा चलत अब, गिरत पेड़ के सुखा के पान
लगथय – पूंजीवाद हा मरिहय, भट के सत्तारुढ़ समाप्त.
होली परब आय हे लकठा, चलव मनान सुंटी ला बांध
बाद मं लड़बो छोर कछोरा, पर अभि खेलन प्रेम के रंग.
जेला जोहत एक बछर तक, अभर गीस उत्सव के रात
“होली हे’ लइका चिल्लावत, घर घर ले मंग लकड़ी लात.
“चोरी झन हो’ कहि बुजरुक मन, ताका करत – करत हें जांच
पर रापा खरिपा हा चलदिस, टुरा चोरा के मारत टेस.
जेन मेर “होली’ हा बरिहय, मनखे बइठ गीन मन मार
ओतिर लकड़ी के गांजे ढिक, जेहर गोला कामिल कांड़.
बुजरुक मन लकड़ी ला देखिन, तंहने होवत हें सन सांय
देत युवक मन ला समझउती -“”बेढंगा अस होवत काम.
यह इमारती लकड़ी ला तुम, बिन सुल बारत अबुज समान
लकड़ी बचा रखव भावी बर, कतको ठक बन जहय मकान.
जंगल धंसा तिहार मनायेन, चिखना परत दुखद परिणाम
वायु प्रदूषण रोग अस बाढ़त, ठीक समय नइ बरसा घाम.
पूर्व कुजानिक करे हवन हम, जानबूझ माछी झन खाव
धरती माता ला हरियर रख, खुद भावी ला सरग बनाव.”
उंकर सलाह जंचिस तंह रखदिन हेर के कामिल लकड़ी।
रांई झुरी जलऊ लकड़ी ला रचत हवंय गोलिया के ।।
बांस घंसर के आग दगाथंय, बाद ढिलिन लकड़ी मं आग
जरत बरत होलिका पापिनी, अत्याचार के पाग समाप्त.
मनसे लीन राख के टीका, एकर बाद छोड़दिन ठौर
घर मं पहुंच रुसुम ला फोरत, अउ “प्रहलाद कथा’ ला कान.
आज आय होली के उत्सव, सबके मन मं भरे उमंग
कते मित्र अउ कते हे दुश्मन, कोन बतान सकत हे भेद !
परसा फूल टोर के लानिन, गघरी मं ओइरिन सब फूल
ओकर साथ नाय हें पानी, गघरी ला चूल्हा रखदीन.
धकधक आगी हा धधकत हे, खउलत जल के संग मं फूल
जहां फूल के रंग हा ओगरिस, देखव बनगे पक्का रंग.
ओकर साथ बनत पिचकारी, ठाहिल बांस के पोंगरी आय
कतको रंग भरय पिचकारी, लेकिन झटका ला सहि जाय.
सबके घर मं चुरे पके हे – नुनहा गुड़हा रोटी आज
ठेठरी पुड़ी करी के लाड़ू, याने जेकर तिर जे शक्ति.
कुछुच फिकर नइ-मन आनंदित, इंकर मुड़ी पर सुख के ताज
चुरे जिनिस ला सबझन खावत, दूसर तक ला बांट बिराज.
अब मनसे मन हा सकलावत, गउराचंवरा तेकर पास
कई प्रकार के रंग धरे सब, ओकर संग मं धरे गुलाल.
दुश्मन मित्र के भेद खतम हे, प्रेम करत हे मन ला चंग
एक दुसर ला कबिया के धर, ओकर ऊपर डारत रंग.
कतको झन मन गोलिया बइठिन, बाहिर लावत मन उत्साह
बजत नंगारा कई ठक बाजा, जोश मं उठ उठ गावत फाग –
“”अरे सर रर सुन ले मोर मितान
फागुन मस्त महीना संगी उड़गे रंग गुलाल
आगू आगू राधा भागे पाछू में नंदलाल
बारामासी
फागुन मस्त महीना अरे संतो,
फागुन मस्त महीना रे लाल
चारे महिनवा पानी गिरत हे
पानी गिरत हे हो पानी गिरत हे
टपटप चुहे ला झोफड़िया हो
टपटप चुहे ला झोफड़िया अरे संतो
फागुन मस्त महीना रे लाल…।
चारे महिनवा जाड़े लगत हे
जाड़े लगत हे हो जाड़े लगत हे
थर थर कांपे करेजवां हो
थर थर कांपे करेजवां अरे संतो
फागुन मस्त महीना रे लाल…।
चारे महिनवा घाम लगत हे
घामे लगत हे हो घाम लगत हे
टपटप चुहे ला पछीना हो
टपटप चुहे ला पछीना अरे संतो
फागुन मस्त महीना रे लाल…।
जासल गीत
अरे हां रे जासल – जासल बुड़गे कउहा में
अरे हां रे जासल – जासल बुड़गे कउहा में
अरे हो ओ ओ ओ ओ ओ रे जासल,
जासल बुड़गे कउहा में
मुड़ टांगे सींह दुवार, अरे मुड़ टांगे सींह दुवार
रे जासल – जासल बुड़गे कउहा में
तो कइसे जासल बुड़गे कउहा में ?
मुड़ टांगे सींह दुवार
रे जासल – जासल बुड़गे कउहा में
जासल बुड़गे कउहा में – जासल बुड़गे कउहा में
मुड़ टांगे मुड़ टांगे मुड़ टांगे सींह दुवार
रे जासल, जासल बुड़गे कउहा में…।
झूला
अरे ककनी मांजे रे तरैया में ककनी
अरे हां हां तरैया में ककनी मांजे रे।
ककनी मांजे बंहुटा मांजे मांजे गले के हार
भला हो मांजे गले के हार
ककनी संग मं बहुंटा मांजे, मांजे ये सोलासिंगार
तरैया में ककनी, अरे हां हां तरैया में ककनी मांजे रे…।
सुत के ऊठे लोटा धरे अउ सोझ्झे तरिया जाय
भला हो सोझ्झे तरिया जाय
तरिया पार में कुकुर कुदाये, लोटा छोड़े घर आये
तरैया में ककनी
अरे हां हां तरैया में ककनी मांजे रे…।
संझा आगे तभो चलत आपुस मं हंसी ठिठोली ।
कोन बरज सकिहय कोई ला आय सुहावन होली ।।
ऐ होली, तंय हा इसने हर बछर दउड़ के आबे ।
दुश्मन तक ला मित्र बनाके ओकर गला मिलाबे ।।

(९) गंहुवारी पांत समाप्त

गरीबा महाकाव्य (अठवइया पांत : अरसी पांत)

जग मं जतका मनसे प्राणी सब ला चहिये खाना ।
अन्न हवय तब जीयत जीवन बिना अन्न सब सूना ।।
माता अन्न अमर तयं रहि नित पोषण कर सब जन के।
तयं रहि सदा प्रसन्न हमर पर मंय बिनवत हंव तोला।।
बिरता हरा हाल के झुमरय, बजय बांसरी मधुर अवाज
गाय गरूकूदत मेंद्दरावंय, शुद्ध हवा राखय तन ठोस.
माटी के घर तउन मं खपरा, पबरित राखंय गोबर लीप
लइका मन चिखला मं खेलंय, हंसी तउन छल कपटले दूर.
मगर पूर्व के समय बदल गे, अब औद्योगिक युग के राज
बड़े बड़े उद्योग लगत हे, हरियर खेत ला करके नाश.
कल के भोंपू कर्कश बोलत, कल के कंझट फोरत कान
गर्द धुआं उड़ आंखी फोरत, जहर सनाय हवा जिव लेत.
पथरा र्इंट लोह के बंगला, सिरमिट डामर बिछत जमीन
लइका वाहन तरी रेतावत, खेलइ तजिन गिल्ली सुरपूक.
खोंचत पेड़ कारखाना मं, वायु प्रदूषण करे समाप्त
मगर पेड़ के बाढ़ नठत हे, भरे जवानी मुरझा जात.
कारावास रहत हे बंदी, सब अधिकार विकास छेंकात
चिरई धंधा पिंजरा मं कलपत, नरी मं अटकत मधुर आवाज.
मंय विकास के दुश्मन नइ अंव, पर अतका बोले अधिकार –
होत विकास तउन अनियंत्रित, बिगर समीक्षा होवत काम.
जिंहा कारखाना के जरुरत, धान उगे कहि करत प्रयास
जिंहा फसल कम श्रम मं छकबक, उहां कारखाना लग जात.
यदि माटी के घर हा टूटत, हो सकथय फिर गंसगंस धान
पर दस मंजिल भवन तउन तिर, कभू भविष्य फसल नइ होय.
जिंहा लौह सिरमिट हा उबजत, पथरा डामर ढंके जमीन
उहां के मन हर जिनिस ला खावत, ओकर पेटभरे दलगीर.
जिहां अन्न परमेसरी उबजत, बिरता कारन गद सब खार
उंकर पेट हा सपसप बोलत, भूख मरत बिन खाय अनाज.
मंगलिन जिंहा करत हे बासा, तउन भवन हा आलीशान
दुनिया मं सुख सुविधा जतका, सेवा करत हाथ ला जोड़.
भवन के आगू दरवाजा मं, जोधी नाम सुरक्षा गार्ड
सजग टंच बन पहरा देवत, एकर रुतबा बाघ समान.
चिरई घलो अंदर नइ जावत, जोधी के आज्ञा ला काट
जेला अंदर घुसना होथय, एकर पास इजाजत लेत.
एकर बीच ठाड़ हो जाथंय बुल्खू खलकट भाना ।
एमन ला जोधी गुर्रावत छटका दूनों आंखी ।।
घुड़किस – “”बिन बलाय आ जाथव, खड़े होत हव भूत समान
काकर पास आय का कारन, सब हुलिया फोरव तुम साफ?”
बुल्खू खलकट खड़े कलेचुप, पर भाना के चढ़गे क्रोध –
“”जोधी आय भृत्य मंगलिन के, यने परिस्थिति हमर समान.
लेकिन हम पर रुतबा झाड़त, हुलिया पूछत बन जासूस
एकर रउती आय लगत हे, मंय देवत हंव धुमड़ा खेद.”
बुल्खू हा भाना ला रोकिस – “”जोधी संग झन कर तकरार
आगन्तुक से प्रश्न चलाना, डांट लगाना एकर काम.
यदि फटकार झड़े ले मिलथय, जोधी ला भरपेट अनाज
एकर भोजन कार छिनन हम, क्रोध सुनन रहि के चुपचाप.”
बुल्खू हा जोधी ला बोलिस – “”मंगलिन से करना हे भेंट
ओकर तिर आवश्यक बूता, अंदर मं इतला कर देव.”
जोधी हा मंगलिन तिर पहुंचिस, बुल्खू के सब खबर बतैस
सुन मंगलिन के टेंशन बढ़थय, बुल्खू काबर मुंह ला लैस !
जोधी ला आदेश सुनाथय – “”बुल्खू तिर तंय कहि संदेश
हवय फलानी हा अनुपस्थित, ओकर साथ भेंट नइ होय.”
जोधी हा बुल्खू तिर अमरिस, बोलिस – “”हमर मालकिन नेक
आगन्तुक ला इज्जत देथय, करथय मदद रखत सम्मान.
मगर मालकिन अभि अनुपस्थित, हम नइ जानत कतिंहा गीस
तुम्मन लहुट अपन घर जावव, फेर बाद मं पता लगाव.”
बुल्खू निश्चय वापिस होतिस, मगर देखथय ओकर आंख –
जेन कार पर मंगलिन बइठत, उही कार हे आगुच ठाड़.
बुल्खू सच रहस्य ला जानिस-मंगलिन हाजिर अपन निवास
पर हमला खेदे बर चाहत, तब भेजत झूठा संदेश.
बुल्खू हा जोधी ला हकनिस- “”मंगलिन हवन सर्व सम्पन्न
भारत मं जेवन कर सकथय, हाथ अंचोहय पहुंच विदेश.
यने विश्व के जमों ठउर पर, मंगलिन पहुंच सकत बिन आड़
लेकिन अभी हवय बंगला मं, सुरुज असन मंय बोलत सत्य.
मंगलिन मनसे मंय तक मनसे, ओकर मोर कहां कुछ भेद
जब मंय आय दउड़ ओकर तिर, भेंट बिना वापिस नइ जांव”
बुल्खू हा बरपेली घुसरत, खत्नकट भाना ओकर साथ
जोधी हा भिड़ कतको छेंकत, लेकिन असफल जात प्रयत्न.
नांगर मं लेटा छबड़ावत, बूता पुरो सकय नइ नास
तब किसान हा इरता हकरा, आगू तन लेगत सब काम.
बुल्खू बइठक कक्ष मं अमरिस, बइठिन उहां गाड़ के खाम
मंगलिन जानिस-बुल्खू घेक्खर, बिना भेंट वापिस नइ जाय.
आखिर मं तीनों तिर आइस, जोधी अ‍ैस आंख कर लाल
कहिथय-” एमन बण्ड झगरहा, बरजत तभो पेल दिन बात.
तोर इशारा भर मंय देखत-मंय पालन करिहंव कत्र्तव्य
घेक्खर मन के मुंह करिया कर, बाहिर फेंक दुहूं चेचकार.”
मंगलिन हा जोधी ला खेदिस- “”तंय हा लहुट बजा खुद काम
जलगस एमन इहां रुके हें, एकोझन अंदर झन आय.”
जोधी ओतिर ले हटजाथय, मंगलिन के सुन आज्ञा।
अब कमरा मं शांति बिराजत यने बसत सन्नाटा।।
सन्नाटा ला मंगलिन टोरिस, बात ढिलत गंभीर अवाज –
“”काबर आय मोर तिर दउड़त, मोर बिना अरझे का काम ?”
बुल्खू कथय उग्रता ला तज- “”कारखाना के खोल कपाट
जम्मों श्रमिक कमाय चहत हें, ओमन अब टोरत हड़ताल.”
मंगलिन टांठ शब्द ला हेरिस – “”तहूं श्रमिक नेता विख्यात
लगवा आग कारखाना मं, मालिक होय निहू कंगाल.
गलत बात कहि श्रमिक ला उभरा, घर बइठार करा हड़ताल
मालिक श्रमिक लड़ंय दुश्मन बन, उच्च सिंहासन पर तंय बैठ.
पर तंय अभी बात जे बोलत, सुन के मंय होवत आश्चर्य
नांग सांप यदि अमृत बांटत, अजरज झझकइ हे अनिवार्य.”
बुल्खू बोलिस – “”मोर करा हे, एक सेक बढ़के कटु वाक्य
भाषा व्यंग अगर मंय मारत, बाण झेल कउनो नइ पाय-
पूंजीपति मन होत लुटेरा, ओमन चुहकत श्रमिक के खून
पर हक मारत बन के शोषक, ओमन होत वतन गद्दार.
इसने पथरा अस बोली ढिल, मार सकत तोर दिल मं शूल
मगर शत्रुता हा बढ़ जाहय, सच उद्देश्य विफल तत्काल.”
मंगलिन बला टरय कहि बोलिस- “” होत मोर तिर कमती टेम
तोर मांग का तंय चाहत का, झपकुन फोर बात दलगीर ?”
बुल्खू बोलिस- “”मांग सकत मंय, कारखाना ला हमला देव
मगर व्यवस्था अभि हे दूसर, कार रखंव अनुचित प्रस्ताव ?
मोर विचार तउन ला सुन ले, मंय का चहत बतावत साफ
जहर करूअस बोली लगिहय, पर परिणाम स्वाद हा मीठ-
आलीशान भवन मं तंय रहि, वातानुकूलित होय प्रबंध
अउ हम बसन स्वयं के घर मं, पंखा या कूलर तो होय.
तुम्मन हवई जिहाज मं बइठव, जब मन होवय जाव विदेश
पर हम बइठ फटफटी घूमन, देखन देश के जम्मों ठौर.
तुम कोंहकोंह ओंड़ा तक खावव, बासमती चांवल घी शुद्ध
लेकिन हमर खाय बर चहिये-सफरी चांवल फल्ली तेल.”
एकर बाद किहिस अउ बुल्खू- “”मंय बोलत तेकर सुन सार
खुलय कारखाना हा झपकुन, जमों श्रमिक मन फेर कमांय.”
मंगलिन टरकिस -“”काबर खोलंव, कारखाना के बंद कपाट
करत श्रमिक मन क्रांति के बूता, भूख मरंय पावंय तकलीफ.
अपन जिद्द ला माने बर तुम, बाध्य करत हव डार दबाव
पर मंय ककरो ला नइ मानंव, मंय चलिहंव खुद मन अनुसार.”
बुल्खू बोलिस -“”मोर मान तंय खोल तुरुत कारखाना।
श्रमिक कमा वेतन पाहंय तंय घलो लाभ अमराबे।।
बुल्खू खलकट भाना उठथंय, रेंगिन लहुट उहां ला छोड़
मंगलिन होइस एके झन तंह, मन में सोचत बन गंभीर-
“”जब ले बंद परे मोर मिल हा, मंय झेलत नंगत नुकसान
माल जाम ते बिक नइ पावत, नव उत्पादन तक हा बंद.
बैंक कर्ज के ब्याज बढ़त हे, गिरत बजार के जम्मों साख
सिरी गिरत उद्योग जगत मं, फिकर हा तन पर लावत रोग.
अब यदि मंय हा अंड़िया बइठत, टेस मं बंद रखत उद्योग
भागे मछरी जांग बरोबर- मुड़ धुनधुन पछताहंव बाद.
बुल्खू मन आ करिन निवेदन, तब मंय सुन लंव उंकर गोहार
मोर प्रतिष्ठा ऊंच सदा अस, ककरो कहां परत मंय पांव!
दूसर दिन के फजर हा आथय, सबझन धरत स्वयं के काम
दूध बेचइया दूध ला बेचत, व्यापारी मन चलत दुकान.
हाकर झपझप घर घर जावत, दैनिक के प्रति देवत बांट
रिक्शा चालक हा रिक्शा धर, खोज करत हे यात्री ठोस.
मिल के श्रमिक असाद असन हें, काम बिना बइठे झखमार
कोन तनी जीविका ला मांगंय, एकोकन नइ दिखत प्रकाश.
तभे अचानक मंगलिन मिल के, भोंपू दिस लगातार अवाज
ओकर अर्थ श्रमिक मन समझिन – मिल के दरवाजा खुलगीस.
हम्मन जावन कारखाना अब, महिनत करन पकड़ के काम
अगर देर तब हालत अइसे – डारा ले बेंदरा चुक जात.
श्रमिक प्रसन्न उछल नाचत हें, मुरझुर मुंह हा हरियर रुप
मरत फसल पर पानी बरसत, पोंगा फुटत करेरी मार.
उत्ता धुर्रा श्रमिक सम्हर गें, मिल तन दउड़त पल्ला छोड़
एक दूसरा ला ढकले बर, होड़ चलत हे ताकत मार.
आखिर मिल के आगू पहुंचिन, जेन सुनिन तेहर सच बात –
खुले हवय मिल के दरवाजा, अंदर जाय निमंत्रण देत.
लेकिन झनक खड़े आगुच मं अंड़िया राखे छाती ।
जेन श्रमिक हा घुसरत तेला ढकलत बाहिर कोती ।।
बोलत – “”तुम हड़ताल करे हव, ओकर बाद काम पर जात
कतका प्रतिशत मिलत बढ़ौत्री, पहिली एकर बता हिसाब.
हम नुकसान खाय हन नंगत, कर्ज करे हन कई झन पास
सब नुकसान भरय मंगलिन हा, रिन पटाय बर अग्रिम लाय.”
जमों श्रमिक मन धथुवा रुकगें, भाना गीस झनक के पास
कथय – “”तोर तिर कान फुंकावत, बिन बलाय आ जाहय कष्ट.
मिल के कइ मशीन मन टूटिन, होतिस लाभ तउन रुक गीस
अगर नदानी करत जरा भर, भरना परिच जहय क्षतिपूर्ति.
पहिली हम्मन काम बजावन, पाय कारखाना डंट लाभ
तेकर बाद मांग यदि रखबो, मंगलिन मान लिही सब मांग.”
कथय झनक के शांति निवेदन, समझौता बंधुत्व सलाह
एमन औद्योगिक जग के अरि, श्रमिक ला देवत हें नुकसान.
अगर मांग ला चहत मनाना, मालिक के मुड़ चहत झुकाय
इंकर मदद खत्तम लेवव तुम – तोड़फोड़ अनशन हड़ताल.”
झनक किहिस भाना ला खखुवा – “”मंय जानत तुम तीन के पोल
बुल्खू खलकट तंय सुम्मत बंध, श्रमिक विरुद्ध रचत षड़यंत्र.
तुम मंगलिन के तिर पहुंचे हव, भोभस भरे अपन भर स्वार्थ
तब मंगलिन के चहत भलाई, जमों श्रमिक के हित ला खात.”
भाना के तन आगी लगथय, बिन कारन मुड़ आवत दोष
ओहर झनक ला पेल हटाइस, मिल मं गीस करे बर काम.
बचे श्रमिक मन काबर बिलमंय, खाता पहुंच करत श्रम खूब
भर उत्साह चुहात पसीना, थकत तभो ले जोंगत काम.
मंगलिन उंकर काम ला देखिस, होत श्रमिक पर अब विश्वास-
अपन इमान श्रमिक मन राखत, मोला मिलिहय निश्चय लाभ.
जम्मों श्रमिक रिझा जावय कहि, फट बंटवा दिस अग्रिम नोट
जहां श्रमिक मन रुपिया झोंकिन, मंगलिन के बोलत जयकार.
मंगलिन हा उपकार करत नइ, एमां हवय स्वयं के स्वार्थ
अब मजदूर झड़क के जेवन, करिहंय काम दून उत्साह.
खलकट भाना के मुंह हरियर, रुपिया धरे बहुत दिन बाद
जिनिस बिसाय हाट गिन ओमन, लेना काय करत हें सोच.
उभे दुकनहा के तिर पहुंचिन, जेन किराना अन्न दुकान
कहिथय उभे – जिनिस उत्तम ला, रखे तोर बर बने सम्हाल.
निमरा फुना साफ चांउर हे, चिलकत बरन के राहेरदार
गंहू रिलियहा के छींटा नइ, पोहा हे ते दगदग साफ.
हरदी चाय मसाला शक्कर, कम लगाय हंव इनकर दाम
सिरिफ मोर तिर उंचहा साबुन, शुद्ध नारियल फल्ली तेल.
जेन जरुरत तेन लेव तुम मंय देवत हरहिंछा ।
यदि रुपिया कमती पर जावत लेगव जिनिस उधारी ।।
खलकट हांस डरिस एला सुन, कहिथय – “”बुरा बात झन मान
तुम व्यापारी मन केकरा अव, चलथव राह समय अनुसार.
जे दिन हम हड़ताल करे हन, याने चुमुक बंद सब काम
सब दुकान मं जिनिस मंगे हन, ताकि पेट भर जेवन नान.
पर सब रिता हाथ लहुटा दिन, एको झन नइ दीन उधार
लेकिन अब का बुद्धि लहुटगे, स्वयं बला के नापत चीज ?”
कहिथय उभे – “”हमर जीवन हा, तुम्हर भरोसा हे जस बेल
तुम दुख पाथव हम दुथ पाथन, तुम सुख पात हमूं खुश होत.
याने जब हड़ताल चलत हे, तुम वेतन ले रहिथव दूर
काकर पास जिनिस ला बेंचन, यदि उधार तब डूबत कर्ज.
तुम कमात तब रुपिया पावत, हमला नाप जिनिस तुम लेत
बदला मं हम नफा कमावत, तब फिर मिलत खाय निÏश्चत.”
खलकट भाना तथ्य समझगें, मन माफिक लेवत सामान
पटा सकिन ततका रुपिया दिन, बचत नोट ला रखिन उधार.
सब समान धर वापिस घरगिन, अब जेवन रांधे के टेम
खलकट कहिथय – “”भूख बियापत, जेवन बना खाय बर जल्द.
मगर मोर आज्ञा तक ला सुन – जेवन बना सुपच स्वादिष्ट
अंगरी तक ला चाब डरंव मंय, जीवन रहत रखंव मंय याद.”
भाना के मन हा आनंदित, पर बाहिर मं क्रोध देखात –
“”जुन्ना युग के खटला नोहंव, जेमां सुन लंव घुड़की तोर.
कंधा मिला तोर संग रेंगत, करत परिश्रम तोर समान
तोर जतिक अधिकार हे मोरो, दूनों मं नीहू हे कोन ?
मन पसंद यदि खाय चहत हस, मोर मदद कर तज के भेद
मंय चांउर ला यदि धोवत हंव, तब तंय राख साग ला काट.
सब्जी मं मंय नांव मसाला, तंय हा मिला दार ला शीघ्र
जेवन चुर के पूरा होवय, खावन दुनों एक संग बैठ.”
सुम्मत बांध दुनों रांधिन अब करिहंय बैठबियारी ।
इही बीच डेंवा हा पहुंचिस तउन घलो हे भूखा ।।
कहिथय – “”आय बने बेरा मं, जउन चहत ते मिलिहय आज
मोर खाय बर चलव निकालव, मंग के खाय मं नइये लाज.”
खलकट बोलिस -“”तुम किसान मन, उपजावत हव खाय अनाज
तुम्हर घलो हक के खाये बर, नदिया के जल नदी मं जात.”
तीनों झन खलखला के हांसिन, एकर बाद बइठ गिन खाय
भोजन के स्तर ला देखत, डेंवा ला होवत आश्चर्य.
कहिथय -“”तुम पूजीपति नोहव, तुम अव औद्योगिक मजदूर
शहर के रहना बसना ऊंचा, जेवन करत तेन तक ठीक.
हम किसान मन गांव मं रहिथन, पोषक अन कहि मारत डींग
पर जेवन नइ पान बने अस, रहन सहन ला पशु अस जान.”
स्वाद लगा जेवत तीनों झन, जमों फिकर ला दूर खेदार
पेट भरिस तंह हाथ अंचोवत, सरलग चलत आपसी गोठ.
एकर बाद चलिस डेंवा हा, घना ला खोजत धर के पेज
आखिर घना सपड़ गिस आगू, जेला चहत तउन मिलगीस.
डेंवा कथय – “”खूब खोजत हंव, होगिस भेंट सुफल हे यत्न
मंय पूछत तेकर उत्तर दव, एकोकन मारव झन फोंक-
तोर पास आश्वासन ला पा, अपन गांव मंय वापिस गेंव
मनसे चील असन जुरिया गिन, पूछिन झूम बांध के हाल.
मंय ऊंकर तिर पटकेंव उत्तर- रखव विधायक पर विश्वास
बांध बनाय दीस आश्वासन, पूरा करिहय अपन जबान.
डेंवा हा फिर घना ला पूछिस- “”मगर बांध हा बन नइ पैस
एकर कारन ला सच फुरिया, कोन शत्रु अरझावत काम ?”
घना जउन ला टरकावत हे, उही दड़ंग ले सम्मुख आत
डेंवा प्रश्न करिस जब चिथिया, घना सन्न रहिथय कुछ टेम.
मगर स्वयं ला हवय बचाना, पर के मुड़ पर डारत दोष
मेड़ के ढेला खेत गिरत हे, तब फेंकत दूसर के मेड़.
मर आश्चर्य घना हा पूछत -“”तंय काबर बोलत हस झूठ
बांध काम रुकगे बोलत हस, लेकिन नइ होवत विश्वास.
तोर गांव मंय जात रेहे हंव, चलत काम के करतेंव जांच
त्रुटि या कमी ला हट जावय कहि, साहब पर करतेंव प्रहार.
मगर तोर सच बात ला सुन के, मंय हा रुकत चले बर राह
चलव तथ्य के पता लगावन, अधिकारी के खावन मांस.”
निज गंतव्य दुनों झन चलतिन, तभे उमेंदी गप ले अ‍ैस
रास ला देख कृषक खुश होथय, होत उमेंदी ला अति हर्ष.
बोलिस -“”तोर बहुत हे अयबल, तोर कोन हा सकत बिगाड़
तभे याद ला करे हवंव बस, होगिस झपकुन दर्शन तोर.
हमर कोष मं जमा करे बर, बिगर बहाना रुपिया लान
तंय हा अपन बचन हारे हस, ओला पूरा कर तत्काल.
मछली फांदा मं फंस जाथय तब ले देत उझेला ।
घना विधायक बोचके बर भारत ढचरा के ढेला ।।
किहिस -“”जमा हे कतका रुपिया, खंगत हवय अउ कतका नोट
मोर डहर ले रहा निफिकरी, मोर नोट ला जमा हे जान.
पहिली पर तिर उघा ले रुपिया, ओकर बाद पहुंच तिर मोर
जतका रुपिया कमी कोष बर, ओतका सब मंय करिहंव पूर्ण.”
घना जहां टरके बर सोचिस, तुरुत उमेंदी ताड़िस सत्य
कहिथय -“”कतको घन हल रेंगत, पर कांसी नइ छोड़य खेत.
तइसे मोर खसकना मुस्कुल, मंय हा घलो विधायक पूर्व
जेन चाल तंय अब रेंगत हस, ओकर दिग्दर्शक मंय आंव.
जतका मदद करे बर सोचत, मोर हाथ पर रुपिया राख
अगर हाथ रीता हरदम बर, उहू बात ला फुरिया साफ !”
जमों डहर ले घना हा गिरगे, तब फोरत हे वाजिब तथ्य-
मंय पावत रुपिया हर महिना, पर कंस खर्च होत हर रोज.
जेन क्षेत्र मं बाढ़ के पीड़ित, उहां मदद बर रुपिया देत
होत हमर दल के अधिवेशन, उहां घलो हम नोट पठोय.
अतेक कलपना जउन करे हंव, एकर अर्थ जान तंय साफ-
मोर पास रुपिया हे कम अक, तोर मदद बर मुश्किल जात.
मगर एक ठक आस बचे अउ, बाबूलाल के तिर चल शीघ्र
ओहर यदि कर देत व्यवस्था, हमर समस्या तुरुत समाप्त.”
बाबूलाल ले भेंटे बर अब, लकर धकर तीनों झन जात
इंकर निदान हवय ओकर तिर, काबर बिलम करंय कुछ बेर !
भेंटिन बाबूलाल ला तंहने, बोलिस घना राख के आस-
बांध बने बर होत शुरूकब, कब पहुंचिस ओकर आदेश?
एकर साथ एक अउ बूता-लाय उमेंदी ला धर साथ
अपन शक्ति भर मदद अमर दे, एमां सधत मोर तक स्वार्थ.”
बाबूलाल के मुंह उतरे अस, फिकर मं काड़ी असन शरीर
केंघरिस -“”मोला झन गोहरावव, मोर पास अब का अधिकार !
अण्डा के जर होत नौकरी, उही कहावत होगिस सिद्ध
तुम्हर पुकार तुलू अउ सुनिहय, नवा आय बदला मं मोर.”
घना विधायक चकरित होवत -“”तंय हा भेद लुका झन राख
तोर बात हा उमंझ परत नइ, कहना काय चहत सच बोल ?”
बाबूलाल अपन दुख रोथय -“”छेरकू के मंय मान दबाव
बगस के काम ला लेगेंव आगू, अपन हाथ ला खुद हा फांस.
याने मंय हस्ताक्षर मारेंव, मिलिस बगस ला आर्थिक लाभ
पर उपकार के बदला मं मंय, पाएंव जिनगी बर अंधियार –
अंगरी उठिस विरुद्ध के बाबूलाल भ्रष्ट अधिकारी ।
लीस बगस ले कोंहकोंह रिश्वत शासन ला दिस घाटा।।
जहां तथ्य के चलिस निरीक्षण, सब आरोप मोर मुड़ अ‍ैस
होय निलम्बित निरपराध मंय, छिनगे मोर जतिक अधिकार.
अपन गोहार करे बर मंय हा, छेरकू पास दउड़ के गंव
बोलेंव – “”तोर बात ला सुन के, बगस के काम पूर्ण कर देंव.
पर परिणाम हा करुहा निकलिस, होय निलम्बित मंय तत्काल
मोर नौकरी तिंही बचा अब, होय निलम्बन आज्ञा रद्द.”
छेरकू साफ उड़िस पोनी अस -“”मोला कार करत बदनाम
गलत काम बर कब बोले हंव, परमानित बर लान गवाह.
मोर बात ला यदि तंय मानत, अंदर कुआं मं जझरंग कूद
तोर असन अधिकारिच कारन, होत राजनीतिक बदनाम.
मंय शासन के अदमी होथंव, शासन के विरुद्ध नइ जांव
गल्ती चाला चले हवस तब, अपन कर्मफल तंय खुद भोग.”
छेरकू छोड़िस बात करे बर, मुंह ला टेड़गा करूबनैस
बोझा अस काबर रुकतेंव मंय, लहुट गेंव धर के अपमान.”
घना उमेंदी डेंवा मन चुप, बाबूलाल तनी हे ध्यान
ओकर व्यथा सुनत ओरखत हें, देत हुंकारूबन गंभीर.
मगर परिस्थिति हा अब बदलत, डेंवा चलत समय अनुसार
बाबूलाल ला देख के कांपय, अब काटत ओहर हर बात.
बाबूलाल के तिर अमरे बर, कंपस जाय डेंवा के गोड़
उहिच व्यक्ति हा सम्मुख मं रुक, अपन बुद्धि के मारत डींग.
डेंवा हा अंखिया के झींकिस, तुरुत उमेंदी ला खुद पास
कहिथय-“”मनखे पद पर रहिथय, गरब देखाथय छाती तान.
बाबूलाल रिहिस पद पर तब, करिस शक्ति भर अनुचित काम
लेकिन पाप के मरकी भरगे, फट ले छूटगिस पद उच्च.”
किहिस उमेंदी -“”उचित कहत हस, बाबूलाल करिस हे लूट
जनता के श्रम नोट ला खाइस, ओकर भोगय दुख परिणाम.”
मानव के आदत बेढंगा – टेटका अस बदलत हे रंग
जे मनसे के काम सफल हे, मरत चलत ओकर तारीफ.
कहिथंय-सफल फलाना होवत, ओकर काम चाल सब ठीक
ओकर असन सबो झन होवंय, अपन कर्मफल पावंय नीक.
पर ओकर पर गिरत बेवस्ता, या हालत गिर जावत निम्न
तंहने दूसर हंस के एल्हत – दुनिया भर के दोष लगात.
कथय – अबगुनी हवय ढेकाना, ओकर बुता सदा त्रुटिपूर्ण
अपन पाप के फल ला भोगत, ओकर ले भागो सब दूर.
डेंवा ला अब कथय घना हा – “”हमर उदिम मं परगे आड़
बांध के बारे बात करे बर, साहब कर आये हन दौड़.
लेकिन बाबूलाल निलम्बित, ओकर छिनगे सब अधिकार
तब हम्मन उपाय का जोंगन – एकोकनिक सुझत नइ राह !”
डेंवा कथय -“”दोष नइ ककरो, करे हवस तंय अथक प्रयास
पर सब धारोधार बोहागे, एकोकन गल्ती नइ तोर.
जनता के हित दौड़ करे हस, पर सब यत्न गीस बेकार
अपन जान ला थोरे देबे, तंय हा रहि जा बिल्कुल शांत.”
घना हा खुश होके सोचत हे – “”बाबूलाल निलम्बित होय
यद्यपि ओकर भावी बिगड़िस, मगर मोर इज्जत बचगीस.
फांसी के डोरी हा कटगे, मंय होगेंव छेल्ला आजाद
अब मोला निÏश्चत जनावत, सब बदनामी ले बच गेंव.”
घना हा उमेंदी ला कहिथय-“”बाबूलाल हा खुद असमर्थ
ओकर मुंह ला काबर जोहन, हमर मांग हा जाहय व्यर्थ.”
घना उमेंदी ला रुपियादिस खिसा मं राखे तेला ।
सब ला नमस्कार खुद करथय उंकर ले काटिस कन्नी।।
आगू डहर झिंगुट हा दिखथय, ओकर साथ करिस नइ भेंट
डर हे – सिरिफ बुद्धि ला खाहय, बिगर अर्थ के ढिलिहय गोठ.
झिंगुट घलो हे अपन बिधुन मं, जावत हे इमला के पास
चित्र बनाय जिनिस हे तिर मं, तेला राखे प्रान समान.
तभे उहिच कौंवा हा अमरिस, जेकर साथ पूर्व पहिचान
कहिथय- तंय जे चीज धरे हस, ओला फेंक समझ बेकार.
यदि तंय चहत चित्र बनवाना, इमला मदद दिही खुद दौड़
अपन काम ला कर नइ पावस, तोर स्वभाव प्रशंसा लैक.”
कौंवा हनिस व्यंग्य भाषा तंह, झिंगुट ला परगे बान समान
कहिथय -“”टांठ बचन बोलत हाल, देवत पीर मगर ए सीख.
टोर्रठ बोल रंग तक करिया, एमन आय प्राकृतिक रुप
इंकरो ले तंय घृणा करस नइ, तभे सफल हे जीवन तोर.
पर हम कर्मवीर के वंशज, अपन हाथ हम करेन विकास
आज दूसरा के मुंह ताकत, तब हम असफल हन हर क्षेत्र.
पर मंय अपन चाल बदले हंव, पर के मुंह तकना अब बंद
अपना काम ला स्वयं पुरोहंव, तब परिणाम मं मिलिहय जीत.”
कौंवा हंसिस -“”गरजथय बादर, तेन बरस जावय तब ठीक
यदि बड़नउकी पूरा होवत, तब भविष्य जमही विश्वास.”
छोड़िस झिंगुट प्रश्न उत्तर ला, बाते मं बाढ़त बस बात
ओहर इमला पास अमरगे, मन मं ललक करे बर काम.
बनके नम्र कथय इमला ला -“”चित्र बनाहंव करके यत्न
यदि त्रुटि होत टोंक देबे फट, सही बनाय चहत हंव राह.”
इमला कथय -“”सांप हा चलथय, टेड़गा बेड़गा घसल जमीन
कछुआ जीव बचाय बर राखत, मुड़ ला लुका के अंदर खोल.
तइसे तोर बुद्धि हा अस्थिर, एतन ओतन किंजरत व्यर्थ
काम देख के भागे चाहत, खोजत रथस बहाना मात्र.
अपन मदद करबे तंय जे दिन, अपन शक्ति के यदि पहचान
कैंसर रोग इलाज हा संभव, मंगल ग्रह मं मानव वास.”
इमला देत ठोसरा बल भर, झिंगुट के बुद्धि ला करथय उग्र
मगर झिंगुट पर कुछुच असर नइ, पुरई पान ले बिछलत नीर.
ओहर चित्र बने कहि करथय- बुद्धि लगा के अबड़ प्रयास
बिगड़त चित्र बोहावत महिनत, तब ले बढ़ा रखे उत्साह.
अपन काम ला करत बिधुन हो, रख के धैर्य चित्त एकाग्र
माछी उड़ उड़ घाव ला चाबत, पर ओ कोत ध्यान नइ देत.
चित्रकला के प्रश्न ला पूछत झिंगुट बने अज्ञानी ।
इमला सबके उत्तर देवत बचा रखिस नइ थाथी ।।
झिंगुट करत हे अथक परिश्रम, श्रमकण बहत माथ ले नाक
गोड़ पिरात खड़े हे अंड़िया, झुमरत आंख रखे हे खोल.
इमला हंसिस -“”मेड़ हा फूटत, जब्दा माल करत यदि काम
लुलसा घन मं लकड़ी चीरत, उकल जात हे फोरा हाथ.”
इमला हा समझात झिंगुट ला -“” मनसे मरत पोट पोट भूख
यदि ओंड़ा के आत ले बोजत, मरिहय या पर जहय बिमार.
तंय उद्देश्य पाय बर सोचत, सफल होय के धरे विचार
काम बजा तंय धुन पक्का कर, हर दिन सतत समय अनुसार.
जतका शक्ति श्रम घलो ओतका, सामन्जस्य दुनों मं राख
बुद्धि देह हा टंच बने तंह, तंय हरदम कर सकबे काम”
ए बोली हा गड़त झिंगुट ला, मगर झेल लिस सबला हांस
धर संतोष उहां ले चलथय, भावी साफ दिखत हे साफ.
ओहर पंचम पास मं पहुंचिस, मन के प्रश्न ला बाहिर लैस –
“”कर्मवीर मंय बने चहत हंव, ओकर बर उपाय तंय फोर.
मन मं होथय काम करंव मंय, बइठंव सबले आगे पांत
मगर वक्त पर पांव हा ठोठकत, असफलता के भय हा खात.
दवई लगत तब लान पिये बर, सुजी जरुरत तब हुग बांह
लेकिन मोर रोग कट भागय, बग जग जाय सोय पुरुषार्थ.”
पंचम तुरुत झिंगुट ला जांचिस, कई उपाय कर होवत जांच
ैतब फिर गुन के पंचम बोलिस -“”मंय हा पकड़ लेंव सब रोग.
तोर देह हा टंच निरोगिल, बुद्धि स्वस्थ पकड़त हर बात
यदि मंय तोला दुहूं दवाई, हर हालत करिहय नुकसान
भरे तोर मं हीन उच्चता, ओहर रखत सदा असमान्य
आगू सरक के पाछू रेंगत, यने सफलता भागत दूर.
काम सरल या कठिन भयंकर, पूर्ण अपूर्ण के छोड़ विचार
कर्म पूर्व कुछ शंका झन कर, रहि निÏश्चत काम ला जोंग.
अइसन तत्व मनुज तन रहिथय, जउन बताथय अपन प्रभाव
सूजी दवई रहत दुरिहा मं, तभो रोग ला करथय ठीक.”
पंचम हा सच राह बताइस, मिलिस झिंगुट ला नव उत्साह
अब कार्यालय छोड़त पंचम, जावत जे तन लगत बजार.
एतन ओतन नजर घुमत टिकगे जैलू पर आंखी ।
जेन चीज जैलू लेवत अचरज ले भरे कहानी ।।
शिशु मन पीयत दूध पावडर, बालक मन बर बाबा सूट
देख भुलाथंय तउन खिलौना, बालक मन के साबुन तेल.
तभे उदुप जैलू हा देखिस, पंचम हा आवत हे पास
जमों चीज ला पिछू लुका लिस, ताकि नजर हा झन पर जाय.
जैलू कथय -“”भेंट होगिस फट, करत फिकर कर जेकर याद
तोर साथ मं भेंट करे बर, वाकई मं हर क्षण बेचैन.
मंय हा अमल मं तंय जानत हस, लगे हवय बस अब तब टेम
मोर कोख ले शिशु अवतरिहय- सात दिनांक बजे दस रात.
लेकिन एक बात तंय सच कहि- निभा सकत हस जचकी मोर
यदि इंकार उहू ला कहि दे, मंय कर सकथंव दुसर प्रबंध ?”
पंचम किहिस- “”पूर्ण सक्षम हंव, जचकी काम करे बर पूर्ण
अउ मन बरगलांय कतको अस, पर उभरउनी ला झन मान.
दूसर पास अगर तंय जावत, मिलिहय उहां कष्ट नुकसान
सुजी दवई चाकू तक चलिहय. दुर्गति होही तोर शरीर.
मोर पास यदि जचकी निभिहय, तोर होय नइ कुछ नुकसान
बालक घलो सुरक्षित बचही, सच मिंझार आश्वासन देत.”
जैलू हर्षित उहां ले रेंगिस, ओहर पाय पूर्ण विश्वास
यदपि पांव ओहिले तन जावत, पर पाछू देखत हे लौट.
पंचम ओकर पाछू आवत, लुकत छुपत हे ओटघन देख
जैलू हा पकड़न झन पावय, इसने बचा चलत हे राह.
जैलू हा एक घर कर रुकगिस, जांचिस सब तन फेंक के नैन
तंह तत्काल घुसर गिस अंदर, ओकर दउहा दिख नइ पात.
पंचम उही मकान मं घुसरिस, करत हवय जैलू के खोज
आखिर दिखिस एक ठन कमरा, लुका के जांचत उहां के हाल-
जैलू पहिरे लुगा अउ पोलका, हाथ मं चूरी टिकली माथ
नकली स्तन बाल हा नकली, मांग भरे हे भर सिन्दूर.
ओकर गोदी मं दुलार ते रोवत ढारत आंसू ।
ओला भुरिया शांत कराये – जैलू गावत लोरी ।।
जैलू शिशु ला दूध पियावत, खुश होवत ओकर मुंह देख
हला खेलौना खेल खेलावत, दूसर तनी ध्यान नइ देत.
जैलू के हालत ला देखत, पंचम खुद ला रख चुपचाप
अचरज खुशी सोग डर होवत, याने हर बल ले असमर्थ.
यदि जैलू ला थोरको छेड़त, हो सकथय कुछ गलत अनर्थ-
जैलू अपघाती कर लेहय, या दुलार के जाहय जान.
पंचम उहां ले बाहिर निकलिस, पांव के आहट ला चुप राख
थोरिक दूर चलिस आगू तन, मोंगरा संग होगिस फट भेंट.
मोंगरा ओकर ऊपर बरसिस – “”तंय बोलत हस हरदम झूठ
जेन बुता हा कठिन असम्भव, ओकर बर मानी पी लेत.
मोर पुत्र हा कहां अभी तक, बिन दुलार मंय तलफत खूब
मोर पास ला गोदी पर रख, भूल के तंय झनकर गुमराह.
यदि तंय धोखा देवत छलकर, मंय जाहंव आरक्षी केन्द्र
तोर विरुद्ध रिपोर्ट लिखाहंव, तोला फंसा मनाहंव हर्ष.”
पंचम कथय – “”जाय कहुंचो तन, हर मनसे हा पूर्ण स्वतंत्र
तंय मोला फांसे बर सोचत, उहू काम ला करके देख.
पर एमां नुकसान तोर खुद, तोर दुलार लहुट नइ आय
अपन गोड़ मं घाव करे बर, अपन हाथ टंगिया झन मार.
दस बजे रात सात तारीख तक, परछो लेव धैर्य मन राख
अतका दिन मं तोर पुत्र हा, तोर गोद मं करही खेल.”
गुनिस मोंगरा – लकर धकर मं, काम बिगड़ के करथय नाश
अतका दिन दुलार बिन जीयत, थोरिक अउ धीरज रख लेंव.
कथय मोंगरा – “”मंय मानत हंव, जउन देत हस नेक सलाह
मगर मोर मन ला मड़ाय बर, प्रश्न के उत्तर कान मं डार-
मोर दुलार कोन स्थिति मं, ओहर अभी कते स्थान
अति रोथय या अड़बड़ किलकत, ओकर स्वास्थ्य गिरे या ठीक?”
पंचम कथय -“”विवश मनखे हा, जानत रथय गुप्त तक बात
पर कहुंचो खोलन नइ पावय, लुका रखत अपने तिर भेद.
यदि मंय तोला पता बतावत, पुत्र डहर जाबे तंय दौड़
उहिच तोर बर घालुक होहय, मोर उदिम तक हा बर्बाद.”
पंचम खुद बढ़ जाथय आगू, अगर रुकत तब बाढ़त फिक्र
प्रश्न चलाहय मोंगरा रहि रहि, फोकट बिसा लिही दुख कष्ट.
पंचम अपन जेब ला जांचत, रखे लुकाय एक ठक चीज
अपन जगह पर हवय सुरक्षित, तंह पंचम होवत आश्वस्त.
मंथिर के प्रयोग कमरा मं पंचम घुसिस धड़ाका ।
उहां उपस्थित मंथिर जेकर मुंह पर फिकर के रेखा ।।
पंचम पूछिस – “”तोर सोध हा, पूर्ण होय या बचे अपूर्ण
अमर प्रसाद के गुण पहिलिच अक, या होगिस सम्पूर्ण समर्थ ?”
मंथिर किहिस – “”बीच मं रुकगे, मंय जब फट पर गेंव बिमार
शोध काम पूरा नइ होइस, गुण ओतकिच अस प्रतिशत साठ.
मगर भरोसा निज बुद्धिच पर, निश्चय पूर्ण बचे जे शोध
अमर प्रसाद के यश सब गाहंय, मोर इहिच अंतिम उद्देश्य . ”
पंचम कथय -“”साठ प्रतिशत हे, अमर प्रसाद दवई के शक्ति
ओतकिच रहन दे ओकर सदगुण, अब झन बढ़ा फेर तंय शोध.”
मंथिर पेल मेड़ ला फोरिस -“”कार रखंव मंय शोध अपूर्ण
बचे काम ला पूरा करिहंव, मोर बुद्धि के जग भर सोर.”
पंचम जानिस – मुड़ ला पेलत, मंथिर धरे हे कड़कड़ जिद्द
ज्ञान बुद्धि के टेस बतावत, सत सलाह तक ला लतियात.
तेकर ले दूसर उपाय कर, मानवता के प्रान बचांवर्
़अमर प्रसाद भसम खुद होवय, खोज करंव मंय ठोंक उपाय.
नष्ट करे के काम मंय करिहंव, मंथिर के बन जाहंव शत्रु
ओहर औषधि फेर बनाहय, जतका अभि तेकर ले दून.
यदि मंथिर खुद के हाथे मं, अमर प्रसाद ला करिहय नष्ट
फिर बनाय के रुचि मिटजाहय, दवई ले घिरना करिहय सोच.
मंथिर हा थोरिक बेरा बर, कमरा तज के बाहिर अ‍ैस
पंचम बचिस एक झन तंहने, काम करत हे मन अनुसार.
रखे खिसा मं तीक्ष्ण जहर ला, सब तन टंहकत हेरिस शीघ्र
अमर प्रसाद रखे जेतिर मं, धुकुर पुकुर गिस ओकर पास.
अमर प्रसाद मं विष ला मेलिस, पूर्व जगह मं आगिस लौट
दैनिक पत्र पढ़त चिभ्भिक कर, शंका के बम झन पर जाय.
मंथिर पुन& लहुट आइस तंह पहिली चलिस ठिठोली।
पंचम अपन बात मं आवत हेरत मन के बोली।।
मंथिर होय प्रभावित मोहित, तइसन ढिलिस ठोस अस गोठ-
“”काम समय मं पूरा होवत, ओहर देवत लाभ इनाम.
लेकिन समय सरक जावत हे, कर्ता हा झेलत नुकसान
बद्दी अपजस मुड़ पर आथय, जमों परिश्रम तक बह जात.
दूध के दूसर नाम हे अमृत, पिये ले बाढ़त ताकत बुद्धि
मगर देर मं फटके बिगड़त, करत बिकार रोग ला लात.
अधिक समय तक मिठई ला राखत, जलिया जाथय करूसवाद
दवई समय ले अधिक रखावत, लाभ के बदला लेवत प्राण.
बांध हा पूर्ण समय निर्धारित, खेत सींच के फसल बढ़ात
पर निर्माण कार्य हा बिलमत, बांध फूट के करत तबाह.
याने मंय कहना चाहत हंव- अमर प्रसाद होय तैयार
बन के रुके रखे दिन्नी अस, कहां होय कई दिन उपयोग!
दवई प्रभाव लाभ गुन देवत, या बांटत अबगुन नुकसान
एकर गुन ला कोन हा जांचिस, ए संबंध मं सब अनजान.”
मंथिर सुनत उग्र हो जाथय -“”तंय हा हरदम के शंकालु
आस मनोवैज्ञानिक तंय हा, सोचत रहत उहिच अनुसार.
अमर प्रसाद मं शंका करथस, पर घटिया हे तोर विचार
मोर दवई के गुण पहिलिच अस, यने बताहय ठीक प्रभाव.
अगर भरोसा नइ मोरे पर, अपन दवई लावत तिर तोर
करत परीक्षण तोरे सम्मुख, ताकि भगय शंका के भूत.”
एक बिलई ला धर के लानिस, कहिथय -“”बिलई डहर तंय देख
एला अमर प्रसाद मंय देवत, पशु पर मंय छलकावत प्रेम.
जहां बिलई हा लिही दवई ला, ओकर तन मं नवस्फूर्ति
जेन दिखत मरियल कोढ़िया अस, नाच देखाहय उठा के गोड़”
मंथिर बिलई ला औषधि देइस, ध्यान लगा के लखत प्रभाव
रखे भरोसा निज बानी पर, जउन किहिस ते निश्चय ठोंक.
लेकिन बिलई लोझम पटिया गिस, छटका दीस दुनों ठक आंख
बपरी के जीवन हा चलदिस, म्यांऊ तक नइ ढिलिस अवाज.
प्रश्न के ज्वाप सही शत प्रतिशत, पर यदि असफल होवत छात्र
तब निराश होवत भावी बर, करत आत्महत्या खुद हाथ.
धान ला हरियर रखे कृषक हा खेत पलोवत पानी।
मगर धान गल के मर जावय कृषक के दरकत छाती।।
मंथिर करे परिश्रम मर मर, जेकर पर हे अति विश्वास
अमर प्रसाद देत धोखा छल, अमृत करिस जहर के काम.
मंथिर के नठ बुद्धि सन्न अस, मुंह मं रुकगे मन के बोल
अमर प्रसाद ला देखत खखुवा, बिलई ला देखत मर के सोग.
सांप ला कुचरत प्रान ला लेथय, पर शंका हा बच रहि जात
तंहा सांप ला आग मं भूंजत, ताकि प्राण खत्तम उड़ जाय.
मंथिर के भरभस टोरे बर, भावी शोध करे बर रद्द
पंचम कथय -“”बिलई मरगे तंह, काबर होत सुकुड़दुम सांय.
काल आय के टेम अनिश्चित, कतको छिन ले सकथय जान
मरगे बिलई मौत स्वाभाविक, अमर प्रसाद के नइये दोष.
अगर दवई पर शंका करथस, ओकर पुन& परीक्षा लेव
दवई प्रभाव गलत या हितकर, अभी मिलत वाजिब परिणाम.”
किंकत्र्तव्य परे मंथिर हा, फिर प्रयोग बर जिव घबरात
आधा बल अउ आधा डर कर, मानत हे पंचम के बात.
मंथिर एक कुकुर ला लानिस, रिंकू नाम जउन पर प्रेम
सहला के चूमा अस लेइस, नाच करैस कांध पर राख.
एकर बाद काम पर आथय, करत दवई के अब उपयोग
देवत दवई कुकुर रिंकू ला, यदपि कंपस हालत हे हाथ.
अमर प्रसाद कुकुर हा पाइस, तुरुत बता दिस दवई प्रभाव
बपुरा रिंकू ढलंग गे पुट ले, रक्षक हरलिस ओकर प्रान.
कूलर फेंकय गरम हवा यदि, तब निश्चित होहय आश्चर्य
फूल गुलाब बास यदि देवत, प्रकृति ले विश्वास समाप्त.
परसा रखे हे स्वादिल जेवन, पर मल असन करत दुर्गंध
भुखहा हा थारी ला धरिहय, ताकत लगा फेंकही दूर.
मंथिर अमर प्रसाद ला पकड़िस, क्षण भर देखिस टक ला बांध
भड़किस क्रोध बुद्धि पगलागे – अमर प्रसाद ला करदिस नष्ट.
कहिथय -“”मंय महिनत जोंगे हंव, तभे दवई होइस तैयार
मगर बोहागे जम्मों महिनत, दवई देखैस विरुद्ध प्रभाव.
दवई बनाय के विधि जे होथय. प्रतिलिपि बना रखे हंव गुप्त
ओला नष्ट करंव मंय हा खुद, शोध के नाम तको बुत जाय.
विधि के प्रतिलिपि ला यदि राखत, अन्य बनाहय अमर प्रसाद
उल्टा गुण फिर दवई बताहिच, जमों दोष के बद मुड़ मोर.”
मंथिर प्रतिलिपि रखे सुरक्षित, घृणा करत बाहिर मं लैस
कई कुटका खुद हाथ मं करदिस, आगी डार बनादिस राख.
दू झन व्यक्ति उहां हें हाजिर मगर बंद हे बोली।
एक दूसरा ला देखत भर वातावरण हे भारी।।
बहुत बेर कर पंचम बोलिस -“”यद्यपि सब महिनत बहगीस
लेकिन तंय हा उचित करे हस, मानव वंश बचा रख लेस.
भावी वंश तोर यश गाहय, उंकर करे वाजिब उपकार
बिन बाधा विकास सब करिहंय, प्रकृति नियम सदा अस ठीक.”
पंचम हा मंथिर ला समझा, करिस नियंत्रित विचलित बुद्धि
एकर बाद उहां ले हटगे, अपन कर्म पर फेंकत तर्क –
अमर प्रसाद नष्ट जे होइस, मोर बुद्धि हा रचे उपाय
मंय उपकार करे हंव जग के, या जग ला अमरिस नुकसान ?
पंचम प्रश्न के उत्तर ढूंढत, पर असफल जावत सब यत्न
अइसन बिकट परिस्थिति आवय, मानव करय एक ठन काम –
कठिन प्रश्न भावी बर राखय, तब तक बदलत समय विचार
भावी करथय उचित समीक्षा, देवत प्रश्न के सही जवाब.
तर्क भंजात चलत पंचम हा, मगर बीच मं परगे आड़
खलकट भाना दुनों अभरगें, उंकर साथ टक्कर अस होत.
आंख लाल कर खलकट भड़किस -“”बने देख के तंय चल राह
तोर आंख हा बटन या आंखी, झपा गेस यद्यपि दिनमान?”
पंचम हा दाबत घुड़की झड़ -“”तुम दू झन तब मारत रौब
मगर मोर उद जरा सकस नइ, जानत नइ का मंय अंव कोन ?”
भाना कथय -“”खूब जानत हंव, तंय प्रधान मंत्री नइ आस
अगर प्रतिष्ठित तब अपने बर, तोर असन देखे हन साठ.”
दर्शक के अब भीड़ हा बाढ़त, कोचक के झगरा ला उम्हियात
लेत मजा मुंह लुका के हांसत, ओ तिर रुके काम तक त्याग.
पंचम मुंह लड़ाय बर छोड़िस, उहां ले हटगे बन गंभीर
खलकट भाना दुनों पहुंचगें, जिनिस बिसाय उभे के पास.
खलकट दीस वस्तु के सूची, उभे करत हे ओकर जांच
कहिथय -“”पूर्व के ऋण हा बांचे, ऊपर ले अउ मंगत उधार.
अगर टांठ भाखा मंय बोलत, तंय हा भगबे दुसर दुकान
लेन देन बढ़िया नइ होवत, कब तक हमर ठीक संबंध?”
खलकट बोलिस- “”चिंता झन कर, वेतन झोंक पटाहंव कर्ज
मंय भाना के साथ कमावत, तोर लइक तहु मिलही नोट.”
खलकट ला समान लेना तब देवत असच भरोसा।
आखिर उभे बात ला पतिया दे दिस जिनिस उधारी।।
उभे जिनिस के कीमत जोड़िस, खलकट ला पढ़के समझैस
बढ़ती भाव ला सुन के खलकट, मुंह ला फारत आंख नटेर.
बोलिस -“”मंय उधार लेवत हंव, तब कीमत ला गजब बढ़ात
श्रमिक के तंय हा पियत पसीना, खुद बर बड़का भवन बनात.”
उभे किहिस -“”कम बुद्धि के तंय हा, तभे मोर पर डारत दोष
प्रतिशत तीस बढ़िस मंहगाई, शासन नीति के मारे आय.
जेन वेग मंहगाई उठगे, वेतन नइ बढ़ पैस समान
तभे उधारी बढ़त दिनों दिन, दिखत भविष्य कुलुप अंधियार.”
उभे किहिस सोला आना सच, मुड़पेलवा बन काटय कोन?
खलकट भाना उहां ले हटगें, जिनिस मिलिस तब खुशी मनात.
दूनों झन जंह मिल मं पहुंचिन, कलुवा झनक मिलिन हें हांस
बी. एस. पी. के श्रमिक ए कलुवा, तउन इहां पर अक्सर आत.
मंहगाई के बात हा निकलिस, तंहने झनक कहत कर रोष-
“”जिनिस के कीमित दिन दिन बाढ़त, वेतन बिलम रुके उहि ठौर.
हम दुकान मं कर्जा लेवत, लेकिन पटा सकन नइ पूर्ण
मर मर कमा देह ला टोरत, पर जीवन हा पात अभाव.
प्रतिशत तीस बढ़िस मंहगाई, वेतन बढ़य उही अनुसार
यदि मंगलिन नट के इन्कारय, होवय तोड़ फोड़ हड़ताल.”
कलुवा श्रमिक के जोश बढ़ावत, बरत आग मं डारत घीव-
“”मांग रखे बर तुम हव खुल्ला, तुम मंगलिन ला कर दव बाध्य.
मंय मजदूर तुम्हू मिहनतकश, हम तुम पाट के भाई आन
यदि करहू हड़ताल आंदोलन, तोलगी पकड़ दुहूं मंय साथ.”
श्रमिक सुनिन जोशीला भाषण, होवत उग्र उमड़गे जोश
आंय बांय चिल्लावत बोमिया, कल टोरे बर करत प्रयास.
मंगलिन के नक्सा ला मारत, कलमा पढ़त डार के दोष
जमों श्रमिक के पांव हा बाढ़त, बाहिर आवत मिल ला छोड़.
फाटक मं अंड़ खड़े हे बुल्खू, श्रमिक ला छेंकत छितरा हाथ
कहिथय -“”बरगलाय ला मानत, प्रथम सोच लव शांत दिमाग.
तोड़ फोड़ हड़ताल करे हव, तेकर भोग डरेव परिणाम
अब यदि रखना चहत मांग-हक, नवा उदिम लानव तुम खोज.”
कलुवा कहिथय-“”क्रांति करे बर, ताकत लगा करत संघर्ष
दुश्मन के रगड़ा टोरे बर, लोहा लेथंय धर हथियार.”
बुल्खू किहिस -“”क्रांतिकारी हस, चहत श्रमिक के तंय हित लाभ
लेकिन साथी जमों ठउर पर, एकेच नीति काम नइ आय.
सुन्तापुर मं पहुंचे हस तंय, उहां बताय जउन तंय नीति
नीति रिहिस उपयुक्त गंवइ बर, होहय सफल उहिच मं क्रांति.
लेकिन उहिच राह ला तंय फिर, इहां के मजदूर ला समझात
श्रमिक के भावी हा रट चौपट, तोर बनाय नीति नइ पास.
गांव के बड़हर धनसहाय हा मरत पधोरिस तोला ।
पर मंगलिन नइ मारय ओहर करिहय लड़ई दिमागी ।।
बी. एस. पी. मं तंय कमात हस, हम मानत हन तुम्हर सलाह
मगर हमर ला तुम दुतकारत, कहां करत तोड़ फोड़ हड़ताल!”
कलुवा कथय- “”तुम्हर हित चाहत, तब देवत हंव नेक सलाह
मोर बात ला फूंक उड़ावत, अउ बोले बर मंय असमर्थ.
मंय हा अभिच भिलाई जावत, उहां ले कारखाना तक दौड़
ठीक समय पर काम ला धरिहंव, तभे जीविका पर नइ आंच.”
कलुवा ओतिर ले हट चलदिस, तंहने खलकट हेरिस बोल –
“”कलुवा पहिली जोश देखाइस, क्रांति करे बर दीस सलाह.
लेकिन ऐन वक्त पर खसकिस, आधा बीच छोड़दिस साथ
यदि अइसन के बुध ला मानत, डोंगा कभू लगय नइ पार”
जम्मों श्रमिक संगठित होवत, आगू बढ़े के खोजत राह
बुल्खू बोलिस -“”टोरइ फोरइ तज, चलव चलन मंगलिन के पास.
अपन मांग ला पूर्ण होय कहि, हम्मन करबो अब संघर्ष
पर संघर्ष के अर्थ ला समझन-हिंसा बकई लूट नइ होय.
बातचीत प्रार्थना अहिंसा, मीठ वाक्य घुड़की भय प्रेम
यदि इंकरे ले लक्ष्य हा पूरा, तब संघर्ष सफल हे जान.”
तभे उदुप मंगलिन हा धमकिस, बोलिस टांठ चढ़ा के भौंह-
“”मोर विरुद्ध बोल हेरत हव, लड़ई उठावत करके जोम.
मिल ला कंस घाटा होवय कहि, तोड़ फोड़ बर बांधत फेट
सोचत मोर सिरी गिर जाए, तुमला मिलिहय काय इनाम !”
बुल्खू देखिस झनक डहर तंह, राखिस जनक जउन हे मांग –
“”तंय हा कहां हानि झेले हस, उल्टा हम पावत तकलीफ.
प्रतिशत तीस बढ़िस मंहगाई, पर वेतन हा पूर्व समान
रुपिया कहां पुरत महिना भर, आखिर मरे परत हे भूख.
जतका बढ़े जिनिस के कीमत, वेतन बढ़य उहिच अनुसार
हमला मिलय पेट भर जेवन, काम करे बर हम तैयार.”
मंगलिन कथय -“”शत्रुता ला तज, तुम्हर समस्या ला सुन लेंव
पर मंय विवश सबो तन ले हंव, मांग सुने बर मुश्किल होत,
देश मं कई ठक कपड़ा के मिल, उंकर वस्त्र स्तर हा ऊंच
स्तर बर मंय लोहा लेवत, एमां खर्च खूब जम होत.
ओमन माल के झप बिक्री बर, कम कर देत जिनिस के दाम
माल जमा झन होवय कहि मंय, कीमत कम कर घाटा खात.
शासन नीति गलत रेंगत हे- छापा परत मिल मं कई बार
आर्थिक स्थित तरी गिरत हे, कहां पुरो सकिहंव मंय मांग?”
मंगलिन जमों मांग ला ठुकरा हटगे तुरतेताही ।
अब मजदूर सफलता पाये खोजत नवा तरीका ।।
भाना बोलिस -“”मंगलिन हा अभि, बिसा सकत मिल नवा तड़ाक
नवा भवन तक बनवा सकथय, जे चाहत कर लेहय प्राप्त.
पर हम मांगत अन्न पेट भर, वाजिब हक ला मारत लात
हमर भविष्य नष्ट झन होवय, शांत बुद्धि ले हेरव राह.”
जउन श्रमिक हड़ताल करे बर, बाहिर निकल भगंय मिल छोड़
ओमन चिभिक उपस्थित मिल मं, यथा लटकना चिपकत वस्त्र.
घण्टा आठ काम ला करथंय, आलारसी टेम भर काट
दस घण्टा अब काम बजावत, रहि के चुस्त देह रख टंच.
बुल्खू हा मंगलिन तिर बोलिस -“”पूर्व ले उत्पादन बढ़ गीस
एकर ले अब लाभ अधिक हे, श्रमिक के वेतन तक बढ़ जाय.”
मंगलिन हा नाही करदिस फट- “”तुमन करत हव अनुचित मांग
तुम अव श्रमिक तभे श्रम जोंगत, कहां करत अचरज के काम!”
बुल्खू किहिस -“”एल झन हमला, यदि नइ सुनस हमर तंय मांग
हम कानून के शरण जावत, जतिक दोष परही मुड़ तोर.
कहिबो-हमला मंगलिन जबरन, मिल मं छेंक रखे हे धांध
समय ले अति बूता ला लेवत, हमर शक्ति के शोषण होत,”
“”घुड़की मार दबावत हस तंय, पर मंय थोरको नइ डर्रांव
तंय कानून शरण मं अभि जा, निपटे बर ताकत तिर मोर.”
श्रमिक के मांग पूर्ण नइ होइस, ओमन धरत कठिन अस राह
भूख मरत पर भोजन छोड़िन, मरत पियास पियत नइ नीर.
जेन टिफिन मं जेवन लाथंय, ओहर रखे पूर्व अस हाल
छागल के जल रखे उहिच मं, होवत नइ ओकर उपयोग.
श्रमिक करत श्रम ला ताकत भर, थक के दंदरे पश्त शरीर
चलत पसीना हा चुहरी बन, मुंह के रंग हा करिया लौह.
गीस झनक हा मंगलिन तिर मं, मुंह कर बंद खड़े चुपचाप
मंगलिन किहिस -“”आय तंय काबर, काय विचार साफ मन खोल.
यदि गुस्सा के धमकी देबे, ओकर आगू झुक नइ पांव
अगर प्रार्थना करबे झुक के, मंय ठुकरा देहंव झड़ लात.”
झनक के आदत उग्र लड़का, तोड़ फोड़ बर हरदम ठाड़
तेकर रुप बदल के दूसर, तेवर शांत बात गंभीर.
झनक किहिस -“”नइ करंव प्रार्थना, का करिहंव मंय धमकी मार
मिल मं काय घटत अभि घटना, राखत गुप्त उहू सब भेद.
तोला गरज बात जाने बर, तंय मिल पहुंच अभिच तत्काल
उहां के स्थिति तुम खुद देखव, अउ भविष्य बर निर्णय लेव.”
झनक उपरहा बात ला छेंकिस, फट ले पलट लहुट गिस जल्द
जमों रहस्य लुका के रख लिस, तब मंगलिन ला धुक धुक होत.
मन मं शंका घिरत बहुत ठक, मन मं करत स्वयं समाधान
लेकिन घुप अंधियार जिंहा हे, कहां निशान परत हे बाण !
मंगलिन हा सवाद नइ जानत यदपि खतम सब खाना।
फिकर मिटे बर सोय धरत पर टकटक देखत आंखी।।
जब बेचैन हो जाथय नंगत, मिल तन चलिस कार मं बैठ
अगर हवाई जहाज मिलतिस, तुरुत जाय करतिस उपयोग.
मिल मं पहुंच परिस्थिति जांचत, ओला होवत अचरज दंग
एकर पूर्व काम जे होवय, ओकर ले उल्टा हर दृष्य.
मंगलिन सब मजदूर ला बोलिस -“”पेट भरे बर जेवन लेव
थके हवव तब काम करव झन, लरघावत तब लेवव नींद.”
लेकिन श्रमिक कान नइ देवत, अपन काम ला बिधुन कमात
जेवन डहर झांक नइ देखत, जल ला ओंठ ले राखत दूर.
मिल मं एक निजी कमरा हे, मंगलिन उंहे बइठगिस एक
आय समस्या के हल खोजत, करत समीक्षा उत्तर बाद.
सोचत -“”अगर मांग ठुकरावत, श्रमिक भूख मर करिहंय काम
इनकर मृत्यु दिखत हे निश्चित, मिल मं लगिहय शव के ढेर.
हत्या के प्रकरण बन जाहय, निश्चय सिद्ध जमों अपराध
कारागृह मं दण्ड भोगिहंव, मिल जब बंद कहां ले लाभ!
अगर श्रमिक के व्यथा सुनत हंव – करिहंय काम राख ईमान
लाभ अमर मंय उन्नति करिहंव, कमी होय नइ इज्जत मान”
मंगलिन तुरुत घोषणा कर दिस -“”करिहंव पूर्ण श्रमिक के मांग
जउन बात हे खोल के बोलव, मंय हा सुनिहंव हृदय ला खोल.”
मंगलिन श्रमिक एक संग बइठिन, एक जगह पर सुम्मत बांध
हेरत राह भविष्य खुशी बर, फेर होय झन झंझटरार.
बुल्खू कथय-“”समिति बन जावय, मालिक श्रमिक के प्रतिनिधि होय
जे उत्पादन मूल्य बढ़ब पर, नजर ला राखय चील समान.
जे प्रतिशत बाढ़य मंहगाई, वेतन वृद्धि होय उहि मान
मिल ला लाभ होय जतका अस, मिलय श्रमिक ला ओकर भाग.
यदि मिल हा कभु घाटा खावय, श्रमिक के वेतन तक कट जाय
यने श्रमिक मालिक के अंतर, बिगर युद्ध हो जाय समाप्त.”
जे उपाय बुल्खू हा फोरिस, सब ला जंचिस करिन स्वीकार
अगर अस्त्र बिन शांति मिलत हे, कोन व्यर्थ धुंकिहय बन्दूक !
जमों श्रमिक मन हर्ष मनावत, ओमन पहिरिन विजय के हार
मंगलिन मन ले खुशी मनावत- ओकर आज होय नइ हार.
मीठ होय संबंध सोच के मंगलिन लैस मिठाई।
बांट श्रमिक ला खुद तक खावत एमां दिखत भलाई ।।
झनक प्रसन्न निकलथय मिल ले, बचे मिठई ला धर के हाथ
थोरिक बाद झिंगुट संग मिलथय, मिठई ला राखिस ओकर हाथ.
झनक किहिस -“”तंय मोला जानत, तन मं जोश नीति हा उग्र
लेकिन सुलह शांति के संगत, कठिन परीक्षा पास हो गेंव.
यने पूर्व के आदत ला तज, विजय पाय हंव धर नव राह
मोर खुशी मं हाथ बंटा तंय, झड़क मिठई ला मुंह कर मीठ.”
झिंगुट मिठई ला खिसा मं राखिस, हेरिस बाद अपन सब फिक्र-
“”तंय उद्देश्य सफल होए हस, हृदय ले मंय हा होवत हर्ष.
लेकिन मंय मांईअसाद अंव, करत अपन पर नइ विश्वास
तउन अपन जीवन बदले हंव, कर्मनिष्ठ बन जीयत आज.
आज परीक्षा मं बइठत हंव, धुक धुक होवत हे जिव मोर
प्रश्न के उत्तर ला नइ पावत- मंय उत्तीर्ण या असफल आज.
याने अपन नीति बदले हस, विजय अमर के पावत मान
अपन नीति ला मंय बदले हंव, सफल के असफल कोन बताय?”
झनक कोचक के भेद ला पूछिस, लेकिन झिंगुट लुका रख लीस
जिंहा चित्र स्पर्धा होवत, पहुंचिस झिंगुट उही स्थान.
इमला अउ कई चित्रकार के, उत्तम चित्र टंगे दीवार
झिंगुट अपन उत्कृष्ट चित्र ला, स्पर्धा मं कर दिस ठाड़.
अगराहिज तक चित्रकार ए, झिंगुट के श्रम ला मारत टोंक-
“”जे पतरी मं भात ला खावत, करत उहिच पतरी मं छेद.
इमला तोला ज्ञान कला दिस, मदद दीस तंय अमरा ख्याति
तंय ओकर उपकार मान अउ, पाछू चल पाटे बर कर्ज.
पर इमला के नाक काटे बर, खुद के पत ला ऊंच उठाय
तंय इमला संग टक्कर लेवत, कोन तोर ले हे बइमान !”
अगराहिज ला झिंगुट हा बोलिस-“”इमला मोर मं कुछ नइ भेद
हमर बीच शत्रुता करे बर, काबर भिड़े हवस प्रण ठान !
कला क्षेत्र हा कर्म ला मांगत, कर्मनिष्ठ हा पाय इनाम
जेन आलसी करतब तजथय, ओला ठेंगवा भर मिल पात.”
इमला, झिंगुट ला टोंकिस -“”तंय कहिथस जस झड़त तमाचा।
मंय समझावत साफ चित्र अस ढिल मंदरस अस भाषा ।।
एक चित्र मं कई रंग रहिथय, सबके अलग महत्व प्रभाव
उंकर बीच मं टक्कर चलथय, मगर मित्र अस रहिथय एक.
चित्र कि पेड़ के पान हा हरियर, हरियर रंग अगर उड़ जात
एक रंग के कमी के कारन, बचत रंग के उड़थय रंग.
याने चित्रकार हन कई झन, अलग अलग हे सबके चित्र
लेकिन सबके हवय जरुरत, सबके एक महत्व प्रभाव.”
कला समीक्षक सूक्ष्म दृष्टि कर, जमों चित्र पर फेंकत दृष्टि
त्रुटि या कमी निकल नइ पावत, उच्च किस्म के उंकर श्रृंगार.
कठिन बाद परिणाम मं पहुंचिन, बन निष्पक्ष घोषणा देत-
“”इमला प्रथम पारितोषक लिस, पैस झिंगुट हा दुसर इनाम.
अगराहिज हा घलो पुरस्कृत, पैस सांत्वना के सम्मान
उहां होय नइ पक्ष धांधली, फल ला पैन बुद्धि अनुसार.
अगराहिज हा झिंगुट ला बोलिस -“”अगर बढ़ाते उदिम दिमाग
प्रथम इनाम तोर हक आतिस, तोर कला सब झन ले श्रेष्ठ.”
बोलिस झिंगुट -“”सदा मंय हारत, पर बाजी जीते हंव आज
हे संतोष अपन महिनत पर, अब कुछ पाय बचे नइ आस.
पर भविष्य मं प्रथम बने बर, करिहंव यत्न राख ईमान
अपन शक्ति पर रखत भरोसा- अमर लुहूं मंय श्रेष्ठइनाम.”
झिंगुट प्रसन्न उहां ले चलथय, ओकर हाथ प्रशंसा पत्र
धरे नोट के चेक हाथ मं, मन डोंहड़ू छितरा गिस फूल.
जावत कहां याद नइ ओला, तभे उहिच कौंवा फिर अ‍ैस
झिंगुट के चेक ला झटक उड़ा गिस, दुरिहा मं रहि टुहू देखात.
कौंवा किहिस -“”निराश के बेरा, मंय हा तोला साहस देव
प्रश्न सिन्धु मं प्रान हा बूड़त, उत्तर बता करे हंव पार.
मगर सफलता तंय पाये तंह, मोला निहू समझ बिसरेस
तब बदला के आगी मं बर, तोर चेक ला मंय झटकेंव.”
झिगुट कथय -“”मंय कृतघ्न नोहंव, तोर कर्ज हा मुड़ भर मोर
मंय बियाज मं मिठई ला देवत, करत मूलधन मं गुनगान.”
झिंगुट खिसा के मिठई ला हेरिस, कौंवा ला दिस ऊपर फेंक
कौंवा मिठई अमर खुश होवत, वापिस करिस झिंगुट के चेक.
कौंवा आधा मिठई ला झड़किस, बचत चोंच धर उड़त अकास
उही मिठई पंचम पर गिरगे, जेन राह रेंगत धुन बांध.
पंचम के मन पुलकित होथय- मिठई मिलिस तब दिखत सुगून
मोर योजना सफल हो जाहय, मिठई असन फल तक हा मीठ.
पर कौंवा के याद ला करथय, सोचत एहर अशुभ प्रधान
काटिस आड़ बीच रद्दा मं, आहय बिघन काम के बीच.
लेकिन अर्थहीन एमन सब, ए सिद्धान्त जियत बिन मूल
गदहा जउन डहर ढलगत हे, बात चलत स्थिति अनुसार.
मंय हा अगर सफलता पाहंव, करिहंव मिठई के गुन ला याद
लेकिन अपन ध्येय मं असफल, कौंवा पर जाहय सब दोषय.’
अपन निवास निंगिस पंचम तब मोंगरा पूर्व पधारे ।
आखिर रात दस बजे आइस जेकर होत प्रतीक्षा ।।
एतन ओतन जकजिक देखत, जैलू घर के अंदर अ‍ैस
लाने हे दुलार ला संग मं, ओकर पर बरसावत प्रेम.
पंचम हा दुलार ला झटकिस, दीस मोंगरा के अधिकार
कथय मोंगरा ला घुड़की कर -“”तंय रहि चुप अउ पा संतोष.
अपन पुत्र बर रोवत हर छन, तेहर मिलगे आप सरुप
जैलू के अहसान मान मंय, जेहर रखिस सुरक्षित पूर्ण.
तोर साथ मं घटिस जे घटना, भूल सदा बर ओकर याद
यदि बिखेद ला कहुंचो फोरत, बिपत निमंत्रित अपने हाथ.
मोर इहां ले निकल भगा तंय, कहां बलाय हाथ ला जोड़ !
तंय दुलार ला घलो साथ धर, मोर पास ले मुंह ला टार.”
पंचम हा मोंगरा ला खेदत, एकर कारन दगदग साफ-
यदि बिलमत तब झगरा बढ़िहय, जैलू हा कर सकिहय क्रोध.
जैलू हा दुलार ला पोंसे, ओकर बाढ़ सकत हे प्यार
बालक पुन& पाय लालच मं, कर तो सकत मार अपराध.
चलिस मोंगरा दुलार संग मं, होगिस तुरुत आंख ले दूर
गप्पी कवि फट ले लिख देतिस – उहां ले उड़ होगे अदृष्य.
जैलू हा बालक बिन तलफत, हे आवश्यक याद हट जाय
ओकर बुद्धि राह धर ले कहि, पंचम हा भिड़ करत प्रयास.
जैलू ला बइठार पलंग पर, पंचम हेरत टांठ जबान-
“”मोला मुरुख जान के तंय हा, कहि असत्य तंय धोखा देस.
कभू परुष हा अमल मं रहिथय, जउन करे हस गलत प्रचार!
पर के शिशु ला चोरा रखे हस, यने करे हस तंय अपराध.
मंय आरक्षी केन्द्र मं जावत, एकर इतला देवत दौड़
तंय पर ला तड़फाये जतका, ओकर बल्दा मिलिहय दण्ड.”
पंचम धमकी दिस तंह जैलू कांपत हे जस पाना ।
जैलू सार आय कहि पंचम हेरत मिट्ठी बोली ।।
“”लेकिन तंय हा फिकर मं मत मर, तंय गोहराय मुंहिच ला पूर्व
यदि दुख आंच तोर पर आहय, मंय हा करिहंव दुख ला दूर.
शिशु ला मोंगरा ला संउपे हस, तोर हाथ ले उत्तम काम
तोर पास यदि बालक रहितिस, ओकर फिकर मं नींद हराम.”
जैलू के तनाव हा घटगे, बुद्धि शरीर लगत हे ढील
मर आलस्य पलंग पर ढलगत, पुट ले अ‍ैस आंख भर नींद.
मृतक शरीर रहत लकड़ी अस, जग ले छूट जात संबंध
जैलू घलो सुतत बेसुध बन, जग मं रहिके जग ले दूर.
दूसर दिवस बेर सुत उठथय, ठीक टेम पर धरलिस काम
ओकर बाद उठिस जैलू हा, तंहने फेर नींद अउ लेत.
एकर बाद नींद हा उमचिस, फुरसुद सुघर लगत हे देह
मुड़ के बड़े बोझ जब उतरत, मानव ला हल्का लग जात.
जैलू हा पंचम ला पूछिस -“”मोर पास मं रिहिस दुलार
कभू निफिक्र खाय नइ जेवन, नींद भगय आंखी ले दूर.
मंय जानत हंव उचित या अनुचित, जान करे हंव सब अपराध
बालक प्रति काबर आकर्षित, एकर उत्तर मिल नइ पात?”
पंचम किहिस- “”दुलार रिहिस हे, तोर पास मं अमरा स्नेह
ओकर चिंता रखस रात दिन, तब फिर कहां ले आवय नींद !
जउन जिनिस के कमती होथय, मानव चहत उही ला पाय
तंय बालक पर होय आकर्षित, प्रकृति के अनुपम उपहार.
कभू कभू मानव कर डरथय, काम बिचित्र हंसय सब लोग
ओकर सच विश्लेषण मुश्किल, होथय ठीक बात हो बंद.”
जैलू हा पंचम ला छोड़िस, बाहिर आके चलत अजाद
ओकर बुद्धि स्वस्थ पहिलिच अस, जांचत हवय शहर के हाल-
नांदगांव हा दिन दिन बाढ़त, कोचकिच भीड़ हवय हर ठौर
इहां बसे बर जगह के कमती, पर ग्रामीण आत तज गांव.
कोन करय मानव के गिनती, आत कहां ले कतिंहा जात !
सरमेट्टा संट घंसर के रंगत, कोलकी गली सन्द नइ पात.
कलबिल चिहुर चलत चंवतरफा, झगरा मारपीट कुछ ओर
हद ले बाहिर बढ़त प्रदूषण, कहत गंदगी शासन मोर.
बस फटफटी कार स्कूटर ट्रैक्टर टेम्पो टैक्सी ।
इंकर तरी यदि मनसे आवत प्रान जात बरपेली ।।
ज्ञानिक आंख मं पट्टी बांधिस, करिया हे पट्टी के रंग
बटबट आंख खोल के देखत, पर कुछ जिनिस दिखन नइ पात.
ज्ञानिक हा फटफटी पर बइठिस, ओला करिस तुरुत स्टार्ट
गाड़ी धड़धड़ आगू सरकत, अपन राह पर जावत सोज.
मनसे मन अचरज भर देखत, एकर साथ करत तारीफ
कतको तर्क चलत एकर बर, जतका मुंह ओतका अस बात.
एक कथय -“”दगाबाज हे ज्ञानिक, ओला दिखत राह झक साफ
तब गाड़ी ला बने चलावत, हर दुर्घटना ले बच जात.”
दुसर कथय -“”ज्ञानिक हा तांत्रिक, तंत्र मंत्र के रखथय ज्ञान
तब बिन देखे गाड़ी लेगत, वरना स्वयं गंवातिस जान.”
ज्ञानिक जिला कार्यालय ले चल, पहुंचिस रायपुर नाका ठौर
गंजमिंज भीड़ बीच रस्ता भर, पर ककरो संग नइ मुठभेड़.
ज्ञानिक पूर्ण सफलता पाइस, तभे एक झन दीस सलाह-
“”तंय साहस के काम करे हस, लिखा गिनिज बुक मं झप नाम.”
ज्ञानिक बोलिस -“”करत नौकरी, वेतन झोंकत हंव हर माह
जिनिस बिसा सक भर जेवत हंव, यने अभाव मोर ले दूर.
जउन योग्यता गुण मोरे तिर, करत प्रदर्शन सबके पास
नाम कमाय जरुरत नइये, दउड़ करंव नइ पाय इनाम.”
उही जगह मं पिनकू ठाढ़े, तेन लेत ज्ञानिक के पक्ष-
“”चलत गिनिज बुक हा एकतरफा, सबो डहर फेरत नइ आंख.
चरत कृषक के गोड़ ला केंदुवा, तब ले ओहर नींदत खेत
माह जेठ मं घाम लकालक, करत परेवा डोंगरी पार.
यदि बइला पुट ले मर जावत, कृषक करत बदला मं काम
पयडगरी मं वाहन लेगत, तब ले नाम दर्ज नइ होय.
यने जउन सार्थक आवश्यक, ओतन गिनिज बुक के नइ आंख
रखत गिनिज बुक पर के विवरण, पर नइ कहय अपन उद्देश्य.”
ज्ञानिक हाथ मिला के चलदिस, पिनकू धरत स्वयं के काम
ओहर मेटाडोर मं बइठिस, भरर भरर करथय स्टार्ट.
पिनकू भीड़ बीच मं जावत, मुश्किल मं लेगत हे काट
दुर्घटना झन घट जावय कहि, आगू जावत लगा उवाट.
आखिर मं पचकौड़ पास गिस, हिले लगा दिस ओकर चीज
पर व्यापारी बहुत काइंया, पिनकू ला कम रुपिया देत.
देश बिगाड़क व्यापारी हा, बाहिर रखत नून गुड़ तेल
पर अंदर गोदाम मं रखथय, नशा करे के जिनिस सकेल.
पिनकू ठीक भाव नइ पाइस, तब फिर काबर झोंकय नोट!
समझाइस पचकौड़ ला अड़बड़, लेकिन नइ मानिस पचकौड़.
दूनों बीच के झगरा बढ़गे, पर मन मजा लेत हें हांस
अब पचकौड़ दोष ला डारत -“”पिनकू करत हवय फरफंद.
आधच जिनिस मोर तिर लानिस, आधा अपन पास रखलीस
थाना मं रिपोर्ट मंय करिहंव, सच उछराहय थानेदार.”
पिनकू हा काबर घबराये- “”तंय हा जिहां चहत चल लेग
मोर कुजानिक एकोकन नइ, थाना जाहंव बिन मिनमेख.
दूनों झन थाना मं पहुंचिन, पर पिनकू हा रहिगे दंग-
उंहचे मींधू हा मिल जाथय, जेहर ए नव थानेदार.
मींधू ला पचकौड़ हा बोलिस -“”साहब, सुन लव मोर गोहार
पिनकू आधा चीज चोरा लिस, अउ उपरहा करत तकरार.
मेटाडोर हवय एकर तिर, ओला कहां ले धर के लैस
खुद बिसाय या चोरा के लाने, सत्य बात के पता लगाव!
मेटाडोर चलावत भर भर, लेकिन नइ ड्राइविंग लाइसेंस
शासन ला धोखा देवत हे, कभू सड़क कल ला नइ देत.”
कई आरोप मढ़िस व्यापारी, तब पिनकू हा करिस उपाय
कागजात ला हेर के रखदिस, ताकि दोष के मिटय प्रमाण.
कहिथय -“”शासन तिर मांगे हंव, मेटाडोर लुहूं कहि कर्ज
उही चलाके जिनगी पालत, जूरुम काम ले रहथंव दूर.
ककरो साथ कार मंय उलझंव, बस पचकौड़ करय ए काम-
महिनत के रुपिया ला देवय, रखय मितानी अस संबंध.”
थाना मं जे वादी आथय, ओहर बोलत ढाढ़ा कूट
प्रतिवादी के विरुद्ध मढ़थय, एक सेक बढ़ झूठारोप.
मींधू जमों भेद ला जानिस, तंह पचकौड़ ला बोलिस डांट-
“”तंय असत्य प्राथमिकी लिखावत, जेहर घलो आय अपराध.
तोर बात ला जान डरे हंव – तंय हस गरकट्टा इन्सान
पिनकू के रुपिया ला झप गिन, ओकर अपन साथ कर न्याय.
तंय हा करथस स्वयं कुजानिक, उल्टा लिखवा देत रिपोर्ट
मोर बात ला सुन अक्षरश&, वरना तंय खाबे नुकसान.”
मींधू ठौंका राह बता दिस, तंह पचकौड़ छोड़दिस टेक
रुपिया ला तुरते गिन देथय, पिनकू हा करलिस स्वीकार.
तीर असन पचकौड़ भगागे, उंहे रुके हे पिनकू।
मींधू साथ पूर्व के परिचित काबर होवय टरकू।।
मींधू हा पिनकू ल कहिथय- “”मंय हा जेन नौकरी पाय
घूंस पटाए हंव एकर बर, तोर पास खोलत सच भेद-
किरपा करे मोर ऊपर तंय, तभे बने हंव थानेदार
मंय चिंता मं घुरत हमेशा- तोर कर्ज ले कब आजाद!”
पिनकू कथय- “”छोड़ चिंता ला, बइसाखू के बात रख याद
ओकर कहना ला यदि मानत, उतर जहय कर्जा के बोझ.
याने जे वास्तव मं मुजरिम, ओला निश्चय दण्ड देवाव
जे निर्दाेष हीन अउ निर्बल, ओकर पक्ष लेव दुख झेल.”
मींधू अपन हृदय मं घोखिस -“”बोलत तेन आय बस वाक्य
लेकिन कर्म क्षेत्र हा दूसर, दुर्गम हे सैद्धान्तिक राह.
कोन आय वाजिब अपराधी, कोन हा एकर खोलय भेद
यदि खुल जात तभो हे मुश्किल, कड़ा दण्ड ओला दे कोन ?”
मींधू हा पिनकू ला बोलिस -“”तंय सुझात ते उत्तम राह
जेमां समाज के हित दिखिहय, हठ करके करहूं ओ काम.”
मींधू दूसर बात निकालिस -“”तंय हा शासकीय पद खोज
ओमां जीवन हा तर जाहय, मरते दम तक मिलिहय नोट.”
पिनकू कथय -“”पाय हस तंय पद, बोलत हस विभाग अनुसार
पूंजीवाद हा जलगस जीवित, खतम होय नइ दुख के भार.
नवजवान मन भिखमंगा बन, रोजगार कार्यालय जात
पर ओमन नइ पात जीविका, सत मं सती जीविका पात.
पूंजीवाद मं अबगुन होथय, सब नइ पांय अपन अधिकार
कुछ के आवश्यकता छकबक, बचत मांग हा खुंटीउजार.”
पिनकू हा थाना ला छोड़िस, काबर करय समय ला ख्वार
ओतन बइसाखू पर आगे, बिना बलाय बड़े तकलीफ.
ओकर पुत्र नाम हे छबलू, तेकर होय अपहरण आज
बइसाखू के बुद्धि नठे अस- कते डहर ले गिरगे गाज!
पिनकू उहें पहुंच के बोलिस -“”हल्लू नाम आतंकी एक
ओहर कई निरीह ला मारिस, करिस जघन्य अपराध अनेक.
आखिर एक दिवस पकड़ागे, तंहने ओहर ओइलिस जेल
लेकिन ओकर मित्र समारु, शासन संग मं खेलिस खेल.
मुख्यमंत्री के पुत्र बीरबल, ओला जानत तुमन घलोक
ओला उठा समारूलेगे, यने अपहरण कर दिस जोख.
रखिस समारूशर्त कड़ाकड़ – यदि बीरबल ला करथव प्यार
हल्लू ला आजाद करव झप, मोर बात कल लव स्वीकार.
अगर मोर कहना नइ मानत, तब बीरबल के लेहंव प्राण
मोर शर्त के उत्तर झप दव, बीरबल के जीवन ला देख.”
खभर मुख्यमंत्री हा पाइस, हल्लू ला फट छोड़वा दीस
पुत्र बीरबल वापिस होथय, मुख्यमंत्री हर्षित हो गीस.”
एकर बाद किहिस अउ पिनकू -“”पाइस मुक्ति बीरबल जेन
ओहर वाकई उचित लगत हे, झन अपहरित होय निर्दाेष.
आतंकी ला शासन छोड़िस, एकर ले अड़बड़ नुकसान-
अउ आतंक क्रूरता बढ़ही, मारे जहय जे गउ इन्सान.”
पिनकू पूछिस व्याख्याता ला -“”ए बारे मं तंय कुछ बोल
अगर तोर पर अइसन घटना, तब तंय करबे काय प्रबंध?”
बइसाखू मुड़ धर के बोलिस -“”करंव कहां ले पर के न्याय
मोर पुत्र खुद अपहृत होगे, बिना बलाय आय हे कष्ट.
करत भयादोहन चइती हा, मोर पास भेजे हे पत्र –
छबलू ला हम रखे सुरक्षित, ओला झन ढूंढव अन्यत्र.
रेल के दुर्घटना जब होइस, करिन हठील अंजोरी लूट
ओमन ला कानून फंसावत, प्राण बचाय भगत कई खूंट.
जे गल्ती हठील मन जोंगिन, ओला अपन मुड़ी पर लेव
स्वीकृत पत्र देव दसकत कर, बदला मं छबलू ला लेव.
गांव मोहारा ले कुछ दुरिहा, बोहत हवय नदी शिवनाथ
उही किनारा आम बगीचा, उंहचे तुम हा दउड़त आव.
उही जगह मं मिलव मोर संग, स्वीकृति पत्र हाथ रख देव
यदि रहस्य जाहय दूसर तिर, छबलू ला जीयत नइ पाव.”
पिनकू ला बइसाखू कहिथय -“”छबलू ला झन खावय काल
सांप मरय लउठी झन टूटय, राह सुरक्षित तिंहिच निकाल.”
पिनकू किहिस -“”अभी मंय जावत, मींधू तिर मं देत अवाज
या मंय स्वयं तोर संग जाहंव, जइसन कहव करंव मंय काम.”
“”भइगे तुम जम्मों झन ठहरव, मंय नइ लेंव कष्ट ला मोल
अपन कष्ट मंय स्वयं भोगिहंव, देखंव भला अपन ला तौल.”
चइती हा बताय हे जे ठंव पहुंच गीस बइसाखू ।
आमा के खाल्हे ठाढ़े हे दुख मं रोवत आत्मा ।।
चइती ओकर तिर मं पहुंचिस, स्वीकृति पत्र मंगिस तत्काल
पर बइसाखू हा इनकारत, पास आत नइ ओकर लाल.
“”तोर सुभाव नेक मंय जानत, लेकिन करत क्रूर अस काम
छबलू हा धंधाय हे कतिहां, ओला तुरुत मोर तिर लान.”
बइसाखू के बात ला सुनके, चइती किहिस चाब के ओंठ-
“”मोर साथ ओरझटी करव झन, वरना मिलिहिय दुष्परिणाम.
अस्त्र पकड़ किंजरत सण्डा मन, देख लेव तुम छटका आंख
यदि आदेश उदेली होवत, जीवन तोर भसम जस राख.
स्वीकृति पत्र मोर हक रखके, वापिस जाव अपन अस्थान
छबलू हा तुमला मिल जाहय, मंय बोलत हंव सत्य जबान.”
स्वीकृति पत्र फेंक बइसाखू, वापिस चलत स्वयं के राह
ठंउका मं छबलू मिल जाथय, जेकर देह भरे दुख दाह.
अपन पुत्र ला पिता उबारिस, बइसाखू हा देवत स्नेह
अपन निवास लहुटगे हर्षित, पाय करुणरस खुद के गेह.
सुख अउ दुख जीवन के चक्का, विचलित होना मुरुख के काम
मींधू थानेदार हा आथय, अपन गुरु बइसाखू पास.
मींधू किंहिस देखा के बेली -“”तंय हा करे हवस अपराध
रेल के दुर्घटना जब होइस, तब तंय करे भयंकर लूट.
सब आरोप तोर मुड़ आवत, तंय खुद करे हवस स्वीकार
गिरफ्तार कर अभिच लेगिहंव, तुम होवत कानून अधिकार.”
बइसाखू कुछ मुसका बोलिस -“”मंय हा जानत सब कानून
ककरो जीवन कहां बनाथय, ऊपर ले बांटत दुख फून.
जतका बखत इहां पहुंचे तंय, जान गेंव मंय अंतस ताड़
तंय निश्चय कर्तव्य निभा ले, मंय नइ परंव बीच मं आड़.
संसो के आगी मं झन बर, एमां बढ़त मोर अउ मान-
मोर छात्र करतब पालक हे, पूर्ण करत शासन के काम.
मींधू हा मन मं सकुचावत, करिस शुरु करतब के काम-
पहिरा दीस हथकड़ी ला झप, अपन गुरूबइसाखू हाथ.
एकर बाद लहुटगे थाना, हवालात बइसाखू गीस
करिस कुजानिक एकोकन नइ, पर होवत दुख के बरसात.
पिनकू लेना चहत जमानत, ओकर बर खोजत हे व्यक्ति
सुख के बखत सबो झन मितवा, बेरा बखत छोड़ दिन साथ.
उदुप दुधे ओला मिल जाथय, तंह पिनकू हा फोरिस साफ-
“”एक व्यक्ति हा फंसे कड़ाकड़, यद्यपि ओहर हे निर्दाेष.
ओकर लेना हवय जमानत, पर तैयार होत नइ एक
ओकर मदद अगर तंय करबे, तब थाना चल हालत देख.”
पिनकू दुधे पहुंचगे थाना उहां हवय बइसाखू ।
जहां दुधे हा गुरूला देखिस – होवत अचरज भारी ।।
बोलिस दुधे -“”माननीय अस तंय, तंय बनाय हस जीवन मोर
तोर कृपा ले मंय सुख पावत, मुश्किल होत करे यशगान.
तोर मदद मंय करना चाहत, काय करंव मंय आज्ञा देव
छूटे चहत तोर लागा ला, काबर के ऋण अब तक शेष.”
बइसाखू हा दुधे ला कहिथय- “”सुरता हवय तोर जे नाम
जीवन ला लेगत हस कइसे- याने काय करत हस काम?”
दुधे हा पहिली सकुचा जाथय, मगर बाद मं फोरिस साफ-
“”रोटी दार पेट भर खावत, जीवन ठीक चलत अभि मोर.
मोला शासन दीस उच्च पद, पर नौकरी ला मारेंव लात-
बिना चिकित्सक गांव हा रोवत, रोग हा खावत तन ला नोच.
ढारा गांव रहत हंव मंय अभि, उहें चलत औषधालय मोर
करत चिकित्सा ग्रामीण मन के, जिये के लाइक लेथंव दाम.”
बइसाखू हर्षित मन बोलिस- “”खावत हवय गांव ला रोग
उहां चिकित्सक जाय चहय नइ, यदपि घोषणा करत हजार.
अगर भूल के गांव मं जाथंय, करथंय उहां मरत ले लूट
आवत बिपत गांव ऊपर अउ, दुहना फूट बोहाथय दूध.
तोर उदिम ले मंय खुश होवत, जउन करत तंय गांव निवास
भेदभाव ला दुरिहा फेंकत, हिनहर तक के करत इलाज.”
मगर दुधे ला अनख जनावत, आरक्षक पहुंचिन ए बीच
पिनकू दुधे दुनों ला खेदिन, उनकर पर गुस्सा ला छींच.
बाहर डहर दुनों झन आथंय, तंह पिनकू हा रखिस सवाल-
“”तंय हा मिटा मोर सब शंका, मोटरी असन रखे हंव बांध.
व्याख्याता तिर बात करे हस, चहत हवस तंय ओकर कर्ज
मगर काय कर्जा ए ओहर, मोर पास कहि बिल्कुल साफ?”
दुधे कथय -“”मंय पढ़त रेहे हंव, उही बखत आइस तकलीफ
जहां परीक्षा शुल्क पटातेंव, मगर मोर तिर नोट अभाव.
मंय फिफिया के दउड़ेंव सब तन, व्याख्याता संग होगे भेंट
ओहर मोर मदद कर दिस टप, मंय हा शुल्क तुरुत भर देंव.
ओकर कृपा परीक्षा बइठेंव, मंय प्रावीण्य होय उत्तीर्ण
यदि बइसाखू मदद ले टरतिस, मोर भविष्य हा नष्ट विदीर्ण.”
व्याख्याता के लीस जमानत दुधे करिस खुद खर्चा ।
जमों बात मन मं राखिस – नइ हेरिस पर तिर चर्चा।।
बइसाखू ला दुधे हा कहिथय -“”तुम हा करव एक ठक काम
हमर गांव चल घूमव कुछ दिन, पावव शांति करव विश्राम.”
बइसाखू स्वीकार के बोलिस -“”माने लइक करत हस गोठ
मगर इहां ले टरना मुश्किल, जबरन आय बिपत के रात.
सच मं मोला कोन फंसादिस, ओकर पहिली पता लगांव
मंय हा कायर कहवा जाहंव, यदि नइ लेवन सकिहंव दांव.”
चइती ला बइसाखू खोजत, पर नइ पावत ओकर पूंछ
पता लगई मं जुग बुड़ जावत, आखिर धधुवा के रहि जात.
तभे खभर पाइस बइसाखू- अस्पताल मं लड़की एक
चिन्ताजनक परिस्थिति ओकर, करना चहत काल अभिषेक.
अस्पताल पहुंचिस बइसाखू, करथय पता आय ओ कोन
चइती आय पता जब चलथय, बइसाखू ला मिलगे तोष.
फेंकरूनाम चिकित्सक बोलिस -“”हवय जरुरत “ओ ग्रुप’ खून
चइती के तन रकत ला पाहय, होन पाय नइ जीवन सून.
दू बोतल भर खून इहां हे, पर चइती बर हे बेकार
जे मनसे के महत्व ऊंचा, ओकर बर ए रहत प्रबंध.”
बइसाखू खुद ला जंचवाथय, लागू होगे ओकर खून
हरहिन्छा खुद खून ला देथय, मन के क्रोध सुपा अस फून.
चइती के तन लहू ला पाथय, औषधि घलो व्यवस्थित रुप
ओकर स्वास्थय हा क्रमश& सुधरत, जीवन हा नवजीवन पात.
बइसाखू ला पिनकू पूछिस -“”मोर प्रश्न के देव जुवाप
चइती करिस शत्रुता तोर संग, काबर ओकर प्राण बचात?”
बइसाखू बोलिस -“”पिनकू सुन, मंय नइ करे कुछुच उपकार
एमां मोर स्वार्थ हा सधिहय, चइती ला पुछिहंव पुचकार.
यदि चइती पट ले मर जातिस, ओकर संग मर जातिस भेद
ओला जेन व्यक्ति उभराइस, ओकर पता बतातिस कोन!”
इही बीच मं पता चलिस सच- रिहिस सुरक्षित ओ ग्रुप खून
बोतल गिरके रइ छइ होगे, सधन पैस नइ ककरो स्वार्थ.
हमर देश बर बिडम्बना हे- मरत प्रान औषधि नइ पाय
जेकर जमों जरुरत पूरा, पूर्व सुरक्षित रखत समान.
चइती अपन निवास मं आथय, हवय खतम मुंह के मुस्कान
मुंहबोक्की अस कुछ नइ बोलय, देखत बक बक बही समान
बइसाखू पहुंचिस चइती तिर, तब ओकर स्थिति सामान्य
बइसाखू हा ओला पूछत, छीतत कृषक पाग मं धान-
“”कभू कभू मानव कर डरथय, आत्मा के विरुद्ध कई काम
यश अपयश जबरन मिल जाथय, जेकर संयोग दुर्याेग नाम.
खोल भला हिरदे के खरिपा – तंय माने हस काकर बात
मोर तोर शत्रुता कुछू नइ, मोर विरुद्ध चले हस राह ?”
चकला घर मं घटिस जे घटना चइती फोरिस ओला।
एकर बाद जेन बीते हे भेद बतावत पूरा ।।
किहिस हठील सरल बन मोला -“”बइसाखू हा दुश्मन मोर
ओला मंय हा चहत फंसाना, तब मंय चहत मदद ला तोर.
रेल के दुर्घटना जब होइस, हम्मन दौड़ करे हन लूट
पर कानून धरत अब हमला, पावत नइ आरोप ले छूट.
तंय हा बइसाखू के तिर जा, ओकर ले मंग स्वीकृति पत्र
अगर चाल मं सफल हो जाबे, तोला मंय देहंव कई लाभ.
तोर चित्र मंय खींच रखे हंव, लहुट जहय बिन टालमटोल
प्रेस मशीन बिसा के देहंव, मंय हा कहत सत्य ला खोल.
मोर वाक्य यदि अस्वीकारत, तोर चित्र जाहय हर हाथ
खूब नमूसी सबो जगह मं, प्रेस मशीन आय नइ हाथ.”
मंय सोचेंव – हठील हे हिंसक, दया मया नइ ओकर पास
ओला मंय अभि देंव पलोंदी, लेकिन बाद कोड़िहंव नींव.”
एकर बाद किहिस अउ चइती -“”मोला झिंकिस अर्थ के लाभ
धन जन के ताकत तंय जानत, चलवा देत गलत हर चाल.”
बइसाखू कहिथय -“”सच बोलत – गलत चले के कोन ला साध
स्वार्थ पूर्ति के लालच मं पर, मानव कर डरथय अपराध.”
चइती किहिस -“”तोर तिर मांगेंव – दुर्घटना के स्वीकृति पत्र
ओला देंव हठील के हक मं, तंहने रखेंव अपन मंय मांग-
“”मोर चित्र मन ला वापिस कर, झपकुन लगवा प्रेस मशीन
तोर बुता ला पुरो डरे हंव, तब झन छीन मोर अधिकार.”
मगर हठील चित्र नइ देइस, लतिया दीस मोर सब मांग
जम्मों धैर्य टूटगे रटरट, यथा आंसकुड़ टुटत कड़ांग.
मंय बोलेंव – पोल हे जतका बगराहंव सब कोती ।
मोर प्रतिष्ठा गिरिहय लेकिन ढंकिहंव लगा के पोती ।।
मंय अंड़ गेंव जिद्द कर उंहचे, कार हठील हा धोखा दीस
अपन बचन के पालन करही, तब तजिहंव एकर स्थान.
घेखरइ देख हठील भड़कगे, दीस अंजोरी ला आदेश-
“”चइती हमर विरुद्ध मं रेंगत, एकर फल तुरते तुम देव.
एहर जलगस जग मं जीवित, तलगस मुड़ मं घुमरत काल
हर के प्राण सबूत ला मेटव, चुर्रुस खतम होय जंजाल.”
घूमत सदा हठील के संग मं, तभे अंजोरी होगे क्रूर
माटीतेल मं घी हा मिलथय, बदल जथय घी के गुण धर्म.
झींका पुदगा करिस अंजोरी, पर मंय झटक करे हंव दूर
ओकर अउ कोतल मन दउड़िन, मोला करिन विवश मजबूर.
धरहा अस्त्र धरे ओमन हा, बलभर करिन मोर पर वार
चइती अब मरगे कहि जानिन, उठा के फेंकिन ठउर निझाम.
पोटपोट मंय करत रेहे हंव, टैड़क के पर गीस निगाह
ओहर अस्पताल मं लानिस, बचत कथा के तोला ज्ञान.”
बइसाखू चइती ला कहिथय -“”पहिली के बदलिस संसार
औरत हा समाज ला बदलत, मरद घलो नइ पावत पार.
लेकिन तंय पर ला धांसत हस, लावत खुद ऊपर तकलीफ
अइसन मं अतियाचारी मन, होवन कहां सकत हें नाश !”
बइसाखू सब भेद ला जानिस, उहां ले हटगे टंटा टोर
माला रुपा मन हा पहुंचिन, बइठ गीन चइती ला घेर.
पहिली हाल चाल ला पूछिन, कठिन प्रश्न ला सम्मुख लैन
माला हा चइती ला पूछिस -“”तंय हा शिक्षित गुण के खान.
सबो दिशा चहली मतात हस, तोर पास अनुभव भण्डार
हमर प्रश्न के उत्तर ला ढिल, बिल्कुल साफ झूठ झन मेल.
स्त्री पुरुष ला जन्मिस प्रकृति, उंकर जुड़य दैहिक संबंध
नया वंश अंवतरय जगत मं, प्राणी बिना शून्य संसार.
मगर सेक्स ला देत महत्तम, रखथंय फेर विरुद्ध मं तर्क
जब सहवास हा अति आवश्यक, ओकर होय सदा सम्मान.
मगर सेक्स के नाम एक तन – प्रेम प्यार आकर्षण केन्द्र
दूसर तन अपयश ला डारत – बलत्कार अउ दैहिक लूट.
याने कर्म हवय एके ठक, मगर नाम मं काबर भेद
जब संसार सेक्स ले जीवित, तब काबर ओकर हिनमान ?”
चइती कथय -“”सेक्स आवश्यक, एकर भेद कहत हंव खोल –
महिला पुरुष दुनों के स्वीकृति, तब मिलथय स्वर्गिक आनंद.
दूनों आकर्षित आपस मं, इच्छानुसार प्रेम संसर्ग
मन अनुसार कर्म जब होवत, तभे सेक्स पावत सम्मान.
मगर बलात सेक्स यदि होवत, – बलत्कार अउ दैहिक लूट
ए सम्मिलन अनिच्छित होवत, दूनों मन आकर्षण हीन.
एक डहर डर भय आशंका, मात्र एक के मन मं वेग
यदपि यहू मं सेक्स हा होवत, पर वास्तव मं अनुचित आय.”
रुपा किहिस -“”अनुभवी हम अन, करे हवन हन यौन व्यापार
यने अर्थ के लाभ ला पावन, रुपिया डहर रहय बस ध्यान.
हर सहवास मदद ला देवन, करन पुरुष के इच्छा पूर्ण
पर हम उत्साहित नइ होवन, सेक्स के आकर्षण ले दूर.”
चइती चलत गोठ ला थेम्हिस -“”अब तुम सुनव करूसच गोठ
महिला के यौन शोषण होथय, इही बात हा जग विख्यात.
लेकिन पुरुष घलो हे शोषित, औरत ओकर करत शिकार
काल ब्वाय याने पुरुष वेश्या, शोषित पुरुष के नाम ला जान.
रुपिया फेंक धनी महिला मन, बिसा लेत हें बली जवान
अपन काम ला शांत करावत, घटत पुरुष के ताकत मान.
तुम निष्कर्ष जान लव अइसन- औरत पुरुष मं झन कर भेद
पुरुष हा जतका अत्याचारी, औरत घलो निर्दयी क्रूर.”
एतन बात करत अंदर मं, बाहिर मं नंदले हा ठाड़
ओहर मुंह ला बंद रखे अउ, बात सुनत हे रख के ध्यान.
सोचत -“”चइती बोलत वाजिब, होत पुरुष पर अत्याचार
मंय हा स्वयं भुक्त भोगी अंव, होय लिंग शोषण हा मोर.
जब अभाव के बीच फंसे मंय, करेंव पुरुष वेश्या के काम
औरत मन मोला चुहकिन अउ, बदला मं रुपिया गिन दीन.
एकर दुष्फल मंय पाये हंव- मोर देह हा निर्बल हीन
मोला रोग पीलिया सपड़िस, दुब्बर बर असाढ़ दू अ‍ैस.
लेकिन चुनू उबारिस मोला, ओहर मदद मं रुपिया दीस
दवई बिसा उपचार कराएंव, तभे स्वास्थय मं अ‍ैस सुधार.
मोला जेहर दीस जिन्दगी, उही पाय हे प्राण के दण्ड
ओकर ऋण ला छुटे चहत हंव, लेकिन अवसर मिल नइ पात.
मंय हा न्यायमूर्ति यदि होतेंव, जमों सजा कर देतेंव माफ
ऊपर ले इनाम अउ देतेंव, खूब बढ़य ओकर यश मान.”
नंदले आय मदद मांगे बर, चइती पर रख के विश्वास
मगर इहां के समझिस स्थिति, वापिस होत हताश दिमाग.
नंदले भूख मरत हे सपसप, लेकिन ओकर तिर नइ नोट
यदि ओकर तिर रुपिया होतिस, सक भर खातिस बासा बैठ.
दैनिक पत्र पढ़िस नंदले हा, छपे हवय विज्ञापन एक-
“”कारागृह मं एक आदमी, ओहर आय क्रूर अभियुक्त.
ओहर मृत्यु दण्ड ला पाये, फांसी लगे के आगे टेम
पर जल्लाद मिलत नइ एको, तब अरझत फांसी के काम.
कोई अगर काम सरकाहय, ओला शासन देहय नोट
ओकर संग जेवन तक मिलिहिय, चाहे जेन सोंट ले लाभ.”
नंदले कारागृह मं पहुंचिस, जेल अधीक्षक के तिर गीस
उहां आय के कारण ला कहि, सब उद्देश्य ला फुरिया दीस.
जेल अधीक्षक कोड़िया पूछिस -“”फांसी देवई हा मुश्किल काम
अइसन काम मं पोटा कांपत, तंय हा कइसे करबे पूर्ण ?”
नंदले अपन वजन ला फोरिस -“”शल्य क्रिया नइ जानय जेन
शल्य कक्ष मं घुसत अचानक, ओहर डर गिरथय बेहोश.
लेकिन शल्य चिकित्सक हा भिड़, फाड़ देत रोगी के देह
कतको लहू बोहावत छल छल, पर दिमाग बिचलित नइ होय.
तइसे मंय हा फांसी देथंव, खूब करे हंव अइसन खेल
मुजरिम ला तड़फत देखत तब, मोर हृदय हा होत प्रसन्न.
फांसी देत मरिन पुरखा मन, जिनगी पालिन जिनगी छीन
उंकर राह पर मंहू चलत हंव, बड़े मीन खावत लघु मीन.”
जेल अधीक्षक लीस परीक्षा, नंदले पर करलिस विश्वास
नंदले सक भर भोजन ओइरिस, उंहे रात भर लीस अराम.
बेर नवा जीवन बांटे बर, बड़े फजर होवत तैयार
गाय अपन छोटे बछरूला, पिया देत अमृत अस दूध.
कारागृह मं उही बखत मं, फांसी लगे के पहुंचिस टेम
नंदले हा तइयार बुता बर, मानो सब ले करतब श्रेष्ठ.
चलिस चुनू हा फांसी स्थल, जिनगी घरी बचे बस चंद
ओकर पांव चलत मुश्किल मं, हंसत न रोवत मुंह तक बंद.
धड़ धड़ धड़ धड़ हृदय हा होवत, आंख खुले पर सुन्न दिमाग
ओला कोन पकड़ के लेगत, का सोचत नइ धरत दिमाग.
जहां चुनू ला नंदले देखिस ओला मारिस पाला ।
तिली खरी हा बिना तेल के नंदले के मुंह काला ।।
भावुक लेखन मन लिख देतिन – चुनू हा कुछ हंस हेरिस बोल-
नंदले तंय हा ठीक करत हस, तंय कर पूर्ण अपन कर्तव्य.
तोर प्राण ला मंय राखे हंव, तब तंय छूटत ओकर कर्ज
तोर हाथ मर के खुश होहंव, निपटा तुरुत अपन तंय फर्ज.”
मुड़ ला गड़िया नंदले कहितिस -“”मोर कुजानिक ला कर माफ
बिना दोष मंय तोला मारत, तइसे मंय हा पाहंव दण्ड.”
जेल के अधिकारी धथुवातिन, चढ़तिस चुनू फांसी के मंच
ओकर मुंह मुसकात फूल अस, कैक्टस कंच मरुस्थल बीच.’
लेकिन इहां दृष्य नइ ओइसन, यदपि करिस नंदले सब काम-
चुनू ला करिया वस्त्र ओढ़ा दिस, नरी मं बांधिस डोरी टांठ.
पांव तरी के पटनी झींकिस, तरी झूलगे चुनू के देह
तन ले ओकर प्राण निकलगे, जग ले बुतगे ओकर नाम.
जमों काम नंदले निपटाइस, मगर उड़े हे ओकर होश
रुपिया ला झोंकत तक बिलमिस, तेकर बाद छोड़दिस जेल.
नंदले अउ बइसाखू मिलथंय, तंह नंदले हा कहि दिस सत्य
बइसाखू हा कथा ला जानिस, लेथय उहू बड़े जक सांस-
“”बुभूक्षितम करोति अपराधम, तंय लोकोक्ति सिद्ध करदेस
मंय अब काकर करंव टिप्पणी, लेकिन तंय हा करे अनर्थ.”
आगू ले हठील हा आवत, इंकर पास मुसकावत अ‍ैस
नंदले ला ताना भर एल्हत -“”करे हवस जनसेवा काम.
एक बखत जे हत्या करथय, ओकर पर चढ़ जाथय खून
अगर चुनू हा जीवित अब तक, कतको झन के लेतिस प्राण.
मुजरिम ला फांसी चढ़ाय हस, एकर ले समाप्त अपराध
दूसर मन ला शिक्षा मिलिहय, सब झन गाहंय जस ला तोर.”
नंदले के गुस्सा कंस भड़किस, देना चहत हे उत्तर टांठ
लेकिन मन मं लुका के रखलिस, अउ भविष्य मं कतको वक्त.
बइसाखू हा खड़े कलेचुप, पर हठील हा खुद गोठियात-
“”मोला देखा नेक रद्दा तंय, ताकि मोर भावी बन जाय.
खोड़रा कते लुका के रहिथव, चलत हवय का मरत ले काम
कतको दिन मं दर्शन देवत, परन तो देवव धोकर के पांव.”
बइसाखू कहिथय -“”हठील सुन, मोला तंय झन झुझका व्यर्थ
तोर कर्म ला मंय जानत हंव, तोर बात के समझत अर्थ.
खोरबहरा के प्राण हरे हस, तंय दिन रात करत अपराध
नंदले चइती चुनू अउ मोला, तिंही करे हस भिड़ बर्बाद.
पाप कर्म ला जोंगत रहिथस, भ्रष्ट राह पर लेगत पांव
यद्यपि वर्तमान सुख देवत, पर भविष्य मं खतरा दाह.
वन के बरहा ला मारे बर, रखत शिकारी गोला राह
बरहा गोला ऊपर रेंगत, गोला फूट जात कर धांय.
बरहा चिथा प्रान ला खोवत, होत शिकारी खुश अंधेर
मांस खात कोलिहा कातिक अस, पात्र निमंत्रण ओकर मित्र.
बढ़त शिकारी के क्रूरता हा, कई ठक गोला ला रख देत
ओकर पांव परत गोला पर, तंह गोला हा फूटत धांय.
होत शिकारी के तन छलनी, आखिर तड़फ होत प्राणान्त
जे गोला मं पशु ला मारिस, उहिच हा बनगे ओकर काल.
गलत काम मं पात सफलता, तभे बढ़त दिन दिन उत्साह
अपन कर्म के फांदा मं फंस, तंय हां खुद हो जाबे नाश.”
कई दृष्टांत दीस बइसाखू, ताकि हठील नेक बन जाय
पर हठील के सींग हा बाढ़त, हित के बात लगत विष बाण.
किहिस हठील -“”ज्ञान भर बांटत, पर खुद करथस खोड़िल काम
फूटत आंख देख मोर उन्नति, तंय हा सोन ला बोलत ताम.
मंय देवत चेतावनी के तंय झन परबे कभु आड़ा ।
वरना दुष्परिणाम भोगबे टूट जहय रट हाड़ा ।।
गीस हठील हा खुद के बंगला, तभे अंजोरी गप ले अ‍ैस
कथय -“”तोर आदेश पुरो के, मंय हा बस अभि आवत लौट.
रेल लूट के धन लाने हन, ओला मंय बिक्री कर देंव
ओकर एवज नोट लाने हंव, तंय हा रुपिया गिन धर हाथ.”
दीस अंजोरी हा सब रुपिया, तंह हठील होगीस प्रसन्न
खूब प्रशंसा पात अंजोरी, ऊपर ले पालीस इनाम.
“”मन अनुसार मार तंय आज्ञा, मोर असन पर कर विश्वास
डंका तोर बजय सब कोती, रखथंव सदा अपन मन आस.”
धर इनाम ला किहिस अंजोरी, तभे पहुंच जाथय पचकौड़
नशा जिनिस लाने हे संग मं, रखिस हठील के तिर सब चीज.
जहां हठील जिनिस ला जांचिस, खुश होके करथय तारीफ
मादक जिनिस शुद्ध शत प्रतिशत, नकली के बुझ गेहे नाम.
तस्कर सटोरिया अपराधी, जेमन करत देश संग घात
अपन असन बूता वाले संग, दोगलई छोड़ रखत ईमान.
मादक द्रव्य सुरक्षित रख के, होवत हे हठील निÏश्चत
तंह पचकौड़ ला रुपिया गिनदिस, लेन देन हा होवय मीठ.
कथय हठील -“”लान मोरे तिर, मादक द्रव्य जतिक मिल जाय
एकर खपत हवय अड़बड़ अउ, लाभ घलो देवत हे खूब.”
तब पचकौड़ करत हे शंका -“”हवय लाभप्रद तोर सलाह
पर मींधू के भय हा खावत, पकड़े बर डारे हे जाल.
यदि मींधू के बूता बनतिस, तब मंय होतेंव पूर्ण स्वतंत्र
मोर काम हा सरलग निपटय, रच तंय भला सफल षड़यंत्र.”
“”सोसन भर तंय धंधा ला कर, तंय डर के घुटना झन टेक
मंय मींधू के बुता बनाहंव, मगर चहत हंव थोरिक टेम.”
दीस हठील बहुत आश्वासन, तब पचकौड़ लहुट के गीस
तंहने फिर आ जाथय छेरकू, देख हठील हा खुश होगीस.
छेरकू हा हठील ला कहिथय -“”तंय हा मोर कष्ट ला टार
बुल्खू आय मोर प्रतिद्वन्दी, ओला तंय किसनो कर मार.
मंगलिन श्रमिक चलिस जब टक्कर, करिन श्रमिक मन जब हड़ताल
व्यवसायी के धंधा चौपट, शहर हा होगे दुखी अशांत.
लेकिन बुल्खू हा मिहनत कर, मंगलिन श्रमिक ला कर दिस एक
दूनों पक्ष ला नफा अमर दिस, अउ भावी बर राह बनैस.
मालिक श्रमिक दुकनहा जनता, बुल्खू भर ला देवत श्रेय
ओकर पक्ष लेत सब मनखे, यने करत सब जय जयकार.
वास्तव मं बुल्खू जनसेवक, राष्ट्रभक्ति तक लबलब पूर्ण
मोर दोष मन बगर जथंय तंह, बुल्खू लेत सुयश ला लूट.
मंय देखत भविष्य ला टकटक- जीत सकंव नइ पुन& चुनाव
मोर बात यदि मान जते तंय, मंय दे देतेंव रक्षा छांव.”
“”काबर पहिलिच टेस ला मारंव, करिहंव यत्न पूर्ण हो काम
मोला हे विश्वास अपन पर, बुल्खू पहुंच जहय यमधाम.”
दीस हठील बहुत आश्वासन, छेरकू लहुटिस कर विश्वास
देखव तो हठील के करनी- करदिस शुरूघात के काम.
मन मं एकोकन डर भय नइ, अपन काम मं चलत हठील
ओकर साथ अंजोरी रेंगत, जेन धरे हे नशा पदार्थ.
गीन महाविद्यालय तिर मं, इंकर पास पहुंचिन कई छात्र
ओमन नशा जिनिस ला मांगत, स्वयं बलात होय दशगात्र.
दाई ददा के धन ला फूंकत, सक भर करत नशा उपयोग
सर मं सती बचे थोरिक अस, वरना फइले बस ए रोग.
भगत समुन्दा नशा ले दुरिहा, ओकर ड्रग के करत विरोध
ओला हठील हा उभरावत, ताकि खरीदय मादक द्रव्य.
कथय हठील -“”शांति मन सुन ले, नशा जिनिस के गुण लमियात-
पहलवान वैज्ञानिक विचारक, करथय उच्च वर्ग उपयोग.
सोय बुद्धि मं शक्ति ला भरथय, आविष्कार मदद ला देत
मादक द्रव्य मिलत औषधि मं, तब ओकर गुण होवत श्रेष्ठ.
अगर छात्र मन नशा ला लेहव, स्मृति तेज पाठ सब याद
निश्चय सफल परीक्षा मं तुम, प्राविण्य मं जुड़ जाहय नाम.
यदि मंय हा असत्य बोलत हंव, पूछव कंवल ला वाजिब गोठ
ओहर मोर दवई ला लेथय, तब ओकर हे भावी साफ.”
कंवल कथय -“”मंय नशा ले भागंव, एको पाठ रहय नइ याद
लेकिन नशा पान हा होवत, मोर जिन्दगी पैस प्रकाश.
जउन पाठ ला याद करत हंव, स्मृति मं स्थायी वास
हिम्मत काम उझेलत हे मन, नवस्फूर्ति लगत हे देह.”
जब वक्तव्य करिस आकर्षित, लीस समुन्दा नशा पदार्थ
दूसर छात्र परत हें झोझा, चिथो चिथो कर जिनिस बिसात.
जेन जिनिस ला लाय अंजोरी, हाथोहाथ बिकिस तत्काल
रुपिया ला हठील हा समटत, अब लहुटे बर करत विचार.
चुपे हठील अंजोरी खसकिन जे वास्तव अपराधी ।
मगर छात्र मन काबर भागंय नशा बनावत जिद्दी ।।
अपन स्वार्थ ला सिद्ध करे बर, नवा युवक ला डारत नर्क
उंकर गलत करनी ला परखव – ओमन आय राष्ट्र के शत्रु.
करके नशा छात्र मन झुमरत, आपुस करत लड़ई तूफान
नशा बिगाड़त इनकर जीवन, का करिहंय पर के कल्याण!
बइसाखू गिस छात्र पास अउ, सुधर जाय कहि मर समझात
मगर छात्र मन कुछ नइ घेपत, ऊपर ले मुंह ला फरकात.
ओकर पास समुन्दा हा गिस, बइसाखू ला दीस तड़ाक
व्याख्याता के आंखी बरथय, बपुरा हा रहि जथय अवाक.
गीस सूचना थाना मं तंह, आरक्षक दल झपकुन अ‍ैस
ओकर साथ पहुंचथय मींधू, जांचत हवय उहां के हाल.
जहां कंवल ला पूछिस मींधू, देत कंवल हा झुमर जुवाप –
“”व्याख्याता मन हा पढ़ाय नइ, देखत रथंय अपन भर स्वार्थ.
वेतन हमर खूब बाढ़य कहि, जब मन होत करत हड़ताल
इहां आय विद्या अमरे बर, मगर अशिक्षित बन के जात.
होवत अत्याचार हमर पर, हमर भविष्य होत हे नाश
अब अनियाव फेर झन होवय, इही सोच हम करत विरोध.”
मींधू बोलिस -“”जे बोले हस, ओहर बेर असन सच गोठ
मगर अभी तंय ढचरा मारत, ताकि गला हा झन फंस जाय.
झेलत बिपत तुम्हर पालक मन, भेजिन इहां पाय बर ज्ञान
उनकर श्रम ला नशा मं फूंकत, अपन हाथ जावत शमसान.
नशा भविष्य के रांड़ ला बेचत, ऊपर ले आवत कंस खर्च
बुद्धि भ्रष्ट बदनामी आथय, चुहका जथय देह के शक्ति.
यदपि नशा के लेत संरोटा, लेकिन तर्क आय बिन गोड़
उभरउनी ला कभु झन मानो, जीवन रखव नशा ला छोड़.”
एकर बाद पूछथय मींधू -“”नशा जिनिस के वितरक कोन
ओकर धुमड़ा खेदे बर हे, ओहर आय प्रमुख अभियुक्त ?”
मींधू चिभिक लगा के पूछत, लेकिन छात्र ज्वाप नइ देत
तब मींधू हा भन्ना जाथय, ताकि ज्ञात होवय सच मात्र-
“”तुम सब टकटक ले जानत हव – थाना पुलिस के अत्याचार
निरपराध तक ला पहटाथन, हमर पास नइ दया या प्यार.
करके नशा करत हव हुल्लड़, तब तुम कहां हवव निर्दाेष
हवालात मं धांध दुंहू अउ, उंहे खतम करहूं सब रोष.
यदि आफत ले बचना चाहत, फोर तुरुत मुजरिम के नाम
ओकर पास दउड़ के जाहंव, करिंहव पूरा करतब काम.
मींधू धमकी देइस तंहने सच फोरिन विद्यार्थी ।
मींधू हा घालुक ला खोजत ओकर निकलय अर्थी ।।
आखिर मं हठील हा मिलगे, तंह मींधू हा रखिस सवाल-
“”छात्र के जीवन ला मेटत हस, काबर चलत गलत तंय चाल ?
जीवन बर रुपिया हा लगथय, करना परत काम व्यापार
तंय हा काम उठा ले दूसर, पर जीयत जीवन झन बार.”
कथय हठील -“”जउन जस होथय, उही असन होवत हे सोच
पुलिस विभाग कमावत हस तंय, तब मुजरिम के करथस खोज.
निरपराध मनसे तक ला तंय, करत प्रमाणित मुजरिम आय
ओला फंसा सजा पावय कहि, कई ठक धारा लगवा देत.
मंय हा नशा ले दुरिहा भगथंव, मंय नइ करंव अनैतिक काम
मंय निर्दाेष वर्षा के जल अस, तंय बेकार दोष झन डार.
हम तुम दुनों आन सहपाठी, तंय अमराय शासकीय काम
बिना जीविका मंय घूमत हंव, तेला घलो करत बदनाम !”
मींधू कथय -“”मित्र मानत हंव, तब समझावत हंव कई घांव
पर अनर्थ बूता जोंगत हस, तब मंय हा झींकत हंव पांव .”
अब हठील हा रेंगत सोचत – सरलग चलय मोर सब काम
मोर लाभ हा बढ़य दिनों दिन, ऊपर ले कमांव मंय नाम.
मगर राह मं अड़चन आवत- मींधू परत बीच मं आड़
ओकर खुंटीउजार मंय करिहंव, तंहने खुद चुर जाहय दार.
याने छुटय जीविका ओकर, का कर लेहय मोर खिलाफ
धुंका बंड़ोरा हा रुकथय तंह, जगमग बरत बुझत जे दीप.’
तुरुत अंजोरी ला बलवाथय, अउ सब बात पियाथय कान
जहां अंजोरी भेद ला जानिस, रेंगत हवय विजय ला पाय.
मींधू तिर जब गीस अंजोरी, मींधू काटत हे अमरुद
ओकर ऊपर नून ला चुपरत, तब फिर खावत लगा के स्वाद.
दीस अंजोरी ला खाये बर, तंहने कथय अंजोरी हांस-
“”जुन्ना मित्र तोर अंव मंय हा, तेला तंय हा करत हताश.
मोला सक भर मिठई खवाते, मगर बिही देवत हस खाय
कतको रुपिया ला झोरत हस, लेकिन हवस सूम के सूम.?”
मींधू कथय -“”करंव का वर्णन, होत बिही हा गुण के खान
उदर रोग के एहर दुश्मन, करत पेट ला खलखल साफ.”
कथय अंजोरी – “”बिही करत हे , पेट के मल ला खलखल साफ
तइसे तंय हा रख मोरो बर, अपन हृदय ला बिल्कुल साफ.”
“”एकर बर निÏश्चत रहा तंय, मंय हा तोर करत सम्मान
करिया हृदय तोर बर कभु नइ, मंय हा चहत तोर शुभ लाभ.”
तभे अंजोरी रुपिया हेरिस, करत हवय मन लुके जे काम
मींधू ला रुपिया पकड़ाथय, नाम अंजोरी करिया काम.
“”आवश्यक तब मंगे रेहे हंव, तोर पास ले ऋण मं नोट
बिपत समय तंय मदद करे हस, जाड़ मरत ला मिलथय कोट.
जीवन रेल व्यवस्थित रेंगत, छूटंव कर्ज सोच के आय
अड़बड़ दिन मं कर्ज पटावत, मोर कुजानिक ला कर माफ.”
बोल अंजोरी हा चुप होगे, मींधू कथय कपट ला फून –
“”मित्र, अपन मन मं कुछ सोचस, लेकिन तोर काम नइ नेक.
मंय हा साहूकार कहां अंव, तेमां तंय पटात हस कर्ज
तोर जरुरत पूरा होगे, एहर मोला दिस संतोष.
जब तंय मोला मितवा कहिथस, लेन देन ला दुरिहा राख
मोला जब रुपिया आवश्यक, तोर पास मंय रखिहंव मांग.”
मींधू हा रुपिया लहुटावत, करत अंजोरी हा इंकार
हारे दांव राखलिस मींधू, एकर सिवा राह नइ और.
तब अपराध निरोधक दल हा, उंकर पास धड़धड़ ले अ‍ैस
मींधू हा जब दल ला देखिस, ऊपर तरी होत हे सांस.
मींधू ला दल प्रमुख हा बोलिस -“”तंय हा लेस नगद मं घूंस
तोला रुपिया दीस अंजोरी, तब तंय रंगे हाथ पकड़ात.”
मींधू के तिर जतका रुपिया, दल के प्रमुख हा धरलिस झींक
यद्यपि मींधू घूंस खाय नइ, लेकिन बिना दोष धंस गीस.
मींधू कहत अंजोरी ला अब -“”बिही साथ खाये हस नून
ओकर कर्ज बने छूटत हस – अपन मित्र ला स्वयं धंसाय !
नाम अंजोरी रखे हवस पर सच मं करिया चाला ।
पर के बुध ला मान चलत मंय जानत बालेबाला ।।
बहुत कष्ट मं पाय जीविका, जेवन मिलत रिहिस भर पेट
तंय नंगात हस ओला भिड़के, काम करे तेहर नइ ठीक.”
“”घूंस पटा के पाय नौकरी, उही घूंस हा पद छिन लीस
गलत कर्म के फल खुद चीखत, मोर मुड़ी लांछन झन डार.”
अतका बोल अंजोरी हा चुप, मींधू संग मिलात नइ आंख
मींधू अपन दांत ला कटरत, मगर क्रोध ला रखलिस रोक.
जेन अपन कर्तव्य निभाथय, घालुक साथ करत संघर्ष
ओहर पद मं टिकन पाय नइ, घालुक मन मानत तंह हर्ष.
मींधू ला बिन दोष फंसा दिस, गीस अंजोरी अपन मकान
मनखे के हे भीड़ कचाकच, जेमन करत चिहुर चिंवचांव.
मनसे पर खखुवात अंजोरी -“”एहर कहां दर्शनीय ठौर
तुम्मन कार इहां आये हव, कारण कहव मोर तिर साफ?”
कारण पूछत हवय अंजोरी, मगर कोन हा लाय जुवाप
ओमन मात्र बोटबिटा देखत, मानों ककरो गमी मनात.
दुकली जेन अंजोरी के बहिनी, ओहर दिखत दुखी गंभीर
बगरे चुंदी – खंरोचा तन भर, अस्त व्यस्त हे ओकर वस्त्र.
टैड़क हा बिखेद ला फोरत -“”तंय अनुपस्थित अपन मकान
तभे हठील इहां पर पहुंचिस, अउ दुकली ला एल्हिस तान.
ओकर मंसा दुकली ताड़िस, तंहने दुकली करिस पुकार
हम्मन दौड़ इहां तक आएन, पर रहिगेन सिरिफ झखमार.
अंदर ले कपाट लगगे तब, मदद करे बर हम असमर्थ
ओतन दुकली के पत जावत, लूटत हवय हठील समर्थ.
करिस कुकर्म हठील निसाखिल, तंह निकलिस दरवाजा खोल
हम्मन घेर के ओला धरतेन, तंह हठील हेरिस पिस्तोल.
सब ला डरा अपन हा भागिस, हम धथुवा इंहचे हन ठाड़
पटिया हा मजबूत हवय पर, सरक के भर्रस गिरथय कांड़.”
टैड़क सब घटना ला फोरिस, बोक्क अंजोरी सुन्न दिमाग
बहुत बाद मं चेत लहुटथय, तब फिर लगत देह भर आग.
गैंदा हा टैड़क ला झींकिस, अलग लेग के रखथय तर्क-
“”पाप पुण्य के फल इहें खावव- स्वर्ग नर्क ला जीयत भोग.
लूट कुकर्म अंजोरी करथय, चइती तक ला दुख पहुंचैस
पाप के फल ला संउहत भोगत, इही जन्म बदला मिलगीस.”
टैड़क हा गैंदा ला कहिथय -“”तंय बोलत हस बात अनर्थ
सब तन के विचार ला समझव, तेकर बाद तर्क ला राख.
बइसाखू दुकली ला जानत, एमन कहां करिन कुछ पाप
तभो इंकर पर आफत आगे, कते कुकर्म के फल ला पैन !
पाप पुण्य मं वार्ता होथय, आय समस्या बढ़थय और
कुष्ठ रोग पापी फल कहिथंय, पर औषधि मं होवत ठीक.
छेरकू करत पाप कतरो ठक, मगर पाय पद पूंजी मान
हंसिया श्रमिक कमावत मरमर, मगर भूख मं छूटत प्राण.
अतिक बात मंय निश्चय मानत, स्वर्ग नर्क मं भेद लुकाय –
मनसे अत्याचार करय झन, ओहर चलय ठीक असराह.
पाप पुण्य के बात ला गोठिया, हम खुद होत कर्म ले हीन
दुख अन्याय रोग हा बाढ़त, शोषक हंसत बजाथय बीन.”
टैड़क अउ गैंदा गोठियातिन पर हट गीस अंजोरी ।
मींधू पास पहुंच के फोरत पूर्व के घटना पूरा ।।
केंघरिस -“”तोर विरुद्ध चले हंव, ओमा रिहिस हठील के हाथ
मंय हठील के पाछू किंजरत, आखिर होगे मोर बिगाड़.
जतका दोष मढ़ेंव तोर ऊपर, अमृत दूध सिन्धु अस झूठ
अब सब दोष अपन पर लेवत, अपन हाथ मारत खुद मूठ.
ताजा घटना घटे हवय अभि, तब हठील के करत विरोध
यदि कुछ दिन देरी हो जाहय, मंय खुद लेहंव ओकर पक्ष.
मोर गोठ ला सत्य समझ तंय – मंय भावुक पर कहत यथार्थ
तंय हठील ले टक्कर ले भिड़, मोर नजर मं तिंहिच समर्थ.
“”अब प्रायश्चित करत अंजोरी’ कहि देहय हे व्यक्ति अबूज
पर मंय अपन स्वार्थ ला साधत, एकर सिवा राह नइ दूज.”
जउन रहस्य हठील के जम्मों, किहिस अंजोरी राख प्रमाण
सब आरोप अपन मुड़ लेइस, भले होय कतको नुकसान.
मींधू जब आरोप ले छूटिस, पुन& करत शासन के काम
धर के पेज हठील ला खोजत, छोड़िस सब आलस आराम.
आगू तन ले अर्थी आवत, कई मनसे हें ओकर साथ
ज्ञानिक खलकट पंचम मंथिर, जैलू झनक झिंगुट तक साथ.
चित्रकार लिप्पिक वैज्ञानिक, अभिनेता शिक्षक मजदूर
एमन अंदर हृदय दुखी हें, बाहिर मुंह पर ब्यापत शांति.
मींधू करत हवय एक शंका -“”मनसे मन ए नइ चिल्लात-
सिरिफ राम के नाम हे सत्तम, बाकी के इहि गत्त अवश्य.
अर्थी पर लाई ला छिंचथंय, छीतत रुपिया छींच गुलाल
अर्थी हा जब मरघट जाथय, जान लेत दुसरो इंसान.
पर ए अर्थी हवय अजूबा- एकर संग मं मानव जेन
उंकर मुंहू हा बंद सिले अस, बाहिर नइ झलकत तकलीफ.
जिनिस अवैध निकासी खातिर, तस्कर चलत कपट के चाल
अर्थी लुका जिनिस ला रखथंय, ताकि निरीक्षक धोखा खाय.”
अर्थी के तिर पहुंचिस मींधू, सब ला डपटिस कड़ा अवाज –
“”अर्थी ला राखव खाल्हे मं, करना चहत सतम के जांच.
एमां काय लुका राखे हव, वैध वस्तु या वस्तु अवैध
जब सच तथ्य ले परिचित होहंव, दुहूं हटे बर मंय आदेश.”
पंचम कथय -“”हमन लेगत हन, प्रतिभावान युवक के लाश
एकर मरना दुखी बना दिस, तंय हा बीच बेंग झन पार.”
मींधू के शक हा बढ़ जाथय, देखे बर करथय हठ खूब
मनसे बाटुल हार जथय तंह, अर्थी ला नीचे रख दीन.
तुरुत कफन कपड़ा ला खोलिन, ताकि लाश दगदग दिख जाय
मींधू जहां लाश ला देखिस, ओकर हृदय धकधका गीस.
आय कंवल के मृत तन ओहर, जेहर आय नवयुवक छात्र
नशा जिनिस ला खूब वापरिस, जीयत तन हा बनगे लाश.
मंथिर हा मींधू ला बोलिस -“”नशा कंवल ला कर दिस नाश
यदि एहर वैज्ञानिक होतिस, जन कल्याण के करतिस खोज.
एहर अगर चिकित्सक होतिस, कई ला देतिस जीवन दान
यदि एहर साहित्यिक चिंतक, जग ला देतिस नवा विचार.
याने मोर बात के आशय – नशा करिस प्रतिभा ला नष्ट
जेहर जग के भविष्य बनतिस, समय ले पहिली ओकर मृत्यु.”
झनक अभी तक हवय कलेचुप, मींधू ला देवत ललकार-
“”तंय कर्तव्यनिष्ठ अंव कहिथस, चहथस- उन्नति पाय समाज.
नशा जिनिस के जे तस्कर ए, ओला पकड़ छोड़ सब काम
कड़ा दण्ड कानून ले दिलवा, ताकि दुसर तक शिक्षा पाय.”
यथा कीटनाशक औषधि ले, हरा पेड़ हा मुरझुर होत
पर वास्तव मं कीरा मरथय, पेड़ के रोग हा होत समाप्त.
तंहने पेड़ लहलहा बढ़थय, बाद मं देवत ठोस अनाज
जहां जीव हा अन्न ला खाथय, ओकर जीवन जीवन पात.
अर्थी साथ हवंय जे मनखे, मींधू ला कई ठोसरा दीन
मींधू ला कंस अनख जनावत, पर वाजिब मं नेक सलाह.
डंडा हा रट्ठा के झड़कत, गिल्ली के छुचकी पर घांव
गिल्ली हा भनभना के उड़थय, मन भर के मारत हे दौड़.
मींधू के दिल घाव बनिस तंह, तुरते चलिस पाय उद्देश्य
ओहर मात्र हठील ला खोजत, ओकर सिवा काम नइ और.
बइसाखू संग भेंट हो जाथय, तंह मींधू करथय संकोच
ओकर हाथ भरिस हे बेली, निरपराध के बूड़िस पोच.
बइसाखू बोलिस मींधू ला -“”मंय जबरन मुजरिम बनगेंव
मोर हाथ डारे तंय बेली, तेकर बर तंय झन कर ग्लानि.
मध्यम वर्ग बुद्धिजीवी हम, वास्तव मं होवत गद्दार
अन्यायी ला मुंह मं बकथन, मगर कर्म ले लेथन पक्ष.
शोषक के चुंगल फंसथन तब, आत ठिकाना भ्रमित दिमाग
तब शोषक संग टक्कर लेथन, पीयत पसिया तक ला त्याग.”
बइसाखू, मींधू ला पूछिस -“”काबर करत हठील के खोज
तंय कर्तव्य करत हस पालन, या फिर लेवत हस प्रतिशोध ?”
मींधू कहिथय- “”का उत्तर दंव- पर अतका हे निश्चय बात
बस हठील के बुता बनाहंव, अर्जुन बेधिस चिरई के आंख.”
मींधू ओ अस्थान ला छोड़िस, अपन लक्ष्य करना हे पूर्ण
ओकर मन हा बायबियाकुल, काबर अब तक अधुवन काम !
अउ हठील स्वारथ पूरा बर, लुका चलत शतरंजी चाल
जस महाभारत के दुर्याेधन, छुपे सुरक्षित भीतर ताल.
मींधू हा नंदले तिर पहुंचिस, नेमिस -“”मोर बात ला मान
तंय पचकौड़ पास जा झपकुन, उहां ज्ञात कर ओकर पोल.
तोला यदि रुपिया मिल जावय, निरपराध के लेथस प्राण
चुनू तोर जीवन ला राखिस, तेला भेजेस मरघट घाट.
नशा जिनिस पचकौड़ बेचथय, ओकर पास लबालब नोट
ओकर तिर ले तंय ले रुपिया, एकर साथ भेद ला जान.
मोर पास सब भेद ला फुरिया, मंय करिहंव करतब के काम
सब अपराध खतम कर देहंव, दुश्मन के रगड़ा ला टोर.”
नंदले छरकिस -“”कहि दूसर ला, तोर बात हे अस्वीकार
तस्कर क्रूर निर्दयी होथंय, बिन डर करत नशा व्यापार.
तंय पचकौड़ के नाम ला लेवत तेमां कांपत पोटा ।
अगर मोर ले बुता कराना भेज दूसरा कोती ।।
वास्तव मं नंदले थर्रावत, हुंकी भरे बर हटत जबान
तंह मींधू हा धमकी देथय, तब नंदले होवत तैयार.
नंदले हा पचकौड़ के तिरगिस, अपन प्रशंसा करथय खूब-
“”काम मंगे बर मंय आये हंव, मोला अपन पास तंय राख.
सब आदेश के पालन करिहंव, कुछ भी करे सदा तैयार
कर विश्वास मोर ऊपर तंय, दुहूं परीक्षा मुड़ के भार.
अगर तोर दुश्मन एकोझन, ओकर करिहंव खुंटीउजार
चुनू ला तंय टकटक जानत हस, मिंही हरे हंव ओकर जीव.”
नंदले दीस उल्थना कइ ठक, तंह पचकौड़ करिस विश्वास
नंदले ला रख लीस अपन तिर, करे अपन ला बिन्द्राबिनास.
बोलिस -“”मोर शत्रु बस मींधू, ओहर परत काम मं आड़
ओहर यदि जग ले हट जातिस, मोरो हटतिस बिपत पहाड़.”
नंदले कथय -“”कसम नइ खावंव, लेकिन एक रिवाल्वर देव
तोर काम के दिन मं पूरा, एकर भेद पूर्व झन लेव.
तोर आड़ ला हटा के रहिहंव, शंका हवय तेन ला टार
बोइर खाय से तंय मतलब रख, गुठलू ला दुरिहा मं फेंक.”
नंदले उंहे रहत हे हिलमिल, जांच करत पचकौड़ के काम
नशा जिनिस ला कतिहां रखथय, कइसे करथय काम अवैध !
एक दिवस जामिल परगे अउ, लैस अंजोरी ला पचकौड़
कहिथय -“”तंय हा काम के लाइक, तोला छोड़ा अपन तिर लाय.
नेता मन आपुस मं लड़थंय, युद्ध होत अपराधी बीच
मोर – हठील बीच झगरा हे, वाकइ मं हठील हे नीच.”
कहि पचकौड़ सांत्वना देवत, लेकिन चलत कपट के चाल
चुप हठील ला बलवा लेथय, अ‍ैस हठील हा बन के काल.
तभे हठील, अंजोरी ला बोलिस -“”जउन बात बोलिस पचकौड़
ओमां मंय संशोधन करिहंव, अपन दिमाग लेग झन और.
अपराधी आपुस मं लड़थंय, पर होवत उंकरे नुकसान
एमन दुनों एक होथंय तंह, दोगला के लेवत फट प्राण.
दुकली संग संबंध करेंव मंय, ओतकिच मं तंय हठ धर लेस
मींधू तिर सब राज फोरे हस, तब तंय भोग करम के डंड.”
धरिन अंजोरी ला जबरन अउ, ओला देवत नशा पदार्थ
करत अंजोरी अड़बड़ छटपट, पर नइ होवन पात अजाद.
आखिर ओकर जीव निकलगे, जग ले बूझिस नाम के दीप
अब पचकौड़ – हठील आनंदित, देन भेदिया ला हम लीप.
जे अपराध कर्म ला करथय, ओकर होत विचित्र सुभाव –
अपन स्वार्थ तक सब ला मानत, कहिथय – तंय अस भाई मित्र.
पर कोई विरोध मं जाथय तंहने करथय बूता ।
ओकर जान आम अस चुहकत फेंक देत हे गोही ।।
नंदले क्रूर दृष्य ला देखिस, ओकर रुंआ हा होगे ठाड़
किम कर्तव्य उपाय दिखत नइ, ना चिल्लान सकिस मुंह फांड़.
नंदले हा मींधू के तिर गिस, जमों खभर दिस ओकर कान
मींधू फट तैयारी करके, अब पचकौड़ के घर मं गीस.
हे पचकौड़ निफिक्र निघरघट, जानत कहां आत मुड़ काल
मींधू अउ आरक्षक देखिस, उहां ले भागत जीव सम्हाल.
मींधू हा हठील ला देखिस, मींधू ओतन दउड़त खूब
पर हठील हा बोचक भगागे, मींधू के मुख्य लक्ष्य अपूर्ण.
समय अमर पचकौड़ हा भागत, आय युद्ध के क्षेत्र ला छोड़
मींधू ओला मरत कुदावत, हार जाय झन चलत जे होड़.
मरो जियो पचकौड़ हा तरकत, छत के अंतिम सिरा समाप्त
तंह पचकौड़ छत ले गिर जाथय, निकलिस लादीपोटा जीव.
मींधू हा धथुवा के रहिगे, पर ओकर मन मं संतोष-
मंय हा अस्त्र प्रयोग करेंव नइ, होगिस खतम पाप के मूल.
उंहचे माद्रक द्रव्य हे जतका, सबला करिस अपन अधिकार
सबो जिनिस दिस शासन हक मं, बाद गीस दुकली के द्वार.
दुकली अपन मकान मं हाजिर, एक व्यक्ति ओकर नजदीक
लगथय- ओहर आय गंवइहा, जेकर बचन सुहावन नीक.
मींधू हा ग्रामीण ला पूछिस -“”तंय हा फुरिया नाम मुकाम
दुकली से मतलब का तोला, इहां आय हस धर का काम ?”
दसरूखुद के परिचय देथय -“”मंय हा बसत करेला गांव
मोर नाम दसरूए सुन लव, अभी कुंवरबोड़का तन मोर.
तोला जम्मों भेद बताहंव, मंय हा फोर कहत सच गोठ
पर तोला बिलमे बर परिहय, छिन मं उठन पाय नइ कोठ.
हमर गांव के तिर सुन्तापुर, उंहचे एक धनी इंसान
ओकर धनवा नाम हे सुन ले, जेन श्रमिक पर करथय राज.
उहिच गांव मं एक अउ मनखे, झड़ी नाम ओकर तंय जान
ओहर जहां धान ला मींजिस, होगे एक अनख अस काम.
धान रास तिर झड़ी हा बइठे, नापत रिहिस कमइ के धान
ओकर तिर धनसाय हा पहुंचिस, झड़ी ला बोलिस टांठ जबान.
अपन बिखेद ला कार लमावंव, धनवा करदिस अत्याचार-
छीनिस झड़ी के धान ला जबरन, ऊपर ले मारिस चेचकार.
झड़ी तप करे जे वस्तू बर, ओहर होगे हाथ बेहाथ
चरिस वृद्ध ला फिकर के घुन हा, आखिर ठग दिस ओकर प्रान.
सुन्तापुर के तिर मं रहिथंव, झड़ी के संग मं रिश्ता मीठ
ओला नता मं मोसा मानंव, याने रिहिस मधुर संबंध.
मरे के पहिली मोला बोलिस -“”तंय करबे गत किरिया मोर
गंगा भले पहुंच झन सकबे, राजिम करबे अस के त्याग.”
अंतिम इच्छा रखिहंव कहि मंय जावत राजिम कोती ।
लेकिन इंहे रेलटेसन मं मोर कटागे खीसा ।।
जउन बखत नइ वाहन सुविधा, अस ठंडा होवय शिवनाथ
पुरखा के अस धर के जावंय, दुरिहा तिर के धनी अनाथ.
धथुवा गेंव बिना रुपिया मंय, जान सकत नइ राजिम तीर्थ
मंय शिवनाथ नदी अमरे हंव, निपटा देंव अपन जे काम.
तभे अचानक ताड़ परेंव मंय- उबुक चुबुक एक टूरी होत
नीरधार संग उहू बोहावत, बुझे चहत जीवन के जोत.
मंय हा तउर गेंव ओकर तिर, बाहिर लाय झींक के बाल
पूछेंव -“”कइसे नदी मं गिरगे, सच फुरिया घटना के हाल-
मरे के परीक्षा देवत हस, या दुख कारण देवत प्राण
या चलचित्र के अभिनेत्री अस, करत हवस तंय अभिनय झूठ?”
दुकली मोरे पर भन्नागे -“”होगे पूर्ण जिये के साद
तंय हा कहां मोर मन्सरुवा, चिभिक लगा के करत सवाल !
डाका परिस मोर इज्जत पर, मोर भविष्य कुलुप अंधियार
शीलहरण के कथा फइलगे, सत्य जान अपनाहय कोन !
मंय हा बिना अधर होगे हंव, मोर चरित्र घलो बदनाम
थुवा थुवा सब मनसे करिहंय, मरना उचित दिखत सिरतोन.”
“”तंय हा बुद्धिमान लड़की अस, कार करत कायर के काम
जग ला देखा-देखा के साहस, खींच शत्रु के जीयत चाम.
नीच के बुढ़ना ला झर्रा भिड़, करतब ले झन ले कल्दास
अपन जिन्दगी के उन्नति कर, मन मं करिहय शांति निवास.”
मंय उल्थना देंव दुकली ला, पर घेक्खर हा दीस उदेल
“लात के देव बात नइ मानय, सोच के थपरा गाल मं पोय.
भड़केंव -“”तोर जीव यदि जावत, मोला पकड़ लिही कानून
बला डार झन मोर मुड़ी पर, जीवन बचा फिकर ला फून.”
दुकली के चेचा पकड़ेंव अउ, ओकर घर मंय लाय बलात
यदि मंय हा कुछ कहत लबारी, दुकली ला पूछव सच तथ्य ?”
मींधू हा कोड़िया के पूछिस, दुकली करिस बात स्वीकार
दसरूके अब होत प्रशंसा – ओहर करे हवय उपकार.
मरिस अंजोरी ते घटना ला, मींधू हा फुरिया दिस साफ
दुकली के दुख हा अउ बढ़गे, दुब्बर पर दू ठक बरसात.
मींधू हा सब बात ला कहिदिस, दुकली हा खुद शक्ति संजोय
क्रूर कष्ट ले टक्कर लेवय, निज भावी बर लाय प्रकाश.
मींधू दसरूउहां ले निकलिन, तंह मींधू हा रखिस सलाह –
“”दुकली के जीवन राखे हस, तोर ले मंय हा खुश अंधेर.
मोर एक अउ बात ला सुन ले- तंय दुकली संग कर ले ब्याह
जोड़ी तुम्हर बने अस जंचिहय, कर स्वीकार बढ़ा उत्साह.
तंय हस दुकली पर आकर्षित, दुकली करत तोर संग प्यार
अगर तुम्हर रिश्ता जुड़ जाहय, जीवन हा चल जहय सुचारू.”
दसरूकथय -“”कथा इहि आवत, लड़की ला बचात हे तेन
ओकर साथ बिहाव रचाथय, या जोड़त बहिनी सम्बन्ध.
उहिच कथा मं मोला फांसत, तभो करत हंव मंय सिवकार
पर दुकली ला पूछ ले पहिली, ओकर मन मं काय विचार !
काबर के मंय हा देहाती – दुकली हा शहराती ।
अगर गांव के बिपत झेलिहय खावय मिल के बासी ।।
मींधू कथय -“”ठीक बोलत हस, सब झन लेत गांव के पक्ष
उहां बसे बर पोटा कंपथय, हर प्रकार मिलथय तकलीफ.
मंय हा दुकली ला पूछत हंव, तंहने खभर दुहूं मंय बाद
तुम दूनों के मन मं सुम्मत, जीवन ला मिलही उत्साह.”
दसरूहा खुश होके लहुटत, तंह बुल्खू संग होथय भेंट
दसरूहंसिस -“”शहर मं किंजरत, याद करे कर गांव के राह.
पहरूला तंय टकटक जानत, जेहर आय सड़क मजदूर
तोर याद ला मरमर करथय, ओकर संग कर ले मिल भेंट.”
बुल्खू कथय -“”खूब जानत हंव, पहरूकरत हे काबर याद
मंय हा डोंगरगढ़ अभि जावत, उहिच श्रमिक के धर के काम.
लेकिन असल बात का फोरंव – कृषिक श्रमिक के करत सहाय
पर चुनाव हा आथय तंहने, मंय हा खाथंव धोखा खूब.
याने मंय चुनाव जब लड़थंव, होथय जप्त जमानत मोर
उही किसान श्रमिक मन हा भिड़, मोर विरोधी ला जितवात.”
बुल्खू हा दसरूला छोड़िस, टेसन अमर बइठ गिस रेल
मनखे के हे भीड़ गंसागंस, जेला कहिथंय रेलमपेल.
लौह पांत पर रेल हा दउड़त, अंदर चलत टिकिट के जांच
जे मनसे तिर टिकिट हा नइये, टिकिट निरीक्षक हेरत कांच.
टिकिट निरीक्षक, फत्ते तिर गिस, ओला करिस टिकिट के मांग
फत्ते हा गिंगिया के बोलिस -“”साहब, सुन लव मोर बिखेद –
मंय हा रेल चढ़े बर आएंव, पर छुट के रेंगत हे रेल
टिकिट कटाय समय नइ पाएंव, बिना टिकिट बइठे हंव दौड़.”
टिकिट निरीक्षक गरजत बोलिस -“”जब गल्ती होगे हे तोर
तंय हा रुपिया हर्जाना भर, फिर गंतव्य अमर निर्बाध.”
फत्ते हा रुपिया ला गिन दिस, साहब भरिस अपन भर जेब
फत्ते ला रसीद नइ देइस, मानों रेल हा ओकर आय.
हाजिर उंहे पुरानिक मंसा, कथय निरीक्षक कड़ा अवाज –
“”तुम्मन मोला टिकिट देखावव, या नइ तब रुपिया गिन देव.”
मंसा कथय -“”बहुत निर्धन हन, तभे टिकिट कटवा नइ पाय
तोला रुपिया कहां ले देवन, हमर देख ले रीता जेब.”
टिकिट निरीक्षक रौब ला झाड़त -“”शासन ला तुम देवत हानि
याने तुम अपराध करत हव, तुमला मंय भिजवा हंव जेल.”
किहिस निरीक्षक ला बुल्खू हा -“”नोट पाय तेला धर लेव
मगर बेटिकट ला जावन दे, ओमन ला भेजव झन जेल.
या एमन ला जेल मं भेजत, तब तुम देवव काटरसीद
यात्री अउ तुम लाभ ला बांटव, या फिर पाव दुनों नुकसान.”
टिकिट निरीक्षक खखुवा बोलिस -“”तंय हा देख अपन भर काम
शासन के मंय काम करत हंव, ओकर बीच पार झन बेंग.”
तभे अधीक्षक साहब आथय, कथय निरीक्षक ला कर रोष –
“”बुल्खू तोर लाभ बर बोलिस, पर तंय कहां करे हस मान !
मोर ब्रह्म आज्ञा ला अब सुन- तंय फत्ते ले रुपिया लेस
ओकर फट रसीद ला काटव, शासन ला दे आर्थिक लाभ.
हें बिन टिकिट पुरानिक मंसा, उंकर टिकिट ला तंय हा काट
ओकर रुपिया तक ला तंय भर, ओमन ला दे प्राप्ति रसीद.
मंय हा तोर लाभ हित चाहत, तभे देंव कमसल अक दण्ड
अगर मोर कहना नइ सुनबे, होही तोर गंज नुकसान –
तोला मंय कर दुहूं निलम्बित, पाछू चल होबे बर्खास्त
इहां के यात्री तोर विरोधी, साक्षी बनहीं तोर खिलाफ.
तंय हा निरपराध अंव कहिबे, रक्षा बर रखबे कइ तर्क
लेकिन तोर नौकरी जाहय, मुड़ धुनधुन पछताबे खूब.”
टिकिट निरीक्षक पानी बनगे, धरिस अधीक्षक के सब बात
प्राप्ति रसीद चटापट काटिस, फत्ते ला अमरिस तत्काल.
अब बच गीन पुरानिक मंसा, उंकरो रुपिया ला भर दीस
टिकिट निरीक्षक के दुख कटगे, ओहर लेवत सुख के सांस.
डोंगरगढ़ हा आ जाथय तंह, बुल्खू उतर जथय तज रेल
होवत श्रमिक के बइठक जे तिर, ओतन जावत धर रफ्तार.
आगू तन मिल जाथय पहरु, बुल्खू कहिथय खलखल हांस-
“”दसरूअउ मंय भेंट करेन तब, खूब खाय हन चुगली तोर.
तंय कर क्रोध भगाते दुरिहा, पर सबले पहिली मिल गेस
तुम्हर श्रमिक के बैठक होवत, कतका टेम बचे अउ शेष ?”
पहरूकथय -“”तोर भर देरी, देखत श्रमिक तोर बस राह
तंय हा बइठक ठौर पहुंचबे, तुरुत कार्यक्रम के शुरुवात.
ए बिस्कुटक रगाबग जानत- दूल्हा आवत पकड़ बरात
स्वागत होथय भांवर परथय, पूरा होत बिहाव के नेंग.”
दूनों हंसत ठउर मं अमरिन, तंह होगिस पारित प्रस्ताव
रखिन श्रमिक मन मांग बहुत ठन, बलवन सुना दीस पढ़ साफ-
“”हम कमती वेतन पावत हन, वेतन होय वृद्धि भरपूर
हम्मन सकभर बासी खावन, बालक मन गुण शिक्षा पांय.
जलगस तन मं ताकत रहिथय, शासन लेत मरत ले काम
लेकिन जहां वृद्ध हो जाथन, नइ देवय पेंशन के नोट.
याने होय सुरक्षित जीवन, श्रम के बदला सुख ला पान
बरसा घाम काम ला करथन, तब ओकर संग सुख ला पान.”
तब सिलाल सुन्ता बांधिस – यदि हमर मांग नइ पूरा।
रजधानी मं हुल्लड़ करबो – चूरी फुटे के चूरा ।।
यदि शासन दुत्कार लगाहय, हम भिड़के करबो संघर्ष
करबो बाध्य टेक दे घुटना, झींक लान लेबो सुख हर्ष.”
जमों श्रमिक मन थपड़ी पीटिन, बुल्खू कथय रहव तुम शांत
जे उपाय मं तुम्हर भलाई, करिहंव मदद स्वयं श्रम जोंग.
एक बात के सुरता कर लव – हम्मन रखे अभी जे मांग
ढारा बइठक मं मांगे हन, होय निवेदन शासन पास.
चलव जमों झन कार्यालय मं, अधिकारी तिर पता लगान-
शासन हमर मांग ला मानिस, या फिर कर दिस अस्वीकार ?”
जमों श्रमिक मन उठ के जावत, लो.नि.वि. कार्यालय तन जल्द
उहां गीन तंह त्रिगुन लिपिक हा, उंकर पास खुद दउड़त अ‍ैस.
कहिथय त्रिगुन -“”बुता जब अरझत, तब हमला करथव बदनाम
लेकिन तुमला लाभ हा मिलथय, हमर जसी काबर नइ गाव !
गारी खाय हवन अतका दिन, पर अब परिवर्तन कर देव –
मुंह मिट्ठी बर मिठई खवावो, एकर साथ करव जयकार.”
पहरूकिहिस -“”बात नइ काटन, हम्मन शर्त करत स्वीकार
पर हम काबर मिठई खवावन, एकर कारण कहि दे साफ ?”
बोलिस त्रिगुन -“”इहां आए हव, अधिकारी तिर तुरते जाव
गुप्त भेद ला खोल बताहय, दिही उही हा शुभ संदेश.”
मंहगू अनुविभागीय अधिकारी, तेकर पास श्रमिक मन गीन
मंहगू हा मुचमुच मुसकावत, मानों श्रमिक के देखत राह.
मंहगू बोलिस -“”तुम्हीं श्रमिक मन, शासन तिर आवेदन देव
तुम्हर मांग पर तब शासन हा, करिस विचार बहुत गंभीर.
जेन मांग ला स्वीकृत देइस, ओला मंय फोरत हंव साफ –
तुम्हर मूलवेतन हा बढ़गे, याने बढ़गे प्रतिशत बीस.
एक बछर मं एके बोनस, घर बनाय बर ऋण बिन ब्याज
तुम्हर पुत्र मन शिक्षित होहंय, शासन लिही खर्च के भार.
पेंशन के बारे मं सुन लव- ओकर पर अभि चलत विचार
हवय भरोसा निश्चित स्वीकृति, तुम्हर भविष्य दिखत हे साफ.”
मंहगू हा प्रमाण नइ देइस बोलिस सिरिफ जबानी ।
बुल्खू ला शंका होइस तंह, पूछत मिट्ठी बानी ।।
कहिथय -“”साहब, तुम बोले हव, तेहर बस मुंह अखरा आय
यदि प्रमाण आंखी मं दिखतिस, तुम्हर बात होतिस विश्वास.”
होय श्रमिक के मांग हा स्वीकृति, ओकर आय हवय आदेश
ओकर प्रति ला मंहगू हेरिस, पढ़ के सुना दीस चट साफ.
कहिथय -“”अउ प्रमाण सच लेवव, तुम सब चलव मोर अनुसार-
वेतन वृद्धि होय जे रुपिया, ओला मंय हा निकला देंव.
तुम्मन त्रिगुन लिपिक तिर जावव, नगद नोट ओकर तिर लेव
रिता खिसा ला खसखस भर लव, इहां ले हांसत वापिस जाव.”
सुनिन श्रमिक मन खुशखबरी ला, अचरज मिश्रित होवत हर्ष
गीन श्रमिक मन त्रिगुन के तिर मं, ओकर तिर ले रुपिया लीन.
बोले त्रिगुन मिठई लाने बर, ओकर अर्थ समझ अब आत
पाय श्रमिक मन लाभ मं रुपिया, बोले हवय त्रिगुन हा ठीक.
जमों कमइया के मन खुश हे, उहां ले निकलिन धरथंय राह
बुल्खू कथय- “”जउन बोलत हंव, ओला रखव बांध के गांठ –
हक मांगे बर हे हक तुम्हरे, लेकिन साथ रखव मन धैर्य
पता करव वाजिब स्थिति तब, ओकर बाद धरव तुम राह.
अभिच अगर हालत जाने बिन, कर देतेव अनशन हड़ताल
साथ मं रुपिया हाथ मं मिलतिस, तुम फोकट होतेव बदनाम.
कहितिन लोग – श्रमिक झगड़ालू, इनकर पक्ष भूल झन लेव
एमन झोरत नंगत रुपिया, तभो जोम कर लड़ई उठात.”
पहरूकिहिस -“”ठीक बोलत हस, नेक सलाह आज तंय देस
तोर बात ला सुन रेंगे हन, शांति साथ निपटिस सब काम.
जब सब काम खुशी मं निपटिस, अब मंय रखत अपन प्रस्ताव-
जब हम डोंगरगढ़ आये हन, एक काम शुभ अउ कर लेन.
इहां हवय प्रकृति के मंदिर, जेकर नाम सुयश विख्यात
ओकर दर्शन चलके कर लव, अइसन बखत फेर नइ आय.”
जमों श्रमिक धार्मिक स्थलगिन, हर्षित होत देख के बाग
कतको किसम फूल फल बेला, मन ला मोहत देत सुगंध.
चिरई उड़त चिंवचिंव नरियावत, भौंरा फुरफुन्दी उड़ियात
शेर मंजूर भठेलिया हरिना, दउड़त खूब कदम्मा मार.
किंजरत उहां दर्शनार्थी मन उंकर हृदय खुशियाली ।
चिंता मुक्त प्रफुल्लित हे मन हरा भरा हरियाली ।।
सब मजदूर मूर्ति के तिर गिन, प्रकृति मां के दर्शन लेत
ओकर रुप करत आकर्षित, रुप कर्म के दू ठक रंग.
देवी दिखिस एक कोती ले- मुसकावत देवत हे स्नेह
दूसर डहर क्रोध हा भड़कत, घृणा करत पहुंचावत हानि.
रिहिस पुजारी तेकर तिर मं, रखिस सिलाल हा कड़ा सवाल-
“”भइया, हमला राज ला फुरिया, प्रकृति के काबर दू रुप ?”
किहिस पुजारी हा कोमल स्वर -“”देखत हवस तेन सच आय
प्रकृति के स्वरुप दू होथय, जइसे सत्य करूअउ मीठ.
एके हाथ अस्त्र विस्फोटक, जेहर करथय नष्ट तबाह
ज्वालामुखी प्रलय दुर्घटना, सूखा बाढ़ मृत्यु भूकम्प.
दूसर हाथ फूल अन राखे, जेहर बांटत जीवन प्राण
औषधि अन्न सुकाल सुवर्षा, सुख सम्पन्नता खनिज पदार्थ.”
तभे अ‍ैस बेदुल उनकर तिर, जेहर करत क्रांति के काम
मनखे के जमघट ला देखिस, क्रोध देखाथय बन के क्रूर.
ओमन ला सम्बोधित करथय -“”भरे तुम्हर मं अति अज्ञान
रूढ़ीवादी अंधविश्वासी, बिन उद्देश्य चलत हव राह.
प्रकृति ला देवी मानत हव, करथव पूजा आंखी मूंद
जेहर भौतिक रुप मं हाजिर, देवत हव आध्यात्मिक रुप.
इही किसम ईश्वर नइ होवय, सच मं ओकर नइ अस्तित्व
पर ईश्वर पर करत भरोसा, अउ अस्तित्व करत स्वीकार.
याने तुम गल्ती रद्दा पर, पर ला घलो करत पथभ्रष्ट
एकर फल तो मिलना चहिये, तुम सब हवव मरे के जोग.
तुम्हर जान के मृत्यु हो जाहय, खबर पहुंचिहय सब के पास
ओमन तुम्हर राह नइ धरिहंय, रुढ़िवाद के करिहंय त्याग.”
बेदुल पास शक्तिशाली बम, तेकर करना चहिस प्रयोग
तभे अ‍ैस बुल्खू ओकर तिर, बन के नम्र निकालिस बोल-
“”करत भरोसा मंय तोर ऊपर, मोला तंय जानत हस खूब
कारागृह मं बंद रेहेंव मंय, मोर साथ तंय करे निवास.
मोर बात सुन चिभिक लगा के, अपन हृदय मं करव विचार
तंय बम के उपयोग ला झन कर, झन हो पाय नष्ट विध्वंश.”
बेदुल किहिस -“”पूर्व परिचित हस, तब मंय करत तोर सम्मान
जेन तथ्य तंय रखना चाहत, मोर पास मं रख दे खोल.”
बेदुल के तिर विध्वंशक बम, रोक दीस ओकर उपयोग
जब विध्वंश त्राहि हा रुकगे, बुल्खू हा अब रखत सुतर्क –
“”ठंउका मं प्रकृति हा सच ए, ओकर मं समाहित संसार
ओकर मान करे बर परिहय, श्रद्धा होय या लागय क्रोध.
एक गोठ ठंउका बोले अस- ईश्वर के नइये अस्तित्व
ओहर कभु जग मं नइ आइस, कोई ला दर्शन नइ दीस.
ईश्वर ला खोजे बर जावव, मर मर जोंगव पूजा पाठ
ओकर साथ भेंट नइ होवय, तुम्हर उदिम बह जाही व्यर्थ.
लेकिन एक बात हे एमां, मानव के मन मं विश्वास
ईश्वर के अस्तित्व हा नइये, तब ले करत बहुत विश्वास.
यदि विश्वास होत हे खण्डित, मनसे धरिहय आस्तिक रुप
हमर साथ झगरा मं भिड़िहय, हमर नाम मं नास्तिक रुप.
जउन जिनिस मानव सिरजाथय, ओकर साथ करत हे प्रेम
कोई ओकर करत हइन्ता, मानव करत युद्ध कर क्रोध.
एकर ले उत्तम ए रस्ता – ईश्वर ला मानत हे जेन
ओकर झन आलोचना होवय, ओला करन देव विश्वास.
जेहर ईश्वर ला नइ मानत, ओकर हम झन कर विरोध
ओहर ईश्वर ला मानय कहि, हम हा कभु झन करन दबाव.
एकर ले फल लाभ मं मिलिहिय, नइ हो पाय लड़ई तकरार
आपुस मं सहयोग मित्रता, सुख ला पाहय जमों समाज.
खुद ला उच्च प्रमाणित होए, पर ला देन हानि बदनाम
यद्यपि लाभ पाय थोरिक छिन, लेकिन बाद गलत अन्जाम.
धार्मिक पुस्तक ला बारे हन, एहर घलो कुजानिक काम
पहिली के इतिहास बताथय, ओकर ले हम पात विकास.
“मूर्ति टोरबो मंदिर गिरवा, करे हवन निर्दयी अस गोठ
हमर विरुद्ध गीन सब कोई, खुद के शत्रु बनेन निज हाथ.
आस्तिक नास्तिक बन के झगरत, हम खुद पावत हन नुकसान
तर्क कुतर्क परे रहिथन तब, अपन हाथ जाथन शमसान.
कोनो हा आस्तिक नइ होवय, अउ कोनो नइ नास्तिक ठोस
कर्म समय उद्देश्य हा बदलत, बस ओकर अस वाद विचार.
जे मनसे हा आस्तिक होथय, यदि ओहर मंदिर नइ जाय
ओहर पूजा पाठ करय नइ, तभो कहाहय आस्तिक शुद्ध.
नास्तिक मन मंदिर जा सकथंय, संस्कृति कला करे बर ज्ञान
धार्मिक पुस्तक ला पढ़ सकथंय, जाने बर पूर्व के इतिहास.
हर के आस्था मानवता पर, करथंय सब प्राणी पर प्रेम
ककरो अहित भूल नइ सोचंय, चलथंय सदा नीति के नेम.
चन्दा बेर कुथा कूथा हें, एक गरम हे दूसर जूड़
देवत सुरुज लकालक गरमी, चंदा देवत शीतल शांति.
लेकिन दूनों झन ऊथंय तब, जग के करथंय शुभ कल्याण
दूनों के आवश्यकता हे, दूनों बिन हे जग अंधियार.
आस्तिक नास्तिक शत्रु कहाथंय, ऊपर दिखथय खाई।
मगर भेद एकोकन नइये, दूनों हें सग भाई ।।
बुल्खू हा बेदुल ला बोलिस -“”धरे हवस तंय घातक चीज
घेक्खर बन प्रयोग यदि करबे, पावन ठौर बिछत हे लाश.
एकर अर्थ साफ अब झलकत- शोषक देख डरत दम तोर
तंय संघर्ष से घबरावत हस, तभे धरत हत्या के राह.
तंय हा खुद मं अउ दूसर मं, समझत हस नंगत अक भेद
खुद ला कथस क्रांतिकारी अउ, पर ला शोषक जग के भार.
तभे मचाना चहत तबाही, पर मन शुद्ध ले करव विचार
दूसर तोर भेद कुछ नइये, ना तंय ऊंच ना ओमन हीन.
अइसे मं यदि बम ला पटकत, दूसर मन के खत्तम मौत
लेकिन तंहू बचन नइ पावत, उंकर साथ मं तोरो मौत.
तंय मंय पिनकू जेल मं बंदी, उहां बनाय नेक अस नीति –
हिंसा तज लड़बो दुश्मन संग, तभे पहिरबो जीत के हार .
मोर बात ला अंदर मन मथ, ओकर बाद सत्य खुद खोज
मंय विश्वास तोर पर राखत- मोर बात नइ सकस उखेल.”
बुल्खू के सलाह हा जंचथय, तंह बेदुल के लहुटिस चेत
बम ला लुका बैग मं रखलिस, बम उपयोग रुकिस तत्काल.
बेदुल कथय- “”चहत हस तंय हा- छोड़ंव हिंसा खून के राह
किरिया खाय बाध्य नइ लेकिन, करिहंव उदिम अमल मं लाय.”
एकर बाद श्रमिक बेदुल मन, वापिस जाय हटा दिन गोड़
बुल्खू रेल्वे स्टेशन जावत, मगर बीच दुर्घटना एक.
आगुच मं हठील आ जाथय. जेकर हाथ एक पिस्तौल
कहिथय – “”जननेता अंव कहिथस, कहां भगागे जनता तोर ?
खुद के जीवन बचा रखे बर, अपन सहायक मन ला लान
छेरकू ले दुश्मनी रखत हस, तब मंय लेत तोर अब प्राण.”
बुल्खू हा अचरज भर देखत- कते डहर के संउहत काल
यद्यपि हृदय कंपकंपी होवत, मगर वचन ला ढिलत सम्हाल-
“”मंय छेरकू ले हार खाय नइ, पर घुटना टेकट हंव आज
ओहर सम्मुख आय ले भागत, लेकिन अपन काम करवात.
मंत्री के विरोध मंय करथंव, ओहर बस सैद्धान्तिक आय
मंय हा पर ला कभु नइ भेजंव – ओकर बुता दे जीवनदीप.
पर तंय उभरउनी ला मानत, तब मंय बात रखत बस एक-
जब तंय जीवन देन सकस नइ, काबर ककरो जीवन लेत ?”
बुल्खू केंघर मरत समझाइस, पर हठील पर चढ़े हे जोश
ओहर अब पिस्तौल चलावत, झेलत हे बुल्खू निर्दाेष.
बुल्खू कटे वृक्ष अस गिरथय, बाद निकलगे ओकर जीव
जे दूसर ला जीवन बांटिस, खुद चल दिस हिंसा के गाल.
“जेहर पर बर खोधरा कोड़िस, मगर एक दिस खुद गिर गीस’
ए लोकोक्ति समझ मं आवत, फल ला पैस कर्म अनुसार.
पर जे फूल छितत रद्दा पर, कांटा टूटत ओकर पैर
जेन कर्म ले रहत अहिंसक, ओकर तन के हत्या होत.
एमन जनहित काम ला जोंगिन, झेलत कार दुखद परिणाम ?
अगर विश्व मं कोई ज्ञानिक, न्याय साथ दे एकर ज्वाप ?
छेरकू तिर हठील हा पहुंचिस, उहां बता दिस जम्मों हाल
छेरकू हा प्रसन्न हो जाथय- ओकर अरि के खुंटीउजार.
एक विदेशी उंहचे पहुंचिस, कहिथय -“”तंय हा करे पुकार
तब मंय तोर पास आये हंव, मोर काम ला कर दे पूर्ण.
भारत के रहस्य जतका अस, अति महत्व के दस्तावेज
आर्थिक भेद महत्व के जगहा, जमों सूचना नक्शा चित्र.
लेकिन एक बात तंय फुरिया – रहिथय गुप्त इंकर सब भेद
तब तंय कहां ले देवन सकबे, पहिली मिटा दे शंका मोर.”
छेरकू बोलिस -“”शंका झन कर, मोर बात पर कर विश्वास
मंय मंत्री अंव पद ऊंचा हे, मोर पास हे जम्मों भेद.
ले मंय अभी तोर बूता ला कर देवत झप पूरा ।
तोर मोर मंसा पूरा तंह बाजय खुशी तमूरा ।।
देखव छेरकू के करनी ला, देवत हे भारत के भेद –
एहर चहत मान यश रुपिया, भले देश होवय खुरखेद.
सैनिक केन्द्र रहस्य जे आर्थिक, महानगर इस्पात संयत्र
संसद अन्नागार विमानन, देश के जम्मों गुप्त रहस्य.
धरिस विदेशी नक्शा फाइल, तभे अचानक मींधू अ‍ैस
ओला देखिन जब तीनों झन, उंकर संख उड़ियागे सांय.
मींधू हा हठील ला बोलिस -“”शिक्षा पाय दुनों झन साथ
तेकर कारन प्रेम करत हंव, मोर बात पर तंय रख माथ.
तंय अपराध करे हस कइ ठक, पर अब ओमां मार विराम
तंय कानून साथ झन अब लड़, आत्मसमर्पण कर तत्काल.
यद्यपि मंय पिस्तौल धरे हंव, पर नइ चहत करंव मंय खून
एक बार आदत जंह परथय, तंहने बढ़त ऊन के दून.”
कथय हठील -“”मान लेवत हंव, काबर के मंय अभि मजबूर
यदि तंय आते बस एके झन, मिला के मंय रख देतेंव धूर.
मगर तोर संग आरक्षक दल, जेमन धरे हवंय बन्दूक
तोर बात यदि जड़ ले उदलत, ओमन दिहीं धड़ाधड़ धूंक.”
छेरकू अउर विदेशी मन बर, खुद आगीस लाभप्रद टेम
ओमन जीव बचाके खसकिन, अउ हठील केंघरत गोठियात.
टेकत हवय बात मं घुटना, लेकिन चढ़े खून के रोष
फट हठील पिस्तौल निकालिस, मींधू ऊपर कर दिस वार.
मींधू ला गोली जंह लगथय, कटे वृक्ष अस गिरिस धड़ाम
आरक्षक मन धथुवा देखत, उंकरो अब तक सुन्न दिमाग.
पिलू आरक्षक होश मं आथय, तानिस तुरुत अपन बन्दूक
अउ हठील पर बांध निशाना, ओहर दीस धड़ाधड़ धूंक.
मर जाथय हठील कुछ छिन मं, मींधू घलो त्याग दिस प्राण
हत्या करिस एक झन मनखे, मगर एक होवत बलिदान.
पुलिस विभाग हा गारी खाथय, उही विभाग हवंय कई लोग-
होत देश बर स्वयं खतम पर, अपराधी के टोरत रीढ़.
दू प्रकार जन जग मं दिखथंय – रक्षक भक्षक झूठ ईमान
सेवक स्वार्थी गंध सुगंधित, नेकी बदी मुरुख विद्वान.
पाप पुण्य उपजाऊ मरुस्थल, अन बिख जड़ चेतन दिन रात
क्रांति शांति द्रोहिल जनसेवक, अलग अलग गुन ठंडा तात.
कर्म भेद कारण यश अपयश, मींधू के होवत तारीफ
पर हठील के सुरता आवत, तंह मनखे मन थुंकत खखार.
मींधू के बारे मं बोलत – ओहर जनहितकारी ।
पर हठील पर शोक करत नइ, सब झन देवत गारी ।।

८. अरसी पांत समाप्त

गरीबा महाकाव्य (सतवया पांत : चनवारी पांत)

गांव शहर तुम एका रहिहव राष्ट्र के ताकत दूना ।
ओकर ऊपर आंच आय नइ शत्रु नाक मं चूना ।।
गांव शहर तुम शत्रु बनव झन रखत तुम्हर ले आसा ।
करत वंदना देश के मंय हा करत जिहां पर बासा ।।
ऊगे ठाड़ ‘गाय धरसा’ हा.पंगपंगाय पर कुछ अंधियार
खटियां ला तज दीस गरीबा, पहुंच गीस मेहरू के द्वार.
मेहरु सोय नाक घटकत हे, तेला उठा दीस हेचकार
बोलिस-“तंय अइसे सोवत हस- बेच देस घोड़ा दस बीस.
लगथय- तोर मुड़ी पर चिंता, याने रिहिस बड़े जक बोझ
लेकिन ओहर जमों उतरगे, तब सोवत हस फिक्कर त्याग?”
मेहरु कथय- “ठीक बोलत हस- जानत घुरुवा मन के हाल
उंकर व्यथा ला लिख डारे हंव, होय पाण्डुलिपि तक तइयार.
ओला भेजेंव क्रांति प्रकाशन, पुस्तक हा छप जाय तड़ाक
मोर परिश्रम पाय सफलता, अउ साहित्य नाम चल जाय.
पुस्तक के मंय नाम का राखंव- मंय रहि रहि के करंव विचार
पर अंतिम मुरथम पहुंचे हंव- क्रांति से शांति रखागे नाम.
ठौंका मंय निद्र्वन्द निफिकरी, हे फिलहाल काम सब बंद
तभे नींद गहगट मारत हंव, लेवत कहां उठे के नाम !
हां, अब बता अपन तंय हालत- काबर आय मोर तिर दौड़
मोर पास हे यदि कुछ बूता, तंय बेझिझक भेद ला खोल?”
हंसिस गरीबा-“उंचहा कवि अस, जमों जगह तोरे भर पूछ
हवय भिलई मं कवि सम्मेलन, उहां के श्रोता करत पुकार.
अपन साथ रचना धर के चल, एकोकन ढचरा झन मार
पारश्रमिक मं तोला मिलिहय- कड़कड़ रुपिया आठ हजार.”
मेहरु हा तइयारी करथय, तुंगतुंग जाय पहिर लिस वस्त्र
चलत गरीबा संग लम्हा डग, अपन साथ धर रचना अरत्र.
गीस गरीबा घर मेहरु हा, पर नइ उहां अन्य इन्सान
तभे गरीबा हा पकड़ा दिस, चुंगड़ी एक गंहू ला लान
धरिस गरीबा बइला नांगर, भर्री गिस मेहरु के साथ
ओहर भेद समझ नइ पावत, तर्री अस फइलावत आँख.
बोलिस- “तंय जे काम करे हस, ओकर ले मंय चकरित होय
वाजिब भेद बता दे मोला, ताकि जमों शंका मिट जाय-
फुरिया कहां पढ़ंव मंय कविता, कहां लगे मानव के भीड़
मंय रचना ला काय करंव अब, इहां लाय तंय काबर झींक?”
कथय गरीबा-“”कर नइ पावत, गंहू ओनारी ला मंय एक
तब तोला झींकत लाने हंव, झूठ बोल करके हठ टेक.”
मेहरू कहिथय- “”काम नेक तब, काबर करत व्यर्थ तंय देर
तोर मदद मंय निश्चय करिंहव, हवय समर्थ मोर अभि देह.
कवि मन लोखन के रचना मं, पर ला कथंय-करव तुम काम
मगर स्वयं महिनत ले भगथंय, कथनी करनी पालत भेद.
आज आय बूता के अवसर, मंय नइ लेगंव पाछू पांव
अपन शक्ति भर महिनत करिहंव, देखंव तो श्रम के परिणाम!”
मेहरू बना लीस फट झोली, भरथय गंहू किलो बस तीन
झोली अपन गला मं बांधिस, काम बजाय करत तनतीन.
हल ला जहां गरीबा खेदिस, मेहरू शुरू करिस अब काम
भर भर मुठा गंहू ला ओइरत, याने होत काम नइ ठीक.
नांगर रोक गरीबा बोलिस-“”कवि लेखक मन बहुत उदार
अपन लेख कविता मं तुम्मन, करथव अधिक शब्द के दान.
पर उदारता इहां देखाहव, बिगड़ जही बोये के काम
एक जगह बीजा घन होहय, दूसर जगह परय नइ बीज.
नेत लगा के काम बजा तंय- गंहू गिरा तंय सतत हिसाब
पौधा उगही एक बरन अस, बिरता तक होही भरपूर.”
मेहरू हंफर हंफर के रेंगत चिमिक करत हे बूता।
कवि हा ढेलवाही मं रेंगत बनत जांग के बूता।।
बउग लगा कुंड़ चिरत गरीबा, मुड़ निहरा के कुछ मुसकात
अगर माल के खुर हा छरकत, लानत ठीक तुतारी मार.
सांस पाय बर बीच रूकिन कुछ, मंझन बखत बढ़ागे काम
बिगर बिहाय छोड़ नइ भागिन, यदपि जनावत चड़चड़ घाम.
मेहरू ढलगिस गोड़ ला छितरा, धुंकनी असन चलत हे सांस
कहिथय-“”पता चलिस अब मोला, कइसन होत खेत के काम!
भला थूंक मं बरा हा चुरथय, जांगर हा पाथय कंस कष्ट
तब किसान हा अन्न ला पाथय, जउन ला खाथय सब संसार.”
कथय गरीबा-“”व्यर्थ चढ़ा झन, हम किसान ला उपर अकास
गलत प्रशंसा मं भूले हन, तब तो बनथन भ्रम के ग्रास.
व्यापारी मन अपन जिनिस के, भाव बनात सोच के लाभ
पर किसान मन अपन जिनिस ला, बेंच पाय नइ खुद के दाम.
मर मर अन्न जउन उपजाथंय, मूल्य बनाहंय स्वयं किसान
उही दिवस वाजिब हक पाहंय, बोनस मं मिलिहय सम्मान.”
मेहरू बात दहावत मन मं- किहिस गरीबा बिल्कुल ठीक
ओहर अब उठके घर जावत, काबर के ब्यापत कंस भूख.
मेहरू श्रम के करत प्रशंसा- महिनत ले तन होथय पुष्ट
कभू रोग हा तिर नइ आवय, दवइ दूर भगथय हो रूष्ट.
लेखक यने बुद्धिजीवी मन, काम देख के भगथंय दूर
मांछी ला खेदन नइ पांवय, अपन शत्रु बनथंय खुद हाथ.”
उदुप मेहरू बात ला छेंकिस, आगुच मं धनवा के खार
ओहर काम करत नइ थोरको, बइठे मेड़ पालथी मार.
ओकर चलत जुहा पर नांगर, नौकर मन निपटावत काम
बड़े बड़े बइला छाती भर, ओमन सरलग आगू जात.
नौकर मन हा हल नइ ढीलत, धनवा के डर मं चुपचाप
हरिना रथय बाघ के हक मं, कभू करन नइ सकय विलाप.
घुरूवा के दिन नइ बदलत नइ पावत सुख बरवाही।
कोन बताय एदे दिन उनकर दुख अंधियार भगाही।।
आगू बढ़िन गरीबा मेहरू, पर धनवा के रेंगत काम
ओकर काम खतम ओ बेरा, कातिक गस खा गिरिस धड़ाम.
बउदा हा उठाय बर धरतिस, पर धनवा छेंकिस ललकार-
“”कातिक हा डायल कोढ़िया हे, इसने देथय मुंहू ओथार
यदि मर जहय तभो ले बढ़िया, जीयत तब का देवत लाभ!
अनसम्हार जनसंख्या बढ़गे, दुसरा बर जग चतरा साफ.”
कातिक ला तज सब वापिस गिन, धनवा घर आ जेवन लीस
तंह टहलू ओकर तिर रोवत-“”अपन हाथ लाने हंव काल.
फुलवारी मं घर फूंके हंव, तेकर फल ला भुगतत आज
केंवरी मोला खूब बखानत… मोर धनी ला तंय हा खाय.
हवलदार ला बच जावय कहि, अपन भूमि ला सुपरित देंव
लेकिन ओला मृत्यु लेग गिस, एमां मोर कहां कुछ दोष!
मोर हाथ ले खेत निकलगे, तेकर याद आत दिन रात
तंय खइ देथस काम के बदला, लेकिन भूख मिटन नइ पात.
धनवा के तेवर हा चढ़गिस- “”तंय हा करे धर्म के काम
यद्यपि खर्चा मरत लगे हे, पर अकास तक चलदिस नाम.
हमूं बनाय हवन एक मंदिर, ओमां लगिस कुबल अक खर्च
पर बाजा धर नइ चिल्लाएन, मन मं जमों बात रख लेन.”
धनसहाय हा झन भड़कय कहि, टहलू ढिलिस बात ला मीठ-
“” ठाकुर, मोर प्रार्थना सुन ले, मोला तुम झन समझव ढीठ.
तोर सिवाय मोर नइ दूसर, तंय मारत या राखस जान
मोर बिपत ला तंय हा छरका, धर के आय एक ठक आस-
यदपि कमावत तोर इहां मंय, तंय हा रखे अभी तक पाल
लेकिन पेट तरन नइ पावत, तब मंय बम्बई भगत कमाय.
अड़चन एक आत जमगरहा- टिकिट कटाय नोट नइ पास
मोर सहायक तंय हा बन जा, बदला मं जे चाहत सोंट.”
धनी उच्च पद हें ततका मन, पहिली देखा देत हे क्रोध
लेकिन जहां लाभ हा दिखथय, बात करत मंदरस अस मीठ.
“”तोर मदद मंय करत हमेशा, कब लहुटे हस जुच्छा हाथ
करू जबान दुसर मन देथंय, पर मंय देत अंत तक साथ.
स्वाभिमान हे तोरे तिर मं, बात ले छरकस नइ तिनकाल
मोर पास मं तोरेच घर हे, ओला मोर नाम मं डार.
मोर चौंक के रूप सुधरिहय, तोर सरकिहय अरझे काम
मंय हा फोकट मं नइ मांगत, तोला दुहूं चोख अस दाम.”
टहलू जे घर मुड़ी छुपावत, उही मकान होत बेहाथ
जउन जंवारा ला डंट मानिस, दुख के बखत छोड़ दिस साथ.
धनवा हा घर बिसा लीस अउ गिन दिस ओकर रूपिया।
टहलू हा वापस हो जाथय दुख मं रोवत आत्मा।।
टहलू भिड़ के टक्कर लेवत, धनसहाय के करत विरोध
कूटनीति चल ओला खेदत, तुरूत छोड़ात शत्रु ला गांव.
कातिक हा भर्री ले लहुटत, टहलू संग हो जाथय भेंट
टहलू किहिस-“”गांव छोड़त हंव, मोर इहां ले मटियामेट.”
कातिक बोलिस- “”तोर असन मंय, सक ले अधिक पात तकलीफ
लेकिन कभू गांव नइ छोड़ंव, करना हे शोषक ला नाश.”
कातिक हा धनवा घर जाथय, धनवा हा तिर मं बइठैस
बहुत प्रेम से बात चलावत, करत प्रशंसा चढ़ा अकास.
धनवा हा फगनी ला बोलिस- “”भूख मरत कातिक के पेट
एकर खाय हेर तंय जेवन, एकोकनिक समय झन मेट.”
फगनी हा कातिक ला देइस, बने जिनिस ओकर भरभेट
कातिक ओंड़ा आत ले खाइस, पुन& कमात क्रोध ला भेट.
टहलू बोधनी गांव ला छोड़त, उंकर कहां हे खार मं खेत
सुन्तापुर ले नता हा टूटत, दुख अउ चिंता जिव ला लेत.
मेहरु तिर टहलू हा बोलिस-“काय कहंव मंय अपन बिखेद
एक सुजी भर भुंइया तिर नइ, खुंटीउजार होय घर खेत.
मुम्बइ मं मिलिहय बूता धन, काम करे बर श्रमिक बलात
मोर असन अउ कतको मनसे, गांव छोड़ बस उंहे भागत.
इहां करत हम काम मरत ले, पर पसिया बर होत अभाव
लेकिन बम्बई मं मिल जाहय, जीवन के रक्षा बर दाम.”
मेहरु किहिस- “”सत्य बोलत हस, पर बर्बाद होत हे देश
नगर मं बाढ़त भीड़ रात दिन, मनखे बिगर गांव सुनसान.
बिन मजदूर अन्न नइ उपजय, लगे हवय तुम पर सब भार
जमो श्रमिक मन गांव ला त्यागत, कोन कमाहय खेत कोठार!”
डकहर हा टहलू ला ठेलिस-“”यदि विचार तब निश्चय भाग
खजूर के एक गोड़ हा टूटत, तब ले ओहर रेंगत खूब.”
मेहरु छरिस-” भगत हें मनसे, मरघट असन सांय हे गांव
दुसर भरोसा तीन परोसा, चिखला परिस तोर कभु पांव!
भाव बढ़ाके जिनिस ला बेचत, बइठ के झड़कत किसमीस दाख
केंदुवा चरत परिश्रम ला कर, तब तंय खरथरिहा हुसनाक.”
डकहर किहिस- “ज्ञान झन बांटव, कर डारेंव बम्बई मं काम
ओकर फल ला अब पावत हंव, खात पेट भर पात अराम.”
डकहर अपन प्रशंसा करतिस मोटर आगे गप ले।
टहलू बोधनी दूनों चढ़गिन मोटर मं टपझप ले।।
डकहर खड़े दांत ला पीसत, चहत उतारे बर अउ झार
मेहरु हा हटगिस ओ तिर ले, डकहर हा लहुटत मन मार.
झंगलू शिक्षक लकड़ी चीरत, डकहर कहिथय ओला देख-
“अइसन बुता खभय नइ तोला, एको झन नइ बोलंय नेक.
कुर्सी टोर के वेतन लूटत, काबर देत देह ला कष्ट
पर के पास काम ला करवा, अपन बइठ के बढ़िया खाव.”
“”तोर अतिक मंय कहां कमावत, जेमां करंव नोट ला नाश
महिनत मं तन फुरसुद रहिथय, श्रम ला देख भगत हे रोग.”
झंगलू छोड़िस व्यर्थ उलझना, रखिस अपन तिर कड़ा जुवाप
ततके मं केवरी हा पहुंचिस, फिकर मं जेकर हाल खराब.
केंवरी हा डकहर ला बोलिस- “”तुम्मन सुन लव मोर बिखेद
मोर साथ उठमिलवइ करथय, जबकिन मंय ओला सुख देत.
तुम ओला थोरिक समझ देव, ताकि होय झन व्यर्थ नराज
बुतकू मोर मया नइ छूटय, सत्य कहत हंव तज के लाज.”
डकहर भगिस- “”परंव नइ फरफंद, हमला तंय ढाठी झन डार
पर के न्याय ला काबर टोरंव, दूसर तिर तंय मार पुकार.
बुतकू के आदत मंय जानत- ओहर बहुत बण्ड इंसान
तुम्हार बीच यदि न्याय भंजाहंव, बुतकू हा चढ़िहय मुड़ मोर.
मंय बिसाय ओकर बइला ला, तब के जानत ओकर हाल
स्वयं कुजानिक काम ला करथय, पर दूसर पर डारत दोष.”
डकहर भड़क उहां ले सल्टिस, केंवरी खड़े मुड़ी गड़ियाय
झंगलू हा केंवरी घर जाथय, सास बहू के लड़ई मड़ाय.
बहुरा वृद्धा हा सच बोलिस- “”बुतकू केंवरी करत अनर्थ
देवर भउजी आय दुनों झन, मगर धर्म तज करत कुकर्म.
हवलदार के व्यथा ला जानत, पुत्र आस मं जीवन दीस
ओकर सुरता आवत जे छन, आत्मा मं बरछा के मार.
केंवरी बिन पति के रांड़ी हे, रहिना चहिये बन गंभीर
लेकिन हंसत पेट भर खावत, अपन चरित्र के खोलत पोल.”
झंगलू हा पर जथय दुसंधा, कइसे टोरय न्याय विचित्र
रहड़ा धर के बुतकू आइस, इनला देख के रोकत पांव.
झंगलू गुनिस- उदुप आ जाथय, कठिन प्रश्न हा जाल समान
जउन गुणी ला छांद के राखत, उबर जाय बर बुद्धि नठात.
खाय पिये निश्चिंत जिये बर सब झन हें अधिकारी।
यदि केंवरी के मन आनंदित कार बनंव मंय आड़ा।।
एकर प्रेम चलत बुतकू संग, यदि छोड़त हंव उनकर साथ
केंवरी के चरित्र अउ गिरिहय, तंहने सकिहय कोन सम्हाल!
विधवा व्याह मान्यता पावत, एहर बांटत नवा प्रकाश
बहुरा आय पुरातन मनखे, मंय समझांव धर्म अनुसार.
झंगलू हा बहुरा ला बोलिस- “”बीच मं भेंगराजी झन पार
देवर भउजी संग मं रहिथंय, तब तंय मुंह ला झनिच ओथार.
असल मं सड़पत हे तोर ऊपर- जग के डर मं फिकर के रोग
मगर चुरी परथा सतजुगिहा, जउन ला शास्त्र हा कथय-नियोग.
खाली हाथ रहय औरत हा, लेकिन तलफत बिन संतान
अपन वंश के वृक्ष बढ़य कहि, देवर संग जोड़य संबंध.
पर अब एमां आत समस्या- पहिली ले बदलत संसार
होत पुत्र मां देवर भउजी, यने होत मर्यादित स्नेह.
मंय हा साफ कहन नइ पावत, एमन रखंय कते संबंध
तंहू अपन मुंह ला चुप रख ले, एमन रहंय अलग या साथ.”
झंगलू हा बहुरा ला बोलिस, तंह वृद्धा रहिगे चुपचाप
भिरहा के भुरकू ले होथय, गरूवा के घाव हा चट साफ.
समय सदा कर्तव्य निभाथय, बइठ पाय नइ गड़िया खाम
धान लुए बर देत निमंत्रण, होवत धान लुवई के काम.
चलत कृषक खुद के डोली तन, फुरसुद नइ बोले गोठियाय
धान हा आय कोठार मं जल्दी, कृषक भुलाय नहाना खाय.
लइका मन भिड़ सिला ला बीनत, जउन मेर के उठथय धान
सीला मींज दूकान मं जावत, ओकर बदला मुर्रा खात.
दुखिया भिरे कछोरा कंस के, सुर बोहि भारा झपझप लात
वजन जनात गोड़ लोढ़ियावत, मगर काम हा सरलग जात.
जउन पिलारी मांईलोगन, शिशु ला दूध पिया नइ पात
अनमहराज कोठार मं लानत, भारा रख फिर दउड़त खेत.
धनसहाय हा बड़े गोंसइया, नइ सकलात जल्द सब खार
मुड़ी नवा कुबरी कर कनिहा, काम बजात बहुत बनिहार.
कातिक फूलबती दूनों झन, शर्त लगाइन आपुस बीच-
जउन ददरिया मं जीतत हे, ओहर लेगय घर मं खींच.
याने फूलबती यदि हारत, पंइठू घुंसिहय कातिक पास
यदि कातिक हा शर्त ला हारत, तब बनिहय घरजिंया दमांद.
दुनों बीच अब चलत ददरिया, दूनों रखे विजय के आस
उहां श्रमिक हाजिर तेमन हा, सुनत ददरिया टेंड़िया कान-
“”चितावर मं राम चिरई बोले
चितावर मं राम चिरई बोले
तोला कोन बन मं खोजंव मोर मैना मंजूर
जोड़ी मोला तार लेबे रे दोस…।
जोड़ी मोला तार लेबे रे दोस…।
कातिक-
धाने हा दिखत ठाहिल पोक्खा
पर भीतर मं फलफल हवय गा बदरा
देखव मं सूरत बरत अस गा
पर हिरदे के कपट हा कुलुप करिया.
फूलबती-
आमा लगाएंव खाहुंच कहि के
पर बमरी के कांटा गड़त छाती ला
बोलेंव मंय हंस के मया ला अमराय
तेहा दुश्मन अस बोलत दिहिच धोखा गा.
ऊपर मं जे गैन ददरिया, हिरदे बेध बना दिस घाव
अब संबंध होय मिश्री कहि, पंक्ति ढिलत कर मीठ अवाज.
कातिक –
करके गा मिहनत झड़क बासी
तोला देख लेथंव क्षण भर जुड़ाथय छाती.
फूलबती-
तंय जिंहा जाबे मोरो हे रद्दा
तंय सुबहो के सूरज मंय सांझ के चंदा.
अब के स्पर्धा सैद्धान्तिक, कठिन प्रश्न के उत्तर ठोस
दुनों पक्ष हा करत तियारी, ताकि विजय हा ओकर ओर.
फूलबती हा भिरिस कछोरा, कातिक हा पगड़ी सम्हरैस
निर्णायक के बुद्धि टंच अस, श्रोता हेरिस कान के मैल.
कातिक-
बघवा के मुंह मं दबे हे हरिना
जन जन के भविष्य ला खावत हे लुटेरा
फूलबती-
सुख पाना हे तब उदिम कइसन
सब भाई बहिनी रेंगव एकेच रस्ता
अब कातिक के पांत पहुंच गिस, पर ओहर धथुवा चुपचाप
फूलबती सरियत जीते बर, अपन पक्ष ला करथय पोख.
फूलबती-
धनहा रे खेत मं बाजथे बंशी
याने क्रांति के बेरा निमंत्रण ला देवत
फूलबती-
गाये के बछरू पियत हवय दूध
जनता के युग आगे खावत दही बासी.
कातिक हा आगू नइ बोलिस तंहने हारिस बाजी।
टूरा हा टूरी घर जावय कोन परय भेंगराजी।।
हगरू हा कातिक ला बोलिस- “”होगिस खतम पुरूष के राज
फूलबती घर तंय हा रहिबे, कर उंहचे रांधे के काम.”
कातिक किहिस- “”बदलगे युग हा, तब चलिहंव ओकर अनुसार
फूलबती अउ मंय दूनों झन, उठा के चलबो घर के भार.”
कलुवा नाम भिलइवाली हा, सुनत ददरिया टेंड़िया कान
बइठ फटफटी आय हे ओहर, लगत हवय पुंजलग इंसान.
सोचत हवंय श्रमिक बाटुलमन… कलुवा कहूं के बड़हर पात्र
एकर स्थिति हमर ले उंचहा, वस्त्र कीमती पहिरे झार.
कलुवा सब के चित्र खिंचिस अउ, कहिथय- “”मंहू आंव मजदूर
लोहा के कल मं जूझत हंव, देह दरद मं चकनाचूर.
जांचे आय तुम्हर हालत ला, लेकिन इहां होत अफसोस
तुम्मन मोरे पर भड़कत हव, का कारण होवत आकोश?”
“”नान्हे बुध ला एल्ह भले तंय, पर तंय नोहस धगड़ा मोर
हमर बंहा धर कोन उठाहय, टोरत हे रगड़ा दुख भूख.
अगर पाट भाई अन हम तुम, अंतर कार दुनों के बीच
सब ला एक बरोबर सुविधा, काबर भेद कमल अउ कीच?”
कातिक हा करला के बफलत, कलुवा मानत बन गंभीर
सत्य शब्द ला हर क्षण मानत- गुणी आदमी मति के धीर.
कलुवा बोलिस- “”मंय पतियावत, कोन ला बिपत पाय के साध
लेकिन क्रांति करे बर लगिहय, तब फिर पूर्ण जमों के साद.
तुम्हर साथ मंय हठ कर चलिहंव, साथ चलव बनिहार किसान
जोरफा देख टिकन नइ पावय, गिने गिनाये घर के मान.”
धनवा हा छुप बात सुनत हे, दउड़िस बाद खूब बगियात
कलुवा ला मुटका हकराइस, छाती पर चढ़ नरी दबात.
कलुवा के आंखी हा छटकत, रूके चहत हे ओकर सांस
ओहर दुनों गोंड़ ला खुरचत, थोरिक बचे बने बर लाश.
नौकर मन ला करलइ ब्यापत, लेकिन डर मं बंद जबान
धनवा खुद कलुवा ला धूंकत, खेत होय झन मरघट घाट.
बाद मं कलुवा के बुध जागिस, झांझर आंख लोरमगे देह
चले चहत पर गोड़ थम्हत नइ, उही पास बइठिस मनमार.
धनसहाय कलुवा ला एल्हिस- “”वह रे अलख जगइया जीव
झोंका एक थाम नइ पावत, कहां उखनिहय शोषक नींव!
अब कभु बरगलाय बर आबे, पानी बुड़े बचन नइ पास
बोकरा के खंड़री अस निंछिहंव, खाहंय चील तोर चिथमांस””
धनवा हा कलुवा ला खेदिस, यद्यपि कलुवा हे कमजोर
ओहर रेंगत लिड़िंगलड़ंग कर, मन मं हवय क्रांति पर मोह.
दंउचे हे तब कुटकुटी पीरा, तभो चलत हे हिम्मत तान
एक बियारा तिर जा देखत- मींजत हवय गुहा हा धान.
भारा छोर धान ला छीतत, गड़िया रखे बीच मेड़वार
बइला मन के फंदे हे दौंरी, गुहा हा खेदत लउठी मार.
पुनऊ थुकेल दउड़ के आइन, खेलत उलाण्डबांटी खेल
गुहा हा कतको डर्हुवा बरजत, पर लइका मन देवत पेल.
गोबर करथय बैल पखरिया, उचक छटारा मारिस जोर
पुनऊ उड़ा थुकेल पर गिरगिस, रोवत दुनों कल्हर चिरबोर.
दस महिना तक पेट मं रोखेंव कहां जियानिस मोला।
तुम रोवात हव लइका मन ला- तुम हव निष्ठुर चोला।।
कैना आय गुहा के खटला, तेन करिस कलकल कर क्रोध
ओहर लइका मन ला पाथय, ओकर बाद किहिस कुछ सोध-
“”तुम्मन अब थोरिक सुस्ता लव, तरपंवरी मं होवत दर्द
तुम्मन महिनत जोंगे हव तब, काम करे के करतब मोर.”
कैना हा अब दंवरी खेदत, पति लेवत हे बइठ अराम
पत्नी हा गूहा पर भड़किस, ओकर मन मं नइ दुर्भाव.
कलुवा प्रेम देख के सोचत- “”एमन लड़मिल काम बजात
यदि समान हक सब झन पातिन, स्वर्ग असन बन जातिस गांव.
यदि आर्थिक स्थिति हा उत्तम, भगतिस कोन गांव ला छोड़
शहर नगर के रूप सुघर अक, देश के नक्शा मं सुख हर्ष.”
दुसर कोठार ला कलुवा देखत- झिंकत कलारी धर पछलोर
बइला मन बर कोलिहा कातिक, दाना नावत पेट दमोर.
दंवरी ढिल पयरा ला तिरिया, अन सकलत खरहेरा मार
धान कूत हा ठीक उतरिहय, खुश होवत हे जुगुल हा सोच.
सूपा उठा ओसावत तनिया, खुद किंजरत जस रेंगत वायु
अन्न हा रदरद पास गिरत हे, थोरिक दूर गिरत हे भूंस.
तीसर ठंव जा कलुवा जांचत- रास रखे परछिन अस्थान
सिलियारी फुल गोबर मोखला, उपर कलारी तीन निशान.
एक के बदला राम ला बोलिस, कृषक हा नापत हवय अनाज
Ïक्वटल बाद कुढ़ी एक राखिस, करथय पुन& नपई के काम.
छितरे अन्न गरीबा सकलत, कलुवा आथय ओकर पास
ओखर आंख धंधमंधा जाथय, तंह भुंइया पर गिरिस दनाक.
झझक गरीबा ओला देखत, पर नइ करन सकत पहिचान
उठा गरीबा घर मं लानिस, ओकर जतन करत हे तान.
दुखिया तक पाछू नइ सल्टिस, करथय कलुवा के उपचार
दिन कर्तव्य पूर्ण कर लेथय, कलुवा देखिस नैन उधार.
हल्का लगत तन मं कम पीरा, होगिस हवा फिकर डर क्रोध
एक हा ओला मरत ले झोरिस, दूसर जतन करिस तिर ओध.
कलुवा हा कुछ पूछे रहितिस, उदुप ऐस मानव के भीड़
ओमन धरे अरत्र अउ लउठी, क्रोध देखात करत तरमीर.
किहिस गरीबा हा ओमन ला- “”तुम सच फोरव अपन विचार
हमर तुम्हर नइ झगड़ा झंझट, काबर आय पकड़ हथियार?”
पूर्व बात कहि कातिक बोलिस- “”चहत सुने कलुवा के हाल
धनवा एकर छटठी गिन दिस, रोष बता अगिया बयताल.
हम्मन रेहेन मगर नइ छेंकेन तब मांगत हन माफी।
अब हम कते काम ला फांदन- तुम बताव सत रस्ता।।
कातिक के मुंह हा चोंई अस, मांगत क्षमा प्रकट कर क्षोभ
अब तब प्रायश्चित तक करिहय, अइसे दिखत उहां के दृष्य.
कथय गरीबा हा कातिक ला- “”तंय हा करत क्षमा के मांग
अपन कुजानिक ला स्वीकारत, पर वास्तव मं एमन व्यर्थ.
कलुवा रोय हवय अपमानित, ओहर खाय रचारच मार
लुटे प्रतिष्ठा हा लहुटय नइ, अमरबेल अस मन के घाव.
ककरो प्राण हरत हे हिंसक, बाद करत माफी के मांग
पर प्रार्थना निरर्थक जाहय, मृतक हा नवजीवन नइ पाय.
धनवा हा कलुवा ला पीटिस, तब तंय हा जस दर्शक मात्र
इहां अमर के ढाढ़ा कूटत, एहर आय गलत अन्याय.
पश्चाताप प्रायश्चित रोना, क्षमा मांगना आशिर्वाद
श्राप-रोष कर दया देखाना, एमन सब यथार्थ से दूर.
जब उद्वेग भावना बहिथय, तब उपरोक्त तथ्य के दृष्य
पर कुछदिन हा कट जावत तंह, नष्ट होत हे इंकर प्रमाण.”
कातिक ला अउ कथय गरीबा- “”मंय बोलत अतका अस गोठ
ओकर सफ्फा कारन सुन ले, दगदग समझ जाव सच अर्थ.
हम परिवर्तन करे चहत हन, क्रांति के बाद आय फट शांति
अपन विचार साफ कर पहिली, गोड़ फूंक रेंगव नव राह.
जतिक बुराई पूर्व बताएंव, सच के दुश्मन के कर त्याग.
उहिच धार मं अगर बोहावत, सब उदेदश्य बोहा जहि धार.
तुम्मन क्रांति धान बोये हव, रक्षा करव डार जल खाद
तिरिया रख भ्रम भूल बहाना, तब कट सकिहय ठोस अनाज.”
सुनिस गरीबा के कथनी ला, कलुवा ला होवत विश्वास-
“”हवय गरीब मंथिर ज्ञानिक, कड़क ठोस सिद्धान्त विचार.”
मिलिन गरीबा अउ कलुवा मन, आपुस मं करथंय पहिचान
अलग अलग तन बरन रूप हा, मगर राह सम निरमामोल.
कलुवा कहत गरीबा ला अब- “”मंय हा राखत एक सवाल
तंय धनवा ले टक्कर लेवत, शोषक ला मानत हस शत्रु.
क्रांति करे बर लुकलुकाय हस, तेन क्रांति के कइसन रूप
क्रांति के बाद व्यवस्था कइसन, खोल बता तंय ओकर नाम?”
कथय गरीबा- “”तंय चेतलगअस, तभे रखत हस कठिन सवाल
अपन बुद्धि तक मय ओरियावत, हम उद्देश्य रखे हन जेन.
हम संघर्ष करत शोषक संग, एकर कारन दगदग साफ-
गांव के सब जन सुख ला पांवय, ककरो हक हा झन मर पाय.
जउन व्यवस्था ला चाहत हम, ओकर सुम्मत राज हे नाम
एमां मानव के व्यापक हित, निश्चय पाहंय सब झन लाभ.”
कलुवा कथय- “”जउन तुम सोचत, वास्तव मं जनहित के राह
सुम्मत राज पर रखत भरोसा, दिखत चकाचक भावी साफ.
अरि के धुमड़ा खेदव सुंट बंध, क्रम अनुसार राख मन धीर
कृषक धान ला जांच के काटत- हरूना बाद मं मांई धान.
महाकाव्य बर लगत बछर कइ, नइ कोड़ाय एक दिन मं ताल
मगर हवय विज्ञान असन सच- झुखिहय अवस भेद के ताल”
कलुवा हा समझाइस तंहने सुम्मत बांधत साथी।
कातिक मन ओतिर ले उसलिन मन मं रख प्रण थाथी।।
कथय गरीबा हा कलुवा ला- “”कातिक मन हा लीन सलाह
धनवा तिर रहस्य खुल जाहय, क्रांति काम के खुंटीउजार?”
कलुवा कथय- “”टिंया ले होवत, शोषित रहस्य ला बगरात
पर शोषक मन कहां ओनारत, तभे उंकर मुड़ पहिरत ताज.
मगर एक ठन बात घलोसच- तिर मं होथय भेदिया एक
शत्रु के गुप्त भेद ला फोरय, तभे उखनिहय रिपु के भेद.”
एकर बाद खाय बर बइठिन, ओकर बाद नींद हें नींद
कलुवा बड़े फजर जागिस अउ, अपन भिलाई वापिस गीस.
सनम, गरीबा तिर आ बोलिस- “”परलोदसा होय हे आज
एक व्याक्ति हा मरे परे हे, गिरगे गांव बिपत के गाज.”
मंगत गरीबा पूरा उत्तर, मगर सनम नइ देत जवाब
झीकं गरीबा ला धर लानिस, जिंहा भीड़ हा खड़े बिचेत.
थोथना फारे सब अचरज मं, धुंकनी असन चलत हे सांस
माछी भिन-भिन कीरा बिल बिल, पिच पिच मांस कुबल गंधात.
लाल लहू चप आंखी गायब, डेना अंगरी नख नइ साथ
अतड़ी पोटा छिदिर बिदिर हे, जनन तंत्र हा दूर अनाथ.
मनसे मन सूंघन नइ पावत, मन भिरगात लगत ओकियास
सब के रूंआ ठाड़ डर कारण, बात करे बर शक्ति खजार.
मनखे मन निरघा के चीन्हिन- एहर आय भुखू के लाश
जानिन तंहने चेत उड़ा गिस, हवा अमर के देव कपास.
एक दुसर ला अंखिया पूछत, पर कोई नइ देत जुवाप
शंका करत होय हे हत्या, लेकिन करे कोन हा पाप!
आखिर धनसहाय हा बोलिस- “”भुखू रचय सब बर फरफंद
ओकर होश हमेशा गायब, दिन अउ रात पिये बस मंद.
खवईपियई तक ला तज देवय, करय जान के नइ परवाह
पीलिस होहय मंद पेट भर, तभे उखड़गे एकर प्राण.
गांव के तिर मं दहपट जंगल, घूमत हें वन पशु आजाद
ओमन शव ला चीथदीन तब, लाश के गति एकदम बर्बाद.
थाना मं यदि देत सूचना, सबला थुरिहय थानाध्यक्ष
भुखू जियत भर सबला घालिस, भूल लेव झन एकर पक्ष.
इहां जतिक झन सब अपने हन, भूंज देव फट एकर लाश
गांव के कुकुर भुंकत गांवे तन, आंच आय नइ ककरो पास.”
शव के दहन होत लकलउहा, राख बना दिन शव ला फूंक
जुगनू नंदा जथय बुगबुग बर, तइसे भुखू सदा बर नाश.
मनसे मन घर तन झप भागिन जइसे गरूवा छेल्ला।
डर मं आपुस मं टकरावत यदपि जगा हे मेल्ला।।
धनसहाय के सीगं हा बाढ़त, जइसे अमरबेल के बाढ़
अपन शक्ति पूंजी जोड़े बर, खेलत हे क्रूरता के खेल.
राजबजन्त्री हुम्मसिया बन, धान उघावत घुसर कोठार
दसहत धाक जमे कहि राखे, अपन साथ मं दू ठेंगमार.
बइठे झड़ी रास के तिर मं, नापत हवय कमइ के धान
धनवा ओकर तिर मं पहुंचिस, झड़ी ला बोलिस टांठ जबान-
“”झख मारे बर नइ आये हंव, झप लहुटा बाढ़ी के धान
तिंहिच एक झन कर्जीला नइ, मंय जाहंय अउ कइ खलिहान.”
बपुरा झड़ी सुकुड़दुम होथय, बाघरूप धनवा ला देख
कहिथय- “”सत्य बात एहर हा- मांगे हंव बाढ़ी मं धान.
ओमां खेत निंदाई होइस, डोकरी के होइस उपचार
पर सब खर्चा व्यर्थ बोहागिस, मोर संगिनी छोड़िस साथ.
बिस्वासा हा बच नइ पाइस, लीस रोग हा ओकर प्राण
ओकर तिर पंयकड़ा अउ सुंतिया, जेकर पर ओकर अति प्रेम.
ओ गहना ला धर के मंय हा, तोर पास मंय दउड़त गेंव
तोर हाथ मं सुपरूत करके, छूट डरे हंव जम्मों कर्ज.
लेकिन तंय हा फिर मांगत हस, तब मोला होवत आश्चर्य
तंय हा पुरे गोंसइया खुद हस, नीयत ला रख बिल्कुल साफ.”
खाता खोल देखाइस धनवा, झड़ी हा देखत मुंह ला फार
ठंउका मं नइ कटे कलम हा, ऋण हा अंकित पूर्व समान.
धनवा कथय- “”धान लेगे हस, ओकर कर्ज छूट नइ पाय
लेकिन तंय हा कहत लबारी- मंय हा पटा डरे हंव कर्ज.
ऊपर ले लांछन डारत हस, झन बिगाड़ तंय वृद्ध जबान
स्वंय घोख के सच ला फुरिया- मंय सच बोलत के बेइमान?
“”तुम्हर हाथ मां राईदोहाई, करव रक्सहूं ला भण्डार
पर अब भरत पाप के गगरी , बइठ जहय झप चलत बाजार.”
झड़ी हा अतका दीस सरापा, टुकना मं नापत हे अन्न
धनवा पढ़त हवय अब होले, भिड़े तान बुढ़ना झर्राय-
“”अभी छूट दे कर्जा ला तंय, तोर मोर संबंध मिठास
अगर एक कन होत उदेली, लेग जहंव सब धान ला तोर.”
धनसहाय हा खखुवा जाथय, झड़ी ला मार दीस चेचकार
बुजरूक झड़ी असक ते कारन- अत्याचार सहिस झखमार.
धनवा जबरन धान ला लेगत, रेंगत हे छाती ला तान
धनवन्ता लूटत हिनहर ला, लवा ला जइसे जिमथय बाज.
धनसहाय हा निहु ला लूटत, पुख्ता करत क्रूरता हाड़
इसने सबला कपसाये बर, दड़ंग पहुंचगे मौसम जाड़.
मनसे मन खड़भुसरा फेंकत नाक ले सुड़सुड़ पानी।
रूंआ ठाड़ मुंह सीसी बोलत कष्ट पात जिनगानी।।
परवा ले जल गिरत टपाटप, पत्ता पर मुसकावत ओस
यने क्रांतिकारी हा हर्षित, शोषक मुड़ चढ़ खुशी मनात.
प्रात& सूर्य ओस ला चुहकत, तब फइलावत अपन प्रकाश
लेखक के पारश्रमिक ला खाथय, धन बढ़ जथय प्रकाशक पास.
धाम के दादागिरी चलत नइ, हवा बढ़त बरछी तहि तूत
दिन हा झपकुन फुस ले भागत, पर रतिहा के उमर अकूत.
झरिहारिन गुंड़री बन सोए, रखे गली ला वक्ष चिपोट
पुत्र हा सोवत फिर जग जागत, झरिहारिन रक्षा कर लीस.
गली ला एकदम जाड़ बियापत, झरिहारिन हा करिस उपाय
पहिरे लुगा तउन ला हेरिस, बिगर वस्त्र होथय जस गाय.
गली ला लुगरा ओढ़ा दीस अउ, ओला पकड़िस पुन& चिपोट
अपन जाड़ मं ठरठर कांपत, पुत्र बचावत हे हर ओट.
बड़े फजर तंह कोदिया आइस, बोलिस- “”सुन रतिहा के हाल
तन ला कंपा डरिस जाड़ा हा, मिंहिच आंव कहि लाहो लीस.
घेक्खर जाड़ा ले निपटे बर, गोरसी भरे करे हंव काम
छेना-लकड़ी के छिलपा रख, कोदो के भूंसा भर देंव.
जहां सोय के बेरा आइस, मंय गोरसी ला सिपचा देंव
खटिया तरी राख गोरसी ला, मंय लेवत हंव ओकर आंच.
रूसुम रूसुम कर आंच हा आवय, पर जाड़ा ले खागे हार
मोला नंगत जाड़ बियापिस, पूरा रात नींद नइ ऐस.”
झरिहारिन तक दीस हुंकारू- “”मुंह के बात तिंही छिन लेस
अपन बेवस्ता ला यदि कहहूं, तंय मोला कहिबे बेशर्म.
पुत्र गली हा जाड़ मं कांपत, रक्षा बर मंय करेंव उपाय-
ओला घुमघुम ओढ़ा देंव मंय, अपन जमों लुगरा ला हेर.
मंय होगेंव बिना कपड़ा के, अब नइ कहंव साफ अस गोठ
यद्यपि मंय केवा तापे हंव, पर बताय मं आवत लाज.”
“”जेहर दुख विपदा नइ भोगे, जेन पाय नइ कमी अभाव
तोला दुश्चरित्र कहि सकिहय, निंदा करिहय चारों ओर.
मगर पुत्र के रक्षा खातिर, जउन करे हस तेहर ठीक
ककरो जीवन के रक्षा बर, अच्छा बुरा सबो हा माफ.”
तभे उंकर तिर पुसऊ हा आइस, कथय को दिया ला ए बात-
“”अमरउती के हाल ला जानत, ओहर गरभवास ए टेम.
बच्चा जने बखत तक आगे, अमरउती हा दुख ला खात
पर बच्चा हा गरभ मं अटके, ओहर हा बाहिर नइ आत.
तभे उहां हे तोर जरूरत, मुढ़ीपार चल मोरेच साथ
यदि तंय हा नटबे बिन सोचे, बदनामी आहय मुड़ तोर.”
बात सुनत कटखागे कोदिया- “”तंय हा देस खभर गंभीर
चल मंय चलत तोर तोलगी धर, एको कनिक करंव नइ देर.
तंहू सुना अपनो किस्सा ला, कइसे चलत तोर परिवार
लछनी ला कब तक घर रखबे, ओहर कब जावत ससुरार.”
बोलिस पुसऊ- “”आय हे जइतू, लछनी ला लेगे बर साथ
मंय हरहिंछा बिदा ला करिहंव, एकोकनिक परंव नइ आड़.”
उहां ले रेंगिन पुसऊ अउ कोदिया, मुढ़ीपार मं आके ठाड़
गोस कोदिया अमरउती कर, जांच करत हे ओकर हाल.
अमरउती के स्थिति नाजुक, बयचकही अस कुन्द दिमाग
जीवन मृत्यु बीच मं झूलत, देखत भारत के तस्वीर.
कहिथय- ककरो घर झन टूटय, हर छन फूलय खुशी के फूल
चुरी अमर तिरिया के होवय, बच्चा नाचय अंगना झूल.
भारत, तंय हा देश भक्त अस, शत्रुराष्ट्र के सिरी गिराय
देश के रक्षा होय उचित कहि, तंय हा खुद के प्राण गंवाय.
लेकिन फुरिया अब का होहय- सती गती तोर खुद परिवार
हमर कोन होहय अब रक्षक, हम बोहात हन धारो धार.”
अमरउती हा मनचलही अस हेरत अटपट बानी।
पर के घर ला जेन बनाइस- ते खुद पावत हानी।।
अमरउती के चिंतित स्थिति, लइका अटके अंदर घाट
गांव मं जचकी निभ नइ पावत, करत न ककरो अक्कल काट.
आखिर सब मिल रददा हेरिन- मुढ़ीपार नइ साधन ठीक
जिला चिकित्सालय मं लेगव, उंहचे होहय नीक प्रबंध.
पुसऊ अपन लछनी ला भेजत, सादा अस जइतू के साथ
किहिस पुसऊ हा जइतू ला सच- “”पहिली फुंकगे पूंजी मोर.
मोर पास बांचे लछनी हा, उही ला डारत असलग तोर
मंय हा तोला धन नइ देवत, एकर मोला हे अफसोस.”
जइतू कथय- “”करव झन चिंता – तोर चहत बस आशिर्वाद
मंय विश्वास देत ऊपर ले- कष्ट पाय नइ पुत्री तोर.”
तभे पुसऊ ला रिवघू तिखारिस- “”जइतू ला तंय गलत बनास
मगर देख ओकर चाला ला- कइसे निश्छल सरल सुभाव!”
बोलिस पुसऊ-“”जेन मनखे के, गरम दूध मं मुंह जर जात
ओहर दही फूंक के खावत, हर अच्छा पर शक के वार.
नोनी धरमिन ला खोये हंव, सदा रथय घटना के याद
मंय शंका करथंव सबझन पर, अमृत ला मानत बिख तीख.
पर जइतू ला परख डरे हंव, ए अदमी नइ धोखादार
एकर घर लछनी सुख पाहय, सितराजुड़ा जही जुग जोड़.
जइसे सेना के मनसे मन, रखथंय ऊंच देश के शान
जइतू हा परिवार चलाहय, सब ला कहिहय अपन समाज.”
अमरउती ला धर के लेगत, जिला चिकित्सालय तत्काल
जइतू लछनी अउ कोदिया मन, नांदगांव पहुंचिन बिनबेर.
अस्पताल मं जइतू बोलिस- “”जे भारत हा होय शहीद
ओकर खटला ए अमरउती, जचकी निभा देव झप ठीक.”
पिनकू घलो उहें पहुंचिस अउ, अपन डहर ले करत गोहार
पर बिनती हा व्यर्थ बोहावत, सिर्फ मिलत घुड़की के मार.
अलग लेग गैंदा हा बोलिस- “”तुम्मन रहव शांत चुपचाप
अगर चिकित्सक मन संग लड़िहव, मिल जाहय परिणाम खराब.”
जइतू खखुवा जथय भयंकर- “”अमरउती के जावत जान
टेम हा खसकत हे ऊपर ले, देत चिकित्सक मन नइ ध्यान.
कब तक अत्याचार सहंव मंय, होना चहत हमर नुकसान
युद्धक्षेत्र मं झगरा उठगे, उहां देखाएंव शक्ति कमाल.
बइरी मन के प्राण हरे हंव, बोइर असन पटागे लाश
उही काम अब इंहचे करिहंव- कइके लेहंव जीयत जान.”
पिनकू हा जइतू ला छेंकिस- झन कर बुद्धिहीन अस काम
हवय स्वारथी अधिकारी मन, देश प्रगति तब काम तमाम.
इही देश के लइका सबझन, भूल के झन पहुंचा नुकसान
थोरिक टेम देख लेवत अउ, करबे काम अपन अनुसार.”
छेरकू अउ मुख्यमंत्री पहुंचिन, अस्पताल के होवत जांच
अधिकार लोरत उंकरे तिर, निकल जाय झन गलती कांच.
अस्पताल मं कतको रोगी, ओमन देखत हें बस राह
पर उपचार उंकर नइ होवत, सनसन बाढ़त रोग अजार.
अस्पताल के जांच हो जाथय, मुख्यमंत्री हा रखिस विचार-
“”करत चिकित्सक करतब पूरा, सब रोगी मन पात इलाज.
यद्यपि दोष निकाले जाथय पर मंय करत प्रशंसा।
जब कर्तव्य पूर्ण होवत तब कार झूठ के कंसा।।
अमरउती के पेट मं बच्चा, तेकर पहिली निकलगे जान
जहर हा जच्चा के तन भीनिस, अमरउती के उड़गे प्रान.
छेरकू जहां खबर ला जानिस, मुंह ओथरा कहिथय दुख साथ-
“”भारत देशभक्त हा हमला, पहिलिच कर दिस दीन अनाथ.
साथ छोड़ दिस अमरउती हा, लेकिन रखबो ओकर नाम
अमरउती के प्रतिमा बनवा, पधरा देब चौंक के बीच.”
मंत्री मन ला रखे सुरक्षित, पुलिस आय धर के बन्दूक
छेरकू के निचतई गोठ सुन, कोदिया के बढ़ जाथय क्रोध.
कोदिया आरक्षक तिर पहुंचिस, झटक लीस ओकर बन्दूक
छेरकू पर बन्दूक ला तानिस, अबतब देतिस धड़धड़ धूंक.
तभे दूसरा आरक्षक हा, कोदिया तन तानिस बन्दूक
धड़ धड़ मार प्राण ला हर लिस, कोदिया गिरिस तरी जस पूक.
छेरकू लछनी अउ पिनकू मन, उंहचे खड़े हवंय गमगीन.
यद्यपि जइतू हा भन्नावत, पर काकर संग ले प्रतिशोध
अपराधी मन तुरूत भगागें, उहां हवंय निर्दाेष अबोध.
पिनकू जइतू मन मं सोचिन- तुरूत उठान दुनों ठक लाश
वरना इहां हवंय अउ रोगी, उन पर परिहय गलत प्रभाव.
बइसाखू मन मदद करिन तंह, दुनों लाश हा मरघट गीस
उहां बने हे चिता तउन पर, बर के लाश बदल गे राख.
जइतू लछनी गीन रायगढ़, पिनकू बइसाखू के छांव.
बइसाखू सम्बोधन देवत, पिनकू के दुख होय समाप्त-
व्याख्याता पिनकू ला पूछिस- “”मेहरू करत हवय का काम
ओकर पुस्तक हा अप्रकाशित, या फिर पूरा छपई के काम?”
पिनकू बोलिस- “”छपिहय पुस्तक, मेहरू रखे रिहिस हे आस
मगर प्रकाशक वापिस कर दिस, उहिच पाण्डुलिपि मेहरू पास.
गीस प्रकाशक तिर पाण्डुलिपि हा, पुलिस जान लिस ओकर भेद
दउड़त पुलिस प्रकाशक तिर गिस, वाजिब तथ्य करे बर ज्ञात.
घुड़किस- “”आय पाण्डुलिपि जे अभि, ओमां हे सरकार विरोध
न्यायालय के हाल लिखे हे, फोरत साफ पुलिस के पोल.
हम किताब के नाम ला जानत- क्राति से शांति हे ओकर नाम
तंय अउ लेखक लुका के राखव, लेकिन जान लेन सब भेद.
यदि पुस्तक हा होत प्रकाशित, तोर मुड़ी पर आहय कष्ट
पहिली पुस्तक जप्त हो जाहय, लगही प्रेस मं तारा रोंठ.”
धमकी अमर प्रकाशक डरगे, ओहर बदलिस अपन विचार
मेहरू पास पाण्डुलिपि भेजिस, ओकर साथ एक ठक पत्र-
मेहरू मोर सलाह मान तंय, फोकट आफत झन ले मोल
जेकर पास दण्ड के ताकत, उनकर पोल भूल झन खोल.
अगर लिखे बर किरिया खाये, तंय लिख सकत विषय कई और
ओकर पुस्तक खत्तम छपिहय, पहिलिच ले बांधत अनुबंध.”
बइसाखू हा बीच मं छेंकिस- “”मेहरू के रूकगे सब काम
ओहर आस छोड़ दिस होहय, याने लिखई के साद हा पूर्ण?”
“”होथय जिजीविषा के ताकत, कृषक श्रमिक मन मं भरपूर
कतको भूख बिपत ला भोगत, पर जीवन पर रखथंय आस.
मेहरू उंकर बीच मं बसथय तब नइ छोड़य आसा।
पहिली ले अउ अधिक लिखत हे लिखिहय जलगस स्वांसा।।
बइसाखू कहिथय- “”मंय जावत, अभी रायपुर धर के काम
होत समीक्षक मन के बैठक, होहय बहस कपट ला छोड़.
साहित्य मं धांधली होवत, ग्रामीण लेखक के नइ पूछ
उंकर पक्ष मंय लेहंव भिड़ के- ऊपर उठय प्रतिष्ठा मूंछ.”
बइसाखू हा राजू होके, जावत हवय चढ़े बर रेल
चुनू साथ उरभेटटा होथय, लगे हथकड़ी जेकर हाथ.
बइसाखू हा चुनू ला पूछिस- “”तंय का करे हवस अपराध
आरक्षक मन धर के लेगत, लोहा के बेली हे हाथ?”
कहिथय चुनू- “”सत्य मंय कहिहंव, मगर कोन करिहय विश्वास
तुम मोला टकटक जानत हव, तुम्हर पास बोलंव नइ झूठ.
खोरबहरा के हत्या होगिस, ओला मारिस अउ इसान
पर मंय बिन कारन फंसगे हंव, अबनइ बांचय जीवन मोर.
खोरबहरा हा रिहिस जउन तिर, उही पड़ोस मं मनसे और
ओमन मोर खिलाफ बता दिन, यद्यपि मंय हाजिर नइ ठौर.
किहिन गवाह- चुनू हा पहुंचिस, खोरबहरा ला दीस अवाज-
मंय अंव चुनू दउड़ आए हंव, तोर पास आवश्यक काज.
उही अधार दीस न्यायालय, मोर विरूद्ध मं निर्णय आज
मृत्युदण्ड के सजा पाय हंव, बिन अपराध बिपत के गाज.”
ओतके मं नंदले हा दिखथय, जउनजात रिक्शा मं बैठ
ओकर स्वास्थय गिरे हे एकदम, हरदी असन पिंयर हे देह.
नंदले रोवत चुनू ला बोलिस- “”अस्पताल जावत हंव मित्र
उहां अपन मंय जांच कराहंव, मगर एक ठन बिपत बिचित्र.
उहां दवाई लेना परिहय, मगर मोर तिर अर्थ अभाव
इही वजह मंय आस ला छोड़त, बूड़ जहय जीवन के नाव.”
चुनू के तिर मं जतका रूपिया, सबला नंदले ला गिन दीस
कहिथय- “”मंय हा जेल मं खाहंव, मोर होय नइ अब कुछ खर्च.
तंहने मंय चढ़ जाहंव फांसी, अपन समीप बलाहय काल
पर तंय अपन इलाज ला करवा, किसनो कर जीवन ला पाल.”
चुनू हा अउ कुछ बोले रहितिस, पर आरक्षक लेगत झींक
बइसाखू स्टेशन पहुंचिस, सोचत न्याय होय नइ ठीक.
रेल हा आइस तंह बइसाखू, ओमां बइठिस मुश्किल बाद
रेल हा पहिली धीरे रेंगिस, छुक छुक कर बाढ़त हे चाल.
नांदगांव ले कुछ दुरिहा गिस, तंय होगिस दुर्घटना एक
रेलचाक हा पांत ला छोड़िस, उही पास गिरगे कर टेक.
डब्बा पर डब्बा मन चढ़गें, होवत उहां दृष्य वीभत्स
मनसे मन के लाश पटावत, घायल मन कल्हरत चिरबोर.
तन मं कई ठक घाव उदलगे, खून बोहावत तुर्रा देत
कतको हाय हाय चिल्लावत,कतको झन के उड़गे चेत
एकर खबर सबो तन फइलिस सुनिन हठील अंजोरी।
दुर्घटना स्थल में पहुंचिन करत जिनिस के चोरी।।
घायल मनसे मन हा कल्हरत, एमन लूटत ऊंकर चीज
गहना रूपिया जे मिल जावत, फटले करतअपन अधिकार.
बइसाखू ला मार परे हे, किहिस हठील ला करके क्रोध-
“”विवश दुखी के मदद ला करते, पर तयं करत भयंकर लूट”
पर हठील हा कान धरिस नइ, लूटमार के वापिस गीस
नांदगांव मे पहुंचिस तंहने, रख दिस लुका लाय जे चीज.
बुल्खू चइती दुकली टैड़क, एमन गिन दुर्घटना ठौर
घायल मनला देत पिठैंया, अस्पताल मं लानत दौड़.
जहरी पास गीस चइती हा, उहा कथय दुर्घटना हाल
किहिस हठील के क्रूरता ला, पर जहरी हा देइस टाल.
बोलिस- “”मंय हठील ला जानत, ओहर हवय भला इंसान
क्रूरकर्म ले घृणा करत हे, तंय हा ओकर झन हर मान”.
शांतिदूत में खबर हा छपगे, पर हठील के लुप्त हे नाम
नांग हा डस के जीव ला लेवत, पर पावत पूजा अउ दूध.
चइती हा कार्यालय छोड़िस, पहुंचिस चकलाघर के पास
उहां ले मनसे मन हा निकलत, पापर चटनी धर के साथ.
चइती फट ले अंदर घुसगे, उहां के जाने बर सच हाल
माला ओला देक के हर्षित, झप पहुंचिस चइती के पास.
माला कथय- “”चलत हे अब तक, सरलग अस पहिली के काम
हम बेचें के काम करत हन, यने बेंच के लेथन दाम.
लेकिन पहिली देंह बेंचावय, पर अब बदले ओकर रूप
पापर बरी अचार बनावत, धंधा धरलिस दूसर रूप.”
रूपा किहिस- “”हमर जीवन अब, पहिली ले खुश सुख भरपूर
जे समाज इज्जत ला लूटय, ओहर देत बला के मान.
एकर संग अउ काम करत हन- जे औरत बेबस लाचार
ओला देवत काम अपन अस, ताकि अपनला लेंय उबार.”
चइती हा प्रसन्न मन बोलिस- “”तुम्हर काम ले होवत गर्व
मांई लोगन मन स्वावलम्बी, उही दिवस आजादी पर्व.
मात्र पुरूष पर दोष लगाथन, वाकई ओहर गलत अनीत
खुद के पांव खड़े यदि तुम अस, पुछी उठा भगिहय दुख दाह.”
चइती उहां ले हट के निकलिस, पिनकू संग हो जाथय भेंट
चइती हा सफ्फा ओरिया दिस, कइसे बीतिस ओकर साथ!
पिनकू कथय- “”समाज शास्त्री मन, एदे किसम के रखत विचार-
यदि वेश्यालय बंद हो जाहय, बढ़ जाहय बलत्कार कुकर्म.
वेश्यालय हा चलत तभे तक, करथय मरद काम ला शांत
कामावेश प्राकृतिक होथय, छेंक सकय नइ कानून धर्म.”
चइती काटिस- “”तर्क गलत हे, मोला बता एक ठक बात-
गांव मं वेश्यालय नइ होवय, काबर उहां ठीक निभ जात!
जेन व्यक्ति हा नशा ला करथय, ओहर रखत गलत विश्वास-
यदि मंय नशा करेबर तजिहंव, जीवन मोर बचन नइ पाय.
मगर नशा ला छोड़त हे तब, ओकर जीवन पात प्रकाश
औरत मरद एक हक पावंय, देश विश्व हो सकत विकास.”
छेंक शहर के कथा ला मंय हा- बोलत गांव कहानी।
गांव शहर मिल देश हा बनथय, मरथय भेद के नानी।।
सनम के घर तिर सांवत पहुंचिस, मुचमुच हांसत करिस पुकार-
“”अंदर घुस का काम करत हस, नइ लेवस जयहिन्द जोहार!”
आरो समझ सनम हा कहिथय- “”भतबहिरा अस झन रहि ठाड़
रददा बिसरे हस कई दिन मं, चल अंदर आ खुले किवाड़.”
सांवत आथय सनम के तिर मं, दुनों जहुंरिया बइठिन खाट
सांवत जमों कथा ओरियावत, अपन ह्रदय के खोल कपाट-
“”हमर नियाव गरीबा टोरिस, तब सुंट साथ चलत परिवार
भांवत मोर प्रेम एका हे, भेद के होगिस खुंटीउजार.
दूनों भाई काम करे हन, तब बिरता हा उझलत खार
ओदर तनत तक जेवन मिलिहय, पुन& साख जम जहय बजार.
अनुभव पाय अपन ऊपर ले, उन्नति करथय सुम्मत काम
जेन जगा एका के शासन, खाय मिलत हे सुख के जाम.”
सनम हा मुसकत बात बढ़ाइस- “”शंका होत बात सुन तोर
विश्वशांति बर बइठक होथय, मगर काम होथय कुछ और.
याने विश्व ला बच जावय कहि, एक डहर पारित प्रस्ताव
पर दूसर तन बम बन जाथय, विश्व भविष्य लगत हे दांव.
तइसे भांवत संग झगड़त तुम, अलग अलग खावत हव रांध
मगर मोर तिर झूठ निकालत- हम्मन चलत सुमत ला बांध?”
सांवत बोलिस- “”सच बोले हंव, फुरिया सकत करेला गांव
घर मं बइठ नियाव भंजावत, हमर इहां धर तो कभु पांव!”
बहुत बेर सांवत गोठियाइस, उसल के आथय बाहिर खोर
ओला धनवा छेंक के छोलिस- “”कइसे छुप खसकत जस चोर.
तोर इहां पंचायत होइस, करे गरीबा भर के याद
तोर भविष्य बिगाड़े हंव कब, होन पैस नइ मोर पुकार?”
सांवत किहिस- “”ठीक बोलत हस, गीस गरीबा न्याय भंजाय
ओकर बुती सिद्ध नइ होतिस, तब तो होतिस तोर बलाव.”
सांवत हा सुट रद्दा काटिस, दांत कटर धनसाय नराज
ओहर अपन मकान मं आथय, कोतल मन के जुड़त समाज.
उच्चासन पर धनवा बइठे, गंजमिंज करत हवय दरबार
कानाफूसी भीड़ मं होवत- का कारन बलाय सरकार!
धनवा अपन विचार ला राखिस, पहिली देखिस चारों खूंट-
“”मोर राज के जर उखनय कहि, द्रोहिल कंसा आवत फूट.
मोर दोंगानी धन झटके बर, झंडा टांगत मोर खिलाफ
जेला देंव मान पीढ़ा मंय, उही चलत बइमानी चाल.
सबला क्षमा देत हंव अब तक, हर ला बाटेंव मीठ जबान
पर ओमन मोर मुड़ा पुरोवत, एतन कतिक सहंव अपमान?”
सब गपगपा के तिर तन ओधत कोन निकालय उत्तर।
यदि उत्तर हा एतन ओतन टूट जहय रट गत्तर।।
हिम्मत बढ़ा सुखी हा तानिस- “”कोन तोर संग लाहो लेत
काकर ऊपर रइ आवत हे, फोर भला तंय ओकर नाम?”
धनवा क्रोधित होत सुखी पर- “”तंय हा करत दोगलई घात
मंदरस मीठ असन बोलत हस, लेकिन रखत पेट मं दांत.
मोर विरूद्ध खाय हस चुगली, सनम पास सुरहुत्ती रात
अब तंय काबर ढाढ़ा कूटत, चल अब बोल रटारट बात?”
सुखी ला काटव मगर लहू नइ, सोचत पाइस कहां सुराग
एकर ले मिल यदि मंय रहिहंव, हरियर कंच मोर जे बाग.
धनवा कथय- “”तंगाएंव पर ला, हरे घलो हंव परके प्राण
लेकिन तुम्हर लाभ चाहत हंव, होइस कहां तुम्हर नुकसान!
मोर पास जम्भे आये हव, मंय बांटे हंव नेक सलाह-
तिलिंग के ऊपर तुम्मन बइठव, हेरे हवंव नफा के राह.”
धनवा हा डकहर ला बोलिस- “”मंय जानत समाज के सर्ग
कते वर्ग हा कइसन चलथय, ढुलमुल होथय मध्यम वर्ग.
पूंजीपति संग भेंट हो जाथय, तुम हो जाथव ओकर साथ
लेकिन जब कंगला तिर पहुंचत, क्रांति करे बर बनत अनाथ.
पर मंय हा इतिहास बतावत- जब परिवर्तन अ‍ैस समाज
पहिली मरिन तुम्हर अस मन हा, बाद गिरिस शोषक पर गाज.
अगर सुरक्षित रहना चाहत, तुम्मन बनव सहायक मोर
तंहने हमर तुम्हर नइ बिगड़य, दब जाहय विरोध के सोर.”
डकहर सुखी रहस्य समझगें, अब धनवा के लेवत पक्ष
धनवा करू शब्द मं डांटिस, लेकिन उहू लगत हे मीठ.
मोर शरण मं आय समझ के, धनवा हा दिस आशिर्वाद
धनवा तन कोतल मन भूंकत, ताल बिगाड़े बढ़थय गाद.
शोषक मन के किसम बहुत हे, ओमन जानत सबसिद्धांत
जोंख असन लिजलिजहा चिम्मड़, मुश्कुल मं होथय प्राणान्त.
कोतल मन हा उहां ले निकलिन, तंह दसरू संग होगिस भेंट
पूछिस सुखी- “”कहां जावत हस, फुरिया साफ राख झन पेट?”
दसरू कहिथय- “”मंय जावत हंव, रानीगंज मं मंड़ई हे आज
औरत मर्द सियनहा बालक, उंहचे जात छोड़ के काम.”
दसरू गीस झड़ी के घर मं, कहिथय झड़ी केंघर के खूब-
“”तोला एक भार संउपत हंव, ओला करबे निश्चय पूर्ण.
धनवा हा मारत चेचकारिस, जबरन छीन लेग गेधान
तेकर कारन तन दंउचे हे, हिरदे तक मं भरगे पीर.
मोर बांचना मुश्किल हे अब, जाहंव बिस्वासा के पास
तंय हा गत किरिया ला करबे, लेग जबे अस राजिम धाम.”
दसरू बोलिस- “”मोसा सुन ले- तंय हा जीयत हस संसार
अलकरहा बूता संउपत हस, कइसे करंव तुरूत सिवकार!
पर मंय तोर बात मं चलिहंव, पूरा करिहंव इच्छा तोर
बनें बनाहंव गत किरिया ला, अस धर जाहंव तीरथ धाम.”
लेकिन एक बात तो फुरिया, तंय अइसे बोलस नइ कार-
धनवा अतियाचार करे हे, ओकर ले लेहंव प्रतिशोध?”
“”यद्यपि रंज हवय धनवा पर, ओकर चाहत खुंटीउजार
पर मंय मिरतू के खटिया मं, करना कठिन लड़इ संघर्ष.
हिरदे के दुख आह हा निकलत, ओहर दिही बाद परिणाम
धनवा के सत्ता भट जाही, शोषण जुलुम सदा बर नाश.”
दसरू गीस गरीबा घर तिर लेत उहां के आरो।
दुखिया ओकर स्वागत करथय- “”तुम अंदर पग धारो।।
दसरू हा दुखिया ला एल्हत- “”होय गरीबा अउ तुम एक
तब मंय पाय निमंत्रण तक नइ, अब बलात आगू मं देख.
मिलतिस खाय करीलड़ुवा हा, तेकर तुम्ही करे हव चूक
मंय हा अंदर तभे अमरिहंव, जब पट जहय बचे चे सूक.”
दसरू मुसकावत अंदर गिस, हंसत गरीबा हेरिस बोल-
“”खबड़ा सिरिफ खाय बर सोचत, मुंह ला रखत सदा तंय खोल.
अगर पेट हा सपसप होवत, मार पालथी चलना बैठ
दुखिया अउ मंय जेवन परसत, तंह तंय सक भर जेवन एेंठ.”
दसरू अब ताना मारत हे- “”भइगे तंय जेवन ला राख
जब ले दुखिया ला लाने हस, मोर डहर राखस नइ चेत.
अपन मरे बिन सरग दिखय नइ, मंय करिहंव अब स्वयं बिहाव
मगर तोर अस मंय हा नोहंव, देहातिन ले करंव बिहाव.
खटला लाहंव शहर नगर ले, होय शान से ऊंचा नाक
स्वादिल जिनिस रांध के देहय, फुरिया दिही ज्ञान विज्ञान.”
दुखिया हंस के उत्तर देथय- “”मोला एल्हत आभा मार
मोर गंवइहिन के गुन ला सुन, अचरज मं परबे मुंह फार.
मंय माटी मं रहिथंव तइसे, चिखला मं कर लेथंव काम
जउने मिलत तउन खा लेथंव, ककरो चीज हिनंव नइ भूल.
पर तंय शहर ले तिरिया लाबे, करही कहां खेत मं काम
रिकम रिकम के लुगरा मंगही, इसनो पउडर साबुन तेल.
जतका साद मरत हस अभि तंय, मुड़ी पकड़ पछताबे बाद
खटिया बइठ दिही बस आज्ञा, देबे तिंही खाय बर रांध.”
किहिस गरीबा ला दसरू हा- “” रानीगंज मं मंड़ई मितान
तोला अपन साथमंय धरिहंव, तंय झन छोड़ सुघर अवसान.”
कहां गरीबा बात ला टारत, ओकर मन हा पुचपच होत
दुखिया ला कुछ अलग मं लेगिस, गाल चिमट फुरिया दिस गोठ.
रेंगत मंड़ई गरीबा-दसरू, अउ जावत कतको इन्सान
जेकर पास जेन हे साधन, ओमां बइठ के भागत तान.
एमन देखत मंड़ई पहुंच के, गंजमिंज होवत भीड़ अपार
पांव उचा चलना तक मुश्किल, पेल के बाढ़त कोहनी मार.
नर नारी के देंह संटत हे, सब सरमेट्टा भेद समाप्त
जेमन बइठे लगा के पसरा, उंकर जिनिस उड़गे खुरखेद.
रिश्तेदार अगर मिल जावत, हस के बोलत सुख दुख बांट
पर मनसे मन एल्हत लेकिन, एमन चूमा लेत चटाक.
कातिक फूलबती मन किंजरत, ओमन बंधे एक ठन गांठ
गोदना गोदत हवय बखरिया, एमन रूकिन उहिच स्थान.
वास्तव मं कलाकार बखरिया, करत हवय अचरज के काम
मानव के तन मं गोदत हे- सुन्दर चित्र अमर बर नाम.
कथय बखरिया फूलबती ला- “”तंय गोदना गोदवा ले शीघ्र
फूल पेड़ अउ नाम सखी के, अंकित करवा जउन विचार.
यदि तंय पति के नाम लिखाबे, खोल बता तंय ओकर नाम
हरियर मड़वा हाट मंड़ई मं, पति के नाम सकत हस खोल.”
पूछत हवय बखरिया हांसत, फूलबती हंस दीस जुवाप-
“”क्वांर के बाद आत जे महिना, धान होत जब पके के लैक.
जेन माह होवत देवारी, उहिच माह हा पति के नाम
ओकर साथ नाम मोरो लिख, ताकि अंतक्षण तक संबंध.”
फूलबती गोदना गोदवा लिस, अपन साथ कातिक के नाम
एकर बाद दुनों फिर किंजरत, एकोकन छूटत नइ साथ.
बिकत मंड़ई मं बहुत जिनिस भजिया गुलगुला मिठाई।
तिरिया हांसत बेंचत मुर्रा चना तिली के लाड़ू।।
गोभी मुरई भटा बंगाला, बिही पिड़ीकांदा कुसियार
मनखे बाटुल जिनिस खरीदत, तभो खतम नइ जिनिस बजार.
ढेलवाचक्का पर चढ़ हांसत, धरती फेंक रूमाल उठात
ढेलवा ला ठेलत जे अदमी, श्रम मं बिगड़त ओकर हाल.
पुतरी मंड़ई साथ मं बैरंग, मोहरी दमऊ अंउ दफड़ा साथ
राउत नाचत पार के दोहा, ऊपर डहर फेंकावत हाथ.
सब मनखे ला खभर करे बर, हांका दीस गांव कोतवाल-
“”ऊंचा नाच रात भर देखव, देत निमंत्रण झाराझार.
तुम्मन हा टकटक जानत हव- हवय प्रसिद्ध रवेली नाच
कलाकार जे नकल देखाहंय, उंकर नाम सब तन विख्यात.
लालू फीता मदन मंदराजी, बुलुवा बोड़रा ठाकुरराम
उंकर कला करथय आकर्षित, दर्शक देखेबर ललचात.
ओमन एदे नकल निकालत- चपरासी बुढ़ुवा के ब्याह
सूरा वाले कजुवा निकलत, अउ सींका जोती के राह.”
कथय गरीबा ला दसरूहा,- “इहें रूकन या वापस जान
नाच देख लेतेन मन होवत, कुछ तो निकल जाय बेवसाय!”
तभे श्रमिक पहरू हा आथय, जेकर रानीगंज निवास
इंकर पूर्व परिचित ते कारन, हर्षित हृदय करिस मिल भेंट.
पहरू बोलिस-“”याद करंव बंय, दर्सन तुम्हर पाय हंव आज
ढारा मं जब बइठक होइस, तमे निमंत्रण ला दे देन”
जउन नाच देखे बर सोचत, आगे हवय खेली नाच
चलव हमर सगं जेवन कर लव, तंहा रात भर देखव नाच- ”
कथय गरीबा-“”जेला खोजत, अमर लेन हम बिना प्रयास
ठंउका हमन भाग्यशाली हन, हमर साद हा निश्चय पूर्ण.
लेकिन एक भद ला फुरिया- बोनस पाय नगद मं नोट
ढारा मांग पूर्ण होगिस का, देत निमंत्रण दिल ला खोल?”
“”ढारा मं बइठक जे होइस, ओकर पारित जे प्रस्ताव
ओला ऊपर भेज चुके हन, पर नइ आय अभी परिणाम.
फिर डोंगरगढ़ मं सकलाबो, उंहचे करबो खूब विचार
बुल्खू श्रमिक सबो झन आहंय, रखबो उहें अपन हम मांग.
मगर अभी बर चिंता झनकर, भात खवाय ह्रदय हे ठोस
चल पहिली जेवन तो कर लन, बाद गोठ कर देखव नाच.”
परगें ढार गरीबा दसरू, पहरू के घर जेवन लीन
नाचा शुरू होय कतका छन, इही सोच भागत हे नींद.
एमन नाच ठउर मं पहुंचिन, कटकट जुड़े मनुष्य समाज
बाजा बजत राग ला धरके, परी हा नाचत मार अवाज.
एमन एतन बिधुन हो देखत, जोकर मन के अचरझ काम
ओतन दुखिया फिकर मं जागत- कहां गरीबा हा रूक गीस!
संझा पलट जहंव कहि रेंगिस, पर नइ आय- होत अधरात
ककरो साथ लड़ई कर डारिस, या फिर दुश्मन कर दिस घात!
मात्र एक झन रहना मुश्किल, बिगर गरीबा जग अंधियार
मोर बात ला पेल के चल दिस, गाल ला हलुकुन थपरा मार.
पंइठू घुसेंव गरीबा के घर, तब मंय हा नइ पावत प्यार”
दुखिया ला वियोग तड़फावत, आंसू बहत हवय बन धार.
थोरिक भुड़ कपाट हा बाजिस, तंह दुखिया ला होत अभास-
खड़े गरीबा दरवाजा तिर, करत दिल्लगी देवत झांस.
दुखिया हा कपाट ला खोलिस, सोचत कहां छुपे चुपचाप
मगर गरीबा के दउहा नइ, तंह दुखिया ला लगिस खराब.
उदुप एक ठंव आंखी गड़गे, जे वाजिब मं ठुड़गा पेड़
दुखिया ललक अवाज लगाथय- काबर खड़े हवस ओ मेर?
अब तक जेवन बचा रखे हंव, करा होय नइ- ताजा तात
तोर बिना मंय कइसे खावंव, चलव खाव तरकारी भात.”
दुखिया पेड़ के तिर मंय पहुंचिस, लेकिन डरिस असल ला जान
वापिस पहुंच कपाट लगाथय, विरह लेत हे ओकर जान.
चिरई गोड़ेला के जोड़ी मन, संट के सुते हवंय बन एक
ओमन ला संहरात बिरहनी- कोन कूत सकिहय ए प्रेम!
एक दूसरा ला नइ छोड़त, जीवन सफल उज्जवल भाग
मोर बिपत के रास बड़े जक, बिन पति रात ला काटत जाग.”
छटपट करत हवय दुखिया हा, जोड़ी संग नइ होत मिलाप
आंख मूंद के पति ला देखिस, कुछ संतोष हटिस संताप.
रात सता के मुंह ला टारिस, सुरूज पकड़लिस खुद के काम
हंसत गरीबा हा घर आथय, पकड़े हवय मिठई संग जाम.
खाय जिनिस दुखिया ला संउपत, पर ओहर मुंह ला टेड़गात
समझ पात नइ कुछुच गरीबा, दुखिया ला देखत बक खात.
दुखिया कथय- “”मंड़इ देखत तंय, कहां करे हस चिंता मोर
तोर याद मं रात जगे हंव, वास्तव मं तंय निष्ठुर जीव.”
दुखिया के जब दरद ला जानिस, कथय गरीबा हृदय उमंग-
“”तोर हुदेसना बने सुहावत, प्रेम देखाय करे हस मात.
एक सत्य ला अउ बोलत हंव- बिछड़न मिलन प्राकृतिक देन
एकर कारन सुख दुख मिलथय, लेकिन तंय रख शांति दिमाग.
पति पत्नी तलाक खट देथंय, फट ले टूटत हे संबंध
पर तंय सुरता मोर करे हस, तेकर मंय मानत अभिमान.”
झिंकिस गरीबा हा दुखिया ला हंसत खवात मिठाई।
दुखिया बहुत प्रेम से खावत प्रेम मं बसत भलाई।।

(… ७ चनवारी पांत समाप्त …)

गरीबा महाकाव्य (पंचवईया पांत : बंगाला पांत)

पाठक – आलोचक ले मंय हा नमन करत मृदुबानी ।
छिंहीबिंही खंड़री निछथंय पर सच मं पीयत मानी ।।
एमन बुढ़ना ला झर्रा के नाक ला करथंय नक्टा ।
तभो ले लेखक नाम कमाथय – नाम हा चढ़थय ऊंचा ।।
मेहरुकविता लिखत बिधुन मन, ततकी मं मुजरिम मन अ‍ैन
तब बिसना कथय – “”तंय कवि अस, कविता लिखथस जन के लाभ.
झूठ बात ला सच बनवाये, करथस घटना के निर्माण
पर अब सच ला साबित कर, निज प्रतिभा के ध्वज कर ठाड़.
घटना – पात्र काल्पनिक खोजत, एमां बुद्धि समय हा ख्वार
तेकल ले तंय हमर बिपत लिख, काव्य वृक्ष पर खातू डार.”
कथय बीरसिंग -“”होय हे पेशी, भोला पुलिस झूठ कहि दीस
हमला कड़कड़ ले धंसाय बर, जहर बिखन दिस हमर खिलाफ.
हमर विरुद्ध गवाही देहंय – पल्टन अउ बुलुवा कोतवाल
उंकर मुखारबिन्द का कहिहय, हम नइ जानत ओकर हाल !”
मेहरुबोलिस – “” सुघर कहत हव, हम अन उंचहा साहित्यकार
खोड़रा मं लुकाय रहिथन अउ, लिखथन जमों जगत के हाल.
पर ओ होथय झूठ लबारी, पाठक हा पढ़थय जब लेख
होत दिग्भ्रमित – सच नइ जानय, आखिर पाथय अवगुन हानि.
अब मंय तुम्हर तोलगी ला धर, न्यायालय तक जाहंव आज
सूक्ष्म रुप से अवलोकन कर, काव्य बनांहव खुद के हाथ.”
मेहरुहा मुजरिम संग जावत, सत्य दृष्य देखे बर आज
खैरागढ़ मं पहुंच गीस तंह, टंकक ठेपू संग मं भेट.
मगन तुरुत टंकक ला बोलिस -“”हमर तोर पूर्व के पहचान
हवालात मं साथ खटे हन, कर तो भला हमर तंय याद !
मारपीट कर जुरुम करे हस, ओकर पेशी हे दिन कोन
लगे तोर पर के ठक धारा, तोर विरुद्ध गवाह हे कोन ?”
टंकक हंसिस – “”बता डारे हंव – थानेदार हा परिचित मोर
ओहर कृपा करिस मोर ऊपर, हवालात ले करिस अजाद.
कहां के दण्ड – कहां के धारा, होगिस खतम जतिक आरोप
अब मंय कहां तुम्हर अस मुजरिम, छेल्ला किंजरत हंव हर चौक.”
घुरुवा हा ठेपू ला बोलिस – “”बेचन ला गुचकेला देस
अपन जुरुम ला स्वीकारत हस, तब ले तंय बच गेस बेदाग.
हम भोला ला छुए घलो नइ, तब ले हमर मुड़ी पर गाज
न्यायालय मं खात घसीटा, एहर आय कहां के न्याय !”
ओतन पल्टन अउ बुलुवा ला, भोला अपन पास बलवैस
अउ पल्टन ला उभरावत हे -“”जानत हवस साफ सब गोठ.
तोर गांव मंय गेंव तोर सुन, तब हे तोरेच पर विश्वास
मोरेच तन बयान तंय देबे, ताकि विरोधी हा फंस जाय.
यदि घुरुवा के मदद ला करबे, न्यायालय मं उनकर जीत
तंहने मोर मुड़ी पर आफत, मोर जीविका जाहय छूट.”
पल्टन कथय -“”करव झन चिंता, भेखदास हा दुश्मन मोर
ओकर पक्ष लेत घुरुवा हा, तब ए बड़का दुश्मन मोर.
गांव के आपुस झगरा ला मंय, न्यायालय मं कहिहंव शोध
जब एमन फंस दण्डित होहंय, तभे मोर आत्मा हा जूड़.”
भोला ला बुलुवा ला धांसत -“”काम करत हस हमर विभाग
झूठ साक्ष्य देबे तंय रच पच, मुजरिम झन बोचकंय बेदाग.”
बुलुवा किहिस – “”याद हे अब तक, जब मंय बनेंव गांव – कोतवाल
मोर विरुद्ध चलिस बुलुवा हा, ओकर बदला लुहूं निकाल.”
आरक्षक हा फेर पूछथय -“”एक बात के उत्तर लान –
हमर विरुद्ध कोन हे साक्षी, घुरुवा मन के कोन गवाह ?”
बुलुवा कथय -“”नाम ला सुन लव – बल्ला अउ मालिक हे नाम
ओमन न्यायालय मं आहंय, घुरुवा मन के लेहंय पक्ष.
साक्षी दिहीं निघरघट अस बन – घुरुवा मन बिल्कुल निर्दाेष
ओमन भोला ला नइ मारिन, भोला खुद बोलत हे झूठ.”
भोला गरजिस -“”कान खोल सुन – बन्दबोड़ हा तुम्हर निवास
उंहचे रहिथंय बल्ला मालिक, तब हे तुम्हर सदा मिलजोल.
तुम ओमन ला साफ बताना – थाना पुलिस के शक्ति अपार
ओकर साथ कभू झन उलझव, वरना बहुत गलत परिणाम –
उनकर पर आरोप झूठ मढ़, फंसा सकत प्रकरण गंभीर
घुरुवा मन के दुर्गति होवत, उही रिकम के उंकरो हाल.
यदि ओमन हा चहत सुरक्षा, न्यायालय झन आवंय भूल
बन्दबोड़ मं रहंय कलेचुप, पर हित के रस्ता ला छोड़.”
न्यायालय के टेम अ‍ैस तंह, सब कोई न्यायालय गीन
मुंशी अधिवक्ता साक्षी मन, पहुंचिन लकर धकर धर रेम.
मोतिम न्यायाधीष अ‍ैस अउ, कुर्सी पर बइठिस बिन बेर
पिंजरा अस कटघरा बने हे, ओमां मुजरिम मन हें ठाड़.
दूसर तन कटघरा तउन मं, पल्टन अउ बुलुवा कोतवाल
एमन करत विचार अपन मन – हमला करिहंय काय सवाल !
शासन के अभिभाषक कण्टक, ओहर इंकर पास मं अ‍ैस
कहिथय -“”तुम्मन गांव मं रहिथव, तुम निष्कपट सरल इंसान.
लंदफंद ले घृणा करत हव, तब तुम पर हे बहुत यकीन
तुम्मन सत्य गवाही देहव, एको कनिक कहव नइ झूठ –
भोला तुम्हर गांव मं पहुंचिस, संग मं धर शासन के काम
तब मुजरिम मन एकर संग मं, जबरन झगरा ला कर दीन.
आरक्षक ला दोंह दोंह कुचरिन, ढेंकी मं कूटत जस धान
अपराधी मन धमकी देइन – हम लेबो तोर जीयत जान.
घटना होइस तेन ला टकटक, देखे हवय तुम्हर खुद नैन
बीच बचाव करेव तुम्मन तब, मुजरिम तुमला भी रचकैन ?”
पल्टन बुलुवा झप स्वीकारिन – “”तंय हेरे हस सत्य जबान
बिल्कुल साफ बात होइस हे, सच मं उथय सुरुज भगवान.”
ओमन ला छुट्टी मिल गिस तंह, लकर धकर बाहिर मं अ‍ैन
पल्टन हा बुलुवा ला बोलिस – “”हमर आज माछी अस हाल.
माछी खोजत रथय घाव ला, अमरा के पावत संतोष
हम्मन मन माफिक अमरे हन, विजयी होय बड़े जक होड़.
विस्तृत तर्क हमर तिर नइये, मुंह हा देतिस गलत निकाल
मगर हमर बूड़त डोंगा ला, खुद कण्टक हा लीस सम्हाल.”
न्यायालय मं रुके हे मेहरु, उहां के जांचत हे सच हाल
सुने रिहिस जे तथ्य पूर्व मं, सच उतरत हे आधच गोठ.
मेहरुपहुंचिस अजम के तिर मं, मुजरिम मन के इही वकील
मेहरुकिहिस – “”सुनत आवत हन, तेन बात पर ठुंक गिस कील.
जब गवाह मन हाजिर होइन, गीता के किरिया नइ खैन
ना “मी लार्ड’ किहिन अधिवक्ता, अउ ना बोम फार चिल्लैन.
अनुभव होवत हवय जेन अभि पहिली कहां उवाटी ।
लुलसा ला चढ़ जथय चेत जब परत कोड़ना माटी ।।
अजम हा मुच मुच मुसका बोलिस -“”अइसन दृष्य फिल्म के आय
दर्शक हा आकर्षित होथय, तब निर्माता झोरत नोट.
मगर इहां के कथा अउर कुछ – इहां होत कारज गंभीर
प्रकरण ला सुलझाय सोझ बर, तर्क रखत हें सोच विचार.
न्यायाधीष के बदली होथय, तब आथय नव न्यायाधीष
एकर बारे प्रश्न उछलथय – कोन किसम हे एकर न्याय!
सुनत निवेदन या दुत्कारत, शांति बुद्धि या उग्र स्वभाव
अक्सर कड़ा दण्ड ला देथय, या फिर दोष ले करत अजाद ?
एकर अर्थ जान अब अइसन – न्यायाधीष पर हे सब न्याय
मुजरिम ला बेदाग छोड़ दे, या दे सकत दण्ड ला धांय.
पर अइसन कभुकाल मं होथय, अक्सर होत तउन ला जान –
धारा साक्ष्य नियम अउ स्थिति, निर्णय देत इहिच अनुसार.
हमर बिखेद ला घलो सुनव तुम – हम वकील मन हन बदनाम –
पक्षकार ले रुपिया खाथंय, देखत रथंय स्वयंके स्वार्थ.
सच मं हम वकील मन स्वार्थी, एकर साथ एदे अउ गोठ –
पक्षकार हा जीत जाय कहि, हम्मन करथन अथक प्रयास.
पक्षकार यदि विजयी होवत, हम्मन खुशी होत भरपूर
अगर हार जावत हे ओहर, तब हम होवत मरे समान.”
मुजरिम मन ला अजम हा बोलिस – “”अब जब तुम न्यायालय आव
धीर बुद्धि निर्भीक निघरघट, तइसन साक्षी धर के लाव.
कण्टक अभिभाषक हा ओला, अटपट पूछ डिगाहय राह
ओकर सम्मुख जउन हा ठहरय, ओला लान लगा के थाह.”
तब घुरुवा हा अजम ला बोलिस – “”हमर गवाह हवंय हुसियार
उंकर नाम बल्ला अउ मालिक, ओमन कभू खांय नइ हार.”
अजम वकील ओ तिर ला छोड़िस, इंकर पास खेदू हा अ‍ैस
ओहर हा निÏश्चत लगत अउ, मुंह के रंगत चमकत तेज.
खेदू ला बीरसिंग हा बोलिस – “”तंय हस खूब निघरघट जीव
तोर विरुद्ध चलत हे प्रकरण, तब ले बघवा असन निफिक्र.
लगथय – तोर हाथ मं निर्णय, न्याय के दिश ला सकत किंजार
तोर विजय जब ध्रुव अस निश्चित, फोर भला तंय एकर भेद ?”
खेदू एल्हिस -“”तुम देहाती, जानव नइ अंदर के पोल
श्रम ला बजा अन्न उपजाथव, पर नइ पाव उचित खाद्यान्न.
शासन हा इनाम कई बांटत – भारत रत्न शिखर सम्मान
पर ग्रामीण के हाथ हा रीता, भाग गे मछरी जांग समान.
देश विदेश उच्च पद कतको, अधिकारी के पद ला पात
मगर गांव के शिक्षित मन हा, कहां उच्च पद पावत झींक !
देश के भक्त – समाज के सेवक, गांव मं होवत कई इंसान
पर ओमन विख्यात होंय नइ, डूब जात उनकर यश नाम.”
खेदू हा नंगत झोरिया दिस, लागिस बात हा जहर समान
मगर सत्य ला कोन हा काटय, सच के सदा मान सम्मान.
खेदू हा फिर बात बढ़ाइस -“”पूछत हव प्रकरण ला मोर
मोला जेन पलोंदी देवत, शासन पर हे ओकर धाक.
हांका पार कहत हंव मंय हा – निर्णय मं होहंव निर्दाेष
पर एकर बर समय मंगत हंव, तंहने पूर्ण जनार्दन गोठ.
छेरकू मंत्री जउन हा धारन, गुप्त रखत हंव ओकर नाम
खभर समान्य होत जग जहरित, लेकिन छुपत खभर संगीन.”
खेदू हंसत उहां ले हटथय, तभे बहल कवि ओ तिर अ‍ैस
बोलिस – “”हम ग्रामीण दुनों झन, तंय कवि अस – मंय तक कवि आंव.
रहन सहन अउ काम एक अस, तब मंय करत तोर पर आस
मुड़ी मिला के बात करन अउ, मन के भेद ला बाहिर लान.”
मेहरुमुसका प्रश्न उछालिस – “”तोर बात के अंदर राज
खभर विशेष लुका राखे हस, हां अब बता हृदय के बात ?”
बोलिस बहल -“”जान ले तंय हा – इहां विश्वविद्यालय खास
उहां बहुत झन लेखक आहंय, लेखक सम्मेलन हे खास.
आत रायगढ़ ले छन्नू हा, बिलासपुर के आत बिटान
आत रायपुर ले दानी हा, जगदलपुर ले सातो आत.
आत अम्बिकापुर ले मिलापा, दुर्ग ले परसादी हा आत
नंदगंइहा बइसाखू आवत, सन्तू ढेला तंय मंय और.
महासचिव – अध्यक्ष चुने बर, लेखक संघ के बीच चुनाव
हम तुम घलो उदीम उचाबो, ताकि पान हम पद एकाध.”
मेहरुकथय -“”ठीक बोलत हंस, अब तंय बता स्वयं के हाल
रचना काम चलत हे बढ़िया, सरलग चलत लेख के काम ?
“”हव मंय लेख चलावत सरलग, एकर संग अउ एक विचार –
मंय हा शहर रायपुर जावंव, उहां करंव साहित्य के काम.
आकाशवाणी अउ दूरदर्शन, दुनों केन्द्र मं हाजिर होंव
रचना ला प्रमाण मं राखंव, सब कोती करवांव प्रचार.”
“”दुनों केन्द्र मं निश्चय जा तंय, उहां अपन प्रतिभा ला खोल
यदि उद्देश्य सफलता पाबे, मंय पा लुहूं हर्ष संतोष.
अगर तोर रचना अस्वीकृत, पर तंय होबे झनिच उदास
काबर के उहां होत धांधली, प्रतिभा के होवत अपमान.
जेकर पहुंच रथय ऊपर तक, जे लेखक नामी दमदार
मात्र उही मन जगह अमरथंय, उंकरे रचना पात प्रचार.”
सरकिस बहल अपन रद्दा बल, अपराधी मन छोड़िन ठौर
न्यायालय के काम खतम तंह, उहां कोन बिलमन छन एक !
ओमन बस थोरिक अस टसके, अ‍ैस गरीबा उंकर समीप
ओकर संग मं एक युवक हे, जेहर सब संग हाथ मिलात.
कहिथय – “”मोर नाम हे जइतू, सेना के मंय आंव जवान
मंय हा मुढ़ीपार जावत हंव, कई दिन ले राखे हंव ठान.
भारत ला तुम्मन जानत हव, ओहर मोला बहुत बलैस
लेकिन जलगस भारत जीवित, मोला बखत मिलन नइ पैस.
भारत ला मंय भांटो मानों, तब अमरउती बहिनी आय
ओकर साथ भेंट मंय करिहंव, इही विचार पकड़ के आय.”
किहिस गरीबा हा मेहरुला – “”हमर साथ मं तंय चल मित्र
अगर एक कवि साथ मं होथय, मिलत सुने बर कथा विचित्र.”
मेहरुस्वीकारिस -“”सच बोलत – बहुत बिचित्र जगत के हाल
देश भक्त जनहितू एक तन, पर कोती घालुक चण्डाल.
भारत अपन देश के खातिर, अपन प्राण कर दिस बलिदान
पर छेरकू – धनवा जइसन मन, करत अपन जन के नुकसान.”
मेहरु- जइतू अउर गरीबा, मुढ़ीपार के धर लिन राह
भारत के घर मं पहुंचिन अऊ, लेवत हें अंदर के थाह.
अमरउती हा दुखी दिखत हे, हाथ चुरी ना मुड़ सिन्दूर
नाक फुली ना माथ न टिकली, धोवा लुगा उहू कुरकूर.
भारत के सुरता हा आवत दृष्य दिखत हे नाना ।
अमरउती मन सम्बोधन बर गावत विरह के गाना ।।
पहिली गवन के मोला डेहरी बइठारे,
नारे सुअना बइठेहवंव मन बांध
तिरिया जनम मोर गऊ के बरोबर,
ना रे सुअना दुख पाथय अंधनिरंध
भारत साथ पाएंव सुख थोरिक,
चल दिस देश बचाय
ओकर बिना एदे रात हा मोला,
सउत असन सताय.
जावत जावत किहिस भारत हा,
रखबे ए बात के चेत –
तुलसी के बिरवा तोर मुरझुर मुरझुर,
तोर पिया रन खेत.
तुलसी मं पानी छिड़क के मंय देखेंव,
रात बिरात के जाग
डारा बड़े झुमरय तंह जानंव,
भारत हा हरसात.
छोटे ला बड़का छुए तंह जानंव,
झींकत मोर बंहा
छोटे हटय तेला मानों मंय
बोलत – धर लेग जाहव कहां !
जहां दुनों मिल हालंय अउ होलंय,
हम जोड़ी हन एक
तीसर डार हलय बस थोरिक,
पर मनसे लिस देख.
हवा चलय कहुं झरपट आवय,
भारत क्रोध देखात
छोटे हा जावय बड़े तिर मं तंह,
मंय हा मनात पथात.
इसने कटत दुख के छन चुप चुप,
ान ला रखंव मन बांध
बस दू – चार दिवस नहकय तंह,
भारत पत्र भिजाय.
एक दिन देखेंव तुलसी ला हालत,
हो गेहे चालू लड़ई
उही बड़े डारा ऊपर बाढ़िस,
भारत कर दिस चढ़ई.
नींद न आवय – बिना छिन सोए,
काट डरेंव मंय रात
तुलसी के बिरवा संग मंय एके झन,
कलप कलप करेंव बात.
एक ठक पत्ता गिरिस तंह मानेव – बस एक दुश्मन कटिस
बर बर गीरिन जहां पत्ता मन,
शत्रु के लाश पटिस.
एक ठक फुलगी बढ़िस तंह मानेंव,
जीतिस के चौकी एक
कई ठक फुलगी नवा नवा देखेंव,
पाए हें चौकी अनेक.
मुंह झुलझुल ले उठ मंय नहाएंव,
बारेंव उदबत्ती दीप
तुलसी एहवातिन के पांव परेंव मंय,
मानेंव अड़बड़ सुख.
उही दिवस उपवास ला रहि के,
काटेंव हंसमुख दिन
नजरे नजर मं भारत हा झूलय,
आइस यादे हर छिन.
एक दिन देखेंव बहुत डारा मिल के,
बड़का पर झुम गीन
जान डरेंव भारत हा फंसगिस,
भाग नइ जतकत.
छिन रुक तुलसी के बिरवा हरियाइस,
होगिस शत्रु के नाश
टिकली अउ चूरी सिन्दूर अमर हे,
बंधगे हृदय विश्वास.
ओतके मं देखेंव ए दृष्य ला आगू
नारे सुअना
हो गेंव मंय हा बिचेत
तुलसी के बिरवा मोर मुरझुर – मुरझुर
नारे सुअना
जान डरेंव पति खेत.
नारे सुअना
मोर पती रन खेत ………. ।।
अमरउती हा बंद करिस जब खुद के बिपत कहानी ।
मेहरु- जइतू अउर गरीबा पहुंचिन तीनों प्राणी ।।
अमरउती इनकर बइठेबर, सरकी लानिस तेन तुनाय
बहुत अधीनी ले दिन काटत, काकर तिर जा बिपत सुनाय !
अमरउती के पति भारत हा, अपन देश बर जीवन दीस
मगर देशवासी मन स्वार्थी, छूटत कहां फर्ज के कर्ज !
“छत्तीसगढ़ी सरल मिट्टी अस, जउन करिस हे क्षेत्र विकास
पर छत्तीसगढ़िया मन हा भिड़, करत हइन्ता बीच बजार.
छत्तीसगढ़ी दीन कंगलिन अस, ओकर सदा होत हिनमान
“भाषा आय’ अगर बोलत, मुंह ला दबा – दबात अवाज.’
जेन मिलत अमरउती जेवत, सरफा परत बचे बर जीव
बसत गरीबी गाड़ के खमिहा, निर्बल के सुर्हरावत जीब.
तीनों झन सरकी पर बइठिन, मन मं नइ लाइन कुछ भेव
चिखला मं सनाय रहिथय पर, छिनमिन कहां करत हे नेव !
जइतू किहिस – “”तोर भाई हम, अब ले तंय झन कर कुछ फिक्र
जउन बेवस्ता आय तोर पर, हमर पास कर बेझिझक जिक्र.
भारत रिहिस राष्ट्र के प्रेमी, ओकर अस नइ भारत धाम
यद्यपि भारत हा जग मं नइ, तभो अमर हे ओकर नाम.
ओला नता मं भांटो मानों, हमर दुनों मं चलय मजाक
ओला हार जाय कहि सोचंव, मगर ऊंच तन ओकर नाक.
मंय बीमार परेंव बेधड़क, भारत जतन करिस दुख झेल
मोला खूब प्रसन्न रहय कहि, हंसा डरय बिजरा के एल.
मंय घबरा के अइसे बोलंव – अब नइ बांचय जीवन मोर
तंय हा मोला छोड़ के भग झन, जलगस नइ पहुंचत समसान.”
भारत हा मुसकावत बोलय -“”अभी प्रसन्न कहां यमराज
साले, तोला कोन मारिहय, बचे हवय अभि देश के काम.
अगर कहूं तन जाय के होहय, तब हे मोर प्रथम अधिकार
सत्य बचन ला जांच देखबे – होवत विजय मोर के तोर ?”
वास्तव मं भारत हा जीतिस, अउ मंय हार गेंव हर शर्त
ओकर स्मृति सदा सतावत, चुहे धरत आंसू के धार.”
सबके आंसू छलक बोहावत, आंसू रोक सकिस नइ आंख
नदिया मं बंधाय बांधा हा, बढ़त पुरा नइ पावय रोक.
अमरउती हा आंख पोंछतिस, तंहने लुगा चिरा गिस फर्र
दुब्बर ला परेशान करे बर, दू असाढ़ आ जाथय सर्र.
मेहरुलुगा लाय बर उठथय, अमरउती हा छेंकिस बीच –
“”भारत हा मोला शिक्षा दिस – कभु झन लेबे पर के चीज.
जलगस मंय हा जीवित जग मं, पूरा करिहंव तोर सवांग
अगर युद्ध मं मंय हा चंदन, तब झन तजबे आस कड़ांग.
अपन जिन्दगी अवस पालबे, महिनत कर – दुख संग कर होड़
देसू हा जब बाढ़ जहय तंह, पटक दिही सब सुख ला गोड़.”
देसू नाम सुनिन तीनों झन, जकर बकर देखत सब कोत
जइसे नाविक बीच सिन्धु मं, खोजत रथय कहां के पोत !
जइतू अचरत मं भर पूछिस – “”कते डहर हे देसू ।
भांचा ला हम चहत देखना – जस फागुन हा टेसू ।।
अमरउती हा शर्म मं गड़गे, देखे लगिस स्वयं के पांव
एमन बिगर बताय समझ गिन, हमर बहिन हे भारी पांव.
“”यदपि जिये के अब लालच नइ, पर ए कारन घसलत – हाय
देश डहर जे नाम हा जुड़थय, जीयत ओकर फूल बचाय. ”
मेहरुओला ढाढस बांधिस – “”मरना नइ संहराय के काम
कर संघर्ष जउन ही जीयत, ओकर जगमग होवत नाम.
लक्ष्मीबाई जिनगी खोतिस, पति चिंता मं चिता मं कूद
गोर मन संग कोन हा लड़तिस, अजर अमर नइ रहितिस नाम.”
कथय गरीबा, अमरउती ला – “”तंय हा हमर मदद नइ लेत
तोर पास हे धन के कमती, तब तंय कइसे भरबे पेट ?”
अमरउती बोलिस – “”मंय पाहंव, शासन ले अड़बड़ अक नोट
जीवन अपन चलाहंव सुदृढ़, देसू बर रख लुहूं रपोट.”
मेहरुकिहिस – “”वाह रे शासन, तंय देथस आश्वासन मात्र
मरन देस ना देस मोटावन, जीवित के करथस दशगात्र.”
कथय गरीबा हा जइतू ला – “”तंय हा बता एक ठन भेद
जे सैनिक शहीद हो जाथय, ओकर रथय वंश परिवार.
ओकर मदद करत शासन हा, ताकि अभाव कष्ट हो दूर
अमरउती कब सुविधा पाहय, पेंशन भूमि नगद मं नोट ?”
जइतू कथय -“”साफ फोरत हंव – शासन मंगत अचूक प्रमाण
यदि सैनिक के मृत्यु होय हे, मिलना चहिये ओकर लाश.
पर भारत के जटिल हे प्रकरण, हम जानत हन वाजिब गोठ
भारत हा दुश्मन ला मारिस, ओकर संग खुद होय शहीद.
पर भारत के लाश मिलिस नइ, तब शासन दुविधा के बीच
भारत ला “फरार’ मानत अउ, मदद करे बर हे असमर्थ.
अमरउती ला मदद मिलय नइ, ना भुंइया ना धन के लाभ
हम ओला ढाढस हे सकथन, एकर सिवा शक्ति नइ और.”
अमरउती ला दिन सम्बोधन, तीनों झन अब गोड़ हटात
“भाई मन बिन खाय लहुट गिन’ इही सोच बहिनी पछतात.
तीनों झन पाछू नइ देखिन, रेंगिन चुप – पटके बिन पांव
पर जब जानिन – दिदी हिम्मती, गरब साथ देखिन कई घांव.
एमन आगू कोती रेंगिन, जहां पुसऊ के घर तिर गीन
टीकम चम्पी देवलू बोंगडू, खिघू आदि के लगे हे भीड़.
पुसऊ हा रोवत मुड़ ला पटकत, अपन प्राण तक के सुध खोय
देवलू पूछिस -“”काबर कलपत, आय तोर पर का तकलीफ ?”
मन सम्बोधिस तहां पुसऊ हा, खोले बर लग जथय बिखेद –
“”जान लेंव मंय कतका होथय, पुंजलग अउ कंगला मं भेद !
मंय हा करों घमंड उठा मुड़ – असरुहवय अचक धनवान
ओला मंय समधी बनाय हंव, यने उठेहंव मंय खुद ऊंच.
पर अब वाजिब पता चलिस हे – अपन बेवस्ता फोरत साफ –
मोर दुलौरिन अस धरमिन हा, नइ जीयत हे ए संसार.
हत्यारा फंकट अउ असरु, मोर टुरी के जीवन लीन
दाइज के दानव आखिर मं, धरमिन ला खुद के चइ लीस.”
मनसे मन कारण जानिस तंह, कोइला अस मुंह करिया गीस
जइसे घटके गंहुवारी ला, कुहकुह पाला हा झड़कैस.
टीकम टांचिस तुरुत पुसऊ ला -“”अचरज होत बात सुन तोर
तंय पतियाय के लाइक गोठिया, हमला काबर करत अवाक !
धरमिन आय तोर सग पुत्री, तब ले मांगत ओकर मौत
लगथय -“”तंय पगला होगे हस, काम करत नइ तोर दिमाग ?”
पुसऊ किहिस -“”मंय हा नइ पगला, जउन बताय जमों सच आय
यदि विश्वास मोर ऊपर नइ, पता करव जा छुईखदान.
असली मं मंय समझ पाय नइ, धरमबती के भाषा व्यंग्य
मंय भुलाय रेहेंव गुमान मं – समधी पाय धनी अड़जंग.
मोर मया हा जहां बीत गिस, पहुंच गेंव खट छुईखदान
असरुके व्यवहार देख के, मोर प्रान हा सुखगे ठाड़.
मोर बिगर ओंमन हा दे दिन, मोर मया धरमिन ला दाग
मुख दरसन तक मिल नइ पाइस, तब लगगे तन बदन मं आग.
समधी ला कारण पूछेंव मंय, ओहर कुछ नइ दीस जुवाप
अउ दमांद तिर प्रश्न करेंव तब, ओहर फुंफकारिस जस सांप.
खखुवा के फंकट पर बिफड़ेंव – “”कहां करे धरमिन ला मोर
सम्मुख लान करव अभि सुपरुत, वरना बना दुहूं गत तोर.”
फंकट बोलिस -“”बता तिंही हा – एक वायदा जे कर देस –
मंय हा दुहूं फटफटी तोला, ओला लाने हस का साथ !
तोर पास नइ फुटहा कौड़ी, तब काबर मारे हस डींग
पास मं नइ हरिया अक भुंइया, पूछत पर के कतका खेत !
चालबाज अस तंय सोचत हस – समधी के धन खाहंव लूट
मगर दार हा चुरन पात नइ, तब चहली मतात सब खूंट.
धरमिन हा खुद जीवन ला दिस, रुतो अपन तन माटीतेल
पर तंय बद्दी डारत हम पर, हट जा वरना दुहूं गफेल.”
फंकट धरिस मोर चेचा ला, घर ले बाहिर दीस खेदार
मुड़ ला पटकत उहां ला छोड़ेंव, पहुंच गेंव जे जगह बजार.
हर मनसे के मुंह ले होवत धरमबती के चर्चा ।
उंकर बात सुन अइसे लगगिस – परत मोर पर बरछा ।।
सुनन सकय नइ भिथिया तक हा, नम्मू किहिस कान मं मोर –
“”होना रिहिस तेन तो होगिस, अब तंय घिरिया बात जतेक.
घटना ला लइका तक जानत – हतियारा हे तोर दमांद
मगर साक्ष्य ला दिही कोन हा, फंकट रख दिस सब ला बांध.
अगर भूल के बोम मचाबे, तोरेच पर आहय सब कष्ट
असरुहवय बिकट चलवन्ता, राख बनाही जीवन तोर.”
“”हे कानून सबो के भल बर, तब काबर होहय अन्याय
सुरुखुरुमंय थाना जावत, मोर दुखी के उंहे हियाव.”
अतका बोल ओ जगहा ला तज, थाना पहुंच गेंव गोहराय
बोलेंव – अत्याचार होय हे, तब मंय आय इहां तक दौड़.
असरुडहर ढुलंग गें सब झन, लेवय कोन मोर अब पक्ष
यदि गोहार ला तुम सुन लेहव, तंहने निश्चय न्याय के जीत.”
थानेदार हा मोला घूरिस, किहिस बाद मं डारा मार –
“”तोर टुरी हा मरिस जेन छन, चिरई घलो नई रिहिस मकान.
संकरी लगा – भितर घर मं घुस, धरमिन आत्मघात कर लीस
निरपराध हें फंकट असरु, तंय झन बढ़ा व्यर्थ के बात.
मंय फंसाय बर यत्न करे हंव, मगर प्रमाण हाथ नइ अ‍ैस
आखिर प्रकरण ला खारिज कर, लहुट गेंव चुप उल्टा पांव.”
मंय अड़बड़ करलई करेंव तंह, थानेदार भड़क गिस जोर
तंहने छाती पर पथरा रख; लहुटेंव मुढ़ीपार के खोर.”
दुखी पुसऊ ला दीस सांत्वना, फेर गरीबा बोलिस सोच –
“”लगथय – सबल धनी मन खाहंय, हिनहर के ओद्दा तन नोच.
सब तन इहिच कथा ला सुनथंव – मनसे ला जेवत इन्सान
दाइज दानव हा छुछुवावत, अब नइ बांचय जीयत प्राण.
जब मंय एकर अंदर घुसथंव, दिखत नदानी स्वयं हमार
एक खात धोखा तब दूसर, बत्तर अस देवत हे नेम.
थोथना भार गिरत हन भर्रस, तंहने चेत लहुटथय खूंट
ऊंट जहां जंगल पर चढ़थय, ओकर भरभस जाथय टूट.
घरमिन के शादी जोंगे हस बोर के खुद के पूंजी ।
दूध – दूहना दुनों फूटगें गोभत दुख के सूजी ।।
जुगनू – सुरुज एक नइ होवंय, अन्तर होथय अन्धनिरन्ध
सब रहस्य ला जान के काबर, असरुसंग बनाय सम्बन्ध !
धरमिन ला सुख पाहय कहि के, फंकट ला तंय लड़की देस
लेकिन यहू बात ला जानत – धरती नभ होवंय नइ भेंट.
पुचकट लछनी बचे हवय अभि, ओकर कइसे निभिहय ब्याह
पूंजी पसरा राह पकड़ लिस, टोर भला अब खुद के न्याय ?”
धर के मुड़ी बइठ के उखरु, सुनत पुसऊ हा धर के ध्यान
कहिथय -“”सोला आना सत्तम, होगिस खतम मोर अभिमान.
एक बिहाव मं नसना टूटिस, जतका अस धन जमों खुवार
लछनी के शादी अब मुश्किल, जीवन मोर होत धिरकार.”
जइतू बोलिस -“”फिक्कर झन कर, हिम्मत अंड़ा बढ़ा तंय गोड़
धीरज – कर्म साथ यदि होवत, मनसे जीत जथय सब होड़.
लछनी के शादी जब होहय, तब झन करबे वर के छांट
नेक व्यक्ति अउ बंहाबली संग, जोर सकत वैवाहिक गांठ.
यदि बसुन्दरा तभो फिकर नइ, पर आदत मं निश्छल साफ
बिपत देख झन घबरा जावय, अइसन वर ला पहिली देख.
हम उपदेश कहां ले देवन, उमर मं हम अन लइका तोर
तंय जग के सब भेद ला जानत, अनुभव तक मं कुबल सजोर.”
बुजरुक खिघू बहुत ला सुनथय, तंहने बफल के बोलिस सजोर-
“”अतिक बखत ले तोर सुने हंव, अब तुम सुनव बात ला मोर.
तुम्मन आजकल के टूरा, बड़बड़ात बादर अस खूब
लेकिन मदद करे ले भगथव, जइसे नंदा जथय बन दूब.
खुद ला बड़ ज्ञानिक बोलत हस, बुजरुक ला देवत उपदेश
अगर बिपत ला हरना होहय, तंहने घुसड़ जहय सब टेस.
न्यायालय सच निर्णय देतिस, दैनिक सत्य बतातिस सोध
तब फिर काकर गरज परे हे – इनकर डंट के करय विरोध !
तंय हा चाहत देश के उन्नति, मगर विचार होय नइ पूर्ण
जलगस जनता कष्ट भोगिहय, कोदई समान छरा के चूर्ण.”
खिघू एल्ह के ताना मारिस, तंह जइतू ला चढ़गे खार
यद्यपि मनसे नींद ला भांजत, मगर चढ़त बिच्छी के झार.
पूछिस -“”काबर कहत बिस्कुटक, साफ बात ला सब तिर फोर
अपन शक्ति भर मदद ला देहंव, मोर पांव पाछू नइ जाय.”
धांधिस खिघू -“”अगर राजू हस, लछनी संग कर लेव बिहाव
पुसऊ के फिक्र खतम चुर्रुस ले, ओकर जीवन नव उत्साह.”
खूब अकबका भीड़ हा देखत, बोलई बंद मुंह हा चुपचाप
बक खा गीन गरीबा मेहरु, मानों सूंघिस बिखहर सांप.
हांक बजा के जइतू बोलिस -“”सुन लव बात कृषक बनिहार
मंय हा लछनी ला अपनाहंव, खिघू के सरियत हा स्वीकार.
मंय हा दाइज नइ मांगव – नइ होवन दंव बरबादी ।
व्यर्थ खर्च ला रोक लगाबो – साधारण अस शादी ।।
सब मनसे के हृदय फूल गिस, मगर पुसऊ ला ब्यापत फिक्र
चम्पी हा कारण जाने बर, करिस पुसऊ ले तुरुत सवाल –
“”जइतू हा स्वीकार लीस सब, करिहय लछनी साथ बिहाव
ओहर दाइज तक नइ मांगत, हर्षित हवंय जमों इंसान.
नोनी के तंय सगे ददा अस, मगर लुकावत अपन विचार
यदि मन मं शंका हे कोई, सब के पास खोल दे साफ ?”
बोलिस पुसऊ -“”तुमन जानत हव – भारत हा शहीद हो गीस
ओकर विधवा अमरउती हा, पावत हवय कष्ट गिदगीद.
याने सेना के जवान मन, बोकरा असन मरत अध बीच
तंहने ओकर खटला बपरी, आपसरुप घुसत दुख कीच.
यदि जइतू पर कुछ दुर्घटना, लछनी के भावी बर्बाद
इही सोच मंय नटत पिछू तन, जइतू ला नइ देत जुवाप.”
मेहरुकथय -“”गलत सोचत हस, शंका तोर स्वप्न अस व्यर्थ
सब सैनिक मन बीच मरंय नइ, कतको झन भोगत सुख अर्थ.
मन के भ्रम डर ला बाहिर कर, लछनी ला जइतू संग भेज
इनकर जोड़ी लकलक फभिहय, तोर माथ हा उठिहय ऊंच.”
खिघू किहिस -“”शुभ टेम पाय हस, लछनी ला जइतू तिर हार
सब के मन जोड़ी पर जावत, तंय संबंध ला कर सिवकार.
अगर सुअवसर ले चूकत हस, फिर नइ पास समय कंगाल
जइसे बेंदरा फेर पाय नइ, अगर हाथ ले छूटत डाल.”
पुसऊ जमों के कहना सुनथय, मन मं खूब विचारिस घोख
बोलिस -“”तुम्हर सलाह जंचत हे, मंय उत्तर देवत हंव सोध.
लछनी ला मंय हिले लगाहंव, सिर्फ एक जइतू के साथ
मगर “बिदा’ ला अभि रोकत हंव, एक बात हा आवत आड़ –
धरमिन – आत्मा शांत होय नइ, ए कारण शुभ काम थेम्हात
कुछ दिन बाद अपन लछनी ला, करिहंव बिदा हर्ष के साथ.
पर जइतू ले आस एक ठक – रहय अपन प्रण मं अंड़ ठाड़
वरना लछनी के चरित्र पर, लग जाहय बदनाम के दाग.”
जइतू हा स्वीकार करिस तंह, सबके मन भर गिस संतोष
पुसऊ के हिरदे फूल फूल गिस, काबर के पागिस प्रण ठोस.
खिघू हा पुसऊ ला झिड़की दिस -“”जइतू जब बन गीस दमांद
एमन ला जेवन करवा अउ, बढ़ा प्रेम ला कड़कड़ बांध.
जइतू मेहरुपुसऊ गरीबा बइठिन खाए खाना ।
लछनी लजालजा के परसत देखत हे करनेखी ।।
जइतू अउ लछनी मन देखिन, एक दुसर ला तिरछा नैन
कुछ मुसकान मुंहू पर आवत, मगर प्रेम नइ खोलिन बैन.
इंकर दुनों के हालत देखिन, मेहरुअउर गरीबा मित्र
मगर बात ला लुका के रख लिन, फइलन दीन प्रेम के इत्र.
जेवन कर जब बाहिर आथंय, तब इनकर मं चलत मजाक
कथय गरीबा हा मेहरुला -“”सुन तो मित्र एक ठक बात.
मंय लछनी ला देख पाय नइ, मंय तो भोजन मं बिपताय
यदि तंय लछनी ला देखे हस, बता भला ओकर कस रुप ?”
मेहरुकिहिस – “”करंव का वर्णन, लछनी हे खूबसूरत दिव्य
जइतू ओकर एंड़ी के धोवन, टका सेर के अंतर जान.
बिगर पुछन्ता के होवत हम, जइतू करय हमर नइ याद
लछनी संग मं भूले रहिहय, काकर करा करन फरियाद !”
जइतू हा मुसकावत बोलिस – “”झनिच लगाव मोर पर दोष
सब संबंध तुम्ही जोड़े हव, अपन कर्मफल तुम खुद खाव
पर मंय रायगढ़ शहर मं रहिथंव, हम जानत मित्रता के अर्थ
तुम्हर कदर जीवन भर करिहंव, अमर सदा बर रिश्ता मीठ.”
तीनों झन सुन्तापुर लहुटिन, अ‍ैस गरीबा अपन मकान
तभे अ‍ैस टहलू अउ बोलिस -“”आय मोर पर दुख के भार.
जब धनवा के सब नौकर मन, करे रेहेन हठकर हड़ताल
उही बखत मंय बदे रेहे हंव – बोहंव अवस जंवारा जोत.
मोर कसम हा झन टूटय कहि, उठा डरे हंव बड़ जक काम
पर रुपिया के परत लचारी, जबकिन अठवई लगगे आज.
नरियर लिम्बू बोकरा कुकरी, अब तक ले नइ पाय खरीद
देव काम हा सिद्ध हे निश्चय – जब लेहंव ऊपर के चीज.
मोर पास हे खेत एक ठन, ओला बेच दुहूं मंय आज
यद्यपि अंतस मं दुख होवत, मगर सिद्ध करिहंव शुभ काम.”
कथय गरीबा -“”भइया टहलू, अब तो नींद छोड़ के जाग
तोर पास जब कुछ कूबत नइ, काबर धरत व्यर्थ फटराग !
देव – धर्म ला निश्चय मानों, लेकिन पूर्व जांच लव टेंट
गलत काम ला तंय उठाय हस, जब नइ शक्ति भरे बर पेट.
अब तंय हा कइसे निपटाबे, आय मुड़ी पर गहगट काम
पूर्ण करत तब कंगला होवत, अगर अपूर्ण होत बदनाम.”
किहिस गरीबा हा समझौती, पर टहलू ला लग गिस बाण
तमकिस -“”सब उपदेश ला देथंय, मगर मदद ले झींकत हाथ.
धनसहाय हा हवय दयालू, जेहर सबके हरथय कष्ट
ओकर शरण मं अब गिरना हे, काबर करंव समय ला नष्ट !”
खूब भड़क के कथय गरीबा -“”अपन ला बेंचेस धनवा – हाथ
अब ओकर तिर खेत ला बेचत, अपन गृहस्थी बेंच दे बाद.
तुम्हरे धन ला धनवा खाथय, ऊपर ले हलात छे हाल
साग के मोल मं धरती लेथय, सब ला बना डरिस कंगाल.”
टहलू किहिस – “”मोर दुख ला अब धनवा काट उड़ाही ।
तोर बात ला अगर जानिहय – धुमड़ा तोर खेदाही ।।
कथय गरीबा -“”टेस बता ले, तंय हा खर्चा कर ले खूब
तंय हा बोये हवस जंवारा, तहू ला कहि आवश्यक काम.
धनसहाय के परसंसा कर, पर सबके फल मं नुकसान
धनवा ला तंय कहत हितैषी, तोला उहिच छोड़ाहय गांव.”
कुरबुरात टहलू हा रेंगिस, जरमिर धनवा के घर गीस
ओकर तिर मं लिख दिस लिखरी, ताकि खूब बजनी बज जाय.
धनवा कहिथय -“”मंय जानत हंव – कहां गरीबा के दिल साफ !
इरखादोसी रखत मोर बर, तभो ले मंय कर देथंव माफ.
काबर पहुंचे हवस मोरतिर, फुरिया भला स्वयं के काम
अपन शक्ति भर मदद ला करिहंव, यद्यपि तंय गुनहगरा आस.”
टहलू बोलिस -“”तंय जानत हस – मंय हा फुलवारी ला बोय
पर रुपिया बर लंगड़ी खावत, धुरा ला मंय पटकत हंव दोंय.
मोर पास हे खेत एकेच ठक, ओला अपन पास रख लेव
ओकर बल्दा रुपिया देके, अड़त काम ला सरका देव.”
धनवा डांटिस -“”तंय अबूज अस, काबर बेचत अपन जमीन
ओला अपन पास तंय धर रख, अपन हाथ रोटी झन छीन.
यदि तोला रुपिया आवश्यक, मंय बन जावत धारन तोर
रुपिया ला वापिस नइ लेवंव, धर्म काम मं उड़िहय शोर.
लेकिन जभे मोर नौकर मन, करंय भड़क के मोर विरोध
मोर पक्ष ला तंय हा लेबे, काम बीच झन हो अवरोध.”
धनसहाय हा रुपिया गिन दिस, टहलू लीस लमा के हाथ
ओतकी बखत झड़ी हा आथय, सुंतिया पयकड़ा ओकर हाथ.
गहना ला धनवा ला सौंपिस, तंह धनवा हा रखिस सवाल –
“”मोला काबर गहना देवत, कुछ तो बता गोठ ला साफ ?”
किहिस झड़ी – “”मालिक, तंय हा सुन – मोला देस बाढ़ी मं धान
उही कर्ज ला छूट दुहूं मंय, तंय गहना ला कर स्वीकार.”
धनवा कथय -“”कहां भागत हस, अतका लउहा के का बात
नवा फसल जब हाथ मं आतिस, तंह लागा ला देतेस छूट.”
“”मोर परानी बिस्वासा हा, मर के सरग तनी चल दीस
ओकर गहना सरत घरे मं, अउ गहगट कर्जा मुड़ मोर.
मोर कष्ट मं मदद करे हस, मोर फर्ज हे कर्ज पटाय
मालिक, तंय हा गलत सोच झन, करहूं मान तोर अहसान.”
टहलू – झड़ी निकल गिन बाहिर, तंहने टहलू हेरिस बोल –
“”धनसहाय हे बहुत दयालू, ओकर असन कोन अउ आन !
मोर जमीन ला हड़पे लेतिस, हाथ ले भगतिस धनहा नाट
मंय मूरख हीरा त्यागन कर, कांच ला धरतेंव बिगर उवाट.
गहगट धान तभो झोझा पर, बिगड़ के रहतेंव मंय कंगाल
अपन हाथ मं चुन के गिरातेंव, फसकरा बइठे हंव जे डाल.”
बोलिस झड़ी -“”ठीक बोलत हस, धनवा के हिरदे हे साफ
गिरे परे ला पकड़ उठाथय, दीन हीन के करत सहाय.
मंय ओकर लागा छूटे हंव, मुड़ के उतरिस हे सब बोझ
अब मोला निÏश्चत जनावत, वाकई लागा हे बेकार.”
धनवा के गुन ला गावत ओ तिर ले रेंगिस टहलू ।
आगू तन बूता का करना तेकर हेरत पहलू ।।
नम्मी के दिन दन्न पहुंच गिस, होम हवन टहलू घर होत
सब ग्रामीण उंहे सकला गिन, देखत हवंय जंवारा जोत.
फुलवारी के पांव परिन अउ, ठंडा बर लेगत हें ताल
टहलू के खटला बोधनी हा, फट ले धर लिस बने सम्हाल.
धोवा लुगा पहिर के बोधनी, छरिया रखे हवय सब बाल
जोत जंवारा ला मुड पर रख, चलत हलू अक गोड़ उसाल.
टहलू धरे हाथ मं खप्पर, गुंगुवा उड़त आंख तक जात
गर्मी कारन चुहत पसीना, पर ओला पोंछन नइ पात.
चोवा – गुहा साथ भगवानी, बन के देव देखावत जोश
लोहा के तिरछूल धरे हें, ओला ऊपर तनी उठात.
हा हा करके नंगत कूदत, मुड़ पर दही थपथपा थोप
अपन देह ला सांट मं पीटत, लोर परत तेकर नइ ख्याल.
लोह खड़ऊ पर चढ़ पोखन हा, रेंगत हवय पचापच कूद
गोड़ पिरावत तेकर गम नइ, लोगन झन बोलंय – मरदूद.
बइगा हा भुन भुन मंतर पढ़, मारत कामिल लिमऊ ला काट
जोत ले ऊपर चांउर छीतत, अउ कभु पर ले मांगत सांट.
बउदा भुखू मंगतू अउ नथुवा, उंकर साथ मं अउ कई लोग
ओ सेवक मन बाजा ला धर, खूब बजावत धुन के साथ.
एक दुसर के राग ला झोंकत, मार अवाज गात जसगीत
दूसर तन के सुध बुध नइये, मात्र गीत पर उंकर धियान –
“”बर अगुवावय – पीपर पिछुवावय
हो मैय्या मोरे
लिमवा हे धरम दुवारे
सेवा में हो मैय्या हमूं हा आबो … ।
नीमवाकेनीर तीर मोर गड़ेला हिंडोलना
लाखों आवय लाखों जावंय … ।
कोने मैय्या झुले हो मोर कोन हा झुलावे
कोने मैय्या देखन को आवे … ।
बूढ़ी मैय्या झुले कोदइया मैय्या झुलावय हो
लंगुरे हा देखन को आवै … ।
झुलत झुलत मैय्या बिधुन हो गई हो
टूट गई नौ सेर के हार हो … ।
कामें सकेलंव मैय्या मोरे हरवा अऊ डोलवा
कामें सकेलंव नौ सेर हार हो … ।
टोपली सकेलय मैय्या हरवा अउ डोलवा
दौंरी सकेलय नौ सेर हार हो … ।
कामें गुंथाये मैय्या हरवा अउ डोरवा
कामें गुथाये नौ सेर हार हो … ।
पटुवे गुंथाये मैय्या हरवा अउ डोरवा
रेशम गुंथाये नौ सेर हार हो … ।
बूढ़ी मांई पहिरे हरवा अउ डोरवा
लंगुरे हा पहिरे नौ सेर हार हो … ।
सेवा मं हो मैय्या हमूं हा आबो … ।।
घाम जनावत तभो ले मनखे देख – सुनत हें गाना ।
नवकल्ली मन खांद बइठके आनंद लेवत नाना ।।
निरबंसी औरत हा लानत, हंउला मं भर भर जल साफ
ओला धरती पर रुकोत अउ, चिखला पर खुद हा सुत जात.
सोचत – मंय ओरछत हंव पानी, तब प्रसन्न होहय भगवान
सेवा करे मं सेवा मिलिहय, मोर गोद आहय सन्तान.
बहुरा काम सिद्ध होवय कहि, केंवरी बहू ला शिक्षा देत –
“”चेत लेग झन दूसर कोती, सिर्फ देव पर रख तंय ध्यान.
चिखला माटी पर ढलगे हस, लेकिन झन कर एकर फिक्र
दिही देव वरदान मं तोला – चंदा असन एक औलाद.”
केंवरी हा पेट घंइया ढलगिस, देव ला बिनवत बारम्बार
बोधनी हा ओकर ऊपर ले, पांव उठाके नहकत पार.
पर चिखला मं पांव फिसल गिस, तंह बोधनी गिर गीस दनाक
जोत जंवारा हा गिर जाथय, सुते केंवरी पर भड़ड़ाक.
केंवरी के पति हवलदार हा, कुआं ले जल हेरत भर लेंज
केंवरी के चित्कार ला सुनथय, होगिस सुन्नबुद्धि जे तेज.
हवलदार झुक के गिर जाथय, कुआं के अंदर मुड़ के भार
वंश बढ़ाय उदिम ला फांदत, मगर परत जीवन पर वार.
हवलदार हा बच जावय कहि, कुआं डहर दउड़िन सब व्यक्ति
बोम परत ओमन चिल्लावत, बीच मं रुकगे होवत भक्ति.
अंदर कुआ कोन हा जावय होवत शक्ति परीक्षा ।
हवलदार ला ऊपर लानय बचा अपन जिनगानी ।।
पिनकू हा बहुरा ला पूछिस -“”जब तुम्हरे पर संकट आय
बुकतू कहां दिखत नइ दउहा, मदद करे बर कार भगात ?”
बहुरा आंसू ढारत बोलिस – “”दुब्बर बर दू ठक बरसात
बुतकू ला अजार हा टोरत, खटिया छोड़ उठन नइ पात.
हवलदार पर गाज गिरत अब, ओकर हालत जानत ईश
तुम्हीं बचाव कुआं अंदर घुस, तुम्हर सिवाय मोर अउ कोन !”
कथय गरीबा ला पिनकू हा – “”तंय हा फुरिया अपन विचार
तिंही एक झन लान सकत हस, हवलदार ला बाहिर पार.”
झंउहा ला डोरी मं फांसिन, अब “चइली’ कड़कड़ बंध गीस
ओकर पर बइठीस गरीबा, कुआं मं घुसरिस हिम्मत बांध.
हवलदार ला कबिया धरथय, ओला राखिस खुद के पास
गुहा साथ भगवानी फेंकन, आगू तन के जोंगत काम.
ओमन डोरी ला झींकत हें, वजन के कारण फूलत सांस
लेकिन करतब पूर्ण करे बर, एकोकन नइ थेम्हत काम.
बाहिर पार गरीबा निकलिस, हवलदार हा ओकर जून
बने देह भर घाव बहुत ठक, जगह जगह ले फेंकत खून.
चटपट बैठक बैठ गीस तब, फेंकन बोलिस जोर अवाज –
“”भाई बहिनी शांत रहव तुम, मोर गोहार ला सरवन लेव.
हवलदार हे मरे के लाइक, केंवरी के घायल हे देह
दैविक काम उठावत टहलू, तउन मं पर गिस फट ले आड़.
बहुत अनर्थ होय हे काबर, आखिर कोन रचिस षड़यंत्र
तुम्मन जमों एक संग मिल जुल, वाजिब बात पता कर लेव !”
डकहर हा टहलू ला बोलिस -“”तंय हा जोत जंवारा बोय
लेकिन दैविक काम मं बाधा, काम होय हे अशुभ खराब.
यद्यपि हवलदार हा जीयत, पर झूलत हे मृत्यु के बीच
ओकर खड़े होय बर लगिहय, अड़बड़ अक रुपिया के खर्च.
जमों खर्च ला उठा तिंहिच भर, हवलदार ला तंय कर ठाड़
ए दुर्घटना तोरेच कारण, तब सब जिम्मेदारी तोर.”
टहलू छरकिस -“”मंय लचार हंव, पहिलिच रिता होय हे जेब
फेर कहां ले रुपिया लानंव, मोर मुड़ी मं झन रख बोझ.”
कहिथय सुखी -“”बहाना झन कर, तोर पास हे धनहा खेत
ओला हवलदार के हक कर, वरना तंय फंसबे हर ओर.”
हवलदार ला टहलू हा दिस अपन एकड़ा डोली ।
धनवा तिर ले बचिस तेन हा जावत पर के झोली ।।
धनवा हा पूछिस बोधनी ला – “”तंय हा चलत ठीक अस चाल
पर केंवरी पर दन्न गिरे हस, खुद तन तक नइ सकेस सम्हाल.
तोला फट ले कोन ढकेलिस, दुर्घटना का कारण होय
बइठक पास रहस्य बता तंय, एकर बिन नियाव नइ होय ?”
किहिस बोधनी -“”का बोलंव मंय – सब ला नाश करिस विज्ञान
यद्यपि मंय सच ला गोठियाहंव, पर हो जहय अंधविश्वास.
मोर गोड़ आगू तन रेंगत, तभे उदुप दुखिया दिख गीस
छरिया चुंदी – आंख ला छटका, चुहके बर रक्सिन हा अ‍ैस.
मोला उठा दोय ले पटकिस, फट चढ़ गिस छाती पर मोर
सपसप मोर लहू ला चुहकिस, तब मंय दिखत बहुत कमजोर.”
कैना हा दुखिया ला बोलिस – “”जमों कार्यक्रम सत्यानाश
एकर दोष तोर मुड़ बइठत, काबर करे अनीतिक काम ?”
दुखिया कथय – “”गोहार ला सुन लव – मंय हा रखत अपन सच तर्क
मंय निर्दाेष हवंव वाजिब मं, नइ चढ़ात हंव गप के वर्क.
देखत रेहेंव जंवारा ला मंय, बोधनी ले रहि अड़बड़ दूर
गिरिस बोधनी खुद गल्ती ले, तब पर – पर लांछन झन आय.
जादू टोना जग मं नइये, तंत्र मंत्र हा झूठके जाल
तब मंय कहां ले टोनही रक्सिन, मोला झनिच करव बदनाम.”
धनवा हा बउदा ला बोलिस – “” तुम अमली के गोजा लेव
दुखिया ला पीटव मरते दम, मंत्र के शक्ति खतम कर देव.
आय गांव के नियम इही हा, नियम के पालन निश्चय होय
तभे गांव पर बिपत आय नइ, दुखिया तक हो जाहय सोझ.
एकर पर हम सोग मरत हन, पर दुखिया बोलत हे झूठ
अबला समझ तरस खावत हन, लेकिन एहर मारत मूठ.
एला अगर दण्ड नइ देवत, टोनही हमला खाहय भूंज
दुखिया ला मरते दम झोरव, टूटय झन गांव के कानून.”
बउदा अमली गोजा धर लिस, दुखिया ला सड़सड़ रचकात
दुखिया हा मतात हे खुर्री, मगर मार ले बच नइ पात.
अतियाचार राजबयजन्त्री, मनखे मन देखत चुपचाप
ओमन ला विश्वास कड़ाकड़ – जादू टोना हर अतराप.
केजा हा सब झन ला बोलिस -“”बउदा ला झन मारो रोक
ओहर दुखिया ला झोरत हे, टोनही ला कंस पीटन देव.
दुखिया तंत्र मंत्र के ज्ञाता, पर ला करत हवय बर्बाद
पर बर जेहर गड्ढा कोड़त, उहू एक दिन सजा ला पाय.”
दुखिया हा लस खांके गिरतिस, अ‍ैस गरीबा करे बचाव
बउदा उहू ला मारिस गोजा, मगर गरीबा देवत जोम.
ताकत लगा झटक लिस गोजा, बउदा ला मारिस भर लात
बउदा हा भुंइया पर गिरगिस, रटरट टूटिस दू ठक दांत.
धनसहाय हा नाटक देखत, लेवत हे अन्याय के पक्ष
बोलिस -“”तंय काबर छेंकत हस, बड़ा आय हस बन के शेर.
दुखिया के हम रगड़ा टोरत, ताकि दुसर मन पावंय सीख
पर तंय गलत पलोंदी देवत, टोनही के बढ़ात हस मान !”
धनवा हा नक्सा मारे बर, दांत कटर के धमकी दीस
मगर गरीबा भय नइ खाइस, उहू शक्ति भर चमकी दीस –
“”जादू टोना नइये जग मं, एकर हवय तोर तिर ज्ञान
मगर गांव मं राज करे बर, रुढ़ि के पक्ष लेत हस तान.
औरत के स्तर उठाय बर, तंय दूसर ला देत सलाह
पर दुखिया ला खुद पिटवावत, इही आय का हरचंद न्याय ?”
धनवा बोलिस -“”मंय देखत हंव – लेवत हस दुखिया के पक्ष
एकर अर्थ इही तो होथय – ओकर तोर बीच संबंध.
यदि ए बात अगर सच अस सच, खुले आम दुखिया ला लेग
तुम्हर बीच हम आड़ बनन नइ, काबर परन प्रेम मं बेंग ?”
खड़े भीड़ दुखिया ला एल्हत, फगनी उड़ावत हांसी ।
कमउ मरद ला कभू छोड़ झन ओकर बन जा दासी ।।
कथय गरीबा ला बन्जू हा – “”खतरा साथ करत तंय खेल
दुखिया हा अखण्ड टोनही ए, पत्नी बना अपन घर लेग.
मनसे तोर प्रशंसा करिहंय – हवय गरीबा निर्भय जीव
दुखिया खतरनाक टोनही हे, तउनो तक ला अपन बनैस.”
दुखिया ला चढ़गीस रोष तंह, कहिथय सबके मुंह ला थेम –
“”भले गरीबा छरक भगय पर, ओकर मोर चलत हे प्रेम.
धनवा अउ ग्रामीण जमों मिल, पंइठू बर खिरखिन्द मचात
उंकर बात ला मानत हंव मंय – घुसत गरीबा के घर आज.”
कथय गरीबा -“”कइसे बोलत – तोर मोर कुछ नइ संबंध
अपन साथ तोला नइ राखंव, जा घर अपन बात कर बंद.”
दुखिया किहिस -“”कहत हस ठौंका, अब तक रिहिस अलग अस राह
पर जब सब झन जोश चढ़ावत, एक सात करबो निर्वाह.”
दुखिया गोड़ पटक के रेंगिस, ओकर पिछू गरीबा गीस
करय गरीबा हा का रउती – दुखियाबती ला अपना लीस.
पिनकू अपन मकान मं अमरिस, तंह कोदिया हा रखिस सवाल –
“”नम्मी परब आज मानत हन, एकर तोला हे कुछ ज्ञान !
कब के चीला बने रखे हंव, देखत हवंव राह मंय तोर
लेकिन तंय छयलानी मारत, एती करा होत सब चीज.”
कोदिया हा चीला परसिस तंह, पिनकू देखत पलट उसेल
चीला दिखत हवय घिनमिन अस – थोरिक अस डराय गुड़ तेल.
कोदिया हा पिनकू के दाई, तब कोदिया हा जेवन दीस
तेला पिनकू हा नइ भावत, यने स्नेह के हे अपमान.
पिनकू हिनथय -“”दाई, तंय सुन – पेट मं चीला कइसे जाय
देखत साठ भिरंगगे मन हा, नइ जानस का जिनिस पकाय ?”
कोदिया सुनिस अन्न के फदिहत, तंहने भड़क कथय फुंफकार –
“”रज गज खा के पले बढ़े हस, लेकिन आज करत इंकार.
पहिली के धन कहां हमर तिर, बस दू हरिया पुरती खार
तोर ददा ला रोग धरिस तंह, जमों बोहा गिस धारोधार.
ओकर प्रान हा होगिस चंदन, अब तंय देख बिपत के खेल
घर के जमों जिनिस हा भटगे – पैजन पहुंचा फुली हमेल.
तंय रांड़ी अनाथिन के लइका, लेकिन करत धनी संग रार
अवघट घट मं यदि मिल जाबे, ओमन दिहीं मार फटकार.
तोला नांदगांव भेजे हंव, विद्या पाय मोर प्रिय पुत्र
पर तंय हा चुनाव तक लड़थस, भूल जथस करतब के सूत्र.”
पिनकू हा क्रोधित हो जाथय, कोदिया के सुन भाखा टांठ
चीला ला धरलिस फटके बर, छोड़ दीस कुछ खाय विचार.
पर कोदिया हा फिर समझाथय -“”महिनत करथंय श्रमिक किसान
बहुत कठिन मं अन्न हा उपजत, तब झन करव अन्न हिनमान.”
पिनकू हा चीला ला झड़किस, पाठ करत हे अपन किताब
पढ़ते पढ़त नींद चपकिस तंह, कतको किसम के देखत ख्वाब.
बड़े फजर पिनकू हा उठथय, लेवत हवय खींच के सांस
देखे हवय रात भर सपना, फोरत हे कोदिया के पास –
“”दाई, तोला मार डरे हंव, ढेखरा अस तिर के घिरलात
तोला मरघट लेग गेंव अउ, तोर मांस ला चिथके खात.
ममता ला उड़ेल तंय बोलेस – पिनकू, तंय हा झन मर भूख
मोर करेजा ला जेवन कर, लेकिन स्वास्थ्य बना तंय टंच.”
दोंह दोंह पेट हा भरगे तंहने पकड़ेंव घर के रद्दा ।
घुप अंधियार – गिरंव मंय दन दन हालत होगे खस्ता ।।
प्रेम दिखाय मोर ऊपर तंय – यहदे राह तोर घर जाय
मोर मान के सरलग तंय चल, लगन पाय नइ धक्का खाय.”
तोर मान मंय पाय ठिंहा ला, मगर ख्याल आइस कुछ बाद
सपना मं मंय खूब रोय हंव, रहि रहि करेंव याद ला तोर.
उमचिस नींद तंहा मंय जाचेंव – दसना मं आंसू के धार
बाय बियाकुल जीव करत हे, मन पछतावत बारम्बार.”
पिनकू बोलिस -“”मंय जवान हंव, पर किंजरत ठेलहा बेकार
यद्यपि शासन करत कुजानिक, लेकिन कतरा दोष लगान !
तंय हा बिसर मोर सब गल्ती, पढ़त पढ़त मंय करिहंव काम
मंय अनाज के मान ला रखिहंव, गप नइ मारंव गाड़ के खाम.”
कोदिया अपन पुत्र पिनकू ला, छाती लगा स्नेह बरसात
ममता दृष्य हो जातिस अंकित, चित्रकार यदि ओतकी टेम.
पिनकू हा मेहरुतिर पहुंचिस, उहां कहत सपना के हाल –
“”वास्तव मं तुलना नइ होवय, मां के ममता संग सब चीज.
स्वयं कष्ट ला भोगत लेकिन, करत पुत्र पर अतुलित प्यार
दूध के ऋण ला कोन हा छूटत, रहत अंत तक ओकर भार.”
मेहरुआंखी फाड़ सुनत हे, ओला होत बहुत आश्चर्य –
“”जेन गोठ तंय अभि बोले हस, वास्तव मं भावनात्मक आय.
ममता ला उंचहा दर्जा दिन, लेखक मन हा बिगर विचार
याने ददा अउ महतारी मं, कर दिन ठाड़ भेद दीवार.
एमन दुनों एक अस करथंय, अपन फूल पर प्यार समान
एक तराजु मं तउलावंय, एक भार के इज्जत मान.”
पिनकू गुनिस – तर्क वाजिब हे, सुद्धू आय पुरुष इंसान
करिस गरीबा के पालन ला, एकोकनिक करिस नइ भेव.
याने बालक के रक्षा बर, औरत मरद करत हें यत्न
ओमन पांय एक इज्जत यश, कउनो झनिच पाय पद ऊंच.
पिनकू हा मेहरुला बोलिस -“”परब दसरहा मानत आज
चल “बंछोर’ दुनों झन जाबो, उहां जात मानव के भीड़.
उहां “रामलीला’ तक खेलत, होत राम – रावण मं युद्ध
जब रावण हा मारे जाथय, नाटक देख होत मन शुद्ध.”
मेहरुकिहिस – “”करिस रावण हा, जग ले बाहिर का अन्याय
मार खात हर बछर बिचारा, ओकर अबगुन ला कहि साफ ?”
“”जनता ला दिस कष्ट भयंकर, हिनहर मन पर अत्याचार
नारी के हिनमान करिस हे, यने रिहिस धरती बर भार.”
“”तंय उदाहरण जइसन देवत, वइसन रावण जियत समाज
हिनहर मन के लहू चुहकथय, भोगत हवय स्वर्ग के राज.
कागज लकड़ी ला बारे मं, रावण हा समाप्त नइ होय
ओहर रक्तबीज अस बाढ़त, बिपत बांट के सुख ला पात.
जीयत रावण जलगस किंजरत, तलगस दुख पाहय संसार
पहिली एकर बुता बनावव, तब होही जग के उद्धार.
पर ए काम बहुत मुस्कुल हे, हवय दुनों रावण मं भेद
ओ रावण के रिहिस मुड़ी दस, याने रिहिस अलग पहिचान.
तभे राम हा मार गिरा दिस, उहि रावण ला बिल्कुल तूक
अपन लक्ष्य ला राम अमर लिस, उही कथा सुनथन बन मूक.
लेकिन हवय आधुनिक रावण, सबके मित्र नेक इंसान
वेष चाल अउ काम प्रतिष्ठित, हमरे घर कर ओकर थान.
हम रावण ला मारे चाहत, लेकिन कहां अलग पहिचान
तब खलनायक हा बच जाथय, अउ नायक पर परथय बान.”
पिनकू बोलिस -“”ठीक कहत हस, इही मं चरपट होवत देश
पर तंय मोला बुद्धू समझत, तब देवत बढ़ के उपदेश ?”
मेहरुफांकिस -“”गलत समझ झन, मंय देवत हंव नेक सलाह
ठीक बात ला यदि नइ अमरत, तुम धर सकत गलत असराह.
तुम जवान के तिर मं होथय, अड़बड़ शक्ति भयंकर जोश
लेकिन क्रोध अधिक ते कारण, तुम्मन खोवत हव सच होश.
देश विकास करे बर धरथव, करना चहत तुमन नव क्रांति
पर दिग्भ्रमित तुमन हो जाथव, तंहने अपन लक्ष्य नइ पाव.
रावण कोन आय तेला पहिली सच पता लगाना ।
ओकर बाद प्रहार करे बर जावव धर के बाना ।।
अपन बुद्धि ला शांत धीर रख उचित राह पर जाओ ।
जउन काम तेला पूरन कर लक्ष्य सफलता पाओ ।।

५. बंगाला पांत समाप्त

गरीबा महाकाव्य (छठवया पांत : तिली पांत)

६. तिल्ली पांत
वंदना
अपन तरी मं रखत अंधेरा – दूसर जगह उजाला ।
अपन बिपत ला लुका के रखथय – पर के हरथय पीरा ।।
खुद बर – पर के दुख ला काटत उही आय उपकारी ।
पांव परंव मंय दिया के जेकर बिन नइ होय देवारी ।।
काव्य प्रारंभ
“मंगलिन कपड़ा मिल’ एक ठक हे, ओकर स्वामिन मंगलिन आय
ओकर गरब अमात कहूं नइ, काबर के धन धरे अकूत.
कपड़ा मिल के कुछ आगुच मं, सकला खड़े हवंय मजदूर
खलकटभाना बुल्खू द्वासू, झनक बैन अउ कई मजदूर.
उंकर हाथ मं मांग के तख्ती, ओमां लिखे मांग के बात
सब के मुंह मं क्रोध उग्रता, चिल्ला रखत हवंय हक मांग.
भाना सब ला सम्बोधन दिस – “”हम कमात हन जांगर टोर
हर कर्तव्य करत हन पूरा, मानत हन मालकिन आदेश.
मगर स्वयं के हक नइ पावत, पेट हे सप सप बिगर अनाज
पहिरे बर चेंदरा तक कमती, हम कब पाबो सुख के राज ?
तरतर तरतर चुहत पसीना, श्रम के कारण करिया देह
पर एको झन सोग मरत नइ, जीयत मं भोगत हन नर्क.”
श्रमिक बीच मं झनक खड़े हे, जउन श्रमिक नेता विख्यात
सदा श्रमिक के पाती दाबत, ओकर धाक मान हर ओर.
झनक के मुंह बम लाल क्रोध मं, ओहर कहत देखा कंस जोश –
“”मितवा मजुर, आय सच एहर – सुख के सुरुज हमर ले दूर.
वास्तव मं मंगलिन हा शोषक, पर हक मारत बन के क्रूर
करय श्रमिक पर दया मया नइ, जोंख असन चुहकत हे खून –
हमर प्रार्थना ला लतियावत, तब हम घलो लेन प्रतिशोध –
कर हड़ताल काम सब रोकव, मिल स्वाहा कर ढिल दव आग.”
श्रमिक मित्र बुल्खू हे ओ कर, उहू सुनिस भाषण कर चेत
बुल्खू मंथिर बुद्धि के स्वामी, उग्र शब्द ला नइ अपनैस.
पर उहि भाषण सुनिन श्रमिक मन, उझलत उंकर जोश के ज्वार
मुंह ला उला लगावत नारा, बंगी पढ़त बहुत बेकलाम.
तख्ती धर आगू तन जावत, ओमा लिखे हवय कई बात –
मुर्दाबाद होय मंगलिन के, सब मजदूर के जिन्दाबाद.
हर मनखे ला मंगत समर्थन, ताकि जमों आकर्षित होय
शहर मं किंजरत हवंय निघरघट, सड़क जाम कर रेंगत राह.
खुले दुकान ला बंद करावत, ताकत देखा – आंख कर लाल
जेन दुकनहा बंद करत नइ, ओकर जिनिस करत हें राख.
रमझू रिवघू सुकलू अउ बांके, उंकर साथ अउ कई ग्रामीण
“”पूना के दूकान मं पहुंचिन, रुपिया गिन क्रय करत समान.
ओतकी बरवत श्रमिक मन अमरिन, द्वासू हा हेरिस स्वर जोर –
“”पूना, तंय हा हमर बिपत सुन – हमर मालकिन सब ले क्रूर.
तरहा तरहा के कर दिस तब, हम्मन करत बिकट हड़ताल
तंय हा घलो समर्थन कर दे, तुरुत बंद कर अपन दुकान.”
पूना सब मजदूर ला बोलिस -“”मोर समर्थन तुम्मन लेव
वास्तव मं मंगलिन ला चहिये – तुम्हर मांग कर ले सिवकार.
पर तुम मोरो कोती देखव – दुरिहा के ग्राहक मन आय
बपुरा मन हा जिनिस बिसावत, ओमन ला लेवन दव चीज.
एमन मोला रुपिया देहंय, मोला होत अर्थ के लाभ
एकर बाद तुमन जे कहिहव, मान लुहूं मंय बिन इन्कार.”
भड़किस बैन -“”लफरही झन कर, अपन कमई ला कर दे बंद
हमर कमई हा बंद कड़ाकड़, तोला कार कमावन देन.”
सुकलू हा सब श्रमिक ला बोलिस -“”भइया, हम अन तुम्हर समान
खेत कमाथन मरो जियो रड़, पहती टेम ले बुड़ती बाद.
कृषि औजार बिसाय आय हन, हमला लेवन देव समान
यदि दूकान लगत हे तारा, हमर काम रुक जहय फटाक”.
झनक बिफड़ गिस देहाती पर -“”तुमन पाट भाई अस आव
हमर – तुम्हर हे एक राह मन, बिल्कुल एक ठिंहा उद्देश्य.
पर तुम उल्टा बात करत हव, लगथय तुम अव स्वार्थी जीव
चलव मदद देवव तुम हमला, खुले दुकान ला बंद कराव”.
रमझू किहिस -“”सुकड़दुम हन हम निकल पात नइ बोली ।
यदि हिम्मत कर करत उदेली झाफड़ हमरे झोली ।।
लेकिन शूल हृदय ला मारत – जब तुम्मन चाहत हव मांग
मंगलिन पास पहुंच के बोलव, कार शहर ला देवत कष्ट ?”
भाना के आंखी ललिया गिस, देहाती पर भड़किस जोर –
“”तुम्मन कायर डरपोकना हव, हमर पक्ष ला लेहव कार.
तुम्हर फसल हा चरपट होवत, कभू बाढ़ मं कभू अकाल
ओला देव प्रकोप समझथव, रोवत हव रहि के चुपचाप.
जबकिन तुमला मंगना चहिये – शासन तिर अन धन के मांग
जब तुम कड़कड़ महिनत करथव, सब हक पाय तुम्हर अधिकार.
अपन कान ला टेंड़ के सुन लव – तुम कुछ चीज लेन नइ पाव
हम दुकान ला बंद कराबो, एमां शंका के नइ छेद”.
नेक विचार गंवइहा राखिन, मगर उंकर ला मानय कोन
जमों श्रमिक पूना ला डांटिन, बंद करा दिन तुरुत दुकान.
हवय शहर मं कचरा होटल, नीक प्रबंधक कचरा आय
उहां श्रमिक मन निंगिन दड़ादड़, उठा के फेंकत खाद्य समान.
एकर साथ क्रोध कर खूंदत, रइ छइ कर दिन जम्मों चीज
कचरा हा अकबका के देखत – कते डहर के आफत अ‍ैस.
आखिर मं कंझा के बोलिस -“”मंय हा कर्ज बैंक ले लेंव
ओकर ले मंय जिनिस बिसा के, बनवाये हंव खाय के चीज.
सोचे रेहेंव – चीज जब बिकही, मंय हा नफा कमाहंव खूब
मगर जिनिस ला तुम रौंदत हव, मंय हा केंघर होत बर्बाद.
मोर तोर कभु लड़ई न झगड़ा, मोर दीन पर दया देखाव
जमों जिनीस ला राख सुरक्षित, मोर जीविका बने बनाव”.
बुल्खू चलत श्रमिक के संग मं, कब तक सहय गलत अन्धेर
छेंकिस -“”सुनव श्रमिक भइया हो – कचरा कहत तेन हे ठीक.
वाकइ तुम्मन करत कुजानिक, राह चलत ते हवय अनर्थ
तुम खुद अन्न पाय बर तरसत, पेट भरे बर हव असमर्थ.
खाद्य वस्तु ला नष्ट करव झन, बल्कि खाव ओकर पर पांव
जलगस अन्न देवता जग मं, तलगस जीयत तन मं जान.
इही अन्न ला तुम पाये बर, महिनत करत – करत हड़ताल
होय अन्न – हिनमान कभुच मत, हिरदे ले ओला दव मान”.
बुल्खू जहां श्रमिक ला छेंकिस, झनक ला चढ़गे जलन बुखार
बुल्खू ला प्रतिद्वन्दी मानत, सिरी गिराय होत बउद्दार.
झनक हा बुल्खू ऊपर बिफड़िस -“”श्रमिक उचात क्रांति के काम
जिनिस राख कर – आंतकित कर, प्रकट करत हें अपन विरोध.
तंय मंगलिन के खर दलाल अस, तभे लेत हस ओकर पक्ष
बनत श्रमिक नेता जग जहरित, पर पुंजलग ला देवत लाभ”.
भाना हा बुल्खू पर भड़किस – “”तंय मजदूर के दुश्मन आस
लबरा बादर अस बोली मं, श्रमिक ला पहुंचावत हस लाभ.
तंय मंगलिन केहित के रक्षक, वास्तव मं तंय हा गद्दार
तंय मंगलिन ला देत पलोंदी, तब ओहर लतियावत मांग”.
टांठ गोठ ला सुनिन श्रमिक मन, करिन पसंद हृदय पर राख
बुल्खू ला कर दीन उपेक्षित, मारत बिख के प्रक्षेपास्त्र.
बुल्खू हा रहि गीस कलेचुप, समय आय ओकर विपरीत
जब दुख उल्टा बखत हा आवय, मानव रहय शांत गंभीर.
श्रमिक सुनिन जोशीला भाषण, उंकर जोश हा बढ़ गिस दून
उंकर बढ़त उत्पात बकचण्डी, टोरत हवंय नियम कानून.
आखिर मिल के तिर मं पहुंचिन, बैन हा बोलिस भर उत्साह-
“”नांदगांव के सब मनसे मन, हमला खूब समर्थन दीन.
जेहर हमर बात नइ मानिस, करे हवन ओकर नुकसान
पर आखिर मं लेन समर्थन, शहर बंद हा सफल तमाम.
बचे हवय उद्देश्य एक ठन – मंगलिन ले लेवन प्रतिशोध
तुम्ही सुझाव सघर अक रद्दा – होय शत्रु के खुंटीउजार.”
झनक हा सब झन ला उम्हियावत -“”मंगलिन हमला करत तबाह
ओकर नसना ला टोरे बर, मिल मं आगी ला ढिल देव”.
कतेक अनर्थ सहय बुल्खू हा, झनक ला बोइर अस झर्रात-
“”अपन जिदद् के झण्डा फहरा, कोतला बना श्रमिक ला राख.
लेकिन गलत सलाह झनिच दे, श्रमिक के मुड़ चढ़ जहय नराव
कउनो नइ पतियायंय तोला, यने तोर नंगत नुकसान.
बुल्खू हा मजदूर ला बोलिस -“”तुम्हर शत्रु मंगलिन हा आय
ओकर मिल मं बुता करव झन, बइठव रात दिवस हड़ताल.
रखव सुरक्षित कारखाना ला, ओमां भूल ढिलव झन आग
मंगलिन – तुम्हर चेत जब वापिस, इहिच दिही भोजन भर पेट”.
सच ला ठुकरा दीन श्रमिक मन, तोड़ फोड़ होगिस शुरुवात
कई मशीन ला रटरट टोरिन, मिल ला मिलिस अकुत नुकसान.
एकर बाद अपन घर लहुटिन, मिल मं लगगे तारा ठोस
अब हड़ताल चलत हे सरलग, उत्पादन मं लग गे रोक.
श्रमिक रखे जे जोड़ के धन, घर बैठे खाइन ओला ।
बाद मं बेचिन बर्तन गहना, तंहने मंगिन उधारी ।।
जब सब राह उपाय उरक गिस, भूख मरत हें बिगर अनाज
जीवन जिये उपाय तपासत, पर तड़तड़ी मं मिल नइ पात.
खलकट भाना पति पत्नी मिल, मिल मं काम करंय सुंट बांध
दुनों परानी खुशी निघरघट, जमों खर्च के होवय पूर्ति.
लेकिन जब हड़ताल मं बइठिन, अब होवत हर जिनिस अभाव
आंख बचावत हवंय अतिथि ले, टोरे परत खर्च सब शौक.
हे गृहस्थ के हालत खस्ता, पर भाना हा लाहो लेत
खलकट तिर हुरमुठी बतावत, जिनिस मंगावत कर आदेश.
सहनशक्ति के नसना टूटिस, खलकट दांत कटर खखुवैस-
“”तंय हा क्रांति राह पकड़े हस, ओकर फल मं दुख भुख भोग.
मंय मरमर समझाएंव तोला – सब ला करन देव हड़ताल
पर हम उंकर धरन नइ तोलगी, कार चलन हम पर के चाल.
पर तंय हठी मूड़पेलवी हस, हठकरके छोड़े हस काम
अपन क्रांति ला चल पूरन कर, दुख अभाव ला हंस हंस झेल.
लोहा लेना होय धनी संग, ताकत नइ कंगला के पास
अपन साथ विद्या धन जन रख, तब पुजलग संग टक्कर लेव.
शोषण के विरोध करना हे, शोषक ला तंय बना मितान
न्यायालय मं विजय चहत हस, अधिवक्ता तिर लेव सलाह.
गोरा शासन ला खेदे बर, मदद करिन गोरा विद्वान
बांध बांधना हवय नदी मं, कर उपयोग नदी के जल रेत”.
जलगस मनखे सक्षम दलगिर, अपन ला समझत सबले ऊंच
मगर घिरत दुख रोग फिकर हा, तंहने सुनत डांट उपदेश.
भाना हा गपगपा जथय सुन, खलकट ला बोलिस गुन सोच-
“”तोर बात ला मंय फांके हंव, चाल चले हंव बन के ढीठ.
मगर रहस्य नइ आवत – मंगलिन मांईलोगन आय
हमर पक्ष ला लेतिस प्रण कर, हर अभाव के करतिस पूर्ति.
लेकिन हमला दुश्मन मानत, हमर प्रार्थना ला लतियात
हम जतका दुख बिपत पात हन, ओतका ओहर खुशी मनात”.
कान टेंड़ के टैड़क ओरखत, उंकर बात सुन आनंद लेत
पति पत्नी के बात रुकिस तंह, मंद हंसत गिस उंकर समीप.
भाना ला समझे कहि बोलिस -“”तोर दिमाग हवय कमजोर
तब तंय गलत बात बोलत हस, गलत तर्क के मारत जोर.
मंगलिन हा मिल के मालकिन ए, तंय ओकर हिनहर मजदूर
ओहर धनी – गरीबिन अस तंय, अलग अलग दूनों के वर्ग.
ओहर जियत खाय पहिरे बर, तंय खावत हस जान बचाय
ओकर जीवन पद्धति उंचहा, निम्न हीन हे जीवन तोर.
वर्ग भेद बढ़थय रब्बड़ अस, तंहने शोषक करथय लूट
एक जीव मछरी मछरी मं, पर छोटे ला बड़े हा खात”.
भाना ला टैड़क समझा के उहां ले रेगिस लौहा ।
छेरकू मंत्री राह मं दिखथय जउन हा अड़बड़ कैंया ।।
ओकर बोल मीठ मंदरस अस, मुंह हा फूल असन मुसकात
मगर पेट मं कपट ला पालत, सोन के गगरी मं विष तीक्ष्ण.
मंगलिन पास पहुंच गिस छेरकू, ओकर हाल करे बर ज्ञात
एक के पास अकुत धन पूंजी, दूसर धरे हवय पद ऊंच.
जब चुनाव के बखत हा अंड़थय, मंगलिन मदद मं रुपिया देत
शाशन मंगलिन ला अरझाथय, छेरकू खतम करत हर कष्ट.
छेरकू ला मंगलिन हा देखिस, स्वागत करत हर्ष के साथ
कहिथय- “”तंय स्थिति जानत हस – मिल मं चलत हवय हड़ताल.
मंय नुकसान सहे हंव नंगत, अउ घाटा होवत अनलेख
कते राह धर आगू जावंव, ताकि लाभ कमती झन होय ?”
छेरकू हा गंभीर बन जाथय, फेर निकालिस सरलग बोल-
“”तंय हा फोकट के झन घबड़ा, कोन जरा सकिहय उद तोर!
कंगला श्रमिक के कतका ताकत, घुटना टेक दिही दिन एक
जउन खवाबे ओमन खाहंय, एकोकन नइ करंय विरोध.
मिल मं तारा लगे बड़े अस, चलन देव सरलग हड़ताल
गिर झन ककरो गोड़ निहू बन, श्रमिक घूम रोवंय बेहाल.”
छेरकू, मंगलिन ला फुरनावत, पर एकर अंदर कुछ राज –
ऊपर नफा दिखत मंगलिन के, पर खुद छेरकू पावत लाभ.
एहर श्रमिक के तिर मं जाहय, दिही सांत्वना मधुर अवाज
जमों श्रमिक एकर पतियाहंय, छेरकू के बढ़ जाहय मान.
सुन्तापुर के जमों श्रमिक मन, काम छोड़ कर दिन हड़ताल
छेरकू हा धनवा तिर चल दिस, खतम करैस चलत हड़ताल.
लेकिन इहां उलट के रेंगत, चाहत चलय अउर हड़ताल
यने जेन स्थिति आवश्यक, करथय काम उहिच अनुसार.
दूसर हा नुकसान ला झेलत, पर छेरकू ला नइ परवाह
अपन लाभ पद यश रक्षा बर, ओहर चलत बहुत ठक राह.
छेरकू हा मंगलिन ला छोड़िस, विश्रामे गृह मं चल दीस
पत्रकार अधिकारी विधायक, शासन तंत्र हा स्वागत देत.
उहां आय हे घना विधायक, खुज्जी क्षेत्र के प्रतिनिधि आय
ओला घेर रखे कई मनखे, चीथत मांस अनर्गल बोल.
डेंवा हा रट किहिस घना ला -“”तोला हम उठाय हन ऊंच
विजय देवाय चुनाव समर मं, कतको झन ले बन के शत्रु.
लेकिन तंय हा गुनहगरा हस, टरिया देवत हमर गोहार
जनता ला धोखा देवत हस, पूरा करत स्वयं के स्वार्थ.”
अचरज मं भर घना हा देखत छेंक के राखे गुस्सा ।
अगर अपन हा बायबिरिंग तब खुद पर आहय बद्दी ।।
घना हा बोलिस पुचकारत अस -“”कहना काय साफ अस बोल
छुपे रहस्य के परदा टरिया, दुख ला हरिहंव जान बिखेद.”
डेंवा के बकचण्डी बढ़ गिस -“”तुन नेता के इहिच सुभाव
जनता कतको आंसू ढारत, पर पथरा अस हृदय तुम्हार.
हमर गांव मं जल के कमती, खेत सिंचई बर नहर अभाव
लघु उद्योग तक के टोटकोर्राे, संकट बीच जियत हे गांव.
तंय आश्वासन देस बहुत ठक, लेकिन अब तक काम अपूर्ण
यद्यपि सब सुविधा नइ मिलिहय, पर तंय करा सफल कुछ काम.”
किहिस घना -“”यद्यपि तंय खुश हस – आज विधायक ला डपटेंव
मगर तोर भ्रम भूल भयंकर, गारी हा कराय नइ काम.
हां, अब मोला याद आत हे – बांध बनाय आश्वासन देंव
छेरकू कर मंय रखेंव समस्या, लेकिन ओकर सुध नइ लेंव.
चलना अभि मंत्री तिर जाबो, ओकर तिर ढिलबोन सवाल
तंय हा जेन करत हस शंका, ओकर तक मिल जही जवाब”
छेरकू तिर जा घना हा बोलिस -“”जानत हवस मोर तंय मांग
बांध बनाय केहेंव मंय तोला, कतका सरक सकिस हे काम !
मोर क्षेत्र के सब मनखे मन, करत केलवली दुख ला रोत
ओमन ला उत्तर का देवंव, मोर प्रश्न के देव जुवाप ?”
छेरकू रखे जुवान अपन तिर, तइसे किसम निकालिस जल्द –
“”घना, जउन तंय बात ला पूछत, हवय सुरक्षित ओकर ज्वाप.
मंय राजधानी गेंव जउन दिन, देखे हवंव तोर भर काम –
बांध बंधे बर स्वीकृति होथय, देके जोम करे हंव मांग.
कार्यालय मं भिजा डरे हंव, ओकर होत जउन आदेश
ज.सं.वि. ले तंय स्वयं पता कर, मोर बात मं कतका सत्य !”
बाबूलाल उंहे मेंड़रावत, अधिकृत अधिकारी उहि आय
ओकर पास घना हा पूछिस, ताकि बात होवय स्पष्ट.
बाबूलाल बेधड़क बोलिस -“”मंत्री हा अभि कहि दिस जेन
ओकर बात सत्य सूरज अस, मंय तोला देवत विश्वास.”
अधिकारी के उत्तर सुनथय, घना अपन मन होत प्रसन्न –
मुड़ के फिकर बोझ हा उतरिस, हाही सरापा ले बच गेंव.
बांध हा बन – जल दिही खेत मं, उहां उपजिहय ठोस अनाज
कृषक के कंगलइ भूख मिटाहय, मोर गीत गाहंय धर राग.”
छेरकू जमों कार्यक्रम छेंकिस, पत्रकार ला पास बलैस
उंकर प्रश्न के उत्तर ला दिस, एकर बाद सभा के अंत.
कार जीप पर बइठ के चल दिन छेरकू अउ अधिकारी ।
मगर घना के तिर नइ वाहन खड़े हे चुप झखमारी ।।
डेंवा, घना ला चिथिया पूछत -“”होत शुरुकब बांध के काम
मंय जिज्ञासु सुने चाहत हंव, यदि जानत तब बता तड़ाक ?”
घना सुकुड़दुम हो के बोलिस -“”अधिकारी फोरिस नइ साफ
चल ओकर तिर पहुंच के पूछन, बांध हा बन – कब तक तइयार ?”
द्वितीय वर्ग के अधिकारी तक, बउरत हें शासन के जीप
मगर विधायक मन बिन वाहन, देखव तो शासन के नीत !
हम्मन जनप्रतिनिधि कहवाथन, जन जन तिर पहुंचे के काम
लेकिन हम सुविधा बर तरसत, कहां पूर्ण जनता के काम !
मोला क्षेत्र किंजरना होथय, मंय हा लेत किराया के जीप
खुद हा देत खर्च के रुपिया, शासन वहन करय नइ भार.”
डेंवा लाय फटफटी अड़जंग, ओमां दुनों बइठ गिन जल्द
कार्यालय तन धड़धड़ जावत, बीच राह उरकिस पेट्रोल.
गीन “पेट्रोल पम्प’ एक संघरा, फटफटी मं पेट्रोल भरैन
अब गिनना हे नगदी रुपिया, देखव कोन गिनत हे नोट !
डेंवा सोचत – बांध हा बनिहय, जमों कृषक के सिंचिहय, खेत
तब मंय काबर खर्च उठावंव, पर के भार कार मुड़ लेंव !
घना आय जनता के मुखिया, सबके उहिच हा ठेकादार
आय खर्च ला भरय उही भर, जनता करिहय जय जयकार.
डेंवा डहर घना हा देखिस, पर डेंवा देखत पर ओर
घना समझगे सब रहस्य ला, डेंवा हटत भरे बर नोट.
सोचत घना- अगर मंय टरकत, मंय हो जंहव व्यर्थ बदनाम –
जनता के धारन कहवावत, पर ओकर हित कर नइ पात.
घना निकालिस जेब ले रुपिया, पटा दीस पेट्रोल के दाम
दुनों पुन& कार्यालय जावत, आखिर पहुंच गीन गंतव्य.
बहुत लिपिक ज.सं.वि. कार्यालय, उंकर टिप्पणी बर असमर्थ
कई झन चाय पान बर खिसके, कइ झन मन मारत गप हांस.
बाहिर बेंच रखाय एक ठन, तातू भृत्य लेत हे नींद
लिपिक मंगत हें पानी फाइल, मुश्किल मं मानत आदेश.
घना विधायक ला बग देखिस, सब आलस्य भगागे दूर
सावधान होथय हड़बड़ कर, मानों सब ले करतबवान.
जमों लिपिक ला इतला देवत – आत विधायक हा इहि ओर
अपन काम हुसियार होव सब, मिलय प्रशंसा पत्र इनाम.”
लिपिक जे किंजरत एतन ओतन, कुर्सी बइठ जथंय चुप शांत
कुर्सी बइठ जउन गप छांटत, फाइल पर गाड़त हे आंख.
लिपिक चैन हा घना ला एल्हत – “”कोन विधायक ला डर्रात
एहर काय बिगाड़ सकत हे, चार दिवस बर पद ला पाय.”
बालम किहिस – “”सत्य बोलत हस, एकर तिर नइ कुछ अधिकार
ना कर सकत नियुक्ति निलम्बित, पथरा के देवता भर आय.”
ज्ञानिक हा समभाव से बोलिस – “”ककरो कार करत हिनमान
ओहर तुम्हर बिगाड़ करत नइ, देवव मान समझ इंसान.”
कार्यालय मं निंगत घना अब, अधिकारी के कमरा गीस
लेकिन बाबूलाल नदारत, ओकर मुंह दरसन नइ दीस.
घना उहें के लिपिक ला पूछिस, कहिथय चैन बला टर जाय –
“”साहब पास काम थर के थर, ओकर विस्तृत कर्म के क्षेत्र.
कल भोपाल ले वापिस आइस, मात्र रात भर लीस अराम
आज मुंदरहा निकलगे दौरा, कब वापिस सच कोन बताय !”
घना जान लिस असच बतावत, धोखा देवत मोला ।
अ‍ैस चैन पर क्रोध मगर, नइ मारिस क्रोध के गोला ।।
दूसर प्रश्न घना ला पूछिस -“”बांध बनाय एक आदेश
ओहर इहां कोन दिन आइस, कब प्रारंभ होत हे काम ?”
बालम कहिथय -“”हम नौकर अन, होय नियुक्ति सुनन आदेश
यदि आदेश आय कार्यालय, पालन बर हम हन तैयार.
बांध काम ला कोन छेंकिहय, कोन लिही आफत ला मोल
राष्ट्र विकास मदद सब देवत, कोन सकत आदेश उदेल !”
बालम दीस जुवाप अर्थ बिन, सुन के करथय ज्ञानिक रोष
पर काबर ककरो संग उलझय, स्वयं कहत रख स्थिर बुद्धि –
“”तोला मंय सच भेद बतावत- कहां के बांध कहां के आदेश
काकरा करा – कोन दिन आइस, हमला सुनगुन तक नइ ज्ञान.
यदि अधिकारी ला पूछत हव, पहुंच जाव फट उंकर निवास
अगर भेंट होवय ओकर संग, पता लगाव भेद ला पूछ.”
ज्ञानिक जउन राह फुरियाइस, घना ला जंच – आथय विश्वास
डेंवा साथ उहां ले निकलिस, पर ए बात कान मं आत.
चैन हा एल्हत हे ज्ञानिक ला – “”सब कार्यालय बोलत झूठ
मगर एक सतवंता तंय भर, राह चलत हस पर ले नेक.
कार्यालय ला तंय चलात हस, रख ईमान मान आदेश
सब के भार तोर मुड़ आथय, तोर बिगर कार्यालय सून.”
चलत घना अधिकारी तिर मं, आखिर पहुंचिस उंकर निवास
अचरज मं अंगरी ला चाबत, बाबूलाल के बंगला देख.
बोलिस घना -“”बड़े भुंइया मं, मोहक बंगला बने हे बीच
चारों तन हे बाग बगीचा, जेमां हवय फसल फल फूल.
रख रखाव मं खर्च आत कंस, ओला सहत हवय सरकार
मगर फसल फल फूल ला खावत, साहब अउ ओकर परिवार.
शासन के वेतन ला पावत, तेन भृत्य मन इंहे कमात
एक अधिकारी के सेवा बर, पाछू दउड़त कई इंसान.”
डेंवा रखथय प्रश्न घना तिर – “”कई सुविधा साहब मन पाय
तंय हा शासन के पटिया अस, कतका सुख सुविधा तंय पाय ?”
केंघरिस घना -“”अपन का रोवंव – मंय हा रहिथंव अपन मकान
दूरभाष के खर्च पटाथंव, स्वागत खर्च करत मंय पूर्ति.
जबकि जिंहा मुख्यालय होवय, यने क्षेत्र के मुख्य स्थान
उहां विधायक बर बनवावय – शासन खुद कर खर्च मकान.
काबर के हम जनप्रतिनिधि अन, कतको व्यक्ति हमर तिर आत
ओमन असमय ठइर के सोवंय, उंकर रुके बर होय प्रबंध.”
डेंवा किहिस – “”पता चलगे सच – दिया बरत पर घुप अंधियार
जेन दुसर ला सुविधा बांटत, कृषक असन अमरात अभाव.
तुम्हर हाथ मं राइ दुहाई, खुद कर लव पारित प्रस्ताव
जेन जरुरत सुविधा धर लव, तुम्हर हाथ ला छेंकत कोन .”
घना कथय नारी जुड़ाये अस – “”सत्य मान हम हन असमर्थ
अपन मांग यदि पूर्ण करत खुद, सब तन ले परिहय बद बान.
कुकरी हा अण्डा कई देथय, मगर खाय नइ खुद हा एक
गाय पियावत पर ला गोरस, लेकिन अपन पाय नइ चीख.
अधिकारी के सक्षमता सुन – कलम के ताकत उनकर हाथ
ओमन ला यदि सुविधा चहिये, सब सुविधा लेवत बिन आड़.
कतको नियम कानून बनाथंय, पूर्ण करत जे उंकरे स्वार्थ
ओकर हम रहस्य नइ जानन, तब उनकर का करन विरोध.
जनता के हित जउन मं होथय, ओकर हम रखथन प्रस्ताव
तब अधिकारी हमला छेंकत – नियम विरुद्ध होत हे काम.”
इंकर गोठ हा ठिंहा गीस तंह जावत बंगला कोती ।
घना चलत बेधड़क मगर डेंवा के कांपत पोटा ।।
डेंवा तुरुत घना ला बोलिस -“”तंय बंगला मं अइसे जात
मानों ओहर आय तोर घर, पर मंय हिरदे ले घबरात.
मंय हा सदा तोर घर जांथव, तब घुसरत बिन डर संकोच
तोर समीप जेन मन बोलत, मान घसलहा त्यागत भेव.
पर अधिकारी तिर पहुंचे बर, मोर हृदय ला धुक धुक होत
भइगे तिंही एक अंदर जा, मंय हा रुकत इही स्थान.”
डेंवा हा बाहिर मं बिलमिस, मार बहाना लपझप बोल
ओहर खुश हे जीवन बंच गिस, जइसे गरी ले बपरी मीन.
घना एक मनखे ला देखिस – ठेकादार बगस जे आय
साहब ले मिल हांसत लहुटत, लगत – अमर लिस ध्येय अभीष्ट.
घना विधायक बगस ला बोलिस -“”तंय हा दिखत प्रसन्न विभोर
काय बात हे सच सच फुरिया – पाय हवस का भगती ओल ?”
बोलिस बगस- “”ठीक समझे हस – साहब पास रिहिस हे काम
पर साहब हा झड़य छटारा, टरका के खेदिस कई बार.
मंय हा मंत्री तिर कलपेंव तंह, मंत्री डारिस डंट के दाब
आखिर साहब काम करे बर, मोला सच आश्वासन दीस.”
“”मंत्री के तंय खास व्यक्ति अस, तब ओहर दिस आशिर्वाद
तोर काम अब पूरा होहय, मौज करव अउ मजा उड़ाव.”
बाबूलाल तिर घना पहुंचिस, अधिकारी हा स्वागत देत
ओहर भृत्य हुकुम ला बोलिस -“”ऊगिस आज मोर तकदीर.
आय विधायक हा किरपा कर, ओकर खाय पिये बर लान.”
हुकुम लान नाश्ता राखिस तंह, घना हा खावत मिट्ठी चीज.
घना हंसत उद्देस्य मं आथय -“”साहब मन ला जानत खूब
आवभगत कर मीठ खवाथंय, तंह जुड़ जावत रिश्ता मीठ.
पर एकर ले घाटा खाथन, रख नइ सकन निवेदन मांग
अगर पेल के दुखड़ा रोथन, तब रिश्ता मं करुदरार.
अपन बेवस्ता मं अब आवत, मोर प्रश्न के लान जुवाप –
बांध बने कब नरियर फोरत, यने कोन दिन मुहरुत होत ?”
बाबूलाल मुड़ ला धर बोलिस -“”कहां के बांध कहां के निर्माण
मोर पास आदेश आय नइ, तब आश्वासन कहां ले देंव !”
घना अचम्भित होवत पूछिस -“”छेरकू मंत्री बोलिस जेन
तंय कोलिहा अस भरे हुंकारु, वास्तव मं सब झूठ सफेद?”
बाबूलाल रहस्य ला खोलत -“”हम अधिकारी अइसन शेर
मार दहाड़ डरावत सब ला, पर पोतकी मं जान बचात.
बन अजाद जंगल मं किंजरत, सोनकुकुर हा मारत घेर
जंगल छोड़ गांव तन भागत, ग्रामीण दउड़त धर बन्दूक.
यने बने हन हम अधिकारी, पर नइ पाय पूर्ण अधिकार
सब तन ले गुचकेला खावत, शासन रखे हवय कंस छांद.
यदि जनता के काम हा रुकथय, तब ओहर विरुद्ध चिल्लात
मंत्री तिर हम करत प्रार्थना, देवत उहू डांट नुकसान.
मंत्री हा झड़ दीस लबारी – बांध बने भेजेंव आदेश
लेकिन प्रति अप्राप्त हमर तिर, आगू कहां बढ़य कुछ काम !
यदि मंत्री ला लबरा कहितेंव, यदि कट जातिस ओकर गोठ
फोकट कष्ट मोर पर आतिस, बादर बिगर करा बरसात.
मंत्री के मंय पक्ष धरे हंव, विवश बाद बोले हंव झूठ
धोखा खाय मोर कारण तंय, तंय अब बिसर कुजानिक मोर.
जब आदेश मोर तिर आहय, तोर याद करिहंव तत्काल
काम पुरो के सांस ला लेहंव, मंय तोला देवत विश्वास.
अब मंय अपन पोल दुख खोलत – मंय कइसे होवत मजबूर –
थोरिक पूर्व आय जे मनखे, ठेकादार बगस ते आय
ओहर ठेका लीस एक ठक, ओहर काम करा दिस पूर्ण
प्रस्तुत करिस प्रमाण कागजी, पर वाजिब मं काम अपूर्ण.
भेद जान मंय करेंव निरीक्षण, मंय हा पाय शिकायत ठीक
बचे काम ला बगस पुरोवय, अइसे सोच चलेंव मंय चाल.
बिल के रुपिया काट देंव मंय, रोक देंव अंतिम भुगतान
एमां बगस कलबलागे तंह, मंत्री तिर फोरिस सब हाल.
मंत्री दूरभाष ला नेमिस, मोर साथ कर लिस सम्पर्क-
“बगस ला काबर अरझावत हव, ओकर काम पूर्ण कर देव.’
ऊपर ले दबाव जब देवत, तब मंय होवत हंव मजबूर
बगस के उद ला जरा सकत नइ, करना परत निंदनीय काम.
हिम्मत देखा काम यदि छेंकत, मोला मिलिहय दुष्फल खाय
मंत्री करवा सकत निलम्बित, स्थानांतर बर अधरात.
राजनीति सब के मुड़ नाचत, हर विभाग पर परत दबाव
तब अधिकारी कहां ले जोंगय – शासन बुता ला रख ईमान !
बोलिस घना -“”फिकर हा बढ़गे, तोर पास मंय दउड़त आय
मगर समस्या बचे पूर्व अस, डेंवा ला का देंव जुवाप !
सत्य के रक्षा बर यदि कहिहंव – अभि नइ होय बांध निर्माण
सिंचई व्यवस्था करव तुमन खुद, शासन के छोड़व विश्वास.
एमां डेंवा इहि समझिहय – हमर विधायक काम के शत्रु
जनता के सुख दुख ले भगथय, अमरबेल अस स्वार्थी खूब.
यदि मंय थाम्हत असच के अंचरा – अब बंध जहय बांध तत्काल
खेत हा पल बिरता कंस देहय, मिटा जहय जनता के भूख.
पर एकर ले काम अधूरा, धोखा खाहय जनता मोर
पहिलिच के बदनाम हवन हम, उड़ा जहय जे कुछ विश्वास.”
घना के दार भात हा चुरगे कार रुकय बरपेली ।
नमस्कार कर उहां ले रेंगिस पांव ला लेगत धीरे ।।
घना हा डेंवा के तिर बोलिस -“”जउन समस्या फंसे किसान
ओकर समाधान हा होहय, पूर्ण करे बर चलत प्रयास.
यदि बाधा आ जहय बीच मं, बांध काम तब भले अपूर्ण
ओकर दोष कहां ककरो मुड़, सफल विफलता प्रकृति हाथ.”
डेंवा किहिस -“”तोर बोली हा, करिस मोर मन ला संतोष
हमर विधायक तंय धारन अस, बपुरा सुनथस हमर गोहार.”
इही बीच मं अ‍ैस उमेंदी, जेहर पूर्व विधायक आय
जावत हे सक्षम मनसे तिर, मांगत हे आर्थिक सहयोग.
घना करा गोहरात उमेंदी -“”तंय हा जानत हस सब भेद
कुर्सी पात विधायक मन हा, पांच बछर बर गिने गुनाय.
नंगत खर्च चुनाव मं लगथय, होत कठिन डंट आय वसूल
पद छूटत तंह हालत पतला, एकोकनिक होय नइ लाभ.
इही व्यथा ला खतम करे बर, हमन बनाय एक ठक कोष
ओमा रुपिया जमा करत हन, सक्षम मन तिर धन ला मांग.
दीन हीन जे पूर्व विधायक, रोगी वृद्ध असक विकलांग
एमन ला सब दुरछुर करथंय, भात के बल्दा एल्हई ला खात.
अइसन हीन ला मदद ला देवत, हम संस्था बनाय हन तेन
यद्यपि स्वर्ग के सुख नइ पावय, पर जीवन चल सकिहय ठीक.
तोर पास मंय आय आस धर तंय ढिल स्वीकृति बानी ।
नगदी रुपिया के प्रबंध कर देखा खिसा झन खाली ।।
जउन समस्या रखिस उमेंदी, घना के मन अंदर भिंज गीस
कहिथय -“”मंय हा सेवा करिहंव, मदद ले मंय खसकंव नइ दूर.
काबर के हमरो इहि दुर्गति, कहां दिखत निÏश्चत भविष्य
होत विधायक पद हा अस्थिर, बोइर असन झरत दिन एक.
नगदी रुपिया बर अड़चन हे, ना कुछ जमा बैंक मं नोट
वेतन बाद रकम गिन देहंव, तलगस रहव बना के धैर्य.”
हटिस उमेंदी पा आश्वासन, तंहने डेंवा रखिस सवाल –
“”तंय हा रोय अपन अभि रोना, ओकर ले होवत आश्चर्य.
अपन क्षेत्र के तंय मुखिया अस, होय तोर तिर नोट सदैव
जउन मंगय तेला तंय बांटस, मगर देखाय रिता अस जेब ?”
हंसिस घना, डेंवा के भ्रम ला – “”वइसे हमन देखाथन टेस
हर सुख सुविधा पाल के रखथन, यने दिखब मं हम सम्पन्न.
मगर आंतरिक हालत पतला, लुका के रख लेथन सच भेद
दिखथय पोख चना के फल हा, पर अंदर मं मारत भोंग.
इहें हवंय पचकौड़ अउ मंगलिन, हमर ले उनकर तिर धन ढेर
दुनों बीच मं अंतर अतका – मोटहा चांउर अउ दुबराज.”
डेंवा बोलिस -“”तंय नेता अस, झूठ बात पर हस बदनाम
मगर आज सच गठरी खोलत, कठिन बाद आवत विश्वास.
हम किसान मन हा ठौंका मं, अपन ला पालत धोखा बीच
रहत भूमि – घर हेलफेल अस, तंह समझत खुद ला धनवान.
घर मं अन्न दूथ यदि होवत, तंहने कृषक बतावत टेस –
हम नइ खावन जिनिस बिसा के, पर के जिनिस घृणा के भाव.
पूछी उठा अभाव हा भग गिस, ककरो तिर नइ मांगन भीख
समझत कृषक हा खुद ला पुंजलग, कर घमंड करथय मुड़ ऊंच.
पर घातक बीमारी सपड़त, सक ले अधिक खर्च हो जात
कृषक के नारी जुड़ा जथय अउ, हर घर द्वार मं हाथ लमात.
होय किसान खूब जमगरहा, पर असमर्थ करे ए काम-
खोल सकय नइ मिल कारखाना, घूम सकय नइ विश्व सदैव.
पंच सितारा होटल रुकिहय, तुरते बिकही ओकर खेत
टी. वी. मं विज्ञापन देहय, दर ला सुन उड़ जाहय चेत.”
तभे झिंगुट सम्मुख मं पहुंचिस जेहर अड़बड़ गप्पी ।
नाम कमाय गुनत हे लेकिन श्रम बर साधत चुप्पी ।।
झिंगुट हा फट ले घना ला बोलिस -“”मंय हा चलत ध्येय रख एक
चित्रकार मंय निश्चय बनिहंव, भले बीच मं कष्ट अनेक.
लेकिन पहिली एक बात कहि – मंय सोचत के पांव इनाम
यदि शासन ले तंय दिलवाबे, काम हा चलिहय धर रफ्तार.”
किहिस घना -“”तंय बातूनी हस, सोचत हस यश नाम कमाय
पर महिनत ले भगथस दुरिहा, अपन हाथ असफलता लात.
अब ले तंय खुद के बूता कर, करव प्रदर्शन साथ प्रचार
शासन अगर देखाहय ठेंगवा, दूसर कई झन दिही इनाम.”
“”तुम नेता मन हा देवात हव, अपन पक्षधर मन ला लाभ
कभू हमर जइसन प्रतिभा ला, ऊंच उठाय के करव प्रयास.”
“”बीजा होय ठोसलग उत्तम, कतरो भुइंया तरी मं होय
पर आखिर मं अंकुर फूटत, बाहिर आवत भुइंया फोर.
वइसे यदि तंय प्रतिभाशाली, तोला कोन सकत हे दाब
रख ईमान काम भर ला कर, निश्चय पाबे नाम इनाम.”
झिंगुट उहां ले हट के पहुंचिस, इमला नाम बहुत विख्यात
एक सेक बढ़ चित्र बनाथय, असल प्राकृतिक जेकर रुप.
झिंगुट आय कब ओकर तिर मं, एकर ले इमला अनजान
चित्र बनावत हवय बिधुन हो, सिर्फ काम पर ओकर चेत.
ध्यान मग्न इमला ला देखिस, झिंगुट ला आलस कबिया लीस
आंखी मूंद नींद ला भांजत, काबर आय भूल सब गीस.
इमला अपन बुद्धि विकसित कर, रखिस सहेज चित एकाग्र
चित्र बना के पूरा कर लिस, जेकर दृष्य निम्न अनुसार –
“एक कृषक हा दुंगदुंग उघरा, रखे कांध पर नांगर एक
ओकर संग फुरमानुक बइला, बुता पुरोय चलत हे खेत.
बड़े फजर के टेम सुहावन, शुद्ध हवा बांटत उत्साह
डोंगरी नहक सुरुज उग आवत, चिरई उड़त हें डेना खोल.,
इमला अपन चित्र ला देखत, स्वयं मोहात वास्तविक जान
मन संतोष पात – तन फुरसुद, पके फसल ला देख किसान.
काम डहर ले आंखी हटथय, झिंगुट तनी लेगिस हे आंख
झिंगुट जगय कहि के हेचकारत, आखिर खुलिस जपर्रा के आंख.
अपन दोष ला रिहिस लुकाना, कहिथय झिंगुट खूब कर रोस –
“”मदद मंगे बर आय तोर तिर, पर तंय कहां करत हस मान !
मनसे ख्याति प्राप्त कर लेथय, ओकर नाम चढ़त जहं ऊंच
ओकर पर घमंड चढ़ जाथय, पर ला समझत बइकुफ हीन.
ज्ञान रास हे जतिक तोर तिर, मोला बांट भला कुछ अंश
चित्रकार मंय बने चहत हंव, करके मदद करा उत्तीर्ण.”
झिंगुट हा नंगत अक फटकारिस, पर इमला सब ला टरियैस
कहिथय -“”तंय हा जब जब आथस, फलल फलल करथस बस गोठ.
चित्रकार तंय बनना चाहत, काम करव रख के उत्साह
मंय हा कला मर्म समझावत, मन ले गुण ला कर स्वीकार.
चित्र बनाय जिनिस जे लगथय, ओकर नाम प्रकृया जान
चमचम वस्तुस्थिति ला जानव, तब फिर अपन लक्ष्य ला पाव.
खड़े रथय स्टैण्ड एक ठन, कार्ड बोर्ड मं ड्राइंग शीट
डिश मं ब्रश ओकर संग कई रंग, होत जरुरत जग मं नीर.
रफस्केच बनत पेंसिल मं, कभु हो सकत रबर उपयोग
तंहने फेर रंग भरे जाथय, स्थिति अउ पदार्थ अनुसार.”
इमला सूक्ष्म ज्ञान ला देवत, मगर झिंगुट के कुन्द दिमाग
बोलिस – “”तंय मोला झन समझा, अपन ज्ञान ला रख खुद पास.
बना मोर बर चित्र एक ठक, स्वयं यत्न कर लगा दिमाग
मंय कतको कोशिश ला करिहंव, मगर सफलता भगिहय दूर.”
“”दुसर भरोसा मार परोसा, पर के बिल मं करत निवास
पर तंय एदे उत्थान जानत – नींद आय नइ पार के आंख.
अगर भात ला लिलना होवय, ताकत कर मुंह खोलो ।
ज्ञान पाय बर सोचत तब तन बुद्धि ला श्रम बर जोंगो ।।
इमला सत्य तथ्य ओरियाइस, मगर झिंगुट ला लगथय लाग
बोलिस -“”मंय एला जानत हंव – भुखहा ला दुतकारत भात.
जे मनखे के बूता बिगड़त, कभु नइ पाय सांत्वना प्यार
ऊपर ले दुत्कार ला पाथय – एकर मुड़ पर कलंक निवास.
जेकर काम सफल हो जाथय, ओकर बढ़त दून उत्साह
पात प्रशंसा दुश्मन तक ले – कर्मवीर हे ए इंसान.
यदि आलोचना ला दुरिहा रख, करते सिद्ध मोर तंय ध्येय
हार ले झगड़े शक्ति मंय पातेंव, शांति हर्ष पातिस मन तोर.”
झिंगुट तरमिरा उहां ले निकलिस, मगर राह मं करत विचार –
“”मंय दूसर पर दोष लगावत, देखत रथंव पर के मुंह ओर.
लेकिन अपन शक्ति नइ जाचंव, स्वयं समीक्षा कार अभाव !
अब खुद ले विश्वास जगावंव, अंतस कमी करंव मंय दूर -”
झिंगुट लेत निर्णय भावी बर, कौंवा पर पर जथय निगाह
कुछ दुरिहा रोटी के कुटका, कौंवा चहत उठा के खांव,
चारों डहर टंहक के देखत, झझकत चमकत उला के चोंच
रोटी तिर पहुंचत अमरे बर, मगर उड़त मनखे ला देख.
आखिर हिम्मत दून बढ़ाइस, रोटी पर मारिस फट चोंच
जहां खाय के जिनिस ला अमरिस, पेड़ डार पर बइठ के खात.
झिंगुट प्रश्न राखिस कौंवा तिर – “”तंय अस डरपोकना शंकालु
तोला असफल होना चहिये, पर उद्देश्य ला खब पा लेस.
एमां गुप्त रहस्य छिपे हे, ओकर राज मोर तिर खोल
ताकि तोर अस रद्दा रेंगंव, असफलता पर विजय ला पांव.?”
कौंवा सब रोटी ला खा लिस, तंहने दीस हकन के ज्वाप –
“”पहिली शंका हटा देंव मंय, अपन शक्ति पर दृढ़ विश्वास.
पर के खोदी करना छूटिस, सिरिफ लक्ष्य पर मोर निगाह
तमे सफलता पांवला चूमिस, असफलता के कट गे नाक.”
झिंगुट सुनिस कौंवा के साहस, पूर्व के निर्णय होवत ठोस
तभे पास मं जैलू पहुंचिस, ओहर अपन कथा फुरियैस.
झिंगुट आंख फाड़त भर अचरज, लगिस धान मं बदरा ढेर
कहिथय -“”प्रकृति छल देखाय बर, करथय काम अचम्भापूर्ण.
लेकिन तंय बतात अभि गाथा, ओकर पर ओ दिन विश्वास
सांप के दांत तीक्ष्ण विष होथय, मगर होय अमृत बरसात.”
झिंगुट हा जैलू ला खब भेजिस, पंचम मनोचिकित्सक पास
जैलू अपन समस्या रखथय, लाज खुशी फिक्कर के साथ.
कहिथय – “”मंय कलपत दिन रतिहा, घर सुनसान बिगर औलाद
इच्छा मोर पूर्ण अब होवत, पर प्रकृति कर दिस उपहास.
मंय अंव पुरुष पर अमल मं हंव, लगे हवय महिना गिन पांच
लुका के रहिहंव लाज के कारन, बाहिर आहंव “निभे’ के टेम.
तोर ले मंय हा किरिया लेहंव, निभे बखत आहंव तिर तोर
तंय निपटाबे जन्म काम ला, आंच पाय झन शिशु नवजात.
वार्ता गुप्त जउन अभि होइस, लाई असन बगर झन जाय
वरना मोर हानि नइ होवय, पर बालक जाहय शमशान.”
जैलू कड़ा बात कहि रेंगिस, पंचम सुनथय धमकी क्रूर
ओहर कार्यालय ला छोड़िस, किंजरत करत बुद्धि ला शांत.
तभे मोंगरा पास ले निकलिस जेहर मुंह पर चिंता ।
बिन कोराय हे बाल तेल बिन – आंख ले ढारत आंसू ।।
मोंगरा के हालत देखिस तंह, पंचम बिसरिस खुद के दाह
खजरी ला खुजाय बर बिसरत, यदि हो जाय घाव जंगलोर.
पंचम कहिथय -“”यद्यपि हक नइ, पर के लेंगझा मं धंस जांव
लेकिन तोला देख दुखी अस, प्रश्न चलाय चहत अधिकार.
मानव सदा खुशी ला खोजत, लेकिन उदुप आत तकलीफ
तंय हा मोर पास सच फुरिया – काबर चोंई अस मुंह तोर ?”
मोंगरा के आधा दुख खेदिस, पंचम के मधुमिश्रित बोल
तरिया बीच पहुंच जावत तंह, पार होय अटकर मिल जात.
किहिस मोंगरा -“”बिपत के करलइ, अतका होय लेख साहित्य
कतको मरंय होय दुर्घटना, मगर हृदय घुसरत नइ टीस.
तंय हा आरो मोर लेत हस, तब सुन व्यथा कान ला खोल –
मोर पुत्र जे दूध ला पीयत, ओला चोरा लेग गिन कोन !
मन ला मार बंधावत ढाढस, लेकिन आत पुत्र के याद
सब घर गली खोज डारे हंव, ओकर दउहा दरसन दूर.
ओकर नाम धरे अब तक नइ, यदपि करत हंव ममता प्यार
ओकर बिगर जियइ अब मुस्कुल, तेकर कारन कहत – दुलार.
मंय आरक्षी केन्द्र जात हंव, होहय उहें प्राथमिकी दर्ज
पुलिस दिही सब किसम मदद तंह, वापिस मिलिहय मोर दुलार.”
पंचम होवत सन्न बात सुन, मुड़ ला खुजा – करत कुछ याद
घटना के सम्बन्ध ला जोड़त, समझ गीस तंह मुड़ी हलात.
कहिथय -“”मंय सलाह देवत हंव, बोंगे बिगर करव सम्मान
धीरज रख के घर वापिस जा, ककरो तिर झन कर हड़बोंग.
तंय हा थाना कछेरी झन जा, करव प्रतिक्षा महिना पांच
मिलिहय तोर दुलार हा वापिस, मंय देवत आश्वासन ठोस.”
लहुटगीस मोंगरा तुरंत पंचम ले मिलिस भरोसा ।
अब पंचम पहुंचिस मंथिर तिर शोध के करे परीक्षा ।।
मंथिर आय एक वैज्ञानिक, जउन बनावत औषधि एक
“अमर प्रसाद’ नाम हे ओकर, पिंयर रंग मंदरस अस गाढ़.
पंचम ला मंथिर हा देखिस, तंहने चहक निकालिस बोल-
“”मंय चुहाय हंव जउन पसीना, दिखत मीठ ओकर परिणाम.
अमर प्रसाद के गुण ला सुन ले – करिहय जेन दवई उपयोग
विजय मृत्यु पर हे अलखेली, यने अमर रहि जहय सदैव.
दुनिया मं कतको वैज्ञानिक, लेकिन जमों मोर ले हीन
जतका आविष्कार करे हें, मोर शोध सब ले विख्यात.”
पंचम कथय -“”घमंड बता झन, मानवता अरि अमर प्रसाद
मृत्यु रोक तंय जन्म ला मारत, करत ज्ञान के गलत प्रयोग.
परिवर्तन क्रम ला झन टरिया, एहर प्रकृति के वरदान
पतझड़ होना बहुत जरुरी, बाद पेड़ धरथय नव पान.
युवा वृद्ध मन औषधि पाहंय, तंहने उंकर मृत्यु नइ होय
पर नव शिशु मन होत अवतरित, जनसंख्या बढ़ जहय अपार.
मानव अन्न बिना लरघाहय, करे निवास मकान अभाव
जुन्ना नवा दुनों मिल लड़िहंय, टूट जहय आपुस के प्रेम.
जब बालक ला वृद्ध हा देखत, तंहने करथय ममता प्यार
तउन वृद्ध हा अमर अमरता, बालक साथ शत्रुता द्वेष.
जुन्ना मन बालक ला बकिहंय- “”एमन कार जनम धर लीन
जउन जिनिस उपयोग कर हम, अब दुश्मन मन लेहंय छीन.’
बालक मन डोकरा ला छरिहंय – “वृद्ध भूमि के भार समान
हमरे बर जे जिनिस सुरक्षित, एमन पहिलिच उरका देत.’
मंय हा अतका कहना चाहत -“”तंय हा अपन शोध ला रोक
एकर ले बढ़ जहय समस्या, ककरो नइ होवय कल्याण.’
तोला रटरट सतम जोहारेंव, तोला गड़त यथा तिरछूल
करुदवई हा जीवन रखथय, पर रोगी करुवावत देख.”
मंथिर कथय – “”जलत लकड़ी अस, मोर उच्च प्रतिभा ला देख
तोर ले मंय हा खूब गुनिक हंव, सिरी गिरे कहि करत विरोध.
तंय कतको आलोचना करबे, मोर राह पर बनबे आड़
पर मंय अपन जिद्द पर कायम, करिहंव पूर्ण अपन उद्देश्य.”
पंचम पूछिस – “”सत्य बता तंय, अमर प्रसाद होत तइयार
कतिक सफलता पाय अभी तक, श्रम बजाय कतका अउ शेष.?”
मंथिर बोलिस -“”मोर दवई हा, प्रतिशत साठ सफलता पाय
यद्यपि सब उद्देश्य पूर्ण नइ, पर प्रभाव हा आस बढ़ात
अभी के औषधि जेहर लेहय, ओहर अमराहय गुण श्रेष्ठ –
ओला कभू रोग नइ घेरय, यदि अजार ते भगिहय दूर.
कतको मरत परिश्रम करिहय, मगर थकान देंह ले दूर
मुंह के रंग चमक हा कायम, यने स्वास्थय हा बिल्कुल टंच.
मंय अभि छेरकू तिर जावत हंव, ओला देहंव अमर प्रसाद
यदि प्रसन्न छेरकू हा होवत, शासन ले देवा दिही इनाम.
मंथिर हा मंत्री तिर पहुंचिस, करत दवई के चर्चा ।
छेरकू ला औषधि दिस फिर पीयत हे ओकर मानी ।।
छेरकू कथय -“”करत मंय दौरा, शहर पहर किंजरत दिन रात
थक जाथंव मिहनत के कारन, रथय स्वास्थय हा सदा खराब.
अमर प्रसाद पिये हंव मंय अभि, अगर बताहय ठीक प्रभाव
अपन काम मं सदा उपस्थित, मिटिहय तन के चिंता रोग.
जेन आस धर के आये हस, शासन तिर करवाहंव पूर्ण
आविष्कार करेस हितवा बन, जन कल्याण धरे हस राह.
दवई – असर हा ठीक बतावत, लगत देह मं नवस्फूर्ति
मंत्री बोलिस- “”दवई हे उत्तम, मोर देह के मिटिस थकान.
आज अखण्डानंद के प्रवचन, ओकर पास जात हंव शीघ्र
स्वामी जी के दर्शन करिहंव, बनही जीवन सफल कृतार्थ.”
शहर बीच मं एक ठौर हे – जेहर आय बड़े मैदान
उहां गड़े पण्डाल बहुत ठक, रेम बांध के पहुंचिन लोग.
छेरकू गीस मंच मं चढ़ गिस, माइक ला धर हेरिस बोल –
“”तुम्मन थोरिक करव प्रतीक्षा, तंहने आत अखण्डानंद.
ओहर आय बहुत मुस्कुल मं, करके कृपा राख दिस मान
आज कथामृत पान करव अउ, जीवन अपन करव कल्याण.”
पिनकू घलो उपस्थित होइस, तंह टैड़क हा आइस पास
ओहर जब पिनकू ला देखिस, मुंह लुकाय बर करत प्रयास.
पिनकू एल्हिस -“”काबर छरकत, कार मोर ले बहुत नराज
या तंय मोला नइ पहिचानस, खोल भला तंय सत्तम राज ?
“शांतिदूत’ जहरी के दैनिक, उंहचे तंय हा करथस काम
उही पत्र के काम करे बर, पत्रकार बन के तंय आय.
अउ तंय हा ओ पत्रकार अस, कष्ट लाय हस ऊपर मोर
पिनकू हा चोरहा अपराधी – अइसे बोल धंसा तंय देस. ?”
टैड़क कथय -“”भेद हा खुलगे – तंय कर लेस मोर पहिचान
तोला फोकट जेन फंसाइस, वाकई उही व्यक्ति मंय आंव.
लेकिन मंय नंगत शर्मिन्दित, तोर साथ हो गिस अन्याय
ओकर फल ला खुद भोगत हंव – मिल नइ पावत जेवन छांव.
हमर देश ला निहू जान के, शत्रु राष्ट्र हा लड़ई उठैस
ओकर नसना ला टोरे बर, भारत के सैनिक मन गीन.
उही बखत जहरी हा नेमिस – आय देश पर बिपत अनेक
घर घर पहुंच उघा तंय चंदा, रुपिया अन्न यने हर चीज.
लेकिन एक बात सुरता रख – झन करबे तंय गबन के काम
वरना तोर हाथ पकड़ाहय, मुसटा जहय मोर तक घेंच”.
जहरी के सलाह हा जंच गिस, मंय हा गेंव बहुत झन पास
अपन हाथ ला लमा देंव तंह, एको झन नइ करिन हताश.
अपन शक्ति भर सब झन मन दिन, रुपिया कपड़ा सोन अनाज
बड़हर मन के बात पूछ झन, चंदा दीस दलीद्र समाज.
सबो डहर ले सकला गिस तंह, जहरी के भोभस भर देंव
लेकिन ओकर तिर ले मंय हा, दसकत अउ रसीद नइ लेंव.
चन्दा ला जहरी ला हड़पिस, बंगला बनवा लिस बड़े जान
जब मंय हा हिसाब लां पूछंव, मोला एल्ह करय अपमान.
छेरकू पास गेंव मंय दउड़त, लेकिन दीस कहां कुछ ध्यान
उहू खाय चन्दा मं प्रतिशत, तब फिर कहां ले देतिस ध्यान !
कब तक ले रहस्य हा छुपतिस, जगजग ले खुलगे सब भेद
मंय हां भ्रष्टाचार करेंव नइ, लेकिन पत पर परगे छेद.
शांतिदूत ले दूर भगत हंव जहरी अब नइ संगी ।
प्रात& खाथंव – लांघन संझा, भोगत आर्थिक तंगी ।।
टैड़क अपन बिपत ला फोरिस, पाठक मन अब देखव मंच
एक व्यक्ति मंच सम्हालिस, आय जेन हा ज्ञानिक संत.
पहिरे हवय लकलकी कपड़ा, मुसकावत लुभाय बर मंद
माथ लगाय त्रिपुण्डी चंदन, ओकर नाम अखण्डानन्द.
स्वामी हा सब झन ला देखिस, मानों हरत उंकर सब शोक
अपन आंख ला बंद करिस अउ, धर के राग पढ़ श्लोक-
“”भवानी शंकरौ वन्दे श्रद्धा विश्वास रुपिणौ ।
याम्यां विना न पश्यन्ति सिद्धा& स्वान्तस्थमीश्वरम् ।।
वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं शंकर रुपिणम् ।
यमाश्रितो हि वकोऽपि चन्द्र& सर्वत्र वन्द्यते ।।
जब श्लोक उरक गिस तंहने, धीर लगा के खोलिस आंख
हाथ हला के प्रवचन देवत, लोगन पर जमाय बर साख –
“”तुम्मन टकटक ले जानत हव – भौतिक अउ अध्यात्म मं भेद
भौतिक जिनिस सकेलत मर मर, मगर अशान्ति करत खुरखेद.
जहां देखथंव बड़हर मन ला, ओकर ऊपर आथय सोग
चकल बकल ऊपर मं दिखथंय, पर अंतस रहिथय दुख रोग.
करत रात दिन झींका पुदगा, हाय हाय मं समय हा ख्वार
मरे बाद दर भूमि ला पाथय, जतका कंगला के अधिकार.
धनवन्ता ला सब झन कहिथंय – पापी शोषक क्रूर गद्दार
रेटहा तक हा मान करय नइ, बन जाथय धरती बर भार.
मोर ठोंक ला अंतस धर लव – धन ले भूल करव झन प्रेम
खुले हृदय ले दान करव अउ, लोभ मोह ला राखो दूर.
सात्विक आध्यात्मिक अपना लो, भौतिकता ला शत्रु समान
तंहने स्वयं शांति सुख आहय, जीवन चलिहय धर के नेम”.
सन्त इही उपदेश ला देइस, जनता सुनिस कान ला टेंड़
जब प्रवचन हा खतम हो जाथय, तंहने चढ़िस चढ़ौत्री मेड़.
मनसे मन रुपिया देवत अउ, परत सन्त के धोकर के पांव
सन्त सकेलत टप टप रुपिया, देत भक्त ला आशिर्वाद.
पिनकू करत विचार अपन मन – स्वामी बने जउन इंसान
खोरबहरा ए मंय जानत हंव, ओकर साथ मोर पहिचान.
जहां संत ला पैस अकेल्ला, तंहने पिनकू करिस प्रणाम
कहिथय – “”आज धन्य मंय होएंव, सुन के तुम्हर ज्ञान उपदेश.
तुम्हर साथ मंय रहना चाहत, धरना चहत तुम्हर अस काम
लेकिन पहिली साफ बतावव – खुद के पता नाम अउ धाम ?”
बोलिस संत -“”आड़ तंय झन बन, का करबे तंय हा सब जान
रमता जोगी बहता पानी, आज इहां कल दूसर ठौर.”
पिनकू हा अगिया के बोलिस -“”मंय जानत हंव तंय अस कोन
तंय, खोरबहरा अस जानत हंव, अगर असच तब बात ला काट.
मोर पास तंय अतका फुरिया, कार बने स्वामी संत
सब ला गलत ज्ञान देवत हंस – काबर नइ छोड़स फरफंद ?”
खोरबहरा मन मं सोचिस – यदि मंय नइ भरिहंव हामीं ।
पिनकू हा सब पोल खोलिहय – मंय परिहंव बदनामी ।।
बोलिस – “”धन बिन जमों अबिरथा, मगर करेंव ओकर हिनमान
झूठ गोठ ला सब तिर फइला, रिता जेब ला ठंस भर देव.
यदि मंय ककरो तिर जातेंव अउ, रुपिया बर फइलातेंव हाथ
मोर मदद एक झन नइ करतिस, ऊपर ले चटकातिस माथ.
बहुत सोच के संत बने हंव, बकना परथय मुंह फटकार
एमां देह करय नइ मिहनत, यश धन आथय बन के धार.
छेरकू जउन कार्यक्रम रख दिस, ओहर घलो लाभ ला पात –
जनता मं चर्चित हो जाथय, पूर्ण करत हे खुद के स्वार्थ”.
खोरबहरा, पिनकू ला छोड़स, फिर आ गीस अपन स्थान
रुपिया मन ला गिन थय चुप चुप, लुका के राखिस जीव समान.
तभे हठील पहुंच गिस उंहचे, खोरबहरा ला दीस अवाज –
“”मंय अंव चुनू दउड़ आए हंव, तोर पास आवश्यक काम”.
खोरबहरा हा मन मं सोचिस – काबर चुनू मोर तिर अ‍ैस
ओकर कते बुता हा अरझिस, जेमां जोर अवाज लगैस ?”
खोल कपाट देखथय बाहिर, लेकिन हांसत खड़े हठील
फट हठील हा अंदर जाथय, मांस खाय बर कर्री चील.
खोरबहरा अचरज कर पूछिस -“”तंय काबर बोले हस झूठ
का कारन तंय इहां आय हस, मोला बता भला तंय छूट ?”
क्रूर हंसी हंस हठील बोलिस – “”तंय अस ज्ञानिक स्वामी संत
धन ले तंय हा घृणा करत हस, भौतिकता के चहथस अंत-
मगर शुद्ध भौतिकवादी मंय, प्रेम से राखत हंव हर चीज
अभी चढ़ौत्री जेन पाय हस, मोर हाथ पर रख बिन खीझ”.
खोरबहरा सकपका के कहिथय – “”रुपिया पाय कष्ट ला झेल
अपन हाथ मं करन सकंव नइ, अपन कमाय नोट ला नष्ट”.
“”मादक जिनिस के धंधा करथंव, तेकर तंय हा करत विरोध
पर तंय खुद कुराह पर दउड़त, ओकर मंय लेहंव प्रतिशोध”.
वाद विवाद दुनों मं बढ़ गिस, तंह हठील पर चढ़गे भूत
खोरबहरा पर वार करिस अउ, प्रान हरिस बनके जमदूत.
सब रुपिया ला कब्जा करके उहां ले निकलिस पापी ।
अइसन हतियारा मनसे ला कोन हा देहय माफी ।।
गीस अंजोरी – घर हठील हा, मगर कहां ओकर संग भेंट
दुकली जेन अंजोरी के बहिनी, ओकर संग मं होगिस भेंट.
दुकली ला हठील हा देखिस, फट ले आकर्षित होगीस
दुकली हा नीयत ला ताड़िस, घर ले बाहिर निकलिस शीघ्र.
सक्का पंजा चल नइ पाइस, तंह हठील छोड़िस ओ ठौर
मंय हा कथा ला छेंकत हंव कुछ, पाठक मन हा धर लव घीर.
चइती अपन राह पर जावत, मगर एक ठंव रोकिस गोड़
उही पास चकला घर एक ठक, अंदर घुसिस अपन मुंह मोड़.
लड़की मन सज संवर सुघर अक, हंस गोठियात मरद के साथ
चइती ला लड़की मन देखिन, ओकर तिर पहुंचिन धर पांत.
चइती हा ओमन ला पूछिस -“”कार करत तन के व्यापार
एमां तो इज्जत हा जाथय, जीवन तक हो जाथय ख्वार.”
माला बोलिस -“”काय कहन हम – धर के पेज खोजे हन काम
लेकिन कहुंचो ठिंहा मिलिस नइ, तब धर लेन गलत अस काम.
होत पुरुष मन क्रूर भयंकर, एकोकनिक मरंय नइ सोग
उनकर अत्याचार के कारन, हमला होत गिनोरिया रोग.”
“”मानत हंव मंय तुम्हर विवशता, युवती मन किंजरत बेकार
लेकिन एकर ए मतलब नइ, धथुवा धरव तन के व्यापार.
बुता बुता कहि चिल्लावत हव, चलव मोर संग मं अभि गांव
उहां श्रमिक के अड़बड़ कमती, तुम्मन पहुंच के काम बजाव.
यद्यपि उहां मिलन नइ पावय, सक ले बाहिर श्रम के दाम
पर भोजन अउ कपड़ा मिलिहय, अतका आश्वासन मंय देत.”
रुपा बोलिस -“”हम जानत हन – तंय बतात हस बिल्कुल सत्य
लेकिन काबर गांव मं जावन, हमरे बर ए नरक हा स्वर्ग.
खर्च सौंख हा बढ़े खूब तक, ओकर पूर्ति इहें हो पात
ए माहौल हमर बर रुचिकर, कम बेरा मं अधिक कमात.
शासन हमला धर के लेगिस, उहां कड़ाकड़ा ले बंध गेन
पर हम भाग इहां लहुटे हन, तब ले लगथय बने अजाद”.
चइती सुनिस नया व्याख्या जब, अचरज मं भर होगिस दंग
कहिथय -“”तुम गल्ती रद्दा पर, अपन हाथ होवत बर्बाद.
तब फिर तुम्मन काबर डारत – मरद गरीबी पर सब दोष
नारी जात कलंक हवव तुम, कोन मरय तुम पर अफसोस !
लेकिन मंय अतका फोरत हंव – सूरा हा मल ला डंट खाय
यद्यपि ओकर जीवन चलथय, पर वृष्टा जेवन नइ आय.
सूरा हा श्रम गर्त ले उबरय, भोजन खोजय अन्य प्रकार
इसने तुम्मन इहां ले उबरव, अपन भविष्य के करव सुधार.”
ओतकी मं हठील हा आइस, होवत खुश चइती ला देख
कहिथय -“”आज पता होइस सच – तोर चरित्र हा कतका साफ !
एकर पहिली तंय बोले हस – मंय हा दूसर ले बेदाग
मगर लुका के धंधा करथस, चोरी करथय लुकछिप काग.
लेकिन तंय हा उचित करत हस, अपन खर्च बर रुपिया सोंट
मंय प्रसन्न हंव देख के तोला, धंधा करत जउन कर ओंट.
मंय अपराध तोर अस करथंव तब मंय रखथंव आसा ।
अंड़े बखत मं मदद अमरबे – झन डबकाबे लासा ।।
चइती हा पर ला समझावत, मगर स्वयं पर लांछन आत
नाविक हा रक्षा बर जाथय, लेकिन खोवत खुद के जान.
चइती बोलिस -“”सुन हठील तंय – मोला झन धर अपन समान
मोर तोर हे राह अलग अस, तंय वापिस ले अपन जबान.”
अब हठील हा हेर कैमरा, फट फट लीस बहुत ठक चित्र
कहिथय -“”चइती, तंय हा सुन ले – मंय तोला समझत हंव मित्र.
टांठ बात ला जउन करे हस, ओला मंय कर देवत साफ
अब ए तनी मोर भर चलिहय, पहिलिच ले खोलत हंव साफ.
तोर मदद मंय जभे मांगिहंव, खत्तम रखबे बात के मान
मोर विरुद्ध चाल यदि चलबे, तब तो तोर बहुत नुकसान.
तोर चित्र मंय खींच धरे हंव, ओकर होहय गलत प्रचार
तंय बदनाम हो जबे सब तन, इज्जत गिरिहय मुड़ के भार”
चइती क्रोध गुटक के निकलिस, शांतिदूत कार्यालय अ‍ैस
उहां छेरकू अउ जहरी ला, आपुस मं गोठियावत पैस.
छेरकू बोलिस -“”काय कहंव मंय – जनता के करथंव उपकार
ओहर गुनहगरी बेअकली, मोर हइन्ता करथय झार.
लेखक औरत महिला रोगी, मतदाता मजदूर किसान
एमन होथंय देश के दुश्मन, यने होत सब ले बइमान.
“”मंय कुछ दिन पहिली विदेश गेंव
उहां अतेक ऊंचा पीढ़ी दीन के
सच बताय मं आवत लाज
उहां के जनता
अपन देश बर ईमानदार हे
अउ इहां के मनखे के चाला ला परखथंव-
ते मोर मुड़ी हा
अपने आप खाल्हे कोती निहर जाथे.
बार बार हड़ताल अउ करथंय घेरी बेरी मांग.
एमन ला देख के
मोर तन बदन मं अंगार धधक जाथय
पर आखिर कर देथंव माफ.”
एकर बाद किहिस अउ छेरकू -“”ऊपर केहेंव बात अभि जेन
ओला मन मं लुका के रखबे, एकर झन करबे कुछसोर.
अब ए डहर जउन मंय बोलत, ओला अपन पत्र मं छाप
जनता पढ़के गदगद होवय, ओकर हटय फिकर संताप –
“”शासन हा सब ला सुख देहय, बस नेता अस झाराझार
कृषक के लागा माफी होहय, युवक हड़प लेहंय रोजगार.
श्रमिक के मजदूरी हा बढ़िहय, बालक मन शिक्षा अउ खेल
अबला मन हर हक ला पाहंय, यने न्याय सब झन के साथ -”
छेरकू हा जहरी ला बोलिस -“”तंय हा जोड़ सकत अउ पंक्ति
हमर घोषणा पढ़ंय लोग तब, सब दिन अस मन राखंय भक्ति”.
जहरी खलखल हांसत बोलिस -“”वाकई तंय हस बहुत चलाक
केकरा असन चाल ला चलथस, तब कुर्सी पर सदा बिराज”.
तब पिनकू हा आके बोलिस – “”मेहरुभेजिस रचना एक
करके कृपा छाप दव एला, लिखे हवय वैचारिक लेख”.
पिनकू हा रचना हेरिस अउ जहरी डहर बढ़ाइस ।
लेकिन जहरी छेंकिस सम्पादक के चाल बताइस ।।
कहिथय -“”तंय दानी ला जानत, जे साहित्य मं हे विख्यात
ओकर छपे बहुत ठक पुस्तक, कई संस्था ले पाय इनाम.
दानी हा रचना भेजिस हे, ओला मंय देवत स्थान
जलगस ओकर रचना छपिहय, दूसर ला नइ देंव जबान.
मेहरुगांव गंवई मं रहिथय, कहां लिख सकत लेख यथार्थ
नाम कमाय अगर मन होवत, कविता छोड़ करय परमार्थ”.
पिनकू काबर उहां बिलमतिस, ओ तिर ला फट कर दिस त्याग
बाहिर मं आइस तब देखिस, युवक करत हें हक के मांग
मार अवाज युवक चिल्लावत -“”हम देवत हन कतको बांग
लेकिन शासन सुनइ करत नइ, टुकनी फेंका जथय सब मांग.
हम शिक्षित हन तभो निठल्ला, अब तक कहां पाय रोजगार !
पर मन कमा पेट ला तारत, तिसने हमूं चहत अधिकार”.
बुल्खू उही जगह मं पहुंचिस, युवक ला देखिस हालबेहाल
उंकर समर्थन करना वाजिब, तब देवत हे नेक सलाह.
बुल्चू बोलिस -“”स्वीकारत हंव – तुम्मन हेरत हव सच बोल
जउन बेवस्ता अपन बतावत, ओमां एकोकन नइ पोल.
पर एक गोठ निचट अंदरुनी – जब तक भुकरत पूंजीवाद
तुम्हर समस्या हल नइ होवय, बेकारी लुटही मरजाद.
वर्तमान शासन हा देवत – आश्वासन अटपट गोठियाय
पर सब झन के पेट हे रीता, होत हवय जन पर अन्याय.
तरहा तरहा जउन बनावत, ओकर जड़ ला कोड़ गिराव
बिगर अधर तंह भर्रस गिरिहय, सब ला मिलिहय जेवन छाय”.
नवजवान मन किरिया खाइन – शासन संग करबो संघर्ष
ठाड़ बाय नइ रहन हमन हा, जलगस नइ आहय सुख हर्ष.”
बुल्खू बोलिस – “”तुम बोले हव, ओमां मंय कुछ करत सुधार
यदि तुम्मन सुख शांति के इच्छुक, बुद्धि शांत रख करव उपाय.
शासन गलत नीति पर रेंगत, ओकर करव अवश्य विरोध
यदि जनहित मं नीति लाभप्रद, देव समर्थन द्वेष ला त्याग.
गरम खून ला मंय देखे हंव – असफलता मं होत निराश
तहां आत्महत्या तक करथंय, अपन हाथ मं बनथंय लाश.
पर सच मं एहर कायरता, शोषक ले तुम हा डर गेव
क्षणिक उत्तेजना हा आखिर मं, तुम्हर प्राण के ल ेलिस हूम.
मंय सलाह देवत अतकिच अस – होवत तुम पर अत्याचार
अत्याचार ला सहि लव बिन मन, काबर के तुम निर्बल दीन.
पूंजीपति के तिर धन रुपिया, ओहर बिसा सकत हर चीज
तुम्हर बीच के मित्र बिसा के, बना सकत हे शत्रु तुम्हार.
शासन तिर कानून नियम हे, अधिकारी जनशक्ति अपार
पत्र विचार प्रचार के माध्यम, याने शासन सक्षम खूब.
शासन पूंजीपति के संग यदि, करिहव खुले आम संघर्ष
उनकर पद उद्योग सुरक्षित, तुम्हर हो जाहय खुंटीउजार.
होगिस पश्त श्रमिक आंदोलन, श्रमिक युवक झेलिन नुकसान
हमूं उही तोलगी ला पकड़त, सब उद्देश्य हा चरपट नाश.
अपन स्वार्थ के पूर्ति करत तुम, खूब बढ़ाव शक्ति सामथ्र्य
शासन मं घुसपैठ करव अउ, पूंजीक्षेत्र तुम्हर विश्वस्त.
जब तुम शक्तिवान हो जाहव, करव शत्रु पर विकट प्रहार
तुम्हर भविष्य हा पूर्ण सुरक्षित, सबके आवश्यकता पूर्ण.”
बुल्खू हा जे शब्द निकालिस, तेला युवक सुनिन कर चेत
कतको नीति ला अस्वीकारत, पर आखिर मं इज्जत दीन.
होवत जउन संतुलित जेवन, मांस शाक मीठा नमकीन
पात शरीर जमों कैलोरी, तब पावत दीर्घायु निरोग.
ओतकी मं छेरकू हा आथय, तंह बुल्खू हा हाथ मिलैस
यदपि कुथा हे राह काम दल, पर संबंध ला राखत मीठ.
बुल्खू हा छेरकू ला बोलिस -“”शिक्षित युवक करत हें मांग
इंकर मांग पर ध्यान देव तुम, आय समस्या ला सुलझाव.
युवक किसान श्रमिक मन होथंय, अपन राष्ट्र के मुख्य स्तम्भ
अगर इंकर आवाज ला दाबत, देश उठाथय कई नुकसान.
दंगा हिंसा धार्मिक झगड़ा, आंदोलन आतंक षड़यंत्र
अनाचार विद्रोह गद्दारी, देश बंटत हे कइ ठन भाग.
शासन मं तंय हा बइठे हस, युवक के मांग ला सुन कर चेत
अपन शक्ति भर मदद ला पहुंचा, इंकर जीविका बर कर काम.”
बुल्खू के नक्सा मारे बर, खुद ला सिद्ध करत हे श्रेष्ठ
छेरकू जमों तर्क ला काटत, मात्र चलावत अपन विचार-
“”तंय हा सिर्फ बात मं बोलत, पर हम करत ठोसलग काम
युवक के भलाई होवय कहि, पारित हवय योजना चार”.
छेरकू किहिस नवयुवक मन ला – “”वास्तव मं तुम होवत नष्ट
लेकिन तुम्मन फिकर करव झन, मंय खुद भिड़ के हरहूं कष्ट.
आत दुर्ग मं मुख्यमंत्री हा, मंय जावत हंव ओकर पास
तुम्मन घलो मोर संग रेंगव, ए तिर करव समय झन ख्वार.
आय जाय बर फिकर करव झन, ट्रक बस के हम करे प्रबंध
जेवन अउ कुछ रुपिया मिलिहय, एला झन समझव फरफंद”.
छेरकू हा बरगला डरिस तंह, फेंकिन युवक मांग के डांग
छेरकू साथ भरभरा चल दिन, अपन हाथ मं मेटिन मांग.
बुल्खू पिनकू खड़े उहिच कर, बुल्खू हा बोलिस कुछ हांस –
“”छेरकू के करनी ला देखव – फट ले करिस मांग ला नाश.
हम तुम बक खा इंहे खड़े हन, छेरकू संग चल दीन जवान
गंजमिज भीड़ दुर्ग मं बढ़िहय, तंह छेरकू पाहय सम्मान.
मगर युवक मन ला का मिलिहय, हो दिग्भ्रमित रेंग दिन राह
वाजिब बात के पत ला मेटत, सुघर लगत हे गलत सलाह.
पर आखिर मं करत निरीक्षण – हमर युवक मन हा निर्दाेष
अपन भविष्य कतिक ला देखंय, जब पावत तात्कालिक लाभ.
बुल्खू हा ओ तिर ला छोड़िस पिनकू टहलत फांका ।
मींधू ला कहुं जात देख के ओहर मारिस हांका ।।
पिनकू पूछिस -“”नइ जानस का – चल दिन दुर्ग बहुत इंसान
तंय हा काबर उहां गेस नइ, इहिच शहर मं देवत जीव.
अगर तंहू हा उंहचे जाते, वाहन तक के मुफ्त प्रबंध
आनी बानी जेवन मिलतिस, ऊपर ले नगदौवा नोट ?”
मींधू हा हड़बड़ागे पहिली, गला मं रुकगे सतम जुवाप
ओहर धरे काम कुछ दूसर, उही बात ला सोचत आप.
बहुत बाद मं सोच के बोलिस -“”यद्यपि मंय हा पढ़े जवान
पर, पर ले चाला हे उत्तम, रुपिया बर देवंव नइ जान.
अन्य नवयुवक मन लालच मं, बेच सकत हें भारत देश
लेकिन मंय हा रक्षा करिहंव, जलगस तन मं जीवन शेष.”
पिनकू कहिथय -“”मान सकत हंव, तंय हा बात करत हस ठोंक
लेकिन सम्हर ओढ़ दूल्हा अस, कहां जात हस बनके टंच !
उंचहा घड़ी हाथ मं चमकत, सोन के मुंदरी नरी मं चैन
कोट अउर फूलपेंट हने हस, मटकावत चंवतरफा नैन.
याने अड़बड़ खर्च करे हस, पाय कहां के अतका नोट
मोर पास सच उत्तर ला रख, यदि नइ परत हृदय पर चोट ?”
पिनकू खूब चेंध के पूछत, पर मींधू उत्तर नइ देत
सोचत-काम बिगाडुक हा अब, भेद बताय मांस ला खात.
मींधू बात घुमाय ला बोलिस -“”सपसप करत मोर अब पेट
चल पहिली कुछ जिनिस उड़ावन, तंहने ढिलिहंव उत्तर हेट.”
पिनकू ला बरपेली झींकिस, कचरा होटल मं बइठैस
कई प्रकार के जिनिस खाय बर, कर आदेश तुरुत मंगवैस.
खाद्य पदार्थ हा जहां आगे, पिनकू टप टप झड़कत माल
मींधू अउ दूसर मन हांसत, देख के ओकर कंगलइ हाल.
बालम कथय -“”आज देखत हन – यह तो बिकट हदरहा जीव
जिनिस भगावत तइसे ओइरत, एकोकनिक धरत नइ धीर.”
मींधू अउ दूसर मन छोड़िन, अपन प्लेट मं बहुत समान
पर पिनकू हा जमों गपक दिस, अन्न के झनिच होय हिनमान.
फत्ते हा मींधू ला पूछिस – “”कहां के पेट मंहदुर ला लाय
मोला तो असभ्य अस लगथय, जीवन उच्च जिये नइ आय ?”
पिनकू छरिस -“”जिनिस यदि छोड़त, जनता संग मं धोखा घात
हमर देश के कतको मनसे, पेटभरहा भोजन नइ पात
तुम अनाज ला नष्ट करत हव ओला छोड़ के जूठा ।
इही टेस के कारन मारत भूख रोग हा जूता ।।
फत्ते खुद ला ऊंचहा मानत, तब ओला चढ़गे कंस क्रोध
पिनकू के दर्जा गिराय बर, सब ला सुना के डांटत खूब –
“”वह रे राष्ट्रभक्त परमार्थी, बहुत दिखात नेक सिद्धान्त
होटल के तंय निकल कलेचुप, वरना तोर अवस प्राणान्त”.
पिनकू हा फत्ते पर बखलिस -“”मंय ताकत मं बहुत सजोर
तोला रचका खेद सकत हंव, मार सकत हंव नक्सा तोर.
पर फोकट के झगरा बढ़िहय, इहां आय हें अउ कई लोग
उंकरो शांति भंग हो जाहय, तब मंय रहि जावत चुपचाप.”
अ‍ैस उमेंदी संग मं कंगलू, अउ गोबरुजुगबती सुहान
एमन हा अनाथ लइका एं, जीयत भूख बिपत ला ताप.
किहिंस उमेंदी हा कचरा ला -“”तंय जानत हस परिचय मोर
मंय पहिली के आंव विधायक, मांगे के आदत हे मोर.
पलिही मंय हा वोट ला मांगव, उही सुभांव करत हंव मांग
मोर साथ लइका आए हें, एमन हा असहाय अनाथ.
इंकरे बर होटल मं जाथंव, जिनिस मांगथंव जूठा शेष
अदमी मन के कपड़ा मंगथंव, ताकि ढांक ले खुल्ला देह.
तोर ले तक मंय रखत अपेक्षा – जूठा जिनिस ला कर दे दान
एकर ले कई लाभ हो जाहय, तोर होय नइ कुछ नुकसान.
जेन जिनिस हा फटका जाथय, पर अब नइ होवय बर्बाद
बच्चा मन के पेट भराही, एमां तोर जसी जयकार.”
कचरा हा अकचका के बोलिस – “”तंय हा फभे के लाइक बोल
मंय जूठा ला कइसे देवंव, मोला ब्यापत बुरा कनौर.”
“”बेरी बेरी दउड़ के आहंव, जिनिस मांगहूं आरुग साफ
मोला देख घृणा तंय करबे, आखिर मं करबे इन्कार.
जेन जिनिस मंय हा मांगत हंव, सक्षम के फेंके के आय
पर अभाव मं जेहर जीयत, ओकर बर एहर बहुमूल्य.
जे पर के फेंके के लाइक, ओहर इनकर बर स्वीकार
तंय हा आनाकानी झन कर, हरहिन्छा दे जूठा चीज.”
“”तंय बोलत तेला मानत हंव, उठा लेग मनमाफिक चीज
पर झन होय मोर नकमरजी, एकोकनिक आय झन आंच.”
बालक मन जूठा ला सकलिन, उंकर हृदय होगिस खुश खूब
किहिस उमेंदी ला फत्ते हा – “”मंय हा शर्मिन्दित हंव आज.
हम्मन टेस टास मारे बर, प्लेट मं छोड़त खाय के चीज
एक डहर हम जेवन फेंकत, दूसर तन भुखहा हें लोग.
यदि मनखे हा खुद सुधरय अउ, करय चीज के सदउपयोग
तब एकोझन भूख मरय नइ, सबके पेट रही दलगीर.”
फत्ते हा रुपिया ला हेरिस, ओला कचरा ला पकड़ैस
बोलिस -“”तंय हा बांथ दे बढ़िया, स्वादिल जिनिस मीठ नमकीन.
मंय अनाथ मन ला का देवंव, मोर डहर ले अतकिच भेंट
कहिथंय – पर के मदद करइ मं, धन हा बढ़त ऊन के दून.”
कचरा हा समान ला बांधिस, लइका मन ला पकड़ा दीस
फत्ते हा पिनकू ला देखत, ओकर आंख कृतज्ञ के भाव.
फत्ते हा होटल ले निकलिस, गीस उमेंदी बालक साथ
अब आगू कोती का होवत – ध्यान लगा के देखव हाल.
मींधू हा कचरा तिर अमरिस, झट हेरिस चरपा अस नोट
रुपिया के गड्डी ला देखिस, पिनकू हा चाबत हे ओंठ.
अचरच भर मन अंदर सोचत – यहू दूसरा अस बेकार
कहां ले पाइस अड़बड़ रुपिया, पता चलत नइ कुछ सच सार !
दूनों झन होटल ले निकलिन, तंह मींधू हा हेरिस बोल –
“”मोर बात झन बुरा मानबे, मंय बोलत हंव अंतस खोल.
तोर साथ ला मंय छोड़त हंव, अरझे हवय एक ठन काम
ओला मंय हा अब निपटाहंव, रुकन पांव नइ खमिहा गाड़.”
पिनकू किहिस -“”उहिच मंय सोचत, मंय हा घलो बिलम नइ पांव
तोर ले पहिली झप खसकत हंव, कतको बुता करत हें खांव.”
पिनकू हा मींधू ला छोड़िस, ओ तिर ले खसकिस कुछ दूर
कोन्टा लुका अपन मन सोचत -“अब रहस्य के पता लगांव.
मींधू कहां ले रुपिया पाइस, ओकर काय अरझगे काम
सत्य बात के पता लगाय तब, मन के शंका लिही अराम.’
दूसर तन मींधू हा सोचत – कते डहर ले पिनकू अ‍ैस
दुनिया भर के भेद ला पूछिस, सच बताय मोला चमकैस.
पर ओकर ले मंय चलाक हंव, हटा देंव जतका अस विघ्न
अब मंय फिक्कर ले दुरबाहिर, होहय बुता पूर्ण निर्विघ्न.
ओकर काम ला पाठक सुन लव – हवय शहर मं नलघर एक
नल ले फइलत उहां के जल हा, उही ला पीथंय जीव अनेक.
मींधू तिर मं तीक्ष्ण जहर हे, जहर ला जल मं करिहय मेल
जतका मनसे पानी पीहंय, उंकर खतम जीवन के खेल.
मींधू सावधान बन तरकत, पहुंच गीस नलघर के पास
गलत बुता करना ते कारन, ऊपर तरी होत हे सांस.
तीक्ष्ण जहर ला हेर लीस अउ, आगू तन के करिस उपाय
ओतकी मं पहुंचिस पिनकू हा, मींधू पास बम्ब अस धांय.
मींधू के विष ला टप झटकिस, कहिथय – “”एहर काय मितान
लगत – खाय के जिनिस धरे हस, चल तो भला दुनों झन खान.
अरे अरे मंय गल्ती बोलत, उत्तम चीज तोर भर आय
तभे खाय के तोरेच हक हे, तब तंय हा बस स्वयं गफेल.”
पिनकू हा विष ला खावय कहि, मींधू डहर लेगथय हाथ
मींधू हा पंचघुंच्चा घुंचथय, किसनो कर बचाय बर जान.
पिनकू बोलिस -“”काबर भागत – तंय हा धरे हवस का चीज
एकर ले का रउती करबे, सच सच बता अपन उद्देश्य ?”
मींधू हा सब भेद खोल दिस -“”मंय हा जहर रखे हंव साथ
एला जल मं मेल दुहूं तंह – पटपट मर जाहंय सब जीव.
सच बिखेद ला मींधू फोरिस, तंह पिनकू हा छोड़िस सोग
मरते दम मींधू ला दोहनत, ओहर हवय घलो ए जोग.
पिनकू छरिस -“”काय पाते तंय मनखे के कर हत्या ।
काकर बुध ला मान चलत हस खोल मोर तिर सत्तम ।।
मींधू हंफरत हलू निकालिस -“”तंय जानत हस जीवन मोर
मंय हा शिक्षित पढ़े युवक अंव, मगर काम बिन किंजरत खोर.
इही बीच मं एक विदेशी, मोर पास पहुंचिस चुपचाप
ओहर बोलिस – “”मंय हा हरिहंव, तोर जतिक अस दुख संताप.
मंय तोला रुपिया देवत हंव, पर तंय उठा एक ठक काम
पानी मं विष मिला बेहिचक, रखिहंव गुप्त तोर जे नाम.”
मंय घोखेंव -“”चहत हंव मंय हा – बढ़िया शासकीय पद एक
यदि मोला रुपिया मिल जाहय, तंहने पटा दुहूं फट घूंस.
फिर नौकरी तो खत्तम मिलिहय, भरभर बर जाहय दुख फूस
आय विदेशी तेकर मानों, तभे लक्ष्य आहय खुद दौड़.”
रुपिया ला गिन दीस विदेशी, बढ़िस बिकट लालच के रोग
ओकर बात मान के मंय अभि, काम अनर्थ करत बिन सोग.”
पिनकू बोलिस – “”अर्थ पाय हस, ओकर ले मोला नइ अर्थ
बता विदेशी के छैंहा ला, वरना भगा जहय ठंव छोड़”.
मींधू हा स्वीकार करत नइ, ओहर फंसे कड़क दू ओर
खाई कुआं दुनों जब संघरा, कते कते तन लेगय गोड़.
आखिर मींधू हुंकी ला भर दिस – “”बने के बिगड़य भावी मोर
कहां विदेशी चुप बइठे हे – चल बतात हंव ओकर धाम”.
दूनों झन थाना मं चल दिन, उहां हे अगमा थानेदार
जहां शत्रु के भेद ला खोलिन, अगमा के नटिया गे आंख.
थानेदार चटापट दउड़िस, आरक्षक दल धर के साथ
जहां लुका के हवय विदेशी, उंहचे दबिस दीन तत्काल.
खतरा देखिस जहां विदेशी, खसके बर होवत हुसियार
लेकिन ओहर तरक सकिस नइ, नरी ला धरलिस थानेदार.
जब कमरा के जांच हा होइस, मिलिस उहां पर नोट अपार
गांव देश के नक्शा मिलथय, एक सेक घातक हथियार.
अगमा हा खखुवा के पूछिस -“”तंय हा इहां आय हस कार
मींधू ला चलवात कुरद्दा, अपन भेद ला सच सच खोल ?”
“”मंय ए देश आय एकर बर – भारत देश मचय खुरखेद.
शासन के विरोध जे करथय, जे अशांत द्रोहिल कंगाल
ओला हम बनात आतंकी, ओकर मदद करत हर हाल.
आंतकी मन हमर मानथंय, तोड़ फोड़ कर लेथंय जान
इही समस्या ले निपटे बर, भारत देश के जाथय जान.
वाजिब उन्नति होन पाय नइ, अधर मं लटकत जमों विकास
तंहने भारत देश हा होथय, अन्य देश के आर्थिक दास”.
अगमा हा खखुवा के बोलिस -“”चल संग मनुखमार जासूस
थाना मं फिर अउ बोकराहंव, मरते दोंगर रहस्य ला पूछ”.
पिनकू अउ मींधू ला बोलिस – “”तुम पकड़ाय शत्रु ला आज
तुम्मन हव तारीफ के काबिल, होत हवय भारत ला नाज.
मानव के हित करय जउन हा, हम चाहत हिम्मती जवान
मुड़ हा ऊपर होत गरब मं, तुम्मन देशभक्त इंसान”.
थानेदार ला पिनकू बोलिस -“”जनता के जीवन बच गीस
ओमां मोर हाथ नइ थोरको, बस मींधू भर करिस कमाल.
एहर अपन साथ मं लेगिस, याने बना सहायक एक
बरदी के चरवहा हा रखथय, मदद करे बर टेचा एक”.
थानेदार विदेशी मन गिन ओ तिर छोड़ के थाना ।
मींधू पिनकू काबर रुकतिन परगे पांव बढ़ाना ।।
“”मंय हतियारा लालच मं पर, जोंगे रेहेंव क्रूर के काम
लेकिन तंय हा बीच मं आके, छेंक देस होवत अनियाव.
अउ उपरहा मोर रक्षा बर, करत प्रशंसा रख के तर्क
वाकई तोर मोर मं अंतर, अमृत विष मं जतका फर्क”.
मींधू हा धथुवा के बोलिस, तंह पिनकू हा पारिस बेंग-
“”मोला चढ़ा अकास झनिच तंय, झन कर अभिच प्रशंसा नेंग.
वरना तोला फंसा दुहूं मंय – तंय हड़पे हस नंगत नोट
ओकर भेद खोलिहंव सब ठंव, तंहने फइल जहय हर ओंठ.
तोर राह हा ठीक के गल्ती, अपन कर्म के चहत हियाव
बइसाखू व्याख्याता तिर चल, उही हा करही सही नियाव.
साहित्य क्षेत्र मं आय समीक्षक, लेख सुधारत करके वार
पर यथार्थ घटना जे घट गिस, ओकर पर का रखत विचार ?”
एमन बइसाखू तिर पहुंचिन, मिलगे उंहचे बालक एक
बइसाखू के पुत्र ए छबलू, ओकर गाल चिकोटी देत.
एमन फोरिन पूर्व के घटना, बइसाखू व्याख्याता पास
बइसाखू हा बात समझ के, सोचत देखिस ऊपर अकाश.
मींधू पर ललिया के भड़किस – “”तोर काम ले आवत शर्म
ककरो प्रान ला जबरन छिनना, कहां आय मानव के धर्म !
मगर खुशी ए बात के होवत – जग मं बांच गीन निर्दाेष
अब ले ठीक चाल रेंगे कर, सदा रखे कर कायम होश.
गलत काम कर नोट पाय हस, याने करे हवस अपराध
पर मंय तोला क्षमा देत हंव, अब पूरा कर खुद के साध.
सांप के विष जीवन ला हरथय, कांटा हा गड़ सुख हर लेत
पर कांटा ले कांटा निकलत, विष औषधि बन जीवन देत.
घूंस खवा के झटक नौकरी, अउ जनता के कर उपकार
शोषक द्रोहिल ले टक्कर कर, तब निवृत्ति दोष के भार”.
मींधू बोलिस – “”तंय बफले हस, बुरा लगिस पर मिलही लाभ
व्यासी बखत धान मुरझाथय, मगर बाद उमछावत तान”.
मींधू तिर मं मिठई हे थोरिक, ओला खाय छबलू ला दीस
छबलू मार गफेला खावत, पर ला कुटका तक नइ दीस.
पिनकू हा मींधू ला बोलिस -“”छबलू ला पटाय हस घूंस
शुभ मुहूर्त के कारण मिलिहय, तोला अवस शासकीय काम”.
सब झन हंसिन खलखला तंहने पिनकू नापिस रस्ता ।
आगू तन के दृष्य देख के रहिगे हक्का बक्का ।।
लगे चुनू के हाथ मं बेली, दू आरक्षक ओकर साथ
पिनकू पूछिस -“”दंग होत हंव, तोर अभी के हालत देख.
ककरो ऊपर दुख आथय तब, करथस मदद हड़बड़ा दौड़
कभू गलत रद्दा नइ रेंगस, देत नियम कानून ला साथ.
मगर आज का जुरुम करे हस, लगे हवय का धारा ठोस
आखिर काय बात ए वाजिब, अपन समझ के फुरिया साफ ?”
कलपिस चुनू – “”नेक मनखे हा, अपन ला बोलत निश्छल नेक
ओकर पर यकीन नइ होवय, दुश्चरित्र के लगथय दाग.
तइसे निरपराध हंव मंय हा, पर प्रमाण बर मुश्किल होत
मगर तोर ले अतका मांगत – मोर व्यथा पर कर विश्वास.
खोरबहरा के हत्या होगिस, दूसर व्यक्ति करिस अपराध
पर अधिनियम हा मोला धांधत, मोर मुड़ी पर डारत दोष.
“तीन सौ दो’ धारा हा पकड़त, तब हथकड़ी लगे हे हाथ
मोर खिलाफ दर्ज हे प्रकरण, न्यायालय मं मोर बलाव.
मंय अब तक विश्वास रखे हंव, जब वास्तव मं मंय निर्दाेष
मोला दण्ड मिलन नइ पावय, छेल्ला घुमिहंव इज्जत साथ”.
पिनकू बोलिस -“”निरदोसी हस, यदि तंय दण्ड मुक्त हो जात
तंय हा दूध भात ला खाबे, हमर हृदय के खिलही फूल.
पर तंय धोखा मं झन रहिबे, सावधान रहिबे हर टेम
अपन ला सुरक्षित राखे बर, पहिलिच ले प्रबंध कर लेव.”
तभे अ‍ैन सुखमा अउ नीयत, ओकर साथ एक ठन भैंस
सुखमा पूछिस -“”पहिचानत हव – एहर आय सुंदरिया भैंस ?”
चुनू अपन विपदा ला भूलिस, कहिथय – “”मंय हा जानत खूब
एहर दुर्घटना मं घायल, अब तब छुटतिस एकर प्रान.
बपरी के उपचार करे बर, तोर पास हम धर के गेन
अब भैंसी के तबियत उत्तम, घोसघोस ले मोटाय हे देह.”
सुखमा बोलिस -“”तुम्हरे कारन, बपरी हा जीयत हे आज
बिगर पुछन्ता के यदि होतिस, खुरच खुरच के देतिस जान.”
पिनकू हा सुखमा ला बोलिस -“”तंय हा करे हमर तारीफ
ओकर ले हम गदगद होवत, मगर चुनू के दुर्गति देख –
मरत रथय के जीव बचाथय, अउ असहाय के टेकनी आय
खुद हा निरपराध हे तब ले, फंसगे हत्या के अपराध.”
सुखमा बोलिस – “”दंग होत हंव – वाकई होय गलत अनियाव
जे मनसे ईनाम ला पातिस, ओला कार मिलत हे दण्ड !
पर मोला विश्वास अभी तक – चुनू करे हे हित के काम
ओकर फल मं अच्छा मिलिहय, सब प्रकरण हो जही समाप्त.”
सब झन अपन राह पर रेंगिन, पिनकू हा सुन्तापुर गांव
ओला जहां सनम हा मिलथय, पूछत हवय गांव के हाल –
“”खूंटा गाड़ गांव मं रहिथस, तब तंंय समाचार ला बोल
तोर ददा के तबियत कइसे, ओकर हालत ला सच खोल ?”
सनम किहिस – “”मंय दुख का रोवंव, दुख हा आवत धर के रेम
सुख ला हांका पार बलावत, पर आखिर होगेंव बर्बाद –
केकती नामक गाय रिहिस हे, उही गाय गाभिन हो गीस
ओला देख ददा ला फूलय, केकती के कंस जतन बजाय.
बोलय -“”गाय बियाही तंहने, देहय दूध कसेली एक
मोर गली नाती बर बढ़िया – पिही पेट भर मिट्ठी दूध.
हम्मन खाबो खीर सोंहारी, तब ले बचिहय कतको दूध
ओकर दही मही बन जाहय, तंहने हेर सकत हन घीव.
पर दुर्घटना इही बीच मं, केकती ला बघवा धर लीस
जहां ददा हा खभर ला अमरिस, गाय पास पहुंचिस तत्काल.
शेर हा गाय ला धरे जम्हड़ के, पीयत हवय सपासप खून
ओला जहां ददा हा देखिस, एकर घलो उबलगे खून.
अपन शक्ति भर लउठी तानिस, शेर ला मारत हेरत दांव
कतका मार शेर हा खावय, ददा उपर कूदिस कर हांव.
शेर ले मनसे के कम ताकत, बघवा लीस ददा के जीव
ओकर पहिली बच नइ पाइस, गाभिन गाय के तलफत जान.”
पिनकू हा दुख मान के कहिथय – “”वन के पास करत हम वास
होत हमर बर अति दुख दायक, जीयत जीव बनत हे लाश.
वन्य जीव मन नंगत बाढ़त, एकर ले खतरा बढ़ गीस
फसल मनुष्य अउ पशु ला मारत, निर्भय किंजरत उठा के शीश.
लकड़ी कटई बंद हे कड़कड़, र्इंधन बर लकड़ी नइ पात
वन के पास बसत हन हम्मन, मात्र पेड़ देखत रहि जात.
पर्यावरण के रक्षा खातिर, खूब उपाय करय सरकार
मगर हमर तकलीफ ला देखय, वरना वन तिर रहई बेकार.”
कहिथय सनम -“”एक ठन अउ सुन – दुखिया अउ गरीबा के हाल
दुनों एक संग जीवन काटत, रेंगत गली उठा के भाल.
अंकालू ला खुशी नइ पाइस, मृत्यु लेग गिस करके टेक.
हवलदार ला तंय जानत हस – गिरिस कुआं मं भर्रस जेन
ओकर खूब इलाज चलिस हे, पर बन गीस काल ले ग्रास.
पोखन खड़ऊ मं चढ़के रेंगिस, ओला जिमिस धनुष टंकोर
घटना के संबंध मं होवत – अटपट बात गली घर खोर.
मनसे मन चुप चुप गोठियावत – देवारी हा आगिस पास
टोनही मन के जिव करलावत, तभे पांच झन बनगे लाश.
अब टोनही मन पांचों झन ला, बना के रखिहंय रक्सा भूत
तंह जीयत ला भूत धराहंय, जीव घलो लेहंय कर नेत.”
पिनकू कुछ मुसका के बोलिस -“”घर ला लेत अंधविश्वास
एकर होत विरोध खूब जम, तभो ले आखिर बनथन दास.
एकर पर विश्वास करत शिक्षित वैज्ञानिक ज्ञानी ।
सत्य बतातिन तेमन पीयत – टोना रुढ़ि के मानी ।।
एकर बाद चलिस पिनकू हा, देखत हवय गांव के काम –
परब देवारी तिर मं आवत, मनसे मन के बंद अराम.
देवारी के अड़बड़ बूता, ककरो उल नइ पावत ओंठ
मांईलोगन मन भिड़ पोतत, फूल उतारत भिथिया कोठ.
दूसर दिन पिनकू के संग मं, मेहरुके फट होगिस भेंट
पिनकू हा रचना ला हेरिस, कर दिस मेहरुके अधिकार.
कहिथय -“”तोर स्तरीय रचना, रखे जउन मं उच्च विचार
ओला जहरी हा लहुटा दिस, छापे बर कर दिस इंकार.
एकर ले तोर हालत कइसे, होवत हस का बहुत निराश
तंय भविष्य मं रचना लिखबे, या लेखन ला करबे बंद ?”
मेहरुहंस के उत्तर देथय -“”करत कृषक मन कृषि के काम
मिहनत कर नंगत व्यय करथंय, पर फल मं पावत नुकसान.
पर कृषि कर्म ला कभु नइ छोड़य, चलत राह पर कर उत्साह
साहस करके टेकरी देवत, तभे विश्व ला मिलत अनाज.
उही कृषक के तिर मंय बसथंव, तब उत्साह रखत हंव पास
कतको रचना लहुट के आवत, मगर दूर मं रहत निराश.
सम्पादक रुढ़िवादी होथंय – युग ला छोड़ चलत हें राह
समय विचार बदल जाथय जब, तब ओला करथंय स्वीकार.
चर्चित अउ परिचित लेखक ला, सम्पादक मन स्वीकृति देत
उनकर रचना ला नइ जांचंय, भले लेख होवय निकृष्ट.
सम्पादक के कुर्सी पावत, तंहने खुद ला समझत श्रेष्ठ
श्रेष्ठ लेख ला टुकनी फेंकत, साहित्यिक कृति करथंय नष्ट.
साहित्य मं परिवर्तन आथय, तउन ले सम्पादक अनभिज्ञ
लेखक जउन करत परिवर्तन, ओहर खावत हे दुत्कार.”
मेहरुहा ठसलग गोठिया के, उहां ले सरके करिस प्रयास
पिनकू पूछिस -“”कहां चलत हस, मोर पास कुछ समय तो मेट ?
देवारी हा लकठा आगे, जावत शहर फटाका लाय
नंगत असन बिसा के लाबे, हमूं ला देबे धांय बजाय.”
मेहरुकिहिस -“”मोर ला सुन तंय – मंय खैरागढ़ जावत आज
घुरुवा मन के चलत अदालत, ओकर अंतिम निर्णय आज.
एकर पहिली बल्ला मालिक, घुरुवा मन के बनिन गवाह
मुजरिम मन हा बच जावय कहि, ओमन बोल के हेरिन राह.
मेहरुहवय तेन तिर पहुंचिन – बिरसिंग मगन घुरुवा बिसनाथ
एमन अब खैरागढ़ जावत, बपुरा मन असहाय अनाथ.
न्यायालय के तिर मं पहुंचिन, खेदू संग होगिस मुठभेड़
खेदू ला बिसनाथ हा पूछिस -“”साफ फोर तंय खुद के हाल.
तंय अपराध करे हस कइ ठक, न्यायालय का दण्ड ला दीस
कतका रुपिया के जुर्माना, कतका वर्ष के कारावास ?”
खेदू बफलिस -“”अटपट झन कह, तुम्हर असन मंय नइ अभियुक्त
मोर बिगाड़ कोन हा करिहय, मंय किंजरत फिक्कर ले मुक्त.
छेरकू हा आश्वासन देइस ओला कर दिस पूरा ।
जतका अपराधिक प्रकरण तेमन बह गिन जस पूरा ।।
यने राज्य शासन वापिस लिस – जनहित मं अपराध ला मोर
न्यायालय हा धथुवा रहिगे, मोर उड़त सब दिशा मं सोर.”
बिरसिंग कथय -“”समझ ले बाहिर, जब तंय वास्तव मं अभियुक्त
अर्थदण्ड अउ जेल मं जातेस, पर हरहा अस किंजरत मुक्त.
हम निर्दाेष हवन सब जानत, तभो ले फांसत हे कानून
हम्मन निर्णय मं हा पावत – इही सोच तन होवत सून.”
घुरुवा मन के समय अ‍ैस तंह, न्यायालय के अंदर गीन
इनकर निर्णय ला जाने बर, कतको मनसे भीतर गीन.
मोतिम न्यायाधीष उपस्थिति, मुजरिम मन कटघरा मं ठाड़
इंकर हृदय हा धकधक होवत – अब तब टूटही बिपत पहाड़.
हरिन डरत हे देख शिकारी, मछरी डरत देख के जाल
टंगिया देख पेड़ थर्राथय, हंसिया ले भय खात पताल.
न्यायाधीष हा निर्णय देइस – “”हाजिर हें अपराधी जेन
तुम पर चार लगे हे धारा, जेहर एकदम कड़कड़ ठोस.
पांच सौ छै बी- तीन सौ एकचालिस, एमन दुनों सिद्ध नइ होय
तब आरोप मुड़ी ले बाहिर, दण्ड करन पावत नइ बेध.
तीन सौ तिरपन – दू सौ चौरनबे, ए अपराध प्रमाणित होय
हर अभियुक्त जेल ला भोगव – गिन दू साल माह बस तीन.
अजम वकील सन्न अस रहिगे, अभिभाषक कण्टक मुसकात
मुजरिम मन कारागृह जावत, जेला “नरख’ कथंय सब लोग.
न्यायालय ले निकलिस मेहरु, मिलिन बहल बेदुल दू जीव
बेदुल हा खेदू ला खोजत, अपन साथ रख पसिया पेज.
मेहरुचहत बात कुछ कहना, पर बेदुल के पर तन ध्यान
आखिर मं खेदू हा मिल गिस, ओकर बढ़े भयंकर रौब.
मनखे मन जुरियाय तिंकर तिर, अपन शक्ति के मारत डींग
दमऊ के टोंटा ला चपके बर, दफड़ा करथय खूब अवाज.
खेदू किहिस -“”खूब मंय चर्चित, दैनिक पत्र मं छपगे नाम
मंय हा कतको जुरुम करे हंव, कई जन के मारे हंव जान.
भाजी भांटा ला पोइलत तब – आत्मा मं न कसक न पीर
मनसे ला नंगत झोरिया के, मंय पावत हंव नव उत्साह.”
ओ तिर खड़े हवंय जे मनखे, क्रूर कथा सुन आंख घुमात
उनकर रुआं खड़े होवत डर, मन मन कांपत पान समान.
ठेपू कथय -“”बिकट मनसे हस, तंय हस मित्र निघरघट जीव
गोल्लर अस अंड़िया के रेंगत, सब ला रखत कांरव मं दाब.”
बेदुल के अब कान पिरावत, खेदू के सुन क्रूर घमंड
बेदुल के नकडेंवा चढ़गे, ओहर सवा सेव बन गीस.
खेदू ला भन्ना के पूछिस -“”तंय अस कोन करत का काम
मंय हा चहत तोर सच परिचय, ताकि तोर जस हर ठंव गांव ?”
खेदू कहिथय – “”पिया चुके हंव, मोर शक्ति ला सब के कान
पर अब गर्व साथ खोलत हंव, मोर सिंहासन कतका ऊंच !
मंय करथंव अपराध बेहिचक, मोला जम्हड़ लेत कानून
पुलिस अदालत प्रकरण चलथय, खेदू पाय कड़ाकड़ दण्ड.
पर मंय साक्षी ला फोरत हंव, या धमकी झड़ खेदत दूर
जब आरोप सिद्ध नइ होवय, मंय निर्दाेष प्रमाणित होत.”
खेदू टेस बतावत पर बेदुल कांपत जस पाना ।
आखिर जब सइहारन मुस्कुल क्रोध फुटिस बन लावा ।।
भड़किस – “”रोक प्रशंसा ला अब, अति के अंत होय के टेम
पांप के मरकी भरत लबालब, तभे हमर अस लेवत जन्म.”
खेदू के टोंटा ला पकड़िस, अपन डहर झींकिस हेचकार
भिड़ के शुरुकरिस दोंगरे बर, सरलग चलत मार के वार.
कृषक हा बइला ला गुचकेलत, डुठरी ला कोटेला दमकात
बेदुल हा खेदू ला झोरत, यद्यपि अपन हंफर लरघात.
खेदू ला भुइया मं पटकिस, ओकर वक्ष राख दिस पांव
खेदू ला बरनिया के देखत, खुद के परिचय साफ बतात –
“”मरखण्डा ला मंय पहटाथंव, हत्यारा के लेथंव प्राण
शोषक के मंय शोषण करथंव, मंय खुश होवत ओला लूट.
न्यायालय समाज पंचायत, शासन साथ पुलिस कानून
एमन अपराधी ला छोड़त, यने दण्ड देवन नइ पांय.
तब मंय हा जघन्य मुजरिम ला, अपन हाथ ले देवत दण्ड
ओकर नसना रटरट टूटत, मंय मन भर पावत संतोष.”
मनसे भीड़ कड़कड़ा देखत, मगर करत नइ बीच बचाव
चलत दृष्य के करत समीक्षा, चम्पी तक हा झोंकिस राग –
“”खेदू हे समाज के दुश्मन, पथरा हृदय बहुत हे क्रूर
ओकर दउहा मिटना चहिये, तब समाप्त जग अत्याचार.
बेदुल असन बनंय सब मनसे, जेन करत एक तौल नियाव
अपराधी ला दण्डित करथय, दीन हीन ला प्रेम सहाय.”
तब मेहरुहा बहल ला बोलिस – “”फोर पात नइ अपन विचार
पक्ष विपक्ष कते तन दउड़ंव, दूनों बीच कलेचुप ठाड़.
अनियायी के भरभस टूटय, अत्याचार के बिन्द्राबिनास
पर समाप्त बर कते तरीका, भूमि लुकाय कंद अस ज्वाप.
अपराधी शोषक परपीड़क, पापी जनअरि मनखेमार
इनकर नसना ला टोरे बर, दण्ड दीन – जीवन हर लीन.
तउन क्रांतिकारी ईश्वर बन, सब झन पास प्रतिष्ठा पैन
उनकर होत अर्चना पूजा, कवि मन लिखिन आरती गीत.
पर एकर फल करुनिकलगे, गलत राह पकड़िन इंसान
हिंसा युद्ध बढ़िस दिन दूना, शासन करिस अशांति तबाह.
जइसन करनी वइसन भरनी, पालत अगर इहिच सिद्धान्त
बम के बदला बम हा गिरिहय, राख बदल जाहय संसार.”
आगी हा जब बरत धकाधक, रोटी सेंके बर मन होत
बहल के मन होवत बोले बर, हेरत बचन धान अस ठोस-
“”आग ला’ अग्नि शमन दल, रोकत, रुकत तबाही होवत शांत
तइसे नवा राह हम ढूंढन, तब संभव जग के कल्याण.”
झंझट चलत तउन अंतिम तंह, दुनों विश्वविद्यालय गीन
उहां रिहिस ढेला कवियित्री, तेकर साथ भेंट हो गीस.
ढेला उंहचे करत नौकरी, पाय प्रवक्ता पद जे उच्च
ओकर रुतबा सब ले बाहिर, लेकिन रखत कपट मं दाब.
ढेला हा मेहरुला बोलिस -“”मोर नाम चर्चित सब ओर
दैनिक पत्र हा स्वीकृति देथय, कई ठक पुस्तक छपगे मोर.
दिखत दूरदर्शन मं मंय हा, मिंहिच पाठ्य पुस्तक मं छाय
देत समीक्षक मन हा इज्जत, साहित्य मं प्रकाशित नाम.”
गांव के लेखक आय बहल हा, चुपे सुनत ढेला के डींग
जतका ऊंच डींग हा जावत, उसने बहल के फइलत आंख.
जब ढेला हा उहां ले हटगिस, बहल अ‍ैस मेहरुके पास
पूछिस -“”ढेला जे उच्चारिस, ओमां कतका प्रतिशत ठीक ?”
मेहरुकथय -“”किहिस ढेला हा, तेन बात हा बिल्कुल ठोस
शिक्षा उच्च पाय मिहनत कर, संस्था उच्च पाय पद उच्च.
पर अचरज के तथ्य मंय राखत, जीवन पद्धति राखत खोल –
संस्था परिसर रहत रात दिन, पुस्तक संग संबंध प्रगाढ़.
अपन ला प्रतिष्ठित समझत हें, जन सामान्य ले रहिथंय दूर
उंकर पास नइ खुद के अनुभव, पर के पांव चलत हें राह.
कथा ला पढ़ के लिखत कहानी, पर के दृष्य विचार चुरात
समय हा परिवर्तित हो जावत, तेकर ले ओहर अनजान.
भूतकाल के कथा जउन हे, ओला वर्तमान लिख देत
अपन समय ला पहिचानय नइ, कहां ले लिखहीं सत्य यथार्थ !”
मेहरुबात चलावत जावत, तभे बहल ला मारिस रोक –
“”जेन काम दूसर मन करथंय, उहिच काम तंय तक धर लेस.
उच्च विशिष्ट जउन मनसे हे, उंकर होत आलोचना खूब
उंकरेच बाद प्रशंसा होवत, आखिर चर्चित उंकरेच नाम.
सिंचित भूमि मं किसान मन हा, डारत बीज लान के कर्ज
उहिच भूमि मं करत किसानी, नफा होय या हो नुकसान.
भूमि कन्हार जमीन असिंचित, एला देख भगात किसान
फसल होय झन होय तभो ले, निष्फलता के अर्थ लगात.
दीन हीन लघु पद देहाती, एमन करत ठोसलग काम
मगर इंकर तारीफ होय नइ, निंदा तक बर आवत लाज.”
मेहरुबोलिस – “”ठीक कहत हस, अब सवाल के उत्तर लान –
रिहिस रायपुर मं कई बूता, तब तंय उहां कोन दिन गेस !
टी. वी. अउ अकाशवाणी मं, तोर जाय के रिहिस विचार
उहां तोर का बूता निपटिस, होगिस का पूरा उद्देश्य ?”
बहल किहिस – “”मंय गांव मं रहिथंव, तंहू करत हस गांव निवास
मोर व्यथा ला तंय हा सुनबे, अतका असन रखत विश्वास-
हंसिया श्रमिक कमावत खेती, पर भरपेट अन्न नइ पाय
हम्मन गंवई मं बसथन तब तो, साहित्य मं बुझावत नाम.
लकर धकर मंय गेंव रायपुर, रचना धर साहित्यिक काम
लेकिन उहां पूछ नइ होइस, अउ उपरहा कटागे नाक.
मंय अकाशवाणी तिर ठाढ़े, अंदर जाय रुकत हे पांव
केन्द्र के रुतबा अड़बड़ होथय, तभे सुकुड़दुम मन डर्रात.
मोला लड्डू भृत्य हा मिलगे, उही हा देइस नेक सलाह –
“”तंय अधिकारी तिर जा निश्चय, बात बोल मंदरस अस मीठ.
कहिबे -“”निहू पदी दिन काटत, टीमटाम ले रहिथंव दूर
इहां लड़े बर नइ आए हंव, सिरिफ सधाहंव खुद के काम.”
कार्यालय मं पहुंच गेंव मंय, मन ला करके पक्का ।
देख कार्यक्रम अधिधाशी हा, मारिस बात के धक्का ।।
“”जनम के कोंदा अस तंय लगथस, तब बक खाके देखत मात्र
का विचार पहुंचे हस काबर, कुछ तो बोल भला इंसान ?”
ऊपर ले खाल्हे तक घुरिया, साहब ढिलिस व्यंग्य के बाण
लेकिन मंय हा सिकुड़ खड़े बस – सांवा बीच मं कंपसत धान.
मंय बोलेव – “”रहत हंव मंय हा, अटल गंवई हे गोदरी गांव
कृषक श्रमिक अउ गांव संबंधित, तुम्हर पास रचना ला लाय.
पहिली भेजे हंव रचना कइ, मगर मुड़ा नइ गीस जवाब
तब मंय हार इहां आए हंव, मोर प्रार्थना सुन लव आप –
आकाशवाणी ले चाहत हंव, अपन नाम सब तन बगराय
बिन प्रचार उदगरना मुस्कुल, करिहव कृपा मथत मंय आय.”
साहब हा बरनिया के बोलिस -“”कान टेंड़ सुन सही सलाह
लेखक लइक तोर नइ थोथना, दरपन देख लगा ले थाह.
सांगर मोंगर अड़िल युवक हस, गांव लहुट के नांगर जोंत
काम असादी के बदला मं, श्रम करके झड़ गांकर रोंेठ.”
हंसिस कार्यक्रम अधिधाशी हा, पर मंय मानेव कहां खराब !
गोड़ तरी मोंगरा खुतलाथय, तब ले ओहर देत सुगंध.
मंय बोलेंव – “”नम्र बोलत हंव, पर तुम उल्टा मारत लात
मंहू आदमी आंव तुम्हर अस, पाप करे नइ रहि देहात.
बिगर पलोंदी बेल बढ़य नइ, ना बिन खम्हिया उपर मचान
धर आसरा इहां आए हंव, पर खिसिया के बेधत बान.
कवि उमेंदसिंग बसय करेला, जेन लड़िस गोरा मन साथ
जन जागृति मं जीवन अर्पित, ओकर नाम कहां हे आज ?
जयशंकर प्रेमचंद निराला, इंकर अमर अंतिम तक नाम
पर उमेंद ला कोन हा जानत, ओकर रचना गिस यम धाम.
छिदिर बिदिर होगे सब रचना, एकोझन नइ रखिन सम्हाल
ओकर पुस्तक छप नइ पाइस, तब का जानंय बाल गोपाल !”
मोर कथा ला साहब सुन लिस, भड़क गीस आंखी कर लाल –
“”तोर असन कतरो लेखक ला, मंय हा रखत दाब के कांख.
हगरुपदरुलेखक बनथव, कोन कमाहय बरसा धाम
गांव लहुट के काम बजा तंय, लेख जाय यमराज के धाम.
छोड़ लफरही निकल इहां ले भड़कत मोर मइन्ता ।
वरना बुढ़ना ला झर्राहंव, करिहंव तोर हइन्ता ।।
साहब ला गिनगिन के पत लिस, पर मंय बायबिरिंग ना क्लान्त
बिच्छी हा चटपट झड़काथय, मर्थे व्यक्ति रहि जाथय शांत.
मंय हा उहां ले हट के आएंव – गेंव उबली के पान दुकान
जहां बात के परिस अभेड़ा, उबली लग गिस सत्य बतान.
ओहर किहिस – “”आय हस हंफरत, लेकिन व्यर्थ जात सब खर्च.
साहब मन टेंड़ुंवा गोठियाथंय, आंजत आँख व्यंग्य के मिर्च.
राजबजन्त्री राई दोहाई, अस तस पर देवंय नइ ध्यान
इंकर साथ परिचय अउ बइठक, बस ओमन पाथंय अस्थान.
हम्मन इही पास मं रहिथन, जानत साहब मन के पोल
ओमन चाय पान बर आथंय, आपुस मं गोठियाथंय खोल.”
ओतकी मं बोलिस ट्रांजिस्टर, सुघर ददरिया झड़के बाद –
दानी के कहना ला सुन लव, जे मनसे के जतका साद.
कृषक बसुन्दरा मांईलोगन, बंद करव तुम चिर्री गाज
रचना के नामे ला सुन लव – गांव गंवई के रीति रिवाज.
उबली जे ठौंका ला बोलिस, ओकर मंय पा लेंव प्रमाण
दानी के रचना हा स्वीकृत, मंय हा क्रूर शब्द भर पाय.”
एकर बाद बहल अउ बोलिस – “”दानी करथय नगर निवास
जमों क्षेत्र मं पात सफलता, चढ़े हवय साहित्यकाश.
लेकिन हम तुम गांव मं रहिथन, ते कारन हम जावत गर्त
हमर लेख मन बिगर पुछन्ता, हारत हन साहित्यिक शर्त.”
मेहरुकथय – ठीक बोलत हस, होत शहर साधन सम्पन्न
टी. वी. रेडियो पत्र प्रकाशन, संघ समीक्षक नाम इनाम.
उहां के लेखक चर्चित होथय, जुड़त पाठ्य पुस्तक मं नाम
लेखक श्रेष्ठ कहात उही मन, होत प्रशंसित उंकरेच नाम.
लेकिन एकर ए मतलब नइ, हम्मन छोड़ देन फट गांव
कर्म करत हम मांग ला राखन, उहू कर्म हो प्रतिभावान.
न्यायालय मं जइसन होथय, घुरुवा मन पर आइस कष्ट
उंकर कथा ला काव्य बनावत, होय असच के टायर भस्ट.
क्रांति प्रकाशन हवय एक ठन, क्रांति हवय मालिक के नाम
ओहर पत्र मोर तिर भेजिस – तंय हा रचना लिख धुआंधार.
पूर्ण होय तंह भेज पाण्डुलिपि, ओला मंय हा देहंव मान
सबले पूर्व प्रकाशित करिहंव, मंय देवत हंव सत्य जबान.”
अतका बोल किहिस अउ मेहरु-“”दीस भरोसा क्रांति हा जेन
पुस्तक मोर प्रकाशित होहय, पर नइ पाय झूठ के वार.”
मेहरुबहल बात ला छेंकिन, अउ “दरबार हाल’ मं गीन
लेखक मन तिर एमन अमरिन, अपन अपन परिचय ला दीन.
उहां मिलापा दानी सन्तू, छन्नू ढेला साथ बिटान
सातो बइसाखू परसादी, हवंय काव्य के गुणी अनेक.
दानी टेस बतावत जेकर रुतबा सब ले ऊंचा ।
दूसर लेखक हवंय निहू अस – छरकत पूरा घूंचा ।।
जहां कार्यक्रम के हल रेंगिस, दानी कथय -“”मित्र सुन लेव
आज जगत मं बहुत समस्या, ओकर पर कइ ठक तकलीफ.
२६१
तुम्मन बुद्धिमान मनखे अव, देव समस्या ऊपर ध्यान
जेन विषय पर सोच डरे हव, ओला इहां राख दव खोल.”
सन्तू कथय -“”रखे बर चाहत – विश्व शांति पर ठोस विचार
बम घातक हथियार बने हें, उंकर होय अब खुंटीउजार.
छोटे राष्ट्र देश बड़का हें, ओमन भुला जांय सब भेद
बड़े पलोंदी दे नान्हे ला, सग भाई अस राखंय प्रेम”
मेहरुकिहिस – “”करंव नइ चिकचिक, मगर मोर बस इही सलाह-
“”यथा बाग मं फूल बहुत ठक, एक साथ खिल पात पनाह.
इसने साहित्यिक बगिया मं, जमों विधा मन भोगंय राज
पावंय मान पाठ्य पुस्तक मं, शहराती ग्रामीण समाज.”
सातो कथय -“”जगत सब बर हे, सब प्राणी हें एक समान
मानव पशु पक्षी अउ कीरा, सब के देह एक ठन जान.
कोई ककरो करय न हत्या, दूतर ला झन बांटय पीर
मानव सबले बुद्धिमान हे, तब दूसर के जान बचाय.”
लेखक मन हा सुन्ता बांधिन, दानी ला अध्यक्ष बनैन
उहां जतिक अस नगरीय लेखक, लेखकसंघ के पद ला पैन.
मेहरु बहल गांव के लेखक, भतबहिरा अस पद नइ पैन
यद्यपि एमन तर्क ला राखिन, लेकिन चलन पैस नइ टेक.
मेहरुकिहिस -“”लेख मं देथव – जम्मों झन ला सम अधिकार
लेखक संघ मं भेद रखत हव, हमला खेदत हव चेचकार.
गांव के अन्न शहर मं जाथय, शहर गांव ला देत समान
उसने शहराती देहाती, आपुस मं बांटंय पद मान.”
एकर बाद खाय बर बइठिन, बंटिस उहां पर खाद्य पदार्थ
एमां सब ला मिलिस बरोबर, होइस पूर्ण सबो के स्वार्थ.
बहल हंसत मेहरुला बोलिस – “”लेखक संघ के बैठक होय
हमर पुकार भले झन होवय, लेकिन पहुंच जबो हम दोंय.”
मेहरुखुलखुल हांसत बोलिस – “”मिलिस खाय बर स्वादिल चीज
तेकर लालच तोला धरलिस, तब आबे का बिगर बलाय ?”
“”हम्मन हा यदि सरलग आबो, लेखक संघ हा करिहय पूछ
खूब अंटा के डोरी बनथय, अलग अलग जे नरियर बूच.”
एकर बाद रात करिया गिस, तंहने होइस नाटक एक
“दयामृत्यु’ नाटक के नामे, लेखक ए सुरेश सर्वेद.
दया मृत्यु
पात्र परिचय
प्रोफेसर अनूप – आकाश का मित्र
आकाश – सेफ्टी लाइफ नामक यंत्र का निर्माता वैज्ञानिक
नीलमणि – वैज्ञानिक
प्रेमपाल – वैज्ञानिक
ऋषभ – क्राचीद का विद्वान सदस्य
प्रणव – बेल्ट बम दबाकर वैज्ञानिकों को हताहत करने वाला
आसुतोष – अस्पताल में आकाश की देखरेख इनके ही जिम्मा होती है.
सुमन – आकाश का अधिवक्ता
अमर – शासकीय अधिवक्ता
नागार्जुन – न्यायाधीष
मासुस के – समीर, चन्द्रहास, मृणाल
अन्य सदस्य
प्रपात – अल्जीमर रोग से पीड़ित व्यक्ति
डा. महादेवन – आकाश को दयामृत्यु देने ही इन्हें आदेश मिलता है. इसमें ये असफल रहते हैं.
बालक – डॉ. महादेवन द्वारा अस्पताल से लाया अनाथ बालक
विश्वास – क्राचीद का सदस्य
अन्य – जीप चालक, नर्स.

नाटक प्रारंभ
(प्रोफेसर अनूप के निवास के सामने वैन आकर रुकता है. वैन चालक नीचे आकर दरवाजा खोलता है. वैज्ञानिक आकाश नीचे आते हैं- चालक वैन का दरवाजा बंद कर देता है. वैज्ञानिक आकाश प्रोफेसर अनूप के निवास में प्रवेश करते हैं.
अनूप चिंता में डूबे हैं- जूतों की आवाज उनके कानों में घुसती है. वे दृष्टि उठाकर देखते हैं. सामने आकाश को पाते हैं.)
प्रो.अनूप – (हड़बड़ाकर) आ-आप ……….. !”
आकाश – आप तो ऐसे चौंक रहे हैं मानों कानों में विस्फोट हो गया हो.”
अनूप – (बनावटी मुस्कान होठों पर बिखेर कर) अरे नहीं. मैं कहां चौंका हूं! (सोफे की ओर संकेत करते हुए) बैठिये.”
आकाश – (सोफे पर बैठते हुए) छद्य मुस्कान होठों पर बिखेर लेने से चेहरे की परेशानी खत्म नहीं हो जाती.”
अनूप – आपका तात्पर्य, मैं परेशान हूं?”
आकाश – चेहरे की भाषा तो यही बताती हैं. परेशानी का कारण मुझे भी ज्ञात हो जाये तो इसमें बुराई क्या है?”
अनूप – वर्तमान में मादक द्रव्यों का उपयोग सीमा से अधिक किया जा रहा है. प्रतिभाएं इसके चंगुल में फंसकर नष्ट हो रही हैं. कल मेरे कालेज का एक छात्र और इसकी बलि चढ़ गया.”
आकाश – छात्र छात्राओं को मादक द्रव्यों के दुष्परिणाम ज्ञात हैं. इसके बावजूद वे इसका विरोध करने की अपेक्षा उपयोग करते हैं. इसमें हम कर भी क्या सकते हैं. प्रोफेसर!”
अनूप – आप तो दायित्व से मुंह मोड़ रहे हैं. जिन छात्र-छात्रओं को मैंने करीब से देखा है. जिनकी प्रतिभाओं को परखा है, उन्हें अपनी आंखों के सामने नष्ट होते देखूंगा तो मन में हलचल होगा ही न!”
आकाश – आपकी पीड़ा मैं समझ रहा हूँ.”
अनूप – सिर्फ समझना ही पर्याप्त नहीं है आकाश साहब. इस पर अंकुश लगाना आवश्यक है.(थोड़ा रूककर) सोचता हूं- जिस तरह आप “सेफ्टी लाइफ’ बना रहे हैं. जिसके उपयोग से वह बम की उपस्थिति का संकेत तो देगा ही. वह अपराधी का पता बतायेगा. साथ ही विस्फोटक वस्तु को निष्क्रिय कर देगा ……… ऐसे ही किसी औषधि का उत्पादन क्यों नहीं किया जाता! जिसके उपयोग से व्यक्ति मादक द्रव्यों से घृणा करने लगे.”
आकाश – इस पर भी कहीं न कहीं शोध हो रहा होगा. प्रोफेसर, मेरे “सेफ्टी लाईफ’ बनाने की जानकारी आपके सिवा और किसे हैं?”
अनूप – मैं आपके इस व्यवहार से हैरान हूं. आप मानवहित का काम कर रहे हैं. मगर इसे प्रकाश में नहीं लाना चाहते. आखिर क्यों?”
आकाश – मैं कार्य पूर्ण करके अपने वैज्ञानिक मित्रों को दिखाकर दंग कर देना चाहता हूं…….! और हां, आपसे उम्मीद है- आप भी इसकी चर्चा अन्यत्र नहीं करेगें.”
अनूप – आपके विश्वास को मैं टूटने नहीं दूंगा. (थोड़ा रूककर) अरे, मैं तो बातों में उलझकर आपको पानी तक के लिये भी नहीं पूछा…….. चाय चलेगी न?”
आकाश – (सोफे से उठते हुए) अरे नहीं. मैं अभी जल्दी में हूं. चाय पानी खाना पीना फिर कभी होता रहेगा.”
अनूप – आप इतनी शीघ्रता में क्यों हैं! कहीं जाने की योजना है क्या?”
आकाश – विज्ञान भवन में वैज्ञानिकों की बैठक है. वहां उपस्थिति आवश्यक है.”
अनूप – तब तो मैं आपको रोकूंगा नहीं. संभव है- वहां कोई महत्वपूर्ण शोध पर चर्चा हो………।”
आकाश – तो मैं चलता हूं. फिर मुलाकात होगी.”
अनूप – (अनूप भी उठ खड़े होते हैं) चलिये, मैं आपको बाहर तक छोड़ आऊं.”
दोनों बाहर आते हैं. आकाश वैन की ओर बढ़ते हैं. अनूप गेट के पास खड़े रहते हैं. आकाश वैन में जा बैठते हैं. चालक वैन को आगे बढ़ा देता है. वैन विज्ञान भवन के आगे आकर रूकती हैं. आकाश नीचे आते है. वे विज्ञान भवन में प्रवेश करते हैं. वे “सभागृह’ में पहुंचते हैं. वहां अनेक वैज्ञानिक उपस्थित हो चुके हैं. आकाश अपनी कुर्सी पर जा बैठते हैं. इस बैठक के सभापति वैज्ञानिक नीलमणि हैं. वे सभापति की कुर्सी पर बैठे हैं.
नीलमणि – (सभा को सम्बोधित करते हैं) मित्रों, हमने स्कड प्रक्षेपास्त्रों को आकाश में ही नष्ट करने “पेट्रियट’ का आविष्कार किया हैं. “मेटल डिटेक्टर’ बमों की उपस्थिति की जानकारी दे देता हैं. मगर वर्तमान में तार पेट्रोल और बेल्टबम का उपयोग धड़ल्ले से हो रहा हैं.
आतंकी अपनी कमर में बेल्टबम बांधता हैं. सभा में जाता हैं. बटन दबा देता है. विस्फोट से लाशें बिछ जाती हैं. मेरा विचार है कि हम ऐसे यंत्र का निर्माण करें जो बमों की उपस्थिति की तत्काल जानकारी दे. साथ ही बम निष्क्रिय भी हो जाये. वह अपराधी को पकड़ने मे सहायता करें…….।”
प्रेमपाल – मित्रों, नीलमणि का मन्तव्य विचारीणीय है. वास्तव में हमें इस पर गभ्भीरता पूर्वक विचार करना चाहिये.”
(वैज्ञानिक आपस में सलाह मशविरा करने लगें हैं मगर आकाश की होठों पर मुस्कान उभर आयी है.)

दृष्य परिवर्तन
(यह है क्रातिकारी चीता दल नामक संस्था का अडड़ा. अल्मारियों में रायफल, बेल्टबम, तारबम इत्यादि विध्वंशक रखे हैं. एक स्थान पर टेबल कुर्सियां हैं. कुर्सी मे ऋषभ बैठे हैं. उनके हाथ मे कलम हैं. सामने टेबल पर कागज रखा हैं.
अल्मारी के पास प्रणव खड़ा बेल्टबम बांध रहा हैं. ऋषभ की दृष्टि उस पर टिकी हैं. वे प्रणव के कार्य को ध्यान से देखते हैं)
ऋषभ – (प्रणव से) प्रणव, मैं जानता हूं- आप कहां जाने की तैयारी कर रहे हैं. मगर आप जो करने जा रहे हैं, मेरी दृष्टि में उचित नहीं.”
प्रणव – (बेल्टबम कमर पर कंसते हुए) क्यों उचित नहीं! मैं भी तो एक वैज्ञानिक हूं. मैने भी शोध किया है. मगर मुझे सदैव उपेक्षित ही तो किया गया न!”
ऋषभ – संवादहीनता के कारण हम उपेक्षित रहे. इसका तात्पर्य यह नहीं कि हिंसात्मक कार्य को श्रेय दें.”
प्रणव – ये आप नहीं, आपकी कलम की शक्ति बोल रही है. आप वैचारिक लेख लिखते हैं. मसलन- दयामृत्यु कब-किसे दिया जाये! मादक द्रव्यों पर कैसे पाबंदी लगाया जाये! देश को बंटने से कैसे रोका जाय! मगर आपके उत्कृष्ट विचारों को किसने सराहा? (थोड़ा रूककर) मेरा कहा मानिये और न्यायालय को उड़ा दीजिये.”
ऋषभ – माना कि हम “क्राचीद’ के सदस्य हैं. मगर इसका अर्थ यह नहीं कि हम हिंसात्मक कार्याें को ही श्रेय देते रहें.”
प्रणव – (ऋषभ के पास आकर) अब आदर्श की बातें मुझे समझ नहीं आती. और न समझने का प्रयास करूंगा. (दरवाजे की ओर कदम बढ़ाते हुए) मैं तो चला अपना कार्य करने…..।”
प्रणव बाहर आता है. जीप में सवार होता है. और जीप सड़क में दौड़ाने लगती है. जीप “विज्ञान भवन’ के सामने आकर रूकती है. प्रणव जीप से नीचे आता है. वह विज्ञान भवन में प्रवेश करता है. सभागृह मे वैज्ञानिक सलाह मश्विरा में संलग्न हैं. प्रणव सभागृह में पहुंचते ही “बेल्टबम’ का बटन दबा देता है.
एक जोरदार धमाके के साथ बेल्टबम फट जाता है. धमाके की आवाज बाहर आती है. बाहर तैनात “सुरक्षा सैनिक’ सभागृह की ओर दौड़ते है.
सभा गृह में पांच वैज्ञानिकों के अंग क्षतविक्षत हो गये हैं. नीलमणि की टांगें और भुजाएं शरीर से अलग हो गयी हैं. प्रणव स्वयं कई टुकड़ों में बंट गया हैं. कुछ वैज्ञानिकों को सामान्य चोटें आयी हैं. वे कराह रहे हैं. आकाश के शरीर में कई छर्रे घुस गये हैं.
एक सैनिक अस्पताल फोन लगाता हैं. विज्ञान भवन की ओर एम्बुलेंस दौड़ती है. उसमें घायल और बेहोश वैज्ञानिकों को भरा जाता है. उन्हें अस्पताल में भर्ती किया जाता हैं. उनका उपचार किया जाता है.
आकाश को आपरेशन थियेटर में लाते हैं. वे बेहोश हैं. उनके शरीर से छर्रे निकालते हैं. कार्यपूर्णता पर उन्हें “एसी’ रूम में रखा जाता है.
आकाश चेतनावस्था में आते हैं. वे कराह उठते हैं. नर्स उनके पास दौड़कर आती हैं.
आकाश – सिस्टर, असहनीय पीड़ा हो रही हैं……..!”
नर्स – आप लेटे रहिये. मैं डाक्टर को बुलाकर लाती हूं.”
(नर्स, डाक्टर आशुतोष को बुलाकर लाती है)
आशुतोष – (होठों पर मुस्कान लाकर) आपका जीवन अब खतरे से बाहर है. आज शाम ही आपको “प्राइवेटवार्ड’ में अटेच कर दिया जायेगा.”
आकाश – ये सब तो ठीक है डाक्टर, मगर पीड़ा……..!”
(नर्स इंजेक्शन भरकर लाती है. आशुतोष उसे आकाश को लगाते हैं.)
आशुतोष – अब इससे आपकी पीड़ा कम हो जायेगी. (नर्स से) सिस्टर, आप इनका विशेष ध्यान रखेंगी. समय पर दवाइयां देती रहेंगी.”
नर्स – यस सर……….!”

दृष्य परिवर्तन
(आकाश को प्राइव्हेट रूम में रखा गया है. वे पीड़ा से कराह रहे हैं. डॉ. आशुतोष आते हैं. सुई लगाते है. नर्स दवाई देती है. आकाश उसे खाते हैं.)
आकाश – डाक्टर साहब, आखिर ये कब तक चलेगा- जब भी पीड़ा उठती है. इंजेक्शन दवाइयां दे देते हैं. औषधि के प्रभाव तक पीड़ा दबी रहती है. खत्म होते ही पुन& बलवती हो जाती है.”
आशुतोष – आप धैर्य रखें. आप शीघ्र पूर्ण स्वस्थ हो जायेंगे.”
आकाश – यह आश्वासन तो आप दो माह से देते आ रहे हैं. मगर न पीड़ा खत्म हुई न स्वास्थय लाभ मिला है. मैं तो ऊब गया हूं डाक्टर, इंजेक्शन और दवाइयों से (थोड़ा रूककर) मैं जानता हूं डाक्टर, मेरे कोमल अंगों में घाव बना है. उनका भर पाना असम्भव है. आप मात्र मुझे आश्वासन के बल बूते पर जीवित रख रहे हैं………..!”
आशुतोष – आप व्यर्थ भ्रम में हैं. देखना आप पूर्ण स्वस्थ होकर रहेंगे.”
आकाश – भ्रम में मैं नहीं, आप हैं, मेरा जीवन अंधेरे में है उसमें आप जीवन की ज्योति जलाते हैं…….! डाक्टर, मेरा कहा मानिये. और सांत्वना रूपी औषधि का प्रचार करना छोड़ दें. क्योकि आपके सांत्वना से विश्वास जग उठता है कि अब में स्वस्थ हो जाऊंगा. मगर मैं ही नहीं आप भी जानते हैं कि आप मुझसे विश्वास घात कर रहे हैं. आप ये छल प्रपंच का लिबास निकाल फेंके. मेरा उपचार करना छोड़ दें. ताकि मैं चैन के साथ मर तो सकूं………..!”
(उसी वक्त अधिवक्ता सुमन आती है. वह आकाश के निकट जाती हैं. डाक्टर आशुतोष बाहर चले जाते हैं.)
आकाश – (सुमन से) आप आ गयी सुमनजी, अब न्यायालय जायेंगी न……!”
सुमन – हां, आज आपके आवेदन पर बहस है.”
आकाश – आपसे मेरा एक ही निवेदन है- मुझे “दयामृत्यु’ की अनुमति दिलाने का अथक प्रयास करेंगी.”
सुमन – आप निश्चिंत रहिये. मैं आपको “दयामृत्यु’ की अनुमति दिलाकर रहूंगी.”
आकाश – हां सुमनजी, यह आवश्यक है, मुझे एक शोध करना हैं. इसके लिये मैं जीना चाहता हूं. मगर पीड़ा ने मुझे मृत्यु स्वीकारने विवश कर दिया है.”
सुमन – न्यायालय का समय हो गया है. मैं निकलूं?”
आकाश – हां, आप अवश्य जायें. मैं किसी भी हालत में मरना चाहता हूं. मुझे “दयामृत्यु’ की अनुमति दिलाइये.”
(सुमन अस्पताल से निकलती हैं. वह स्कूटर में सवार होती हैं. स्कूटर सड़क पर दौड़ने लगता है.
(डॉ. आशुतोष अपने कार्यालय में बैठे हैं. उनके कानों में आकाश की आवाज अब तक गूंज रही हैं.)
आवाज – मेरा जीवन अंधकार मय है डाक्टर, कृपया उसमें आश्वासन की ज्योति न जलायें. आप सांत्वना रूपी औषधि का प्रचार करना छोड़ दे. आप मुझे धोखा न दें…. धोखा न दें……!”
(उसी समय नर्स प्रवेश करती है.)
नर्स – (आसुतोष से) सर…………!”
(डॉ. आसुतोष आवाज से बाहर आते हैं. नर्स की ओर देखते हैं.)
नर्स – सर, आकाश पुन& पीड़ा से व्यथित हो गये हैं. उन्हें सम्हाल पाना कठिन हो रहा है……!”
आशुतोष – (खीझकर) उन्हें मरने दो………!”
नर्स – (अवाक आशुतोष को देखती है) ये आप क्या कह रहे हैं सर?”
(आशुतोष झेंप जाते हैं. वे उठकर नर्स के साथ हो लेते हैं.)
दृष्य परिवर्तन
(न्यायालय में अधिवक्ताओं, पक्षकारों व अन्य लोगों की भीड़ है. न्यायाधीष नागार्जुन अपनी कुर्सी पर बैठे हैं. अधिवक्ता सुमन और अमर पैरवी करने उपस्थित हैं.)
अमर – (न्यायाधीष से) सर, अधिवक्ता सुमन ने न्यायालय में आकाश का आवेदन प्रस्तुत किया है. उसमें दर्शाया गया है कि आकाश को “दयामृत्यु’ दी जाये. मगर मेरी दृष्टि में “दयामृत्यु’ को मान्यता नहीं देनी चाहिये.”
सुमन – सर, शासकीय अधिवक्ता अमर ने कहा कि दयामृत्यु को मान्यता नहीं देनी चाहिये. मगर क्यों? वे सभी बातें स्पष्ट रूप से बतायें!”
न्यायाधीष – (अमर से) हां, आप अपनी बात स्पष्ट कीजिये- दयामृत्यु की मान्यता का विरोध का कारण बताइये?”
अमर – सर, दयामृत्यु को मान्यता देने से व्यक्ति छोटे छोटे रोंगों से मुक्ति के लिये मृत्यु मांगने लगेगा. दूसरा रूप यह भी है कि चिकित्सक असाध्य रोग से ग्रसित व्यक्तियों एवं वृद्धों को स्वस्थ करने की जिम्मेदारी से हटेंगे.”
सुमन – सर, शासकीय अधिवक्ता का तर्क ग्राहय है. पर जिसका जीवन मृत्यु से बदतर हो. जिसका वर्तमान और भविष्य कष्टों के सागर में डूबा हो, सर ऐसे पीड़ित व्यक्ति को “दयामृत्यु’ का अधिकार मिलना ही चाहिये. (कुछ दस्तावेज न्यायाधीष को सौंपते हैं) सर, ये डाक्टर की रिपोर्ट है. इसमें आकाश से संबंधित सारे तथ्य स्पष्ट रूप से लिखे हैं.”
(न्यायाधीष नागार्जुन दस्तावेज को गंभीरतापूर्वक पढ़ते हैं. अधिवक्ता अपने अपने स्थान पर जा बैठते हैं.)
न्यायाधीष – न्यायालय ने अधिवक्ताओं के तर्क सुने. दस्तावेजों का अध्ययन किया. न्यायावय स्वयं आवेदक की स्थिति का अवलोकन करेगा. तत्पश्चात निर्णय दिया जायेगा.”
(न्यायाधीष कुर्सी से उठ खड़े होते हैं. अधिवक्ता सुमन और अमर के साथ जीप में सवार होते हैं. जीप न्यायालय परिसर से निकलकर सड़क पर दौड़ने लगती हैं. जीप अस्पताल के स्टैण्ड में रूकती हैं. न्यायाधीष नागार्जुन, सुमन और अमर जीप से नीचे आते हैं.)
सुमन – (न्यायाधीष से) सर, इधर आइये.
(वे प्राइवेट रूम के पास जाते हैं कि उनके कानों में क्रंदन की आवाजें गूंजती हैं. न्यायाधीष रूककर सुनते हैं.)
आवाज – डाक्टर, आप मुझे स्वस्थ नही कर सकते फिर मेरा उपचार क्यों करते हैं. डाक्टर, पीड़ा असहय हो गयी. आहा- ओहो…..। अब मुझे इंजेक्शन मत लगाइये. मुझे गोलियां मत दीजिये (पीड़ायुक्त आवाज) मुझे चैन से मरने दीजिये.”
(न्यायाधीष, सुमन की ओर उन्मुख होते हैं.)
न्यायाधीष – ये पीड़ायुक्त आवाज किसकी है?”
सुमन – सर, ये कारूणिक आवाज आकाश की है.”
न्यायधीष – क्या वे इतने पीड़ित हैं कि स्वयं मृत्यु मांगें.”
सुमन – हां सर, आप अपनी आंखों से देख लीजिये.”
(सुमन बाहर रुक जाती हैं)
(वे आकाश के कक्ष मे प्रवेश करते हैं. आकाश पीड़ा से कराह रहे हैं. डाक्टर आशुतोष सुई में दवाई भरने संलग्न हैं. आकाश, न्यायाधीष और अधिवक्ताओं की ओर प्रश्न दृष्टि से देखते हैं.)
आकाश – (आशुतोष से) डाक्टर साहब, ये कौन हैं- यहां क्यों आये हैं.?”
(आसुतोष सुई में दवाई भर लेते हैं. वे आकाश के पास आते हैं.)
आसुतोष – ये आपसे मिलने आये हैं.
आकाश – लोग उससे मिलने आते हैं. जो मृत्यु के पास पहुंच गया हो या जीवित हो……। पर मैं तो बीच में लटका हूं डाक्टर. पीड़ा असहनीय हो गयी है. मुझे कब तक बेहोशी की सुई दे देकर जीवित रखेंगे?
आसुतोष – अब आप शीघ्र स्वस्थ हो जायेंगे.”
आकाश – कभी नहीं. मेरे स्वास्थय में सुधार आ ही नहीं सकता. आप सुई की दवाई फर्श में चिपक दें. मेरे शरीर में मत लगाइये.”
(आकाश पीड़ा से कराहते हैं. इससे न्यायाधीष का ह्रदय दहल जाता है. आसुतोष, आकाश को सुई लगाने का प्रयत्न करते है.)
आकाश – आप मुझे सुई देना ही चाहते हैं. न- तो जहर की सुई दीजिये. मुझे मृत्यु दीजिये मृत्यु. मैं पीड़ा युक्त जीवन नहीं जीना चाहता.”
(डाक्टर इंजेक्ट कर ही देते हैं.)
आकाश – आखिर आपने सुई लगा ही दी न डाक्टर!”
(कहते कहते आकाश बेहोश हो जाते हैं. डाक्टर के चेहरे पर परेशानी और चिंता के भाव हैं.)
न्यायाधीष – (आसुतोष से) डाक्टर साहब, आप तो अत्यंत परेशान दिख रहे हैं.”
आसुतोष – जी हां, में आकाश की पीड़ित जिन्दगी से परेशान हूं. समझ नहीं आता- इन्हें कब तक आश्वासन की आशा बंधाता रहूं.”
न्यायाधीष – आप का परिश्रम सफलता लायेगा. आकाश शीघ्र स्वस्थ होकर रहेंगे.”
आसुतोष – सतत उपचार के बावजूद आकाश की स्थिति पूर्ववत है. मुझे नहीं लगता कि उन्हें पीड़ा से मुक्ति मिलेगी.”
न्यायाधीष – आप एक चिकित्सक होकर निराशावादी बातें कर रहें हैं.?”
आसुतोष – सत्यंता का संबंध निराशा से नहीं हैं.”
न्यायाधीष – अर्थात आकाश की स्थिति सुधर नहीं सकती. उन्हें पीड़ा युक्त जीवन जीना ही पड़ेगा?”
आसुतोष – हां, मेरे अनुभव का यही निष्कर्ष हैं.”
न्यायाधीष – (स्वयं से) याने आकाश को पीड़ा से मुक्ति दिलाने मुझे ही कुछ न कुछ उपाय करना होगा. (आसुतोष से) अच्छा डाक्टर, अब हम निकलते हैं.”
(न्यायाधीष, अमर और सुमन बाहर आते हैं. वे जीप में बैठते हैं.)
न्यायाधीष – (जीप चालक से) आप मुझे मेरे बंगने में छोड़ दें.”
चालक – यस सर.
(जीप सड़क पर दौड़ती हुई न्यायाधीष के बंगले के आगे रूकती हैं. न्यायाधीष नीचे आते हैं.)
न्यायाधीष – (अधिवक्ताओं से) आकाश के आवेदन पर कल निर्णय दिया जायेगा.”
अधिवक्ता – यस सर.
(जीप आगे बड़ जाती है. न्यायाधीष अपने बंगले में प्रवेश करते हैं.)
दृष्य परिवर्तन
(एक कमरे में अनेक व्यक्ति हैं. ये मानव सुरक्षा संघ (संक्षिप्त नाम-मासुस) के सदस्य हैं. जब भी कोई गंभीर समस्या पर विजार करना होता है तो ये एकत्रित होकर निदान के लिये रास्ता निकालते हैं.)
चन्द्रहास – (सदस्यों से) मित्रों, क्रांतिकारी चीता दल याने क्राचीद की कार्यप्रणाली किसी से छिपा नहीं. वह अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिये हिंसा करता हैं. उनके हिंसात्मक कार्य का निशाना आकाश जैसे वैज्ञानिक बने. आकाश कितना दुखद जीवन व्यतीत करें- अंतत& उन्हें दयामृत्यु की अनुमति मांगने न्यायालय की शरण लेनी पड़ी. न्यायालय ने उनकी पीड़ा को अनुभव किया. और आकाश को दयामृत्यु की अनुमति दे दी.”
समीर – (चिंतित स्वर में) लेकिन अब क्या होगा! न्यायालय ने ऐसा निर्णय देकर उचित नहीं किया. सेफ्टीलाईफ के निर्माण का कार्य अधूरा है. आसाश की मृत्यु के बाद उसे कौन पूरा करेगा…..!”
चन्द्रहास – हां समीर. आपकी चिंता उचित है. सेफ्टीलाईफ मानवहित को ध्यान में रखकर बनाया जा रहा हैं. और उसकी पूर्णता के लिये आकाश का जीवित रहना आवश्यक है.”
समीर – इसका अर्थ हमें आकाश को जीवित रखने कोई न कोई रास्ता निकालका पड़ेगा.”
प्रताप – लेकिन न्यायालय ने दयामृत्यु का निर्णय दे दिया है. यहां तक कि डा. महादेवन को इसके लिये आदेश भी मिल चुका है.”
चन्द्रहास – समस्या गंभीर है.
दृष्य परिवर्तन
(डा. महादेवन तैयार होते हैं. वे दर्पण के सामने खड़े होते हैं. दर्पण में उनका प्रतिरूप उपस्थित होता है.)
प्रतिरूप – तो डा. साहब, आप आकाश को मृत्यु प्रदान करेंगे ही न?”
(डॉ. की खीझ बढ़ जाती है)
डा.महादेवन – हां, न्यायालय का मुझे आदेश मिला हैं. मैं आदेश का निरादर करके अपना भविष्य अंधकार में नहीं डाल सकता.”
प्रतिरूप – आप आकाश का उपचार करके स्वस्थ करने से तो रहे! हां, उन्हें मृत्यु प्रदान आसानी से कर सकते हैं. क्यों सही है. न डाक्टर!”
(डा. की खीझ बढ़ जाती है.)
डा.महादेवन – हां, मैं आकाश को मृत्यु प्रदान करूंगा. इसमें कोई अवरोध उत्पन्न नहीं कर सकता.”
प्रतिरूप – आप कर भी क्या सकते हैं.! आप डाक्टर का कर्म करके आकाश के प्राण बचाते. लेकिन आप तो जल्लाद बन गये हैं जल्लाद. और इसके अंतर्गत आकाश के प्राण हरेंगे ही.”
(डा. खीझ कर प्रतिरूप पर पत्थर दे मारते हैं. दर्पण टुकडों में बंट जाता है. उसमें डा. के कई प्रतिरूप उपस्थित होते हैं. वे सभी के सभी अटटहास करते हैं. डा. कमरे से बाहर हो जाते हैं. तभी एक बालक सौरभ उनके पास आता हैं.)
सौरभ – पापा, आप अस्पातल जा रहे है.”
(डा. महादेवन, सौरभ के सिर पर स्नेह का हाथ फेरते हैं. उनकी आंखों के सामने उस दिन का दृष्य उपस्थित हो गया- जब एक महिला अस्पताल में आयी. वह गर्भवती थी. उसने एक बालक को जन्म दिया और उसे छोड़कर भागगयी. प्रात& अस्पताल में शोर मच गया.)
नर्स – (डा. महादेवन से) डा. साहब, पलंग नं. आठ की महिला नवजात शिशु को छोड़कर भाग गयी.”
(डा. महादेवन पलंग के पास आये. बालक निद्रा में था. उसके मासूम चेहरे को देखकर डा. को प्यार आ गया. उन्होंने बालक को स्पर्श किया. बालक ने आंखे खोलकर उनकी ओर देखा)
नर्स – सर, यह बालक कितना सुंदर है! अब यह अनाथ हो जायेगा.”
डा.महादेवन – यह अनाथ नहीं होगा. इसका पालन पोषण मैं करूंगा.”
(डा. महादेवन बालक को उठा लेते हैं……। अब डा. पूर्व की यादों से बाहर आते हैं)
सौरभ – पापा, आप कहां खो गये थे. आप मुझे प्यार क्यों नहीं करते. आप तो सदैव दूसरों का उपचार करते हैं. उनके प्राण बचाते हैं.”
(डा. महादेवन स्नेह का हाथ फेरकर आगे बढ़ जाते है.)
अस्पताल का दृष्य
(डॉ. महादेवन अस्पताल में प्रवेश करते हैं. आकाश पलंग पर सोये हैं. उनके पास “मृत्यु मशीन’ रखी हैं. डा. महादेवन वहां प्रवेश करते हैं. आकाश उनकी ओर देखते हैं. डॉ.महादेवन को लगता है कि आकाश उनसे कह रहे हैं)
आवाज – आइये डॉ. साहब, आपका स्वागत है. आप उपचार करके मेरी पीड़ा खत्म नहीं कर सके तो मृत्यु प्रदान करने आ गये. आइये, मुझे मृत्यु स्वीकार है. आज से आप डाक्टर लोग यह तो नहीं कहेंगे कि हम दूसरे ईश्वर है. मरते हुए को प्राण देते हैं.”
डा.महादेवन – (आकाश की ओर कदम बढ़ाते हुए मन ही मन) आपको जीवन से मुक्ति दिलाने का आदेश न्यायालय ने दिया है. मैं उसके आदेश का पालन करुंगा ही.”
(डा. महादेवन आकाश के पास पहुंचते हैं. वे मृत्यु मशीन का बटन दबाने हाथ बढ़ाते हैं. मगर उनके हाथ कांपने लगते हैं)
डा.महादेवन – (स्वयं से) अरे, अनायास मेरे हाथ को क्या हो गया। वह मृत्यु मशीन के बटन को क्यो नहीं दबा सका. मेरा ह्रदय इतना अधिक क्यों धड़क रहा है. मेरी शक्ति पल पल क्षीण क्यों हो रही है.?”
(डा. महादेवन बटन पर उंगली रखते हैं. उनकी उंगली कांपने लगती हैं. माथे पर पसीना उभर आता है. आकाश, डाक्टर के हावभाव को देखते है.)
आकाश – (डॉ. को साहस देते हुए) डा. साहब, आप शीघ्र कीजिये. बटन दबाइये. मृत्यु मशीन आपको आमंत्रित कर रही है. आप पराजय मत मानिये. डा. साहब, आप शीघ्र कीजिये.”
(मगर डॉ.महादेवन बटन दबाने में असमर्थ हो जाते हैं. वे बटन से हाथ खींच लेते हैं)
आकाश – (कलरव करते हैं) आप हार क्यों मान रहे हैं. मुझे मृत्यु चाहिये. मुझे मृत्यु दीजिये.”
(डॉ. महादेवन बाहर निकल जाते हैं.)
आकाश – (जोर जोर से चीखते हैं.) डॉ. साहब, ये आपने क्या किया- रूक जाइये. मुझ पर दया कीजिये. मुझे मृत्यु प्रदान कीजिये……।”
(आकाश चीख चीखकर बेहोश हो जाते हैं.)
दृष्य परिवर्तन
(मासुस के सदस्य आपस में विचार विमर्श करने संलग्न हैं कि एक सदस्य मृणाल प्रवेश करती हैं. उनके चेहरे पर प्रसन्नता की आभा है)
चन्दहास – मृणाल, आप इतने प्रसन्न क्यों दिखायी दे रही हैं.?”
मृणाल – समाचार सुनेंगे तो आप भी प्रसन्नता से खिल जायेंगे.”
चन्द्रहास – यहां हम समस्याओं में उलझे हैं और आप प्रसन्नता की बात कर रही हैं.!”
मृणाल – डॉ. महादेवन अपने कार्य में असफल हो गये.”
सभी सदस्य – क्या, आप सच कह रही हैं?”
मृणाल – हां, वे मृत्यु मशीन का बटन नहीं दबा सके. वे निलम्बित कर दिये गये हैं. उनके बदले डॉ.सुरजीत को आदेशित किया गया है.”
समीर – इसका तात्पर्य हमें भरपूर समय मिल गया.”
मृणाल – हां समीर, पूरा पूरा समय मिला हैं. हमें अपना कार्य शीघ्र निपटाना होगा.”
चन्द्रहास – मगर कार्य का प्रतिपादन कैसे किया जाय-समझ नहीं आ रहा हैं?”
मृणाल – हम आकाश का अपहरण क्यों न कर लें?”
चन्द्रहास – मगर यह अपराध है. जबकि “मासुस’ अपराधिक कर्म को स्वीकार नहीं करता.”
मृणाल – हम आकाश का अपहरण फिरौती लेने थोड़े ही करेंगे. यह अपहरण अपराध नहीं कहलायेगा.”
प्रताप – मृणाल का कहना उचित है. एक उपाय मैं सुझाता हूं- आप आकाश का अपहरण कर लें. मैं उनके स्थान पर सो जाऊंगा. इससे डॉ. सुरजीत के कार्य में अवरोध उत्पन्न नहीं होगा. और आकाश जीवित भी बच जायेंगे.”
मृणाल – तात्पर्य, आकाश को बचाने आप को मृत्यु शैया पर सुला दें.”
प्रताप – नि&संदेह.
मृणाल – एक के प्राणरक्षार्थ. दूसरे को मृत्यु का ग्रास बनाने का प्रावधान “मासुस’ की संहिता में नहीं है”
प्रताप – मैं “मासुस’ के विचारों का आदर करता हूं. मेरी चेतना दिन प्रतिदिन लुप्त होती जा रही है. और वह दिन दूर नहीं जब मेरी चेतना पूर्णत& लुप्त हो जायेगी. मैं महत्वहीन हो जाऊंगा. मानवहित के लिये मेरा जीना उतना आवश्यक नहीं, जितना कि आकाश का.”
चन्द्रहास – (सभी सदस्यों से) क्यों मित्रों, क्या हम प्रताप के प्रस्ताव को स्वीकार लें?”
सभी सदस्य – प्रताप का विचार उचित है. हमें उनके विचार का स्वागत करना चाहिये.”
चन्द्रहास – तो इस कार्य में विलंब करना उचित नहीं.”
(मासुस के सदस्य आकास को उठा लेते हैं. उनके स्थान पर प्रताप सो जाते हैं)
(आकाश अचेतावस्था में हैं. मासुस के सदस्य उनके इर्द-गिर्द बैठे हैं. वे आकाश की चेतना लौटने की प्रतीक्षा में हैं. आकाश आंखे बंद किये ही बड़बड़ाते हैं)
आकाश – पानी पानी.
(चन्द्रहास ग्लास में पानी डालते हैं)
चन्द्रहास – (आकाश से) लीजिये पानी. मुंह खोलिये.”
(आकाश मुंह खोलते हैं. चन्द्रहास पानी डालते हैं. आकाश पानी को गुटकते हैं. प्यास बुझती हैं तो मना कर देते हैं. चन्द्रहास ग्लास रख देते हैं.
थोड़ी देर बाद आकाश आंखे खोलते हैं. सामने अपरिचितों को देखकर चौंक पड़ते हैं)
आकाश – (उठने का प्रयास करते हुए) आप लोग कौन हैं- मैं तो अस्पताल में था. मुझे यहां किसने लाया?”
चन्द्रहास – आप लेटे रहिये. हम गलत व्यक्ति नहीं हैं. हम “मासुस’ के सदस्य हैं.”
आकाश – मैंने इस संस्था का नाम सुना है. मगर आपने मुझे यहां क्यों लाया?”
चन्द्रहास – मृत्यु से मुक्ति दिलाने.
आकाश – आप लोग अनभिज्ञ नहीं होंगे- मैंने स्वयं मृत्यु चाहा था.”
चन्द्रहास – मगर हम आपको असमय मरने नहीं देना चाहते.”
आकाश – पीड़ित जीवन ने मेरे जीने की लालसा खत्म कर दी है.”
चन्द्रहास – अब हम आपकी पीड़ा को खत्म कर देंगे. और जीने की लालसा को बढ़ा देंगे.”
आकाश – असम्भव, बड़े बड़े डाक्टर असफल रहे तो आप लोगों को सफलता मिलना संभव नहीं.”
चन्द्रहास – हम अपने कर्माें पर विश्वास रखते है. अपनी विधि से उपचार करते हैं. और असंभव को संभव बनाने का प्रयास करते है. अंतत& जीत हमारी ही होती है.”
आकाश – मैं एक बार फिर कह रहा हूं- मेरी बात मानिये. मुझे मरने दीजिये.”
चन्द्रहास – नहीं…… न हम आपको मरने देंगे ओर न ही “सेफ्टी लाईफ’ के कार्य को अधर में लटकने देंगे.”
आकाश – (आश्चर्य से) अरे, सेफ्टी लाईफ के संबंध में आप जानकारी रखते हैं. लेकिन आपको किसने बताया?”
(उसी समय प्रोफेसर अनूप आते हैं)
अनूप – मैंने बताया
(अनूप को देखकर आकाश आश्चर्य में पड़ जाते हैं.)
आकाश – प्रोफेसर आप……..।”
अनूप – हां मित्र, मैं प्रोफेसर अनूप. मैंने अपना निश्चय तोड़ा- इसके लिये क्षमा प्रार्थी हूं.”
आकाश – क्या आवश्यकता थी- आपको वचन तोड़ने की?”
अनूप – यदि मैं वचन बद्ध रहता तो आपका जीवन, मृत्यु में परिवर्तित हो जाता.”
२६५
आकाश – क्या आपको भी विश्वास है कि “मासुस’ मुझे स्वस्थ कर देगा?”
अनूप – नि&संदेह.
आकाश – यदि मासुस इसमें असफल रहा तो?”
अनूप – असफलता का कोई कारण नहीं है.”
मृणाल – तो आप अपने मित्र के विचारों से सहमत हो गये न आकाश?”
(आकाश स्वीकृति में सिर हिला देते हैं. मासुस अपनी विधि से आकाश का उपचार करना शुरू कर देता है.)
दृष्य परिवर्तन
(आकाश सोफे पर बैठे हैं. मृणाल उनके पास आती हैं. उनके हाथ में दवाई भरी सुई है.)
आकाश – मृणाल, अब सुई लगाने की क्या आवश्यकता है! मैं तो “मासुस’ के कारण पूर्ण स्वस्थ हो गया हूं?”
मृणाल – (आकाश की बांह में सुई लगाते हुए) अनावश्यक सुई तो लगाऊंगी नहीं. आपको इसकी आवश्यकता है. इसीलिये ही लगा रही हूं.”
(इसी समय चन्द्रहास, अनूप सहित अन्य सदस्य प्रवेश करते हैं. उनके चेहरे पर प्रसन्नता की छाप है)
चन्द्रहास – (मुस्करा कर आकाश से) क्यों आकाशजी, अब तो आप को हमारे कार्य पर विश्वास हुआ न?”
आकाश – हां, अब तो मुझे सुई से डर लगने लगा है.”
चन्द्रहास – आप तो बांह में लग रही सुई से भय खाने लगे है. फिर मृत्यु मशीन की सुई को कैसे सहन करेंगे- मृत्यु मशीन की सुई तो सीधा हृदय को बेधती है?”
आकाश – अब मृत्यु मशीन की आवश्यकता नहीं है.”
चन्द्रहास – इसका तात्पर्य अब आप मृत्यु से कतराने लगे?”
आकाश – जब जीने के लिये अवसर मिल गया है तो जी लिया जाय.”
(आकाश हंस पड़ते हैं. साथ ही “मासुस’ के सदस्य भी)
आकाश – मासुस की तरह क्राचीद भी एक संस्था है. उसके सदस्य प्रतिभावान हैं. विद्वान हैं. मगर दोनों की कार्यप्रणाली में अंतर है.”
मृणाल – क्राचीद की कार्यशैली हिंसात्मक है. हिंसा कभी हितकर कार्य नहीं कर सकता. हिंसक व्यक्ति समाज को हितैषी बनने के बदले शत्रु बन जाता है. और इसीलिये क्राचीद की कार्यप्रणाली का मासुस विरोध करता है. हिंसक कितना भी प्रतिभावान क्यों न हो मगर उसे लुक छिपकर रहना पड़ता है. इसलिये वह अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करने में असफल रहता है. हम तो “क्राचीद’ से भी अपेक्षा करते हैं. कि वह हिंसा का त्याग करे. समाज के हित में कार्य करे.”
(आकाश, मृणाल के विचारों से प्रभावित होते हैं.)
आकाश – वास्तव में मासुस के विचार प्रशंसनीय हैं.”
मृणाल – और कार्य प्रणाली?’
आकाश – अनुकरणीय है. मैं मासुस के कार्य और विचारों का आदर करता हूं. अब देखना- सेफ्टी लाईफ को मैं पूर्ण तैयार करके दिखाऊंगा.”
(सभी सदस्य एक साथ तालियां बजाते हैं)
दृष्य परिवर्तन
(डा. महादेवन का निवास. वे चिंतामग्न बैठे हैं कि घंटी बजती है)
(वे दरवाजे की ओर बढ़ते हैं. कि घटी पुन& बजती है.)
डॉ.महादेवन – (ऊंची आवाज से) मैंने घंटी की आवाज सुन ली. मैं मरा नहीं. अभी जीवित हूं.”
(वे दरवाजा खोलते हैं. सामने प्रोफेसर खड़े मुस्करा रहे है, डॉ. हड़बड़ा जाते है.)
डॉ.महादेवन – प्रोफेसर साहब, आप…………।
प्रोफेसर – हां, क्या अंदर आने नहीं कहेंगे!
डॉ.महादेवन – क्यों नहीं. आइये न.
(दोनों भीतर प्रवेश करते हैं. वे सोफे पर बैठते हैं.)
प्रोफेसर – आप बहुत खीझे हुए दिखाई दे रहे है!
डॉ.महादेवन – हां प्रोफेसर, आपको क्या मालूम- किसी की जीविका छिन जाती है तो उसकी क्या स्थिति होती है.
प्रोफेसर – मैं आपकी पीड़ा समझ रहा हूं डॉ.”
महादेवन – बस इतना सांत्वना तो सभी देते हैं.”
प्रोफेसर – मैं आपको सांत्वना देने नहीं आया. मैं आपको जीविका दिलाने आया हूं.”
महादेवन – आखिर आप कहना क्या चाहते हैं?”
प्रोफेसर – न्यायालय ने आपको आकाश को दयामृत्यु देने नियुक्त किया था. उसमें आप असफल हो गये. इसे कर्यव्यहीनता माना गया. और आप निलम्बित कर दिये गये.”
महादेवन – हां
प्रोफेसर – डॉ. सुरजीत ने अपना कार्य पूर्ण किया. इसके लिये वे पदोन्नत हुए.”
महादेवन – हां
प्रोफेसर – मगर यथार्थ में डॉ. सुरजीत ने भी अपना कार्य नहीं किया.”
महादेवन – (आश्चर्य से) आखिर आप कहना क्या चाहते हैं. मुझे साफ साफ तो बताइये!”
प्रोफेसर – दरअसल डॉ. सुरजीत ने जिस व्यक्ति को दयामृत्यु दी वे आकाश नहीं अपितु प्रताप थे. और वे मासुस के सदस्य थे.”
महादेवन – इसका तात्पर्य आकाश जीवित हैं. और जीवित हैं तो आप उनके रहने के स्थान को जानते होंगे?”
प्रोफेसर – हां अवश्य.
महादेवन – तो प्रोफेसर, मुझे आकाश ही न्याय दिलवा सकते हैं. मुझे उनके पास ले चलिये.”
प्रोफेसर – मैं आपको ले जाने ही आया हूं.
महादेवन – फिर देर क्यों कर रहे है. शीघ्र कीजिये.”
(दोनों जीप में बैठते हैं. जीप सड़क पर दौड़ता है)
प्रोफेसर – आकाश ने सेफ्टीलाईफ नामक यंत्र का आविष्कार किया है. वह मानव जीवन के लिये रक्षा कवच है.”
डॉ.महादेवन – अच्छा.
प्रोफेसर – हां (चालक से) दाहिना मोड़िये. वो पीला बिल्ड़िग है न वहीं जीप रोकना.”
चालक – जी हां.
(जीप दाहिना मुड़कर बिल्ड़िग के सामने रूक जाता है. दोनों जीप से नीचे आते हैं. बिल्ड़िग की ओर कदम बढ़ाते हैं.)
प्रोफेसर – इस यंत्र की खूबी है कि यह बमों को निष्क्रिय करने में पूरी तरह समर्थ है.”
डॉ.महादेवन – अच्छा.
प्रोफेसर – हां (एक कक्ष में प्रवेश करते हुए) आइये.
(दोनों भीतर प्रवेश करते है. सामने आकाश को पाकर डॉ.महादेवन के पांव ठिठक जाते है. वे चकित होकर आकाश को देखते हैं.)
आकाश – ठिठक क्यों गये डाक्टर. आइये. बैठिये.”
(डॉ. महादेवन सोफे पर बैठ जाते हैं)
आकाश – डॉ. साहब, मै आपका आभारी हूं (सेफ्टीलाईफ को दिखाते हुए) मैं आपके ही कारण इस यंत्र का आविष्कार कर सका.”
डॉ.महादेवन – मगर इसके बदले मुझे क्या मिला-मेरा वर्तमान और भविष्य गर्त में चला गया न!”
आकाश – मैंने इस गर्त से उबारने ही आपको बुलाया है.”
डॉ.महादेवन – आपका तात्पर्य?
आकाश – मैं न्यायलय में इस सेफ्टीलाईफ को दिखाऊंगा. और आपको न्याय दिलाऊंगा. आप मेरे साथ न्यायालय चलिये.”
(डॉ.महादेवन और आकाश जीप में बैठते हैं. जीप सड़क पर दौड़ता है)
दृष्य परिवर्तन
(क्राचीद का अडडा. ऋषभ कमर में बेल्टबम बांधता है. वह निकलने लगता है कि विश्वास कहता है)
विश्वास – ऋषभ, आप कहां चले?”
ऋषभ – मैं न्यायालय का सर्वनाश करने जा रहा हूं. आज बेल्टबम का प्रयोग वहीं करूंगा.”
विश्वास – आप विद्वान हैं. प्रतिभावान लेखक हैं. फिर भी आप सर्वनाश करना चाहते हैं.”
ऋषभ – हां, मेरी विद्वता मेरी प्रतिभा की पहिचान आपको है. मगर कानूनविदों को नहीं (अंतिम क्रांति-नामक पुस्तक की ओर संकेत करते हुए) आप तो जानते हैं- मैंने इस “अंतिम क्रांति’ पर दयामृत्यु के संबंध में लिखा है. मगर इसे किसी ने नहीं सराहा. उल्टा अवहेलित की.”
विश्वास – आपकी पुस्तक और आपके विचारों का निरादर हुआ इसका तात्पर्य यह तो नहीं कि आप न्यायलय को ही उड़ा दें. आप अपराधिक कर्म पर अंकुश लगाइये.”
ऋषभ – हूंह. यही भाषण मैंने प्रणव को पिलाया था. उसने कहा था- न्यायलय को उड़ा दो. तब मैंने धैर्य पर बल दिया था. सोचा था- देर सबेर मेरी प्रतिभा का मूल्यांकन होगा. मगर संवाद हीनता आड़े आयी. अब तो मेरे पास एक ही रास्ता है- न्यायालय का सर्वनाश करना.”
(ऋषभ झटके के साथ आगे बढ़ जाता है)
दृष्य परिवर्तन
(न्यायालय – यहां अधिवक्ता. पक्षकार साक्षी और अन्य लोगों की भीड़ है. आकाश, डॉ.महादेवन के साथ न्यायालय में प्रवेश करते हैं. इसी क्षण सेफ्टीलाईफ की लालबती जलने लगती है. आकाश के कदम रूक जाते हैं)
डॉ.महादेवन – आकाश जी, आप रूक क्यों गये?”
आकाश – सेफ्टीलाईफ संकेत दे रहा है कि यहां कोई खतरा है.”
डॉ.महादेवन – खतरा लेकिन कैसा खतरा?
(डॉ.महादेवन सिहर उठते है. वे भयभीत दृष्टी से इधर-उधर देखते हैं. सेफ्टीलाईफ की पीलीबती जल उठती है)
आकाश – यहां कोई बेल्टबम पहनकर आया है. वह न्यायालय को तबाह करना चाहता है.”
(आकाश एक बटन को दबाते हैं. वे एक व्यक्ति की ओर संकेत करते हैं. वह ऋषभ है. आकाश सेफ्टीलाईफ का दूसरा बटन दबाते हैं.) अब देखना-ऋषभ का बेल्टबम निष्क्रिय हो जायेगा.”
महादेवन – क्या सच?
आकाश – हां
(ऋषभ बेल्टबम का बटन दबाता है. मगर सेफ्टीलाईफ के कारण वह निष्क्रिय हो जाता है. ऋषभ बेल्टबम के बटन को पुन& जोर जोर सो दबाता है, मगर वह नहीं फटता. ऋषभ परेशान और गुस्से से भर जाता है. अचानक उसकी दृष्टि आकाश पर जाती है. आकाश मुस्करा रहे हैं. ऋषभ को क्रोध पार कर जाता है. वह किटकिटाकर आकाश की ओर दौड़ता है. आकाश चिल्ला उठते हैं)
आकाश – इसे पकड़ो. इसके पास बेल्टबम है.”
(न्ययालय में भगदड़ मच जाती है. ऋषभ प्राणबचाकर भागने का प्रयास करता है. मगर तब तक वहां की पुलिस उसे दबोच लेती है. उसे न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है. आकाश को सामने पाकर न्यायाधीष नागार्जुन आश्चर्य मे पड़ जाते हैं)
न्यायाधीष – आप.
आकाश – हां मैं आकाश.
न्यायाधीष – मगर आपको तो?
आकाश – मुझे दयामृत्यु दे दी गयी थी……. आप यही कहना चाहते हैं न! मगर “मासुस’ ने मुझे मरने नहीं दिया.”
(सेफ्टलाईफ न्यायाधीष को सौंपते हुए) जिसका उपलब्धि यह है.”
न्यायाधीष – यह क्या है?
आकाश – यह सेफ्टीलाईफ है. इसके कारण ही बेल्टबम निष्क्रिय हो गया. अपराधी पकड़ा गया. न्यायालय बर्बाद होने से बच गया.”
(उसी समय ऋषभ अपनी “अंतिम क्रांति’ पुस्तक को न्यायाधीष को सौंपते है)
ऋषभ – (न्यायाधीष से) सर, इसमें अनेक गंभीर विषयों पर वैचारिक लेख लिखे गये हैं. इसमें “दयामृत्यु’ पर भी चर्चा की गई है- कि किस व्यक्ति को किस परिस्थिति में दयामृत्यु का अधिकार दिया जाय.”
न्यायाधीष – अच्छा.
ऋषभ – हां सर, (थोड़ा रूक कर) सर, मैं एक प्रश्न करना चाहता हूं?”
न्यायाधीष – कहो.
ऋषभ – सदा से एक नियम चला आ रहा है- मेरी तरह अपराधी पकड़ा जाता है. उस पर न्यायालयीन कार्यवाही होती है. और उसे दण्ड दिया जाता है. क्या यह प्रथा चलती ही रहेगी?”
न्यायाधीष – नहीं, वर्तमान में विश्व की न्यायपालिकायें अनिश्चय की स्थिति में हैं. कि दयामृत्यु को मान्यता दी जाये या नहीं! इस पर तुम्हारा लेखन है. सेफ्टीलाईफ ने अपनी प्रतिभा का प्रमाण प्रस्तुत कर दिया. अब उसकी योग्यता को कौन अस्वीकार सकता है! (अंतिम क्रांतिपुस्तक की ओर संकेत करते हुए) वैसे ही यदि यह पुस्तक अपने उद्देश्य में सफल रही तो इसका सम्मान होकर रहेगा.”
नाटक ला लेखक मन देखिन, टकटक खोल के राखिन आंख
जरत ह्रदय हा इरखा कारन, उंकर गिरत लेखन के साख.
दानी अंदरूनी मन सोचत- अब आगू आवत ग्रामीण
हमर साथ मं टक्कर लेवत, खोज लीन साहित्यिक रीढ़.
मेहरू बहल उंहे चुप सुतगिन, कार रात मं कहुंचो जांय!
बड़े फजर होइस तंह मेहरू, सुन्तापुर बर करथय कूच.
अपन गांव मं पहुंचिस मेहरू, तंह कातिक संग होगिस भेंट
खैरागढ़ के व्यथा ला कहिदिस, कुछ नइ रखिस लुका के पेट.
कातिक हा मेहरू ला छोड़िस, परब के बारे करत विचार-
“”देवारी हा भेद बढ़ाथय, मानव बीच परत हे सन्द.
जउन हा पहिली मानिस होही, भेद के दीवारी तिवहार
ओहर रोइस के सुख मानिस, चुप लुकाय हे एकर भेद.
जगमग दिया बरत एक घर मं, पर के घर मं घुप अंधियार
एक आदमी कोंहकोंह खावत, दूसर हा रहि जात उपास.”
फूलबती हा तिर ले निकलिस, जेन धरे प्रेतिन के रूप
छुही पोताय नाक मुंह मुड़ पर, मुसकावत कातिक ला देख.
कातिक फूलबती ला देखत, जमों फिकर ला तिरिया दीस
दुनों बीच मं गोठ चलत हे, याने चलत प्रेम के गोठ.
“”ए टोनही”- काये गा टोनहा”- तिर आ बैठ”- बता का काम?”
“”तड़फत हंव”-मन मड़ा कुछेच दिन”-“”चल अभिघर-“”होहंव बदनाम.”
कातिक हा मुसकावत बोलिस-“”होइस अभी जेन सम्वाद
एहर हमर दुनों झन के नइ, हम्मन नकल करे हन आज.
दुखिया अउर गरीबा दुन्नों, टोनहा टोनही मं बदनाम
उंकर बीच मं चलतिस ताना, तब सम्वाद कमातिस नाम.”
गांव नता मं भउजी लगथय, ते झरिहारिन आइस पास
किहिस-“”खोज ले लान देरानी, कब तक ले रहिबे बिपताय!
किंजरत गली कुंवरबोंड़का अस, उमर तोर हे करे बिहाव
यदि टूरी नइ चाहत तोला, लुगरा पोलखा पहिर सुएम.”
कातिक बोलिस- मंय सोचत हंव- मिल जातिक मुड़ढक्की रोग
पोथी पतरा देखा डरे हंव, लेकिन कहां मिलत हे जोग!
वइसे एक नजर में हे जेकर पर रखत भरोसा ।
जेहर साथ दिही जीवन भर कभू नइ दिही धोखा।।
झरिहारिन अउ बात बढ़ाइस-“”देवर, तंय हा धीरज राख
हरहिन्छा आसिस देवत हंव- तोर मुड़ी मं लगिहय मौर.”
“”तोर बात हा सत्तम उतरय, एकदम तूक मार तो दांव
अगर सफलता हम अमराबो, तोर धोकर के परबो पांव.”
“”खाल्हे गिरत निहू बन के तुम, डारत मोर मुड़ी मं भार
एक खुंटा मं बंध के रहिहव- सुक सनिचर पंड़री बुधवार.”
झरिहारिन, फूलबती ला पूछिस- “”तंय हा बता गोठ सच छूट
मोर परन हा पूरा होहय, या फिर जाहय रट ले टूट?”
फूलबती हा कुछ नइ बोलिस, ठेंगवा देखा के धर लिस राह
कातिक घलो खेत तन जावत, मन मं भरे मया उत्साह.
धनहा खेत मं कातिक किंजरत, मन मं खुशी ह्रदय मं हर्ष
धान के कद हा हवय नरी तक, महमहात हे ओकर फूल.
हवा देखावत मया धान पर, जूड़ हवा मं झूलत धान
एहर खाय जिनिस ए तब तो- एकर मान सबो ले ऊंच.
खेत जांच के कातिक लहुटिस, धनवा तिर फोरत सब हाल-
“”मालिक, धान फंसे हे कंसकंस, खूब अन्न मिलिहय ए साल.
बदरा झुण्डा के निसनाबुत, लाम गरा दाना मन पोख
मेड़ पार मं धान फंसे हे, मंय हा बोलत हंव बिन फोंक.”
धनवा भड़किस- “”तंय दोखहा हस, का होवत यदि गसगस धान
बनी भुती कतको नापे हन, ओमां कभू रखे हस ध्यान!
तोल मुंहू देखब मं असगुन, अंखफुटटा अस फट लू देस
पर के उन्नति ले तंय जलथस, तंय खुद पाथस कलकल क्लेश.”
कातिक हा ओतिर ले खसकिस, धनवा के सुन गुहरा गोठ
क्रोध के कारण बोल सकिस नइ, चुप रहिगे बस चाबत ओंठ.
बइला खाथय मार पेट भर, तभो रहत मालिक के पास
कातिक हा धनवा के घर गिस, हारत हे जीवन के होड़.
धनसहाय हा घर मं अमरिस, देखत हे नौकर के काम
पर के कुरिया अरन बरन पर, खुद के घर हा चकचक साफ.
धनसहाय के पुत्र एक झन, ओकर नाम हवय मनबोध
ओहर टुड़ुग टुड़ुग रेंगिस तंह, धनवा फट ले मारिस रोक.
पुचकट ला पुचकार के बोलिस-“”तंय झन कर मिहनत के काम
मंय अनसम्हार धन सकले हंव, ताकि पास तंय सुख आराम.
सोन के मचली मं सोय रहिबे, दुनों हाथ मं करबे खर्च
अंटा जहय तरिया के जल तक, पर धन मोर उरक नइ पाय.”
कपट गोठ मनबोध का समझय, कातिक तिर बालक हा जात
ओला धनवा अधर उठालिस, मुंह ला चूमत प्रेम जतात.
कातिक तन इंगित कर कहिथय-“”तंय नइ जानस एला।
दिखब मं सुधुवा लेकिन रखथय मन मं कपट के भेला।।
धनवा हा बालक ला लेगिस, कातिक हगरू तिर गोठियात-
“”देखव बड़हर मन के आदत, हम गरीब ऊपर अंटियात.
हे मनबोध अभी नानुक अस, तेला देत कुजानिक पाठ
प्रेम ज्ञान के राह देखातिस, पर पीटे बर देवत सांट.
सांपनाथ के नांगनाथ हा, बालक ला बतात हे चाल
पर ओ बखत मरत ले रोहय, जब भावी मं आहय काल.”
हगरू किहिस-“”रहन ते भइया, धनवा ला नइ परय दलेल
ओकर तिर पूंजी के ताकत, ओकर ले रहिबो कर मेल.”
“”इही चाल ला चलिन ददा मन, कोलिहा असन हुंकारू दीन
हम्मन उंकरों ले अउ कोतल, तब धनवा पनही झड़कात.
अगर भविष्य बनाय चहत हन, शोषक ले हम टक्कर लेन
तब हकिया के छोड़ के रहिहय, लहू चुसे बर भंइसा जोंख.”
ओतकी मं फगनी हा आइस, नौकर मन के झिकिस लगाम-
“”काली हवय परब सुरहुत्ती, लेकिन बचे गंज अक काम.
जलगस परय नइ कोर्रा लउड़ी, तुम्मन कहां हलावत देह
बुता बचे तेला उरका दव, तब छुट्टी मिलिहिय घर जाय.”
नौकर मन मुंह ला चुप रखथंय, अधरतिया तक काम बजैन
उंकर पेट होवत हे सपसप, घर मं अमर के जेवन पैन.
सुरहुत्ती के दिन धनवा हा, बात करत फगनी के साथ-
“”लछमी पूजा हे संझाकुन, पूजा बर सब जिनिस सकेल.
लक्ष्मी मानपान ला पाथय, उंहचे छाहित होथय सोज.
जउन नेम ले रहत उराठिल, घुघुवा हा खावत हे खोज”
धनवा हा कातिक ला बोलिस-“”पूजा बर का करे प्रबंध
यदि लछमी के स्वागत करबे, तभे खतम दुख के अनुबंध.”
कातिक किहिस-“”एल्ह झन ठाकुर, लछमी हमर बाच हे बैर
ओकर इज्जत करन सकन नइ, तब लछमी हा काबर आय!
अटब हार वाले ला चिन्हथय, ओला दर्शन देथय दौड़
लछमी के सेवा तंय करथस, तब सुख ला पाहय मन बोध.”
“”तंय हा मोला मुरूख समझ झन, मंय समझत तोर भाषा व्यंग
तंय कसरहिल करत दूसर पर, आंख फुटत पर के धन देख.
एकर फल ला दंय खुद पावत- तोर पास हर जिनिस अभाव
रांयरांय कर जिनगी काटत, पर नइ मिलत सुखद परिणाम.
धनवा हा कातिक पर घुड़किस, तंह सकलिस पूजा बर चीज
ढरकिस बेर सांझ हा आगे- शुरू होत पूजा के खेल.
धनवा के घर बजत फटाका, दगदग दिखत हवय घर द्वार
अंधियारा के नाम बुतागे, रगबग बरत घीव के दीप.
कातिक हा मन मं सोचत हे- काबर दुवाभेद के खेल
घिव के दिया बरत धनवा घर, हमर इहां नइ अरसी तेल.
धनवा कथय- घिव हा गुन देथय, एकर खाय भोगाथय देह
थोरिक मंहू चोरा के खावंव, तंहने बन जाहंव बलवान.
एक दिया भर घीव चोराइस उहां ले छरकिस लउहा।
तात घीव हा गोड़ मं गिरगे उबलिस चकचक फोरा।।
कातिक हा करला के केंघरत, ओकर बढ़त जलन अउ दाह
दाईददा के नामे सुमरत, कउनो करय मदद ला दौड़.
सुखी हा जम्मों दृष्य ला देखिस, मगर मदद ले जीव हटैस
धनसहाय के कान ला फूंकत, बढ़ चढ़ के चुगली ला खैस.
बोलिस-”आय हवय सुभ मुहरूत, धन सुख खुशी आय के टेम
लेकिन नीयत खोर कातिक हा, अशुभ काम ला करदिस आज.”
धनवा हा घटना ला जानिस, कातिक पर बतात हे क्रोध
अपन डहर कातिक ला झींकिस, धान के पैर कलारी चोख.
लोर के उपटत गाल ला मारिस, चिन्हा दिखत हे टकटक लाल
ओन्हारी के कुंड़ चिरथय तब, ओकर चिन्ह दिखत हे साफ.
धनवा बकिस-“तिजऊ के अंसअस, जान पाय नइ लहू-प्रभाव
सोमना ला कतको चतरावत, पर ओकर जड़ रहिथय खेत.
तोर सइत्ता छुटत रिहिस हे, मंगते घिव मुंह ला फुटकार
एक किलो अस देतेंव मंय खुद, ओकर संग मं नोट हजार.”
धनवा अब पूजा मं भिड़थय, आगे सुभ मुहरूत के टेम
पूजा मं फगनी संग बइठिस, खेलत पास पुत्र मनबोध.
नवा नवा कपड़ा पहिरे हें, महमावत हे अत्तर सेन्ट
सम्हरे हे मनबोध सुघर अक, दिखत हवय जस नंदी बैल.
लछमी चित्र हवय आगुच मं, गहना मन हा रखे परात-
सुर्रा खोपिया तितली खोटला, टिकली बारी फुली बुलाक.
कोपरबेला हंसली पुतरी, बंहुटा सुंतिया पिन संग गोफ
अंइठी करधन तोड़ा चुटकी, गहना अतिक बात नइ फोंक.
लछमी मं चढ़ात दूनों झन, नरियर मिठ फल चांउर दूब
आंख मूंद के मिट का जाथंय, बिनती करिन दुनों झन खूब.
सुखी उपस्थित हवय कलेचुप, देखत सिरिफ मुआ अस बांध
धनवा के पूजा ला जांचत, ओकर अक्कल हा भट जात.
सुखी झकनकागे जब पाइस- एक पसर भर मिठई-प्रसाद
खाइस तंह ओंड़ा दलगिरहा, धान बढ़त पाके जल खाद.
बोलिस सुखी-“”कहां पाये हंव, आज उड़ाय जेन मंय चीज
मंय हा हांका पार के बोलत- रहिहंय सदा इहिच दहलीज.
ए जग मं कतको मनसे हें पर नइ पीयंव मानी।
तंय हा छाहित हवस मोर पर नइ चढ़ात हंव पानी।।
एकर बाद सुखी हा सल्टिस, धनसहाय ला चढ़ा अकास
जेन काम कोतल मन करथंय, करत प्रशंसा सबके पास.
सनम हा तड़ ले सुखी ला बोलिस-“”तंय लुहाय चुगली कर आज
कातिक ला पकड़ाय तिंही भिड़, पाय एवज मं काय इनाम?”
“”गांव के रददा चतरावत हंव, तुम झन लेव चोर के पक्ष
अइसन मं पर जहय संधाड़ा, छाती तान घूमिहिय चोर.”
सुखी के तर्क ला सनम हा काटिस-“”हवय कोन ला बद के साध
लेकिन धन के भेद के कारन, मनसे हा करथय अपराध.”
“”अतका बात बोल दूसर तिर, मंय जानत पुंजलग के रंग
उंकर विरूद्ध अगर हम जावत, टंगिया गिरिहय खुद के अंग.
दीन के खटला भउजी होथय, बंड के औरत बहिनी आय
हागे कुला छोटे मधुमक्खी, भांवर ला सब झन डर्रात.
पिरपिटटी ला खेदत लइका, चिचिया भागत डोमी देख
हरिना के तन हाथ ला फेरत, पर धिधियात बाध ला देख.”
“”भांवर के मंदरस निकलत हे, जहर के औषधि तक बन जात
बघवा हा सरकस मं नाचत, बंड हगत जब हक मर जात.”
अधरतिया के नर नाही मन, झड़ी के घर बाजा घर गीन
गउरा गउरी रखे हे उंहचे, परघावत इज्जत के साथ.
गउरा गउरी ला मुड़ पर रख, गउरा चंवरा के तिर लैन
फूल हा कुचरे रखे उहां पर, देव ला चंवरा मं पधरैन.
माटी के देवता मन मोहत, चमकत हे सनपना के भीथ
मेमरी सिलियारी गोंदाफुल, सब तन बरत रगबगा दीप.
देव के भांवर रखे हे करसा, करसा मं उतरे हे फूल
भीतर भरे फरा अउ मुठिया, लइका हेर के खावत झूल.
बाजा बजत देव मन नाचत धर के सांकर बाना।
खांद पकड़ के नारी मन चांउर छित गावत गाना।।
(१) गौरा गीत
गौरा जागो मोर गौरी जागे
जागे शहर के लोग ।
झाई झुई झुले झरे, सेजरी बिसाय
जागो जागो मोर गांव के गौंटिया
जागो जागो मोर ढौलिया बजनिया
जागे ओ गंवइहा लोग
बैगा जागे मोर बइगिन जागे
जागे ओ शहर के लोग ।
(२) फूल कुचरना
एक पतरी रैनी भैनी राय रतन ओ दुर्गा देवी
तोरे सीतल छांव माय चांउर चौंकी चंदन पिढ़ली
जैसे गौरी के होथय मान तुम्हारे
जइसे टेढ़ा डार जइसे
परवा छछल गाई डार
एक पतरी रैनी भैनी राय रतन ओ दुर्गा देवी
तोरे सीतल छांव माय चांउर चौंकी चंदन पिढ़ली
गौरी के होथय मान- जइसे गौरी हो मान तुम्हारे
जैसे कोरे धान
कोरे असन डोड़ही पर्रा छछलगे फूल………।
दू पतरी रैनी भैंनी राय रतन ओ दुर्गा देवी
तोरे सीतल छांव माय चांउर चौंकी चंदन पिढ़ली
गौरी के होथय मान – जैसे गौरी हो मान तुम्हारे
जइसे कोरे धान
कोरे असन डोड़ही पर्रा छछलगे फूल………।
(३) जोहार गीत
जोहर जोहर मोर ठाकुर देवता,
सेवर लागौं मैं तोर ।
ठाकुर देवता के मढ़ि ला छवायंव,
झुले ओ परेवना के हंसा ।
हंसा चरथे मोर मूंगा ओ मोती
फूलै ओ चना के दार
धरती पृथ्वी के मढ़ि ला छवायंव
झुले ओ परेवना के हंसा
हंसा चरथे मोर मूंगा मोती
फूले चना के दार
(४) डड़ैंय्या गीत
लाले लाले बरसा लाले हे खमारे
लाले इशर राजा छोड़वा संवारे
सिकही लबेदा मारे इशर राजा
बेला गिरै सहनाई
नदिया भितर झिल मिल टेंगना
जाइ धरइ अस मोतिन के अंचरा
छोड़ो-छोड़ो रे टेंगना हमरो अचंरा ला
जाइ धरई जस मोतिन के अंचरा……..।”
(५) अखरा गीत
दे तो दाई दे तो दही मं मोला बासी
अखरा खेलन बर जैहों ओ दाई
अखरा अखरा बाबू तुम झन रटिहौ गा
अखरा में बड़े बड़े देवता रे भैया
अखरा खेलत बाबू ददा तोर बीत गे
पैदा लेवत बाबू दाई तोर बीतगे
न तोर ददा बाबू न तोर दाई गा
कोन तोर आड़ी ला पुरोही गा भैया
तिहीं मोर ददा दीदी, तिहीं मोर दाई ओ
तिहीं मोर आड़ी ला पुरोबे ए दीदी
तिहीं मोर अखरा मं दिया बार देबे ओ
के कोसे के अखरा सो लाये
कै कोसन के फेरे रे भैया
दस कोसन के अखरा सो लाये
बीस कोसन के फेरे रे भैया ।
(६) विसर्जन
एक पतरी चढ़ायेन गौरी, खड़े हो बेलवासी ।
आमा आमा ला पूजेन गौरी, मांझे चौरासी ।।
रौनिया के भौनिया रंग परे कस्तुरिया ।
आगू आगू राम चले, पाछू मं भौजइया ।।
रथिया काटिन कर जगवारी, परब देवारी लगगे आज
हूम दीन गउरा गउरी मं, दुन्नों ला मुड़ मं बोहि लीन.
देव ला ठंढा करना हे अब, जनसमूह तरिया मं गीस
उंहे देव ला ठंढा कर दिन, तंहने करत सफइ के काम.
मनसे मन हा डुबक नहावत, हेरत हवंय देह के मैल
गन्दा कपड़ा मन ला धोवत, साबुन तिली चिरचिरा राख.
मनसे अपन ठिंहा मं लहुटिन, अड़बड़ काम के आय तिहार
गरूवा मन नइ लगत थिरबहा, दउड़त गली बोरक्की मार.
रंधनी के तिरिया मन सोचत- समझ आत नइ रांधन काय
पास परोसी ला पूछत हें-“”काय साग रांधत हव आज?
कोंहड़ा कोचई जिमीकांदा हे, तेमां अमसुर मही डराय
एमन आज सुहाथय नंगत, तभे परब हा होवत पूर्ण.”
कोंहड़ा कोचई जिमीकांदा ला, कहुंचो ले कर लीन प्रबंध
ककरो मन हा काबर टूटय, सब घर रांध करिन तैयार.
अउ पकाय ताकत के पुरती- बरा सोंहारी भजिया खीर
अपन पेट भर जिनिस उड़ाइन, संहरावत खुद के तकदीर.
मांईलोगन लिखपोहना धर, ननचुनिया के कोरत बाल
पर ओमन ला कुछ नइ भावत, भगना चहत गुंडी तन जल्द.
गायगरू के पूजा होवत, खिचरी खवा परत हें पांव
सोहई ला बांधत बरदीहा हा, लेवत हें ठाकुर के नाम.
कृषक के कोठी ऊपर ओमन, गोबर लोंदी मारिन खींच
अन धन हा दिन दूना बाढ़य- मन ला खोल देत आशीष.
चार बजिस तंहने मनखे मन, बइगा चंवरा तिर सकलैन
चेतलग मन पोटास मन्सिर भर, गचकुण्डी ला धांय बजैन.
एक बछर मं एक देवारी, सबके मन मं हवय उमंग
पुरसारथ भर सम्हरें सबझन, एको झन नइ जड़ग बड़ंग.
नान्हे लइका कंधा पर चढ़, जगर बगर देखत सबकोत
बजत फटाका मन हा भड़भड़, लइका झझक के रोवत खूब.
नवयुवती मन सम्हर खड़े हें, कान मं खोंचे दवनापान
आंख मं काजर गोड़ मं माहुर, मुंह मं दाबे बंगला पान.
हे घुमियार देवतिर तिरिया, इहां आय घर तारा ठेंस
अपन सखी संग बात चलावत- आज तो हंस के कर ले गोठ.
उनकर ले थोरिक दुरिहा मं, डोकरा मन कनिहा धर ठाड़
बेलबेलहा मन कंहु बिजरावत, कुबरी लउठी सर्र घुमात.
ओतकी मं राउत मन आइन, बाजा बजत नचत हें झूम
बइगा चंवरा परकम्मा कर, कांछा ढोंलग देत हें हूम.
आंखी काजर मुंह मं बंसरी, तेंदू खैर के लउठी हाथ
गोड़ पयजना संग मं घुंघरू, कनिहा भर कउड़ी के हार.
मोर पंख के गांथे खोपड़ी, राउत मन के देखव शान
साजू छाती बंहा मं बंहिका, रखे हें गघरा ऊपर तान.
एक जगा मं ठाड़बाय नइ जइसे कतला रोहा।
लउठी धर के पिचरिंग कूदत कांख के पारत दोहा।।
कालीदह मं कुदे कन्हैया तोड़े पताल के ताला।
उचक गेंद पताल मं धंसगे सोचय पृथ्वी वाला।।
पत्थर चुन चुन महल बनाया लोग कहे घर मेरा।
ना घर तेरा ना घर मेरा चिड़िया करे बसेरा।।
अंचरा चिरचिर फेंके सीता मांई
झोंके बीर जटायू
तीन लोक में है कोई जोइधा रख रखे बिलमाई.
राम नाम के लूट है लूट सकै तो लूट।
अंतकाल पछतायेगा प्राण जायेगा जब छूट।।
बृन्दाबन के कुन्जगलिन मं लम्बा पेड़ खजूर।
चढ़ने वाला चढ़गया संगी, उतरे तो ब्रज दूर।।
सब के लउड़ी रींगी चींगी मोर लउड़ी कुसुवा ।
पाँच कउड़ी मं डउकी लानेंव उहू ला लेगे मुसुवा ।।
अड़बड़ दिन के पावन संगी मुख दर्शन को आय हो ।
अइसन देवारी नाचो संगी जीव रहे के जाय हो ।।
राउत नचत बढ़त आगू तन, मनखे रेंगत उनकर साथ
भांवर मं दुलहिन हा चलथय, चांटी चाल चलत हें पांव.
नाच डहर सब के सुरता हे, सतिया छुटत देख अब लेंव
अगर एक झन अगुवा जावत, पर हा बाढ़त धक्का मार.
कोलकी गली जउन तिर अभरत, तिरिया मनबर अड़बड़क्लेश
लेकिन कुराससुर ला घंसरत- बाद मं दे लेहव उपदेश.
चिरई हा वापिस खोंधरा आथय, सुरूज जात घर करके काम
कमल फूल हा डोंहड़ू बनथय, महानगर के रद्दा जाम.
गरूवा चारा चर के आथंय, जब होथय दिन रात मिलान
उही बखत देहाती पहुंचिन, राउत नाच देखत दइहान.
गोबर के गोरधन जंगल हे, संहड़ादेव के बिल्कुल पास
उत्ती बुड़ती हे गोरस जल, जेहर आरूग यने के नीक.
धान के बाली रूमझुम होवत, सिलियारी मेमरी मन साथ
जमों खोंचाय गाय गोबर मं, ओमन अति सुन्दर रूपसात.
एक बरन गइया के बछरू, जेकर चिलक लेत मन मोह
पूजा करा सोहई बंधवा लिस, खिचरी झड़क नचावत गोड़.
गोरधन डोंगरी ला उझारदिस, बछरू हा गदफद कर कूद
बाग बगीचा रंउदा चरपट, भुंइया घुसगे पानी दूध.
गरूवा मन सकला ठाढ़े हें, ओमन ला लानिन ए पास
ओमन गोबरधन ला खूंदिन, मनसे मन हा खुशी मनात.
सब ग्रामीण दउड़ के आइन, गोबरधन ला धरलिन हाथ
एक दूसरा माथ मं टीकिन, भूल शत्रुता करलिन भेंट.
आपुस मं गोबरधन बदथंय छोटे परिस बड़े के पांव
एक दूसरा हाथ ला पकड़िन, सबझन लहुदिन खुद के छांव.
होईन अभी दूध पानी अस बिसरिन मारा मारी।
शांति के बंसरी बज ही जग मं तब पबरित देवारी।।

(… ६. तिली पांत समाप्त …)

गरीबा महाकाव्य (चौंथा पांत : लाखड़ी पांत)

धरती माता सबके माता-सब ले बढ़ के गाथा ।
मोर कुजानिक ला माफी कर मंय टेकत हंव माथा।।
अन्न खनिज अउ वृक्ष हा उपजत तोर गर्भ ले माता ।
सब प्राणी उपयोग करत तब बचा सकत जिनगानी ।।
“”कहां लुका-भागे डोकरा?
तोला खोजत हन सब कोती
सुन्तापुर के सब छोकरा ।
कहां लुका भागे छोकरा…?
चुंदी पाक गे सन के माफिक
अंदर घुसगे आंखी
बिना दांत के बोकरा डाढ़ी
पक्ती – पक्ती छाती.
झड़कत रथस तभो ठोसरा…।।
हाथ गोड़ के मांस हा झूलत
कनिहा नव गे टेड़गा
कउनो डहर जाय बर होथय
धरथस कुबरी बेड़गा.
सरकस के भइगे जोकरा…।
हमर मितान आस तब तो हम
आथन तुम्हर दुवारी
घर ले निकल तुरुत आ वरना
खाबे नंगत गारी
अउ हम्मन खाबो बोबरा ।
कहाँ लुका-भागे डोकरा ।।
लइका मन हा नाच गीत गा अब तक खड़े दुवारी ।
पर सुद्धू के पता लगत नइ- कहाँ गीस संगवारी ।।
रंगी जंगी गज्जू गुन्जा, मोंगा संग मं पुनऊ थुकेल
बाहिर मं रहि काय करंय अब, अंदर जाय बढ़ा दिन गोड़.
छोकरा मन घर अंदर घुसरिन, सब ठंव जांचत चोर समान
मुंह रख हाथ इशारा देवत, बंद रखे हें अपन जबान.
देखिन – सुद्धू सुते खाट मं, आंख बंद कर अल्लर देह
हला – हला झींकत चिल्लाइन, पर सुद्धू देवत नइ स्नेह.
लइका मन गुदगुदा डरिन पर, सुद्धू हा नइ लिस कल्दास
नाक मं अंगरी ला रख देखिन, मगर बंद हे ओकर सांस.
अतिक बखत तक लइका मन हा, रहि के बिधुन करत हें यत्न
जेन गरीबा हे अनुपस्थित, ओहर पहुंच गीस ए बीच.
कथय गरीबा बच्चा मन ला – “”काबर करत उदबिरिस व्यर्थ
मोर ददा ला झन केंदरावव, चले फिरे बर हे असमर्थ.
तुम नटखट हठ करे रेहे हव – होय जनउला कथा तड़ाक
तब ओ खेल हा खतमे हो गिस, मोर ददा ला झन केंदराव.”
रंगी कथय -“”डांट झन हमला, ढंगी हवय तोर खुद बाप
ओहर एकोकन नइ बोलत, सोय हवय बिल्कुल चुपचाप.
हाथ गोड़ ला रखे हे अकड़ा, चलती सांस ला रख लिस रोक
ओहर आज बतात बहाना, तब हम अचरज मं हन ठाड़.”
का होगे ? कहि तुरूत गरीबा, देखिस अपन बाप के हाल
जानिस जहां बाप हां मरगे, आंसू हा ढर आइस गाल.
यद्यपि अंतस मं दुख नंगत, पर नइ रोइस धर के राग
लइका मन आंसू ला देखिन, उंकर जीव बस एक छटाक.
गज्जू बोलिस -“”हम सुद्धू संग, एकोकन नइ करेन मजाक
तभो गरीबा आंसू ढारत, हमला समझ लड़ंका खूब.
लेकिन सच बिखेद हम जानत – सुद्धू हवय स्वयं चरबांक
ओहर अइसे ढचरा मारत – लइका मन होवंय बदनाम.”
मोंगा किहिस -“”लहुट हम जानत, पर तंय आंसू ला झन डार
इहां पहुंच के जुरूम करे हन, तेकर बर छोड़त हन द्वार.
हमर पुकार करिस सुद्धू हा, दल बल साथ आय हम दौड़
पर अब खुद हा ढचरा मारत, हमर खेल मं पारत बेंग.
ओहर हा बुजरूग मनखे तब, ओकर लाख दोष हा माफ
इही कुजानिक यदि करतेन हम, नाक कान ला खिंचतिस जोर.”
सुनिस गरीबा केंवरी भाखा, कबिया धरिस मया के साथ
कहिथय -“”यदि तुम बिफड़ के जाहव, तंहने मंय हो जहंव अनाथ.
तुमला फोर बतावत हंव मंय – ददा के निकले हे अब प्राण
तुम्हर साथ खेलन नइ पावय, मिट्टी मिलिहय ओकर देह.”
लइका मन सच स्थिति समझिन, रोय धरिन कलपत बोमफार
कतको छेंक लगात गरीबा, तभो बहत आंसू के धार.
मेहरुला बलवैस गरीबा, पर ओहर नइ अपन मकान
दूसर मनसे कर कलपिस पर, ओमन छरकिन ढचरा मार.
दुब्बर बर असाढ़ दू ठक – कारज कइसे निपटाये ।
लइका मन ला उंहे छोड़ के रेंगिस कपड़ा लाने ।।
डकहर नाम एक झन मनसे, जेन हा पहिली रिहिस गरीब
लांघन भूंखन समय ला काटय, दुख अभाव हा ओकर मित्र.
आखिर मं हताश खा गिस तंह, खाय कमाय मुम्बई चल दीस
लगा दिमाग करिस डंट महिनत, तेकर मिलिस लाभ परिणाम.
अड़बड़ रूपिया उहां कमा लिस, सुन्तापुर मं लहुट के अ‍ैस
इहां भूमि घर फेर बिसा लिस, खोलिस एक ठन बड़े दुकान.
जम्मों जिनिस दूकान मं रखथय – ग्राहक रिता हाथ झन जाय
एमां लाभ मिलत मन माफिक, डकहर के धन बाढ़त खूब.
डकहर तिर मं गीस गरीबा, ओहर कर दिस बंद दुकान
लगथय – उहू दुसर तन जावत, हाथ धरे पीताम्बर वस्त्र.
डकहर पूछिस -“”काय बात हे, दिखत हवस तंय खिन्न उदास
तोर काम का हवय मोर तिर, जमों प्रश्न के उत्तर कोन ?”
कथय गरीबा हा दुख स्वर मं -“”अपन कष्ट मंय काय बतांव
मोर ददा हा सरग चलेगे, मुड़ पर गिरिस बिपत के गाज.
जलगस ओहर जग मं जीयत, मंय आनीबानी सुख पाय
लेकिन आज साथ छोड़िस तंह, ओकर बिन मंय होय अनाथ.”
परिस अचम्भा मं डकहर हा -“”तंय बताय हस दुख के बात
बपुरा सुद्धू भला आदमी, सब संग रखिस मधुर संबंध.
पर ए बात समझ ले बाहिर – सोनू घलो आज मर गीस.
एक दिवस मं दू झन मनसे, क्रूर काल के चई मं गीन.
लगथय के दई हा खिसिया गिस, दिखत गांव के हाल बेहाल
अब काकर पर करन भरोसा, गांव हा बदलत हे शमसान.”
“”मोला देव कफन के कपड़ा, मदद करे बर तंय चल साथ
शव ला उठा लेगबो मरघट, एकर बर जरूरत हे तोर.”
डकहर पीताम्बरी देखाथय -“”मोला तंय बिल्कुल झन रोक
एला सोनू के शव रखिहंव, तब मंय हा जावत ओ ओर.
धनवा अउ मंय भाई अस अन, मंय हा ओकर आहंव काम
जानबूझ के अगर बिलमिहंव, धनवा करिहय तनकनिपोर.
अपन काम साधारण निपटा, व्यर्थ खर्च ला झन कर भूल
ढोंग धतूरा छोड़ गरीबा – रकम बचा के भविष्य सुधार.”
करिस गरीबा अड़बड़ करलइ, पर डकहर कपड़ा नइ दीस
आखिर हार गरीबा हा अब, अपन मकान लहुट के अ‍ैस.
होत कोन दुर्बल के मितवा, सक्षम के सहायक संसार
बरसा जल समुद्र मं गिरथय, खेत हा देखत मुंह ला फार.
अपन ददा के शव पर डारिस, चिरहा धोती एक निकाल
बांस कहां खटली बनाय बर, होन चहत अब शव बेहाल.
ओतिर हवय उपाय एक ठक – झींकिस कांड़ लगे ते बांस
खटली बना रखिस ओकर पर – मरे हवय सुद्धू के लाश.
लाश उठाय के क्षण आइस तंह, करत गरीबा एक विचार-
यदि लइका मसानगंज जाहंय, पालक नइ रहिहंय थिरथार.
मनसे मन बिफड़े पहिलिच के, एमां धरिहय तिजरा रोग
बालक मन ला इहां ले भेजंव, दुख ला लेंव मंय खुद हा भोग.,
शंका ला फुरियैस गरीबा, लइका मन ला चढ़गे जोश
जंगी कथय बढ़ा के हिम्मत -“”तंय डरपोकना अस डर गेस.
तंय हा अड़िल जवनहा लेकिन, हिम्मत तोर बहुत कमजोर
तंय हा हमला मदद नइ मांगत, शक्ति हमर तिर मरघट जाय.
सुद्धू कथा कहानी बोलिस, ओकर संग मं हंसी मजाक
यदि अंतिम क्षण मं हम हटबो, हमर ले बढ़ के कपटी कोन !
यदि डर्रात तिंही घर मं रूक, कैची बन इच्छा झन काट
अपन मित्र के थिरबहा करबो, तब करतब हो जहय सपाट.”
छेंकिस खूब गरीबा पर नइ मानिन बालक बाती ।
मरघट जाय तियार होत काबर के जावत साथी ।।
बालक लघु अउ ऊंच गरीबा, ऊपर नीचे खटली होत
शव उठाय बेवसाय बनत नइ, कइसे करन करत हें सोच.
आगू ला बोहि लीस गरीबा, लइका मन तोलगी धर जात
उंकर खांद हा बहुत पिरावत, बदबद गरुहोत हे लाश.
एक दुसर के मदद करत हें, काबर बोझ उठावय एक !
लइका मन के करनी परखव – करत अनर्थ के करनी नेक !
लइका मन ला बुद्धिहीन कहि, एल्हत आत जवान सियान
लेकिन सूक्ष्म दृष्टि से अब सब, करो भला इनकर पहिचान.
जेंन अपन ला कहत सुजानिक, कहत शांतिवादी मंय आंव
आय उहू मन जनता के अरि, जर ला खोद करावत युद्ध.
पर उपकार के बात ला करथंय, पर करथंय पर के नुकसान
याने कथनी अउ करनी मं, अमृत अउ विष ततका भेद.
लइका मन के हृदय हा निश्छल, अगर सबो झन कोमल शुद्ध
दंगा कपट लड़ाई रिपुता, सब दिन बर हो जहय समाप्त.
मरघट पहुंच उतारिन खटली, कोड़त दर दफनाय बर लाश
साबर रापा बिकट बजावत, थक गिन पर नइ होत हताश.
आधा काम होय अतकिच मं, आत दिखिस सोनू के लाश
रूपिया नावत लाई छितत लाश पर, सोनू रिहिस गांव के खास.
टहलू, रमझू झड़ी उहां हें – डकहर सुखी भुखू धनसाय
बन्जू बउदा हगरुकातिक, केजा बहुरा गुहा ग्रामीण.
मानो सब के ददा हा मरगे, कुल्ह के रोवत आंसू ढार
बदल बदल के खटली बोहत, जइसे के श्रद्धालु अपार.
लाश रखाय नवा खटली मं, ओढ़े हे नव उंचहा वस्त्र
फूल गुलाल छिंचाय बहुत अक, सुद्धू अस नइ हे कंगाल.
जहां लाश हा मरघट पहुंचिस, फट उतार नीचे रख दीन
देख गरीबा अउ बालक ला, मनसे मन कुब्बल खखुवैन.
कातिक अउ बहुरा दूनों झन, अ‍ैन गरीबा के तिर दौड़
बहुरा झड़किस – “”अरे गरीबा, काबर करत अबुज अस काम.
लइका होथंय भोला भाला, नइ जानंय फरफंद कुचाल
इहां लाय ओमन ला भुरिया, का कारण देवत हस दण्ड !”
कातिक बोलिस -“”अरे गरीबा, लइका मन ला काबर लाय
अपन ददा के संग एमन ला, चहत हवस दर मं दफनाय !
तंय जानत मरघट मं रहिथंय – रक्सा दानव प्रेतिन भूत
तंय खुद ला हुसनाक समझथस, पर तंय काबर आज बिचेत !
पर के पिला ला धर लाने हस, कते व्यक्ति हा दिस अधिकार
बालक मन ला इहां ले भगवा, वरना तोर अब खुंटीउजार.”
लइका मन ला हटा गरीबा, जोंगत काम अपन बस एक
जब सब मदद ले भागंय दुरिहा, मनसे करय स्वयं के काम.
धनवा डहर बहुत झन मनसे, अपन अपन ले जोंगत काम
सब ग्रामीण मदद पहुंचावत, ताकि कहय धनवा हा नेक.
लकड़ी रच के चिता बना दिन, फिर रख दिन सोनू के लाश
धनवा किंजर करत परकम्मा, लेवत फुस फुस दुख के सांस.
चिता के आगी धकधक बरगे, तब धनसाय दीस मुंह दाग
आंसू गिरा के रोवत धड़धड़ -“”ददा, मोर अब फुट गे भाग.
तंय मोला छोड़त तब करिहय मोर कोन रखवारी ।
छल प्रपंच नइ जानंव कइसे कटिहय विपदा भारी ।।
डकहर किहिस -“”शांत रह धनवा, वाकई आय तोर पर कष्ट
लेकिन मन ला सम्बोधन कर, तभे हमर दुख होहय नष्ट.
सोनू मण्डल भला आदमी, सिरिफ तोर नइ रिहिस सियान
ओहर सब अतराप के पुरखा, मनसे मन हा पुत्र समान.”
केजा घलो सांत्वना देइस -“”जग मं होथय कई इंसान
मगर कर्म के अंतर कारण, यश मिलथय – होथय बदनाम.
पर उपकारी तोर ददा हा, करिस जियत भर भल के काम
तभो ले कतको जलकुकड़ा मन, मुंह पाछू कर दिन बदनाम.
जेन व्यक्ति हा दुश्मनी जोंगिस, सोनू मदद करिस हर टेम
सबके खातिर हृदय साफ झक, नइ जानिस कुछ छल या झूठ.”
मनखे मन मुंह देखी बोलत, काबर के धनवा धनवान
यदि ध्रुव असन सत्य बोलत हें, धनवा हा लेहय प्रतिशोध.
सोनू रिहिस लुटेरा घालुक, ए रहस्य जानत अतराप
कोन घेपतिस मनसे ला पर – पूंजी के भय करथय खांव.
शासन निहू हे धन के आगू, ए बपुरा मन हवंय अनाथ
सोनू के मरना ले खुश हें, बाहिर मन से देवत साथ.
सिरिफ गरीबा हे दुसरा तन, एको झन नइ ओकर पास
खंचुवा कोड़िस मात्र अपन भिड़, पर कइसे दफनावय लाश !
मदद मंगे बर गीस दुसर बल, करूण शब्द मं हेरिस बोल –
“”अब दर मं शव ला रखना हे, लेकिन होवत मंय बस एक.
अंड़े काम पूरा करना हे, दे के मदद करा दव पूर्ण
मोर ददा हा साऊ अदमी, थिरबहा लागे ओकर लाश.”
टपले सुखी बात ला काटिस -“”तोर शर्म कतिहां चल दीस –
“”सोनसाय के जीव का छूटिस, तंय बिजराये बर धमकेस.
टेम सुघर अक आय तोर बर, मिलगे मुफ्त गांव के राज
अपन थोथना इहां ले टरिया, खुद सम्हाल मरनी के काम.”
भुखू कथय -“”तंय हा जानत हस – हम्मन अभी दुखी गमगीन
जब गंभीर बखत हा होवय, कभू भूल झन होय मजाक.
जेन कार्यक्रम एती होवत, ओला छोड़ अन्य नइ जान
तंय हा अपन काम कर पूरा, हमर आसरा बिल्कुल छोड़.”
गंगा हा जब बहत छलाछल, कोई भी धोवत हे हाथ
जमों गरीबा ला दंदरावत, टहलू तक हा मारत डांट –
“”अतका बखत ले खरथरिहा अस, करत रेहेस उदिम बस एक
काम अधूरा तब दउड़े हस, चल अब पुरो अपन सब काम.”
हटिस गरीबा हा काबर के – हिनहर के नइ हितू गरीब
भंइसा बैर छत्तीस गिनती अस, तलगस ले सुर्हराहय जीब.
जब असहाय होय मानव हा, खुद हा करय लक्ष्य ला पूर्ण
खात गरीबा कहां हार अब, देत परीक्षा होय उत्तीर्ण.
यथा ढेखरा खर खर तीरत, लाश ला लानिस दर के तीर
एकर काम देख के हांसत, दूसर तन के मानव – भीड़.
अपन बहा मं खने जेन दर, उही मं घुस के झींकत लाश
अपन ददा ला भितर सुता के, होत गरीबा दुखी उदास.
बाहिर निकल पलावत माटी, धांसत पथरा मं बड़ जोर
दुसर डहर के मनसे मन अब, चलिन उहां के रटघा टोर.
धनसहाय के घर तिर पहुंचिन, धोइन एक – एक कर गोड़
एकर बाद अपन घर जाये, उहां ले रेंगिन मुँह ला मोड़.
शाम के अउ बैठक जुरियाइस, धनवा बोलिस दुखी अवाज –
“”मंय असहाय अनाथ होय हंव, मोला परिस बज्र के मार.
अड़बड़ जहरित रिहिस बाप हा, कुब्बल उदगरे ओकर काम
ओकर आत्मा पाय शांति सुख, एकर बर मंय करंव उपाय.
लेकिन कते काम ला जोंगव, मोर दिमाग उमंझ नइ आत
नेक सलाह देव तुम मिल जुल, सुलिन लगा के होवय काम.”
सुखी कथय -“”तंय राज ला करबे, अपन बाप के धन में।
ओकर आत्मा शांत होय, तइसे कारज धर मन में ।
मंय उत्तम सलाह देवत हंव – तंय खवाय “भंडारा’ खोल
मनसे जहां कलेवा खाहंय, तृप्ति अमर गाहंय जस तोर.
मृतक के आत्मा तुष्ट हो जाहय, भटकत आत्मा तक हा शांत
यद्यपि होवत नंगत खरचा, पर होवत हे सद उपयोग.”
बन्जू कथय -“”असामी अस तयं, भरे बोजाय चीज घर तोर
तब हम तोला उम्हयावत हन – तंय हा निश्चय कर परमार्थ.”
यद्यपि हगरुहा खुद कंगला, पर असहाय के छोड़त साथ
करत गरीबा के जड़ खोदी, ताकि स्वयं उठ जावय ऊंच –
“”अन्न खाय नइ पाय गरीबा, कंगला हाथ कहां जस – काम
करत अधर्म पुत्र पापी हा, पर सुद्धू हा गिरिहय नर्क.”
धनसहाय स्वीकार लीस सब -“”मंय मानत हंव तुम्हर सलाह
मंय भण्डारा खोल के रहिहंव, खाय पेट भर सब अतराप.
मगर कार्यक्रम हे बड़ भारी, सफल बनान सकंव नइ एक
एकर बर तुम देव आसरा, मंय हा चहत तुम्हर सहयोग.”
डकहर बोलिस -“”तंय निफिक्र रहि, गिरन देन नइ इज्जत तोर
अगर कार्यक्रम मं कुछ गल्ती, हम सब मनखे तक बदनाम.
दस झन के लकड़ी के बोझा, एक के मुड़ पर कभु नइ जाय
तोर काम ला सफल बनाबो, तोर बोझ हा हमरो बोझ.”
बातचीत मं टेम खसक दिस, कब ले खलस रेंग दिस शाम
बइठक उसल गीस तंह रेगिन – मनसे मन हा खुद के धाम.
पल – पल बढ़त रात के फंदा, बाहिर नइ निकलत इन्सान
अपन प्रथम पारी निपटा लिस, कर अवाज कोलिहा परधान.
बिरबिट करिया चारों मुंहड़ा, डर मं सांय सांय अतराप
दूझन जीव गाँव ले निकले, सुद्धू अउ धनवा के बाप.
जे मनसे के नींद हा परगे, सपना मं डर के बर्रात
ओकर तिर मं एकोझन नइ, मगर झझक का का गोठियात.
बहुरा डर मं दुबक के सोये, भूंकिन कुकुर खूब ए बीच
हवलदार बुतकू केंवरी ला, बहुरा हा कर दीस सचेत-
“”टोनही मन हा मंतर मारिन, सोनू सुद्धू पर अजमैन
ओमन ला फिर जीवित कर दिन, धर लिन दुनों कुकुर के रूप
ओमन ला भगाय झन सोचव, तुम झन निकलव बाहिर पार
अगर बात के करत उदेली, तुम पर आहय बड़े बवाल –
सोनू अउ सुद्धू दूनों मिल, रूप बदल के बनिहंय बाघ
तुम्हर प्राण लेहंय थपोल झड़, तंहने बाद मं खाहीं मांस.”
सोय झड़ी हा ओढ़ के चद्दर टकटक देखत आंखी ।
ओहर भय मं लद लद कांपत चुप हे मुंह के बोली ।।
तभे सामने ओहर देखिस – ललिया आंख खड़े सोनसाय
झड़ी कठिन मं बक्का फोरिस -“”मालिक, तोर सदा मंय दास.
बइठक अउ पंचायत होइस, तोर पक्ष मंय भिड़ के लेंव
तोर ले निहू रेहेंव हमेशा, तोर विरूद्ध कभू नइ गेंव.
धनवा ले बाढ़ी मांगे हंव, ओकर ऋण बइठे मुड़ मोर
मंय हा ओला खतम पटाहंव, मोला जिये के अवसर देव.”
थोरिक बाद झड़ी हा देखिस, आगू कोती आंख नटेर
मगर उहां पर एको झन नइ, वातावरण हवय सिमसाम.
ओढ़िस झड़ी हा तुरते चद्दर, मुड़ ले गोड़ रखे हे ढांक
मन मन मं प्रार्थना करत हे – हे प्रभु, बचा मोर अब जान.”
भगवानी तक डर मं कांपत, आगू तन देखत टक एक
तभे एक ठक आकृति उभरिस – सुद्धू खड़े हवय भर क्रोध.
भगवानी रोनहू बन बोलिस -“”लड़िन गरीबा अउ धनसाय
तंहा गरीबा फंस जावय कहि, मंय हा देंव गवाही झूठ.
मंय हा गल्ती गजब करे हंव, पर ए डहर भूल नइ होय
हाथ जोड़ के माफी मांगत, मोर कुजानिक ला कर माफ.”
लघु शंका बर निकल पात नइ, मुश्किल होत रूके बर वेग
तब ले मनखे सुतत कलेचुप-मुड़ ऊपर चद्दर ला लेग.
दू झन वृद्ध गांव मं पहुंचिन, दीन अवाज मंगे बर भीख-
“”हम भिक्षुक अन – भूख मरत हन, हमला देव खाय बर भात.”
उंकर अवाज ला गुहा हा सुन लिस, तंह कैना ला करिस सचेत –
“”सोनू अउ सुद्धू एं एमन, धमकिन इहां बदल के रूप.
ओमन अब बन गीन भिखारी, मांगत भीख गली हर द्वार
भिक्षा दान करे बर जाबो, ओमन हमला दिहीं दबोच.
मरघट तक ले जाहंय झींकत, जिंहा अभी के उंकर निवास
पुनऊ थुकेल झझक झन जावंय, दूनों ला रख बने सम्हाल”
हम कतको शिक्षित ज्ञानिक हन, पर मजबूत अंधविश्वास
जलगस नइ विज्ञान के शिक्षा, छू मंतर नइ भ्रम के भूत.
हर दरवाजा गीन वृद्ध मन, पर कड़कड़ ले बंद किवाड़
भूख मं आंटीपोटा बइठत, कंस करलावत इनकर जीव.
आखिर एक मकान पास गिन, बइठ गीन होके लस पश्त
बुड़ुर बुड़ुर का का गोठियावत, एक दुसर के बांटत कष्ट.
जब देखिन अब जीव हा छूटत, मुंह ला फार दीन आवाज-
“”मंगन मन ला देव खाय बर, वरना पटिया मरबो आज.”
बेंस खोल के अ‍ैस गरीबा, पूछिस -“”रथव कते तुम गांव
परगे बिपत का बोम मचावत, जाय चहत हव काकर छांव ?”
उनकर हाल गरीबा देखिस -“”अंधरा एक – दुसर विकलांग
कुष्ट रोग हा छाय दुनों पर, घिनघिन कपड़ा लटके देह.
अंधरा हवय जेन डोकरा हा, अपन रखे हे “मंसा’ नाम
जेन वृद्ध टेंग टेंग लंगड़ावत, ओकर नाम “पुरानिक’ जान.
किहिस पुरानिक -“”हम मंगन अन, कंगलई करत हमर पर राज
मुंह चोपियात पिये बिन पानी, पेट हा कलपत बिगर अनाज.”
लाला लपटी देख गरीबा, दया देखात – मरत हे सोग
पर सुद्धू मरगे तेकर बर, काठी छुआ अशुद्ध समान.
शंका ला सुन मंसा बोलिस -“”अपन चोचला रख खुद पास
शुद्ध अशुद्ध ला हम नइ मानन, काठी छुआ ला रखथन दूर.
एला अगर मान्यता देबो, ककरो इहां सकन नइ खान
तब तो हमर जीव तक जाहय, तन असक्त पर बहुत अजार.
जे सम्पन्न शक्ति धर – सक्षम, चलथय नियम धियम ला मान
उंकर बुराई कोन हा करही, बेर हा हरदम बर बेदाग.”
अंदर लान सियनहा मन ला दीस गरीबा बासी ।
दूसर मन दुत्कारिन लेकिन खुद काबर दे फांसी ।।
बड़े कौर धर खात वृद्ध मन, कभू खाय नइ तइसे लेत
बुड़त सइकमा मं डाढ़ी हा, तेकर घलो कहां कुछ चेत !
कथय गरीबा -“”देव ज्वाप तुम – काबर किंजरत पर के द्वार
तुम्हर सहायक जेन व्यक्ति हे, का कारण उठाय नइ भार. ?”
किहिस पुरानिक -“”का बतान हम – यद्यपि हवंय हमर संतान
लेकिन कुष्ट रोग के कारण, करथंय घृणा-भगावत दूर.
पुरबल कमई के कारण हमला, घृणित रोग हा सपड़ा लीस
हम ए बखत रतेन निज छंइहा, किंजर के खोजत बासी – छांय.”
किहिस गरीबा -“”कोन हा कहिथय, पाप के कारण कुष्ठ अजार
भ्रम के बात कभू झन मानो, एकर होथय खुंटीउजार.
कुष्ठ रोग ला खतम करे बर, निकल गे हावय दवई प्रसिद्ध
ओकर सेवन करो नियम कर, तंहने तन हो जहय निरोग.”
किहिस पुरानिक -“”बुरा मान झन – तंय बतात हस बिल्कुल झूठ
ज्ञानिक ग्रंथ जेन ला बोलिन, उंकर तथ्य पर मारत मूठ.
पर तंय हा विद्वान बनस नइ, तंय हमला भरमा झन व्यर्थ
जउन हा सच ते दिखत हे संउहत, कुष्ठ रोग नइ होय समाप्त.”
मंसा अपन तर्क ला रखथय -“”मानव पास शक्ति भण्डार
बात असम्भव रहिथय तेला, संभव बर कर देत प्रयास.
धन हा सम वितरण नइ होवय, रहिथंय दीन धनी इंसान
तीर मं तुक्का लग जावय कहि, करथंय समाजवाद के बात.
कुष्ठ रोग हा अजर अमर हे, ओला खतम करत हे कोन
मगर रोग हा मिट जाये कहि, मनखे सक भर करत प्रयास.
एकर ले नइ होय निराशा, जीवन जियत आस के साथ
दूध समुद्र होय नइ जग मं, तभो ले ओकर पर विश्वास.”
कई ठक तर्क गरीबा रख दिस, तभो वृद्ध मन फांक उड़ैन
ओंड़ा आत पेट हा भर गिस, हाथ अंचोय बर उदिम जमैन.
अन्न के नशा छपाइस तंहने, सोय चहत हें दुनों सियान
बोलत हवय गरीबा टुड़बुड़, पर एमन देवत नइ ध्यान.
सिरिफ गरीबा करत जागरण, ओकर मन मं चलत विचार-
“अब मंय हा मनमरजी करिहंव, भल दुसर बोलंय गद्दार.
सब के मान चलत आवत हंव, लेकिन मिलिस मात्र नुकसान
ओमन चहत गरीबा भागय, बेच के अपने माल मकान.’
मनसे जब निराश हो जाथय, या सब डहर ले दुख – बरसात
ओहर मन मं अनबन सोचत, क्रोध देखात – करत आक्रोश.
कतका बखत आंख हा लग गे, कहां गरीबा जानन पैस !
ओकर सुते आंख खुलथय जब, शासन सुरूज देव के अ‍ैस.
लेथय टोह वृद्ध मन कोती, उनकर छैंहा मिल नइ पैस
घर ला जांचिस जहां गरीबा, कतको जिनिस नदारत पैस.
घर ले निकल गरीबा खोजिस, दूनों वृद्ध ला नंगत दूर
लेकिन उंकर मिलिस नइ दउहा, आखिर विवश आत हे लौट.
तभे गुरुझंगलू हा मिल गिस, ओहर रख दिस एक सवाल-
“”तंय फिफियाय हवस का कारण – करत हवस तंय काकर खोज !
मनखे दुख ला कभु बलाय नइ, दुख आ जाथय तब परेशान
तोरो कोई जिनिस गंवा गिस, तभे दिखत अड़बड़ परेशान ?”
कथय गरीबा -“”तंय भांपे हस सोला आना ठौंका ।
ओकर कतका चर्चा छेड़न इहां रोज दिन घाटा ।।
मगर रात के घटना ला सुन, अ‍ैन हमर घर दू झन वृद्ध
उनकर नाम पुरानिक मंसा, कुष्ठ रोग के रिहिस मरीज.
ओमन अपन विचार ए राखिन – पुरबल जनम होय जे काम
ओकर फल ए जनम मं पावत, ईश्वर हा देवत हे दण्ड.
पर मंय उंकर बात फांके हंव – कुष्ठ रोग हा दैहिक रोग
खतम करे बर औषधि बन गिस, मोर वाक्य पर कर विश्वास.
पर डोकरा मन अड़बड़ अंड़ियल, कैची अस काटिन सब गोठ
मंय समझाय करे हंव कोशिश, मगर बोहा गिस जमों प्रयास.”
झंगलू हा समझाय बर कहिथय -“”एमां बुजरूक के नइ दोष
जे मान्यता पूर्व ले आवत, ओहर तुरूत खतम नइ होय.
भूत प्रेत जादू अउ टोना – एमन मात्र काल्पनिक चीज
यदि हम इंकर हकीकत कहिबो, हमर बात पर हंसिहंय लोग.
बैगा तोला टोनहा कहि दिस, मनखे मन कर लिन विश्वास
धन तो दुधे उहां पर पहुंचिस, वरना तंय खाते कंस मार.”
“”वाकई मं हम मुंह मं कहिथन – भूत प्रेत बिल्कुल नइ होय
खुद ला वैज्ञानिक बताय बर, रखथन एक से एक प्रमाण.
लेकिन मन मं स्वीकारत हन – जग मं होथय प्रेतिन प्रेत
तंत्र मंत्र जादू अउ टोना, इंकर शक्ति के रहत प्रभाव.”
एकर बाद गरीबा हेरिस, शुद्ध सोन के चूरा एक
ओहर झंगलू गुरुला बोलिस -“”मोर बात ला सुन रख ध्यान-
मोर ददा हा बचा के राखिस, इहिच सोन के चूरा एक
कतको कष्ट झपैस हमर पर, ओला नइ बेचिस कर टेक.
ददा किहिस के जब मंय मरिहंव, बेच देबे तंय चूरा मोर
श्रद्धा संग गत गंगा करबे, तोर उड़ाहय इज्जत – सोर.
पर चूरा ला तुमला देवत, ले दव पट्टी कलम किताब
ओला दीन छात्र ला बांटव, ओमन पढ़ लिख शिक्षित होय.
भूल करंव नइ खात खवई ला, कोन जाय अब तीरथ धाम
अइसी के तइसी मं जावय – जमों खटकरम गंगा धाम.”
अतका किहिस गरीबा हा अउ, अपन वचन ला तुरूत निभात
झंगलू ला चूरा ला देथय – नगदी दान होत महादान.
झंगलू किहिस -“”होत हे अक्सर – मनखे करत घोषणा बीस
सत्तर ठक आश्वासन देवत, मदद करे बर अस्वीकार.
पर तंय लबरा बादर नोहस, जेन बताय करे हस काम
दीन छात्र मन मदद ला अमरें, पढ़ लिख के बनिंहय गुणवान.”
झंगलू हा चूरा ला रख लिस, एकर बाद छोड़ दिस ठौर
अब ओ तन के कथा बतावत, जेतन होत काम हे और.
सब अतराप के मनखे मन हा, धनवा घर मं जेवन लेत
बपुरा मन हा सदा भुखर्रा, पर अभि पाय सुघर अक नेत.
पेट तनत ले झड़किन कोंहकोंह, हिनिन बाद मं धर के राग
बोकरा के जिव जाथय लेकिन – खबड़ू कथय अलोना साग.
सोचिन के जब सोनसाय हा, पर धन लूट बनिस धनवान
हम्मन बढ़िया पांत पाय हन, काबर छोड़न मूर्ख समान !
यथा सिन्धु के कुछ पानी ला, झटक के खुश हो जथय अकाश
इसने एमन थोरिक उरका, लेवत बपुरा सुख के सांस.
मुढ़ीपार के पुसऊ निवासी, बन्दबोड़ रमझू के गांव
सुन्तापुर के वृद्ध फकीरा, भण्डारा मं भोजन लीन.
पुसऊ हा दूनों झन ला बोलिस -“”धनवा करिस खर्च कंस आज
सब अतराप के नर नारी मन, ओकर घर मं जेवन लीन.
धनसहाय ला पुण्य हा मिलही, सबो डहर ले यश जयकार
सोनू के आत्मा नइ भटकय, ओहर करिहय स्वर्ग निवास.”
रमझू कथय -“”देख झन पर तन, तंय हा बता स्वयं के हाल
धरमिन के शादी रचेस तब, तंहू करे हस अड़बड़ खर्च.
खैन बराती पेट के फूटत, समधी सजन खैन पकवान
हम रहि गेन बाट ला जोहत, मिठई कलेवा कुछ नइ पाय.”
पुसऊ हा मुसका दीस ठोलना -“”जब धनसाय निमंत्रण दीस
तंय भण्डारा मं उड़ाय कंस, मगर अभी तक खाली पेट.
ठीक हे भई, अभी बचे निमंत्रण, तंय हा पहुंच गांव मुढ़ीपार
तोला उंहचे खूब खवाह