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सुरता (संस्मरण) – सिकरनिन दाई

जब मंय ह प्रायमरी कक्षा म पढ़त रेहेंव अउ हमर ददा-कका मन के संयुक्त परिवार रिहिस त परिवार म बारो महीना कोई न कोई घुमंतू मंगइया-खवइया नइ ते पौनी-पसेरी मन के आना-जाना लगेच् रहय। विहीमन म एक झन माई घला आवय। हमर दाई-काकी, परिवार के अउ गाँव के दूसरमन ह वोला सिकरनिन कहंय। मंय ह वोला सिकरनिन दाई कहंव।
सिकरनिन दाई ह होली-देवारी अउ दूसर तिहार-बार होतिस तभे आतिस। आतिस तब भीतर आंगन म आ के एक ठन आंट म बइठ जातिस। जब कभी वो आतिस, इहिच आंट म बइठतिस। सेरसीधा झोंके बर वोकर तीर एक ठन टुकना रहितिस। एक-दू ठन झोला घला रहितिस। गाँव के दूसर घर घला वो ह जावय। वो ह मोला गजब मया करे, बिलकुल दाई बरोबर। मोर मन करे कि वोकर गोद म जाके बइठ जातेंव। फेर अइसन कभू नइ हो सकिस। सिकरनिन दाई ह घला मोला अपन गोद म बइठारे के कभू कोशिश नइ करिस। वो ह दुरिहाच् ले बात करतिस। मिलनेवाला सेरसीधा ल घला दूरिहाच् ले झोंकतिस। आशा के अनुसार सेरसीधा नइ मिलतिस कि कोनों अउ चीज के जरूरत होतिस ते मुँह फटकार के मांग लेतिस। सब संग बढ़िया प्रेम से सुख-दुख के बात गोठियातिस। सेरसीधा पा के गजब आसीस देतिस अउ दूसर दुवारी चल देतिस।
अलग बइठना अउ दुरिहा ले गोठियाना, दूरिहा ले सेरसीधा झोंकना हमर समाज के जाति व्यवस्था के नियम हरे, ये बात ल मंय ह लइकापन म का जानतेंव? मंय ह येला सेरसीधा मंगइयामन के नियम होही समझंव।
जब ले मोर उमर ह जाने-सूने के होइस तब ले मंय ह वोकर अवई अउ वोला जानत रेहेंव। अउ जब मंय ह कालेज म गेयेंव तब तक वोकर आना जारी रिहिस। बाद म वोकर आना बंद हो गे। काबर? का बतावंव। बात वोकर सियानमन सरीख लगय फेर उमर म वो ह कभू मोला सियान असन नइ लगिस। वोकर उमर के बारे म का बतावंव। दाई ह लइका बर उमर भर दाईच् रहिथे। न कभू जवान, न कभू सियान। या तो वो ह चले-फिरे म असक्त हो गिस होही या फिर वोकर इंतकाल हो गिस होही। नइ ते आयेबर वो ह काबर छोड़तिस?
मोर जानेसुने के उमर होय के पहिली वो ह आवत रिहिस होही कि नइ आवत रिहिस होही, का जानव? आवत रिहिस होही त का वो ह कभू मोला अपन गोद म बइठारत रिहिस होही? बइठार के मोला दुलार करत रिहिस होही? का पता? फेर अब, जब मंय ह हमर समाज के जाति व्यवस्था अउ छुआछूत के व्यवस्था ल समझ गे हंव, मोला नइ लागय कि वो ह अइसन कर पावत रिहिस होही।
वो ह शिकारी जात के रिहिस। पंड़की, बटेर अउ तीतर जइसन चिरई अउ मुसुवा, खेखर्री जइसन छोटे-मोटे जन्तु के शिकार करना; बबूल, लीम अउ करंज के दतवन टोरना अउ वोला बाजार म बेचना इंकर पुश्तैनी धंधा आय। शिकार करे बर उँकर तीर तांत अउ बांस के कमची के बनाय फांदा रहय, जउन ल वोमन खुदे बनावंय।
दूसर जातवाला कोनों आदमी वइसन फांदा नइ बना सकंय। बबूल, लीम अउ करंज के दतवन बने के लाइक पतला-पतला टहनी कांटे बर वोमन सइघो बांस के पतला छोर कोती धारवाला बिना बेठ के हँसिया बांध के बनावल अकोसी धर के आवंय। जमीन म खड़े-खड़े वोमन अकोसी म कतको अकन दतवन कांड़ी कांट लेतिन। अइसन ढंग ले कांटे दतवन कांड़ीमन के कांटा अउ पत्ता-डारामन ल छांटेबर वोमन तीर बंकी रहय।
फांदा, अकोसी अउ बंकिच् ल ऊँकर स्थायी संपत्ति जान। खेत-खार, जमीन-जायदाद जइसे स्थायी संपत्ति भला ऊँकर तीर कहाँ। अब शिकारीमन मेहनत-मजदूरी के कोनों दूसर काम करे लग गिन होहीं। वोमन के लोग-लइकामन पढ़लिख के सरकारी नौकरी पा गिन होहीं अउ अपन जिनगी ल सुधार लिन होहीं। अपन अइसन पुश्तैनी काम ल छोड़ दिन होहीं। विही पाय के अपन काम-धंधा खातिर वोमन के गाँव कोती अवइ अब कम हो गे हे। आज के दिन चिरई-चिरगुन के शिकार करना संभव नइ हे। ये जीवमन अब दिखथेंच कहाँ? कानून के बंदिश अलग हे। ये काम अब वोमन नइ करंय। फेर दतवन टोरे अउ बेचे के काम आजो विहिचमन करथें।
ये हर चैहत्तर-पचहत्तर के पहिली के बात आवय। फेर आजो सिकरनिन दाई के धुँधरहू छबि ह मोर आँखी आगू बनथे। वो ह बनेच् ऊँचपुर रिहिस। शरीर ले पतला-दुबला। बनिहार ले घला गयेबीते उँकर जिनगी रिहिस होही। वइसन भोजन वोमन ल कहाँ मिलत रिहिस होही कि वोमन के शरीर म चर्बी जमा हो पातिस? कि शरीर ह पानीदार दिख पातिस? वोकर शरीर म पानी भले नइ रिहिस होही पन मोला बिसवास हे कि वोकर स्वभाव म पानी के कोनों कमी नइ रिहिस होही। हँसी-मजाक ह अपन जघा हे, इज्जत अउ मान-सनमान ह अपन जघा। नइ ते अपन इज्जत बचाय खातिर वो मन अपन चेहरा ल जला के बदसूरत बनातिन काबर?
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सिकरनिन दाई ह हमर गाँव के रहवासी नइ रिहिस। हमर गाँव म कि हमर अतराब के परोसी गाँव मन म शिकारी जाति के एको परिवार नइ रिहिस। आजो नइ हे। हमर बड़का दाई ह बतावय – ’’सिकरनिन ह बसंतपुर म रहिथे। इंकर गाँव बसंतपुर हरे।’’
’’बसंतपुर? कते कर हे बसंतपुर ह?’’
’’नांदगाँव तीर हे।’’
’’तंय ह नांदगाँव जाथस त ऊँकर घर बइठेबर जाथस?’’
’’हमर सगा आवंय, गजब मार बइठेबर जाबोन।’’
’’हमर सगा नो हे। काकर सगा आवंय?’’
’’सिकरनिन के सगा सिकरनिन।’’
’’हमन का हरन?’’
’’हत् रे चेंधन। हमन का हरन, तंय नइ जानस?’’
’’बता न?’’ मंय ह जिद् कर देतेंव।
’’हमन तेली हरन बेटा, तेली।’’ बड़का दाई ह बतातिस।
’’हमन तेली हरन? …. वो ह सिकरनिनि काबर आय?’’
’’अपन-अपन करम-करनी। पूरब जनम के भाग ताय बेटा। जइसन करम करे रहिबे, तइसन जात म भगवान ह जनम देथे। अब अउ जादा झन पूछ। पूछबे ते चटकन परही। जा पढ़बे लिखबे।’’ बड़का दाई ह खिसियाके कहितिस।
’’पढ़े-लिखे ले का जाति म जनम धरहूँ?’’
’’तोर खंगेच् हे का रे’’ कहिके बड़का दई ह थपरा उठा के मोर कोती झपटे कस करतिस। मंय ह हाँसत-हाँसत खोर डहर भाग जातेंव।
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सिकरनिन दाई के रंग ह सांवली रहय। मोला नइ लगय कि चूँदी म वो ह कभू कंघी-कोकई करत रिहिस होही। वोकर चूँदी ह बनेच, कनिहा के आवत ले रिहिस
होही, काबर कि वोकर खोपा ह बड़े अकन रहय। वो ह जब भी आतिस, खोपा बांध के आतिस। वोला बेनी गांथ के आवत मंय ह कभू नइ देखेंव। चूँदी ल छितराके आवत घला वोला कभू नइ देखेंव। टेहर्रा नइ ते भांटाफूल रंग के कोष्टउहाँ लुगरा पहिरे रहितिस। वो समय कोष्टउहाँ लुगरा के चलन रिहिस। बलाउज पहिरे के जादा चलन नइ रिहिस। वो ह बलाउज पहिरे कि नइ, नइ जानंव। टिकली, सिंदूर लगावय कि नहीं, वहू ल नइ जानंव। फेर मोर पक्का सुरता हे, वोकर चेहरा म, दूनों गाल म बड़े-बड़े जले के निशान रहय। एक तो वोकर बिरबिट ले बिलई चेहरा, ऊपर ले जले के निशान, कोई घला अनुमान लगा सकथे कि कतिक सुंदर रिहिस होही वो ह?
दाई के सुंदरता ले बेटा के का लेना-देना। फेर वोकर जले के निशान ह मोला बने नइ लागय। मंय ह वोला पूछंव – ’’दाई! ये ह का के निशान आय?’’
वो ह बात ल हाँस के टरका देय। जब-जब वो ह आतिस, मंय ह वोला जरूर पूछतेंव – ’’’’दाई! येे ह का के निशान आय?’’
जादा जिद करे में एक दिन वो ह बताइस, – ’’कढ़ाई के कड़कत तेल ह छिटक गे रिहिस बेटा। विही म जर गे रिहिस।’’
’’कढ़ाई के?’’ मोला विश्वास नइ होइस। ’’का रांधत रेहेस?’’ फेर पूछतेंव।
वो ह हाँस दिस। मतलब वो ह जरूर झूठ बोलत रिहिस। मंय ह फेर जिद करेंव – ’’बता न दाई, कामा जरे हे?’’
’’हमर मन के मुँहू ह अइसनेच् रहिथे बेटा।’’
’’जनम ले अइसनेच् हे?’’
’’हव गा, जनम ले अइसनेच हे।’’
’’दूसर मन के ह असन काबर नइ रहय?’’
’’भगवान जाने बेटा।’’
हमर बड़का दाई ह मोर सवाल करई म कंझा गे रहय, डपटत किहिस, ’’हत रे चेंधन। तोर अउ कोनों दूसर काम नइ हे? भग इहाँ ले।’’
मंय ह मन मार के चुप रहि गेंव।
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मोर सवाल ह जस के तस माड़े रहि गिस। जब ग्यारहवीं कक्षा म गेंव, तब हमर जीवविज्ञान के सर ह एक दिन हमला डार्विन के सिद्धांत बताइस। ’’प्रकृति के साथ जीवन संघर्ष में जीवों में अनुकूलन पैदा होता है। अनुकूलन के द्वारा अर्जित गुण पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होता जाता है। इस तरह कई पीढ़ियों के बाद की संततियों में उनके मूल पूर्वज से बिलकुल अलग तरह के गुण और लक्षण विकसित हो जाते है और ये अपने पूर्वजों से पूरी तरह भिन्न दिखने लगते है। इस तरह से नई प्रजातियों का विकास होता है।’’ संग म वो सर ह एकठन सवाल अउ ढील दिस जउन ह डार्विन के सिद्धांत ल गलत साबित करे उपाय रिहिस – ’’परंतु भारतीय स्त्रियाँ सदियों से नाक-कान छिदाती आ रही हैं। यह गुण आज तक हस्तांतरित क्यों नहीं हुआ?’’
मंय ह सिकरनिन दाई के गालमन के दाग ल डार्विन के सिद्धांत के परिणाम मानके देखे लगेंव। फेर जब मंय ह कालेज म आयेंव तब हमर जीवविज्ञान के प्रोफेसर सर ह डार्विन के सिद्धांत ल अउ पढ़ाइस। संगे-संग भारतीय नारीमन के कान-नाक के छेद के पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तातरित नइ होय के कारण ल घला समझाइस। वोमन बताइन – ’’डार्विन के अनुसार संततियों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी केवल उन्हीं गुणों का हस्तातंरण होता है जो प्रकृति के संग जीवन संघर्ष में अनुकूलन के फलस्वरूप अर्जित किये जाते हैं। भारतीय स्त्रियों के नाक-कान छिदवाने का उनके जीवन संघर्ष के साथ कोई संबंध नहीं है। इसलिए इस गुण का हस्तातंरण नहीं हो पाया। ऐसे गुणों का हस्तातंरण नहीं होता।’’
एक घांव फेर मोर मन म सिकरनिन दाई के गालमन के दाग ह प्रगट होके उलझ गे। शिकारी जात के औरत-मर्द, सब बिलई-बिलवा होथें, काबर कि वोमन बारो महीना घाम-पियास म शिकार करेबर, दतवन काड़ी टोरेबर, गिंजरत रहिथें। घाम म रहि-रहिके वोमन करिया हो गे हें। फेर शिकारी जात के औरतमन के गाल के जले के दाग के येकर ले का संबंध? खाली औरतमन के चेहरा म ये दाग ह काबर? पुरूषमन के चेहरा म काबर नहीं? अब मंय ह जाने-सुने के लाइक हो गे रेहेंव। सिकरनिन दाई के आवई अब बंद चुके रिहिस। बड़का दाई ले पूछे म झिझक होवय। तब दिगर सियानमन ले ये सवाल के जवाब पूछे के शुरू करेंव। एक दिन गाँव के एक झन बुजरुग सियान बबा ह मोर सवाल के जवाब ल समझाइस। मोर सवाल ल सुनके पहिली तो वो निरक्षर सियान बबा ह मोर कालेज के पढ़ाई के गजब लानत-सलामत करिस; पढ़े-लिखे म कामचोरी करे के मोर ऊपर आरोप लगाइस। मन लगा के पढ़े के उपदेश दिस। अउ किहिस – ’’तुँहर किताब म येकर बारे म नइ लिखाय हे जी?’’
’’अइसन बात ह किताब मन म नइ लिखाय रहय बबा।’’
’’त का लिखाय रहिथे? लुवाठ? सुन, शिकारी जात के न घर, न गाँव। घुमइया जात। अउ ये दुनिया म, हमर समाज म, इंकरो ले बड़े-बड़े शिकारी जात के आदमी बसे हें रे बाबू। अइसन शिकारी, जउनमन ह आदमी के शिकार करथें। आदमी के इज्जत अउ मान-सनमान के शिकार करथें।’’
’’कइसन शिकार बबा?’’
’’अरे बुद्धू! बड़े-बड़े मालगुजार, मंडल-गँउटिया अउ अपन आप ल ऊँच जात समझनेवाला आदमीमन कोनों शिकारी ले कम होथंव जी? गाँव के कते गरीब-गुरबा के, कते छोटे जात के नारीमन के इज्जत के येमन शिकार नइ करत होहीं? काकर इज्जत के ये मन ह शिकार नइ करत होहीं। बेटीमन के मुड़ी म पानी घला नइ परन देवंय साले मन? तोरे गाँव के अदमी ला देख ले न जी। अब वोकर तीर न तो माल हे, न गुजर हे, तभो ले तो आगी म मूतत हे नीच ह।’’ बतावत-बतावत सियान बबा के चेहरा ह तमतमा गे। वोकर आँखी म दुनियाभर के दुख अउ पीरा हिलोर मारे लगिस। कंठ के आवाज ह कंठे म रुक गे। थोरिक देर रुक के बबा ह अपन कंठ म अटके, ये बड़े शिकारी मन के प्रति उपजे घृणा के भाव ल खखार के थूँकिस। अपन मन म उपजे पीरा अउ क्रोध के लहरा ल पीइस अउ फेर केहे लगिस – ’’गाँव म बसे किसानमन के बहू-बेटीमन तो बांचय नहीं बेटा, तब तो तंय ह जउन शिकारी जात के बात पूछथस कुबेर, उँकर कोन पुछंता हे बाबू? इंकर न घर, न गाँव। तब अपन बेटी-बहू के इज्जत ल ये मन कइसे बंचाय? इज्जत बंचाय खातिर ये शिकारी जात केमन ह बाबू, बेटी के जनम धरते सात ऊँकर मुँहू ल हँसिया तिपो के दाग देथें बेटा, ताकि उँकर बेटीमन बदसूरत हो जांय। डररावन दिखे लगंय, ताकि बड़े-बड़े मालगुजार, मंडल-गँउटिया अउ ऊँच जात के शिकारी आदमीमन के मन म ये मन ल देख के घिन पैदा हो जाय, अउ बेटीमन ह इंकर शिकार बने ले बांच जाय। समझेस ग?’’
बबा के जवाब सुन के मोरो हिरदे ह क्षोभ अउ वितृष्णा के भाव ले भर गे। जुबान नइ फूटिस। मुड़ी ल हलाके केहेंव – समझ गेंव बबा, समझ गेंव। अपन आप ल संभाले के बाद मंय ह बबा डहर देखेंव, वोकर निगाह ह अगास डहर सुन्न में अटक गे रहय। थोरिक देर चुप्पी ओढ़े के बाद बबा ह फेर किहिस -’’देख रे मनुवा, अब तो तंय ह गजब अकन पढ़-लिख डरेस। अब ये बातमन ल तंय ह अपन किताब म लिखबे अउ दुनिया ल पढ़ाबे’’
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आज न तो वो सियान बबा हे अउ न वो सिकरनिन दाई हर हे। फेर मोला वो बबा के बात ह भूले म नइ भुलाय। ये बात ल बतावत समय के वोकर चेहरा, वोकर चेहरा के भाव, वोकर आँखी म लहरावत दुख अउ पीरा के लहरा आजो जस के तस मोला दिखाई पड़ जाथे। अब तो वो सिकरनिन दाई ह घला नइ हे फेर वोकर चेहरा के वो दाग मन ह आजो मोर आँखी ले नइ जावय। सोचथंव – अपन नानचुक पिला के चेहरा ल हँसिया तिपो के आंकत-दागत समय वो दाई-ददामन ल कतका पीरा होवत रिहिस होही? नानचुक अबोध पिलामन, जउनमन अभी-अभी ये दुनिया म आँखी उघारे रहय, लकलकावत हँसिया म दागे के पीरा ल कइसे सहत रिहिन होहीं? वो बेटीमन बड़े हो के जब अपन बदसूरत चेहरा ल देखत रिहिन होहीं तब वोमन ल कतका पीरा होवत रिहिस होही? ये पीरा ल जिनगीभर वोमन कइसे ढोवत रिहिन होहीं?
डार्विन के सिद्धांत के बारे म सोचथंव। वोकर ’’विभिन्नताएँ एवं वंशागतिकी’’ के सिद्धांत ह हमर समाज के शूद्र वर्ण अउ दीगर छोटे जाति समाज के दिमाग ऊपर जरूर लागू होय हे, नइ ते वर्ण व्यवस्था के कारण उपजे ये समाज के मनखेमन के दिमाग म समाय हीनताबोध ह घर नइ कर पातिस। उंकर मन म ये प्रथा के विरोध करे साहस के लोप नइ होतिस। अत्याचार ल चुपचाप सहन करे के प्रवृत्ति उंकर दिमाग म नइ आतिस। जिनगीभर अपमान अउ दुख-पीरा सहि के जीये के ताकत वोमन म नइ आतिस।
सोचथंव कि डार्विन के ’’विभिन्नताएँ एवं वंशागतिकी’’ के सिद्धांत ह शिकारी जाति के बेटीमन ऊपर काबर लागू नइ होइस होही। लागू हो जातिस त उंकर अबोध बेटी मन ल लकलकावत हँसिया म दागे के पीरा ल सहन करे बर तो नइ पड़तिस। अपन विकृत चेहरा अउ वोकर पीरा ल जिंदगीभर धर के जीये ल तो नइ पड़तिस।
सिकरनिन दाई ल जब मंय ह वो दाग के बारे म पूछंव तब वो ह मोर बात ल हाँस के टार देवत रिहिस। वो ह काकर ऊपर हाँसत रिहिस होही? हमर समाज के घिनौना जाति-वर्ण प्रथा ऊपर कि अपन किस्मत के ऊपर? हमर समाज के उच्च वर्ण के चरित्रहीनता ल देखथव अउ शिकारी समाज के अपन चरित्र रक्षा खातिर अपन चेहरा ल लकलकावत हँसिया म दाग के विकृत करे के भाव ल देखथव अउ सोचथंव कि ये दोनों वर्ण म कोन वर्ण ह श्रेष्ठ हे?
सिकरनिन दाई के चरित्र के शुचिता के बारे म सोचथंव तब मोर मुड़ी ह वोकर छबि के सामने श्रद्धा ले नव जाथे।

कुबेर

फोटो गूगल से प्रतीकात्‍मक

सुरता – गीत संत डॉ. विमल कुमार पाठक

इतवार १४ जुलाई, २०१३ के संझा वीणा पाणी साहित्य समिति कोती ले पावस गोस्ठी के आयोजन, दुर्ग म सरला शर्मा जी के घर म होइस. कार्यक्रम म सतत लेखन बर छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग के अधियक्छ पं.दानेश्वर शर्मा, जनकवि मुकुन्द कौशल, हिन्दी अउ छत्तीसगढ़ी के वरिष्ठ लेखिका डाॅ.निरूपमा शर्मा, संस्कृत हिन्दी अउ छत्तीसगढ़ी के वरिष्ठ लेखिका शकुन्तला शर्मा के सम्मान समिति ह करिस. ये अवसर म डॉ. विमल कुमार पाठक के घलव सम्मान होवइया रहिसे फेर डाॅ.पाठक कार्यक्रम म पधार नइ पाइन. कार्यक्रम बर डाॅ.पाठक के उप्पर लिखे मोर आलेख गुरतुर गोठ के पाठक मन बर प्रस्तुत हावय – Continue reading

सुरता गजानंद परसाद देवांगन

9 दिसमबर पुन्यतिथि

धरती म जनम धरना, जीना खाना अऊ एक दिन इंहा ले चले जाना, अइसन जीवन कतको मनखे जीथे। फेर, बहुतेच कमती मनखे अइसे होथे, जेन दूसर बर जीथे अऊ अपन जिनगी के एकेक समे ला परमारथ म लगाथे। समाज अऊ देस हित बर समरपित होके सुख अऊ सनतोस के अनुभौ करथे। अइसने समाज, सनसकीरीति, साहित्य अऊ धरम बर समरपित बिभूति रहिस सिरी गजानंद परसाद देवांगन जी हा। जेन ला कभु रमायन परबचन, कभु कबिता पाठ त कभु सांसकरीतिक मंच के सनचालन करत देखंय लोगन हा। अभु घला उंकर कबिता अऊ कहाँनी हा समाचार पत्र पतरिका अऊ अकासबानी ले पढ़हे अऊ सुने बर मिल जथे। 1940 के गनेस चतुरथी के जनम धरइया गुरूजी के ननपन हा धमतरी जिला के मगरलोड बुलाक के गराम धौराभाठा म बीतिस। सिरी रामाधीन देवांगन अऊ पारवती देवांगन के मनझला लइका सिरी देवांगन जी ला छत्तीसगढ़ परदेस के इसकूल म सबले पहिली योग सिकछा पराप्त करे के गौरव पराप्त हे। 1972 म धौराभाठा के मिडिल इसकूल म योग परारम्भ करीन।



1973 ले योग के अनियमित सिकछा सासकीय इसकूल छुरा म देवत रिहीन। ओ समे म, इंकर योग के खिल्ली उड़इया कतको मनखे रहंय। फेर पाछू कतको झिन इंकर योग सिकछा ले लाभ पराप्त करके इनला अपन गुरू मानिन। परचार परसार, जुम्मेवारी अऊ समयाभाव म भलुक इंकर योग छुटगे। वइसे भी इंकर नजर म योग केवल सारीरिक क्रिया नोहे बलकि एक मनखे ला दूसर ले जोड़के, भगवान तक मनखे ला जोड़ना रिहीस, अऊ इही ला जीवन परयंत निभइन घला। 9 दिसमबर 2011 के सरग जाये के पहिली लगभग 1500 गीत, कहाँनी, आलेख के रचना कर चुके रिहीन। अभू तक इंकर पांच किताब परकासित हो चुके हे। इंकर याद ला बनाये रखे बर, इंकर बूता ला सम्मान देवत, छत्तीसगढ़ सासन हा सासकीय उच्चतर माध्यमिक साला छुरा के नामकरन ला इंकर नाव म कर देहे। सिरी गजानद परसाद जी देवांगन के व्यकतित्व अऊ बूता ला परनाम अऊ नमन करत, उंकरे भाखा म केहे जा सकत हे –
जौन करतब करके मर जथे,
पूरा होथे ओकरे अधिकार।
जौन दिया बनके बर जथे,
अंगना होथे ओकरे उजियार ॥

संजू एच.एस. देवांगन
छुरा
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सुरता चंदैनी गोंदा के

दाऊ रामचंद्र देशमुख ल छत्तीसगढी लोकमंच के पितामह केहे जाथे।इंकर जनम 25 अक्टूबर 1916 म पिनकापार (राजनांदगांव) म होय रिहिसे।फेर एमन अपन करमभूमि दुरुग के बघेरा गांव ल बनाइन।ननपन ले दाऊ जी ल नाचा गम्मत म रुचि रिहिस।सन् 1950 में दाऊ जी ह “छत्तीसगढ़ देहाती कला विकास मंडल ” के स्थापना करिन।एकर सिरजन बर उन ल अथक मिहनत करे बर परिस।जेन समें म आय-जाय के बरोबर साधन नी रिहिसे वो समे दाऊ जी ह बइलागाडी म गांव-गांव म घूमिन अउ गुनी कलाकार मन ल सकेलिन।छत्तीसगढ़ में प्रचलित नाचा गम्मत के परस्तुति म दिनों-दिन आवत गिरावट ल देखके उन ल बड दुख होवय।तब ओमा सुधार करे खातिर दाऊ जी ह नाचा-गम्मत म साहित्य ल संघेरे के सोचिन।
अउ 7 नवंबर 1971 के वो अद्भुत रतिहा आइस।जेन दिन छत्तीसगढ़ी अस्मिता के चिन्हारी अउ कला मनीस्वी दाऊ रामचंद्र देशमुख जी के सपना ह ग्राम बघेरा(दुर्ग) म अवतरित होइस।ये तारीख ह छत्तीसगढ़ के इतिहास म अजर-अमर होगे,काबर कि इही दिन छत्तीसगढी लोक संस्कृति के चिन्हारी चंदैनी-गोंदा के जनम होइस।दाऊ जी ल अपन माटी ले बड लगाव रिहिसे।फेर वोला वतकी संसो इंहा के गरीब बनिहार अउ किसान के तको रिहिस।आने मनखे मन के द्वारा इंहा के गरीबहा मन के शोसन ह भीतरे-भीतर ओला कलपाय।तब वोहा मंच ल अनियाय अउ शोसन के बिरोध के माध्यम बनाके देस-दुनिया के आगू आइस।




दाऊ जी ह अंगरेज मन के राज ल देखे रीहिसे अउ ओमन ल देस ले खेदे-बिदारे म सुराजी सिपाही बनके अपन योगदान देइन। देश आजाद होगे।फेर गाँधी जी के सपना के भारत दूरिहागे।दाऊ जी ह गरीबहा मन के हक ल मारत देखिन त बड दुखी होइन।छत्तीसगढ़ के इही दुख-पीरा ल देखाय बर अउ इंहा के आरूग लोक संस्कृति-संस्कार म हमावत दोष ल दूरिहा खातिर ‘चंदैनी-गोंदा’के सिरजन करिन।फेर अतिक बड सपना ल सिरजाय खातिर उन ल भारी मिहनत करे ल परिस।
लगभग 63 कलाकार मन के समिलहा उदीम ले चंदैनी-गोंदा के पहिली परदरसन बघेरा गांव म होइस त देखइय्या मन बक खागे।छत्तीसगढ़ महतारी के वैभव ल देखके जम्मो छत्तीसगढिया मन के छाती तनगे।दाऊ जी के मार्गदर्शन म खुमान लाल साव जी के संगीत के संग पं. रविशंकर शुक्ल,पवन दीवान,लक्ष्मण मस्तूरिहा जइसे कतको छत्तीसगढिया साहित्यकार के गीत ले सजे चंदैनी गोंदा के सन् 1981 तक कुल 99 परदरसन छत्तीसगढ़ के कोन्हा-कोन्हा म होइस ।श्रीमती कविता वासनिक,लक्ष्मण मस्तूरिहा ,भैया लाल हेडाऊ जइसे कतको कलाकार मन के नांव के सोर चंदैनी गोंदा ले जुडे के बाद होइस।एकर बाद दाऊ जी ह छत्तीसगढ़ के नारी के तियाग अउ समरपन के कहिनी “कारी” के सिरजन म लगगे।देवार जनजाति के दुख-पीरा ल समाज के आगू म लाने बर उन ‘देवार-डेरा’के मंचन तको करिन हे।




सन् 1982 से लेके आज तक “चंदैनी-गोंदा” के बिरवा ल पोगरी अपन खून-पसीना ले सींच के जिंयावत हे छत्तीसगढी लोक संगीत के इतिहास पुरुष खुमान बबा ह।दाऊ जी के संग लगाय चंदैनी गोंदा के बिरवा ह आज बिसाल वटवृक्ष के रूप ले डरे हे।लगभग 40 अनुशासित कलाकार मन के समिलहा सहयोग ले खुमान लाल साव जी के कलायात्रा आजो सरलग चलत हे।पुरखा के सपना पूरा होगे।छत्तीसगढ़ नवा राज बनगे।ए बीच म कतको बडोरा अइस फेर चंदैनी गोंदा आजो ममहात हे।छत्तीसगढ़ के रुप बदलगे फेर खुमान बबा के जोश अउ चंदैनी गोंदा के रुप थोरको नी बिगडिस।
दाऊजी के निर्देसन वाला चंदैनी गोंदा ल देखे के सौभाग्य नी मिलीस काबर की वो पंइत हमर जनम नी होय रीहिस।फेर खुमान बबा ल संउहत अपन आगू म हारमोनियम बजावत चंदैनी गोंदा म देखना कम सौभाग्य के बात नी होय।अभी तक 3-4 परस्तुति देख डरे हंव फेर मन नी अघाय हे।आजादी के लडई म अंगरेज मन के अतियाचार अउ सुराजी सिपाही मन के तियाग अउ संघर्ष ल चंदैनी गोंदा के कलाकार मन जब मंच म उतारथे त देंहे घुरघुरा जाथे।लहू डबके ल धरथे।अजादी मिले के बाद बटोरन लाल जइसे नेता मन देश के का हाल करे हे?गुने बर मजबूर कर देथे।छत्तीसगढ़ के वयोवृद्ध कलाकार शिवकुमार दीपक जी के अभिनय ल घेरी-बेरी नमन करे के जी करथे।अस्सी के उमर पार होवत होही फेर कला के प्रति अइसन समरपन कि लागबे नी करे कि ओमन थकत होही।
छत्तीसगढ़ शासन अउ जम्मो कलाकार मन ले हांथ जोंड के निवेदन करत हंव के खुमान बबा अउ दीपक जी जइसे विलक्षण कला साधक अभी हमर बीच हावय।ओमन ल सम्मान के लालच नीहे।फेर मोर मानना हे कि ओमन ला सम्मानित करके सम्मान खुद सम्मानित होही।खुमान बबा अउ शिवकुमार दीपक जी ह पद्म सम्मान पाय के अधिकारी हे।ये दिशा म उदीम होना चाही।

रीझे यादव
टेंगनाबासा(छुरा)493996
मो.8889135003
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सन्त रविदास जयन्ती माघी पूर्णिमा 10 फरवरी

सन्त रविदास



गियान के जघा हा जग मा सबले ऊँच अउ अव्वल हावय। गियान हा मान,सम्मान अउ गरब गुमान हरय। गियान जिनगी के सबले खच्चित जीनिस हरय,एखर बिना मनखे पसु के समान होथे। अगियानी आदमी हा आँखी रहीके अंधरा कहाथे। गियान मनखे के तीसरइया नयन हरय। गियान अंतस के वो अंजोर हरय जेखर ले समाज मा फइले अंधबिसवास, छुआछूत, जातपात, ऊँचनीच, ठग-जग, लाचच-लबारी जइसन जीवलेवा अंधियार हा दुरिहा भागथे। समाज मा ग्रहन कस धरे ए अंधियारी मन ला अपन गियान के बल मा भगाय के, दुरिहाय के बूता समे-समे मा हमर संत-महात्मा करे हावँय। सरी संत-महात्मा मन हा अपन गियान के बल मा आज समाज मा पूजनीय हावँय।

अपन गियान के गुन ले हमर भारत भुँइयाँ के गियानी धियानी संत मा संत रविदास के नाँव अमर हावय। मनखे के पूजा ओखर नाँव, गाँव, घर-घराना,रंग-रुप अउ धन-दोगानी ला देख के कभू नइ होवय। सिरिफ अउ सिरिफ गियान के पूजा होथे। ए बात ला सिद्ध हमर संत रविदास हा अपन गियान ले करे रहीन। अमर संत रविदास जेला रैदास कवि के नाँव ले घलाव जानथन, वो हा अपन गीत अउ कविता ले ए समाज मा छाये सरी बुरई के मेकराजाला ला सफ्फा करे के सरी उदिम करीन। संत कुलभूसन कवि रैदास के जनम हा माघी पुन्नी के इतवार के दिन कांसी नगरी मा चरमकार (चमार) कुल मा हो रहीन। इंखर ददा के नाँव संतोख दास (रग्घु) अउ महतारी के नाँव कलसा देवी बताय जाथे। कवि रैदास हा महान संत कबीरदास के गुरुभाई रहिन,काबर के इन दुनो संत के गुरु सवामी रामानंद जी हा रहीन। पनही-भंदई बनाय के इंखर पुरखौती धंधा रहिस। संत रविदास जी हा अपन मन ले खुसी-खुसी ए धंधा ला अपनाइस। अपन बुता ला बङ लगन, अनुसासन अउ महिनत ले सहीं समे मा पूरा करँय। एखर इही बेवहार ले इंखर तीर अवइया मनखे मन हा अब्बङ खुस होवँय।

संत रविदास हा साधु-संत मन के संगति मा अब्बङ गियान पाइन। नान्हेंपन ले रैदास हा बङ उपकारी अउ दयालु रहीन। साधु-महात्मा मन के साधु-महात्मा मन के सेवा, सतकार अउ सहायता मा रैदास ला बिक्कट खुसी अउ आनंद मिलय। एखर सेती संत रविदास हा बिन पइसा ले पनही-भंदई ला बना के दे देवय। साधु महात्मा मन के अइसन सेवा-सतकार ला इंखर दाई-ददा मन हा थोरको नइ भावँय। इही उदिम ला देख के इंखर बाप-महतारी मन एक दिन इंखर सुवारी सुद्धा अपने घर ले बाहिर निकाल दीन। रैदास हा परोस मा एकठन कुंदरा बना के रहे ला धर लीन अउ मन लगा के अपन काम-बुता ला करे ला धर लीन। समे बचय ता भगवान के भक्ति-भजन ला करँय। साधु-संत मन संग सतसंग करँय। गियान के मरम ला जानिन। धरम मा लबारी, पाखंड, मुरतीपूजा अउ तिरथ यात्रा के बिरोध करँय। इंखर मानना रहीन के सबले सार जीनिस हे भन के भाव हा। जात-पात, छुआछूत हा समाज के सबले घोर बुराई हरय। एमा कखरो कलयान नइ हे।




मन चंगा ता कठौती मा गंगा ला संत रविदास जी हा चरितार्थ करँय। उंखर कहना रहय के मन के मइल ला धो के,टार के फरी करे ले कठवा के पानी घलाव गंगा नहाय के पुन दे सकथे। सबले जरुरी गोठ हे मन के दसा हा। अपन इही बिचार अउ बेवहार ले संत रविदास हा समाज मा छाय अगियान के अंधियार ला भगाय के जिंयत भर सरी उदिम करते रहीन। रैदास जी के भक्ति अउ भाव हा समाज बर आज घलाव अनुकरनीय हावय। इंकर भक्ति रचना ले ए बात हा परमानित होथे।

“प्रभु तुम चंदन हम पानी, जाकी अंग-अंग वास समानी”।
का मथुरा, का कासी-हरिद्वार, रैदास खोजा दिल आपना, ता मिलिया दिलदार।
तीज अभियान मेटिआपा पर, पिपिलक हवै चुनि खावै, कह रैदास तेरी भगति दूर हे, भाग बङे सो पावै।
जाति-जाति के जाति हैं,जो के तन के के पात, रैदास मनुस ना जुङ सके,जब तक जाति न जात।

संत रविदास के कहना रहीन के मन से बङके कोनो नइ होवय। मन के भाव सबले सार भाव हरय। मन ला सफ्फा अउ पबरित राखव, बाहिरी देखावा मा झन परव।सबला एकमई अउ बरोबर के दरजा समाज मा देवाय के सरलग प्रयास जिंयत भर ए मन हा करते रहीन। एक संत , कवि, समाज सुधारक के रुप मा रैदास के योगदान ला समाज हा कभू झन बिसरावय। सिरतोन मा आज घलाव इंखर खच्चित जरुरत हावय हमर सभ्य समाज ला।

कन्हैया साहू “अमित”
परशुराम वार्ड-भाटापारा (छ.ग)
संपर्क~9200252055



सोनाखान के सोन: शहीद बीर नारायण सिंह

शहीद बीर नारायण सिंह ह छत्तीसगढ़ के पहिली शहीद आय। 10 सिदम्बर 1857 म अत्याचारी अंगरेज मन बीर नारायण सिंह ल फांसी दे दे रिहिन। ओखर अपराध अतेक रिहिस के सन् 1856 के भयंकर दुकाल के समे वो ह अपन जमींदारी के भूख से तड़फत जनता बर एक झन बैपारी के अनाज गोदाम के तारा टोर के उहां भराय अनाज ल जनता म बांट दे रिहिस। अतके नहीं ये बात के जानकारी लगिहांत वो समै के रइपुर के डिप्टी कमिश्नर ल घलो पठो दे रिहिस के ये काम वोला भूख म तड़फत जनता के भूख मिटाय खातिर करना परिस। फेर अंगरेज कमिश्नर ल ओखर मानवता अउ ईमानदारी नइ भाइस। वोला तो वो जमाखोरी बैपारी के सिकायत म नारायण सिंह ऊपर कार्रवाही करना पसंद आइस। अउ इही बात म डिप्टी कमिश्नर ह बीर नारायण सिंह बर गिरफ्तारी वारंट निकाल दिस। वो अत्याचारी डिप्टी कमिश्नर के नांव एलियट (चार्ल्स एलियट) रिहिस। तेखरे पाय के कतको झिन जुन्ना छत्तीसगढ़िया मइनखे के एलियट नाव घलो सुने म मिल जाथे। खैर हमला नामकरन म धियान नइ दे के शहीद बीर नारायण सिंह के किस्सा कोती धियान देना हे।
तौ ये बीर नारायण सिंग के जनम सोनाखान के जमींदार रामसाय बिंझवार राजपूत के घर सन् 1795 ई. के कोनो तारीख म होय रिहिस। तारीख के पक्का जानकारी नइ मिलय। अपन बाप के इंतताकल के बाद 35 बछर के उमर म नारायण सिंह सोनाखान के जमींदार बनिस। उन बड़ धारमिक, गियानी, मिलनसार अउ परोपकारी परबृत्ति के रहिन। एखरे संगेसंग उंखर म धीरज, साहस अउ प्रजापालक के गुन घलो लबालब भरे रिहिस। वो ह निच्चट सादा जीवन बिताय। वो ह महल अटारी म न हि भलुक माटी अउ बांस के बने कच्चा मकान म राहय अउ अपन परजा के तकलीफ ल दूर करे म हरदम तियार राहय। सोनाखान के राजा सागर, रानी सागर अउ नंद सागर तलाब आजो ओखर जनकल्यानकारी सोंच के गवाही देथे। Continue reading

छत्तीसगढ़ी काव्य चितेरे : बाबू प्यारेलाल गुप्त

Pyarelal Guptछत्तीसगढ़ के भुइंया मं कतको रतन मनखे मन जनम लइन। जेखर काम ले छत्तीसगढ़ के नांव हर बड़ उजराइस हवे। अइसन हे हरियर भुइंया मं 17 अगस्त, 1891 के दिन बाबू प्यारेलाल गुप्त के जनम होए रहिस। गुप्तजी हर गद्य तथा पद्य दूनो म अपन कलम चलाइन अउ कतको उपन्यास, कविता, संग्रह तथा इतिहास के किताब लिखिन। उन हिन्दी म तो लिखबेच करीन, ठेठ छत्तीसगढ़िया म भी खूब लिखिन। धरम-करम में भी उंखर मन लागय। रतनपुर के प्रख्यात विष्णु महायज्ञ ल सफल करे बर बड़ मिहनत करीन अउ ओखर स्मारिका के रचना घलो करीन।
सुखी कुटुम्ब‘ अउ ‘लवंगलता‘ नाव के उपन्यास ‘पुष्पहार‘ कहिनी संग्रह ल गुप्तजी हर लिखे रहिन। उंखर लिखे इतिहास के किताब ‘फ्रांस की राय क्रांति‘ अउ ‘ग्रीस के इतिहास‘ हर प्रयाग के हिन्दी साहित्य सम्मेलन के परीक्षा बर पाठय पुस्तक रहिन हवे। येही ले रतनपुर विष्णुयज्ञ के स्मारिका, एक दिन (प्रहसन) अउ साहित्य वाचस्पति पं. लोचनप्रसाद पाण्डेय की प्रमाणित जीवनी जइसन कतको ल गुप्तजी लिखे हंवे। रविशंकर विश्वविद्यालय रायपुर हर गुप्तजी के लिखे ग्रंथ ‘प्राचीन छत्तीसगढ़‘ ल छपवाए रहे। वो समय उहां के कुलपति जगदीशचंद्र दीक्षित घलो ये ग्रंथ के बड़ाई करत कहे रहिन कि, वे ग्रंथ पढ़इया लइकन के काम के अनूठा कृति हावय। तेकर से सब्बो भारी फायदा उठाहीं।
प्यारेलाल गुप्त हर साहित्यिक चिन्हइया चोख साधक रहिन। उनला जौन विषय जंचिस ओही लिख डारिन। हिन्दी अउ छत्तीसगढ़ी दूनो भासा मं गुप्तजी बरोबर लिखिस अउ समाज मं फैले कुरीति, तीज-त्योहार प्रकृति अउ आपसी रिस्ता-नाता के ऊपर सुघ्घर रचना रचिन। छत्तीसगढ़ी संस्कृति उंखर छत्तीसगढ़ी रचना के जान बरोबर हवै। उंखर याद मं लिखे ये लेख मं उंखर छत्तीसगढ़ी गीत अउ कविता के चर्चा करत हवन।
देश प्रेम हर गुप्तजी के कविता मं झलकत हे-
संगी आज तिहार मनाबो,
भारत ल शीष नवाबो
जब ले उगे नील गगन मां
सूरज चांद अउ तारा,
तब ले रहिबो हम भारत के
भारत वर्ष हमारा
चरन कमल बलि जाबो संगी
आज तिहार मनाबो…।
गांव के रहन-सहन के बखान करत गुप्तजी लिखे रहिन-
हमर कतका सुंदर गांव, जइसे लक्ष्मी जी के पांव
घर द्वार लीपे-पोते जेला देखे हवेली रोथे।
छत्तीसगढ़ी साहित्य बर गुप्तजी हास्य रचना घलो करिन जइसे-
गोई अइसे लागथे, नोनी के बिहाव,
अउ बाबू के चुनाव, दूनो एक तरह।
गांव-गांव म कुकुर सांहि मारे-मारे फिरथें
बीच बचौवल करे धरे बर येला वोला धरथे।
गोई अइसे लागथे…।
सब्बो विषय म लिखइया प्यारेलाल हर प्रकृति के बरनन अति मया ले के करे हवे-
जब पानी बरसे लागिस तब धरती माता जागिस।
अउ लिहिस जबे अंगड़ाई, तौ चंवर करिस पुरवाई॥
परिवार मं होत हंसी ठट्ठा ल अइसे दरसाय हावै –
भौजी जब रोए लागिस, बंदूक के गोल दागिस,
सावन मां मइके जाहवं, पितर मान उहां ले आहौं।
सुनके भइया भइन उदास, कहिन मैं करिहौं बनवास,
गांव के महत्तम ल समझात गुप्तजी लिखथें:-
गांव मं बसथे हिन्दुस्तान, गांव हवय अन्नपूर्णा के धाम,
गांव मं झगरा झन बगरावा, सब सुमता ले काम चलावा
तब हो है सबके कल्यान अउ होहै भारत महान।
गांव-गंवई के चेलिक जवान के शहर के आकरसन ल रोके बर कहत हवैं-
पढ़-लिख के अउ सीख साख के जब मैं आहवं गांव
जम्मो बोझा खेत-खार के, लेहवं तुरन्त उठाय
बाबू मुंसी मैं नई बन हवं, अतक पक्का जान।
मैं बनिहो चतुर किसान।
गांव मां जाड़ा के रात कैसे बीतथे येला देखव-
कइसे जाड़ बिताथन, तेला का जाना,
कइसे देह गरमाथन, तेला का जाना
संझा होय खा-पी लेथन
पंछा ओढ़े मुंह ल पोंछत
गोरसी खातिर जाथन दौड़े-दौड़े
कइसे जाड़ बिताथन, तेला का जाना।
गंवइहा मनखे करजा-बोड़ी मं झन बूड़े एखर बर गुप्ताजी कथें-
न हम कर्जा काढ़ी न हम गंगा नहावन गा।
जभे रुपिया बचही तभै गंगा नहाबोन।
होली तिहार के बारे म घलुक गुप्तजी रसिया हावै-
सूरज खेलत दिन मं होली, चंदा खेलत रात मं
धरती माता खेले होरी, चारमास चौमस मं
भैया-भौजी खेले होरी, सुघ्घर बारो मास मं
भाई-बहिनी के प्रेम के संबंध में गुप्ताजी लिखथें:-
मैं भारी पुण्य कमाएंव, गोई भाई दूज मनाएंव,
सुरता करके मोर मया ल बड़का भइया आइस
धन जोड़े के एकेठिन उपाय हवे, जेला समझात गुप्तजी कथें-
जांगर के फल पाए खातिर, जब किसान अकुलाथे।
वही समय मं लक्ष्मी माता उतर सरग ले आथे।
ये तरह प्यारेलाल गुप्तजी ह छत्तीसगढ़ साहित्य के लगातार अउ अब्बड़ सेवा करके छत्तीसगढ़ साहित्य के खजाना ल भरे हवे, येखर बर नाम अउ काम हमेशा सुरता करे जाही। श्री गुप्तजी हर छत्तीसगढ़ी के स्तंभ पुरुष अउ छत्तीसगढ़ महतारी के प्यारा सपूत रहिन।

विजय कुमार गुप्ता
गुरु घासीदास विवि मुख्य मार्ग
पुराना सरकंडा
बिलासपुर

छत्तीसगढ़ी भासा के महाकाव्यकार

महाकवि कपिलनाथ कस्यपKapilnath Kashyap

महा कवि कपिलनाथ कस्यप हमर देस के आजाद होय के पहली जनम लेइन अउ बरिस 1985, 2 मार्च के देहावसान होइस, बीसवीं सदी के उन एक साधारण अचरचित साहित्यकार रहिन उन समाचार पत्र-पत्रिका म अपन नाम छपय एकर ले परहेज करत रहिन जबि उन राष्ट्रीय कवि मैथिलीसरन गुप्त के समकालिन कवि रहिन।
छत्तीसगढ़ी भासा ल एक मानकरूप म लाये म उन तीन ठन महाकाव्य ‘श्री राम कथा’, ‘श्री कृस्नकथा’, ‘महाभारत’ अउ ‘श्रीमद् भागवत गीता’ (छत्तीसगढ़ी भावानुवाद) के रचना कर अपन प्रतिभा ला बताईन -छत्तीसगढ़ के महाकवि कहाइन उन कथाकार, नाटककार, निबंधकार रहिन। हिन्दी साहित्य म भी उनकर योगदान हावय पद्य अउ गद्य दूनो म लिखत रहिन हिन्दी म नौ खण्डकाव्य नाटक के रचना करके पाण्डुलिपि के अम्बार लगा देहे हैं प्रचार प्रसार ले दूरिहा रहिन ‘स्वान्त: सुखाय’ लिखत रहिन। उन अपन कृतित्व ल जन मानस के बीच जनवाय के कोसीस नही करत रहिन आचार्य रामचन्द शुक्ल, डॉ. धीरेन्द्र वर्मा, डॉ. रामकुमार वर्मा के सिस्य प्रयाग विस्वविद्यालय के डर्विन कालेज म पढ़त रहिन अपन गुरुदेव के सम्पर्क म रहिके हिन्दी साहित्य विसय लेके बिसेस लगाव के साथ-साथ लेखन के प्रति रूचि होइस लगाव अउ इलाहाबाद म साहित्यिक गोस्ठी म आय जाय लगिन बरिस 1931 म स्नातक के डिग्री लेहे के बाद अपन गांव पौना तहसील जिला जांजगीर-चाम्पा आ गइन अउ गांव म आके बाग बगईचा अउ पेड़ पौधा लगाय के विसेस ध्यान देहे लगिन। साथ-साथ साहित्य लेखन म लगे रहिन 1932 म अकलतरा अंग्रेजी स्कूल चलाय के जिम्मेदारी मिलिस अउ सिक्छीय कार्य सुरू करिन, कुछ राजनैतिक उठा-पठक के कारन अकलतरा के सिक्छीय काम ल छोड़के रायपुर आ गइन इहां स्व. खूबचन्द बघेल अउ रायपुर के स्वतंत्रता सेनानी साहित्य कार मालवी प्रसाद श्रीवास्तव अउ साहित्यकार मन के सम्पर्क म आइन वोही समय चाम्पा लछनपुर के उनकर संगवारी डोरी लाल केंवट राजस्व विभाग म सरकारी नौकरी करे बर बाध्य करिन। राजस्व विभाग के पद म रहत हुए अधीक्षक भू-अभिलेख के पद ले वरिस 1961 म दुर्ग ले रिटायर होइन अउ नावा सरकण्डा म स्थायी रूप से निवास बर घर बना के बस गईन।
रिटायर होय के बाद अपन समय ल साहित्य लेखन म बिताईन छत्तीसगढ़ी हिन्दी म बहुतकन खण्डकाव्य हिन्दी अउ छत्तीसगढ़ी म महाकाव्य, खण्ड काव्य, कहानी, एकांकी, नाटक, निबंध के रचना कर डारिन इनला हिन्दी अउ छत्तीसगढ़ी दूनो भासा म समान रूप ले ग्यान रहिस छत्तीसगढ़ी भासा के ग्रंथ रचना के संख्या पच्चीस ठन अउ हिन्दी साहित्य के चौदह ठन के पाण्डुलिपि ले स्वयं मससियानी लेखनी म लिख के धरे रहिन जउन हर भंडारन के रूप म धरोहर रखय हावय। कविवर कपिलनाथ के लिखे ‘श्रीराम कथा’ ल मध्यपरदेस साहित्य परिसद ले वरिस 1975 म लोक साहित्य के ‘ईसुरी पुरस्कार’ देहे गये हे, उनकर अभिनंदन भोपाल के रविन्द्र सभा भवन सम्मानित मुख्यमंत्री के हाथ ले करे गये हे ‘श्रीराम कथा’ महाकाव्य छत्तीसगढ़ी भासा के पहली महाकाव्य आय। कविवर कपिल नाथ प्रतिभासाली एकांत साधक साहित्यकार रहिन उनकर साहित्य रचना के मूल्यांकन होना जरूरी हे, डॉ. विनय कुमार पाठक के पोस्ट डाक्टरेटरिसर्च वर्क के द्वारा कविवर कस्यप के सब्बो रचना ग्रंथ मन ल जन मानस सामने इन लाइन ये दृष्टि ले छत्तीसगढ़ी के पहला महाकवि निबंधकार नाटककार, कहानीकार माने बर परही कविवर कपिल छत्तीसगढ़ी साहित्य ल एक मानक अउ पोठ साहित्य भंडार म लाय बर उनकर कोसीस ल भुलाय नहि जा सकय। कविवर कपिलनाथ जइसे रचनाकार 20वीं सताब्दी म न तो होय हे न आने वाला सदी म होही अइसे लागथे। कविवर कपिलनाथ के जम्मो रचना साहित्य मन ला प्रकाशन छपवाय के बीड़ा ल महाकवि कपिलनाथ कस्यप जयंती समारोह समिति अउ प्रयास प्रकासन मिलके करत हे।

गणेश प्रसाद कश्यप
सरकंडा, बिलासपुर

नाचा के सियान : भुलवाराम यादव

भुलवाराम दुर्ग के तीर रिंगनी गांव के अहीर रहिस। भुलवाराम लइकई ले अपन गांव म मालगुजार, गौंटिया मन के गरूवा चरइ अउ गोबर-कोठा के काम करय। जब लइका भुलवा गरूवा चराये बर निकलय त बंसरी संग करमा-ददरिया के गीत गावय अउ सिम-साम देखके बिधुन होके नाचय। भुलवा के नचई अउ गवइ ला देख के नामी पंडवानी गायक पूनाराम निषाद के पिताजी लक्ष्‍मण निषाद अउ नामी गम्‍मतिहा ठाकुरराम के पिताजी गोविन्‍दराम मन ओला खड़े साज नाचा म परी बना के नचवाये लागिन। ओ समय भुलवा के उमर आठ साल के रहिस। बालकपन ले नचकरहीन के रूप म नाचत भुलवाराम बाढ़े उपर ले बड़े परी बन के गम्‍मत म महिला के पाठ तको करे लागिस। भुलवाराम अपन गांव के मंच ले निकल के पहिली पइत मोंहदी गांव के मड़ई म होये नाचा म परी बन के नाचिस त ओला अड़बड़ प्रसंसा मिलिस। एखर पाछू जभे कोनो गांव म नाचा होवय, भुलवाराम ल परी बने बर बलाये जाए लगिस। अउ भुलवा नाचा म रम गे। वो समय भुलवा के खेले गम्‍मत मन म साधु, कोंहड़ा चोर अउ तीजा पोरा नकल ला अड़बड़ पसंद करे जाए। भुलवाराम अपन गांव रिंगनी के नाचा पार्टी के माई नचकहरिन रहिस। भुलवाराम नाचा म पांव म घुघरू बांध के, मूड़ म लोटा बोहे, ददरिया ला जब उंचहा गला ले गावय अउ कनिहा मटका के नाचय त देखइया-सुनइया मन के चिहुर र जाए, सीटी उप्‍पर सीटी परय अउ ताली के लाइ फूटे लागय।
वो समय दाउ मदराजी के रवेली नाच पार्टी अउ मदन निषाद मन के रिंगनी नाचा पार्टी के चारो मूड़ा सोर रहिस। इन दूनों नाचा पार्टी के कार्यक्रम अपन गांव म कराये खातिर नरियर घर-धर के मनखे खड़े रहय। सन् 1955 म दाउ रामचंद्र देशमुख ह पिनकापार गांव के मड़ई म ये दूनो नामी नाचा पार्टी ला एक म जोर दिस, तहां ले रवेली रिंगनी साज एक होगे। मदन, लालू, ठाकुरराम, बाबूदास, परदेसी, रामचरन, शिवदयाल अउ जगमोहन जइसे एक ले बढ़ के एक नाचा के कलाकार म जुरिया गे। दाउ मदराजी के नाचा पार्टी संग हबीब तनवीर के नया थियेटर म घलो काम करिस। नाचा म महिला के रूप म काम करइया भुलवा ह नया थियेटर के मिट्टी के गाड़ी नाटक म पहिली पइत पुरूस के पाठ म आघू आइस। येखरे संग चरनदास चोर म चोर, हिरमा की अमर कहानी म हिरमा के पाठ करिस। हबीब जी के जमादारिन, बहादुर कलारिन, लाला शोहरत राय, आगरा बाजार, मोर नाव दंमाद, देख रहे हैं नैन जइसे कई ठन नाटक म भुलवाराम के पाठ ला सुरता करे जाथे।
छत्‍तीसगढ़ी लोकनाट्य नाचा म भुलवाराम के नाव महिला परी के रूप म काम करइया लोककलाकार के रूप म प्रसिद्ध रहिस। हबीब जी के संग भुलवा ह अपन परी के रूप ले अलग छत्‍तीसगढ़ी भासा के कलाकार के रूप म काम करिन। अपन गांव ला छोड़ के हबीब जी के थियेटर संग जीवन भर नाटक करइया भुलवाराम के नाचा बर योगदान खातिर छत्‍तीसगढ़ सरकार ह एक लाख रूपिया अउ दाउ मदराजी सम्‍मान दीस। अपन गांव ले लेके सात समुंदर पार देस-बिदेस म हमर नाचा के नाम रोसन करइया भुलवाराम ह अस्‍सी बरिस के उमर म सरग सिधार गे।
संजीव तिवारी

छत्‍तीसगढ़ी नाचा के जनक : दाउ दुलारसिंह मंदराजी

Mandaraji Dauराजनांदगांव ले सात किलोमीटर दूरिहा रवेली गांव हे। रवेली गांव के दाउ बाड़ा के बड़का अंगना म बड़े पेट वाला नान्‍हे लईका दुलार खेलत रहय, उही समे मा लइका ने नाना सगा के रूप म आइस। नाना ह देखिस बाड़ा के अंगना म तुलसी चौंरा म माढ़े उडगुड़हा पथरा के मद्रासी भगवान कस अंगना म खेलत पेटला लइका हर दिखत हे। त ओ बबा ह नाती ला मजाक म ‘मद्रासी’ कहि दीस। लइका दुलारसिंह ला घर के मन मजाक म मद्रासी कहे लागिन। गांव म मद्रासी सब्‍द ह बिगड़त बिगड़त मंदराजी होगे अउ दाउ दुलासिंह के नाव संग मंदराजी जुरगे। Continue reading