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वृत्तांत (10) : जिनगी ह पानी के, फोटका ये फोटका

Kosariyaपुनिया दादी अउ सफुरा आज असनान्दे बर पुन्नी घाट गेहे।पुन्नी घाट ल कोन नइ जानही ? राज-राज के मन इंहा सिरपुर मेला देखे बर आथे। महानदी के खड म बने हे ,बडे-बडे मंदिर हे,घंटा घुमर बाजत रइथे, पूजा- पाठ करइया मन के जमघट लगे रहिथे।दरस करइया मन के रेम लगे रहिथे ।मंदिर म हार-फूल,पान-परसाद,मेवा-मिष्ठान अउ पइसा-कउडी,नरियर के बडे-बडे भेला चढे रहिथे । पुन्नी घाट म तो पंडा पुजारी मन कोरी खइरखा ल भरे पडे रहिथे । कोनो करत हे असनान, ध्यान कोनो करत हे , पाठ, पूजा, कोनो करत हे, दान पून, अउ तुरते तरंत हो जा कोनो बइठे हे, पांव परवावत कोनो करत हे,हूम, धूप, आरत त कोनो सुनावत हे ,ज्ञान-बात।
कोनो लगावत हे टीका माथ नदिया के पारे-पार म मंदिर बने हे ,अउ खडे-खड म, नहाय धोय बर, ये बांही से लेके ,ओ बांही तक चर-चर ल पचरीे-घाट बने हे ।बडे मंदिर के आघू म बाबू पिला घाट, मंझोत म पुजारी घाट अउ खालहे म माईलोगिन घाट बने हे।इही मेर, हर बच्छर मेला भराथे ।सब पुन्नी नहाथे,तेकरे सेती येला पुन्नी घाट कहे जाथे ।बर ,पीपर अउ लीम के जंगबड-जंगबड रूख हे । सब असनान करके पानी म मूड सुद्धा बूड- बूड के ,सरधंग ल निकल के , पानी चुचवात ,इही रूख म पानी रूतोवत रहिथे ,मौली सूंत लपेटत रहिथे ,पियंर पियंर चाउर अउ हार-फूल चढावत रहिथे।पंडा-पुजारी मन इंकर माथा म तिलक लगावत रहिथे । मुरवा म येन बद्धो बलिराजा सत्यवादी दानेंद्रो महाबला,तेनात्वां प्रीत बंधनामी रक्षेति माचल: माचल: कहि-कहि के मौली सूंत बांधत रहिथे ।, पान- परसात देवत, दान-पून, चढौत्री बर गरियावत रहिथे।जइसे जइसे पूजा-पाठ कराथे ,सबके अलग-अलग दाम बताथे ।पाच हजार, दस हजार ,एक सौ एक ,जादा नही ते थोरहे , इंक्यावन,इक्कीस या ग्यारह तो चढाय ल पढही ,नही ते झंझेटही,काबर आय हच, कहि के गुडेरही।छोटे बडे सब इंहा अइसने मुडावत रहिथे। इही घाट म, आमा अमरइया हे ,जामुन ,बिही ,छिता फर के बगइचा हे ।फर ,फरहरी खाय बर कोइली ,मैना ,पडकी ,सुआ ,परेवना सब आथे ।किसिम किसिम के सूर ताल म गीद गाथे ,आनी बानी के आवाज सुनाथे ।मनखे कस बोली बतरस घलो निकालथे । कान दे के सुने म ,गजब नीक लागथे ।कोइली के कुहू- कुहू बोली अब्बड सुहाथे।कान म गघरा भर शरबद ल ढरका देहे कस लागथे ।
पुनिया दादी अउ सफुरा नाहवत हे ,धोवत हे ,नतनीन बुढीन दूनो गुठियावत हे।नदिया भर पानी छल-छल ल दिखत हे ।सूरूज उये बर ,अभी ललियाय हे ।त नदिया म पानी ह अइसे लगत हे ,जइसे लाली लुगरा म ढकाय हे ।ऊपर घठौंदा म नाहवत ,नवा दुलहिन के गंवना के लाली लुगरा ह ,बोहाय हे ।बिहनिया, फुरहुर-फुरहूर पुरवइया चलय ,त नदिया के उठत लाहरा,हाथ भर ओरमा के मुंड ढांके ,सधे पांव ,लहसत रेंगत लाली बिजुरिया के उडत अचरा कस लागय ।मछरी उछल-उछल के जब कूदय अउ पानी म छल्ल ……….. छल्ल…….के आवाज आवै ,तो कोनो बेल बेलहा ,गोटी मार के इशारा करत कस लागय। लाहरा के उडत फउव्वारा, ह जब तन ,बदन म छिटकय, त अंग- अंग म सरसरी आ जाय । दिन-दुखिया के मन घलो ,इंहा पल भर म दुख बिसरा के मन भौरा कस गुनगुनाय लग जाय। लइका ,सियान सब नाहवत हे ।कोनो हाथ ,गोड लगरत हे ,कोनो कपडा-लत्ता कांचत हे,कोनो धोवत हे, पानी म खलहारत हे ,झटकारत हे , कोनो झुखोवत हे ।कतनो ,दुरिहा-दूरिहा म जा जा के तउरत हे।कतेक गहिरा हे ,कहिके बूड-बूड के अपन गोड म थाह लेवत हे,हाथ उपर उठा उठा के पानी ल टटोवत हे ।कोनो मेर पोरिस भर ,कोनो मेर टोंटा भर, कोनो मेर थाह घलो नइ मिलत हे ।ये सब ल देख-देख के सफुरा घलो अपन लइकई पन के दिन ल सुरता करत हे अउ अपन दादी संग असनानदत- असनानदत मुहा-चाही गुठियावत हे । सफुरा ह कहिथे … दादी हमन, सब जवंरिहा जवंरिहा इही बगइचा म छुवउल खेलन। आमा,चिरईजाम के फिलिंग फिलिंग म चढ-चढ के कांचा-पाका फर ल टोरन।नदिया खड कुती ओरमे डारा मन म चढ – चढ के सब जझरंग-जझरंग पानी म कुदन।अउ चित्ता बोहावत- बोहावत खालहे घडौंधा म उतरन। अउ पानी म तउर-तउर के एक दूसर ल छुवन।
इही बीच ,बचाव-बचाव कही के कोनो चिहोर पारत हे।आघू घठौंदा ल एक लइका, नदिया के धारे धार म बोहावत हे । धंय बूडत हे , धंय उफलत हे,उबूक-चुबूक होवत हे , बस ! सब, बचाव- बचाव चिल्लावत हे ।जा के निकालन कहिके ,ककरो दम नइ होवत हे। लइका बोहावत हे -बोहावत हे ,पुजारी घाट आगे।सब पुजारी ,पानी तीर घाट म आ के,बेर उत्ती नदिया पूजा करत हे । बचाव-बचाव के आवाज ल घलो अनसुना करत हे ।
सफुरा के हिरदे म ,ये आवाज ह रही नइ गिस। लुगरा ल कछोरा भीरथे अउ कस के बांधथे, चभरंग ल कूद के एक बुडाना तउरथे ,त ओ लईकेच मेर अभरथे ।लइका के चुंदी ल ,एक हाथ म पकड के अउ एक हाथ म तउरत, खींचत घठौंदा मेर लाथे। त देखथे, बिरजू पुजारी के बेटा, ये तो सिचरण ये, कान म बात परन नइ पाय, ये सब दउड के आगे।पुजारी के बेटा ये, पुजारी के बेटा ये ,कहि कहि के घाट अउ पारा ,मोहल्ला तक बात फैल गेे । दूझन ,चिंगी चांगा उठा के ऊपर मंदिर म,ला के सोवाथे।सिचरण बिसुद्ध पडे हे ,कोनो हाथ ल हिलावत हे , कोनो गोड ल ,कोनो गाल ल थपकियावत हे ,कोनो चिमोटत हे, अंगरी खोटत हे । चिट-पोट नइ करत ये ,सब हिलाथे-डोलाथे ,ओ तो बद परे हे।का करन ? का नइ करन ? ककरो समझ नइ आवाते ।बडे-बडे पंडा पुजारी अउ इंहा बने हे ज्ञानी ,ध्यानी ककरो मगज ह नइ पूरत ये। कोनो काहत हे , भगवान रिसाय हे। कोनो काहत हे , नदिया खिसियाय हे। कोनो काहत हे , जरूर इंहा पाप ह समाय हे ।कांही न कांही अधरम काम होय हे ।तेकरे सती एक बाम्भण के लइका ऊपर संकट आय हे ।बिरजू पुजारी अउ पुजारिन अपन बेटा ल मूर्छा परे देख के ,छाती पीट-पीट के रोवत हे । मोर….. शिचरण बेटा….. ……मोला छोड के कइसे चल देयच रे ………. । बने नहाय बर आय रहे बेटा …….आवत हंव कहिके काबर मोला ठग देयच…….. रे……।मोर बाढे पोढे राजा बेटा ……..काबर गुठियावत नइयच …………रे ……..।रोटी दे…. कहिके काबर काहत नइयच रे ।यें ….हें….हें……हें …….।कथ कथ के पुजरनीन रोवत हे।बिरझू पुजारी घलो घोघ पार पार के रोवत हे ,मोर छोटकन दुलरवा बेटा रे…।अभी अभी जनेऊ संस्कार कराये रहेंव बेटा …..। मंदिर के पूजा करही काहंव बेटा, तेंह मोला छोड के चल देयच रे……. ।मै का करंव बेटा ……..।पुजारी घलो पढ पढ के रोवत हे ।मने मन म कंदरत हे।
सफुरा ह देखथे…. शिचरण ओइसनेच परे हे।महतारी , बाप रोवत धोवत हे।सब जुरियाय हे , ककरो आंसू धर-धर चुहत हे ,कोनो सुस्कत हे ,।मत रो ,पुजारी मत रो कहिके, कतको धीरज बंधवत हे । सब पंडा,पुजारी मन पूजा , पाठ ,यज्ञ ,हवन के तियारी करत हे । सब गांव भर के ल,नदिया आरती बर बुलावा भेजे हे।सबआरती धर-धर के पुन्नी घाट म,सकला गेहे । सफुरा ह सोचथे…. अइसना म ,तो एकर जाने ह ,चले जाही ।घुंचौ घुचौं ….मै जात हंव, हमर यहां के अमरू के ददा ल बुला के लाहू , कहिके कपडा-लत्ता चुंदी-मुडी फिले के फिले हे, झरफर- झरफर ,दउडत-दउडत घर जाथे । घासी ह ,अपन मयारू हीरा मोती बइला ल दाना-पानी खिलावत हे। हिरण के भी सेवा-जतन करत हे । हफरत-दउडत आवत सफुरा ल, देख के घासी ह कहिथे ….. का होगे ओ सफुरा ? का होगे ?अतेक काबर हफरत आवत हच ओ ?सफुरा के हफरई म ,बक्का घलो नइ फूटत ये ……नदिया …..ओ नदिया ….म , मै हा ,…एक झन बूढे लइका ल….. निकाले हंव ।घासी कहिथे ……आंय ? पानी म बूड गे रहिस हे ।सफुरा ह कहिथे …. हां , चिट-पोट नइ करत ये ,चित्त परे हे ।अतना सुनत घासी चल- चल,चल-चल, मै जात हंव कहिके… जइसने के ओइसने छोड देथे ।घासी के संगे संग सफुरा उही पांव लहुट जथे ।त देखथे…… उंहा पुन्नी घाट म अब्बड भीड लगे हे ।ओकर महतारी, बाप ,पूरा परवार रोवत हे ।देखइया मन के जीव ह ,घलो कलपत हे । कतनो पथरा के थाती होही ओकरो आंसू बोहावत हे अउ फफकत हे। मंदिर म ,पुजारी मन यज्ञ-हवन, पूजा-पाठ करत हे ।जोर जोर से मंत्र पढत हे यज्ञ मे स्वा: ….स्वा:…. कहि के हवन करत हे ।नदिया पूजा म गांव भर के आदमी सकलाय हे । सबके हाथ म ,थारी नरियर पान सुपारी रख के दिया जलाय हे । पुजारी मन आरती गावत हे ,सब आरती घुमावत हे ।दूध ,दही ,घी अउ हार, फल, फूल, सोना ,चांदी के गहना ल घलो महानदी मइया के जलदेउती दाई म ,समर्पण करके बोहवावत हे ।
घासी अउ सफुरा ,थोरकुन घुंचौ घंचौ कहिके भीड के भीतरी म चल देथे अउ सब ल चुपव-चुपव ,मत रोवव, कांही नइ होवय, ये ,बने हो जही ,कहि के चुप कराथे ,धीरज बंधाते ।घासी अउ सफुरा मिल के सिचरण ल उबडी कर देथे ,मुंह कुती उतारु अउ गोड कुती चढाउ रख के पीठ ल मसक थे ।सिचरण के नाक, मुंह से घल-घल ,घल-घल पानी निकलत हे ।दू ,चार ,बार अइसने मसक-मसक के पेट म जतना पानी समाय रहिस ,सबे ल निकाल लेथे ।अब सिचरण ल, बराबर जगा म सोवा थे , चित्ता कर देथे अउ छाती ल थपथपाथे , थोरकुन मसकथे ,छोडथे ,मसकथे ,छोडथे, चार ,छै ,बार अइसने मसके छोडे से सिचरण के सांस चलना शुरू हो जथे । देखते ही देखते सिचरण के होंस आ जथे , आंखी खोल लेथे ,हाथ ,गोड हिलाय , डुलाय लग जथे ।सिचरण के दाई , चददा फेर अपन छाती म सपटार- सपटार के रोवत हे…….तेंह कइसे होगे रहे बेटा….,.।काबर चिटपोट नइ करत रहे …..। मोर राजा बेटा रे…. ……।अब खुशी के आंसु बोहावत हे । अउ दूनो, सिचरण के दाई-ददा, सफुरा अउ घासी के पांव तरी डंडाशरण गिर जथे अउ कहिथे ……मोर बेटा ला नवा जीवन देहच । तें ह हमर लिए संउहत भगवान अच । तेंह नइ रहिते ,त मोर बेटा ल ,कोनो नइ बचा सकतिच ।मोर बेटा के जीव ह ,निकल गे रहिस। ओ ला लहुटा के ला देयव, सच म ये रूप धर के भगवानेच ह आ गे हव । आवव सब मिल के आरती करव कहि के बिरझू ह सब ल बुला लेथे अउ घासी के ही पूजा, पाठ, आरती करे लग जथे । घासी अइसना मत करव….अइसना मत करव कहि के बहुत बरजथे, फेर ओ मन, नइ मानय, आरती करे लग जथे ।
सिचरण ल होस आगे , सुनते साट ,सब पंडा पुजारी दोर दीर ल इही मेर आ जथे ।अउ देखथे…… बिरजू महराज अउ सब काकर पूजा-पाठ, आरती करत हे ।सब पंडा-पुजारी मन “ये सब का होवत हे ,बंद करौ “कहि के जोर से ललकारथे तभो ल बंद नइ करय ।तब पंडा पुजारी मन बोलथे…. देख बिरझू महराज, हमन सब मंदिर म अउ जलदेउती दाई के अतेक पूजा, पाठ, यज्ञ ,हवन ,आरती करे हन ,दूध ,दही, घी ,फल ,फलहरी ,सोना ,चांदी के गहना घलो ये नदिया मइया ल समर्पित करे हन ,जेकर से खुश हो के तोर लइका ल नवा जीवन दीसे ।अउ तेंह ये कोन मइनखे के आरती करत हस।घोर कलजुग आगे, घोर कलजुग । महानदी मइया की जय, महानदी मइया की जय। जय ,जय जयकार करे लगथे ।
बिरझू पुजारी के छाती म इंकर बात ह अगिन बाण कस लग जथे ,आठो अंग म भर भरी चढ जथे। अपन आंखी ,कान ल पोछत खडा होथे अउ मुंह ल आगी उछरत कहिथे ……. तुंहर, पूजा पाठ से मोर बेटा ह ठीक होय हे ,? तुंहर आरती घुमाय से जिए हे ? दूध, दही ,घी ,ल ये पानी म रूतोय से मोर बेटा बने होय हे ? फल ,फूल ,हार अउ सोना ,चांदी बोहवाय से मोर बेटा ठीक होय हे ? हूम ,धूप ,यज्ञ ,हवन करके धूंगिया उडाय से मोर लइका बने होय हे ? नही …।मोर बेटा तो ठीक, ये तुंहर सब के आघु म ,खडे संउहत, जियत भगवान के परसादे होय हे।अगर तुंहरे आसरा म रहितेंव त मोर बेटा ल आज नइ पातेंव ।येकर जीव तो उडा गे रहिस । मोर बेटा ल बचाय बर सरग से ही मनखे रूप म उतरगे।अउ मोर बेटा के जीव ल लहुटा के ला दीस ।मरे आदमी ल जिया दीस । चमत्कार कर दीस ।मोर बेटा ल नवा जीवन दे दीस ।सब जय कारा लगाय लगथे …. बाबा घासीदास की जय , बाबा घासीदास की जय , बाबा घासी दास की जय घासी सब ल शांत करावत कहिथे …….ये लइका ल ,जो नवा जीवन दान मिले हे ,ओ ,ह ,न महानदी मइया के पूजा-पाठ से मिले हे, न आरती ,हूम ,धूप से ,न दूध ,दही, चढाए से मिले हे ,न फल ,फूल ,हार, पहनाए से ,न सोना ,चांदी के गहना अर्पित करे से ,न सरग से कोनो भगवान उतर के ठीक करे ये ,न दुनिया म ऐसे कोई चमत्कार हे ,जे ह मरे हुए प्राणी ल जिंदा कर सकय। बाम्भण भले ,दुनिया ल पथरा के मूरत म प्राण प्रातिष्ठा के नाव म, ढोंग पाखंड करथे ,अगर अइसना कोई मंत्रतंत्र होतिच, त बाम्भण मन अपन दाई ददा ल, मरतिच ,त प्राण प्रतिष्ठा करके फेर जिंदा कर लेतिच । ये लइका के जान तो ,एक शरीर के ज्ञान के बिधि से बचे हे । अगर थोरको बिलम हो जतिच,अउ मै जो ,ओ पेट म समाय पानी ल ,नइ निकाल पाय रहितेंव ,त तुमन लाख उदीम करतेव ,पूजा, पाठ ,यज्ञ, हवन दान, पुन ,चढावा देतेव ,कोनो काम नइ आतिच । अउ ये लइका के जान ह नइ बाचतिच ।हमर सब के जिंनगी ह पानी के फोटका,ये फोटका।हवा हे ,त फोटका फूले हे ,फोटका फूटगे ,हवा निकलगे ।हवा के ही खेला हे ।ये जिंनगी म ,हवा के ही खेला हे । पूजा ,पाठ ,ढोग ,पाखंड म मत बूडे राहव ।ज्ञान सीखव, ज्ञान।ज्ञान के बिना सब कुछ अंधियार हे । जिंनगी ल सुख से जिए बर ,सब जिनीस के जनकार होवव , जनकार …….।हर दुख ,सुख से ,तभे रही पाहु, खबरदार ……..! खबरदार ! सब जयकारा लगाय लग जाथे………
बाबा घासी दास की जय बाबा घासी दास की जय !

जय सतनाम!

भुवनदास कोशरिया
भिलाईनगर
9479059126

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वृत्तांत-9 मोला तो बस, येकरेच अगोरा हे

Kosariyaटूर- बुर गुठियावत हे।घासी के आंखी म नींद नइ आवा ते।काक सती ? तेला, सफुरा ह ,अपन दादी ल बतावत हे। बाहरा डोली म, होय घटना ल सुनावत हे। मछरी ह ,तो कब के मर गे हे ।अठुरिया के ह, पंदरही होगे हे।अंधियारी पाख ह पहा गे हे, अंजोरी लग गे हे ।फेर दादी ! तोर नाती दमांद ह ,अभीच ल फडफडावत हे।ओ…..! सुघ्घर मछरी के खेलई ह, तउरई ह, फडफडई ह , तडफ-तडफ के मरई ह, ओकर नजरे -नजर म झूलत हे ।अब तो मछरी ह, का ? तोरो ,हमरो अउ सबे के शरीर म जो हे, ओ ह, का ये ?
कहां से आथे ?
अउ कहां चले जाथे ?
ये बात ह , ओकर हिरदे म उठत हे । बारा गाडा लकडी के जलत धूनी कस, ओकर छाती ह धधकत हे ।मने-मन म खोजत हे, माथा ह ओकर गिंजरत हे।जे ला पाये बर धरती, समूंदर अउ अगाश , सूरूज ,चंदा अउ परकाश, जंगल , झाडी अउ परवत ,पहार ।अउ का कहिबे ? मे ह तो कउवा गे हंव । दुनिया जहांन म अपन मति ल फइलावत हे।बिचार मंथन के मथनी म मथावत हे । का जनी ?येकर खोज ह ,येला कहां-कहां ले जावत हे ? उठई-बइठई ,खवई-पियई ,सोवई-बसई येला कांहिच ह ,नइ सुहावत हे।
नान-नान मोर नोनी-बाबू हे, असासंभार किसानी बारी हे । साधू-संयासी कोनो बन जही त ? अतेक बड मोर घर के भार ल, कोन ह उठाही ?अउ हमर पहाड कस जिंनगी ह, दादी ?कइसे पहाही? हमर तो मरे बिहान हो जही।कहि …कहि के सफुरा ह फुसुक-फुसुक रोवत हे।अउ रोवत रोवत दादी ल काहत हे…..दादी जब-जब मै तोर पांव-पयलगी करंव ,त तेंह मोला आशिश देवच ,संत-ज्ञानी पति पावच ,संत-ज्ञानी पति पावच । कहि कहि के रात-दिन अंगोय राहच ,तिही उतारा ह ,तो दादी ! मोर जिंनगी म संउहत उतरगे । जइसने बोले रहेस ओइसने उतरगे । सिरतोन म तोर अकारे ह दादी रेख भर फरक नइ परय ।मोला लगथे तोर आशिशे ह दादी !मोर जिंनगी के खुवार कर दीही घर बार के बिगाड कर दीही ।
पुनिया ह ,सफुरा ल पुचकारत हे । चु…..चु…चु….चू…. कहिके मुंह ल चुमत हे, चटकारत हे, अपन छाती म सपटार के दुलारत हे….मोर सुवा बेटी !नइ, नइ ,नइ ,नइ रोवय ओ ,अइसना पढ-पढ के नइ रोवय । चुप ,हो जा ,ओ मोर मैना बेटी, चुप हो जा । तेंह…कइसे हो जबे ओ बेटी । रो…थस…. । तें….ह… …रोथस ओ, मोर पुनिया के ज्ञानी-साहसी बेटी …,,ह, रो….थस….. ओ । मत रो…… हिम्मत कर । मै तो हंव । तोर संग ससुरे ,मइके के सब के सब परवार हे ।काबर रोथस ?एक्के झन थोरे हस ओ ।तोर संग हमन सब झन हन । चुप बेटी …..चुप कहिके पुनिया ह सफुरा के मुड-हाथ ल अपन हथेरी से सलहारत हे ।पुचकारत हे ।दुलारत हे।
अउ पुनिया ह कहिथे…. ….बेटी सफुरा ! आशिष ह ककरो बिगाड नइ करय ओ । ये तो बनाय बर देये जाथे बेटी।जिंनगी ल ,सजाय संवराय बर देये जाथे । खुशियां के बहार आय बर,आशिष देये जाथे । अउ तेंह मोला दोष देथच ओ बेटी, कि कही साधू संयासी हो जही त, कहिके। लेकिन मे ह तो संत ज्ञानी पति पा,कहिके आशीश देवंव। साधू संयासी भले घर परवार छोड दीही, फेर संत ज्ञानी अइसना नइ करय ओ मोर बेटी । ये तो सब के घर परवार ल जोडे के काम करही । ऊंच ,नीच ,भेद, भाव, ढोंग ,पाखंड ल दूर करे के काम करही । तेंह चिंता मत कर ओ मोर मैना बेटी ।एक न एक दिन ये मोर आशिश ह तोर जरूर काम आही । अउ तें ह, तब,मोर सुरता करबे।ओ समे का पता मै ह जियत रइहूं के नइ रइहूं ।
अभी तो तोर जिंनगी ह का ?बेटी जब ले ये भोसला बम्भणउटा के राज ये छत्तीसगढ म आय हे ।तब ले सब आदमी के जिंनगी म, डर भय समाय हे । कब काकर खेती-खार ल छिन लिही, छटवा-छटवा बईला, भईसा ल ढील लीही। कोठी के धान-पान ल उलदवा लीही । कब ?का जिनीस बर कोन ल अपन बाडा म बुलवा लीही ?जांगर के टूटत ल बूता करवाही ।सेती मेती म बेगारी बुलाही ।कब काकर बेटी बहू के अस्मत ल लूट लिही ।तेकरे सती कतनो सुग्घर सुग्घर बेटी बहू मन जाहर महुरा खा के अपन जान ल दे देहे ..ओ मोर सुवा बेटी ।
बेटी सफुरा ! ये बम्भणउटा के राज म कोनो अंग भर बस्तर नइ पहिर सकत ये, न पेट भर अन्न खा सकत ये ।जाड, घाम अउ पानी ,बादर म बेगारी करवावत हे । कमा कमाके सब रूर गे हे ।आंखी कान चिबिर-चिबिर होगे हे ।तेल-नून बर भोंकटी पइसा नइये ।खाय-पिये बर दाना-दाना के मोहताज होगे हे।येकर बोली बतरस ह हुदेसना म हुदेसे कस लागत हे।सब ल हिन्दू हव, कहिके मनु कानून लगाय हे । बाम्भण ,छतरीय , बैस्य अउ बाकी सब शूद्र मान, इंकर सेवा म फंसाय हे । जे ह, सेवा नइ करही तेला अछूत बनाय हे। वाह रे ! बम्भणउटा इंहा जियत आदमी रीबि रीबी के हो गे हे अउ ये ह पथरा के राधा-किसन ,राम-लखन के मंदिर बनाके सबके खेती खार ल दान म चढवाय हे । धरम करम के नाव म मंदिर म ही कमिया रबिया लगवाय हे। इंकर सब के उद्धार कराइया ,सत के रस्दा बताइया कोनो तो कोनो आही ।बेटी कोनो तो आही
पुनिया ह कहिथे ….बेटी सफुरा !मोला अइसे लागत हे ,घासी के हिरदे म सदज्ञान के दीया बरे बर फूलफुलावत हे ,जेकर अंजोर से निकले किरण ल ध्यान -साधना के शक्ति से जब एकाग्र कर ली ही, तभे ओकर हिरदे म एक लुक निकलही। जेमा मया ,तृष्णा, काम, क्रोध,मद, लोभ ,अहंकार जरे लग जाही ।भर-भर ,भर-भर बारा गाडा लकडी के धुनी बराबर बरे लग जही ,धधके लग जही,फेर एक न एक दिन जूडाही, थिराही अउ एक दिन अइसे आ जही, कि सागर ह ,बूंद म समाही ।धधकत आगी ह ,एक मशाल बन जाही। जे ह हिरदे से निकल के जब हाथ म आ जही ।जेला लेके दुनिया दुनिया म जा, जा के ज्ञान के जोत जलाही। जेकर अंजोर से सारा जग ह जग-मग, जग-मग उजियारा हो जाही । सतनाम के ज्ञान ल बगराही ,सतनाम के ज्ञान ल बगराही ।
बेटी !बस मोला तो, येकरे ही अगोरा हे ।
मोला तो, येकरे ही अगोरा
कि ये ह अब,कब आही ?
ये ह अब,कब आही ?
ले बेटी, चल सो जा ।कहिके दोनो आंखी मूंद के चादर ओढ के सो जथे ।
*जयसतनाम *

भुवनदास कोशरिया
भिलाईनगर
9926844437

वृत्तांत- (5) कौरा के छिनइ अउ जीव के बचई : भुवनदास कोशरिया

Guru Ghansidasघासी ह बइला गाडी ल तियार करत हे ,अपन ससुरार सिरपुर जाय बर । सवारी गाडी ये ।रथ बरोबर सजाय हे ।घासी ह, सादा के धोती कुरता पहिरे हे ।सिर म, सादा के पागा बांधे हे ।कंधा म ,अलगी लटकाय हे। पांव म, नोकदार चर्राहट पनही पहिरे हे। बइला हीरा मोती ल, घलो बढिया सम्हराय हे ।घेंच म, घांघडा बंधाय हे। गाडी म बइला फांद के ,कांसडा खींचे बइठे हे ।सफुरा ल अगोरत हे ।सफुरा मइके जाय के धुन म, लकर धकर घर के काम करिच अउ लोग लइका बर खाना पीना बना के सज धज के तियार होगे ।अउ आके गाडी म बइठत कहिथे ……चलव…चलव मै ह ,आ गे हंव ।
घासी ह जइसे ही बइला के कांसडा ल, थोर कुन ढील देथे । सांयह ल ,बइला ह आगे दउडथे ।अउ अइसे भागथे कि ओकर खूर ह, धरती म नइ पडत ये ,अधरे अधर उडत हे । उडन पखेरू हो गे हे ।इंकर कांसडा ल कोनो नइ थाम सकय । घासी के ही बात मानथे ।गाडी के भगई ल डहरचला मन देखय तो दूरिहा ल ही भागय ।
आज सोनाखान के राजा रामराय घलो अपन ससुरार पिथउरा जावत हे ।इहू ह ,अपन घोडागाडी ल गजब के सजवाय हे ।दूनो राजा रानी गाडी म बइठे हे ।भाला पकडे दू झन अंगरक्षक घलो हे ।सारथी बिसनू ह , गाडी हांकत हे ।चाबुक म सडाक ले घोडा ल मारत हे ।दोनों घोडा पूंछ उठा के भागत हे ।गांव से बाहिर अभी निकले हे । खूब दउडावत हे ।पाछू बहुत दुरिहा ल खन खन खन खन के आवाज आवत हे ।पाछु म अब गाडी ह झके लग गे ।अउ देखते देखत घासी के बइला गाडी ह रामराय के घोडागाडी के पाछूच म आगे अउ बाजू से काट के सांयह ल आगू होगे ।अउ अइसे भगाइस कि गाडी ह नजर म नइ झकाइस ,हवा होगे, क्षिण म क्षार होगे ।अउ ओकर उडे धूर्रा म राजा के गाडी ह तोपा गे ।अंधाउर ,गरेर आगे , बवंडर उडगे ।गाडी ल रोक …रोक ….रोक काहत,आंखी कान रमजत राजा ह बिसनू ल कहिथे ….कस रे बिसनू ! ये ह कहाँ के गाडी ये रे ?अउ काकर ये रे ? हाँ !राजा महाराज काहत बिसनू ह कहिथे……..ये ह गिरौद के गाडी ये राजा महराज अउ ये ह घासी के गाडी आय ।
देखत हस रे बिसनू ! येकर हिम्मत तो देख ,एक राजा के गाडी ल काट के आघू बढगे ।बिसनू ह कहिथे …….हाँ राजा महराज सारंगढ के बइला दौड म पांच साल होगे पहिला इनाम पावत हे त आगू होबेच करही महराज ।आइसे !त ठीक हे रे बिसनू जब ये वापिस लहुटही त इंहेच छेक लेबे अउ मोर जगा लाबे , बइला गाडी सुद्धा ,। जतना कीमत मांगही ,मुंह मांगे दाम देहूं ।अउ ये बइला गाडी ल महीच ह रखहूं । तबहे मोर मन ह माढ ही ।अब का ससुरार जाहूं ?ओकर गाडी के पाछू पाछू ?चल चल वापिस चल ।अब नही जाना हे ससुरार । अउ जाना हे ,ते उहीच गाडी म जाना हे ।बिसनू ह घोडा गाडी ल लहुटा के वापस राजमहल आ जथे
घासी के बइलागाडी ह कुर्रू पाट के पहाडी ल पार होगे हे । सोनाखनिहा जंगल म समा गे हे । कटाकट जंगल हे ,सराई साल साजा बीजा के असासुन ऊंचा ऊंचा पेड हे । आय जाय बर बीचो बीच गाडा रवान हे ।बघुवा भालू के माडा हे ।बनभैसा, नीलगाय ,हिरण चीतल सांभर मिरगा ह तो खइरखा के खइरखा हे । तितर बटेर तो एति ओती तुरतुर भागत हे । मंजूर पांखी फैला के झूम झूम के नाचत हे । कोयल के कुहू कुहू बोली अब्बड सुहावनी लागत हे । पडकी मैना मनखे सहीन ठोल ठोलके गुठियावत हे ।घांघडा बइला के खनखनाहट ह पूरा जंगल म घन घनावत हे गुंजावत हे ।
पेड म अचानक बेंदरा के उछल कूद शुरू होगे ,हूप हूप के आवाज आय लग गे ।चिराई चिरगुन चिंव चांव ,चिंव चांव करे लग गे । घासी ह समझ गे । बइला के कांसडा ल थोरहे खींच लिस ।धीरे धीरे चलत हे ।घासी ह देखथे आघू म कोस भर दूरिहा ले , अंधउर गरेर के आवाज आवत हे । सरसर ,सरसर हिरण मिरगा भागत हे ।फडफड, फडफड पाना पताउवा उडियावत हे ।आंही बांही दू बघुवा ,हिरण ल गाडा रवाने रवान दौडावत हे ।सब हिरण मिरगा अंधाधुंध भागत आवत हे ।ये तरफ ल बइला गाडी जावत हे .,अभरेट्टा होगे । सब हिरण छिदिर बिदिर होगे । आखिर म ,एक ठो हिरण बघुवा के पंजा म पकडा जथे ।दूसरा बघुवा ह, ओकर घेंच ल हबक देथे ।हिरण झटकारत हे ,बचे बर हुमहेलत हे । हीरा मोती बइला ह हिरण ल फड फडावत देख के अगिया जथे ।आंखी से गुरेरथे अउ जोर से फुसरथे ।रख मखा के दोनो पैर म खुरचथे ।सिंग ल हिलावत ,हुंकरत,गाडी सुद्धा बघुवा ल हुबेडे बर दउडथे । बघुवा मन जान बचा के भागथे । फेर खडा होके देखथे ।बइला मन एक बार फेर हुंकरत दउडथे ।बघुवा मन अउ दूरिहा भागथे ।
एक बघुवा हिरण के पखुरा ल ,पंजा मार दे र हिस अउ दूसरा ह ओकर घेंच ल ,अपन जबडा म दबोच दे रहिस ।हिरण लहुलुहान होगे रहिस ।बेहोस पडे रहिस।घासी अउ सफुरा गाडी ल उतर जथे।दूनो दउड के हिरण ल उठाथे । सीधा करथे ,पैर पीठ ल मालिस करथे। सिर ल सहलाथे ।घासी तीर तखार म झाडी से पाना पतउवा तोडथे ।हथेरी म रमंजथे अउ रस ल हिरण के मुंह म टपकाथे ।कुछ अउ पत्ती लानथे जे ला रमंज के जिंहा जिंहा खून निकलत हे ओला पोछ के लगाथे ।अउ अपन अलगी ल पट्टी बना के बांध देथे ।
दवाई के असर पडथे हिरण के होस आ जथे ,हिले डुले लगथे। सफुरा खुश हो जथे ।हिरण उठे के कोशिश करथे ।पखुरा के चोट गहरा हे ,उठ नइ पावत ये ।टुकुर टुकुर दूनो बघुवा ,दूरिहा ल देखत हे ।अउ सोचत हे ,कब तक खैर मनाही । सब हिरण पास म आवत हे ,कोई सूंघत हे ,कोई चाटत हे ,कोई उठावत हे ,कोई रेंगाय के उदिम करत हे ।लेकिन ओ, न उठ पावत ये ,न चल पावत ये ।सब हिरण थक हार जथे ।सामने येकर जमराज बइठे हे ।अब काइसे येकर जीव ल बचावन ।”मनखे होतिच त कलहर डरतिच ,बचा ले ददा मोर लाइका ल कहिके पांव तरि लोटतिच ,बिनय करतिच अउ ओकर जान बचाय के भीख मांगतिच “। लेकिन ये तो बेजुबान जीव ये ।बस धर धरधर धर आंसू ढरत हे । सफुरा के आंखी घलो तर बतर हे ।अचरा म कभु ये हिरण के, तो कभु ओ हिरण के, आंसू पोछत हे ।कभु दुलारत हे,कभु पुचकारत हे , कभु धीरज बंधावत हे ।हीरा मोती के आंसू घलो टपाटप गिरत हे ,अउ बघुवा ल देख देख के इंकर जीव रख मखियावत हे ।
Kosariyaघासी आत्म चिंतन म पडगे । करंव तो का करंव ? बेरा ह खसल गे हे ।जाना,तो बहुत दूर हे । सोच के सफुरा ल कहिथे …..कइसे सफुरा ! का करना हे तेला बता ?मोला तो समझ नइ आवत ये । “ककरो मुंह के कौरा ल छिनई अउ ककरो जीव के बचई “येमा कोन ह उचित हे ? तेला, तेंह मोला बता ।सफुरा ह, कहिथे ….का बतावंव ? छोडत हन, त ओ बघुवा के भोभस भरा जही ।चल येला संगे म लेगबो ।येकर जान तो बच जही ।हमर पुनिया दादी कहिथे …”..जीव के लेवइया से जीव के बचइया बडे होथे। “अतना सुनत घासी ल जवाब मिल जथे ।बघुवा तरफ देखत कहिथे ……माफ करव भइया ,अब इंहा से जाव अउ ये रस्ता म कभु मत आहू ।कहिके अपन दोनो हाथ से जाये के इशारा कर देथे ।अउ ओ बघुवा मन घलो सच्च म जाय लगथे । घासी अउ सफुरा मिल के हिरण ल उठा के गाडी म बइठाथे । सब हिरण बडे ही कातर भाव से देखथे । साथी हिरण के बिछुडे केएक मन म दुखी हे ,तो एक मन म ओकर जान बचे के खुशी भी हे ।घासी ह हीरा मोती ल ,ले चलव कहिके खेदे लगथे ।अउ सब हिरण ल हाथ से इशारा करत बोलथे……ठीक हे हमन जावत हन ,एक अठुरिया बाद आवत हन ।इंहे फेर मिलबो ,तुंहर अमानत ल तुमन ल सौप के जाबो ।आज हीरा मोती अडबड खुश हे ,बघुवा से टक्कर ले हे अउ एक मन आगर भागत हे । सोन खनिहा जंगल ल अब नाहकत हे.

* जय सतनाम *

भुवनदास कोशरिया
कैलाशनगर भिलाई
9926844437

वृत्तांत- (6) सबे जीव के सरेखा ..रखना हे : भुवनदास कोशरिया

Guru Ghansidasघासी के बइला गाडी सोनखनिहा जंगल ल पार होगे ।अब छोटे ,छोटे जंगल, पहार, नदिया, नरवा अउ कछार ,उबड, खाबड खेती ,खार , रस्ता ल नाहकत हे । गाडी के खन खन ,खन खन करत घांघडा के आवाज ले बघुवा ,भलुवा चीतवा सब बांहकत हे ।गाडी के हच्चक हाइया होवाई से घासी ह कहिथे …….देखत हस सफुरा !ये रस्ता ल । कभु जंगल ,कभु झाडी कभु परवत ,कभु पहाड़ी । का ? का ? मिलिस हे ? अतका सुनत सफुरा ह कहिथे ……हमर पुनिया दादी ह काहय । “कहीं दुख हे , तो कहीं सुख हे ।कहीं उथला हे तो कहीं गहरा हे ।कहीं धूप हे तो कहीं छांव हे । इही ह जिनगी के नाव हे “।अपन हाथ से हिरण ल सहलावत हे,दुलारत हे ,बेटा सोना ,बेटा सोना कहिके ओकर मुह म चुमत हे, पुचकारत हे ।घासी अउ सफुरा मुहाचाही गुठियावत हे ।बीच, बीच म सोना हिरण ल हुंकारू भरवावत हे।
गांव गांव म बूलकत ये बइला गाडी के देखनी होवत हे । दउडइया बइला बर पिथउरा काय हे, घंटा भर म अभरा दीच । पिथउरा सोनखनिहा राजा के ससुरारी रजवाडा ये ।दसकोशी के मन इंहा बजार करे बर आथे । आज बडे बाजार ये । सबे जीनिश के इंहा लेनदेन होथे ।चाऊर ,दार ,कपडा, लत्ता ,बरतन ,भाडा ,सोना ,चांदी, मिठाई ,जलेबी ,सबजी ,भाजी ,अउ माल मत्ता के भी बहुत बडे बाजार लगथे ।रस्ता म ही बइला के पसरा लगे हे ।दावन के दावन गाय,बइला, भैसी ,भैंसा के दो तीन दिन से ढार परे हे । नगपुरिहा ,बडारी ,देशटा, कनपुरिहा जेला जइसना चाही ओइसने मिलत हे ।छांटत हे ,कोई खूर देखत हे ,कोई पूंछ देखत हे ,कोई दांत देखत हे। उदंत हे ,के पुरोय हे ,कोई चर दत्ता हे, त कोई छै दत्ता ,कोई उतरहा ।बेचे अउ बिसाय बर कोचिया लगे हे ।कभु बेचाइया से दाम गिरावत हे ,कभु खरिदवइया से बोली बढवावत हे।कभु तुतारी से बइला के पखुरा म अरई झकावत हे ,त कभु पूंछी अइंठ के पीठ थपथपावत हे। बइला के तरमरावत चाल दिखावत हे।
खन खन ,खन खन घांघडा के आवाज ह सब ल चंउका दीच । घासी के बइला गाडी आवत हे ।बइला के रंग रूप अउ कद काठी बंधना ह सब के मन ल मोह लीच ।सब मुंह फार के देखते ही रहिगे ।अउ कहे लगिस वाह… वाह …का ? बइला ये। अइसना बइला तो बजार भर म नइ ये । पता नही येला कहां से उतारे हे? सब देखत हे गुठियावत हे।अउ गाडी बइला पिथउरा ल पार होगे ।
घासी के बइला गाडी ह, सिरपुर बेराछत पहुंचत हे ।बेरा फुल फुलाय लगगे हे । पीठ म कमरा, खुमरी टांगे ,अइंठी मुरेरी पागा बांधे, रिंगी चिंगी सलुखा पहिरे ,कान म चोंगी खोंचे ,घेंच म नोई ओरमाये ,गला म कऊडी ,ताबीज पहिरे हे ।डेरी हाथ म बसरी अउ जेउनी हाथ म तेंदूसार के लउठी पकडे ,पहाटिया बरदी ल धरसावत हे ।हररे…….हररे…..काहत हे …..सुऊऊऊऊऊ……….कहिके सुसरी बजावत हे ।ये बरदी म लागत गाय बछरू हे ,छोडावन हे ,कलोर हे, गाभिन हे ,दुदत्ता ,चारदत्ता ,छै दत्ता, पुरोय अउ उतरहा बइला भईसा घलो हे ।इही बरदी म बडे डिल्ला वाला खडा सींग ,छोटे कान ,लम्बी पूंछ अउ ऊंचा ,उदंत ,धौरा रंग म ,काला चितकबरा ,मरकनहा गोल्लर नन्दू घलो हे।कान म घांघडा के आवाज परते ही, ओ ह दउड पडथे ।बइला ल हुबेडथे अउ गाडी ल तो पलटीच कर देथे ।
सिरपुर म अंजोरी मंडल काहत लागय ।गांव के मातबड हे, आठ गांव के जमीदार हे । जमीदारी फौजदारी के सरकारी नर नियांव खुद करथे ।खेती किसानी बर नौकर चाकर अउ मुखतियार रखे हे ।एक खरिखा गाय गरुवा अउ एक खरीखा भैसी भैसा रखे हे ।चराय बर पहाटिया अउ ठेठवार रखे हे ।पशुधन के उन्नत नस्ल सुधार बर गोल्लर भी ढीले हे ।
आज अंजोरी ह पिथाउरा रस्ता के खेत देखे बर गे हे ।संझउती सब बनिहार भूतिहार घर लहुटत हे। ये रस्ता म बहुत बडे चरागन भाठा हे। कई खरिखा गाय गरवा चरत हे।घासी के बइला गाडी के आती होवत हे, पहाटिया मन के गरूवा धरसाती होवत हे ।घांघडा के आवाज ल सुन के गोल्लर नन्दीराज ह अरकट्टा दउडत आवत हे ।अंजोरी मंडल ह देख डरथे ,अरे !ये तो गोल्लर आवत हे ।घासी के बइला गाडी अभी थोडा दूर म हे।अंजोरी तेंदूसार के लउठी पकडे हे । अखाडा खेले कूदे है ।बुलंद कद चुस्त बदन के हे ।सादा के धोती कुरता पहिरे हे ।मुड म सादा के पागा बांधे हे।गोरा अंग हे, दमकत बरण हे।खांध के अंगोछा ल कनिहा म बांधत सब बनिहार मन ल कहिथे …….आवव…. आवव……ये गोल्लर ल लहुटावव।नही ते अलहन कर दीही । अंजोरी लउठी घुमा घुमाके गोल्लर ल लहुटावत हे ,गोल्लर बांहक बांहक के फेर आ जावत हे ।नौकर, चाकर अउ सब खेतिहार मन छेंकत हे। लेकिन गोल्लर हुंकर हुंकर के सब ल दउडा देवत हे ।
घासी दूरिहा ल देख लेथे। अपन गाडी बइला ल खडा कर देथे। अउ उतर के सब ल कहिथे …….छोड देवव ….छोड देवव ……आवन देवव ……आवन देवव । हुंकरत ,फुंसरत सींग ल डोलावत ,दउडत आवत गोल्लर ल घासी ह पुचकारथे ,कान ल पकडथे ,माथा ल चुमथे ,रमंजथे, घेंच ल पोटारथे ,पीठ ल थप थपाके दुलारथे ।अतेक मया पिरीत ल पा के अतेक मरकनहा गोल्लर घलो परेम के भाखा जानथे ।घासी ल सूंघे लगथे, चांटे लगथे अउ सिग ल हिला हिला के अपनो परेम ल दिखाय लगथे ।
खेत ल लहुटत सब खेतिहार मन के भीड ह देखे बर सकलाय लगथे ।अचरूत हो जथे ।कतनो गाडी बइला ल हुबेड चुके हे ,पलट चुके हे। आज कइसे कांहिच नइ करिस। अंजोरी ह घासी के पास आ जथे। सफुरा घलो गाडी ल उतर जथे ।बेटी दमांद ल देख के सब गांव के आदमी मन खुश हो जथे ।सफुरा अउ घासी अंजोरी के पांव पायलगी करथे ।गांव के बेटी दमांद ये ,कहिके सबके सब आशीष देवत हे ……खुश राहव बेटी , आनंद मगन राहव ।
गाडी म रखे हिरण ल, देख के सब पूछे लगथे ।सोनखनिहा जंगल के होय घटना ल सफुरा जब सब ल बताय ,तो सब के मुंह से आ..हा..आ.. ..हा..आ… हा…के दर्दीला आवाज उंकर हिरदे ल निकले ल लगगे ।सबके जीव ह धक ल होगे।उही भीड म मंगतू गोड ह घलो हे । ओ ह कहिथे …मोरो तो ससुरार उही सोनाखान म हे ।कुर्रू पाट म देवी ह ,संउहत बिराजे हे । बाघिन के सवारी हे ।अवइया जवइया मन ल रकतटीका देये बर लगथे । हर साल उंहा छंटवा ,छंटवा बछवा, पडवा, बोकरा, भेडवा अउ हजारो जीव के पुजई करे जाथे। नइते कांही न कांही, अनहोनी घटना होके रहिथे ।कतनो तो बाघिन के खाजी होगे हे ।रस्ता ह टूट गे हे। ओ रस्ता म, तेंह आय हस गा दमांद घासी । धन हे ,तोर किस्मत, बांच गेयच तेला मनौती मना ,अउ लहुटे के बेरा उंहा ,खच्चित रकत टीका देइच देबे ।
घासी ह कहिथे …..देख गा सियान ,ये दुनिया म जड अउ चेतन दो चीज होथे ।जेमा चेतन ल खाय पीये के जरूरत पडथे अउ जड ल नइ पडय ।कुर्रूपाट म जो देवी ये कहिथे, ओ ह पथरा ये गा ।अउ पथरा ह जड आय ।ओ ह का ला खाही गा ।पुजई के नाव म जतना जीव काटथे ओला तो मनखेच मन खाथे गा ।देखत हव सब अपन अपन घर म कइसे बेटा, बेटी बरोबर ये बछवा ,पडवा ,बोकरा, भेडवा ल पोसे पाले रहिथव।अपन घर के पशुधन निरीह अउ मुक परानी ल अपन आंखी के सामने खचाखच कटवा देथव ।धन है तुंहर जीव, दया, मया ,करूणा नइ लागय ,तुंहर हिरदे म संवेदना कइसे नइ जागय ।ये पथरा म ,देवी अउ देवता के नांव म, भय अउ भरम फैलाय हे, जे इंकर बात नइ मानय ,तेकर हत्या करके ये देवी रिसाय हे ,कहिके नाम लगाथे । लूट, पाठ ,चोरी, डकैती अउ हत्या के अपराध छिपाय बर किसिम किसिम के कथा कहानी रचवाय हे ।
Kosariyaघासी ह कहिथे……आप सब इंकर कहानी म मत आय करव ।ये सब ल जाने समझे के बात ये । कोई पथरा म ,कोई देवी देवता नइ ये ।अउ येला न कोई चीज खाय के जरूरत हे ।ये धरती म जितना भी जीव हे ,सब हमरे बराबर हे ,अउ हम सब ल ये धरती म रहे के जरूरत हे, तभे तो सब ल इंहा जनम मिले हे । अउ मनखे ल भी इंहे जनम मिले हे ।लेकिन मनखे के जनम सबसे सरस हे, सबल हे ,ज्ञान वान हे ,येकरे सती तो सबसे जादा येकरे गरज हे ,कि सब मे ” जियव अउ जियन दव ” के भाव जगावै । पेड ,पौधा से लेकर चिरई, चिरगुन ,चांटी ,हाथी तक के सरेखा रखै । आवव आज हम सब परण करिन कि सबे जीव ल एके बरोबर मानबो , जीव हत्या ल सबसे बडे अपराध मानबो ,सबे जीव परयावरन के सहयोगी संगी साथी ये । ये धरती म सबे जीव ल समोखबो । पिरीत पियार के मेलजोल अइसे बढाबो कि दया ,मया ,करूणा ,क्षमा के भाव आ जाय। सेवा ,जतन अउ रक्षा अइसे करबो ,कि सबे जीव के सरेखा हो जाय ।
घासीदास की जय ……
घासीदास की जय …..
जयकारा होय लगथे
अउ सब अपन अपन घर जाय लगथे ………..
*जयसतनाम*

भुवनदास कोशरिया
भिलाईनगर
9926844437

वृत्तांत- (7) अपन धरती अपन आगाश : भुवनदास कोशरिया

Kosariyaभीड ओसरी पारी खरकत गिस ।सब अपन अपन घर जाय लगिस ।सफुरा ह गाडी म चढीच। घासी घलो गाडी म बइठ के बइला ल खेदे लग गे ।आगू आगू अंजोरी मंडल अउ संगे संगे गोल्लर नंदीराज घलो जावत हे ।घांघडा बइला के आवाज गली गली म खन खनावत हे ।खेलई, कूदई म बिधून लइका मन घलो खेलई ल छोड के गाडी के पाछू पाछू आवत हे। घरेच तीर म ,घांघडा बाजे के आरो ल पाके ,चाऊर निमारत सफुरा के दाई संतरा ह, कोन आगे दाई ? कहिके, सिंग दरवाजा म निकल के देखथे। दूआरीच म ,बइला गाडी ह ,खडा होइच अउ देखे बर पारा भर के मनखे मन सकलाय हे ।अंजोरी ह, अपन घर के नौकर मन ल ,गाडी बइला ल ढीले बर कहिथे ।अउ गाडी से हिरण ल, चार झन मिल के, चिंगी चांगा उठा के घर के आंगना म लेगथे ।दू झन नौकर ल ,येकर देख रेख बर लगा देथे ।दाई संतरा अउ दादी पुनिया ह ,अपन बेटी दमांद ल देख के अइ ! हमर बेटी आगे दाई कहिके अब्बड खुश हो जथे । बेटी ल ,गाडी से उतारे बर सास ,बहू दूनो तिर म आ गे।कोनो मोटरा गठरी त कोनो ओकर हाथ ल थेभा के गाडी से उतारत हे। घासी अउ सफुरा उतरते ही दाई अउ दादी पुनिया के टपा टप पांव छू छू के भजत हे।आनंद राहौ, खुशी राहौ ,आशिश देवत पुनिया ह, सफुरा के ,ओकर दूनो बांही ल ,धर के उठा लेथे अउ अपन दूनो हथेरी ल ,ओकर दूनो गाल म ,जोर के चटाक चटाक मुंह ओधा के चुमा लेथे। काबाभर पोटार के अपन छाती म लगाथे ।अउ फेर भेंट लागथे …… मोला……..का…. बर बिसरा …… गेयच …..बेटी ….ओ ।मोर बिना तोर नींद ह नइ परत रीहिस बेटी ……ओ । मोला किस्सा सुनाय ल काहच ……. बेटी ओ ।मोर संगे म नहावच बेटी ….. संगे म खावच ओ……. ।मोर संगे संग म घुमच बेटी ओ…….. ऐं …….हें …. हें….. हें….. । ससन भर गा ,गा के रो ,रो के भेट लागिस तभे पुनिया दादी के हिरदे ह जुडाइस ,चुप होइस ,शांत होइस। देखइया मन घलो रो डरिस , आंसु म तरबतर होगे रीहिस । कतनो अभी ल सुसकत हे , नाक कान पोछत हे ।तब तक पूरा माहौल गमगीन होगे रीहिस । सब चुप चाप होगे रीहिस। एक ठो पत्ता ह ,नइ खरकत रीहिस। सूजी ह ,गिरतीच ,तहू ह सुना जतीच।
हाथ ,पाव पखरवाय बर, बेटी ल ,गोड धोना मेर लेगिस । परछी म ,रखे बाजवट म ,चादर बिछावत, आव बेटी आव ,येमा बइठ कहिके, पुनिया ह बइठइस, अउ ओकरे संग घसेल के बइठ गिस।
अंजोरी मंडल के घर म, हाथी बुलकाउ सिंग दरवाजा हे। चौफेर परछी ,बीच म गाडा भर के पयेर मिंजउ अंगना हे ।बेटी दमांद आये हे ,कहिके बाटा परोसी परिवार मन घलो जुरियाय हे । सब अंगना म, चर चर ल बइठे हे ।अउ सुनत हे ,बेटी दमांद के आवत खानी होय घटना ल। सबके सब सन्न हो जथे ।कहे लगथे बेटी हो तुमन ककरो नइ बिगाडे रेहेव। कोई अच्छा करम जरूर करे होहू, तभे तुमन सही सलामत आ गे हव ,बघुवा के मुंह ल बांच के ।
दादी पुनिया ह ,सब ल कहिथे …..मोर बेटी ह बिहंचे ल निकले हे, भूखे प्यासे होही । बेटी बेटा हो ,अब जावव तुमन ,सब अपन अपन घर जावव । बहू संतरा ,जेवन ह बनगे ओ ?जल्दी जल्दी बनाव बेटी हो कहिके ,रंधनी घर म जा के देखथे …. संतरा ह, कांसा के लोटा म पानी लेके, आवत हे ।सब ल पानी देवत कहिथे … चलौ, चलौ जेवन जेय बर बइठौ । अंजोरी मंडल ह बेटी दमांद ल हाथ मुंह पखारे भर बोलथे ।उंकर बइठे बर भूइंया म चादर के आसन बिछाथे अउ थारी मढाय बर कठवा के कुंदवा पिढवा रखथे ।दाई संतरा ल, थारी म दारभात निकालत देख के सफुरा ह, परोसे बर संग देये बर चल देथे । अउ कहिथे ले दाई महुं ह परोसन लागत हव कहिके ….. सफुरा ह थारी मन ल,ले जा जा के देवत हे ।बेटी दमांद आय हे, भाटा मुरई साग बने हे। बेटी ल मसलहा अच्छा लागही ,कहिके करेला बना डरिस । करेला कही करू लागही त ?कहिके संतरा ह, आलू गोभी के साग बना डरिच ।अउ मने मन म सोच थे । अम्मट खाय के बेटी के मन होही त? कहिके भइस के खाटी दही म बफउरी डार के डुबकी कडी बना डरिस ।अब सब बर कांसा के थारी म ,दुबराज चांउर के भात, राहेर दार म ,ठोमहा भर गाय के घी डाल के दीच ।अलग अलग माली म, साग अउ कटोरी म आमा अमली के अथान ल दीच ।पुनिया ह सफुरा ल आव ,संगे संग जेबो कहिके, अपने संगे म बइठाइस ।बेटी के मया ये, अउ नदिया बारी के साग भाजी ये। छकत्त ल खवाहूं कहिके ,किसिम किसिम के साग रांध डरिस ।सच कहिबे ,ते बिकट दिन म ,अइस बेटी के मया म संतरा ह, उबुक चुबुक होगे रहिस ।का ? का ?रांधौं । का ? का ? खवावौं। कहिके ओकर सुद्धबुद्ध ह हजा गे रिहिस।एक फर अउ लेले,बेटी एक फर अउ लेले कहिके कभु करेला ल दै ,तो कभु फूलगोभी, अउ काहय, बने खा बेटी ,बने खा,भूख लागे होही। ओरसानी पोरसानी दे दे के खवावत हे ।
सफुरा ,आज अपन दादी संग म सोय हे ।टुरबुर ,टुरबुर गुठियावत हे, बच्छर भर के दुख सुख ल सुनावत हे।नींद ह को जनी कहाँ गंवागे? पडत नइये।कतना सोइच,? कतना नइ सोइच ,? पहाती रथिया फेर टुरबुरावत हे। अब्बड दिन म मिले हे, बड मयारू नतनीन बूढनीन ये ।नइ सिरावै इंकर गोठ ह। दादी पुनिया के रोज के काम राहय ,भिनसरहा ल उठ जाय अउ योग ध्यान म जरूर बइठै। खेती खार,किसानी बारी,गाय गरूआ, लोग लइका,अपन गांव,पारा मुहल्ला, अगल बगल के गांव अउ आठ गंवा के घलो दुख सुख के सरेखा करै। सिरपुर ह महानदी के पार म बसे हे। नदिया के बडे बडे कछार हे। उही म सब अपन अपन गांव तीर म, नदिया बारी लगाय हे ।रार के रार भाटा, मिरची ,करेला ,बरबट्टी, रमकेलिया , गोभी ,नवलगोल, पताल, अउ कलिंदर ,केकडी घलो बोवाय हे। अब्बड मेहनत मजदूरी के काम ये ,माटी गोटी म मिल के हांडाटोर बूता करथे , किसिम किसिम के चिभिक लगाथे तब कही रेती मा सोना उगलाथे ।इही ह , पेशवा बभनउटा के आंखी म गडगे हे।नदिया, नरवा म घलो नियत लगाय हे ।सब खेत खार ल नंगा के बडे बडे जमीदार, सूबेदार बनाय हे । मनुरीति ल थोप के इंहा ,सबके जिनगी ल नरक म भोगवाय हे । बाम्भन, ये धरती के स्वामी ये ।बाकी सब येकर सेवक ये।नारी नरक के खान ये।जीना मरना अउ इंकर सेवा, जतन करना ही, जिनगी के नाव ये । पुनिया म ज्ञान हे, जीवन जीये के विधान हे,सबे जीव एके बरोबर ,येला जन जन तक बताये के ओकर काम हे।तुम्हरो ,हमरो, ओकरो अउ सबके ये धरती म बराबर सनमान हे ।ज्ञानी बनहू, जुड के रइहू, तभे अपन हक ल लेहू ।कहिके के पुनिया ह एक संघ बनाय हे ।जेमा दस गांव के नारी मन जुडे हे ।भंडार के धनमत लोहारिन, तेलासी के सगन तेलिन, बोदा के फुलवा मरारिन , मोहान के केंवरा गहिरीन ,चिखली के सुखिया केंवटीन, जुनवानी पिंगला कलारिन ,कुरूद के बसंता नवाईन , कुटेला के मोतिम कुर्मीन ,मुहमेला के देवंतीन गोडिन ,समोंदा के बिसासा् कडरिन अउ सिरपुर के पुनिया दादी। इंकर बड जुझारू संघ हे ।भाखा परन नइ पाय सब तुरते जुरिया जथे ।जिंहे कहिबे सब उंहे सकला जथे । ये संघ के सियानी पुनिया ल ही सौपे हे । ओकर जन जन बर दया ,मया, नर , नियांव ,हक, हुंकार म ,लडाई भिडाई म ,आगू के आगे आके भीड के सबके काम करई ल ,देखके सब ओकरेच नाव म ही संघ के नाव पुन्नीमा संघ रखे हे ।
इंहा पहिली आदिवासी राजा रहिस ।सब कमावत रिहिस, धमावत रीहिस ,जिनगी ल सुख से पहावत रीहिस ।खेती अउ अपन खार रीहिस, जांगर के परसादे खुद के घर दुआर रीहिस ।जब ले ये बम्भनउटा के शासन आइस ,जिनगी ह दुश्ववार होगे ।लगान अइसना अइसना म लगाय हे जेला भरत भरत हमर जांगर घलो ह खु्वार होगे।देखना ,जनम म कर, मरण म कर ,बर म कर. बिहाव म कर, बिहाव छूटे म कर, बिहाव टूटे म कर , गौना म कर, चुडी पहनाय म कर ,चुडी फोरवाय म कर, नाव धरवाय म कर , झालर उतरवाय म कर ।नवा घर बनाबे तब कर, जूना म अउ दुआरी फोरबे तब कर ।घर ह पांच हाथ से ऊंचा मत होय । दू खोली अउ एक एक खटिया के परउ, छानी पाना पतउआ के होवय ।खपरा लगाय के नावेच झन ले।एक दिन सुखनंदन मरार ह ,पांव म पनही पहिर के गली घूम दीस, बलउवा होगे ,तेलासी के बावा जमीदार घर ससन भर पिटवाइस, साध ह भूता के सुखनंदन के ,उही पनही ल, ओकर मुडी म रखवा के घर भेजिच ।कुटेला म ओइसने परदेशी कुरमी ह, घुठवा भर धोती कुरता पहिर के गली बूलत हे, ओकरो बुलउवा होगे, वाहा पिटान पिटवाइस अउ धोती कुरता ल चीर फोर के खडेक खडे नीछवा दीच । देखाइया मन घलो चेत गे।
मुंधरहा ल बाम्भन जमीदार ह रइपुर जाय बर निकले रहिस । रस्ता म अपन घर से निकलत बहोरिक तेली ह बाम्भन ल पांय लगी महाराज बोलिस ।मुंह देखते ही बाम्भन के मन म खटकिस । खुश रहौ कहिके घलो नइ बोलिस । मुंधरहा मुंधरहा तेली के मुंह ल देख के जात हंव ।कांही अपशकुन तो नइ हो जही कहिके थोर कुन उही मेर खडा होके बिलमिस अउ सांहaस अंदर बाहिर लेवत हे ,तभो ल ये टोटका ह, ओकर मने मन म भीतरे भीतर खाये जात हे ।कांही होवय मत ,कांही होवय मत। इंहा ल उंहा गुनत गुनत जात हे। रइपुर जाथे ,त उंहा पता चलथे, कि ओकर जमीदारी ह छिनागे हे ,दूसर ल मिल गेहे । बाम्भन ल अक्खर गे । तरमरा के रहिगे । मुंधरहा मुंधरहा तेली के मुंह देखेंव ,तेह मोला नइ फुरिस कहिके ,ओकर हिरदे ह जर भूंज के ख्वार होगे। अउ येकर रिस ल तेली के उपर उतारे बर मने मन म सोच डरिस । घर लहुटते ही अपन गांव म पाल के रखे आठ दस लठमार मन ल बोलथे…..जावव रे ,ओ रस्ता म ,बसे तेली के घर कुरिया ल टोर फोर दौ, भसका दौ ,अउ ये गांव से ही खेदार दौ।नइ रइही बांस अउ नइ बाजही बासरी।बिहंचा बिहंचा तेली मुख दिखे से बांच जबो। लठमार ठंडाफटकार मन बहोरिक तेली के घर पहुंच गे अउ घर के सब ल मारिस पिटिस, घर कुरिया ल टोर फोर दीस, बेंदरा बिनास कर दीस ।बिचारा बहोरिक अपन लोग लइका संग, अपन हाथ गोड ल धर के दूसर गांव चल दीस । नानकुन खीला ल घलो नइ लेगिस । ये बाम्भन जमीदार ये, अब्बड अत्याचारी रीहीस ।कोनो ल होवय, बेरा उवत ले बूडत तक काम बूता करवा तिच ।बनी भूती नइ देतीच ।अइसने सेती मेती करवातीच। अइसना होवय पेशवा के राज म। सोच मनखे ह कइसे जियत रहिस होही ।एक एक मनखे पीछे एकेक देवता मिलके तैंतीसकोटी देवता ह घलो इंकर रक्षा नइ कर पावत रहिस। अउ अन्याय अत्याचार हद से पार होगे रहिस ।मानवता के अइसे हनन होवत रहिस ।
जब ले अंजोरी ल ग्यारहगांव के जमीदारी मिले हे। तब ले वोह सुनता के रस्ता खोल दे हे। गुलामी ल मुक्त करा दे हे ।कोनो ककरो धरे बांधे नइ हे, जे ह जोतही ,ओकर खेती। खेती अपन सेती ।अपन धरती अपन अगाश ,जे बोबे ,ओ लुबे ओमा चाहे सोना उपजाश ।अपन हाथ ,अपन मुठ ,ददा भाइया हे ,चारो खूट। समता, स्वतंत्रता ,बंधुत्व अउ न्याय ,ये सब पुनिया के बोली आय।जन जन म ये भाव जगाइस ।जब जब पेशवा के नवा कछ आदेश आइस, ये पुन्नीमा संघ ह डट के विरोध जताइस। आज नदिया बारी के सर्वे करे बर पेशवा के मुलाहिजा आवत हे। जेकर विरोध करे बर पुन्नीमा संघ अपन सदस्य अउ गांव गांव के नदिया बारी किसान ल प्रदर्शन करे बर बुलाय हे ।सबके सब सिरपुर के पुन्नीघाट म सकलावत हे। अंजोरी ह ,ये ग्यारह गाव के जमीदार ये। सबके बइठे अउ भोजन पानी के बेवस्था इही ह लगाय हे ।टपटप, टपटप घोडा के आवाज आवत हे, देखते देखत म दंग ल पहुच गे।चार ठो घोडा म पेशवा के पैरोकार आय हे । सरकार के आदमी ये, खिलावत हे, पिलावत हे, आव भगत करत हे । बेरा ठढियावत बइठका शुरू होइस ।पुन्नीमा संघ के पुनिया दादी धनमत, सगन, फुलवा, केंवरा ,सुखिया ,पिंगला, बसंता ,मोतिम, देवंतीन ,बिसासाअउ नदिया बारी के सब किसान अपन अपन बात रखे बर आय हे ।जमीदार अंजोरी ह बइठका ल ,सुचारू रूप से चलाय बर, शासन, नारी संगठन अउ सब किसान मन के स्वागत ,सत्कार के दू शब्द बोलत कहिथे ………देखव आज हमन शासन के आदेश के जन सुनवाई अउ जन हित के बात रखे बर इंहा सकलाय हन । हमन सब एक दूसर के ददा ,भइया ,दाई ,बहिनी, कका, ममा ,काकी ,मामी ,फूफा ,फूफी सहींन कई ठो सगा ,सोदर ,रिश्ता ,नाता से बंधे हंन। अइसने शासन के आदमी भी अपने बीच के आदमी ये । अउ जमीदार ह शासन अउ प्रजा के बीच के आदमी ये ,जे ह शासन के आदेश अउ प्रजा के हित ल देखत प्रजापालक के रूप म निर्णय लेथे । तो सबसे पहिली मै ह ,शासन के पैरोकार मन से निवेदन करत हंव कि ओ ह,शासन के जो आदेश हे, प्रजा के बीच रखै। शासन के अधिकारी सबके बीच खडा होथे अउ आदेश ल पड के सुनाथे।हमर शासन ह इंहा जनता से लगान वसूले के आदेश निकाले हे जेमा……..नदी के पानी ल रोके के कर ,ओमा नहाय के कर ,ओमा पानी पीये के कर , नदियाबारी म पानी पलोय के कर , माल मत्ता धोय के कर ।ये सब तुमन ल पटाय ल लगही । जन सुनवाई होवत हे, सब कटाकट बइठे हे ।एक दूसर के मुह ताकत हे ।कोई नइ बोलत ये।इही बइठका म दमांद घासी भी आय हे। कोन ह का ? का ?बोलत हे ?तेला ध्यान से सुनत हे ।अब जमीदार अंजोरी ह खडा होके बोलथे……. अभी तुमन शासन के आदेश सुने हंव ।अब पुन्नीमा संघ के सदस्य अउ सब किसान मन एक एक करके अपन अपन दुख पीडा के बयान कर सकत हव।
पुनिया दादी ह अपन संघ के जम्मो सदस्य मन ल उंकरे उंकरे क्षेत्र के पाठ पीढा दे हे।अउ अइसे अइसे सिखाय पढाय हे कि राजा के दरबार म घलो अपन दुख पीडा ल रख सकय ,हक अधिकार ल जता सकय ।हजारो साल से दबाय नारी म जान फूंक देहे ।अब इंकरो मुंह म दही नइ जमाय ये।जुबान म धार आगे हे। छूरी सहिन चलथे।बाजू म, ओ ताकत आगे हे ।मौका परथे ते दो चार घलो करथे। लाठी डंडा अउ तलवार घलो चलाथे। तभे तो सिंधिया होल्कर के लुटेरा पिंडारी मन से लड के अपन क्षेत्र के बचाव करथे ।इंकरे सुनता अउ रस्ता ल देख के पेशवा शासन घलो इंकरेच बात मानथे। जनहित के जतना इंकर मांग राहै तुरते पूरा करथे।गांव गांव म, ये मन मया पिरीत के अइसे बीज बोइस, रिश्ता नाता म जोरिस, कि कोनो ह आने नइ होइस ।सब अपनेच होइस । सखी , सहेली ,मित मितनीन ,महापरसादिन , सहनाइन, भोजली बदवाइस,मनखे ल मनखे मिलाइस अउ जात कुजात सब ल एकमइ कर दीस ।अउ इंकर मान गउन अइसे होवय लगिस, कि अपन ददा ल, भले ददा नइ काहय फेर सहीना ददा ल ददा जरूर कहे लगिस ।अइसन राहय पुनिया दादी के काम ह। जे ल देख के सब ओला पांय लग के आशिश लेवय ।
अंजोरी के बोले के आदेश पाके फुलवा मरारिन ह, खडा होके बोलथे…..मैं ह, सब्जी भाजी बो के कइसनो करके ,अपन परिवार के गुजर बसर करत हंव। अतेक अकन कर पटाबो ,त अपन लोग लइका के मुंह म ,कौरा का? डारबो ।
धनमत लोहारिन ह बोलथे…..खेती खार ल नंगा डरे, नदिया नरवा म नजर ल झन गडा साहेब ।
देवंतीन गोडिन ह कहिथे….. अइसना कर पटाबो, तब कतनो मर मर के कमाबो, तभो ल ओकर भोभना म नइ भरावत ये।सब के पेट मुंह ह लगे हे ।कोनो ह पेट ल बांध के नइ कमा सकय।
केंवरा राउताइन ह बोलथे……हमर माल मत्ता लक्ष्मी ह बिन मुंह के जीव ये ,नदिया नरवा म नइ बूडही त कहाँ पानी पी ही ?ओला कहां रोके सकबो। नदी म ही पानी पीथे अउ उहें बूडे रहिथे।
पिंगला कलारिन ह कहिथे ,,,,,जनता बर ,रहे केे घर , खाय के भोजन,पीये के पानी के बेवस्था करे के जिम्मेवारी सरकार होना चाही।
बसंता ह कहिथे….. जनता के जिनगी चलाय बर सरकार ल हर तरह के रोजगार खोलना चाही।
सगन ह कहिथेे ….. जनशिक्षा अउ जनस्वास्थ्य के काम ह सर्वाधिकार होना चाही।
अब पुनिया दादी ह खडा होइस अउ सब जन मानस ल सतनाम, सतनाम, सतनाम के तीन बार मुखोच्चारण कराइस, फेर अपन बात कहे के शुरू करिस……देखव हमन सब इंहा जतना जन हन ,सब एक दूसर के जियत मरत के साथी हन । लेकिन कोनो जानथव ? जनम के पहिली कहाँ रेहेन ?कहाँ से आयेन? कइसे रहेन ? कोनो जाने हव का? नही….।कोनो नइ जानेन।अउ मरण के बाद कहाँ जाबो? कहाँ रइबो ?अउ कइसे रहिबो?कोनो जानथव का ?नही …कोनो नइ जानन। फेर मरे के बाद सरग नरक के भय ,भरम म का बर पडबो। लेकिन जनम के बाद ,अउ मरण के पहिली, हमन कहाँ हन ? कइसे हन ? कहाँ रह सकत हन? अउ कइसे रह सकत हन ? तेला हम सब जरूर जान सकत हन।अउ अचछा अच्छा रहे के लिए कुछ कुछ कर भी सकत हन ।ये धरती म ही दुखी, दंडी ,घृणा, द्वेष से जीबो त नरक ,सुख सुविधा अउ दया मया से रहिबो त सरग बन जाही ।काबर ? नही ।त ये धरती ल ही सरग बनाय के कुछ उदीम करिन । अउ ये सब काम ह, एक दू झन के काम नोहय । समिलहा के काम ये। समिलहा के सूजी ह,एक के सांगा होथे ।एकरे सती सब मिल जुल के काम करना हे। ये काम म शासन ,जमीदार के साथ साथ हम सब के भी भागीदारी बनथे। लेकिन जमीदार इंहा के रहवासी शासक होय के नाते येकर महती जिम्मेवारी होथे।कि हर गांव म कुंआ , तालाब ,पाठशाला, अस्पताल, अनाजघर, खेती किसानी केन्द्र ,बैंक, राशन केन्द् ,हर प्रकार के लघु उद्योग केन्द्र ,अउ काम सिखाय के प्रशिक्षण केन्द्र ,पशुधन अस्पताल ,अउ नस्ल सुधार केन्द्र खोलै ।अउ स्त्रीपुरूष, जातिपाति के भेदभाव के बिना सब ल बराबर बराबर रहे के, खाय के, कमाय के ,अवसर मिलै ।
गांव म ,ये सब बनाय बर जनता से लगान लेयेच ल पडही ।ये सब जमीदार ल देखना हे। कि.जनता से पैदावरी के हिसाब से ही कर वसूले । अकाल दूकाल म कर माफ करै । चौथ सरदेशमुखी अउ गैर उत्पादित काम ल करमुक्त करे ।
मंगतू गोड ह खडा होथे अउ बोलथे……हमर बीच, ये गांव के बेटी दमांद घासी ह घलो इंहा आय हे। इहू ह ,दस गांव के माने हुए जमीदार ये ,दस कोशी म येकर नांव हे। उहू ल बोले के मौका दे जाय।
अंजोरी ह ओकरो नाव लेके बुलाथे….अउ कहिथे कि घासी ह मोर बेटी दमांद ये ।कल ही संझा इंहा आइस हे ।तो आवव लगान के जनसुनवाई के बारे म घासी के का विचार हे सुनन।घासी ह सब के जय जोहार अउ जय सतनाम कहत अपन बात शुरू करथे……आदरणीय संत जनो ! ये चराचर जीवजगत मे जितना भी जीव हे ,सब ल ,इंहा जीये बर कुछ न कुछ समय जरूर मिलथे। जेला हमन जीथन।, जियई ह काये ? अउ हमन कइसे जीयन ? जे ह सबसे बडे सवाल ये ?जेला सुलझाये बर अनेन प्रकार के धरम आइस ,सब के सब कुछ न कुछ धराइस । पोप, पीर, फकीर अउ भगवान उपजिस ,तैंतीस कोटी देवता होइस ।किसिम किसिम के देवी बनिस ।पेड परवत अउ कण कण म घलो भगवान ह पिकी फोरिस ।बांचे खोंचे म बामभन ह, ये धरती के संउहत भगवान परगट होइस ।सब धरम, अपन अपन दुकान चलाइस, भरमाइस कोनो ल उत्ती के रस्ता बताइस, कोनो ल बूडती ,कोनो ल भंडार, त कोनो ल रकसेल के बाट धराइस । अउ सब बाटे बाटे बोहाइस। कोनो पार नइ होइस।कोई हिंदू कहाइस, कोई मुस्लिम होइस, इसाई, बुद्ध ,जैन ,सिख ,पारसी बना बनाके मनखे से मनखे ल फोरवाइस । कोई एती झिकत हे ,कोई ओती झिकत हे, झिकातानी म मानवता ह, चिथाइस। कोई सरग अउ धरम युद्ध के नाव लेके अश्व मेघ घोडा छोडिस। लडिस अउ मिलाइस,नइ मिलिस तेला कत्लेआम करिस ।कोई गाजी बनगे , जेहाद छेड दीस ।जन्नत के हूर परी के लालच म धरती ल ही जहन्नुम कर दीस ।
तेकरे सती ये शासन से मोर ये दरखास्त हे ,कि अगर ये धरती म सब सुखी से राहय ,सुख शांति से जियय, मया प्रेम से मिलय ,समता, स्वतंत्रता, बंधुत्व अउ न्याय के राज आवय त ,जतना धरम हे तेला प्रतिबंध लगवा दै । इंहा न कोई जात होवय, न पात होवय ,धरम होवय, न भरम होवय ,करम होवय ,न कांड होवय, ढोंग होवय, न ढकोसला होवय ,भाग होवय ,न भगवान होवय । बस इंहा एक रस्ता होवय, सहज सरल जिये के एक मारग होवय । इंहा एक न्याय होवय ,समता अउ सुनता के, स्वतंत्रता होवय, जियव अउ जीयन दव के, बंधुता होवय भाईचारा के । आदरणीय संत जनो ये जीवन ल ,सवाल ये, कहिके हल करे बर झन बइठ जाहौ।हर पल ल, जीयव ,अउ तिहार मनावौ, नाचो ,गावौ , गुनगुनावौ ,मौज म बूड जावौ। ये पल ल , ब्यर्थ म मत जान दौ ।जीवन, जियई म हे ,अउ सब ल ,जीयन देवई म हे ।ये जीवन ल अगर सच म जीये के इच्छा हे ,त जीयव अउ बांटव। जतका रस ले सकत हव, लौ ।अउ जतका रस दे सकत हव ,दौ । जतके देबे ,ओतके मिलही । प्रेम ल, दया ला ,करूणा ल , क्षमा ला, जे तोर पास हे ,उही ल बांट, सारे जहांन म, मानव म ,पशु म ,पक्षी म, सारा चराचर जीव जगत म ,दुख सुख के भागीदार हो जावौ । अउ संत जनो अगर कुछ बनना हे ,ते भले कुछ बन जा लेकिन मोला नइ सुहावाय ककरो बनना, घेंच के घांटी । तोला बनना हे , तोे बन जा ,अंधरा के आंखी, बुढापा के लाठी, अउ सहारा कर, बन के बेटा अउ नाती । “दे ,दे ,देवा दे ,नइते रस्ता बता दे ,सब ल पडथे कभु आती त कभु जाती ।” अतना कहिके जय सतनाम जय सतनाम बोलत घासी ह अपन वाणी ल थिरका देथे ।
अंजोरी ह सब ल कहिथे …..
आज हमर बीच शासक के पैरोकार ह तुंहर सब के बात ल सुन ले हे ,लिख के रख ले हे ,ओला शासक के पास पेस करे जाही । शासक ह ,आम जनता के हित म ,जरूर कुछ निर्णय लिही।अउ मोर जमीदारी म ,तो जतना तुंहर मांग हे ,सब पूरा होही ।सब जयकारा लगाय लगथे
अंजोरी ह सब ल धन्यवाद देवत कहिथे…..कि सब शांतिपूर्वक ये बइठका म आयेव, सुनेव अउ अपन, अपन बात ल रखेव येकर लिए सब ल बहुत बहुत धन्यवाद ……..

*जयसतनाम *

भुवनदास कोशरिया
भिलाईनगर
9926844537

वृत्तांत- (8) सिरपुर के पुन्नी घाट : भुवनदास कोशरिया

Kosariyaसिरपुर के पुन्नी घाट मा, जन सुनवाई के होय,बइठका ह समापन होइस। सब अपन ,अपन गांव, घर जाय लगिस।पेशवा शासक के पैेरोकार अपन अपन घोडा म सवार हो के दर, दर रइपुर निकलगे। पुन्नी संघ के जम्मो सदस्य मन ,घासी के तीर म आ गे । चारो मुुडा ल, घेर के गोलियावत हे । अउ दीया म ,बतर कीरी बराबर सब झिकावत हे ,एक के ऊपर एक झपावत हे ।घासी म तो ज्ञान हे, विज्ञान है ,ध्यान हे, सुलझे हुए सियान हे ।सब मनखे ह का ? जीव, जंतु ह, घलो जेमा ज्ञान के परख हे, सकलावत हे ।अउ सब के सब कुछ न कुछ पूछे बर उल्फुलावत हे ।
धनमत ह कहिथे …..गांव, गरीब ,किसान ,जीव ,जंतु अउ जहान बर ,तोर सोच, विचार अउ भाखा, बानी ह, हमर मन के दिल दिमाग म, एक हलचल पैदा कर देहे ।हिरदे म,
खलबली मता दे हे ।कि हमु मन, ये देश ,दुनिया अउ ब्रम्हाण्ड म धन, धरा अउ धाम ल ,सत संस्कृति अउ संस्कार ल ,कइसे सिरजावन, अउ कइसे ये ला जन जन म बगरावन।
सगन ह कहिथे …….. घासी ! तोर मुख मंडल ल देखे सेे तो मोला अइसे लगथे।कि तेंह तो सत के एक अखंड बरत मशाल अच।जेकर तीर म जे ह ओध जही ,अंजोर म जे ह जगजगा जही ओ ह दूरिहा ल ही ओकर हिरदे के बाती ह बर के उहू ह, एक मशाल हो जही ।
केंवरा ह कहिथे ……अउ इही मशाल के अंजोर म देश, दुनिया अउ ,सारा जहांन ह जगजग ल उजियार हो जही । फेर सब सफा, सफा दिखे लग ही ।अउ सतनाम के रस्ता ह झके लग जही ।जेमा चल के सब सुखे सुख जिनगी जिहि ।
बसंता ह कहिथे ………ये पुनिया दीदी,ये पुनिया दीदी ,घासी ल हमन सब ल ,एकक झन ल चिन्हवा । जब जब हमन ल ,येकर संग मांगे पर पडही, तब तब हमर एक्के भाखा म, दाउड के आही ।
सुखवंतीन ह कहिथे …… पुनिया दीदी ! कल ये घासी ल, हमर घर बइठारे बर लाहू । चिन्हे जाने रइही तबहे तो कभु इंकर घर चल देबो त बइठ ,उठ कइही ।नइते डेरउठी च, ल कोन अव कहि दीही, खडे च रहि जबो।
सब के सब अपन अपन घर म ,बइठारे बर बुलाय लग गे ।कोनो कहिथे ….. कल के पेज पानी हमर घर राइही ,पुनिया दीदी घासी अउ सफुरा ल तोला हमर घर लाय बर लगही।
कोनो कहिथे …हमरो घर आ जही अपन गोड के धूर्रा ल झर्रा दीही। हमरो घर ह पबरित हो जही ।
कोनो कहिथे …हमरो घर एक कौंरा खा लिही अउ एक घूंट पानी ल पी ली ही ।
कोनो कहिथे …..हमर घर नइ खाही ते ,बइठ के तो आ जही, हमरो मन ह थिर हो जही ।
कोनो कहिथे …….हमन का खवा पिया सकबो बहिनी, एक लोटा पानी ल तो पुरबो ।
कोनो कहिथे ….हमरो घर आ के ,अंगना ल खूंद दीही बहिनी।
कोनो कहिथे …..हमन का मान ,गउन करे सकबो ?, मुंह के सुग्घर बोली ,भाखा ल तो दे सकबो । इही मुंह ह ,आ कहिथे। इही मुह ह, जा कहिथे ।
सबके दया ,मया ,पियांर, पिरीत ल देख के कोनो ल बिहनिया, कोनो ल मंझनिया ,कोनो ल संझा, अलग अलग बेरा म, अपन अपन घर नेवता, हिकारी करे के पारी बंधा डरिस
पुनिया दीदी ह कहिथे ,…
ठीक हे , रे मोर बहिनी हो । तुंहर बात ल कइसे नइ मानहू ।मोर दुलउरीन सफुरा अउ घासी ल सबके घर बइठारे बर लाहूं ,अउ एकक झन ल चिन्हाहूं।सब अपन ,अपन मन के शक ,सुभा अउ गियान ,गुन के बात ल पूछ लुहू ।उहू ह कुछू कांही पूछही, तेला तुहू मन बता दुहू।उहू ह इंहा कांही खोजे बर आय हे ।का जनी ? कोन जंगल, पहार म, जीव,जन्तु अउ जिनावर म ,घास पूस मा साजा ,बीजा, देवदार म ,कण ,कण म या जीव जगत चराचर म ।का जनी ? काकर हिरदे से , बोली भाखा से ,देखे से, सुने से ओकर खोज ह ,मन के दउड ह, थिरथार हो जही ,शांत हो जही ।
चलव चलव ,अपन अपन घर चलव बहिनी हो रतिया ह बाढत हे……. ….पुनिया ह कहिथे। त बसंता ह ,ओकर हाथ ल पकड के रोकत कहिथे …..पुनिया दीदी !ये हमर संगी सहेली के मजमा ह ,छोड़न नइ भावत ये । त चलव, एक गीत गा लेथन, नाच लेथन ,गुनगुना लेथन ,अउ मया के एक्के ठो गठरी म सब के सब बंधा लेथन।सब खुश हो जथे।गोल झूम जथे।अउ घूम घूम के नाचत हे ,गावत हे…… ………
पुन्नी के रात हे ,
नदिया के घाट हे ।
मिल जुल के रहिबो संगी ,
रतिया बीते जात हे।
सुख सोहर गुठियालव दीदी,
दुखे बिसरात हे ।।1।।
चलव मया पिरीत के अइसे बंधना,
घर घर म बांध देबोन ।
भोजली ,जंवारा ,गजामूंग
अउ महपरसाद बदवाबोन।
मित मितानीन अउ सहनइन,
संगी सहेली कहिबोन ।।2।।
चलव, आवव बहिनी हो ,
मिल के गावव दीदी हो।
सुख सोहर गोठियालव संगी हो,
इही म दुख बिसरात हे ।
पुन्नी के रात हे ,
नदिया के घाट हे ।
मिलजुल के रहिबो बहिनी ,
रथिया बीते जात हे ।
करिया ,गोरिया अउ परदेशिया ,
एके दुआरी म आही।
धरम, करम ,भय ,भेद मिटा के ,
एके थारी म खाही ।
सत ,अहिंसा ,प्रेम ,दया ह
सबके मन म सुहाही।।3।।
चलव आवव बहिनी हो ,
मिल के गावव दीदी हो ।
सुख सोहर गुठियालव दीदी हो ,
इही म दुख बिसरात हे ।
पुन्नी के रात हे ,
नदिया के घाट हे।
मिल जुल के रहिबो संगी ,
रतिया बीते जात हे ।

अइसे गावत, हंसत ,खिलखिलावत , मिल ,भेट करत,मत भूलाहू ,हमरो सुरता राखे राइहू काहत सब ल पुनिया दादी ह जय सतनाम ,जय सतनाम के जय जोहार करत घासी , अंजोरी अउ सब अपन अपन गांव ठांव म चले गिस ।

* जयसतनाम *

भुवनदास कोशरिया
भिलाईनगर
9926844437

वृत्तांत- (2) पंग पंगावत हे रथिया : भुवनदास कोशरिया

Bhuvan Das Kosariyaपंग पंगावत हे, रथिया के चंउथा पहर ह पहावत हे ।सुकवा उगे हे, खालहे खलस गे हे । चिर ई चिरगुन मन चिव चांव ,चिंव चांव करत हे। कुकरा ह बास डरे हे। ये संत महुरत के बेरा ये । ये बेरा म योगी जोगी ,ज्ञानी ध्यानी ,विज्ञानी सियानी अऊ जाग जथे कर इया खेती किसानी । जे ह ये बेरा म, जाग के अपन कछु पाये के उदिम करथे ओ ह अपन मंतब म जरूर पूरा होथे ।
घासी म ज्ञानी हे , ध्यानी हे , मानवता के ऊपर होवत अनियाव ,अत्याचार अऊ अंध विश्वास दूर करइया सियानी हे , धरती म किसिम किसिम के उपज करइया ,ये फसल पैदावर के चिभिक जनइया किसानी हे ।इहू ह जाग गे हे , ध्यान लगाय हे ,गुनत हे ,ब इठे हे , अपन धुन म “कि क इसे मनखे मनखे के भेद मिटावन कि मया पिरीत के गठरी बंध जाही ।कइसे धरती म फसल उपजावन कि अन्न धन्न कोठी भर जाही ” ।
थोरकुन बाद रेंहची रेंहची के शोर घलो आय लागिस ।अपन धुन म बिधुन ,घासी के धुन ह, टूट जथे अऊ देखथे,ये शोर ह गोपाल बारी ले आवत हे ,कुंआ बारी म टेडा लगे हे , टेड टेड के भाटा मिर्ची म पानी पलोवत हे ।अब येकर ध्यान ह , भाटा अऊ मिर्ची म लग जथे ।अउ सोचथे …अइसे का चिभिक करे जाय कि एक्के ठो पेड म भाटा अऊ मिर्ची दोनो फर जाय ।
बुढवा मरार ह अथक होगे हे ।अपन रउती के राहत ले सब चाक चौबंद राखे रहिस हे । एक ठो तिनका घलो न इ खरके रहिस हे । बुढवा मरार के एक झन नोहर छोहर बेटा ये। आडी के काडी न इ करवाय रहिस हे ।जब्बर हे , किसानी ह गोपाल तो जानै नही । किसानी के राग पाग ल तभे तो घासी के पांव तरि गिरे रहिस हे ,ये बछर घर के सियानी मुखत्यारी करे बर ।
घासी के रोज के काम राहय एक नजर गोपाल घर के बारी बखरी,खेती खार ,गाय गरूआ ,बैला भैसा सब के जानकारी ले लै ,नौकर चाकर ल हिले के हिले लगा लै , तब अपन घर के काम काज म लगय । एकरो तो लम्बा चौडा कारो बार हे, खुद एक जमीदार हे।गाय, भैस , नस्ल सुधार अऊ घोडा पाले के एक अच्छा घोडसार हे ।पशुधन इलाज के एक जाने माने बैद्यराज है ।
आज गोपाल बारी म बाजा बाजत हे ।गीत गावत हे , जय कारा होवत हे ।घासी ह अचंभित होगे , आजेच तो मै ह ,संतरू अउ नानहे ल भाटा बारी म काम म भेजे रेहेंव ।फेर , का होगे ,ते म बाजा बाजत हे । रटपटा के उठिस अउ गोपाल बारी द उडत जाय लगिस ।देखथे ,उहां तो जमघट लगे हे । लइका सियान सब बाजा गाजा म गावत बजावत हे । नरियर फाटा , हूम धूप चढावत हे।
घुंचौ घुंचौ कहिके सब ल तिरियावत भीड के अंदर जाके घासी ह जोर से डपट के बोलथे …..अरे संतरू ! का होगे रे । का करत हव सब ।कोनो तो मोला बताव ।गाना बजना बंद हो जथे ।घासी ह देखथे ..सब थारी म नरियर ,पान सुपारी ले के खडे हे ।नान्हे के बिहाव होय बारा बछर होगे हे । सबके कोरा म ,नान नान नोनी बाबू खेलत हे । मोरो सुन्ना अंगना म लइका के किलकारी आ जाही , कहिके भाटा के संग म फरे मिर्ची ल देख के अउ सब अपन अपन दुख दरद अउ मन्नत पूरा होय के आस म इंहा आय हे ।
संतरू अउ नान्हे दूनो परानी आरती के थारी ल पकडे हे ।कस रे संतरू !तुमन सब ये का करत हव रे । मै तो तुमन ल ये भाटा बारी म निंदाई कोडाई बर भेजे रेहेंव रे । संतरू ह बोलथे … हाँ ! कका हमन निंदत निंदत देखेन कि ये भाटा के सातेच पेड म भाटा अउ मिर्ची दोनो फर लगे हे ।भगवान ह संउहत इंहे उतर गेहे । अइसना अचरूत कहिच न इ देखे रेहेन ।हमरो कोरा म आमा अमली के फर मिल जही । कहिके सब गांव के मन ल बुला के भाव भजन करत हन । तहूँ ह देख ले कका ! ये सातेच पेड म कइसे भाटा मिरचा फरे हे तेला ।
गोपाल मरार अउ मरारिन आरती के थारी ल पकडे घासी के पास आ जथे । अउ आरती उतार के पांव तरि गिर के कहिथे ।जब ले तोला हमर घर के सि यानी मुखत्यारी सौपे हन तब ल हमर घर म कुछ न कुछ अचरूत घटना होवत हे ,ये सब तोरेच कृपा आय । अब सब के सब घासी के ही आरती करे लगे ।बाजा बजे लगे गीत गाए लगे ।घासी बाबा की जय ,घासी बाबा की जय ……जय जयकारा होय लगिस ।
साहेब सतनाम ,साहेब सतनाम अभिवादन के बाद घासी बोले लगिस ……कइसे रे संतरू !ये भाटा के पेड ह तोला बच्चा दे दीही रे ।भीड तरफ देखत बोलथे …..तुहू मन बताव ये जड पौधा ह तुंहर मन के दुख दरद ल दूर कर दीही , तुंहर मन्नत ल पूरा कर दी ही ।कोई बोल न्इ सकत ये ,एको झन हिल डोल न्इ सकत ये । जे मन संउहत भगवान समझ के पूजा पाठ करत रहिस ,घासी के गोठ ल सुन के सब ठाढहे सुखा गे हे ।
घासी ह कहिथे ….ये दुनिया म दो चीज हे , एक जड दूसरा चेतन ।चेतन याने जो चेत सके , देख ,सुन ,सूंघ चख अउ छू के जान सके ।जेकर पास पांच ज्ञान इंद्रीय हे उही ह चेतन आय अउ जेकर पास न्इये ओ ह जड आय ।अउ ज्ञान के बिना सबे जड आय ।
ये भाटा के पौधा म मिरची के फर लगना कोनो भगवान के संउहत उतरना नोहय । ये तो एक प्रकार के ज्ञान आय ।पेड पौधा क्इसे जामथे ,बाढथे ,एक दूसर म संघरथे ,फूलथे अउ फलथे । ये सब जानना एक ज्ञान ये ।जेला वनस्पति ज्ञान कहे जाथे ।मै खुद किसिम किसिम के पौधा लगाय के चिभिक करे हंव । जेमा भाटा के पेड म मिरची संघार के एक्के ठो पेड म दूनो फर ल फरोय के उदिम करे हंव ।देक्खे लग्गे न ?
जिंहा जिंहा अज्ञान हे ,
उंहे संउहत ब्इ ठे भगवान हे
जिंहा जिंहा सदज्ञान हे,
सब दुख दरद के निदान हे ।
ये दुनिया म जो चार सत हे ,उही ह अखंड सत हे ।पहला जनम ,दूसरा मरण ,तीसरा ये दोनो जनम मरण के बीच म जो समय होथे ,जेला हमन जीथन वो हे जीवन । अउ च्उथा हे ये जीवन ल सुखमय जीये के जो ज्ञान हे ,जो रस्ता हे ,जो नाम हे , उही ह सतनाम हे ।जनम अउ मरण तो हमर बस म नइ हे ,जीना तो हमर बस म हे ।अनियाव अत्याचार ,ढोंग ,ढकोसला अउ अंधविश्वास से दूर प्रेम ,दया ,करूणा अउ क्षमा से जुड ,जिनगी जिये के रस्ता ,जेला पाए बर ,जेला जाने बर ,जेकर ज्योति जलाए बर हमन गुरू के शरण म जाथन । जेकर बिना सारा जिनगी घनघोर कुलूप अंधियार हो जथे ,मुह जोरे नइ दिखय । सतगुरू के ज्ञान ओ दीया के बराबर हे जे ह बरते ही उजियारा कर देथे ।कोई भेद न्इ करय ,न जात के ,न पात के ,न ऊपर, के न नीचे के सबले बराबर अंजोर करथे ।
गुरू बाबा की जय , गुरू बाबा की जय
जय कारा लगाय लगथे ।
इही बीच गोपाल मरार ह जन मानस ल कहिथे ….आज ले ये हमर गुरू ये , येकर बताए ज्ञान म,रस्ता म ,सबला चलना हे ।जिन्दगी ल सुखमय अउ गांव ल सरग बनाना हे । हमर सबके जिन्दगी म अज्ञान अउ अंधविश्वास के अंधियारी छाये रीहिस हे ।अब हमर बीच ज्ञान के सुरूज ह आ चुके हे । अब येकर प्रकाश से हमरो अंधियारी जिन्दगी म बिहनिया होय बर पंग पंगावत हे,रथिया पहावत हे , अब हमरो जिनगी उजियार होय बर आवत हे ।
” जय सतनाम “

भुवनदास कोशरिया
9926844437

वृत्तांत- (3) कोई उही म दहावत हे, कोई इही म भंजावत हे : भुवनदास कोशरिया

Bhuvan Das Kosariyaकुंवार लग गेहे ।सब धान के बाली ह, छर छरा गे है ।बरखा रानी के बिदाई होगे हे ।जगा- जगा काशी के फूल ह, फूल गे हे ।मेढ ह ,भक- भक ल बुढवा के पाके चुंदी बरोबर दिखत हे।ऊपर खेत म दर्रा फाट गे हे ।धान ल, ठन ठन ल पाके बर एक सरवर पानी के अउ असरइया हे ।अब का गिरही ? रथिया तो छिटिक चंदैनी अंजोर रीहिस हे ।बदली ह छट गे हे ।एक पिछौरी के जाड शुरू होगे हे ।शीत बरसे लग गेहे ।रुस- रुस, रुस -रूस गोरसी ह ,अब्बड सुहावत हे ।धान के संग उंहारी उतेरे के बढिया पाग आये हे ।मुही पार के आखिरी जुगुत के बेरा हे । कहीं पानी रेंगाय के तो कहीं मुही फोरे के ।
आज घासी ह बाहरा डोली जात हे ।मेढे मेढ एक पइंया रस्ता हे। सरर -सरर पुरवाही चलत हे ।बाहरा डोली म दुबराज धान बोवाय हे ।महर -महर महकत हे ।ओकर सुगंध ह खार भर फैल गे हे ।फर्लांग भर के आदमी मन घलो जब पुरवाही के दिशा ह बांहकय त सुगंध म आ…..हा……हा कहिके सांहस भर भर लेवय । कई झन तो कहां से माहक आवत हे , कहिके बाहरा डोली के धान ल देखे बर जाय। धान के भीरा अउ छर छर ल निकले बाली ल देख के तीर- तीर के गांव म घलो चर्चा हे ,कि ये बछर गोपाल ह ,अपन घर के रउती घासी ल सौपे हे ,तब ले उंकर घर के सबे काम अउ किसानी बियारी ह ,आगू के आगू होवत हे ।
घासी ह ,सबे खेत के मुही पार ल देखत हे ।मंझोत म बाहरा डोली हे ।मुही के तीर तेंदू के पेड हे। एकरे छइंहा म घासी ह खडा होइस। कुंवांर के घाम ये ,घमा गे रीहिस, पसीना म बदन तर- बतर होगे रहिस । घासी पेड के छ्इहा म बइठ के सुस्तावत हे ।,फुर- हूर ,फुर- हूर पुरवाइया चले लगिस ।पसीना सुखे लगिस ।तब घासी के मन ह, थोरकुन थीर लागिस ।त देखथे मुही तीर म, दू ठो मछरी कइसे खेलत हे ,जिंदगी के मजा लेवत हे ।देखते- देखत खेत के पानी अटावत हे, मछरी के खेलई ह बिगडगे ,अब खलबलावत हे ।घासी के नजरे नजर म अंतरमन म मछरी के मरना ह ,झके लग गे कि जल बिना मछरी कइसे फडफडाही अउ तडफ तडफ के कइसे मर जाही ।इही बीच घासी के कान म मछरी के तरफ से एक आरो आथे….चित म अन्तर्ध्वनि गूंजथे……..कि ” हमू मन तोरे सहींन मनखे रहेन ,रहेन दूनो परानी , का करनी करे रहेन मछरी के मिलिस जिंदगानी ।”
घासी ह ध्यानस्थ हो जथे , चिंतन के समंदर म ,विचार के ज्वार भाटा ह ,पहाड जैसे ऊपर नीचे होवत हे ।सत के खोज ह ओकरो ल आगे उठत हे ।
घासी …ये घासी …के आवाज म ,घासी ह झकना जथे ,। आंखी ह बडबड ल खुल जथे ,देखथे मेढ भर गांव के आदमी मन सकलाय हे ।भीड लगे हे । बेरा ह ,उत्ती के ह, बूडती म उतरगे हे ।घासी, घर नइ लहुटे ये ।सफुरा ह ,गोपाल के घर पहुच जथे ।सफुरा ल देखत, गोपाल के जीव ह, धक ल हो जथे । घासी ह, बाहरा डोली ल अभी ल नइ आय ये । गोपाल के मन ह ,नइ माढय ,जिपरहा खेत ये ,कही अनहोनी मत हो जाय कहिके ,सब नौकर चाकर अडोसी पडोसी अउ गांव के बडे बडे सियान मन ल लेके बाहरा डोली गिस । त उंहां देखथे ,घासी ह ध्यान म मगन हे।
घासी ह सब ल देख के कहिथे …तुमन सब कइसे आय हव गा ।गोपाल ह ,घासी के आगू म आ के कहिथे …..दुहानी के बेरा ल ,तेंह खेत दे खे बर आय हच ,अउ बरदी दरसे के बेरा ह होगे हे ,अभी ल का करत हस ।अउ ये ह का ये ? तोर आगू म दू दू ठन मछरी ह मरे परे हे । घासी ह कहिथे …..हाँ ! गोपाल इहीच ल देखत अउ जिनगी के बारे म गुनत मोर सुद्ध बुद्ध ह बिसरागे ।मति ह हजागे ।
मोर आंखी के सामने कइसे ये मछरी ह खेलत रहिस ,अउ देखते देखत का से का होगे ? खेत के पानी अटागे । मछरी ह खलबलावत रहिस ,फडफडावत रहिस ,फेर तडफ तडफ के चित्त हो गे । पता नही का होगे ? अब तो मूर्दा होगे । अब येमा अइसे का चीज नइये ? जेमा ये ह हालत नइये ,न डोलत नइये ।पहिली येमा का चीज रहिस ? तेमा बढिया खेलत रहिस ।
” येमा का रहिस? अउ ओ ह कहाँ गिस ? इही ल कोई तो मोला बता दव ?
का,ये ,जे कर कहाँ हे ठौर,
अउ कहाँ हे ठिकाना ।
कइसे होथेे येकर आना ,
अउ कइसे होथे जाना ।
घासी के बाणी सुन के सब जयकारा करे लगथे…….
घासी बाबा की जय …..
घासी बाबा की जय ।
जयकारा होय लगथे ……..
पूरा खार कले चुप हो जथे । कोन ओला बता सकही ?सुरूज ल, दीया दिखा सकही ?समंदर म ,पानी छलका सकही ? नहीं ।दुबराज धान के खुशबू थिर होगे । लहरावत धान के बाली ह ,सोझ होगे ।खसलत सूरूज ह ,ठाढ होगे ।पेड के चिराई चिरगुन मन शांत होगे ।डारा, पाना, हिलना डुलना भूल गे ।सबके सब ध्यानस्थ होगे ,घासी के वचन ल सुने बर …….. ।
घासी ह फेर कहिथे ……हमर सब के जिनगानी ह एक पहेली ये, एक अजब गजब जनऊला ये । जेला बताये बर मनखे इहां ,जब ले जनम ले हे ,तब ले एक से एक मनखे मन उलफुलावत हे । ऋषि ,मुनि ,संत, महंत ,पोप ,पीर ,फकीर ,गुरू ,योगी, जोगी ,ध्यानी ,ज्ञानी सबके सब कुछ के कुछ बतावत हे । जेकर जइसे मन म ,आवत हे उही म दहावत हे ।धरम, करम ,यज्ञ हवन ,यंत्र तंत्र, पूजा पाठ करके कुछ इही म भंजावत हे ।कोई नाम पान ,दान ,बलिदान ,सुमरन मंत्र, ज्ञान म लहावत हे ।ढोग ढकोसला अउ अंधविश्वास म भरमावत हे ।कोई लडत हे ,कोई लडावत हे ,मनखे ह, मनखे के खून बहावत हे ।अपन अपन पीछे चलाय बर ,सब उभरावत हे ।ये दुनिया ह ,भेड धसान ये ,जिही तरफ देखबे उही तरफ सब जाय बर उम्हियावत हे ।अब मोला तो कुछ कुछ समझ आवत हे ,सत के रस्ता ह मोला कुछ कुछ झकावत हे ………
“कोई उही म दहावत हे ,
कोई इही म भंजावत हे ।
सच्च के रस्ता ह मोला ,
कुछ कुछ झकावत हे ।
घासी बाबा की जय …..
घासी बाबा की जय …
जयकारा करत सब घासी के संगे संग गांव गिरोद की ओर चले जाथे ……
“जयसतनाम”

भुवनदास कोशरिया
भिलाई
9926844437

वृत्तांत- (4) न गांव मांगिस ,न ठांव मांगिस : भुवनदास कोशरिया

Guru Ghansidasअठुरिहा ह पहागे हे।जब ले बाहरा डोली म होय ध्यान ह,घासी के मूड म माढे हे तब ले अचकहा रोज ओकर नींद ह उचक जथे ।कभु सोपा परत , कभु अधरतिया , त कभु पहाती ।ताहन नींद ह न्इच पडय ।समुच्चा रथिया ह आंखीच म पहाथे ।टकटकी आजथे …… ये सोच म कि “ओ दिन क इसे बाहरा डोली म तउरत ,खेलत मछरी ह पानी के सिराते ,फड फडा य लग गे,तडफे लग गे ,आखिर म हालय न डोलय ,चित होगे ।का चीज रहिस कि मछरी ह खेलत रहिस ,अब का चीज नइये की वो ह चित होगे । सबके शरीर म ये हावे ते ह का ये ? कहां से आथे ? अउ कहां चले जाथे ?
घासी ह रथिया रोज पलंग ल उतर के ध्यान म बइठ जथे ।हालय न डोलय अउ न कुछ बोलय । सफुरा ह झकना जथे ।अपन पलंग ल टमडथे , घासी ह नइये । अपन ओढे पिछौरी ले मुंह उघार के देखथे । ठुडगा रूख बरोबर ठक ठक ले कोनटा म बइठे हे ।सफुरा ह परेशान हो जथे । अउ कहिथे ,,,,,, तहूं ह अंतउले करत हस , रात रात भर जागत हस । का होगे तोला ?बता तो मोला ।का गुनत हच ? अउ का दुख दरद हे तेला ?
घासी ह कहिथे ,,,,,,,,देख सफुरा ! मोला कांही दरद हे,न कांही दुख हे ?मोला तो मोर हिरदे म जागे सतनाम के भूख हे । बाहरा डोली म उठे एक खोज हे ।जेला कोन ह बता ही ? अउ कइसे मिल पा ही ?इही ह मोर नींद ल उडा दे हे ।भूख ल भगा दे हे । तहूं ह बता , कुछू जानत होबे तेला ।
सफुरा ह सोय पलंग ल उठ जथे । घासी ह पद्मासन बइठे हे ।योग ध्यान मुद्रा म हे।आंख अधखुला हे । सफुरा ह घलो घासी सामने ओइसने मुद्रा म बइठ जथे । अउ कहिथे ,,,,,,, मैं ह का बता पाहूं ? लेकिन हाँ ! मोर पुनिया दादी हे ,जे ह जरूर बता सकत हे । मैं ह अपन दादी के अडबड दु लौरिन रेहेंव ।संगे म नहवावै ,खवावै ,जिंहा जिंहा जावै संगे संग घुमावै । रथिया संगे म सोवावै अउ किसिम किसिम के कहानी किस्सा सुनावै ।मै हुंकारू भरौं।हुंकारू देवत देवत मोर नींद ह लटक जाय ,त किस्सा ह घलो रूक जाय । मोर नींद ह फेर उचक जाय अउ हुंकारू देना शुरू हो जाय ।मोर पुनिया दादी के किस्सा ह कभ्भो नइ सिरावय ।रंग बिरंग के गीत ,कहानी किस्सा तुरते गढय बात बात म हाना पारै ।जनऊला अइसे पूछै कि बडे बडे मन पानी मांग लय ।बोली ठोली म ही बाण चलाय ।हंसी ठिठोली म ही सबके दिल जीत लै ।ओकर बोली भाखा म मिठास हावय ।चार झन अवइया जवइय ओकर डेरउठी म पडेच राहय ।ओकर जनऊ ह सब जिंदगी ल जुडे सवाल राहय ।दुख दरद के इलाज राहय ।मनखे ल मनखे जोडे के रोज ओकर काम राहय । आज तहूं ह चल , का तोर जाने के इच्छा हे तेला तहूं ह चल पूछ ।
घासी ह सफुरा के बोली ल सुन के आंखी म आंखी गडा के एकटक देखे लगथे ।अउ आंखी आंखी म कहिथे …….. तही हच मोर मया पिरीत के पुछारी । तही हच मोर दुख दरद के संगवारी । तोर मया पिरीत के बोली अडबड गहरा हे ।दया धरम के बोली जइसे अमृतभरा हे । अउ मने मन म कहिथे …मोला सफुरा कबभो नइ बोले रहिस ,आज अइसे बोलिस कि ज्ञान के लहरा म मोर आठो अंग ल भिंजो दीच ।अब सफुरा ल अपन छाती म लगावत कहिथे ….. मैं ह धन्य हंव !जो तोर सही जांवर जोडी पायेंव ।जो अइना ज्ञानी ध्यानी दादी के अंग संग म सीखे पढे अउ कोरा म पले बढे ह मिलिस । सफुरा ह कहिथे …….नहीँ …..नही ,नही ,नही ।आइना बात नोहय ।जब जब मै ह अपन दादी के पांय पायलगी करंव तब तब ओ ह मोर झुकाए सिर म अपन दोनो हाथ के छांव देके का हय …..जुग जुग जियो बेटी ,लाख बरिसो ।दूधे नहाओ ,दूधे खाओ ।सुघ्घर संत ज्ञानी पति पावो । बेटी बेटा नाती छनती से घर भर जाओ ।दुनिया म अपन नाम कमाओ ।कहिके आशिष देवय अउ मोला उठा के अपन दूनो हथेरी ल मोर दूनो गाल म लगा के मुंह जोर के चटाक चटाक चुमा लेवय ।अउ अपन छाती म लगा के गदगदा के हंसत गला मिलय ।ओकरे आशिष से मै ह तोर सही पति पाय हंव ।
दूनो परानी आजेच सि रपुर जाय के तियारी म लग जथे ।घासी के पास धौरा धौरा चमकदार रंग के पोरिस भर भर ऊंचा पूरा बइला हे । सिंग खडा खडा हे ,पूंछ लम्बा ,काला हे ।आंख कजरारा हे ,तरमराती चाल हे । सिंहि ल सिंहिल करत सुगठित बदन हे ।बरार नसल के हे ।इंकर धोना ,मांजना ,दाना पानी खिलाना पिलाना खुद घासी ही करय ।अपन बेटा बराबर मानय , हीरा मोती कहिके बुलावय ।उहू मन घासी के अइसे दिवाना राहय कि घासी ह जइसने जेला ,बुलावय ओह ओइसने बात मानय ।
हरेली के तिहार म सारंगढ रियासत के राजा ह हर साल बइला दौड के आयोजन करथे ।ये पांचवा बछर ये लगातार घासी के बइला ह पहिला इनाम पावत हे ।दग दग ल सादा धंवरा बइला हे ओमा रंग रंग के फूल छपाय हे । सिंग म कौडी गुंथाय हे ।मंजूर पांख चलो लगाय हे। गला म घांघडा बंधाय हे । ज बइला दौडे तो राजा घलो देखइया मन के संग मुंह फार के देखय ……ओ …..हो कहिके दंग रहि जाय ।दांतो तले उंगली दबा लै ।अउ सब ऐ …हे…..ऐ …हे…. कहिके चिहोर पार के खुशी म नाचय ।
राजा ह पहिला इनाम देये बर घासी के नाम पुकारै तो सब जनता ताली बजा के स्वागत करय । राजा ह घासी ल इनाम देवत अउ फूल हार ,नरि यर ,धोती से सम्मान स्वागत करत सब जनता ल कहिथे …… देखव !सब घासी के बइला ल देखव । पहिला इनाम पाय हे ।तुहू मन सब अपन अपन बइला ल अइसने सजाय सम्हराय कर व। अच्छा खिलाय पिलाय कर व ।अच्छा सेवा जतन करे करौ ।मै ह घासी के पशुधन के प्रति सेवा जतन अउ प्रेम भाव ल देख के बहुत खुश हंव ।ये पहिला इनाम देये के साथ साथ मुंह मांगे इनाम देये के घोषणा करत हंव ।जो दिल चाहे मांग सकत हे ।
राजा के घोषणा ल सुनत घासी के मन म खुशी के ठिकाना नइ राहय ।राजा ये , का मांगव ?का नइ मांगव ? हक्का फूटत न बक्का । चिंतन म पडगे ।फेर घासी के मन म एक बात आइस …….”सारंगढ राज म बहुतेच देवी के स्थान हे ।जिंहा पशुबलि के नाव म हर साल हजारो जानवर के पुजई कर दिये जाथे “। अउ घासी तुरते राजा ल बोले लगथे ।राजा महाराज …..अगर मोला मुह मांगे इनाम देना चाहत हव तो मै अपन इनाम के रूप मे जनता बर ओ आदेश मांगना चाहत हंव कि आपके ये सारंगढ राज म ओ आदेश दे दव कि आज से कोई भी स्थल म बलि अउ मांसाहारी के नाव म जीव हिंसा नइ हो वय ।ये इनाम मोर जिंदगी के सबसे बडे इनाम होही ।अतना सुनत राजा सकपका जथे ।ठाढे झुखा जथे । जबान चुके हे ,मुंह मांगे इनाम देयेके ।मुकर सकय नही ।
राजा ह सब जन मानस ल कहिथे …देखव !घासी के महानता ल देखव ।अगर चाहतिच ते धन दौलत रूपिया पैसा ,खेती खार अउ मोर से जमीदारी भी मांग सकत रीहिस । अउ मै चाहत भी रेहेंव दस बीस गांव अउ दे दूहूं ।लेकिन वो ह, “न गांव मांगिस ,न ठांव मांगिस , जीव पर दया अउ प्रेम के भाव मांगिस ,सबे जीव एके बरोबर ,ये कर एक नियांव मांगिस ।”
राजा ह कहिथे …… आज से मोर शाही फरमान हे ! मोर राज म,कोई भी स्थान म बलि अउ मांसाहार के नाव म कोई पुजाई नइ होवय ,कोई हिंसा नइ कर सकय ।जीव हिंसा ह पाप ये ,राजकीय अपराध ये ।येअपराध जे करही ओला कडी से कडी सजा दे जाही ।सबे जीव एके बरोबर हे ।सबे पशुधन ल अपन घर के परिवार बराबर मानहु ।सेवा जतन अउ प्रेम पूर्वक रखहू ।मै घासी के बहुत बहुत आभार मानत हंव जेकर कृपा से ये शाही फरमान देये के मोला गौरव मिलिस ।
इही कहिके राजा ह सब किसान मन ल किसानी बारी अच्छा अच्छा होय के,घर परिवार सुख शांति मय राहय ,इही ह मोर तरफ से बधाई हे।
लोग सब एक दूसर ल बधाई देवत ,हंसी खुशी से अपन अपन घर लहुटत हे ।

भुवनदास कोशरिया
भिलाई
9926844437

वृत्तांत- (1) इंहे सरग हे : भुवनदास कोशरिया

Guru Ghansidasसंतरू के अंगना म पारा भर के लइका मन सकलाय हे। आज अकती ये। पुतरी, पुतरा के बिहाव करे बर, आमा डारा के छोटे कन ढेखरा ल मढवा बना के आधा लइका मन पुतरा अउ आधा लइका मन पुतरी के सगा सोदर, ढेडहीन, सुवासिन अउ पगरइत, पगरइतिन बन के बिहाव के नेंग जोग करिस। अब्बड उच्छाह रीहिस लइका मन के मन म। संतरु ह घलो लइका म लइका मिल के लाडू रोटी के बेवसथा कर दीच। कलबल कलबल करत लइका मन के आरो ल पा के अपन दुलौरिन बेटी ल खोजत घासी ह संतरू के घर म पहुंच जथे। बेरा ह ठढिया गे हे, खवई पियई ल तियाग के इंहा जीव ल दे हच कहि के पुतरी के दाई बने अपन बेटी सहोदरा ल कहिथे।लइका मन सब लजा जथे। अउ लाडू रोटी ल पा के अपन अपन घर जाय लगथे।
बडेज्जान अंगना, चौफेर परछी ल लइका मन गजबज गजबज करत निकलत राहय। बाजवट म चादर बिछावत संतरू ह घलो गदगदा के हंसत घासी ल बइठाइस। अउ लाडू रोटी देवत कहिथे …..कका !मे ह पुतरी पुतरा के बिहाव करे हंव गा। ये बछर सरग देवता ह अब्बड बरसा कर ही।
हत रे भकला संतरू ! पुतरी पुतरा के बिहाव करे ल कोनो पानी गिरही रे। संतरू के हंसई ल देख के घासी ह कहिथे ….पानी गिराना हे त ये धरती के सेवा अउ सिंगार कर, पेड अउ पौधा लगा, जंगल ल बचा।
एक टुकना धान ल संतरू के हाथ म धरावत नान्हे ह कहिथे……. का तेंह लइका मन संग लगे हच। आज ले हमर किसानी बारी के दिन ह आगे हे। जा तेंह गांव के ठाकुर देंवता, साहडा देंवता, डीह डोंगर म बिजहा चढा के आजा। जब तक मे हं बढबइला ल दाना भूसा खवा पिया के रखत हंव। फेर गरउसा खेत म हूम जग दे के, बिजहा छिच के एक हरियर नांगर जोत के नेंग कर देबे।
तहूं ह भकली हच ओ बहुरिया नान्हे ! पथरा के देवता म धान चढाय ल, बिजहा हे, के अबिजहा हे, तेला का ओ ह बता दिही ओ। घासी ह कहिथे ……तोला पता करे भर हे, त अलग अलग धान के छोटे छोटे मोटरी बना के पानी म भिंजो के रख दे। चार छै दिन म खोल के देख ले। के ठो बीजा जामे हे तेला। संतरू ह नान्हे के बात परत हाहा….हीही…करत लाइका मन के बिदाई करके अपन किसानी के नेंग म लग जथे।
एक अठुरिया पहाय नइ पाय रीहिस पुतरी पुतरा के बिहाव ह, उमड घुमड के बरसा होय लगिस। चारो कुती हुहेल्ला कर दीच। झुक्खा नदियां नरवां भरगे, सांयफो सांयफो करे लग गे। मेचका टर राय लगगे, झिंगुर गीत गाय लगगे ,बतर किरा उडियाय लगगे ।सब किसान के हिरदे जुडियाय लगगे, भुइंया के पियास बुझाय लगगे। अब आगे आगे, बतर बोवई के पाग आगे। सब किसान मन गुठियाय लगगे।
गांव भर धान बोवई म बदक गेहे। गोपाल मरार ह गांव के बडका किसान ये।चार जोडी नागर बइला संग म सउंजिया, बाहरा डोली जात हे। हुम धूप अउ एक बोकरा घलो ले जात हे। मुंधरहा ल घासी ह स्नान ध्यान करे बर तरिया गे हे। लहुटत रस्ता म गोपाल मरार से अभरेट्टा होगे। नांगर बाइला अउ बोकरा ल देखत घासी ह कहिथे…… कस गा गोपाल ! ये नागर बइला चार जोडी बराबर दिखत हे। त ये बोकरा ल काकर संग फांदबे गा। एक्के ठो दिखत हे। गोपाल ह खिसिया के कहिथे ……तोरेच संग फांदहू। देख ददा तेंहा! हांसी, ठठ्ठा मत कर। मोर बाहरा डोली ह बडा जिपरहा हे। बिना जीव देय, बोनी बक्खर नइ कर सकन।
घासी ह कहिथे ….सिरतोन कहिथच गा। जी देयेच ल पडही। गोपाल ह कहिथे …हमर पुरखा ह आवत हे बाबू! अइसने देवत। घासी ह कहिथे …. नइ देबे त का हो जही? देवता धामी के काम ये, लइका के खेल नो हय। गोपाल ह कहिथे …. अते कन हांसत खेलत मोर परवार हे, नांगर बइला, सउंजिया रबिया हे, कांही हो जही त ?
घासी ह घुडक के कहिथे….. कांहिच नइ होवय। ये तोर बोकरा ल छोड येकर बदला म मेहा जा हूं। अउ तोर बोनी बक्खर कर ल के दिखाहूं। घासी के घुडकइ ह गोपाल के छाती म खड बाण कस बेधागे। अउ तरमरा के कहिथे … अतेक खरबइता यच त ले। ये बोकरा ल ढील देथंव अउ तेंह ह अभीच चल, हमर संग, अउ अगवार नांगर ल जोत के बता। अउ कांही होही त तेंह जान। घासी ह बोकरा ल छोडवा के गोपाल के संगेसंग चल देथे, चारो सउंजिया मन नांगर ल बोहे, बइला चरवाहा बइला ल खेदत,  मरारिन समुंद ह, हूम धूप अउ बिजहा ल बोहे चलत हे बाहरा डोली खार…..घासी सतनाम सतनाम जपे बार बार।
बाहरा डोली म पहुंच के सउंजिया मन कहिथे …. मालिक जब तक इंहा हूम धूप अउ जीव के बली नइ देबे तब तक हमन ये नांगर ल नइ चलावन। गोपाल ह झुंझवा जथे। अउ घासी ल कहिथे …… देख! देख घासी अब तेंह एकेच झन ये नागर ल जोतबे। घासी ह नहाय के बाद रखे खांध म कच्चा धोती ल मेढ म झुखा देथे। सादा के धोती कुरता पहिरे हे, मुड म पागा बांध के, पहिली बिजहा ल खेत म छिचथे। तब तक सउंजिया मन सबसे गरियार बइला ल नांगर म फांद के दे देथे।घासी ह नांगर के मुठ ल पकडथे अउ बोलथे ………….चल सदगुरू साहेब जय सतनाम कहिके नांगर चलाय लगथे।
गोपाल मरार कांही अनहोनी घटना होय के डर म कांपत मने मन बोलत राहय ……. जय धरती माता, चांद, सूरूज, जगीन देव, जल देउती दाई, ठाकुर देवता, महाबीर, महा माई, रकत माई, कुलडीहीन,  कालिका, कांही होवय………. ते घासी के ऊपर होवय ….। घासी नांगर जोतत राहय। गरियार बइला घलो घासी के परेम अउ दुलार ल पा के एक मन आगर रेंगत राहय। समुंद अउ गोपाल ह एक भावर नांगर के जोतत ल कांपत दे खत राहय। कांहिच नइ होइच। अइसने देखत देखत एक हरिया, एक डोली,  दू डोली, जोतत सब खेत ल जोत डरिच।
मझनिया होगे राहय। मुंधरहा ल स्नान ध्यान करे बर गे हे। घासी ह घर नइ लहुटे ये। सफुरा ह कलबलावत राहय। का होगे ? अभीच ल, आय नइये तरिया ल। तरमर तरमर करत सफुरा ह तरिया कुती जात हे, जिही ल पाय तिही ल पूछय।कोनो देखे हावव का ….. ? कोनो देखे हावव का ……..? हमर इंहा अमरू के ददा ल।
लीम चउरा म बीडी पियत बइठे पटइल ह कहिथे …… कोन ल पूछत हच बहुरिया। तरिया बिहंचे ल नहाय ल गे रहिस हे। अभी ल नइ लहुटे ये। हमर इंहा के हा।कहिके सफुरा ह कहिथे। सफुरा ल पटइल ह गोपाल संग घासी के होय बाता चिता के बारे बताइच। त सफुरा के मन ह नइ माढिस। धसर धसर गोपाल के बाहरा डोली कुती चले गिस। बेरा ह खिसल गे रहिस।भूख म गोपाल घलो अकुला गे रहिस। सउंजिया ल नांगर ढीले बर कहिथे। घासी ह बइला ल च.अ…..च..अ……च.अ….च..अ.करत परेम से पुचकारत दुलारत हो…रे…हो…रे….हो…रे…. कहिके नांगर ल खडा करथे। सफुरा घलो अरकट्टा आ के पोरिस भर मेढ ल नाहकिच। त देखथे ……दोनो परानी मरार मन घासी के पांव तरि गिरे रहिथे। अउ काहत रहिथे … धन हे तोर महिमा अपरंपार हे घासी। पुरखा ल होत आवत पाप ल हमन ल उबार देयच। सफुरा अउ घासी ह दोनो परानी ल उठावत अउ घेंच म लगावत कहिथे ….. आज ले भय भरम अउ अंधविश्वास म पड के बोकरा के पुजई मत करहू, नरबलि, पशुबलि के नांव म कोनो जीव ल झन मारहू। सबे जीव एके बरोबर आय। जीव हइता पाप आय। गाय अउ भइस ल नांगर झन फांदहू। ठाढे बेरा म नांगर मत जोतहू। हाथ जोडे दूनो परानी मन कहिथे …… आज ले हमन तोरेच रस्ता म रेंगबो। अउ एक ठो हमारो बिनती हे।आज ले हमर घर के सियानी मुख्तियारी तुंहींच ल करे ल पडही।
नौकर चाकर नांगर ढील के बईला ल खेदत सब घर जाय लगिस। घासी अउ गोपाल मरार, सफुरा अउ मरारिन समुंद संगे संगे घर जात हे डर मत हिम्मतकर हमन तो हन कही के धीरज बंधावत हे। अउ घर जावत हे।
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बोनी बक्खर होगे राहय। संझाउती के बेरा ये। पटइल के लीम चाउरा म कच कच ले आदमी मन सकलाय राहय। जगन्नाथ ले आय हे पंडा। दग दग ले घुठवा भर धोती, पूरा बांही बंगाली कुरता पहिरे, मुड म सादा के टोपी, माथा भर तिलक चंदन म पोताय हे। सब मुह फार के सुनत राहय। भगवान जगन्नाथ के किस्सा ल। भगवान के रथ झिके ल पुरखा ह तरथे।अउ लादिक पोटा होवत कहीं जी ह छूटगे त, तुरते सरग ह मिलथे। तीरथ धरम के परचार करत पंडा मन तीर तार इतराभ म घूमगे।
रात ह पंग पंगागे राहय। संतरू के नींद ह उमच जथे। आंखी ल रमजत रटपटा के उठथे। देखथे, सुकवा उगे हे। नान्हे ….ये नान्हे….उठ, उठ..। जलदी तियार हो। गिराउद म सब जगन्नाथपुरी जाय बर चार दिन ल जोरत जंगारत हे। पटइल ह येकर अगवाई करत हे। छै आगर छै कोरी आदमी मन मोटरा चोटरा जोर के लीम चिउरा म सकलइच। हफता भर के रद्दा हे जुडे जुड रेंगबो कहिके मुंधरहा ल निकल जथे। अउ गीत गावत रहिथे………भगवान बोलो ……….जगन्नाथ हे ………..।
तिरीथ जवईया मन के रेम लगे हे। सारंगढ के तरिया पार म ढार परे हे। राजा घलो पुण्य कमाये बर जात्रा भण्डारा खोले हे। दोनो हाथ जोडे दूनो राजा रानी सब अवईया मन ल जेवन पा लौ, जेवन पा लौ, हमरो कुती ल कहिके निवेदन करत हे। रेंगई म सब थके राहय। पेट म अन्न परिस। तरिया पार म परपट ल सोय हे। सबो के नीद ह चर्रस ल परगे। इही ढार म घासी ह घलो सोय हे। “सरग ह कइसना होही, अउ पुरखा ह कइसे तरत होही ” जेला पाये भर सब उम्हियाय हे। इही सोच म रात ह पहागे। कतनो उदिम करिस तभो ल नींद ह नइ परिस। संतरू, गोपाल, पटइल सब उठौ, उठौ रात ह पहागे हे। कहत घासी ह कमंडल पकडे स्नान ध्यान बर निकलगे। घाठ घठौंदा अउ चारो कुती तरिया भर मइनखेच मइनखेच बोज्जाय हे नहाय धोय बर।
उवत सूरूज ल पंडा पुजारी मन स्नान ध्यान करके चोवा चंदन लगावत राहय। शंख फूंक फूंक के तरिया म माडी भर भर पानी म उतर उतर के पसर भर भर पानी देवत राहय। घासी घलो कनिहा भर म उतर के सूरूज ल पानी देवत कहिथे। “ये सूरूज नरायेन, ये सूरूज नरायेन, ये धधकत आगी के गोला म कब तक समाय रहिबे। ये पसर पसर भर पानी म नइ जुडावतच। तंहू ह जगन्नाथ चल अउ भगवान के रथ ल झिक, अपन आत्म ल धधकत आगी से मुक्ती पा अउ सरग म जा।
अतना सुनत पंडा पुजारी मन रख मखा जथे। सब जुरिया के राजा के दरबा म जाथे अउ गुहार लगाथे। कि आपके राज म एक आदमी ह पंडा पुजारी के नकल करिस हे। सुरूज नरायेन ल हूत कराइस हे। जेकर से हमर भगवान जगन्नाथ के अपमान होइस है। राजा महराज येला कडी से कडी सजा देय जाय।
राजा के दरबान घासी ल पकड लेते। अउ राज दरबार म ले चलथेे। तरिया भर के मनखे मन घलो घासी के संगे संग राजा के दरबार म पहुँच गे। तीरथ जवइया सब जत्था के जत्था दरबार कती मुरकगे।
गजमोतिन के माला पहिरे, माथ मुकूट हीरा के, सोन सिहासन म बिराजे राजा सब तीरथ यात्री मन के माथ नवा के परनाम करके कहिथे ….. देखव आज हमर पंडा पुजारी मन के नकल अउ भगवान जगन्नाथ के अपमान करके घासी ह बहुत बडे अपराध करे हे। बतावव येला का सजा देय जाय ? सब यात्री सन्न रहिजथे, मुह ह खुलय नही, भाखा फुटय नहीं …….. ।
तब घासी ह कहिथे …… राजा महराज ! जो सजा देना हे। मोला मंजूर हे लेकिन मोरो एक फरियाद हे। आदेश होही ते मै रखत हंव। राजा बोलथे हां ..हां.. बोल का फरियाद हे तेला बता।
राजा के आदेश पा के घासी ह बोलथे। राजा महराज मोर पहिली फरियाद हे ……..
अगर पंडा के पसर पसर भर पानी ओतना दूर रहइया सूरूज ह पा जथे। तब तो मोर आवाज ह बहुत दूर तक जाथे सूरूज नरायेन जरूर मोर बात ल सुन के आ जाही।
मोर दूसरा फरियाद हे ……
जगन्नाथ के रथ झिके ल हमर पुरखा ह तर जही, त सूरूज के भी लाखो करोडो पुरखा, चंदैनी मन टंगाय हे, ते मन घलो तर जही।
मोर तीसरा फरियाद हे …..
हमन ल अगर सरग मिल जही त बिचारा सूरूज जे ह धधकत हे उहू जुडा के थिर हो जही। नरक के आगी के गोला म जरई से मुक्ती पा जही। अउ सुख के सरग मिल जही।
घासी के उदगार ल सुन के सब जन सइलाब से आवाज आय लगथे ……हां …..हां …. घासी सही कहत हे। हां ……हां….घासी सही बोलत हे। जनमानस के आवाज सुन राजा भी बोले लगथे ….हां..हां…. घासी सही बोलत हे, जनता के आवाज जनार्दन के आवाज ये। लेकिन मोर मन म गुंजत हे कि ये पुरखा के तरई ह काय ये ? सरग ह काय ये ? अउ ये ह कइसे मिलथे ? ये ल तोला बताय ल लगही। नही ते सजा तोला जरूर मिलही।
Bhuvan Das Kosariyaऊंचा पूरा पचहत्था, गोरा नारा, सादा के धोती कुरता गला म पहिरे चंदन के कंठी माला, अउ हाथ कमंडल, मुख म दमकत आभा मंडल, जब दबंग आवाज से बोले लगिस त हजारो हजारो के भीड ह शांत होगे। लोग एकटक देखे लग गे। मिलकी नइ झबकावत ये। खडे हे ते ह खडेच हे। बइठे हे तेह बइठेच हे। अउ सब सुने लगथे…… ।
घासी ह कहिथे ….राजा महराज अउ सब जनता जनार्दन ….
“जियत ल मां बाप के सेवा जतन कर इही ह पुरखा के तराई ये ” मरे के बाद पितर मनई ह मोला बइहा कस लागथे। गंगा स्नान अउ तिरीथ बरत जवई ह ढोंग आय। सबे तिरथ मां बाप के पांव म हे, ये धरती के सेवा अउ सिंगार कर, ठांव ठांव म हे, गांव गांव म हे।
“जिंहा परेम हे, उंहे सरग हे”, परेम के बिना सबे नरक हे। ये सरग बर सतनाम ही एक मारग हे, जेमा चले से सत्य, अहिंसा, दया, करूणा, क्षमा, समता के भाव आथे, मन के भय, भरम, अंविश्वास, रूढिवाद सब मिट जाथे। ये रस्ता म जे ह चलथे सतनामी कहाथे। आऔ सब मिल जुल के ये धरती ल ही सरग बनाबो। जन जन के हिरदे म परेम के बिरवा लगाबो।
घासी बाबा की जय …. घासी बाबा की जय …… जयकारा से राज दरबार गुंजायमान होय लगगे। राजा घलो जय जयकार करे लग गे।
राजा सब जन मानस से कहिथे…  देखव आज हमन ल घासी ह सब चीज बता दीच, पुरखा के तराई ह का ये ? ये सरग ह का ये ? अउ ये ह काइसे मिलथे ? येकर रस्ता बता दीच। आज ले ये हमर सब के गुरू ये। जे ह हम सब ल सत मारग दिखाइस। मै बहुत खुश हंव। आज से मै आदेश देवत हंव कि मोर सारंगढ राज म सब घासी के ही रस्ता म चलही। सब सतनामी बनही। आज ले कोई तिरथ बरत करे के जरूत नइ हे।हम ल ये धरती ल ही सरग बनाना हे, अउ सदमारग म चलना हे। आऔ हम सब ये अपन गुरू बाबा घासी के चरण वंदन करन, जय जय कार करन कहिके…. गुरू घासी के दणवत चरण वंदन करथे। सब जगन्नाथ पुरी के तिरथ यात्रा जवाइया मन गुरू घासी के चरण वंदन करके इंहे से ही सतनाम ..सतनाम उच्चारण करत अपन अपन गांव घर वापस लहुट जथे।

* जयसतनाम *

भुवनदास कोशरिया
भिलाई
9926844437

* रचनाकार परिचय *

नाम – भुवन दास कोशरिया
पिता – स्व० श्री जानू दास कोशरिया
शिक्षा- B Sc ll
व्यवसाय -भिलाई स्टील प्लांट
पद – सीनियर टेक्नीशियन
पता – प्लाट नं° 9/A
कैलाशनगर हाऊसिंगबोर्ड
भिलाई, जिला दुर्ग
ग्राम -खपरी , पोस्ट -बलौदी,
तह पलारी,जिला.बलौदाबाजार
( छत्तीसगढ़ )