Category: समीच्‍छा

समीक्षा : जुड़वा बेटी

छत्तीसगढ़ी साहित्य म गद्य लेखन नहीं के बतौर होवत हे। कहानी,एकांकी,उपन्यास के तो मानो टोंटा परे हवय। अइसन बेरा मा बादल जी के “जुड़वा बेटी” ल पढ़े के बाद ये आस जागिस हवय कि अब गद्य लेखन छत्तीसगढ़ी मा समृद्ध होही। बादल जी के कहानी मन आँचलिक समस्या ऊपर केंद्रित हवय। गाँव गवई में समाज के समस्या ल कहानी के रूप मा प्रस्तुत करके  पाठक ल जोड़े मा बादल जी पूरा सफल होय हवय। मुहावरा अउ लोकोक्ति के सुग्घर प्रयोग बादल जी के कहिनी म देखे बर मिलथे। कहानी के शिल्प के चिंता करे बिना बादल जी अपन बात ल पाठक के बीच सुग्घर अउ फोरिया के रखे हवय। कहानी के भाखा अउ शब्द चयन सहज अउ सरल हवय।

सबो कहानी संवेदनशील हवय जेला पढ़ते पढ़त पाठक स्वयं एक पात्र के रूप मा खो जाथे अउ कहानी खतम होय के बाद चिंतन बर विवश होथे। ये किताब के पहिली कहानी “इंसानियत के लाश” भीड़तंत्र के दोष ला उजागर करत शिक्षाप्रद कहानी हवय। “किरिया’ मा बादल जी स्कूल म पढ़ई लिखई के समस्या ल प्रमुखता ले उठाय हवय संग म समस्या के निदान घलो बताय हवय । “बुधवारो” कहिनी बेटी मन ला प्रेरित करथे कि हर स्थिति के सामना कइसे करना हवय । निःसंतान होय के बाद भी बहू मन समाज बर प्रेरणा बन सकथे येकर सुग्घर उदाहरण “पतरेंगी” कहानी म देखे ल मिलथे।

“जुड़वा बेटी” सन्देश परक मार्मिक कहानी आय जेहा नशा  के कारण परिवार के दुर्दशा ल चित्रित करथे। नारी के संवेदना के प्रति-पूरा पूरा न्याय लेखक ह करे हवय, ये कहानी पाठक के अंतस मा सीधा उतरथे। मन में चिर स्थायी जघा बनाथे। समलैंगिकता  जइसन  गंभीर मुद्दा  ला “माथा चकरागे” कहिनी के माध्यम ले उठाय हवयँ । इंसानियत के लाश,अति के अंत, बुधवारो, दुलार के दवा कहानी मन लघुकथा के एहसास कराथे। जात बाहिर कहिनी सामाजिक समस्या ऊपर हवय जेकर निदान घलो लेखक ह बताथे। सबो कहानी में सुखांत हवय जेकर ले पाठक उल्लासित रहिथे। विषय वस्तु चयन के संग सुग्घर अभिव्यक्ति  लेखक के कौशल के परिचायक हवय।
शीर्षक के अनुरूप कव्हर पेज कलात्मक अउ बेहतरीन हवय। अवइया बेरा मा ये कहानी संग्रह निश्चित रूप से साहित्य मा अपन जघा बनाही येमा संदेह नइ हे। नवा रचनाकार मन ये किताब ला एक घाव जरूर पढ़य।

अजय अमृतांशु
भाटापारा

कृति-      जुड़वा बेटी
लेखक-    चोवाराम वर्मा “बादल”
प्रकाशक- वैभव प्रकाशन
मूल्य-      100/-

हीरा सोनाखान के

छत्तीसगढ़ी साहित्य के पद्य लेखन मा उत्कृष्ट लेखन के कमी हवय, छन्द लेखन म तो बिल्कुल नगण्य। येकर भरपाई – हीरा सोनाखान के (खंडकाव्य) करत हवय । ये खण्डकाव्य ला पढ़ेंव एक घव मा मन नइ माढ़ीस ता दुबारा-तिबारा पढ़ डारेंव। पंडित सुंदरलाल शर्मा के दानलीला के एक लंबा अंतराल मा खण्ड काव्य आइस जेन पूरा व्याकरण सम्मत अउ विधान सम्मत हवय। बीच-बीच मा खण्डकाव्य के इक्का दुक्का किताब जरूर आइस फेर व्याकरण अउ विधान म पूरा खरा नइ उतरिस । मितान जी के ये खण्डकाव्य विधान सम्मत अउ व्याकरण सम्मत हवय जेमा उपमा, अनुप्रास अउ अतिसंयोक्ति अलंकार के सुग्घर प्रयोग देखे बर मिलिस।

शहीद वीर नारायण के सौंदर्य (पुरुष श्रृंगार) के गजब के वर्णन मनीराम जी के काव्य कौशल ला दर्शाथे । अनुस्वार अउ अनुनासिक के बहुत ही बारीकी से प्रयोग मनीराम जी करे हवय । शब्द चयन सटीक अउ अर्थपूर्ण हवय। गाँव गँवई के नँदावत ठेठ देहाती शब्द मन ल लेखक सुग्घर प्रयोग करे हवय जेकर ले छ्न्द के सौंन्दर्य बाढ़गे हवय । खण्डकाव्य मा प्रयोग छत्तीसगढ़ी शब्द मन अवइया बेरा मा मानकीकरण के आधार बनही । ये बात के नँगते खुशी हवय कि छन्द लेखन के परंपरा छत्तीसगढ़ म पुनर्स्थापित होवत हे अउ छन्द लेखन मा नवा नवा प्रयोग भी देखे मा आत हे ।

शहीद वीर नारायण सिंह के गाथा वर्णन मा लेखक कुल 21 प्रकार के छ्न्द – दोहा, रोला, कुण्डलिया, अमृतध्वनि, सवैया, रूपमाला, गीतिका, आल्हा, त्रिभंगी,उल्लाला, हरिगीतिका, बरवै, सरसी, शक्ति, चौपाई, घनाक्षरी, शंकर, सार, विष्णुपद, छप्पय अउ सोरठा के प्रयोग करे हवय। मुख्य छन्द आल्हा हवय जेकर संख्या कुल 251 हवय । युद्धभुमि के अद्भुत वर्णन घनाक्षरी छन्द में हवय जेला पढ़बे त रोंवा-रोंवा खड़ा हो जाथे। आल्हा में गाथा के संगे संगे जनमानस मा देशप्रेम के भावना ल जागृत करे म घलो लेखक पूरा सफल होय हवय । अनुप्रास अलंकार के प्रयोग देखव-

तर्र तर्र तुर्रा मार, लाली-लाली लहू धार ।
खार-खाय खच-खच, चलै हो के चाँद गा।
छेदै छाती जोंग-जोंग,आल-पाल भोंग-भोंग।

आल्हा में अतिशंयोक्ति अलंकार के बानगी देखव –
सिंह के खाड़ा लहरत देखय,बइरी सिर मन कट जयँ आप।
लादा पोटा बाहिर आ जयँ,लहू निथर जय गा चुपचाप।

हीरा सोना खान के छत्तीसगढ़ी साहित्य म मील के पथरा बनही एमा रत्ती भर संदेह नइ हे। किताब के छन्द मन उत्कृष्ट अउ कालजयी होही अउ छत्तीसगढ़ी म छ्न्द लेखन के परंपरा ल पोठ करे के काम करे के काम करही। नवा रचनाकर मन ये किताब ल जरूर पढ़य उन ला नवा दिशा मिलही।

अजय “अमृतांशु”
भाटापारा

पुस्तक समीक्षा : गाँव के पीरा ‘‘गुड़ी अब सुन्ना होगे‘‘

  • वीरेन्द्र ‘सरल

जिनगी के व्यथा ह मनखे बर कथा होथे। सबरदिन ले कथा-कंथली ह मनखे के जिनगी के हिस्सा आय। मनखे जब बोले-बतियाय ल नइ सिखे रिहिस मतलब जब बोली-भाखा के विकास घला नइ होय रिहिस तभो मनखे अपन जिनगी के अनुभव ला भितिया में रूख-रई, चिरई-चिरगुण, साँप-डेरू, हिरू-बिच्छू के चित्र ला छाप के परगट करत रिहिन काबर कि ओ समे अपन दुख-दरद ला जनवाय के अउ कोन्हो साधन नइ रिहिस। जब बोली-भाखा के विकास होईस तब मनखे अपन बात ला मुँह अखरा एक पीढ़ी ले दूसर पीढ़ी पहुँचाय के उदिम करिस। इही ल लोक साहित्य कहे गिस जउन आज ले चलत हे। कथा-कंथली ह अपन बात ला कहे अउ समझाय के सबले सस्ता अउ बढ़िया माध्यम बनिस। काबर कि येमा अउ काय होही कहिके जाने बर मन ह अघाबे नइ करय। कहिनी म मन ह अतेक रम जथे के बेरा के पता नइ चलय अउ कहिनी ह काय कहना चाहत हे अहू बात ह अन्तस में पहुँच जथे। हमर छत्तीसगढ़ी के लोक साहित्य में नान्हे कहिनी के बात करे जाय तब ‘ढेला अउ पान‘, ‘डोकरी अउ बादर‘, राजा अउ चिरई के नान्हे कहिनी ला कोन भुला सकत हे? आज ले सियान दाई मन लइका भुलियारे बर इही कहिनी ला सुनावत हे।




आज जमाना गजब बदलगे हावे। अपन बात ला बोले बताये बर हमर मेरन गजब अकन किसम-किसम के साधन होगे हावे फेर कहिनी के महत्व ह ज्यों के त्यों बने हावे। नान्हे-नान कहिनी में जिनगी के बड़े-बड़े बात ल कहे के कला सब झन ला नइ आवय। कोन्हो-कोन्हो ला अइसन कला ह मिलथे। बड़े बहिनी डॉ षैल चन्द्रा ह ये कला ला पाय हे। हिन्दी लघु कथा में तो ओखर नाव के षोर ह देष भर म बगरेच हे फेर अब छत्तीसगढ़ी लघु कथा मे घला ओखर नाम ला बड़ सन्मान ले ले जाही। षैल दीदी के पहिली घला कोन्हों छत्तीसगढ़ी लघु कथा संग्रह छपवाय होही ये बात के तो मोला जानकारी नइ हे, अभी-अभी षैल दीदी के लघु कथा संग्रह ‘गुड़ी अब सुन्ना होगे‘ पढ़े के मउका मिलिस तब जानेव ‘गागर मे सागर काला‘ कहे जाथे। पहिली जमाना म गाँव के गुड़ी के ओतकेच महत्व रिहिस जतना आज देष बर संसद भवन के हाबे। गुड़ी ह गाँव के ओ ठउर आय जिहां गाँव भर के मनखे मन दिनभर के काम कमई ले फुरसत पाय के बाद जुरियावय अउ अपन दुख पीरा ला साझा करय। सुन्ता-सुलाहा के गोठ करय। लड़ई-झगड़ा के निपटारा करय अउ गांव के विकास बर नीति-नियम बनावय। आज ओहा सुन्ना पड़े हावय। नान्हे-नान बात बर मनखे आज कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगावत हे। मोबाइल, नेट अउ टी वी म अइसे मगन हे कि पड़ोसी ला तो छोड़ अपने परवार के मनखे के सुख दुख के संषो तक नइ कर सकत हे। घर-परिवार, षिक्षा-संस्कार, संस्कृति-प्रकृति, कथनी-करनी सबो विशय ला षैल दीदी ह ये संग्रह के कहिनी मन म समोय के उदिम करे हावे। षैल दीदी ला गाड़ा-गाड़ा बधाई।

पुस्तक के नाव-‘गुड़ी अब सुन्ना होगे‘ प्रकाषक-आषु प्रकाषन रायपुर, मूल्य-150 रूपया।



ये किताब ल आप ये कड़ी ल क्लिक करके आनलाईन पढ़ सकत हव।

पुस्तक समीक्षा : अव्यवस्था के खिलाफ आक्रोश की अभिव्यक्ति ‘‘झुठल्ला‘‘

महान विचारक स्वेट मार्डन ने कहा है कि ‘कहकहों में यौवन के प्रसून खिलते है।‘ अर्थात उन्मुक्त हँसी मनुष्य को उर्जा से भर देती है। पर आज के भौतिकवादी इस युग ने जीवन को सुविधाओं से तो भर दिया है पर होंठो से हँसी छिन ली है। एक ओर ढोंगी, पाखंडी, बेईमान और भ्रष्ट लोग अपनी आत्मा को बेचकर समृद्धि की शिखर पर मौज मना रहे हैं वहीं दूसरी ओर ईमानदार, श्रमशील और सत्यवादी लोग दो-जून की रोटी को तरस रहे है। जब चारों ओर ढोंग, आडम्बर, पाखंड का पहाड़ खड़ा हो, नैतिक मूल्यों का हा्रस हो रहा हो। संवेदनाएं सूखती जा रही हो और मनुष्यता छटपटा रही हो तो संवेदनशील मनुष्य आखिर हँसे तो कैसे हँसे? चूंकि व्यंग्य के साथ पाठक हास्य की अपेक्षा रखते हैं। इसलिए व्यंग्यकार अपनी रचना को सुरूचिपूर्ण बनाने के लिए व्यंग्य के साथ हास्य का समावेश अवश्य करता है पर उसका उद्देश्य केवल हँसाना नहीं होता बल्कि चेतना को झकझोरना होता है।
हास्य-हास्य में भी अन्तर होता है। एक हँसी विनाश का कारण बनती है जैसे दुर्योधन पर द्रोपदी की हँसी के कारण ही महाभारत का युद्ध हुआ था क्योंकि यह उपहास की हँसी थी। और एक हँसी चिन्तन का सबब भी बनती है। उदाहरणार्थ मैंने कहीं पढ़ा है कि कवि जायसी जब बादशाह शेरशाह के दरबार में पहुँचे तो उसकी कुरूपता देखकर बादशाह हँस पड़े तब जायसी ने हँसते हुए पूछा-‘मोहि कां इससि कि कोहरहि‘ मतलब आप किस पर हँस रहे हैं? मुझ पर या मुझे बनाने वाले पर? रचना पर या रचियता पर? जायसी के कहे का आशय समझ में आते ही बादशाह लज्जित हुए और वे चिन्तन में डूब गये। फिर उन्होने जायसी की विद्वता को यथोचित मान-सम्मान दिया। व्यंग्य का काम केवल व्यवस्था का उपहास करना नहीं है बल्कि व्यवस्था को और भी अधिक जनकल्याणकारी बनाने के लिए प्रेरित करना होता है। इसी अभिष्ट की प्राप्ति हेतु श्री कृष्ण कुमार चौबे जी , विसंगितयों, विद्रुपताओं और मुखौटों के भीतर छिपे चेहरों पर व्यंग्य वाण चलाते हैं। अपने प्रथम छत्‍तीसगढ़ी व्यंग्य संग्रह ‘लंदफंदिया‘ को पाठकों से मिले अपार स्नेह से उत्साहित चौबे जी अपने दूसरे व्यंग्य संग्रह ‘झुठल्ला‘‘ लेकर पाठकों के बीच उपस्थित हुए है।
बुजुर्गो का कहना है कि साँच कहे तो मारन धावा, झूठ कहे तो जग पतियावा आशय स्पष्ट है कि झूठ कहने पर लोग आसानी से विश्वास कर लेते हैं और सत्य कहने पर मरने-मारने को उतारू हो जाते हैं। आज का युग विज्ञापन का युग है। पूरा बाजार विज्ञापन की बुनियाद पर ही खड़ा है। पीतल पर सोने की कलई चढ़ाकर सोने के भाव बेच देना बाजार का बायें हाथ का काम है। अब केवल बाजार ही नहीं बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में झूठों का ही बोलबाला है। झूठों के बढ़ते हुए वर्चस्व को ही केन्द्रिय विषय बनाते हुए और पाठकों को सजग और सचेत करते हुए चौबे जी ने संग्रह का नामकरण झुठल्ला किया है। संग्रह में संग्रहित लेख कथात्मक और पत्रात्मक शैली में है। जहां झन झपा लेख यातायात की समस्या की ओर संकेत करता है तो तीजा आवत हे , जीव धुकधुकावत हे लेख महंगाई की समस्या को इंगित करता है। संग्रहित लेखों में विशेष रूप से पत्रात्मक शैली में लिखे हुए व्यंग्य भकाड़ूराम के दुसरइय्या चिट्ठी राजनीति में अल्पश्कि्षितों के वर्चस्व पर व्यंग्य करता है तो तीसरइय्या चिट्ठी दलबदल और अवसरवादी राजनीति पर गहरा कटाक्ष करता है। व्यंग्य में भाषा की भूमिका बहुत ही महतवपूर्ण होती है। भाषा ही साहित्य की अन्य विधाओं से व्यग्य को अलग करती है। व्यंग्य अमीर ल गरीब के चिट्ठी में कार्पोरेट की कठपुतली बनकर नाचती हुई राजनीति पर व्यंग्य वाण चलाते हुए लेखक की सधी हुई भाषा की ताजगी और रवानगी देखिए कि
‘‘ हमन देस के खातिर गर कटाय बर अपन लइका मन ला फउज म भेजथन। अउ तुमन अपन लइका मन ला अपने कस अमीर बनाय बर हमर गर म छुरी दंताथो। नेता मन तो तुंहर ‘गरी‘ मा फंसेच रहिथें। पइसा गारे बर तुम कतको ‘गिर‘ सकत हो। का होईस, गिरहू तभे तो गारहू। हमर भाग म तो सिरिफ गारी हे महराज। तेकरे बर हमन गरीब (यानि कि गारी-बे) कहाथन।‘‘
गरीबनवाज ल गरीब के चिट्ठी व्यंग्य में र्धार्मक ढकोसले से अपना उल्लू सीधा करने वालो पर निशाना साधते हुए लेखक लिखता है कि-
‘‘ छोटे पापी हर कोनो कोन्टा-उन्टा म तुंहर बर नानकुन, मुड़ी बुलकउ मंदिर बना देथे, तब बड़का पापी मन या तो बड़े-बड़े मंदिर मा करोड़ों के सोना के जेवर चढ़ा देथे या कि बड़े जन मंदिर बनवा देथे। ओ मंदिर के एक-एक ईंटा म हमर लहू सनाय रहिथे परमात्मा।‘‘
दलबदल और अवसरवादिता की राजनीति पर व्यंग्य करते हुए लेखक लिखता है कि-
‘‘ भई आदमी के दार चुरना चाही। चाहे कोनो पानी म चुरय। कुआं के पानी म नई चुरय तब तरिया के पानी म चुरोवव, तरिया के पानी म नई चुरय तब बोरिंग के पानी म चुरोवव। उहू म नई चुरय त डबरीच के पानी म चुरोवव। दार चुरना चाही। घोटरहा दार ला थोड़े खाहू भई। त तुमन निशदिन दार चुरोय के उदिम म लगे रहिथव, ये बात के में तारीफ करथव। तभे तो तुमन ला लदबदाय दार सरपेटे के मजा मिलत रहिथे।‘‘
जब किसी लेखक के सामने अपने ही समाज की विसंगतियों पर कलम चलाने की बात आती है। तो उसकी स्थिति अर्जुन के समान हो जाती है सामने सब अपने ही परिजन नजर आने लगता है पर व्यंग्यकार का केवल एक ही धर्म होता है, वह है विसंगतियो पर प्रहार करना। इस बात को सिद्ध किया है चौबे जी ने अपने व्यंग्य लेख मोर का जाही में। कथनी और करनी की असमानता पर लेखक ने बड़ी बेबाकी से कलम चलाई है।
के के चौबे जी के व्यंग्य संग्रह झुठल्ला से गुजरते हुए हर पाठक आत्म साक्षात्कार करने के लिए बाघ्य और सोचने के लिए मजबूर होता है। एक स्वस्थ्य, समृद्ध और समतामूलक समाज का निर्माण करना ही व्यंग्य का उद्देश्य है। इस कसौटी पर के के चौबे जी की व्यंग्य रचनाएं खरी उतरती है। एक सार्थक और सोद्देश्य व्यंग्य संग्रह के लिए के के चौबे जी को मेरी हार्दिक बधाई और उनके यशस्वी लेखकीय जीवन हेतु अशेष शुभकामनाएं।

वीरेन्द्र ‘सरल‘
बोड़रा (मगरलोड़)
जिला-धमतरी ( छत्‍तीसगढ़)
मो-7828243377

छत्तीसगढ़ गज़ल और बलदाऊ राम साहू

-डॉ. चितरंजन कर

निस्संदेह गज़ल मूलत: उर्दू की एक काव्य विधा है, परन्तु दुष्यंत कुमार के बाद इसकी नदी बहुत लंबी और चौड़ी होती चली गई है। जहाँ-जहाँ से यह नदी बहती है, वहाँ-वहाँ की माटी की प्रकृति, गुण, स्वभाव और गंध आदि को आत्मसात कर लेती है, जैसे नदी अलग-अलग प्रांतों, देशों में बँटकर भी अपना नाम नहीं बदलती, वैसे ही छत्तीसगढ़ में यह छत्तीसगढ़ी गज़ल के नाम से जानी जाने लगी है।
छत्तीसगढ़ी में जिन कलमकारों ने गज़ल-विधा को आगे बढ़ाया है, उनमें डॉ. प्रभंजन शास्त्री, रामेश्वर वैष्णव एवं मुकुंद कौशल के नाम अग्रण्य है। मुकुंद कौशल तो जैसे छत्तीसगढ़ी गज़ल के पर्याय ही हो गए हैं। इनकी तीन-चार पुस्तकें अब तक आ चुकी हैं। भाई बलदाऊ राम साहू की छत्तीसगढ़ी गज़लें इस दिशा में विकास की एक और कड़ी है, उनकी गज़लों में छत्तीसगढ़ी की माटी की सोंधी महक है। ऐसा लगता है उनकी भाषा की सहजता, सरलता और तरलता मानो आपस में बातचीत कर रहे हों, कहीं कोई उलझाव नहीं, सीधे-सीधे अपनी बात कहने की कोशिश है, पर सपाट नहीं है। सरल होना, सरल सोचना, सरल बोलना-लिखना, सरल जीना कितना कठिन है, यह सुधीजन भली-भाँति जानते हैं। एक सरल रेखा खींचने के लिए स्केल की जरूरत होती है, परन्तु टेढ़ी-मेढ़ी (वक्र) रेखा के लिए कोई पैमाना नहीं होता।
बलदाऊ राम साहू की छत्तीसगढ़ी गज़लों में समकालीन जीवन का ऐसा कोई पहलू नहीं है, जो न मिले। प्रेम, नीति, राजनीति, अर्थव्यवस्था की संस्कृति, पर्व त्योहार, ऋतु, कृषि, कृषक, पर्यावरण, गाँव, शिक्षा, देश इन गज़लों में अनेक रूपों में चित्रित हुए है, जिनमें आमजन की समस्याएँ हैं, परन्तु प्रत्येक गज़ल में वह सचेत है और सबको सचेत करता है। सुनहरे भविष्य की आशा लेकर ‘सुरुज नवा उगइया हे’ को सार्थक करता है।




”दूसर के रद्दा मा चलना,
सिरतों हे बेकार रे भाई।
‘बरस’ हवै, तुरते रद्दा मा,
रेंगे बर तइयार रे भाई।’’
जहाँ की संस्कृति की अपनी एक अलग पहचान है उसके भिन्नï-भिन्न पकवान, खान-पान, कृषि की अपनी पहचान है तथा जिसके पास आगे बढऩे का हौसला भी है, जिसे उन्होंने सहजता से उकेरा है-
”सुआ, ददरिया, करमा के हम तान लिखन,
अउ संगे मा चलौ ग्यान-बिग्यान-लिखन।”
इस गज़ल संग्रह में बलदाऊ जी ने छत्‍तीसगढ़ की महिमा-मात्र गाकर आत्ममुग्ध होने वालों को सावधान किया है कि ज्ञान-विज्ञान के बढ़ते चरण के साथ-साथ आगे बढऩा भी जरूरी है। यहाँ धार्मिक सहिष्णुता की एक मिसाल देखिए-
”मंदिर-मस्जिद जम्मो एक्के संग हावै,
बात हे बढिय़ा इनकर चलौ बखान लिखन।”
धार्मिक पाखंड का बोलबाला जितना आधुनिक युग में देखने को मिलता है, उतना पहले कभी नहीं था। वृद्ध माता-पिता का तिरस्कार भला कैसे धार्मिक हो सकता है?
”जीयत देवता ल दुत्कारन,
पथरा के आगू मुड़ी नवावन।
जिनगी भर जउन हाड़ा टोरिन,
अंतकाल मा भूखन-लाँघन।”
छत्तीसगढ़ी मनखे भले ही जैसा हो, पर उसका मन उज्‍वल, धवल रहता है, कमी है तो बस स्वाभिमान की। देखिए-
तन के करिया मन के उज्जर जम्मो झन,
छत्तीसगढिय़ा मन अपनो सुभिमान लिखन।
नए युग के शंखनाद के साथ चलते हुए भी हमारे जवान और किसान सर्वप्रथम पूजनीय, वंदनीय है-
च्बरसज् कहत हे बखत नया आवत हावै,
जै जवान संग जै-जै किसान लिखन।
व्यंग्य सच का कलात्मक रूपायन है, जो कथन और संवेदनात्मक तीव्रता को धारदार बना देता है। व्यंग्य के लिए धर्म और राजनीति से बढ़कर और कौन-सा विषय हो सकता है, जहाँ आडंबर अधिक और असलियत बहुत कम रहती है। कुछ बानगी देखें-




गोल्लर मन हर देस ल चर दिन,
कर तब ले निस्तार रे भाई।
अँधवा पीसय, कुकुर खावय
जग होगे अँधियार रे भाई।
धरम-जात के टंटा पालें सुवारथवस,
राम-रहीम के झंडा अपन उँचावत हें।
मनखे मन ठलहा अउ कमचोरहा हे
कुरसी पा के उहीच हा इतरावत हे।
बाँटत हे जउने अँधियारी,
हाथे मा ओकर मसाल हे।
सत्तïा उप्पर करै सवारी,
ओमन सिरतों मालामाल हें।
संसद मा लड़त हावैं नेता मन
तभो ले नामी अउ महान संगी।
देस ल चर डारिस उही मन हर,
तुमन देखौ बइठे मचान संगी।
कहते हैं कि जब झूठ को बार-बार दोहराया जाता है, तब सच लगने लगता है, परन्तु अंततोगत्वा वह उजागर हो ही जाता है।
कौनो मोला हूँत कराइस
खाल्हे ले मैं ऊपर देखेंव।”
नींद खुलिस तब अचरज परगे
जम्मो सियासी असर देखेंव।
छत्तीसगढ़ कृषि प्रधान प्रदेश है, जिसे ‘धान का कटोरा’ भी कहा जाता है, परन्तु भारतीय किसान की हालत दिन-ब-दिन बिगड़ती जा रही है। कृषक-पुत्र बलदाऊ भला इससे द्रवित कैसे न हों। लिखते हैं-
किसान के पसीना के नइ हे मोल,
कोचिया मन के गाल ह लाल होगे।
उनकी आर्थिक स्थित पर व्यंग्य देखिए-
”नगदी के संगी अब अकाल होगे
इही पाय के सस्ता पताल होगे
खेत ल लील डारिस सोमना अउ बदउर,
ये जुग मा करगा ह घलो धान होगे।”
नोटबंदी का असर किस कदर जन-जीवन पर पड़ा, देखिए-
”अपने मन ह होगे बिरान संगी
नोटबंदी टोनही-मसान संगी।”
पानी कस मोल होगे जिनिस के,
रोवत हे जम्मो किसान संगी।
इस उत्तर-आधुनिक युग में विकास की बात होती रही है, परन्तु वास्तव में यह भ्रम है। गाँव-गाँव नहीं रहे, शहर बड़े से और बड़े होते जा रहे हैं। जहाँ कभी सौहार्द, शांति, विश्वास और प्रेम का बोलबाला था, वहाँ अब स्थिति बदल गई है-




”कपटी मन अगुवा होगे, करथे ग नियाव,
परपंच ह ग्यान होगे, अब तो गाँव मा।
सुमत संग जिये के आस अउ विस्वास रहै,
मितान ह बइमान होगे, अब तो गाँव म।
गुरतुरू गोठ नँदागे, टेंचरही गोठियाये,
बानी हर तीर-कमान होगे, अब तो गाँव मा।”
गाँव का किसान सूखी रोटी में ही पकवान का आनंद ले लेता है, उसे दूसरों के प्रति अन्याय और शोषण की आदत नहीं होती-
”का बर दूसर के छाती मा दार दरत हौ,
च्बरसज् बर सोंहारी, सुक्ख रोटी आय।”
जमाने के साथ-साथ प्रकृति में भी बदलाव आने लगा है ऋतुएँ अपना क्रम भूल गई हैं। ऋतुओं के राजा बसंत का आगमन होते ही प्रकृति का सौंदर्य निखर जाता है, परन्तु अब-
बसंत आगे, कौनो खबर नइ दिस।
आजू-बाजू कौनो नजर नइ दिस।
न फूलिस सेमर अउ न डहकिस परसा,
नीमुआ घलो अपन असर नइ दिस।
चुप हे कोयली, आमा महकत नइ हे,
संगे-संगवारी हाँथ गर नइ दिस।
पर्व-त्योहार छोटे-बड़े सब के मन में उल्लास-उमंग जगाते हैं, परन्तु अब वे केवल नाम के लिए रह गए हैं- कहाँ तो पहले यह था-
बड़का राखी तिहार रे भाई।
का मालिक बनिहार रे भाई॥
और कहाँ अब-
”जम्मो नाता-रिस्ता टूट गे,
अँगना म दीवार रे भाई।
बहिनी मन अड़बड़ दुरिहा गे,
परोसी बर हे पियार रे भई।
कइसे हम बाँधन राखी-डोरी
भीतर हवै तकरार रे भाई।
शिक्षा संस्कार है और विद्यलय और शिक्षक कभी मंदिर की तरह पूजनीय थे, पवित्र थे। अब तो शिक्षा का व्यवसायीकरण भी हो गया है-




इस्कूल सब बैपारी होगे
लाइलाज बीमारी होगे।
लइका मन हर भालू-बेंदरा
गुरूजी घलो मदारी हो गे।
जउन ला बरम्हा कस मानिन हे
आज सबो बर गारी होगे।
छेरी-पटुरू, कुकरी, मुरगी
गिनइया अधिकारी होगे।
शिक्षक रहिन, होगे करमी
जिनगी उँकर उधारी होगे।
गज़ल मूलत: प्रेमी-प्रेमिका का वार्तालाप है। बलदाऊ ने भी अनेक $गज़लें प्रेम पर लिखी हैं। कुछ बानगी-
”तोर रूप ला आँखी म उतार लेतेंव,
तैं आ जाते गोई, हाँक पार लेतेंव।
प्रेम पर्व-त्योहार में परवान चढ़ता है। होली में प्रेम का चित्र देखिए-
”रंग-गुलाल संग मिल के फागुन होली आइस,
हवा के धुन मिलजुल के हँसी-ठिठोली गाइस।
चुरी खनकि, झुमका बोलिस, बिंदिया हरसाइस,
लइका बन के पुरवाही नाचिस, हमजोली गाइस।
रंग पियार के नोनी के आँखी मा समा गे,
संभर के निकरिस, ओकर लहँगा-चोली गाइस।”



छ्न्द बिरवा : नवा रचनाकार मन बर संजीवनी बूटी

चोवाराम वर्मा “बादल” जी के “छ्न्द बिरवा” पढ़े बर मिलिस । एक घव मा मन नइ माढ़ीस दुबारा पढ़ डारेंव। सिरतोन म अतका बढ़िया छन्द संग्रह हवय येकर जतका प्रसंशा करे जाय कम हवय । अब के बेरा म अइसन लिखइया आगे हवय जिंकर किताब ल पढ़ना तो दूर पलटाय के भी मन नइ होय अइसन बेरा मा बादल जी ल पढ़ना सुखद अनुभव रहिस । सबो छ्न्द विधान सम्मत, व्याकरण सम्मत हवय । अनुस्वार अउ अनुनासिक के बहुत ही बारीकी से प्रयोग बादल जी करे हवय । शब्द चयन सटीक अउ अर्थपूर्ण हवय। छत्तीसगढ़ी के नवा रचनाकार मन दिशाहीन अउ उत्ता धुर्रा लिखइच बुता करत हवय उँन ला मोर सलाह हवय के ये संघरा ल जरूर पढ़य अउ गुनय कि लेखन कइसे करे जाथे।
बादल जी के किताब म मात्रिक अउ वार्णिक मिलाके लगभग 40 किसिम के छ्न्द मिलथे। शुरूच म मात्रा विधान दे हवय संगे संग प्रत्येक छ्न्द मा लिखे के पहिली वो छ्न्द के विधान ल घलो दे गे हवय जेकर ले पाठक छ्न्द पढ़े के बाद समझ भी सकथे कि छन्द ला कइसे लिखे गे हवय । छन्द बिरवा म प्रयोग करे शब्द मन पोठ दाना आय जेन छत्तीसगढ़ी के मानकीकरण के बेरा म काम आही अइसे मोर मानना हे । वर्णमाला के जम्मो 52 वर्ण के प्रयोग बादल जी करे हवय जो कि पूर्णतया उचित हवय। संघरा म एक डहर जिहाँ पौराणिक, ऐतिहासिक, प्रकृति अउ लोक परम्परा ल विषय बना के छ्न्द लिखे गे हवय उँहे दूसर डहर नवा जमाना के समसामयिक विषय बेटी बचाव,स्वच्छता,दहेज,मृत्युभोज, प्रदूषण,नशा ऊपर घलो सारगर्भित छ्न्द हवय। गाँव गँवई के नँदावत ठेठ देहाती शब्द मन ल बादल जी ज्यों के त्यों प्रयोग करे हवय जेकर ले छ्न्द के सौंन्दर्य बाढ़गे हवय।

छ्न्द बिरवा म दोहा,सोरठा,रोला,कुण्डलिया, अमृतध्वनि, उल्लाला,छप्पय,रूपमाला,शोभन,गितिका चौपाई, चौपई, सार,आल्हा,त्रिभंगी,ताटक, सरसी सहित कुल 22 मात्रिक छ्न्द हवय। वार्णिक छ्न्द म 18 प्रकार के सवैया अउ घनाक्षरी छ्न्द हवय। अंत म कहमुक़री हवय। छ्न्द बिरवा ह छत्तीसगढ़ी म नवा आयाम गड़ही येमा रत्ती भर संदेह नइ हे । बादल जी लिखे छ्न्द मन उत्कृष्ट अउ कालजयी होही । ये किताब हा छत्तीसगढ़ी म छ्न्द लेखन के परंपरा ल पोठ करही अउ नवा रचनाकार मन बर संजीवनी बूटी सही काम करही ।

अजय “अमृतांशु”
छ्न्द संग्रह : “छ्न्द बिरवा”
लेखक : चोवाराम वर्मा “बादल”
प्रकाशक : आशु प्रकाशन
मूल्य : 150/-
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छन्द के छ : एम.ए.छत्तीसगढी के पाठ्यक्रम मा जोडे जाना चाही






निगम जी के “छन्द के छ’ पढे बर मिलीस। पिंगल शास्त्र के जानकारी देवइया किताब ल महतारी भाखा म पढ के मन आल्हादित होगे। आज के लिखइया मन छन्द के नाम ल सुन के भागथे अइसन बेरा म छत्तीसगढी साहित्य ला पोठ करे खातिर निगम जी पोठ काम करे हवय।
छन्द ला समझाये खातिर निगम जी ह सबले पहिली – अक्षर, बरन, यति, गति, मातरा, डांड अउ चरन (सम चरण, बिषम चरण), लघु (1) गुरू (5) काला कहिथे? तेला बिस्तार ले समझाये हे। मातरा ला कइसे गिने जाथे? मातरा ल गिने के नियम होथे ओला फोर-फोर के बताय हवंय। छत्तीसगढी मा छन्द विधा ला बिस्तार ले समझा के छन्द के जानकारी देवईया मोर जानबा मा ये पहलइया किताब आय। अपन किताब म उन लघु ला- छोटकू अउ गुरू ला- बडकू के रूप म परयोग करे हवय।
छन्द हा साधना के विषय आय अउ साधना करे बर गुरू के जरूरत परथे। बिन गुरू के छन्द ल साधना मुसकुल काम हे। हाँ ये किताब ल निगम जी ह अतका सरल, सरलग अउ सुग्घर बना के लिखे हवय के ये ला गंभीरता ले अध्ययन करे के बाद कोनो भी साहित्यकार छन्द म आसानी ले काम कर लेही। ये किताब म छन्द ला पूरा विधि-बिधान ले बताय गे हवय। छन्द के जम्मो उदहारण ल निगम जी अपन स्वरचित कविता के माध्यम ले दे हवय। नवा लिखइया अउ छन्द म रूचि लेवइया मन बर ये किताब ह बरदान साबित होही अइसन मोर बिसवास हवय। ये किताब म दोहा, सोरठा, चौपाई, सवैया, छप्पय, रोला, कुण्डलिया, बरवै, रूपमाला, गीतिका, आल्हा, त्रिभंगी, सवैया, घनाघक्षरी, कहमुकरी, उल्लाला, मऱ्तगयन्द, कुकुभ सहित कुल 50 किसिम के छन्द ल उदाहरण सहित समझाय गे हवय।
“छन्द के छ” किताब खातिर निगम जी के मिहनत साफ झलकथे। जाने कोन-कोन मेर ले अलग-अलग प्रकार के छन्द ला इकटूठा करिन होही? कोन-कोन पुस्तक के अध्ययन करिन होही? छन्द ह कइसे लिखे जाथे? ओखर मातरा कइसे चलथे? जम्मो जिनिस ला एक शोधार्थी ही एकत्रित कर सकथे। आज जब कि छन्द के परंपरा ह लगभग टूटे के कगार म आ गे हवय, छन्द म लिखइया मन ल अँगरी म गिने जा सकथे, अइसन बेरा म छन्द के किताब लिख के निगम जी ह पिंगल शास्त्र म जान के काम करे हवय। छत्तीसगढी मा लिखइया मन के कमी नई हे| हर गली चउराहा मा कोरी-कोरी रचनाकार मन मिल जहय फेर आधुनिक कविता के नाम म अदर-कचर लिखइया अउ तुकबंदी ल अपन ब्रम्हास्त्र समझइया मन ये किताब ल जरूर पद्य अउ छत्तीसगढी साहित्य ल पोठ करे खातिर पोठ रचना लिखय।
कालेज के बिद्यार्थी ल पढाना सहज हवय फेर पहिली कक्षा के बिद्यार्थी ल पढाना कतका मुसकुल हवय ये बात ल प्राईमरी के गुरूजी ही समझ सकथे। ठीक वइसने निगम जी ह छन्द ल समझाये खातिर पहिली कक्षा के बिद्यार्थी के स्तर मा जा के समझाये के परयास करे हावय जेकर फायदा ये होही कि कोनो भी पाठक छन्द के नियम-धियम ल सुगमता ले समझ जाही। अभी हाल तक छन्द पढे/समझे/ अउ लिखे बर हम या तो हिन्दी के किताब ल पढन या संस्कृत के किताब ह माध्यम रहय, फेर अब निगम जी के किताब आये ले ये सुविधा अब सोझ हमर महतारी भाखा छत्तीसगढी म उपलब्ध होगे हवय।
किताब ह उत्कृष्ट, प्रसंशनीय अउ संग्रहणीय हवय। छंद के छ” ला एम.ए.छत्तीसगढी के पाठ्यक्रम मा जोडे जाना चाही ताकि नवांकुर मन छत्तीसगढी साहित्य म छन्द के भरपूर लाभ उठा सकय। छन्द के छ जइसन भगीरथ परयास बर निगम जी ल अंतस ले बधाई।
अजय अमृताशु

साहित्यकार – अरूण निगम
प्रकाशक – सर्वप्रिय प्रकाशन, दिल्ली
मूल्य – 100/- मात्र







गांव के संस्‍कृति के धरोहर : ओरिया के छांव




“ओरिया के छांव” के मनीराम साहू “मितान” के पहिली छत्तीसगढी कृति आय। छत्तीसगढ के गॉंव-गँवई ल जेन जानना चाहथे उनला ये किताब जरूर पढना चाही। सावन, भादो, जेठ,अषाढ़, घाम, जाड जम्मो मास के सौंदर्य के बरनन मितान जी ये संघरा म करे हवय। कोन महिना म छत्तीसगढ़ के किसान का काम करथे, कोन से तिहार परथे तेकर सुघ्‍घर चित्रण ये संघरा म मिलही संगे-संग सँझा, बिहनिया, देवारी, फागुन, तीजा-पोरा, नवा बछर हमर छत्तीसगढ़ म कइसे होथे अउ कइसे मनाथे येकर जानकारी ये संघरा ल पढे़ म मिलही। कुल 51 रचना ये संघरा म हवय जेमा छत्तीसगढी़ के मानक शब्द के प्रयोग कवि ह करे हवय।
मितान जी जमीन ले जुडे़ रचनाकार आय जइसने देखे हें वइसने लिखें हवंय। बतर-बियासी, निंदई-गुडई, धान लुवई, करपा उठई, भारा बंधई तक के वर्णन ल पढबे़ त खेती किसानी के जम्मो दृश्य ह आँखी के आघू सनिमा कस दिखे लागथे। किसान के दु:ख-पीरा ल देख के मितान जी लिखथे –
हरहर-कटकट घेरे रहिथे /रात दिन हम ला किसानी म
बड़ चढऊ-उतारू हे संगी / किसनहा के जिनगानी म।
छत्तीसगढी़ संस्कृति म अँगाकर के महिमा ल सबो जानथव एकर बखान कवि ह जबरस्त ढंग ले करथे –
वाह रे अँगाकर /तोला कहिथे भँदाकर /तैं छेना कर चाकर…..
समाज म व्याप्त बुरई ले रचनाकार ह अनभिज्ञ नई हे, कन्या भ्रुण हत्या विरोध म उन मुखर होके अपन बात रखथे-
मारत हच तैं कोंख के बेटी / बहू कहाँ ले पाबे रे,
अरे हइतारा मनखे जात /तैं जर सुद्धा नाश हो जाबे रे।
गाँव-गंवई के संगे-संग देश के चिंता घलो कवि ल झकझोरथे, सीमा पार के संभावित खतरा उपर आह्वान करथे-
तैं खरतरिहा बीर बेटा / बीर नरायन बन जा
दुसमन मन के आघू म /बन्दूक बन के तनजा
अपन तीर तखार के गाँव म लगने वाला किरवई के प्रसिद्ध मवेशी बाजार अउ सोमनाथ मेला के वर्णन मितानजी अपन कविता म सुघ्‍घर ढंग ले करे हे जेन ल पढ के मन म उत्सुकता होथे के अतेक प्रसिद्ध जघा कोन मेर होही –
लखना सोमनाथ के मेला / चल ना जाबो संगवारी
भुइया फोर के उद्गरे हे / बबा भोले भण्डारी ।
गाँव म बोले जाने वाला ठेठ छत्तीसगढी़ शब्द ल कवि अपना रचना म प्रयोग करे हवय जेला पढे़च म बड मजा आथे- धनहा, भरी-भाठा, कोठी-डोली, नरवा-झोरकी, संसी-कोलकी, कुकुर-माकर, झुकुर-झाकर, नाहना, जोता, खुमरी, गेरवा,परई, कुड्रेरा, ठेकवा, भंदई, अकतरिया, काँसडा ये शब्द कुछ उदाहरण आय जेन ये संघरा म मिलथे। खोइला भाटा, रखिया के बरी, जीमी काँदा, कनसइया लेडगा बरी, अदउरी बरी, चेंच अमारी, पटवा, सुकसा, कुरमा भाजी, नून मिरचा के चटनी अउ अँगाकर रोटी ल अपन रचना म जघा दे के गाँव देहात के नंदावत संस्कृति ल बचाय के काम मितान जी करे हय। आज के नवा पीढी मन अइसन शब्द ले विमुख होत जावत हे जन गंभीर चिंता के विषय ये।
साहूजी जउन माटी म जनमिस, जिहाँ के पानी पीस, जेकर धुर्रा फुदकी म खेल के बडे होइस वो माटी के करजा ल उतारे के काम ए संघरा के माध्यम ले करे हवय जेमा रचनाकार पूर्ण रूप ले सफल होय हवय। चूँकि उँकर पहिली संघरा आय वो हिसाब से शब्द चयन अउ मात्रा उपर पूरा सावधानी बरते गे हवय। अनुस्वार, अनुनासिक, लिंग अउ वचन के पूरा धियान रखे गे हवय ये कारण से भी लेखक के परिपक्वता साफ झलकथे। पुस्तक के छपाई सुघ्‍घर अउ कव्हर पेज “ओरिया के छाव” शीर्षक के हिसाब ले सटीक बने हवय।
अजय ‘अमृतांशु’







पुस्तक समीक्षा : अंतस म माता मिनी

छत्तीसगढ म जतका महान विभूति अवतरित होईन ओमा मिनी माता के प्रमुख स्थान हवय। माता मिनी न केवल कुशल राजनेता रहिन बल्कि बहुत बडे समाज सुधारक, गुरूमाता अउ दूरदृष्टा भी रहिन। एक विभूति के भीतर अतका अकन सद्गुण के समावेश ये बात के परिचायक हवय कि माता मिनी छत्तीसगढ म परिवर्तन लाये खातिर अवतरित होय रहिन। आज जब हम मिनी माता के जीवन उपर कुछ पढना चाहथन त उँकर उपर लिखे गे साहित्य के कमी के कारण अध्ययन से वंचित रहि जाथन। गौरतरिहा जी के ये किताब सार्थक पहल हवय। मोर जानबा म मिनी माता उपर विस्तृत जानकारी देवइया ये पहिली किताब आय।
लेखक ह किताब ल सुव्यवस्थित ढंग ले चार खण्ड म विभाजित करे हवय। पहिली खण्ड बड़ मार्मिक हवय। छत्तीसगढ़ म अकाल परथे, अकाल ले प्राण बचाये खातिर राजमहंत अउ जमींदार अधारीदास (मिनीमाता के दादा) अपन तीन झिन बेटी के संग रोजी-रोटी के तलाश म पलायन करथे, कलकत्ता होवत असम के चाय बागान पहुंच जाथे। अपन तीन बेटी म से दू बेटी ल भूख के मारे काल के गाल म समाय ले नई बचा सकय। ये घटना सन 1896 के आय जेमा पलायन के पीरा ल लेखक चित्रित करे हवय।
दूसर खण्ड म मीनाक्षी के जन्म होना अउ गुरू अगमदास जी के जीवन संगिनी बनके मीनाक्षी ले मिनीमाता बने के घटना ल लेखक बताय हवय। गुरू अगमदास जी के साथ मिनीमाता के असम ले सपरिवार छत्तीसगढ वापस आना वर्णित हवय। गुरू अगमदास जी के सतलोक वासी होय के उपरांत गुरू माता उपर गुरूगददी अउ घर परवार दूरों के जिम्मेदारी आगे। सन 1953 म तात्कालीन म.प्र. के प्रथम महिला सांसद होय के गौरव गुरूमाता ल मिले हावय।
तीसरा भाग म मिनीमाता के राजनीतिक, सामाजिक अउ धार्मिक संघर्ष के उल्लेख हवय जेन प्रेरणादायी हवय। 1953 म मिनीमाता के अगुवाई म अस्पृश्यता निवारण कानून संसद ले पास होना उँकर कुशल राजनीतिक जीवन के परिचायक हवय। 1967 म भिलाई स्पात संयत्र द्वारा भू-अर्जन ले प्रभावित 1500 मजदूर अउ छटनी करके निकाले गे मजदूर के हक खातिर जमीनी लडई करके उन ला फेर नौकरी देवाय के काम मिनीमाता करिन जेकर ले उन सर्वहारा वर्ग बर पूजनीय होगिन। 1968 म घटित गुरूवइन डबरी हतियाकांड ह मिनीमाता ल अंतस ले झकझोर दिस, इही बेरा म मिनीमाता के रौद्र रूप देख बर मिलीस। संसद म बघनीन बरोबर गरजत मिनीमाता के कहना कि- मोर लइका मन कोनो गाजर मुरई नोहय जिंहला मारे, काटे भूंजे जाथे मैं अपन समाज के उपर जुलुम होत नइ देख सकव।” अइसन बात ल कोनो लौह महिला ही कर सकथे।
चौथा भाग गुरूमाता के सामाजिक जीवन उपर केन्द्रीत हवय। सतनाम धर्म अउ बाबा गुरू घासीदास जी के उपदेश के प्रचार-प्रसार, सामाजिक जीवन म छुआछुत, उँच नीच अउ जाति-पाति के विरोध ल लेखक ह मुखर होके लिखे हवय। मिनीमाता के कहे 11 संदेस अउ उंकर सतलोकवासी होना भी इही खण्ड म हवय। कुल मिलाके गौतरिहा जी ह मिनीमाता के जीवन के कई पहलू ल सामने लाय केपूरा प्रयास करे हवय।
आने वाला बेरा म मिनीमाता के उपर अउ गहन शोध करे के जरूरत हवय ताकि न केवल सतनामी समाज बल्कि सर्वहारा वर्ग भी मिनीमाता के जीवन दर्शन, उंकर संदेश अउ आदर्श से लाभान्वित हो सकय। शोधार्थी छात्र बर ये किताब ह बड उपयोगी साबित होही।
अजय अमृतांशु

पुस्तक समीक्षा : चकमक चिंगारी भरे




दोहा हिन्दी साहित्य के जुन्ना विधा आय। भक्तिकाल में कबीर, सूर, तुलसी, रसखान, रहीम आदि कवि मन दोहा के माध्यम ले जन जागरण के काम करिन। बिहारी तो सतसई लिख के अमर होगिन, बिहारी के सतसई परंपरा ल छत्तीसगढी म आगू बढाय के काम श्री बुधराम यादव जी अपन दोहा सतसई “चकमक चिंगारी भरे” म करे हवय। चार चरण अउ दू डांड म कहे जाने वाला दोहा लिखना गगरी म सगरी भरे के चुनौती भरे काम आय। दिखब म जतका सरल दिखथे लिखे म वोतके कठिन काम आय दोहा लिखना, कवि अपन उदिम पूरा सफल होय हे। दोहा अतेक लोकप्रिय विधा आय कि आजकल हिन्दी के अलावा अउ कई भाखा म भी लिखे जावत हे।
एक ठिन हाना हवय- जईसन दिख वइसन लिख, बुधराम यादव जी उही बात ल लिखे हे जउन उन देखे हे। हिन्दी अउ छत्तीसगढी़ दूनो म समान अधिकार रखईया अपन सम्पूर्ण साहित्य जीवन के पूरा निचोड़ ल यादव जी दोहा सतसई म उकेरे हवय। दोहा म रूपक, अनुप्रास अउ उपमा अलंकार के सुग्घर प्रयोग घलो देखे म मिलथे। परंपरा अनुरूप कई ठिन दोहा म अपन नाम के प्रयोग कवि ह करे हवय जेकर ले दोहा के सौदर्य बाढ गे हवय। दोहा के भाखा सरल, सहज सुगम अउ ठेठ हवय। दोहा मन विधान सम्मत हवय। किताब के हर पेज म दोहा म प्रयोग कठिन छत्तीसगढी़ शब्द के अर्थ हिन्दी म घलो दे गे हवय ताकि हिन्दी भाषी पाठक ल कोनो किसिम के परेशानी झन होवय।
जइसे चकमक पथरा म चिंगारी होथे वइसने कवि के दोहा म चिंगारी हवय। येमा चिटकुन भी संदेह नई हे कि श्री यादव जी के दोहा छत्तीसगढी साहित्य ल नवा दिशा देही। छन्द के साधक संग पाठक मन घलो इंकर दोहा ले भरपूर लाभ लेही। कवि के शब्द चयन सटीक हवय संगे-संग अट्सन कई शब्द आप के दोहा म आय हवन जडउन अब नंदात हे। दोहा म मुहावरा अउ कहावत के सुंदर प्रयोग भी मिलथे जेकर ले दोहा के सौंदर्य बाद गे हवय। जीवन के लगभग हर पहलू ल छुए के प्रयास कवि करे हवय। श्री यादव जी के चुनिंदा दोहा ल पाठ्यक्रम म सम्मिलित करे जाय जेकर ले महतारी भाखा म उत्कृष्ट दोहा छंद उपलब्ध हो सकय।
छत्तीसगढी साहित्य म छंद विधा ल पोषित अउ पोठ करे के काम बुधराम यादव जी करे हवय। उँकर मेहनत ल मोर नमन। छत्तीसगढी म प्रकाशित अइसन उत्कृष्ट साहित्य के दूनों भूमिका हिन्दी म लिखे गे हवय, भूमिका छत्तीसगढी म होना रहिस। पुस्तक संग्रहणीय हवय, बधाई शुभकामना।
पुस्तक चकमक चिंगारी भरे
साहित्यकार -बुधराम यादव
प्रकाशक श्री अक्षय पब्लिकेशन,इलाहाबाद अजय अमृतांशु
मूल्य ~250/- मात्र
समीक्षक – अजय ‘अमृतांशु’