Category: शब्‍दकोश

छत्‍तीसगढ़ी जनउला (पहेली-प्रहेलिकायें)

बिना पूंछी के बछिया ल देख के, खोदवा राउत कुदाइस
खेत के मेंड ऊपर बैठके, बिन मूंड के राजा देखिस
(मेंढक, सर्प और गिरगिट)

नानक टुरी के फुलमत नांव हे, गंवा के फुंदरा गिजरिया गांव
(पैली, काठा )

काटे ठुड़गा उलहोवय नहीं
(बोडरी )

एक ठन धान के घर भर भूसा
(चिमनी )

कर्रा कुकरा, अंइठ पूंछी, अउ छू दिहीच, ते किकया उठीच
(शंख)

खा पी के जुठही बलावय
(बहारी )

दिन मन अल्लर राहय, रात कन अडे़ राहय
(छांद डोरी )

पेट भरी डउकी कुला ला चाटे
(चोंगी )

बन ले लानेंव बेंदरी, ओखर छेदेंव कान
दूध भात के भोजन करेंव, फेक देंव

मैदान
( पतरी )

गुरमेंट के मुंदरी पहिराइस, फोक ल टोर के कुला ल चाटिस
(चोंगी)

पाँच कबूतर पांचे रंग, महल में जाके एके रंग
(पान सुपारी )

अइंठत बोरे, चुचुवात निकारे
(डुवा)

गांव में आगी लगे, वो गांव में कुंआ
पान पतई जरगे, गोहार पारे कुंवा
(हुक्‍का)

नानकुन डबरी बने, बूडे़ भारी जहाज
पूछी कोती ले पानी पीथे, कोनो पंडित करो बिचार
(दिया)

बिना पंख के सुवना, उडि़ चलत अकास
रूप रंग उनके नही, मरै न भूख पियास
(जीवात्‍मा)

एक गांव में दुइ बहिनी, दूनो के एके नांव
दूनो के कोख में एके बालक, अउ होवत छोडे़ बोही गांव
(सुतई-सीप)

पूंछी उठा के खसले डारै
(जूता)

पेट चिरहा, पीठ कुबरा
(कौड़ी)

राजा के राज में नइए, मालिक के बगीचा में नइए बिन टोरे खबा जाय
(करा-ओला)

अटपटी छेरी के फटफटी कान, छेरी खाए कई गुना धान
(ढ़ेंकी)

उड़त देखे कांग कुड़ी, बैठत डेना पसार
लाखन जिवरा मार के, अपन परे उपास
(मछरी मारे वाले जाल)

एक गोड के घोडा बने, दुइ झन भये सवार
आगू हटे न पाछू हटे, बेड़ा में बहुत भगाय
(रंहचूली, झूलना)

होत साथ करधन पहिराय
(चोंगी)

धन कोरी बिकट बंधना, जे नई जाने ते चाबे नहना
(ककई)

नानचुन टूरा कूद कूद के पार बांधे
(सूजी-सुई)

पहाड़ ले उतरे रेचकी घोड़ी, ओकर पीला अठारा कोरी
(चलनी)

रात भर नंगरा, दिन भर पहिरे
(अड़गसनी)

मूठा में धरे, अउ खंचवा मं भरे
(जांता-चक्की)

कारी गाय के कारी पिला, कारी खद्दर खाय
पाथर उपर पानी पियै, ये जनाउर राय
(छुरा)

फांदे के बेर एक ठन, छोरे के बेर दू ठन
(दतवन-दातौन)

करिया घोड़ा भागे, लाल घोड़ा कुदाए
(आगी के लपट)

काटे ल कटायै नहीं, भोंगे ले भोंगावे नहीं
(छांव)

मारहूं त रो देबे, धर दुहू त चुप हो जाबे
(बर्तन)

एक पैसा ले लेनी देनी, पीछू कोती फेंक देनी
(फुंदरा)

फूले न धरे, गर मर जाय
(डलिया)

छितका कुरिया म बाग गुर्राये
(जांता)

तोर घर गे रहेंव, मोला देय पोंछ के
(बर्तन)

नदिया के तिर-तिर चिक्कन माटी, उठ रे मोर बंड़वा हाथी
(ढेंकी )

दस खीला जडे़ हे, दरबार में खडे़ हे, मैदान में पडे़ हे
(पतरी )

नदिया के तीर तीर चल बोकरा, पानी अंटागे मर बोकरा
(दिया)

एक सींग के बोकरा, मुंह कोती ले खाय बाखा कोती ले पगुराय
(जांता)

आए लूलू जाय लूलू, पानी ले डराय लूलू
(जूता)

भाई खडे़ ह, आंयर परत हे
(पोतनी)

सुलूंग सुटकेनी, ओकर फुनगी में गांठ
नई जानही ओकरे नाके ला काट
(नदिया तीर के गोंदिला)

अतका जड़ चुमिया में लोला पिला, ओला खाय माई पिला
(नारियर)

कुट कुटेला कुटते जाय, ओकर ददा के मेंछा टुटते जाय
तोर दाई के पेट फुटते जाय
(गेहूं)

बीच तरिया में केकरा फड़फड़ावय
(लाई)

उपर ले दिखये बड लोढ़वारी
ढ़ेढा कोती बीख, येहा काये तेला बता दे
झांकी हे भीतर तीन
(खीरा)

बारा महीना के चुरे भात, जब खाबे त ताते तात
(मिरचा)

एक फूल फूले, सौ फर फरे
(केरा-केला)

फूल फूले रिंगी चिंगी, फर फरे लमडोरा
(मुनगा)

सूखा डबरी में बगुला फड़फड़ाए
(लाई-मुर्रा)

बिना पानी के, उज्जर सूत
(दूध)

कटोरा ऊपर कटोरा, बेटा बाप ले गोरा
(नरियर)

पान गुजगुज फर लड़वा, ऐला नई जानही तेकर बाप भकुवा
(प्याज)

ऐंदुल असन बेंदुल असन, फोर देखें व सेंदुर जसन
(मसरी)

फरे न फूले नवे न डार, जब ले जीवय तबले खाय
(नमक)

थोकुन ओला, थोकुन ओला धरमस के उइला
(चटनी)

गांव तीर तीर मरी मरे, कउंवा कुकुर नहि खाय
तेला मनखे चिपचिप खाय
(गन्ना )

पान के ओधा, मांस के घोंघा
(भांटा)

भरैन फूलै, सूपा पर टूटे
(पान )

झिमरी टुरी के भितरी लेड़ा
(मुरई)

दिखब म लाल, छुअब म गुजगुज
(पताल)

धड़ कटै धरनी गिरे, गंगा नहायै जाय
हाड़ा दिखे ओके शंख सम, खाल बेचाए जाय
(पटुआ, सन)

बोवत देख्यों बाटरा, जामत मा कुसियार
ढाई महीना के छोकरा, दाढ़ी मेंछा म हुसियार
(जोंघरी-भुट्टा)

बगर बगर के भैंस चराय, बांधे पडरू मोटाय
(मखना)

ओमनाथ के बखरी में, सोमनाथ के

कांटा
एक ठन फूल फूले, पचास ठन मांटा
(केरा)

तीन मूड शंकर नो हे, दूध देथे ते गाय नो हे
रुख में रथे, ते पंछी नो हे
(नरियर)

खुसर खुसर खोर्री, छे आंखी तीन घोरी
(नागर, बैला, मनखे)

फूल फूले रिंगी चिंगी, फर फरे कटघेरा
उहू कथा जान के, जाबे अपने डेरा
(भसकटिया)

सुरुंग सुलोटी, फुलगी मं गांठ, नइ

जानही तेकर नाक ला काट
(लहसून)

राजा के राज में नइये, अउ बनिया के

दुकान में नइये
(बरफ)

हरदी के बूग बाग, पीतल के लोटा
ए कहनी ल नई जानबे, त बेंदरा के बेटा
(बैल)

सोन के तिजोरी में, लोहा के ढकना
फोर के देखेंव त, चार ठन पखना
(तेंदू)

लोहा कस पेंड़ में, सोन कस फूल
चांदी कस फर में, पथरा कस झूल
(बंबूल)

सोन कस गघरी, मैन कस ढपना
जे नई जाने तेला चाबे न हना
(तेंदू)

डलियन टूटे, बजरियन जाय
फरै न फूले, नवे न डार
(पान)

सगा घर सगा जाय, धर सगा सगा ला,
मार सगा सगा ला
(लोहा, हथौड़ी)

नान किन टूरी बिख टोनही
(मिरचा)

छिछिल तलैया मं, डूब मरै सितलैया
(पूड़ी)

बन ले लान्यों बेन्दरी, घर में छेदो कान
दूध भात के भोजन करके, फेंक दियो मैदान
(पतरी)

असाले में मसाले में, चार सींग वाले में, लाल नरियर के हरियर पूंछ
(लौंग)

लाल नरियर के हरियर पूछ, नी जानव तोर कतकले पूंछ
(बंगाला)

फूले फरै घुमर रहि जाय, एक झन टोरे सब झन खाय
(पान)

अहो रतनसिंह अहो रतनसिह, ऐंठ के

बांधे जूरा
लहू के धर बोहागे, हाड़ा के दू कूरा
(कुसियार-गन्‍ना)

दूनो कोठा के गोबर ला, एके हाथ में हेरै
(नाक)

तरी पचरी उपर परी, बिच में मोंगरी मछरी
(जीभ)

अत्थर ऊपर पत्थर, पत्थर ऊपर दू पइसा
बिन पानी के महल बनावैं, यह कारीगर कैसा
(दिंयार-दीमक)

बिना पांव के अहिरा भइया, बिना सींग के गाय
अइसन अचरज हम नई देखेन, खारन खार कुदाय
(सांप, मेंढक)

चार गोड़ दुई पांखी, मूड़ ले बडे आंखी
(दंतईया-बर्र)

पेट खलाखल पूछी गाभिन, नइ जाने तोर बेटी रांधिन
(चींटा)

करिया बन में रइथंव, लाल पानी पीथौं
(जूंवा-जूं)

रांध रइथे नई ते बांधे, सरी रात के अंधियारी एकै कूढ़ा होय
(हाथी)

पैर म चक्की बांध के, हरिना कूदा होय

(हाथी के पांव का चिन्‍ह)

आही तब नई आवय, नई आही तब

आही
(नदी, नाला)

लाल बइला पिछवाय हे, करिया बइला

अगुवाय हे
(कुहरा-धुआ)

बीच तरिया में कंचन थाली
(पुरइन पत्ता)

तरिया पार में थारी चिक चिकाय
(सूर्य )

गाड़ा भर गेहूं म एक ठन गोटी

(चंदा-चन्द्रमा)

देखब म दूनो रोटी एक बरोबर
(सूरज, चंदा)

पर्रा भर लाई, घर भर छरियाही

(चांदनी, अकाश)

पर्रा भर लाई, गने न सिराई
(चंदैनी-तारे)

नन्द बबा के नौ सौ गाय, रात चरत दिन

बेड़े जाय
(चंदैनी-तारे)

में जाथंव ते दे बे
(कपाट)

बच्छर दिन के भात, जभे छूबे तभे तात

(खातू )

माइ पिला के एक ठन करधन
(बारी के घेरा)

काँधे आय कांधे जाय, नेंग नेंग में मारे जाय
(बाजा)

सब जरै सब जरै, राजा के लिंगोटी झन झरै
(रद्दा-रास्‍ता)

कारी गाय करंगा पीला, मरगे गाय छटक गे पीला
(बन्दूक)

नानकुन टूरा गोटानी असन पेट, कहां जाबे टूरा रतनपुर देस
(चिट्ठी)

हहात हहा, ए तमासा कहां
पीठ उपर पोंद नाचे, ए तमासा कहां
(घोड़ा)

मोल तोल कतेक बेर, धरीच ततेक बेर
हाय सूं कतेक बेर, आधा म गीच ततेक बेर
पांव पलौटी कतेक बेर, सबो गीच ततेक बेर
(चूरी)

धर सगा सगा ल, मार सगा सगा ल
(हथौड़ी)

तें फार मेहर डारथंव
(पोता, धान)

ताकत हे तुकावत हे, दूनो गोड़ अलगावत हे
(कोकड़ा)

भाई के हर हालथे, भउजी के हर

चटके हे
(लुरकी, खिनवा)

तीन गोड़ के बरहा बने, दुइ गोड़ के गाय
एक गोड़ के अहिरा बने, सकल दूध दुहि खाय
(पटवारी की तिपाई, परकार और कलम)

अरे एक टांग, काय रे, चार टांग
दू टांग कहा गे हे, दस टांग ला मारे

(छत्ता, बाघ, आदमी, केकड़ा)

बिना पूंछी के बछिया ल देख रे, खोरवा राउत कुदाइस
खेत के मेड़ उपर बइठ के, बिन मूड के राजा देखिस
(मेंढक, सांप, केकड़ा)

अरे गड़ेर काए ओरमें, ओ देखत ये कोन ए रे
तोला मोला खाथे तेन ताय रे
(मुला, कांटा, आदमी)

बाप डरंगा, बेटा पोन्डा, नाती निन्धा

(पेड़, फूल, फल)

छिन्दक छिन्दक फूल, बारा राजा होइन मंजूर
(डूमर फुल)

अरे गडे़ कायरे ओर में, चल रे बजार जाबो
हमर गोसिया लेजही त जाबो
(भांटा, मुरई)

एक पेड दसपति के, तेकर बारा घाव
तीस तीस के झोथा, तेकर भिन्ने भिन्ने पांव
(मास, रात, दिन)

खटिया गांथे तान वितान, दू सुतइया बाइस कान
(रावण, मन्दोदरी)

तिल सरीखे गउ बने, चार मुख छय गोड़
अउ नौ मन के धड़ बने हे, पूछी अठारा हांथ
(4 बेद, 6 शास्त्र, 9 व्याकरण, 18 पुराण)

दस चरण धरती चले, पचास चरण अकास
तीन सीस दुइ नैन बने, साधू करो बिचार
(विष्णु, रुद्र, ब्रह्मा, चक्र, कमल, तीर, बैल, गरूड़, हंस)

बरुना चकती कर गहे, बगहा के असवार
लपा सरीखे मिलना, दिन में सौ सौ बार
(लक्ष्मी, परबती, सरस्वती )

कारी छेरी के गर में डोरी, चल रे छेरी हाट के बेरी
(तराजू )

अक्‍कड़ लकड़ी के जक्‍कड़ बंधना, नइ जानबे त चाब दिही नाहना
(ककई)

चार गोड़ के चारिक चप्‍पो, ओकर उपर निप्‍पो
आइस गप्‍पो ले गयो निप्‍पो, तब बांचिस चारिक चारिक चप्‍पो
(भैंसा, मेंढ़क, चील)

लाल बइला भागत हे, करिया बइलाल कुदावत हे
(आग, धुंआ)

उ-ऊ छत्‍तीसगढ़ी हिन्‍दी शब्‍दकोश

उँकर (सं.)  उकडू, पैरों के पंजों के बल बैठना।
उँचान (सं.)  ऊँचाई।
उँटवा (सं.)  ऊँट।
उँटिहार (सं.)  ऊँटी दे.  लेकर गाड़ी के आगे-आगे चलने वाला व्यक्ति।
उंडा (वि.)  औधा, मुँह के बल।
उकठना (क्रि.)  बीती घटनाओं को सुना-सुना कर गाली-गलौज करना।
उटकना (क्रि.)  दे.  उकठना
उकेरना (क्रि.)  निकालना, रस्सी आदि की बटाई खोलना।
उखरू (सं.)  दे. ‘उँकरू’।
उखलहा (वि.)  1. ओछी तबीयत का, नीच स्वभाव का, दोषी। 2. जादा बोलने वाला, सहजता से वास्‍तविक बात बता डालने वाला।
उखरा (सं.)  रस से पगी लाई दे. । (वि.) नंगे पैर।
उखानना (क्रि.)  उखाड़ना।
उगता (सं.)  मजदूरी का ठेका।
उगती (सं.)  सूर्योदय।
उगोना पाख (सं.)  शुक्ल पक्ष।
उघरा (वि.)  1. शरीर के ऊपर वस्त्र न होना 2. खुला हुआ, बिना आवरण के।
उचारना (क्रि.)  खोलना।
उचंती (सं.)  थोडे समय के लिए लिया हुआ ऋण, अग्रिम राशि, – (वि.) चलने को उत्सुक।
उचना (क्रि.)  ऊँचा होना, उठना 2. जलना क्रियाशील होना।
उचाना (क्र.)  1. ऊँचा करना, उठान 1. जलाना, क्रियाशील करना 3. खर्च करना।
उच्छिन होना (क्रि.)  1. दृष्टि से ओझल हो जाना, अदृश्य हो जाना 2. उदास होना।
उछरना (क्रि.)  वमन करना।
उछराई (सं.)  1. कै का आभास, उल्टी कर का मन होना 2. अत्यधिक पिटाई।
उछला (वि.)  लबालब (खेत, तालाब आदि के सम्बन्ध में)।
उछार (सं.)  वमन, कै, उल्टी।
उछाल-तलाव (सं.)  हैजा।
उछाह (सं.)  उत्साह।
उजारना (क्रि.)  उजाड़ना।
उजियार (सं.)  उजाला, प्रकाश।
उजियारी (वि.)  उज्ज्वल।
उजीर (सं.)  धोबी।
उज्जर (वि.)  उज्ज्वल, सफेद, स्वच्छ, साफ।
उझारना (क्रि.)  नष्ट करना, उजाड़ना।
उझालना (क्रि.)  उछालना, ऊपर फेंकना, ऊपर-नीचे करना।
उटंग (वि.)  वस्त्र पहनने पर अपेक्षित लंबाई से उसका कम पाया जाना, धुलने पर कपड़े का लंबाई में सिकुड़ना।
उटकट (सं)  ऊब। दे. ‘असकरट’। – (.वि.) उत्कट, अत्यधिक।
उटकटाना (क्रि.)  दे. ‘असकटाना’।
उटकना (क्रि.)  ताना देना, व्यंग्य करना, उलाहना देना, अनपेक्षित पुरानी बातें कहना।
उटकुट (वि.)  दे. ‘उटकट’।
उठलँगरी (वि.)  स्त्रियों की एक गाली, जिसमेँ दुश्चरित्रता का बोध समाहित है।
उड़ासना (कि.)  बिस्तर उठाना, बिस्तर समेटना।
उडि़या (सं)  1. उड़ीसा का निवासी। 2. सँवरा जाति की एक उपजाति।
उडि़याना (कि.)  1. उड़ना 1. उड़ाना ।
उड़ेरा (वि.)  आकस्मिक।
उढ़ना (सं)  पहनने या ओढूने का वस्त्र, चादर, ओढनी। -(क्रि) ओढ़ना।
उढ़रिया (सं.)  1. भगाई हुई या भागी हुई औरत 2. विवाह का एक प्रकार। दे. ‘उढरी’।
उढ़री (सं.)  पति या पिता के घर को छोडकर भागी हुई औरत।
उढ़ेरना (क्रि.)  खाली करना।
उतरना (सं.)  एक प्रकार का कर्णाभूषण। – (क्रि) उतरना, नीचे जाना।
उतलंग (वि.)  1. ऊधम करने वाला। 2. उघम मचाने वाला।
उतान (क्रि. वि.)  पीठ के बल, सीधे चित्त। उत्तान।
उतान भँसेड़ा (वि.)  ऊटपटाँग, अव्यवस्थित, अनियमित।
उतारू (सं.)  ढलान।
उतियाइल (वि.)  नरटखट, ऊधमी, उतावला।
उतेरना (क्रि.)  गीले खेत में बीज फेंककर बौना।
उतेरा (सं.)  उतेरने (दे. ‘उतेरना’) के लिए बीज।
उत्ता-धुर्रा (वि.)  अनियंत्रित तरीके से, मनमाने ढ़ग से। – (क्रि. वि.) जल्दी-जल्दी।
उत्तिम (वि.)  उत्तम।
उत्ती (सं.)  1. पूर्व दिशा 2. सूर्योदय का काल।
उत्थल (वि.)  उथला।
उदंत (सं.)  जिस शावक के दूध के दाँत न टूटे हों।
उद (सं.)  1. प्रेत, मसान 2. मुर्दो को उखाड कर खानेवाला एक जंगली जानवर।
उदकना (क्रि.)  उछलना।
उदबास (सं.)  उपद्रव। – (वि.) उपद्रवी।
उदबिदहा (वि.)  उत्पात्त मचाने वाला, गडबड करने वाला, ऊधमी, उथल-पुथल करने वाला।
उदलना (क्रि.)  1. बोए गए बीजों का उमस के कारण बेकार हो जाना 2. भेलवा दे.  के प्रभाव से फोड़े हो जाना।
उदाली (सं.)  अपव्यय।
उदीम (सं.)  उद्यम, परिश्रम, यत्न।
उधवा (सं.)  मिसाई (दे. ‘मिसना’) करके रखा हुआ अनाज का ढेर।
उधाना (क्रि.)  टिकाना।
उधार (सं)  ऋण।
उधोनी (क्रि.)  समाप्त करना।
उन कर (सर्व.)  उन का, उन के, उन की।
उन खर (सर्व.)  दे. ‘उन कर’।
उन खर ले (सर्व.)  उन्हीं से।
उनारना (क्रि.)  दे. ‘ओनारना’।
उन्‍ना (सं.)  दे. ‘उढना’। — (वि.) खाली।
उन्हों (सं.)  कपड़ा।
उन्हारी (सं.)  रबी की फसल, गर्मी की फसल, दलहन की फसल।
उपनना (क्रि)  मार आदि का निशान दिखाई पडना, कोई भी चिह्न या वस्तु अचानक दिखाई पडना, उत्पन्न होना।
उपकाना (क्रि)  उखाड़ना।
उपत के (क्रि. वि.)  अपनी ओर से, स्वेच्छा से, स्वयं होकर।
उपटना (क्रि.)  दे. ‘उबवकना’।
उपदरा (सं)  उपद्रव, उत्पात्, ऊधम। (वि.) उपद्रवी।
उपदरी (वि. स्त्री.)  उपद्रवी।
उपर (क्रि. वि.)  ऊपर। (पर.) पर।
उपरना (सं)  दुपट्टा।
उपर सँस्सी (सं.)  साँस का ऊपर चलने का क्रम।
उपरहा (वि.)  आवश्यकता से अधिक, उपयोग के अतिरिक्त बचा हुआ।
उपरोहित (सं.)  पुरोहित, पंडित।
उपरौना (सं.)  दे. ‘पुरौनी’।
उपला (सं.)  सूखा हुआ गोबर। दे. ‘बिनिया छेना’।
उपसहिन (सं.)  उपवास रखने वाली स्त्री।
उपाई (वि.)  कुचक्री, गड़बड़ करने वाला, उपद्रवी।
उपास (सं)  उपवास।
उफनना (क्रि) उबल कर पात्र से बाहर निकलना।
उफलना (क्रि.)  सतह पर तैर आना, सतह पर आ जाना।
उबकना (क्रि.)  1. उभरना 2. उखड़ना।
उबजना (क्रि.)  उत्पन्न होना, उपजना (विशेषकर घनत्व के साथ)।
उबड़ी (वि.)  औधा, पेट के बल।
उबड़ी परना (क्रि.)  किसी चीज को पाने के लिए टूट पडना।
उबरना (क्रि.)  शेष रहना, निवृत होना, बचना।
उबारना (क्रि.)  मुक्त करना, उद्धार करना, उत्पत्ति में सहायता देना।
उभुक-चुभुक होना (क्रि.)  1. डूबना-उतराना 2. आगा-पीछा करना, अनिश्चय की स्थिति में होना।
उबुक-चुबुक होना (क्रि.)  दे. उभुक-चुभुक होना
उमन (सर्व.)  वे।
उम्मर (सं.)  1. आयु,  2. मीठापन।
उम्हर (वि.)  अत्यधिक मीठा।
उरई (सं.)  1..खस की घास 2. एक प्रकार का धान।
उरई जर (सं.)  उरई की जड़ अर्थात् खस।
उरकना (क्रि.)  1. कम पडना 2. समाप्त होना।
उरकहा (सं.)  फटने वाली जमीन।
उरभठ (वि.)  ऊबड़-खाबड़।
उरमाल (सं.)  रूमाल।
उररना (क्रि.)  खींचना, खींचकर निकालना।
उरला (वि.)  पीछे भार अधिक होने से आगे के हिस्से के उठ जाने की स्थिति, उठंग होने की स्थिति।
उल्‍ला (वि.)  दे. उरला
उरिद (सं.)  उर्द।
उरेरना (क्रि.)  बनाना।
उर्री-पुर्री (वि.)  लबालब। दे. उछला।
उर्रु (वि.)  कड़ा, सूखा।
उलँडना (क्रि.)  उल्टा हो जाना, संतुलन बिगड जाने के कारण लुढ़क पडना।
उलचना (क्रि.)  खाली करना, उलीचना।
उलदना (क्रि.)  औधा कर के ढालना, उलटना।
उलफुलहा (वि.)  कम बुद्धिवाला, प्रशंसा सुन कर प्रसन्न हो जानेवाला।
उलफुलाना (क्रि)  मतलब साधने के लिए उत्साहित करना।
उलरना (क्रि.)  1. गाडी का पीछे से वजनी होने की स्थिति में असंतुलित हो जाना 2. ढीला होना 3. ढीला करना। 4. बटी हुई रस्‍सी का बट खुलना।
उलरुवा (सं.)  उलरने (दे. ‘उलरना) की स्थिति मं गाडी को सहारा देने के लिए अड़ाई गई लकड़ी।
उलार (वि.)  दे. उरला।
उलेंडा (वि.)  दे. उछ़ेरा।
उल्लुर (वि.)  1. दे, ‘उरला’ 2. सुस्त, ढीला 3. कोमल ।
उल्हवा (वि.)  कोमल (पत्ते)।
उल्होना (क्रि.)  अंकुरित होना, कोंपल फूटना।
उसकारना (क्रि.)  पड़ी हुई वस्तु को खड़ा करना या उठाना।
उसनना (कि.)  उबालना।
उसना (वि.)  उबाला हुआ।
उसनिंदा (वि.)  निद्रातुर, जिसकी नींद पूरी नहीं हुई हो, उनींदा।
उसयाइल (वि.)  1. सूजा हुआ (अंग-विशेष)। 2. मैला-कुचैला, गंदा, फूहड।
उसरना (क्रि.)  कार्य समाप्त होना, निवृत्त होना।
उसराना (क्रि.)  कार्य समाप्त करना, निबटाना।
उसलती (वि.)  उठता हुआ, बंद होता हुआ, उचटता हुआ।
उसलना (क्रि.)  1. उठ कर चला जाना 9. उखड़ना
उसालना (क्रि.)  जमी हुई वस्तु को धीरे-धीरे उठाना।
उसीसा (सं.)  1. सिरहाना 2. सिर को टिकाने का साधन, तकिया।
उसुआना (क्रि.)  सूजना।
उसुर-पुसुर (क्रि. वि.)  उकताकर, किसी परेशानी से बेचैनी की स्थिति।
उहॉं (क्रि. वि.)  वहाँ।
उही मन ला (सर्व.)  उन को।
उही (सर्व.)  1. वही 2. उसी।
ऊँच (वि.)  ऊँचा, ऊँची जाति का, बड़ा।
ऊँटी (सं.)  गाड़ी टिकाने के लिए प्रयुक्त होनेवाली विशेष तरह से तैयार की गई लकड़ी जिसके नीचे की ओर दो पाये हों, लाठी।
ऊँधस (सं.)  ऊधम।
ऊना (कि.)  उदित होना। – (वि.) खाली, कम, न्यून। दे. ‘उन्ना’।
ऊमस (स.)  उमस।
ऊल (सं.)  1. संतुलन 2. गिल्ली को ऊँचा उछालने का कार्य।

आ, इ, ई, छत्‍तीसगढ़ी हिन्‍दी शब्‍दकोश

आँकना (क्रि.)  चिकित्सा के उद्देश्य से शरीर के पीडित भाग को गर्म लोहे से जलाना या दागना।
आँकुस (सं.)  1. अंकुश 2. नियंत्रण।
आँखी (सं.)  आँख।
आँच (सं.)  लौ की गरमी, हल्का ताप।
आँजर-पाँजर (सं.)  1. शरीर का पिंजरा, विशेषत: शरीर की नश्वरत्ता संकेतित करने के लिए प्रयुक्त शब्द। दे. “ढाँचा” 2. अंग-प्रत्यंग।
आँट (सं.)  1. रस्सी की ऐंठ 2. चबूतरा।
आँटना (क्रि.)  1. रस्सी बँटना 12. घुमाना, चलाना।
आँटी (सं.)  1. रस्सी बँटने का लकड़ी का बना उपकरण 2. दे. बाँटी 3. खेल की एक स्थिति।
आँठ (सं.)  बैठने के लिए बनाई गई दीवार से लगी मुँडेर । –(वि.))  गाढा ।
आँठना (क्रि.)  ऐंठना, रस्सी-जैसी वस्तु में घुमाव देना
आँठी (सं.)  दही का थक्का ।
आँड़ग (वि.)  1. अधिक । 2. अकथ्य भाव-युक्त ।
आँतर (सं.)  1. भूमि का बिना जुता या जोत में छूट गया भाग ५. अंतर । आँधी-चापर (सं.).)) आँख-मिचौनी की तरह का एक खेल ।
आँवर (सं.)  प्रसव के बाद का फूल, जाँत।
आँवा-जुड़ी (सं.)  दस्त की बीमारी
ऑसो (क्रि.वि.)  इसी साल ।
आकाबीसा (वि.)  एक से बढकर एक । दे. ‘तारासीरा’ ।
आगर (वि.)  अधिक, नाप-तौल से अधिक ।
आग लुवाट (सं.)  खीझ का मुहावरा
आगी (सं.)  अग्नि, आग ।
आगू (क्रि.वि.)  आगे, पहले, सामने ।
आगू-पाछू (क्रि.वि.)  आगे-पीछे, बहुत थोडे अन्तर से, बाद में
आघू (क्रि.वि.)  दे. ‘आयू’ ।
आछर (सं.)  अक्षर।
आठे (सं.)  श्रीकृष्ण के जन्म का पर्व, कृष्ण-जन्माष्टमी नो भादों मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को पड़ती है।
आड़ (सं.)  परदा, ओट, अवरोध, बीच में 1
आड़ा (सं.)  मोटा डंडा ।
आड़ी (सं.)  आयताकार में अधिक लंबाई का भाग। –(वि.))  1. लंबा 2. तिरछा
आतमा (सं.)  आत्मा।
आदा (सं.)  अदरक । .
आधसीसी (सं.)  आधे कपाल का दर्द । (वि.)) 1. अपूर्ण, अधूरा, कमजोर । 2. गर्भवती ।
आने (सर्व.)  कोई और, दूसरा, पराया, अन्य ।
आन-तान (वि.)  अनाप-शनाप, बिना विचार के।
आनना (क्रि.)  1. लाना 2. आने देना ।
आनी-बानी (वि.)  नाना प्रकार के, विविधता लिए हुए।
आन (वि.)  अन्य ।
आमसड़ा (सं.)  दे. ‘अमसरा’।
आमा (सं.)  आम का फल या पेड ।
आमा डगारी (सं.)  आम की डाल पर चढने का एक खेल।
आरी (सं.)  1. गाङी के पहिए के बीच की लकटड्ठी 2. दे. ‘अरई’ 8. आरी ।
आरुन (वि.)  शुद्ध । दे. आरूग
आरो (सं.)  आहट, समाचार।
आल (सं.)  नस ।
आलस (सं.)  1. आलस्य 2. चेचक
आवाँ (सं.)  कुम्हार की भट्ठी जिसमें वह मिट्टी के कच्चे पात्रों को पकाता है।
आसरा (सं.)  1. भरोसा, सहारा, आश्रय 2. गर्भ ।
आसा-तिसना (सं.)  आशा और तृष्णा।
आसों (क्रि.वि.)  इसी वर्ष । दे. ‘आँसो ।
इ 
इंदरावन (सं.)  एक औषधीय वृक्ष।
इंद्री (सं.)  इंद्रिय।
इदारगोई (सं.)  मित्र ।
इजारा (सं.)  ठेका ।
इटली (सं.)  इडली ।
इढ़र (सं.)  अरबी या घुइयाँ के पत्तों पर बेसन या उड़द के आटे को भाप में पकाकर बनाया गया एक खाद्य।
इढ़हर (सं.)  दे इढ़र
इतरौना (वि.)  इतराने वाला, चंचल ।
इनकर (सर्व.)  इनका ।
इफरात (वि.)  बहुत अधिक ।
इब्बा (सं.)  1. गुच्ची अर्थात् गिल्ली-डंडे के खेल में गिल्ली उछालने के लिए जमीन पर बनाया गया खाँचा या लंबा उथला गड्ढा 2. गिल्ली ।
इब्‍भा (सं.)  दे. इब्बा
इमान (सं.)  ईमान ।
इरखा (सं.)  जलन ।
इसारा (सं.)  संकेत, इशारा ।
इस्कूल (सं.)  स्कूल, शाला।
इहाँ (क्रि.वि.)  यहाँ, इस स्थान पर।
इहाँ-उहाँ (क्रि.वि.)  यहाँ-वहाँ ।
इहीचे (क्रि.वि.)  यहीं पर ।
ई 
ईकरा (क्रि.वि.)  इसी जगह, इसका उच्‍चारण ‘एकरा’ भी होता है।
ईचमेर (क्रि.वि.)  इसी जगह, इसका उच्‍चारण ‘एइमेर’ भी होता है।
ईंटकोरहा (वि.)  जो समुचित ढंग से गीला न हो, इसका उच्‍चारण ‘गिलगोटहा’ भी होता है।
ईंटा (सं.)  ईंट ।
ईंहा (सर्व.)  यह ।
ईसर (सं.)  ईश्वर।

अ – छत्‍तीसगढ़ी हिन्‍दी शब्‍दकोश

अँइठी (वि.)  गोल मुड़ी हुई, ऐंठ कर बनाई हुई, एक आभूषण।
अइलहा (वि.)  कुम्हलाया हुआ।
अइलाना (क्रि.)  कुम्हलाना। (सं.) उबाली गई तिवरा मटर, अरहर आदि की कच्ची फली।
अँकरी (सं.)  घास की जाति का एक अनाज जिसमेँ छोटे-छोटे गोल दाने होते हैं।
अँकबार (सं.)  1. आलिंगन 2. दोनों भुजाओं के अन्दर भर जानेवाली फसल की मात्रा।
अँकवारना (क्रि  आलिंगन करना, अंक में भरना, परस्पर लिपट कर भेंट करना, गले मिलना।
अँकुआ (सं.)  ऑंकने, दागने के लिए प्रयुक्त छोटा हँसिया। दे. ‘अँकुआना’
अँकुआना (क्रि.)  मोच या सूजन को जलाने की स्थिति तक हँसिया आदि से सेकना।
अँकवाना (क्रि.)  दे. ‘अँकुआना’
अँकोइ (सं.)  हम्माल का अंकुश।
अँखियाना (क्रि.)  आँख से इशारा करना, आँख मारना, आँख मटकाना।
अँगठा (सं.)  1. अँगूठा 2. अँगूठे की छाप।
अँगठी (सं.)  अँगुली।
अँगना (सं.)  आँगन। (सं.) दे. ‘अँकवार’।
अँगरक्खा (सं.)  अँगरखा। दे. ‘सलूखा’।
अँगरना (क्रि.)  1. गलना 2. ठिठुरना।
अँगरा (सं.)  अंगार, जलते कोयले का छोटा-सा टुकड़ा, धधकते उपले का टुकड़ा।
अँगरी (सं.)  दे. ‘अँगठी’।
अँगरेजी मिर्चा (सं.)  छोटी किन्‍तु तीखी मिर्च की एक प्रजाति।
अँगाकर (सं.)  कंडे की आग में पकाई गई पिसे चावल और बासी भात से बनाई गई मोटी रोटी।
अँगेठा (सं.)  जलती हुई मोटी और भारी लकड़ी, अँगीठी।
अँगेठी (सं.)  जलती हुई पतली लकडी।
अँगेरना (क्र.  1. अंगीकार करना 2. प्रस्तुत होना।
अँगोछना (क्रि.)  अंगों को गीले कपडे या तौलिए से पोंछना।
अँगोछी (सं.)  1. छोटी धोती जिससे घुटनों तक का भाग ढकता है २. अँगोछा।
अँगौछी (सं.)  (दे. अँगोछी
अँचरा (सं.)  आँचल, साडी का एक छोर।
अँचोना (क्रि.)  1. भोजन करके हाथ-मुँह धोना।
अँजुरी (सं.)  दोनों हाथों को संपुटित्त करके बनाई गई अंजलि।
अँजोर (सं.)  उजाला, प्रकाश।
अंजोरी (वि.)  चाँदनी भरी शुक्ल पक्ष की रात।
अँजोरी पाख (सं.)  शुक्ल पक्ष।
अँराना (क्रि.)  सूखना।
अँटियाना (क्रि.)  1. अवयवों आदि का अकड़ना 2. अँगड़ाई लेना।
अँठियाना (क्र.  (दे. ‘अटियाना’
अँड़वा (सं.)  अंडा ।
अँड़वारी (सं.)  अंडेवाली मछली। अँडि़याना (क्रि. ) 1. अकड़ना 2. ऐंठना 3. अँगड़ई लेना।
अँदोहल (सं.)  1. शोर 2. कलरव।
अँधउर (स.  ऑंधी।
अँधरा (वि.)  अन्धा।
अँधरोटी (सं)  आँखों में दोष के कारण अन्धकार-सा प्रतीत होने की स्थिति, आँखों में अन्धकारमयता की स्थिति, रतौंधी।
अँधवा (सं.)  अन्धा सर्प, अन्धा व्यक्ति (वि.) अन्धा, नेत्रहीन।
अँधाना (क्रि.)  औंधाना।
अँधियार (सं.)  अन्धकार।
अँधियारी (सं.)  1. घर का वह अँधेरा कमरा जहाँ अचार आदि रखा जाता है, भंडारगृह 2. छोटी अलमारी  (वि.) अँधेरी।
अँधियारी पाख (सं.)  कृष्ण पक्ष।
अँयरी (सं.)  एक चिडिया जिसकी गरदन और पूँछ काफी लम्बी होती है।
अँवरा (सं.)  आँवला।
अंकाल (सं.)  अकाल, अभाव का काल।
अंजन (सं.)  1. आँखों को आँजने का साधन जैसे-काजल 2. एक प्रकार का धान।
अँजरी (सं.)  अंजलि। (दे. ‘अँजुरी’
अंझा (सं.)  अभाव, अनुपस्थिति।
अंटा (वि.)  टेढ़ा, टेढ़ी।
अंडस (सं.)  अड़चन, बाधा।
अंडा (सं.)  1. एरंड 2. अंडा।
अंडा भाजी (सं.)  फूलगोभी के पत्ते।
अंडी (सं.)  1. छोटा एरंड 2. रेशम से निम्न कोटि का एक प्रकार का वस्त्र जिसे पवित्र माना जाता है।
अंतस (सं.)  अंतर्मन, हृदय, मन।
अंताज (सं.)  अनुमान।
अंते (क्रि.) वि.  अन्यत्र।
अंते-तते (क्रि.) वि.  यहाँ-वहाँ।
अंथऊ (सें.  शाम का भोजन।
अंदोहल (सं.)  दे. ‘अँदोहल’।
अंधड्ड (सं.)  आँधी।
अंधन (सं.)  अदहन, दाल भात पकाने के लिए अन्न को पात्र में डालने से पूर्व पानी के उबलने की स्थिति।
अंधेर (सें.  अन्याय, मनमाना, ज्यादत्ती, अति।
अंस (सं.)  1, अंश 2. परिवार।
अइतबार (सं.)  इतवार का दिन, रविवार।
अइताचार (सं.)  अत्याचार।
अइलाना (क्रि.)  कुम्हलाना, मुरझाना।
अइसन (वि.)  ऐसा, अई (अव्य.) अरे, अरी।
अउ (समु.  1. और 2. और भी, अधिक। (वि.)  अन्य।
अउठ (वि.)  साढे तीन। (सं.) 1. काई, जल में पैदा होनेवाली वनस्पति विशेष, पानी में डुबकी मारनेवाली एक छोटी चिडिया।
अकइसी (सं.)  एकादशी। (वि.) इक्कीसवाँ।
अकतरिया (सं.)  ग्रामीण औरतों की विशेष ढंग की चप्पल जिसे बरसात में पहना जा सकता है।
अकतहा (वि.)  अधिक, अतिरिक्त।
अकतियार (सं.)  शक्ति, अधिकार।
अकती (सं.)  अक्षय तृतीया का पर्व जो वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाया जाता है। इस दिन गाँव के नौकरों का कार्यकाल समाप्त होता है।
अकन (अव्य.)  परिमाण द्योतक ‘सा’। दे. ‘कन’।
अकबकाना (क्रि.)  स्तब्ध रह जाना, घबरा जाना, हक्का-बक्का रह जाना।
अकबकासी (सं.)  घबराहट।
अकबार (स.  अखबार, समाचार-पत्र।
अकरस (सं.)  अंतिम वर्षा, रबी फ्रसल के समय की वर्षा, बेमौसम का पानी, पानी का थम-थम कर बरसना। (वि.) केवल एक ही, अकेला, मात्र, इकलौता।
अकलउती (वि.) स्त्री.  इकलौती।
अकलमुंडा (वि.)  एकांतप्रिय, आत्मकेंद्रित व्यक्ति, दूसरों की चिंता न करने वाला। भकसी (सं.) फल तोइने के लिए बनाई गईं जाली लगी मोटी (दे. , जिससे फल टूट कर नीचे न गिर कर जाली में ही गिरे।
अकाऱरथ (वि.)  व्यर्थ।
अकास (सं.)  आकाश ।
अकेल्ला (वि.)  अकेला, एकाकी।
अखरना (क्रि.)  बुरा लगना, खलना, अप्रिय अनुभव करना, पश्चाताप होना।
अगड्डाही (सं.)  बड्डी आग।
अगम (वि.)  अगम्य, अथाह, अनुमान से परे।
अगमुत्ता (वि.)  आग में मूतने वाला, अत्यधिक शैतान, एक गाली।
अगा (अव्य.)  संबोधन शब्द ‘ए’।
अगाड़ी (क्रि.) वि.  आगे, सामने, आगे।
अगास दिया (सं.)  आकाशदीप।
अगियाना (क्रि.)  1. जलन का अनुभव होना 2. जल उठना 8. आगबबूला होना।
अगीत (क्रि.) वि.  दे. ‘अगाडी’।
अगोरना (क्र.  प्रतीक्षा करना, बाट देखना।
अग्घन (सं.)  अगहन मास।
अग्याँ (सं.)  1. आज्ञा, आदेश बालतोड़, फोड़ा।
अग्यारा (वि.)  ग्यारह की संख्या।
अघरिया (सं)  एक जाति विशेष।
अघात (स.  चोट, प्रहार।
अघात ले (वि.)  बहुत, खूब। (क्रि.) वि. छकने तक, मन के भर तक, पूरा संतुष्ट या तृप्त होने तव थकने तक।
अघाना (क्रि.)  1. छक जाना, ऊब जान तृप्त हो जाना 1. थकना।
अघाय (वि.)  पेट भरा हुआ।
अघुआ (वि.)  सामने रहने वाला, लीडर।
अघुआना (क्रि.)  जागे हो जाना।
अघोरी (वि.)  ऐसा व्यक्ति जो खूब खाक भी अतृप्त रहे।
अचंभों (सं.)  आश्चर्य, विस्मय।
अचवानना (क्रि.)  खाट के पैताने की ररस्स खींचना, अलवायन कसना।
अचहड़-पचहड़ (वि.)  1. पाँच से अधिक 2. ढेर सारा।
अचहर-पचहर (वि.)  दे. अचहड़-पचहड़
अचानचकरित (वि.)  अचंभित, विस्मित, चकित । (क्रि.) वि. अचानक।
अचोना (क्रि  खाने के बाद हाथ-मुँह धोना।
अजरहा (वि.)  बीमार, रुग्ण ।
अजरा (सं.)  1. रोग 2. दो धानों का मिश्रण 3. योंहीं, बिना नापे तौले 4. अंदाज से।
अजार (सं.)  पेट की एक प्राणधातक बीमारी।
अजारा (वि.)  बिना माप या तोल के केवल अंदाज से प्रदत्त ।
अटकपारी (सं.)  अधकपारी, आधे कपाल का दर्द जो सूर्योदय के समय शुरू, मध्याह्न में सर्वाधिक और शाम को कम हो जाता है।
अटरकर (सं.)  अनुमान, अटकल।
अटकन-बटकन (वि.)  थोड़ा-बहुत।
अटकार (सें.  1. बाधा, बंधन, रुकावट, हरजा 2. आवश्यकता।
अटकाव (सं.)  हरजा।
अटर्रा (सं.)  नीबू की जाति का खट्टा मीठा स्वाद वाला एक फल।
अटाटूट (वि.)  1. प्रचुर परिमाण में 2. अपार।
अटाटोर (सं.)  दे. ‘अटाटूट’।
अठुरिया (सं.)  आठ दिनों का समूह।
अठोरिया (सं.)  दे. अठुरिया
अड़कड़ी (सं.)  इधर-उधर भाग जाने के अभ्यस्त जानवर को रोकने के लिए पैरों में बाँधी जानेवाली लम्बी लकड़ी।
अड़गड़ (सं.)  दरवाजे में रोक के लिए लगाया गया बाँस, अर्गला।
अड़गड़ी (सं.)  1. अर्गला 2. दे. ‘गड़गड़ी’।
अड़गसनी (सं.)  अरगनी, कपड़ा सुखाने के लिए बाँधा गया बाँस।
अड़बड़ (सं.)  भीड। (वि.)  प्रचुर, बहुत।
अड़हा (वि.)  मूर्ख, संस्कारहीन, बिना पढा-लिखा, जिद्दी।
अड़हा बइद (सं.)  नीम हकीम।
अड़ानी (वि.)  अनाड़ी, अनजान।
अड़ीसा (सं.)  चावल और गुड से चना पकवान। दे. ‘अनरसा’।
अइरसा (सं.)  दे. अड़ीसा
अड़ुक (वि.)  इतना। दे. ‘अतका’।
अढ़ई (वि.)  ढाई, अढ़ाई।
अढ़ाम (सं.)  ढाई, व्यक्ति के जमीन पर गिर पडने से उत्पन्न ध्वनि, धड़ाम।
अढ़ैया (वि.)  ढाई दिन के अंतर से आनेवाला ज्वर।
अढ़ोना (क्रि.)  आदेश देना।
अतकहा (वि.)  कुछ अधिक, ज्यादा।
अतका (वि.)  1. थोड़ा  2. इतना 3. इस सीमा तक।
अतकी (वि.)  थोड़ा। दे. ‘अतका’।
अतकेच (क्रि.) वि.  इतना ही।
अतको मा (क्रि.) वि.  इतने पर भी।
अतमयती (सं.)  1. जातीयता, आत्मीयता 2. स्वजातीय सहभोज ।–(वि.) आत्मीय, प्रिय।
अत्तर (सं.)  इत्र।
अतेक (वि.)  दे. ‘अतका’।
अत्तहा (क्रि.) वि.  पहले के।
अथान (सं.)  अचार।
अदरा (सं.)  आर्द्रा नक्षत्र। — (वि.) नौसिखिया।
अदहरा (सं.)  कंडे का अलाव, जीर्ण-शीर्ण।
अदियावन (वि.)  जिसे देखकर दया उत्पन्न हो, दयनीय।
अद्धर (वि.)  1. अलग, पृथक 2. ऊँचा।
अधकपारी (सं.)  1. आधे कपाल में दर्द का रोग 2. आधाशीशी।
अधिया (सं.)  कृषि उपज का आधा भाग। — (वि.) आधा लेनेवाला।
अन (उप.)  नहीं। उदा.–अनदेखना, अनभल।
अनख (सं.)  ईष्या, जलन।
अनगैंइहाँ (वि.)  दूसरे गाँव का।
अनगोडवा (वि.)  ऊटपटाँग, अव्यवस्थित, बेसिर-पैर का।
अनचिन्हार (वि.)  अपरिचित।
अनठेहरा (वि.)  1. तिरछा देखने वाला, जिसकी पुतलियाँ स्थिर न हाँ 2. टेढा, भेंगा 3. बनती हुई बात में टाँग अड़ाने वाला 4. लक्षणा में बात कहने वाला।
अनते (वि.)  अन्यत्र, दूसरे स्थान पर।
अनदेखना (वि.)  ईष्यालु, दूसरे को काम करते देखकर स्वयं वही करके टाँग अड़ाने वाला।
अनपचन (सं.)  अनपच, अजीर्ण।
अनबोला (सं.)  1. शत्रुता 2. मान, क्रोध आदि के कारण बातचीत बन्द होने की स्थिति।
अनभल (सं.)  बुराई, अहित।
अनभरोसिल (क्रि.वि.)  शायद।
अनमन (वि.)  उदास।
अनरसा (सं.)  चावल, गुड और खसखस के मिश्रण से बना एक पकवान, इंदरसा।
अनवट (सं.)  एक आभूषण।
अनवासना (क्रि.)  नई वस्तु का उपयोग प्रारंभ करके उसकी नवीनता को समाप्त करना।
अनाचार (सं.)  अत्याचार, पाप का कृत्य परंपरा-विरुद्ध कार्य।
अनाथिन (सं.)  अनाथ (महिला
अनानास (सं.)  अनन्नास।
अपंगहा (वि.)  पंगु।
अपखया (वि.)  1. अभक्ष्य भक्षण करने वाली 2. स्त्रियों की एक गाली।
अपजस (सं.)  अपयश, बदनामी।
अपन (सर्व.)  अपना।
अपन-विरान (सर्व.)  अपना-पराया।
अपया (सं.)  बदनामी, अवगुण।
अपरस (सं.)  चमडी का एक रोग जिसमें त्वचा से भूरे रंग की परत-सी निकलती है।
अपहाँस (सं.)  उपहास।
अपासी (सं.)  आबपाशी, सिंचाई। — (वि.) सिंचाई की व्यवस्था युक्त।
अप्पत (वि.)  जिद्दी, बेशर्म।
अबिरथा (वि.)  व्यर्थं, बेकार का।
अबेर (सं.)  देर, विलंब।
अबेरहा (वि.)  देर से आनेवाला।
अब्बड़ (वि.)  दे. ‘अड़बड़’।
अभियावन (वि.)  भयावना, डरावना।
अभिच (क्रि.) वि.  अभी ही, अभी-अभीद्य।
अमचुर (सं.)  कच्चे आम के टुकडों को सुखा कर बनाया गया चूर्ण, अमचूर।
अमरइया (सं.)  आम्र-कुंज आम के वृक्षों का बाग, अमराई।
अमरना (क्रि.)  पहुँचना, ऊँचाई पर स्थित वस्तु को प्रयत्नपूर्वक स्पर्श करना अथवा इस प्रकार उसे प्राप्त करना।
अमरित (सं.)  अमृत।
अमरोइया (वि.)  पहुँचाने वाला।
अमली (सं.)  इमली ।
अमसरा (सं.)  पके हुए आमों के रस को सुखा कर जमाया गया खाद्य, अमावट, अमरस।
अमाना (क्रि.)  समाना, घुसना।
अम्मठ (वि.)  खट्टा, खट्टे स्वाद वाला।
अम्मठ (वि.)  दे. ‘अम्मट’।
अम्मर (सं.)  अमृत। — (वि.)  अमर।
अयरी (सं.)  आरी।
अरई (सं.)  जुते हुए पशुओं को हाँकने के लिए प्रयुक्त डंडा जिसके एक सिरे पर कील लगी होती है।
अरकटहा (वि.)  लक्ष्यहीन, दिशाहीन।
अरथ (सं.)  अर्थ।
अरमपपई (सं.)  पपीते का वृक्ष या उसका फल।
अरसी (सं.)  अलसी।
अरिया (सं.)  आला।
अरूआ (सं.)  बिना उबाले धान से कूटा गया चावल।
अर्र (अव्य.)  जुते हुए बैल को दाहिने से बाएँ हाँकने के लिए प्रयुक्त ध्वनि। दे. ‘तत्ता’।
अलकर (वि.)  कष्टदायक, असुविधाजनक, गुप्त, कष्टसाध्य।
अलकरहा (वि.)  अनपेक्षित।
अलखा (सं.)  अंचल।
अलगा (सं.)  चप्पल, जूता।
अलटना (क्रि  उमेठना।
अलथी-कलथी (सं.)  छटपटाहट, तड़पन।
अलबेला (वि.)  अल्हड़।
अलमल (वि.)  पर्याप्त, संतोषप्रद मात्रा में।
अलबाइन (वि.)  ऊधमी, शैतान। दे. अलवाईन
अलवा-जलवा (वि.)  ऐसा-वैसा, व्यर्थ का, हीन कोटि का। फालतू।
अलबान (सं.)  1. शाल 2. रुमाल। दे. अलवान
अलहन (सं.)  विपदा, संकट, झंझट, दुर्घटना।
अलाउंस (सं.)  घोषा, एनाउंस।
अलाल (वि.)  आलसी, सुस्त।
अलिन-गलिन (सं.)  गली-गली।
अलोना (वि.)  नमक रहित, स्वादहीन।
अल्लर (वि.)  सुस्त। दे. ‘उल्लुर’।
अल्होरना (क्रि  अन्न आदि के ढेर से कचरे को अलग करने की प्रक्रिया।
अवइया (वि.)  आनेवाला।
अवतरना (क्रि.))  जन्म लेना, उत्पन्न होना।
अवाज (सं.)  आवाज।
असंख (वि.)  असंख्य, अनगिनत।
अस (सं.)  अस्थि। — (वि.) दे. अइसन
असकट (सं.)  ऊब, परेशानी, उकताहट, आलस्य।
असकटना (क्रि.)  तंग होना, ऊब जाना, उकता जाना।
असकरवा (सं.)  नियोजित परिवार। (वि.) एकाकीं।
असकराना (क्रि.)  1. कपड़े की तह खोलना। एक पर्त में फैलाकर रखना, बिछाना, फैलाना।
असकरिया (सं.)  एक तल्लेवाला जूता। दे. अकतरिया, पनही। — (वि.) कूटने की पहली प्रक्रिया का चावल।
असकरी (वि.)  इकहरा कपडा़।
असकिटियाना (क्रि.))  दे. ‘असकटाना’।
असकुड़ (सं.)  बैलगाडी के पहिए में उपयोग में आनेवाला लोहे का डंडा। दे. अछौद
असगुन (सं.)  अपशकुन।
असढि़या (सं.)  आषाढ का प्रभावी विषयुक्त सर्प विशेष। दे. ‘धमना’।
असत (सं.)  झूठ।
असती (वि.)  दे. ‘अधोरी’। दे. ‘असत्ती’।
असत्‍ती (वि.)  1. स्त्रियों की एक गाली। 2. चरित्रहीन। 3. बहुत तंग करने वाली। .
अस्थान (सं.)  स्थान, जगह।
असन (वि.)  दे. अइसन
असनान (सं.)  स्नान। (सं.) दे. ‘असनान’।
असरोना (क्रि.)  प्रतीक्षा करना, आशा लगाना।
अलबार (सं.)  सवार, सवारी करने वाला, चढ़ा हुआ व्यक्ति।
असाद (वि.)  आलसी, साफ-सफाई न रखनेवाला। असाधु।
असीस (सं.)  आशीष, आशीर्वाद।
असुधहा (वि.)  अशुद्ध, अस्वच्छ।
असोडढिया (सं.)  दे. ‘असढिया’।
असोना (क्रि  अन्न को साफ करना, अनाज उड़ाना। दे. ‘ओसाना
अहमी (वि.)  घमंडी।
अहिवात (सं.)  सुहाग, सौभाग्य।
अहिवाती (वि.)  सौभाग्यवती।

कुल 264 शब्‍द

जनउला (प्रहेलिकायें)





1) बीच तरिया में टेड़गी रूख।
2) फाँदे के बेर एक ठन, ढीले के बेर दू ठन।
3) एक महल के दू दरवाजा, वहाँ से निकले संभू राजा।
4) ठुड़गा रूख म बुड़गा नाचे।
5) कारी गाय कलिन्दर खाय, दुहते जाय पनहाते जाय।
6) कोठा में अब्बड़ अकन छेरी, फेर हागे त लेड़ी नहीं।
7) अँउर न मँउर, बिन फोकला के चउँर।
8) नानचून टूरा, कूद-कूद के पार बाँधे।
9) नानूक टूरा, राजा संग खाय ल बैइठे।
10) नानचून बियारा में, खीरा बीजा।
11) तरिया पार में फट-फीट, तेकर गुदा बड़ मिठ।
12) तरी बटलोही उपर डंडा, नइ जानही तेला परही डंडा।
13) छुए म नरम, ओड़े म गरम, धरे म शरम।
14) सुत उठ के लड़ँगा नाच ।
15) एकझन कहे संझातिस झन, दूसर कहे पहातिस झन।
16) एकठन थारी में दु ठन अंडा, एक गरम एक ठंडा।
17) पूछी में पानी पियय, मूँड़ी ललीयाय।
18) जरकुल ददा, निरासा दाई, फूलमत बहिनी, फोदेला भाई।
19) डबरा मताय हस, कि करार ओदारे हस।
20) ददा के एक ठन, दाई के दुठन।
21) पाँच भाई नांगर जोते, दस भाई कोप्पर तीरे।
22) करिया बईला बैठे हे, लाल बईला भागत हे।
23) कका ल काकी चाबे, काकी ल सब लोग लइका चाबे।




24) दुरूग के डोकरी, पाछु डाहर मोटरी।
25) चार चौकड़ी गोल बजार, सोला रानी तीन यार।
26) पीठ कुबरा पेट चिरहा, नई जानही तेकर चाल किरहा।
27) थोकिन एला थोकिन ओला धर बैठेंव तोला।
28) दू झन में उचथे, पाव भर न छटाक भर।
29) तोर घर के जुनना सियान कोन ए।
30) छितका कुरिया में बाघ गुर्रावय।
31) बाप लड़ँगा, बेटा पोण्डा, नाती निंधा।
32) हरियर भाजी, साग में न भात में, खाय बर सुवाद में।
33) काँटे मा कटाय नहीं, भोंगे मा भोंगाय नहीं।
34) उपर पचरी नीचे पचरी, बीच में मोंगरी मछरी।
35) पानी के तीर-तीर चर बोकरा, पानी अँटागे मर बोकरा।
36) तीन गोड़ के टेटका मेरेर-मेरेर नरियाय, पाछू डाहर खुँदे त आगू डाहर हड़बड़ाय।
37) बाप अउ बेटा के नाम एके, नाती के नाम औरे, ए जनउला ल जानबे, तब मुहँ म डारबे कौंरे।
38) नानकुन टूरा, गोटानी असन पेट,  कहाँ जाथस टूरा, रतनपुर देश।
39) दिखे में लाल लाल, छिये में गूज-गूज, हा दाई चाबदिस दाई बड़ेेक जन बूबू।
40) ओमनाथ के बारी म, सोमनाथ के काँटा, एक फूल फूले, त पचीस पेंड़ भाँटा।
41) एक सींग के बोकरा मेरेर-मेरेर नरीयाय, मुहु डाहन चारा चरे, पाछु डाहन पघुराय।
42) सुलुँग सपेटा फुनगी में गाँठ, नई जानही तेकर नाक ल काँट।
43) टेंड़ेग बेंड़ेग बाँसुरी, बजाने वाला कौन, भऊजी गेहे मइके, मनानेवाला कौन।
44) फूल-फूले रिंगी-चिंगी, फर फरे कटघेरा, एक हानी ल जानबे तभे जाबे अपन डेरा।
45) नीलकंठ राजा नहीं, चार गोड़ घोड़ा नहीं, लाम लँगूर बानर नहीं।
46) लाल मुहँ के छोकरी हरियर फीता गंथाय, निकले कहुँ बजार में, त हाँथो हाँथ बेचाय।
47) पानी भीतर के कमनीन बपरी, लम्बा-लम्बा केंस,  बारा लइका के महतारी होगे, फेर नइ हे पुरूष संग भेंट।




उत्तर – 1. चिंगरी मछरी 2. दतवन 3. रेमट 4. टँगिया 5. कुआँ 6. चाँटी 7. मउहा 8. सूजी 9. माछी 10. दाँत 11.नरियर 12. जिमीकाँदा 13. कथरी 14. बाहरी 15. दिन-रात 16. सुरूज चंदा 17. दीया 18. कुम्हड़ा 19. बासी-भात 20. गोत्र 21. दतवन 22. आगी 23. कांड़-भदरी 24.मेकरा 25. पासा 26. कउ़ड़ी 27. सील-लोड़हा 28. झगड़ा29. पाटी 30. जांता 31. मउहा 32. पान 33. छइँहा 34.जीभ 35. दीया 36. ढेंकी 37. मउहा 38. नरियल 39.मिरचा 40. भसकटिया 41. जांता 42. बाँस 43. नदिया44. भसकटिया 45. टेटका 46. बंगाला 47. ढुलेना काँदा

सुरेश सिंह बनाफर जी के व्‍हाट्स एप ले साभार



सुकलाल प्रसाद पाण्डेय के छत्‍तीसगढ़ी वर्णमाला गीत

वर्णमाला के स्वर

अ के अमली खूबिच फरगे।
आ के आंखी देखत जरगे।
इ इमान ल मांगिस मंगनी।
ई ईहू हर लाइस डंगनी।
उ उधो ह दौड बलाइस।
ऊ ऊघरू ल घला बलाइस।
ऋ ऋ के ऋषि हर लागिस टोरे।
सब झन लागिन अमली झोरे॥
ए ए हर एक लिहिस तलवार।
ऎ ऎ हर लाठी लिंहिस निकार ॥
ओ ओहर ओरन ल ललकारिस।
औ औहर बोला कोहा मारिस॥
अं अं के अंग हर टूटगे|
अ: अ: ह अअ: कहत पहागे।





वर्णमाला के व्‍यंजन

क क के कका कमलपुर जाही।
ख ख खरिया ले दूध मंगाही।
ग गनपत हर खोवा अँउटाही।
घ घर घर घर ओला बंटवाही।
ड ड पढ़ गपल हम खोबोन।
तब दूसर आन गीत ला गाबोन।
च चतरू हर गहना पहिरिस।
छ छबिलाल अछातेन बरजिस।
ज जनकू हर सुन्ना पाइस।
झ झट झट ओला मारिच डारिस।
झन गहना पहिरौ जी गिंया
ञ ञपढ़ ञ पढ़ पढञ।
ट टेटकू ह आवत रहिस।
ठ ठकुरी हर घला रहिस।
ड डियल बावा हर आईस।
ढ ढकेल खंझरी बनाईस।
ण ण ण कहिके डेरवाइस।
बम बम बम कहत फरइस।
त त तरकारी भात बनायेन।
थ थ थरकुलिया दार मंगायेंन।
द द देवी ला घला चघायेन।
ध धनऊ संग सब झन खायेव।
न न नदिया के पानी पीबोन।
अब हम आन गीत गाबोन।

सुकलाल प्रसाद पाण्डेय
वर्णमाला संबंधी गीत
रचनाकाल – 1906
बाल पहेली म संकलित



छत्तीसगढ़ी के सर्वनाम





मैं / मैं हर (मैं) – मैं दुरूग जावत रहेंव/ मैंं हर दुरूग जावत रहेंव।
हमन (हम) – हमन काली रईपुर जाबो।
तैं / तें हर (तुम) – तैं का करत हस? / तैं हर का करत हस?
तुमन (आप लोग) – तुमन कहां जावत हव। (बहुवचन)/ तुमन बने दिखत हव। (एकवचन)
ओ / ओ हर (वह) – ओ खावत हे। / ओ हर खावत हे।
ओमन (वे) – ओमन नई खईस।
ए,/ एहर (यह) – ए कुकुर आए। / ए हर कुकुर आए। (एकवचन)
एमन (ये) – एमन बिलासपुर ले आवत हें। (बहुवचन)

छत्‍तीसगढ़ी भाषा संबंधी हमारेे इस प्रयास में कोई त्रुटि या कमी हो तो कृपया टिप्‍पणी करके सुझाव देवें।



छत्तीसगढ़ी भांजरा

छत्तीसगढ़ी के मुहावरे

अकल लगाना = विचार करना
अंगठी देखाना = उंगली दिखाना
अंग म लगना = अंग में लगना
अंगरी जरना = उंगली जलना
अंधियारी कुरिया = अंधेरी कोठरी
अइसे के तइसे करना = ऐसी की तैसी करना
अकल के अंधवा होना = अक्ल का अंधा होना
अजर-गजर खाना = अलाय–बलाय खाना
अद्धर करना = अलग करना
अपन घर के बडे होना = अपने घर का बडा होना
आँखी-आँखी झूलना = आँखों ही आँखों में झूलना
आँखी-कान मूंदना = आँख-कान मूंदना
आँखी के कचरा = आँख का कचरा
आँखी के तारा = आँख का तारा
आँखी = आँख गडाना
आँखी गुडेरना = आँख दिखाकर क्रोध करना
आँखी फरकना = आँख फडकना
आँखी फार फार के देखना = आँखें फाड फाडकर देखना
आँखी म समाना = आँख में समाना
आँखी मटकाना = आँख मटकाना
आँखी मारना = आँख मारना
आँखी मिलना = आँखें मिलना




आँसू पी के रहि जाना = आँसू पीकर रह जाना
आगी उगलना = आग उगलना
आगी देना = आग देना
आगी बूताना = आग बुझाना
आगी म घी डारना =ऱ आग में घी डालना
आगी म मूतना = आग में मूतना
आगी लगना = आग लगना
आगी लगाके तमासा देखना = भग लगाकर तमाशा देखना
आघू-पीछु करना = हीला हवाला न करना
आघू-पीछु घुमना = चमचागिरी करना घुमना
आडी के काडी नि करना = कोई काम न करना
आन के तान होना = कुछ का कुछ हो जाना
आसन डोलना = आसन डोलना
आसरा खोजना = सहारा खोजना
इज्जत कमाना = इज्जत कमाना
उबुक चुकुक होना = डूबना उतराना
उलटा पाठ पढाना = उल्टा पाठ पढाना
एडी के रिस तरवा म चढना = अत्यधिक क्रोधित होना
एक कान ले सुनना = एक कान से सुनकर
दुसर कान से बोहा देना = दूसरे कान से निकाल देना
एक खेत के ढेला होना = एक खेत का ढेला होना
एक ताग नि उखाड सकना = कुछ भी न बिगाड सकना।
एक दु तीन होना = नौ दो ग्यारह होना
एक हाथ लेना दूसर हाथ देना = बराबरी का सौदा करना
एके लवडी म खेदना एक ही लाठी से हाँकना
एती के बात ओती करना = इधर की बात उधर करना
कचर-कचर करना = बकबक करना
कठवा के बइला = काठ का उल्लू
कन्हियाँ टूटना = कमर टूटना
कमर कसना = कमर कसना
करजा बोडी करना = कर्ज आदि करना
करम फूटना = भाग्य फूटना
करेजा निकलना = कलेजा निकल आना
काटे अंगरी नि मूतना = कटि अंगूली में न मूतना
कान म तेल डारे बइठना = कान में तेल डालकर बैठना
कान ल कौंआ ल जाना = कान को कौंआ ले जाना
कुल के दिया होना = कुल का दीपक होना
कोन खेत के ढेला होना = किस खेत का ढेला होना
कोरा भरना = गोद भरना
कोरा म लेना = गोद में लेना
खटपट होना = यथावत




खटिया धरना = खाट पकडना
खांध देना = कंधा देना
खाक छानना = खाक छानना
खाए के दाँत अलग = खाने के दाँत अलग और
देखाए के दाँत अलग = दिखाने के दाँत अलग होना
खुसुर पुसुर करना = खुसुर फुसुर करना
गंगा नहाना = गंगा स्नान करना
गडे मुरदा उखाङना = गडे मुर्दे उखाङना
गरवा पुछी छुना = गाय की पूँछ छूना
गांड जरना = मलद्धार जरना
गुड गोबर करना = गुड गोबर करना
गोड धोके पीना = पैर धो के पीना
परना = गांठ पडना
घुचुर-पुछुर करना = आगे-पीछे करना
चारी करना = चुगली करना
चुरी उतरना = विधवा होना
चुरी पहिराना = चूडी पहनाना
छाती म दार दरना = छाती पर मूंग दलना
जरे म नून = जले पर नमक छिडकना
जहाँ गुर तहाँ चाँटा होना = जहाँ गुड वहाँ चिंटा होना
जुच्छा हाथ होना = खाली हाथ होना
जे थारी म खाना ओही म छेदा करना = जिस थाली में खाना उसी में छेद करना
झक मारना = झक मारना
टुकुर-टुकुर देखना = टुकुर-टुकुर देखना
पीटना = टिंडोरा पीटना
डेरी हांथ के खेल होना = बाँए हाथ का खेल होना
तिडी-बिडी होना = तितर बितर होना
दाँत ल खिसोरना = दाँत निपोरना
धरती म पाँ नि मढाना = जमीन पर पैर न रखना
नाक कटोना = नाक कटाना
नाक घसरना = नाक रगड्ना
पहुना बनना = मेहमान बनना
पाठ–पीढा लेना = शिक्षा-दीक्षा लेना
पिंजरा के पंछी उड जाना = पिंजरे का पंछी उड जाना
पुदगा नि उखाड सकना = बाल न बाँका कर सकना
पेट म आगी बरना = पेट में चूहे कूदना
पोटार लेना = गले लगना




फूटहा आँखी म नि सुहाना = फूटी आँख न सुहाना
बनी भूति करना = मजदूरी करना
भोरका म गिरना = गडढे में गिरना
माटी के माधो = गोबर गणेश
मीट लबरा होना = मीठी छुरी होना
मुंह करिया कर डारना = मुंह काला कर डालना
मुड्भसरा गिरना = सिर के बल गिरना
मोर चिरई के एक गोड = मेरी मुर्गी की एक टांग
लुगरा चेंदरा तक बेचा जाना = कंगाल हो जाना
एक हंसिया के टेडगा होना = अनुशासन में रखना
हर्रा लागय न फिटकरी = हर्रा लगे न फिटकरी
हाथ उचाना = हाथ उठाना
हाथ झर्राना = पल्ला झाडना
हाडा गोड नि बाचना = हड्डी पसली न बचना।

छत्तीसगढ़ी हाना

छत्तीसगढ़ी कहावतें (हाना / लोकोक्तियाँ)




अँधरा पादै भैरा जोहारै (अंधा पादे, बहरा जुहार करे)
अँधरा खोजै दू आँखी (अंधा खोजे दो आँख)
अँधवा म कनवा राजा (अँधों में काना राजा)
अक्कल बडे के भैंस (अक्ल बडी की भैंस)
अड्हा बइद प्रान घात (अनाडी वैद्य प्राण घातक होता है)
अपन आँखी म नींद आथै (अपनी आँखों में नींद आती है)
अपन कुरिया घी के पुडिया (अपना घर स्वर्ग समान)
अपन मराए काला बताए (अपनी समस्या किसे बताएँ)
अपन मरे बिन सरग नि दिखय (अपने मरे बिना स्वर्ग दिखायी नहीं देता)
अपन हाथ जगन्नाथ (अपना हाथ जगन्नाथ)
अपन गली म कुकुर घलो बघवा कस नरियाथे (अपनी गली में कुत्ता भी शेर की तरह दहाडता है)
आए नाग पूजै नहीं, भिंभोरा पूजे जाए (आए हुए नाग की पूजा न करके उसके बिल की पूजा करने के लिए जाता है)
आगू के करु बने होथे (पहले की कड्वाहट बाद की कड्वाहट से अच्छी)
आप रुप भोजन, पर रुप सिंगार(आप रुचि भोजन, पर रूचि श्रृंगार)
आए न जाए चतुरा कहाए (आता जाता कुछ नहीं चतुर कहाता है)
उपर म राम-राम, भितर म कसइ काम (मुख में राम बगल में छूरी)
एक कोलिहा हुँआ–हुँआ त सबो कोलिहा हुँआ-हुँआ (एक सियार हुँआ बोला तो सभी सियार हुँआ बोले)
एक जंगल म दू ठिन बाघ नि रहय (एक जंगल में दो शेर नहीं रह सकते)
एक ठन लईका गाँव भर टोनही (एक अनार सौ बिमार)
एक ला माँ एक ला मौसी (भाई भतीजावाद करना)
एक हाथ के खीरा के नौ हाथ बीजा (तिल का ताडड राई का पहाड)
कथरी ओढे घी खाए (खाने के दांत अलग दिखाने के अलग)
कतको करय गुन के न जस (कितना भी करें गुण का न यश का)
कौआ के सरापे गाय नि मरय (कौंआ के श्राप से गाय नहीं मरती)
करिया आखर भैंस बरोबर (काला अक्षर भैंस बराबर)
करेला तेमा नीम चढय (एक तो करेला उस पर नीम चढा)
कहाँ गे कहूँ नहीं काय लाने कछु नहीं (कहाँ गए कहीं नहीं क्या लाए कुछ नहीं)
कहाँ राजा भोज कहाँ गंगवा तेली (कहाँ राजा भोज कहाँ गंगू तेली)
नंगरा नहाही काला अउ निचोही काला (नंगा नहाएगा क्या और निचोडेगा क्या)
का माछी मारे का हाथ गंधाए (मक्खी मारकर हाथ गंदा करना)
गरियार बइला रेंगथे त मेड्बवा ल फोर के (आलसी कुछ करता नहीं, करता है तो नुकसान करता है)
बाम्हन कुकुर नाउ, जात देख गुर्राउ (प्रतिद्धन्दी से ईष्या करना)
कुकुर के पूछी जब रही टेडगा के टेडगा (कुत्ते की पूँछ कभी सीधी नहीं हो सकती)
कुकुर भूकय हजार हाथी चलय बजार (कुत्ते भोंके हजार, हाथी चले बाजार)
कोरा म लइका गली खोर गोहार (बगल में बच्चा गाँव भर हल्‍ला)
खसू बर तेल नहीं घुडसार.बर दिया (खुजली मे लगाने को तेल नहीं पर घुडसाल में दिया जलाने के लिए तेल चाहिए)
गंगा नहाए ले कुकुर नई तरय (गंगा स्नान करने से कुत्ते को मोक्ष प्राप्त नहीं हो जाता)
गाँव के कुकुर गाँवे डहार (गाँव का कुत्ता गाँव की ओर से ही भोंकता है)
गाँव के जोगी जोगडा आन गाँव के सिद्ध (गाँव का जोगी जोगडा आन गाँव का सिद्ध)
गाँव गे गवार कहाए (गाँव गए गवार कहाए)
गाँव भर सोवै त फक्कड रोटी पोवै (गाँव के सभी लोग सो जाते हैं तो फक्कड रोटी बनाता है)
बढई के खटिया टुटहा के टुटहा (दिया तले अँधेरा)
गुरु तो गुड रहिगे चेला शक्कर होगे (बाप से बेटा सवा शेर)
घर के भेदी लंका छेदी (घर का भेदी लंका ढाए)
घर के कुकरी दार बरोबर (घर की मुर्गी दाल बराबर)
घानी कस किंजरत हे (कोल्हू का बैल बनना)
घी देवत बामहन टेड्वाए (बेवजह नखरे करना)
चट मंगनी पट बिहाव (चट मंगनी पट विवाह)




चटकन के का उधार (थप्पड की क्या उधारी,/क्वथनं किं दरिद्रम)
चमडी जाए फेर दमडी झन जाए (चमङी जाए पर दमङी न जाए)
चार बेटा राम के कौडी के न काम के (चार बेटे राम के कौडी के न काम के)
चिर म कौंआ आदमी म नउँवा (पक्षियों में कौंआ और मनुष्यों मे नाई)
चोर मिलय चंडाल मिलय फेर दगाबाज झिन मिलय (चोर मिले चंडाल मिले किन्तु दगाबाज न मिले)
सिधवा के डौकी सबके भौजी (सीधे व्यक्ति की पत्नी सभी की भाभी)
छानी म चघके होरा (छप्पर पर चढकर होला है)
जइसे जइसे घर दुवार तइसे तइसे फइरका जडसन दाई-ददा तइसन तइसन लडका (जैसा घर वैसा दरवाजा, जैसे मां-बाप वैसे बच्चे)
हूम देके हाथ जरोए (भलाई का जमाना नहीं)
मया के मारे मरे त दूनो कुला जरे (अधिक प्रेम करने से शत्रुता हो जाती है।)
जिहाँ गुर तिहाँ चाँटी (जहाँ गुड वहाँ चींटी)
जेखर घर डउकी सियान तेखर घर मरे बियान (जिसके घर में पत्नी की चलती हो वहाँ पति की मृत्यु हो जाती है)
जेखर बेंदरा तेखरे ले नाचथे (जिसका बंदर उसी से नाचता है)
जेखर लाठी तेखर भैंस (जिसकी लाठी उसकी भैंस)
जइटसन बोही तहसन लूही (जैसा बोएगा वैसा काटेगा)
जोन गरजथे तोन बरसे नहीं (गरजने वाले बरसते नहीं)
जोन तपही तोन खपबे करहि (जो अत्याचार करेगा वह नष्ट होगा)
झांठ उखाने ले मुर्दा हरू नी होय (झांट उखाडने से मुर्दा हल्का नहीं होता)
टठिया न लोटिया फोकट के गौंटिया (थाली न लोटा मुफ्त के जमीदार)
टिटही के थामें ले सरग नि रुकय (अकेला चना भाड्ड नहीं फोड सकता)
रद्दा के खेती अउ रांडी के बेटी (रास्ते की फसल और विधवा की पुत्री का कोई रखवाला नहीं होता)
राजा के अगाडी अउ घोडा के पिछाडी (राजा की अगाडङडी अउ घोडा की पिछाडी)
चोदरी डउकी के बारी ओखी (वेश्या औरत के अनेंक बहाने)
तइहा के गोठ बइहा ले गे (गई बात गणपत के हाथ)
तिन म तेरा म ढोल बजावै डेरा म (कबीरा खडा बाजार में सबकी मांगे खैर, ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर)
म लाडू नि बंधावय (थूक थूक से लड्डू नहीं बंधता है।)
दाँत हे त चना नहीं, चना हे त दाँत नहीं ( दाँत है तो चना नहीं चना है तो दाँत नहीं)
दुब्बर बर दू असाड (गरीबी में आटा गिला)
दूध के जरे ह मही ल फूक के पीथे (दूध का जला छाछ को भी कर पीता है)
दुधारी गरुवा के लातों मीठ (दुधारु गाय की लात भी सुहाती है)
दुरिहा के ढोल सुहावन (दूर के ढोल सुहावने)
धोए मुरई बिन धोए मुरई एके बरोबर (गधा घोडा एक समान)
न उधो के देना न माधो से लेना (न उधो को देना न माधो से लेना)
न गाँव म घर न खार म खेत (न गाँव में घर न खार में खेत)
कतको घी खवा चाँटा के चाँटा (कितना भी खिलाओं अंग नहीं लगेगा)
न मरय न मोटाए (न मरेगा न मोटाएगा)
नकटा के नाक कटाए सवा हाथ बाढय (नक्टे की नाक कटी परन्तु वह सवा हाथ बढ गयी)
नानकुन मुह बडे-बडे गोठ (छोटा मुँह बडी बात)
नीच जात पद पाए हागत घानी गीत गाए (तुच्छ को पदवी मिल जाती है तो वह अभिमानी हो जाता है)
नौ हाथ के लुगरा पहिरे तभो टांग उघरा (नौ हांथ लम्बी साडी पहनने पर भी पैर नंगे)
पर भरोसा तीन परोसा (पराधीन सपनेहू सुख नाही)
सही बात के गांड गवाही (सांच को आंच नहीं)




फोकट के पाए त मरत ले खाए (फोकट के चंदन घिस मेरे नंदन)
बर न बिहाव छट्ठी बर धान कुटाए (शादी न ब्याह छठी के लिए धान कुटाए)
जादा मीट म कीरा परय (अति परिचयात् अवज्ञा)
बाते के लेना बाते के देना (ब्यर्थ बकवास करना)
बाप मारिस मेचका बेटा तीरंदाज (बाप ने मारी मेंढकी बेटा तीरंदाज)
बाप ले बेटा सवासेर (बाप से बेटा सवा शेर)
बिन देखे चोर भाई बरोबर (बिना देखा हुआ चोर भाई बराबर)
बिलई के भाग म सिका टुटय (बिल्ली के भाग्य से टूटा)
बुढतकाल के लट्डका सबके दुलरवा (बुढापे का बच्चा सबका प्यारा)
बेंदरा काय जानय आदा के सुवाद (बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद)
भगवान घर देर हे अंधेर नइ ये (भगवान के घर देर है अँधेर नहीं)
भागे भूत के लंगोटी सही (भागे भूत की लंगोटी सही / नहीं मामा से काना मामा)
भूख न चिनहय जात कुजात, नींद न चिनहय अवघट घाट (भूख जात कुजात की और नींद अच्छे बुरे स्थान की पहचान नहीं करती)
भंइस के आघू बिन बजाए भैंइस बइठे पगराए (भैंस के आगे बिन बजाए भैंस रही पगुराए)
दान के बछिया के दाँत नि गिने जाए (दान की वस्तुओं का मूल्यांकन नहीं किया जाता)
मार के देखे भुतवा काँपे (मार से भूत भी काँपता है)
मुड मुडाए त छुरा ल का डराए (ओखली में सिर दिया तो मूसल से क्या डरना)
ररूहा खोजय दार भात (दरिद्र को सिर्फ खाना चाहिए)
राखही राम त लेगही कोन, लेगही राम त राखही कोन (जाको राखै साईयाँ मार सकै न कोय, बाल न बाँका कर सकै चाहे जग बैरी होय)
रात भर गाडा फाँदे, कुकदा के कुकदा (रात भर गाडी चलाई जहाँ के तहाँ)
रात भर रमायन पढिस, बिहनियाँ, पूछिस राम सीता कोन ए त भाई बहिनी (रात भर रामायण पढी, सुबह पूछा कि राम सीता कौन तो बताया भाई-बहन)
रुपया ला रुपया कमाथे (रुपए को रुपया कमाता है)
लंका म सोन के भूति (लंका में सोने की मजदूरी)
लटका जांग म हाग दिही त जांग ल थोरे काट देबे (यदि बच्चा जांग पर मल त्याग कर दे तो जांघ को थोडे ही काट देते हैं)
लबरा घर खाए त पतियाए (झूठे की खाए तभी विश्वास करे)
लात के देवता बात म नइ मानय (लातों के भूत बातों से नहीं मानते)
लाद दे लदा दे छे कोस रेंगा दे (लाद दो लदा दो छह कोस पहुँचा दो)
संझा के झडि बिहनिया के झगरा (शाम की झडी और सुबह का झगडा)
सबो कुकुर गंगा चल दिही त पतरी ल कोन चाटही (सब कुत्ते गंगा चले जायेंगे तो पत्तल कौन चाटेगा)
सबो अंगरी बरोबर नइ होवय (सभी अंगुलियाँ बराबर नहीं होतीं)
सरहा मछरी तरीया ला बसवाथे (एक सडी मछली पूरे तालाब को गंदा करती है)
सस्ती रोवय घेरी-फेरी महँगी रोवय एक बेर (सस्ता रोए बार-बार रोए एक बार)
जोन सहही तेकर लहही (जो सहेगा वह टिकेगा)
सांझी के बइडला किरा के मरय (सांझे का बैल कीडे पडकर मरता है)
सावन मं आँखी फुटिस हरियर के हरियर (सावन के अंधे को हरा ही हरा सूझता है)
सास लट्कोरी, बहू सगा आइस तउनो लइकोरी (जब सभी कामचोर हों तो काम कभी पूरा नहीं होता)
सीखाए पूत दरबार न् चढय (सीखाया हुआ पुत्र दरबार नहीं चढता)
सौ ठन बोकरा अउ झांपी के डोकरा (एक अनुभवी सौ नवसिखियों पर भारी पडता है)
सुनय सबके करय अपन मन के (सुने सबकी करे अपने मन की)
सूते के बेर मूते ल जाए, उठ उठ के घुघरी खाए (सोने के वक्त पेशाब करने जाता है और उठ उठ कर घुघरी खाता है)
सोझ अंगरी म घी नई निकरय (सीधी अंगुलि से घी नहीं निकलता)
सौ ठन सोनार के त एक ठन लोहार के (सौ सुनार की तो एक लोहार की)
सोवय तउन खोवय, जागय मउन पावय (जो सोया वह खोया, जो जागा सो पाया)
हगरी के खाए त खाए फेर उटकी के झन खाए (एहसान फरामोशों से कुछ नहीं लेना चाहिए)
हाथी के पेट म सोंहारी (ऊँट के मुँह में जीरा)
हाथी बुलक गे पूछी लटक गे (हाथी निकल गया पूँछ रह गयी)
आवन लगे बरात त ओटन लगे कपास (बारात आने पर आरती के लिए कपास ओटने चले)
कुँआर करेला, कातिक दही, मरही नही त परही सही (क्वार में करेला और कार्तिक में दही खाने वाला यदि मरेगा नहीं तो बीमार अवश्य पडेगा)
पीठ ल मार ले त मार ले फेर पेट ल झन मारय (किसी के पेट पर लात मारना ठीक नहीं)
बिन रोए दाई घलो दूध नई पियावय (बच्चे के रोए बिना माँ भी दूध नहीं पिलाती)
मुड मुडाए देरी नइ ए करा बरसे लागिस (आसमान से टपके, खजूर पर अटके)
हर्रा लगय न फिटकरी रंग चोखा (मुफ्त में अच्छा काम हो जाना)



छत्तीसगढ़ी भाषा में रिश्ते-नाते

दाई / महतारी / दइ = माँ (Mother)
ददा = पिता (Father)
बबा = दादा (Paternal Grandfather)
डोकरीदाई = दादी (Paternal Grandmother)
कका = चाचा (Father’s Younger Brother)
काकी = चाची (Father’s Younger Brother’s Wife)
नानी / आजी, ममादाई = नानी (Maternal Grandmother)
नाना /आजा बबा = नाना (Maternal Grandfather)
मौसी दाई = सौतेली माँ (Step Mother)
मौसी = मौसी (Mother’s Sister)
मौसा = मौसा (Mother’s Sister’s Husband)
ममा = मामा (Mother’s Brother)
मामी = मामी (Mother’s Brother’ Wife)
भई / भईया = माई (Brother)
भौजी = भाभी (Brother’s Wife)
बहिनी / दीदी = बहन (Sister)
बहनोई = छोटी बहन का पति (Brother-in-law)
जीजा = बंडी बहन का पति -जीजा (Sister’s Husband)
फूफा = पिता की बहन का पति (Father’s Sister’s Husband)
फुफु दीदी बुआ = पिता की बहन (Father’s Sister)
ससुर = ससुर (Wife’s/ Husband’s Father)
सास = सास (Wife’s/ Husband’s Mother)
पत्तो / बहुरिया = बहू (Daughter in Law)
बहु = बेटे की पत्नी (Daughter in Law)
सारी = साली (Wife’s Sister)
सारा = साला (Wife’s Brother)
डेढ़ सास = पत्नी की बङी बहन (Wife’s elder Brother’s Wife)
डेढ़ सारा = पत्नी का बडा भाई (Wife’s elder Brother)
साढू = साली डेढ सास का पति (Wife’s Sister’s Husband)
सरहज = साला डेढ साला की पत्नी (Wife’s Brother’s Wife)
ननंद = पति की बहन (Husband’s Sister)
नंदोई = पति के बहन का पति (Husband’s Sister’s Husband)
कूरा ससूर / जेठ = पति का बड भाई (Husband’s elder Brother)
देवर = पति का छोटा भाई (Husband’s younger Brother)
देवरानी = देवर की पत्नी (Husband’s younger Brother’s Wife)
जेठानी = जेठ की पत्नी (Husband’s elder Brother’s Wife)
ममा ससुर = पत्नी/पति का मामा (Wife’s/Husband’s Uncle)
मामी सास = पत्नी/पति की मामी (Wife’s/Husband’s aunt)
मौसा ससुर = पत्नी/पति का मौसा (Wife’s/Husband warts)
मौसी सास = पत्नी/पति की मौसी (Wife’s/Husband’s aunt)




नना ससुर = पत्नी/पति का नाना
नानी सास = पत्नी/पति की नानी
कका ससुर = पत्नी/पति का चाचा
काकी सास = पत्नी/पति की चाची
फूफा ससुर = पत्नी/पति की बूआ का पति
फुफु सास = पत्नी/पति की बूआ
बेटा = बेटा (Son)
बेटी = बेटी (Daughter)
भाईबहू = छोटे भाई की पत्नी
ढेंढा = विवाह की रस्म कराने वाला (जीजा या मामा)
ढेंढिन = विवाह की रस्म कराने वाली (बडी बहन / दीदी या बुआ)
सुआसिन = ससुराल पक्ष की विवाह की रस्म कराने वाली
सुआसा = ससुराल पक्ष का विवाह की रस्म कराने वाला
बिहइ = विवाह कर लायी गई पत्नी
उदढरिया = भगाकर लायी गई पत्नी
मितान, गियाँ = मित्र (Friend)
डौकी /गोसइन /घरवाली / सुआरी / = पत्नी (Wife)
डौका / गोसइयॉ /घरवाला, लगवार = पति (Husband)

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छत्‍तीसगढ़ी में शरीर के अंग