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छत्तीसगढ़ी भाषा का मानकीकरण : कुछ विचार

डॉ. विनय कुमार पाठक और डॉ. विनोद कुमार वर्मा की पुस्तक ‘छत्तीसगढ़ी का संपूर्ण व्याकरण’ पढ़ने को मिली। इसमें देवनागरी लिपि के समस्त वर्णों को शामिल करने की पुरजोर वकालत की गई है। यह भी ज्ञात हुआ कि डॉ. वर्मा और श्री नरेन्द्र कौशिक ‘अमसेनवी’ की पुस्तक ‘ छत्तीसगढ़ी का मानकीकरण : मार्गदर्शिका’ भी शीघ्र प्रकाशित होने वाली है।

यहाँ मैं ‘छत्तीसगढ़ी का संपूर्ण व्याकरण’ पुस्तक पर अपने कुछ सवाल और विचार रखना चाहता हूँ। क्या व्यक्तिवाचक संज्ञा के लिए ही देवनागरी लिपि के सभी वर्णों को स्वीकार किया गया है? क्योंकि प्रशासनिक शब्दकोश खण्ड में हिन्दी के बहुत से शब्दों को अपभ्रंश रूप में लिखा गया है। यथा- आकास, अनुसासन, अब्दकोस, असासकीय, आचरन, सीघ्रलेखक, आदेस, रास्ट्र, वरिस्ठ, वेधसाला, कार्यसाला,संदेस, सिफारिस, अनुसंसा, गियापन, ससर्त, अकुसल, सुल्क, सून्य, सपथपत्र, विसय, सारनी, उपसीर्स, संदेस आदि।
शब्दकोश खण्ड में इसारा, इस्लोक, ईसान आदि।





संधि खण्ड में विसम, विसाद, सुसमा, प्रनाम, भूसन, निस्फल, निस्चिंत, दुस्सासन, मन-अभिलासा आदि। इस प्रकार श, ष, ज्ञ और ण की छुट्टी कर दी गई है।

‘व’ की जगह ‘ब’ के प्रयोग से बचने का सुझाव तो है लेकिन बकालत, बिसय, बिस्तार, बित्तीय, बिदेसी, बिधान, बिबेक, बिक्रय, बिभाग, साबधानी आदि को बेखटके इस पुस्तक में स्थान देने का क्या अर्थ निकाला जाए? पुस्तक शुद्ध छत्तीसगढ़ी की बात करते-अपभ्रंश छत्तीसगढ़ी की चपेट में दिखता है। कुछ उदाहरण और जो छंद खण्ड से लिए गए हैं-

बरम्हा, धरम, परान, इंदिरावती, दुरुग, करन, नकसान, परबत, बिनास, निरासा, लछमी, लछमन, आसुतोस, नियारी, पियारी, रक्छा, गनेस आदि।
नरेन्द्र कौशिक ‘अमसेनवी’ जी भी ‘छत्तीसगढ़ी का मानकीकरण’ पुस्तक से जुड़े हैं। उनका कहना है कि अर्ध ‘र’ की जगह पूर्ण ‘र’ लिखकर हम ‘प्रदेश’ को ‘परदेश’ बना लेते हैं। हम लोग ‘प्रभाव’ को ‘परभाव’ लिखेंगे तो इसका अर्थ पर का भाव (दूसरे का भाव) हो जाएगा। इसे छत्तीसगढ़ी शब्द का हिन्दी अर्थ निकालना कहा जाएगा। यह सुविज्ञात तथ्य है कि शब्द का केवल एक ही अर्थ हो यह कोई जरूरी नहीं है। एक शब्द के कई अर्थ होते हैं। वहीं छत्तीसगढ़ी में ‘श्रम’ या ‘परिश्रम’ लिखने की जरूरत ही नहीं है। क्योंकि इसके लिए छत्तीसगढ़ी में मिहनत शब्द है। धरम, करम, गरम, मरम, गरभ, सरम, करन, को गलत कहना कहाँ तक उचित है? धर्म, कर्म, गर्म, मर्म, गर्भ, शर्म, कर्ण आदि के आधे ‘र’ को पूर्ण ‘र’ करना कहीं से भी अनुचित नहीं है।





अर्ध ‘र’ कहाँ जरूरी है इसका उदाहरण देखिए- ‘कार्य’ यदि इसे कोई ‘कारय’ लिखता है तो गलत है।
अब हम क्रम, प्रण, प्रकार, प्रभाव, प्रणाम, प्रचार, प्रपंच, प्रबंध, प्रमाण आदि को देखें तो इन शब्दों में प्रथम वर्ण ही आधा है और ‘र’ पूरा है। इसमें प्रथम वर्ण को पूर्ण बनाकर आदिकाल से आजतक छत्तीसगढ़ी में सहजता से बोला जाता है।
यथा- करम, परन, परकार, परभाव, परनाम, परचार, परपंच, परबंध, परमान आदि। यहाँ करम और परभाव जैसे कुछ शब्दों के दो-दो अर्थ बताने होंगे।

ङ, ञ का प्रयोग तो हिन्दी में भी बंद हो चुका है। ऋ का महत्व भी सिर्फ मात्रा लगाने तक सीमित हो गया है। अतः हिन्दी में प्रयुक्त होने वाले सभी वर्णों के छत्तीसगढ़ी में प्रयोग से कोई ऐतराज न होने के बावजूद मतभेद मुख्यतः ष, श, ण, और संयुक्ताक्षर क्ष, त्र, ज्ञ को लेकर होता है। छत्तीसगढ़ी में इन वर्णों का उच्चारण नहीं होता। क्योंकि छत्तीसगढ़ी न तो इनसे शुरू होनेवाले शब्द हैं न ही अन्य किसी शब्द में इनका प्रयोग होता है। इसलिए सभी वर्णों को शामिल करने का मुख्य कारण अन्य भाषा के शब्दों को जस का तस स्वीकारना भर है। दूसरी समस्या है अर्द्ध अक्षरों को किस सीमा तक पूर्ण बनाकर प्रयोग किया जाए। जैसे धर्म- धरम, कर्म- करम ( आधा र को पूर्ण र करके) दोनों का प्रयोग सही है। क्रम- करम, प्रण- परन, प्राण- परान (आधा क और प को पूर्ण करके) यहाँ भी दोनों प्रयोग सही है। अत: अपभ्रंश को गलत मानना हमेशा उचित नहीं है। छत्तीसगढ़ी भाषा पर कई महत्वपूर्ण पुस्तकों के लेखक डॉ. सुधीर शर्मा की टिप्पणी एकदम सही है- “अपभ्रंश शब्द छत्तीसगढ़ी की एक बड़ी विशेषता है।” अपभ्रंश से परहेज करे तो कविता लिखना बंद हो जाए।

“मोर छुटगे ‘परान’
जीव होगे हलाकान
मैं बेटी अटल कुवाँरी
मइके म रहितेंव वो…”

“मोर कतका सुग्घर गाँव
जइसे ‘लछमी’ जी के पाँव।”

-दिनेश चौहान

पुस्तक समीक्षा : अव्यवस्था के खिलाफ आक्रोश की अभिव्यक्ति ‘‘झुठल्ला‘‘

महान विचारक स्वेट मार्डन ने कहा है कि ‘कहकहों में यौवन के प्रसून खिलते है।‘ अर्थात उन्मुक्त हँसी मनुष्य को उर्जा से भर देती है। पर आज के भौतिकवादी इस युग ने जीवन को सुविधाओं से तो भर दिया है पर होंठो से हँसी छिन ली है। एक ओर ढोंगी, पाखंडी, बेईमान और भ्रष्ट लोग अपनी आत्मा को बेचकर समृद्धि की शिखर पर मौज मना रहे हैं वहीं दूसरी ओर ईमानदार, श्रमशील और सत्यवादी लोग दो-जून की रोटी को तरस रहे है। जब चारों ओर ढोंग, आडम्बर, पाखंड का पहाड़ खड़ा हो, नैतिक मूल्यों का हा्रस हो रहा हो। संवेदनाएं सूखती जा रही हो और मनुष्यता छटपटा रही हो तो संवेदनशील मनुष्य आखिर हँसे तो कैसे हँसे? चूंकि व्यंग्य के साथ पाठक हास्य की अपेक्षा रखते हैं। इसलिए व्यंग्यकार अपनी रचना को सुरूचिपूर्ण बनाने के लिए व्यंग्य के साथ हास्य का समावेश अवश्य करता है पर उसका उद्देश्य केवल हँसाना नहीं होता बल्कि चेतना को झकझोरना होता है।
हास्य-हास्य में भी अन्तर होता है। एक हँसी विनाश का कारण बनती है जैसे दुर्योधन पर द्रोपदी की हँसी के कारण ही महाभारत का युद्ध हुआ था क्योंकि यह उपहास की हँसी थी। और एक हँसी चिन्तन का सबब भी बनती है। उदाहरणार्थ मैंने कहीं पढ़ा है कि कवि जायसी जब बादशाह शेरशाह के दरबार में पहुँचे तो उसकी कुरूपता देखकर बादशाह हँस पड़े तब जायसी ने हँसते हुए पूछा-‘मोहि कां इससि कि कोहरहि‘ मतलब आप किस पर हँस रहे हैं? मुझ पर या मुझे बनाने वाले पर? रचना पर या रचियता पर? जायसी के कहे का आशय समझ में आते ही बादशाह लज्जित हुए और वे चिन्तन में डूब गये। फिर उन्होने जायसी की विद्वता को यथोचित मान-सम्मान दिया। व्यंग्य का काम केवल व्यवस्था का उपहास करना नहीं है बल्कि व्यवस्था को और भी अधिक जनकल्याणकारी बनाने के लिए प्रेरित करना होता है। इसी अभिष्ट की प्राप्ति हेतु श्री कृष्ण कुमार चौबे जी , विसंगितयों, विद्रुपताओं और मुखौटों के भीतर छिपे चेहरों पर व्यंग्य वाण चलाते हैं। अपने प्रथम छत्‍तीसगढ़ी व्यंग्य संग्रह ‘लंदफंदिया‘ को पाठकों से मिले अपार स्नेह से उत्साहित चौबे जी अपने दूसरे व्यंग्य संग्रह ‘झुठल्ला‘‘ लेकर पाठकों के बीच उपस्थित हुए है।
बुजुर्गो का कहना है कि साँच कहे तो मारन धावा, झूठ कहे तो जग पतियावा आशय स्पष्ट है कि झूठ कहने पर लोग आसानी से विश्वास कर लेते हैं और सत्य कहने पर मरने-मारने को उतारू हो जाते हैं। आज का युग विज्ञापन का युग है। पूरा बाजार विज्ञापन की बुनियाद पर ही खड़ा है। पीतल पर सोने की कलई चढ़ाकर सोने के भाव बेच देना बाजार का बायें हाथ का काम है। अब केवल बाजार ही नहीं बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में झूठों का ही बोलबाला है। झूठों के बढ़ते हुए वर्चस्व को ही केन्द्रिय विषय बनाते हुए और पाठकों को सजग और सचेत करते हुए चौबे जी ने संग्रह का नामकरण झुठल्ला किया है। संग्रह में संग्रहित लेख कथात्मक और पत्रात्मक शैली में है। जहां झन झपा लेख यातायात की समस्या की ओर संकेत करता है तो तीजा आवत हे , जीव धुकधुकावत हे लेख महंगाई की समस्या को इंगित करता है। संग्रहित लेखों में विशेष रूप से पत्रात्मक शैली में लिखे हुए व्यंग्य भकाड़ूराम के दुसरइय्या चिट्ठी राजनीति में अल्पश्कि्षितों के वर्चस्व पर व्यंग्य करता है तो तीसरइय्या चिट्ठी दलबदल और अवसरवादी राजनीति पर गहरा कटाक्ष करता है। व्यंग्य में भाषा की भूमिका बहुत ही महतवपूर्ण होती है। भाषा ही साहित्य की अन्य विधाओं से व्यग्य को अलग करती है। व्यंग्य अमीर ल गरीब के चिट्ठी में कार्पोरेट की कठपुतली बनकर नाचती हुई राजनीति पर व्यंग्य वाण चलाते हुए लेखक की सधी हुई भाषा की ताजगी और रवानगी देखिए कि
‘‘ हमन देस के खातिर गर कटाय बर अपन लइका मन ला फउज म भेजथन। अउ तुमन अपन लइका मन ला अपने कस अमीर बनाय बर हमर गर म छुरी दंताथो। नेता मन तो तुंहर ‘गरी‘ मा फंसेच रहिथें। पइसा गारे बर तुम कतको ‘गिर‘ सकत हो। का होईस, गिरहू तभे तो गारहू। हमर भाग म तो सिरिफ गारी हे महराज। तेकरे बर हमन गरीब (यानि कि गारी-बे) कहाथन।‘‘
गरीबनवाज ल गरीब के चिट्ठी व्यंग्य में र्धार्मक ढकोसले से अपना उल्लू सीधा करने वालो पर निशाना साधते हुए लेखक लिखता है कि-
‘‘ छोटे पापी हर कोनो कोन्टा-उन्टा म तुंहर बर नानकुन, मुड़ी बुलकउ मंदिर बना देथे, तब बड़का पापी मन या तो बड़े-बड़े मंदिर मा करोड़ों के सोना के जेवर चढ़ा देथे या कि बड़े जन मंदिर बनवा देथे। ओ मंदिर के एक-एक ईंटा म हमर लहू सनाय रहिथे परमात्मा।‘‘
दलबदल और अवसरवादिता की राजनीति पर व्यंग्य करते हुए लेखक लिखता है कि-
‘‘ भई आदमी के दार चुरना चाही। चाहे कोनो पानी म चुरय। कुआं के पानी म नई चुरय तब तरिया के पानी म चुरोवव, तरिया के पानी म नई चुरय तब बोरिंग के पानी म चुरोवव। उहू म नई चुरय त डबरीच के पानी म चुरोवव। दार चुरना चाही। घोटरहा दार ला थोड़े खाहू भई। त तुमन निशदिन दार चुरोय के उदिम म लगे रहिथव, ये बात के में तारीफ करथव। तभे तो तुमन ला लदबदाय दार सरपेटे के मजा मिलत रहिथे।‘‘
जब किसी लेखक के सामने अपने ही समाज की विसंगतियों पर कलम चलाने की बात आती है। तो उसकी स्थिति अर्जुन के समान हो जाती है सामने सब अपने ही परिजन नजर आने लगता है पर व्यंग्यकार का केवल एक ही धर्म होता है, वह है विसंगतियो पर प्रहार करना। इस बात को सिद्ध किया है चौबे जी ने अपने व्यंग्य लेख मोर का जाही में। कथनी और करनी की असमानता पर लेखक ने बड़ी बेबाकी से कलम चलाई है।
के के चौबे जी के व्यंग्य संग्रह झुठल्ला से गुजरते हुए हर पाठक आत्म साक्षात्कार करने के लिए बाघ्य और सोचने के लिए मजबूर होता है। एक स्वस्थ्य, समृद्ध और समतामूलक समाज का निर्माण करना ही व्यंग्य का उद्देश्य है। इस कसौटी पर के के चौबे जी की व्यंग्य रचनाएं खरी उतरती है। एक सार्थक और सोद्देश्य व्यंग्य संग्रह के लिए के के चौबे जी को मेरी हार्दिक बधाई और उनके यशस्वी लेखकीय जीवन हेतु अशेष शुभकामनाएं।

वीरेन्द्र ‘सरल‘
बोड़रा (मगरलोड़)
जिला-धमतरी ( छत्‍तीसगढ़)
मो-7828243377

असम में जीवंत छत्तीसगढ़

हाल ही में श्री संजीव तिवारी के वेब मैगज़ीन गुरतुर गोठ में एक लेख पढ़ा था जिसमे लोटा के चलन के विलुप्त होने की बात कही गयी थी। चिंता सही हैं क्योंकि अब लोटे का चलन पारंपरिक छत्तीसगढ़ी घरो में उस तरीके से तो कम ही हो गया है जैसा शायद यहाँ पर पहले होता रहा होगा।
पर संयोग से इस लेख के पढ़ने के तुरंत बाद ही एक ऐसे इलाके में जाने मिला जहाँ लोटे की उपयोगिता वहां के छत्तीसगढ़ी समाज में देखने मिला। लगता है शायद वह भी लोटे का एक ख़ास उपयोग रहा होगा, क्योंकि जिनके बीच की मैं बात कर रहा हूँ वे लोग आज से लगभग 150 पहले छत्तीसगढ़ के करीबन 2500 किलोमीटर जाकर आसाम के चाय बागानों में बस गए थे।
मैं जैसे ही डिब्रूगढ़ में एक छत्तीसगढ़ी परिवार में पंहुचा। घर की मुखिया महिला कांसे के लोटे में जल लेकर आई। फिर असमिया में बोली, अरे ये तो जूता पहने हैं। फिर छत्तीसगढ़ी में मुझसे आग्रह कीं कि मैं जूते उतारूँ, उन्हें पैर धोने हैं। मैंने पैर धुलवाने से मना किया तो वह दुखी हुईं। अंत में समझौता हुआ, मैंने जूते खोले और उनसे निवेदन किया कि वे कुछ जल छिड़क दें।
वहां जिस घर में भी आप जायेंगे सबसे पहले लोटे में पानी दिया जाता है कि मुह हाथ पैर धो लिया जाये। फिर आप विराजें तत्पश्चात जलपान-भोजन करने बुलाने के लिए एक लोटा पानी लेकर आप को बुलाया जाएगा मतलब लोटे के पानी से हाथ मुह धोलें और भात खाने विराजें।
इस परम्परा से संधारक लगभग 20 लाख असम में रहने वाले छत्तीसगढ़ वंशियों में से कोई दो ढाई दर्ज़न लोगों के इस महीने के अंत में रायपुर आने की संभावना है जिनसे संवाद से लोटे के अलावा और भी बहुत सी बातें जानने को मिलेगा।यह भी जानने को मिलेगा कि इन 150 सालों में उनने क्या पाया,क्या खोया,क्या खोने का खतरा है और उनकी यहाँ से कुछ अपेक्षाएं है क्या।

-अशोक तिवारी

छत्तीसगढ़ी साहित्य में काव्य शिल्प-छंद

– रमेशकुमार सिंह चौहान

doha-ke-rangछत्तीसगढ़ी छत्तीसगढ़ प्रांत की मातृभाषा एवं राज भाषा है । श्री प्यारेलाल गुप्त के अनुसार ‘‘छत्तीसगढ़ी भाषा अर्धभागधी की दुहिता एवं अवधी की सहोदरा है।’’1 लगभग एक हजार वर्ष पूर्व छत्तीसगढ़ी साहित्य का सृजन परम्परा का प्रारम्भ हो चुका था। अतीत में छत्तीसगढ़ी साहित्य सृजन की रेखायें स्पष्ट नहीं हैं । सृजन होते रहने के बावजूद आंचलिक भाषा को प्रतिष्ठा नहीं मिल सकी तदापि विभिन्न कालों में रचित साहित्य के स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं। छत्तीसगढ़ी साहित्य एक समृद्ध साहित्य है जिस भाषा का व्याकरण हिन्दी के पूर्व रचित है। जिस छत्तीसगढ़ के छंदकार आचार्य जगन्नाथ ‘भानु’ ने हिन्दी को ‘छन्द्र प्रभाकर’ एवं काव्य प्रभाकर भेंट किये हों वहां के साहित्य में छंद का स्वर निश्चित ध्वनित होगा।
छत्तीसगढ़ी साहित्य में छंद के स्वरूप का अनुशीलन करने के पूर्व यह आवश्यक है कि छंद के मूल उद्गम और उसके विकास पर विचार कर लें। भारतीय साहित्य के किसी भी भाषा के काव्य विधा का अध्ययन किया जाये तो यह अविवादित रूप से कहा जा सकता है वह ‘छंद विधा’ ही प्राचिन विधा है जो संस्कृत, पाली, अपभ्रंश, खड़ी बोली से होते हुये आज के हिन्दी एवं अनुसांगिक बोलियों में क्रमोत्तर विकसित होती रही। हिन्दी साहित्य के स्वर्ण युग से कौन परिचित नही है जिस दौर में अधिकाधिक छंद विधा में काव्य साहित्य का सृजन हुआ। तो इस दौर से छत्तीसगढ़ और छत्तीसगढ़ी छंद से कैसे मुक्त रह सकता था। छत्तीसगढ़ के संदर्भ में यह विदित है कि छत्तीसगढ़ी नाचा, रहस, रामलीला, कृष्ण लीला के मंचन में छांदिक रचनाओं के ही प्रस्तुति का प्रचलन रहा है।
डॉ. नरेन्द्रदेव वर्मा ने ‘छत्तीसगढ़ी भाषा का उद्विकास’ में छत्तीसगढ़ी साहित्य को गाथा युग (सन् 1000 से 1500), भक्ति युग (1500 से 1900) एवं आधुनिक युग (1900 से अब तक) में विभाजित किया है। अतीत में छत्तीसगढ़ी साहित्य लिखित से अधिक वाचिक परम्परा से आगे आया। उस जमाने में छापाखाने की कमी इसकी वजह हो सकती है । किन्तु ये कवितायें अपनी गेयता के कारण, लय बद्धता के कारण वाचिक रूप से आगे बढ़ती गई।
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अंग्रेजी के दबदबे के बीच छत्तीसगढ़ी की जगह

Chhattisgarhiक्या आपने कभी किसी दुकान प्रतिष्ठान का नाम छत्तीसगढ़ी भाषा में लिखा पाया है? व्यवसाय क्षेत्र में कहीं भी चले जाइए आप एक भी छत्तीसगढ़ी नाम पा जाएं तो यह कोलम्बस की अमरीका खोज जैसा पुरुषार्थ होगा। दुकानों प्रतिष्ठानों के अंग्रेजी नाम ही लोगों को लुभाते हैं। चाहे वह प्रतिष्ठान का मालिक हो या ग्राहक, अंग्रेजी नाम ही लोगों की जुबान पर चढ़े हैं। कस्बों देहातों में ये नाम देवनागरी लिपि में मिलेंगे। थोड़ा बड़े शहर में चले जाइए वहां तो आप देवनागरी लिपि में भी नाम देखने को तरस जाएंगे। सारे नाम अंग्रेजी और रोमन लिपि में ही मिलेंगे। विजिटिंग कार्ड तो देवनागरी लिपि में छपने का श्रीगणेश ही नहीं हुआ होगा। ऐसे में छत्तीसगढ़ी भाषा कहां पर है यह देखना काफी दिलचस्प होगा। Continue reading

छत्‍तीसगढ़ी कथा कंथली : ईर, बीर, दाउ अउ मैं

– डॉ. दादूलाल जोशी ‘फरहद’

लोक कथाओं के लिए छत्तीसगढ़ी में कथा कंथली शब्द का प्रयोग किया जाता है। यह वाचिक परम्परा की प्रमुख प्रवृत्ति है। कथा कंथली दो शब्दों का युग्म है। सामान्य तौर पर इसका अर्थ कहानी या कहिनी से लिया जाता है किन्तु वास्तव में इसके दो भिन्न भिन्न अर्थ सामने आते हैं। इसका ज्ञान तब होता है, जब कथा वाचक लोक कथा कहना शुरू करता है। छत्तीसगढ़ में प्रायः लोक कथाकार बतौर भूमिका निम्नांकित पक्तियों को दीर्घ कथा प्रस्तुत करने के पूर्व बोलता हैः-

कथा आय न कंथली ,
जरे पेट के अंतड़ी ।
चार गोड़ के मिरगा मरे ,
कोनो खावे न पिये ।।

उपर्युक्त पद्य में कथा और कंथली दोनो शब्द भिन्न भिन्न आशय के लिए प्रयुक्त हुए हैं। कथा माने दीर्घ कहानी जिसमें विभिन्न घटनाक्रमों का पर्याप्त समावेश रहता है। उसकी शैली मूल रूप से गद्यात्मक होती है। कंथली छोटी होती है। उसकी शैली प्रायः काव्यात्मक होती है। उनमें तुकबंदी का प्रयोग स्पश्ट रूप से परिलक्षित होता है। यह समस्या पूर्ति अथवा प्रहेलिका के रूप में भी हो सकती है।इसके अंतर्गत भाठों के कवित्त को भी रखा जा सकता है।छत्तीसगढ़ में भाठों की भी परम्परा रही है।इससे जुड़ा हुआ एक कहावत भी प्रचलित था , जैसे:- ‘जेकर भाठ नही , तेकर जात नहीं’,अर्थात यदि किसी जाति का भाठ या चारण नहीं है तो वह जाति की श्रेणी में नहीं आती है।वर्तमान में भाठों की परम्परा लगभग लुप्त हो चुकी हैं।इस विशय पर स्वतंत्र रूप से चर्चा की जा सकती है। बहरहाल कंथली के भावार्थ या गूढार्थ को सही तरह से नहीं समझ पाने की स्थिति में यह मात्र मनोरंजनार्थ प्रस्तुत की गई व्यर्थ की वार्ता प्रतीत हो सकती है ,जबकी वाचिक परम्परा की कोई भी सामग्री फालतू या बकवास नहीं होती हैं। सभी का निश्चित भावार्थ होता हेै तथा उसके केन्द्र में तत्कालीन समाज की सभ्यता और संस्कृति होती है। वाचिक परम्परा का उत्कृश्ट रूप गाँवों में ही देखने को मिलता है। रात्रि कालीन भोजन के पश्चात वाचक और श्रोता निश्चित स्थान पर स्वस्फुर्त या स्वप्रेरित उपस्थित हो जाते हैंऔर कथारस प्रवाहित होने लग जाता है। कुशल कथा वाचक का स्थान समाज में सम्माननीय होता है। वह हर आयु वर्ग के लोगों के लिए श्रद्धेय होता है। इसका कारण यह है कि – एक तो वह fनःशुल्क सेवा देता है तथा दूसरा उसके स्मृतिकक्ष में कथा कंथली का पर्याप्त संग्रह होता है। कथानकों एवं घटना प्रसंगों का वैविध्य और कहने की रोचक शैली कथा वाचक का विशेश गुण होता हैं। यहाँ एक बात खास ध्यान देने योग्य है कि कथा कहने और सुनने का कार्य व्यापार हुंकारू देने वाले सहयोगी के बगैर सम्पन्न नहीं हो सकता । कथा वाचक पहले ही शर्त रख देता है कि किसी एक व्यक्ति को हुंकारू देना होगा । वह ऐसा व्यक्ति होगा जो ठीक अवसर पर , उंची आवाज में हुंकारू देगा साथ ही वह पूरे समय सजग और सचेत रहेगा । हुंकारू देने वाला कुछ तय शुदा शब्दों का प्रयोग करता है जैसे – हाँ , हव , या अच्छा जी इत्यादि । कथा हो या कंथली – ये वक्ता और श्रोता दोनों को अनिवर्चनीय आनंद तो प्रदान करती ही है साथ ही साथ परिवेश और समाज के सभ्यता , संस्कृति और इतिहास को भी युगानुरूप अभिव्यक्त करती है। प्रस्तुत है कथा कंथली का एक उदाहरण जो मुंगेली तहसील में ‘‘ ईर , बीर , दाउ और मय ‘‘ शीर्शक से प्रचलित रही है:-

(1) ईर कहिस चल बांस काटे ,                    (2) ईर काटिस ईर बांस
बीर कहिस चल बांस काटे ,                       बीर काटिस बीर बांस
दाउ कहिस चल बांस काटे ,                       दाउ काटिस तीन बांस
हमू कहेन चल बांस काटे ।                        हम काटेन कनई ।
(3) ईर कहिस चल गुलेल बनई                    (4) ईर बनाइस ईर गुलेल
बीर कहिस चल गुलेल बनई                       बीर बनाइस बीर गुलेल
दाउ कहिस चल गुलेल बनई                       दाउ बनाइस तीन गुलेल
हमू कहेन चल गुलेल बनई ।                     हम बनायेन गुलेलिया ।
(5) ईर कहिस चल चिरई मारे                   (6) ईर मारिस ईर चिरई
बीर कहिस चल चिरई मारे                        बीर मारिस बीर चिरई
दाउ कहिस चल चिरई मारे                        दाउ मारिस तीन चिरई
हमू कहेन चल चिरई मारे ।                       हम मारेन लिटिया ।
ईर कहिस चल छेना बीने                         ईर बीनीस ईर छेना
बीर कहिस चल छेना बीने                        बीर बीनीस बीर छेना
दाउ कहिस चल छेना बीने                        दाउ बीनीस तीन छेना
हमू कहेन चल छेना बीने।                        हम बीनेन कन्डों।
(9) ईर कहिस चल चिरई भूंजे                   (10) ईर भूंजीस ईर चिरई
बीर कहिस चल चिरई भूंजे                        बीर भूंजीस बीर चिरई
दाउ कहिस चल चिरई भूंजे                        दाउ भूंजीस तीन चिरई
हमू कहेन चल चिरई भूंजे                         हम भूंजेन लिटिया।
(11) ईर कहिस चल पिढ़वा लाये                  (12) ईर लानीस ईर पिढ़वा
बीर कहिस चल पिढ़वा लाये                        बीर लानीस बीर पिढ़वा
दाउ कहिस चल पिढ़वा लाये                        दाउ लानीस तीन पिढ़वा
हमू कहेन चल पिढ़वा लाये ।                       हम बइठेन वइसनेच्च ।

(13)  ईर कहिस चल चिरई खाई                          (14)  ईर खाईस ईर चिरई

बीर कहिस चल चिरई खाई                               बीर खाईस बीर चिरई

दाउ कहिस चल चिरई खाई                              दाउ खाईस तीन चिरई

हमू कहेन चल चिरई खाई ।                              हम खायेन लिटिया ।

(15)  ईर कहिसचल घोड़ा लिहे                          (16)   ईर लेईस ईर घोड़ा

बीर कहिस चल घोड़ा लिहे                               बीर लेईस बीर घोड़ा

दाउ कहिस चल घोड़ा लिहे                               दाउ लेईस तीन घोड़ा

हमू कहेन चल घोड़ा लिहे।                               हम लेयेन गदही ।

(17) ईर कहिस चल घोड़ा पहटाई                     (18)  ईर पहटाईस ईर घोड़ा

बीर कहिस चल घोड़ा पहटाई                          बीर पहटाईस बीर घोड़ा

दाउ कहिस चल घोड़ा पहटाई                         दाउ पहटाईस तीन घोड़ा

हमू कहेन चल घोड़ा पहटाई                           हम पहटायेन गदही ।

(19) ईर कहिस चल पानी पिये                        (20)  ईर गईस ईर डबरी

बीर कहिस चल पानी पिये                             बीर गईस बीर डबरी

दाउ कहिस चल पानी पिये                            दाउ गईस तीन डबरी

हमू कहेन चल पानी पिये।                             हम गयेन गदही उबरी

                                          ( तेमा हमर गदही सटकगे )

                                  (21) ईर के घोड़ा होन -होन , होन-होन

                                      बीर के घोड़ा होन-होन ,होन-होन

                                      दाउ के घोड़ा होन-होन ,होन-होन

                                      हमर गदही चींपों – चींपों ।

              (22) ईर कहिस चल आमा खाय                           (23) ईर खाईस ईर आमा

बीर कहिस चल आमा खाये                              बीर खाईस बीर आमा

दाउ कहिस चल आमा खाये                              दाउ खाईस तीन आमा

हमू कहेन चल आमा खाये                                  हम खायेन कचलोइया

                                                  ( पहुंचगे गोंसईया )

                                          (24)   ईर ला मारीस ईर लाठी

                                                बीर ला मारीस बीर लाठी

                                                दाउ ला मारीस तीन लाठी

                                              हम गयेन बोचकइया।।

  प्रस्तुत कंथली में एक तरफ ग्रामीण जन की मनोवृत्ति और उनके राग विराग का आभास होता है तो दूसरी तरफ सामाजिक,राजनीतिक,और आर्थिक दशाओं का ज्ञान भी हो जाता है।इससे तत्कालीन समाज के दर्शन (फिलासफी) से साक्षात्कार भी होता है।इस कंथली का कथासार इस प्रकार हैः-’’ इसमें चार पात्र हे- ईर ,बीर , दाउ और कथा वाचक । चारों तय करते हैं कि उन्हें बांस काटने के लिए जाना चाहिए । वे सभी बांस काटने के लिए जंगल जाते हैं और अपनी

अपनी हैसियत के मुताबिक बांस काटते हैं। ईर , बीर , और दाउ समाज के विशिश्ट लोग हैं , इसलिए उनके बांस मजबूत और लम्बे होते हैं । दाउ के बांस की संख्या तीन होती है क्योंकि वह गाँव का मुखिया है। इस कथा का सर्जक स्वयं को साधारण व्यक्ति मानता है।इसलिए पतले बांस का छोटा टुकड़ा ही काटता है। फिर वे लोग उसका गुलेल बनो हैं। ईर ,बीर  और दाउ के गुलेल बड़े और सुन्दर होते है किन्तु लोक कथाकार का गुलेल साधारण और छोटा होता है, जिसे वह गुलेलिया कहता है। गुलेल बन जाने के बाद वे चारों चिड़ियों के शिकार करने जाते हैं। ईर एक चिड़िया , बीर दो चिड़िया और दाउ तीन चिड़िया मारते हैं जो बड़ा-बड़ी है किन्तु कथाकार छोटी और मामूली का शिकार करता है। शिकार को भूनने के लिए चारों इंधन की तलास में जाते हैं । शुरू के तीनों पात्र गाय,बैल और भैंस के गोबर के बड़े सूखे कन्डे (छेना) बीनते हैं।कथाकार बछड़े के गोबर का सुखा हुआ छोटा कन्डा (खरसी) बीनता है क्योकि उसकी चिड़िया छोटी (लिटिया) है। आखिरकार उनके शिकार के भुन जाने पर वे उसे खाने के लिए बैठते हैं। ईर , बीर और दाउ बैठने के लिए आसन (पीढ़ा)ले आते हैं  किन्तु कथाकार के पास पीढ़ा नहीं है लिहाजा वह जमीन पर बैठ कर खाता है। फिर चारों घोड़ा खरीदने की योजना बनाते हैं। ईर , बीर और दाउ बढ़िया घोड़ा खरीदते हैं लेकिन कथाकार गदही खरीदता है। वे अपने अपने पशुओं को चारा चराने ले जाते हैं । चारा चरा लेने के बाद छोटे जलाशयों में पानी पिलाने ले जाते हैं। जलाशय भी उनकी हेसियत के मुताबिक बने हुए हैं। लोक कथाकार का जलाशय गदही डबरी के नाम से संबोधित होता है। सबके घोड़े पानी पी कर सकुशल लौट आते हैं किन्तु कथाकार की गदही कीचड़(दलदल) में फंस जाती है क्योंकि वहाॅ पानी कम और कीचड़ जादा है। अगले क्रम में वे चारों आम खाने की इच्छा प्रकट करते हैं और एकमतेन हो कर आम के बगीचे में पहुँच जाते हैं ईर ,बीर और दाउ बड़े-बड़े पके हुए मीठे आम खाते हैं लेकिन कथाकार अधपके आम खाकर संतुश्ट हो जाता है। चूंकि आम के बगीचे का मालिक कोई अन्य व्यक्ति है । वह रखवाली करता हुआ वहाँ पहुँच जाता है।चारों को आम की चोरी करते हुए पकउ़ लेता है और उन्हें दण्डित करता है। ईर एक लाठी की मार खाता है,बीर दो और दाउ तीन लाठी की मार सहता है। कथाकार चतुराई दिखाता है ,ओर वहाँ से भाग जाता है। इस तरह वह सजा पाने से बच जाता है।

                               उपर वर्णित कहानी सामान्य घटनाक्रमों पर आधारित हैं। इससे हास्य रस की अनुभूति होती है । इस कथा का सार सौंदर्य दण्डित होने से बच जाने की चतुराई है। कथानक साधारण है किन्तु इसका भावार्थ या गूढ़ार्थ गंभीर है।इसके गूढ़ार्थ को अनेक तरह से व्याख्यायित कर सकते हैं। सामाजिक , आर्थिक और दार्शनिक तीनों प्रकार से इसकी व्याख्या हो सकती हैं। इस कंथली में चार लोग चार वर्ग के रूप में उपस्थित हैं। सभी पात्र व्यक्ति वाचक संज्ञा होते हुए भी यहाँ जाति वाचक संज्ञा हैं। चूंकि यह कथा सामंती व्यवस्था के युग की रचना है , अतः उस युग की छाप इसमें होना स्वाभाविक है। कथा में ईर शासन प्रशासन के छोटे कारिन्दों का प्रतीक है जो हमेशा एक हिस्सा पाने की फिराक में लगे रहते हैं। बीर बड़े अधिकारियों, दलालों, साहूकारों का प्रतीक है जो दोगुना हिस्सा पाना चाहतें हैं तथा दाउ पूंजीपति , गौंटिया ,जमीदारों एवं मालगुजारों का प्रतीक हैं जिनका हिस्सा हमेशा तीन गुना तय रहता है। इसे समझने के लिए जमींदारी व्यवस्था को समझना होगा । कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद ने गोदान उपन्यास में इसका परिचय दिया है। उनकी कहानी ‘पूस की रात’ जमींदारी व्यवस्था का जीता जागता दास्तान है। गाँव की अधिकांश जमीनों का मालिक जमीदार ही होता था।वह खुद खेती नहीं करता था बल्कि भूमि हीन किसानो को बटाई या रेगहा या कट्टू में दे देता था । उपज का तीन हिस्सा जमींदार का होता था तथा एक हिस्सा किसान को प्राप्त होता था।इसीलिए दाउ का हर काम तीन की संख्या में होता था । कथा में एक पात्र ‘हम’ है , जो कथा का सर्जक है। वह मेहनतकश किसानों , मजदूरों एवं गरीब तबके का प्रतिनिधि है।यह आश्चर्य जनक है कि कथा का सृजेता स्वयं को सभ्रान्त वर्ग में न रख कर मेहनतकश किसानों और मजदूरों के वर्ग में रखना पसंद करता है। इससे यह निश्चित हो जाता है कि इस कथा का रचनाकार श्रमिकवर्ग से ताल्लुक रखता है।

           इस कथा में विरोधाभासी असंगत कार्य व्यापारों का वर्णन है। इसलिए प्रश्न उठता है कि ईर ,बीर और दाउ तीनों सुविधा- सम्पन्न हैं तो ऐसी स्थिति में वे बांस काटने ,गुलेल बनाने ,और चिड़िया का शिकार करने क्यों जायेंगे? छेना (कन्डे)बीनने और पशु चराने का काम क्यों करेंगे? चारों वर्गो में दोस्ती कैसे हो सकती है? चारों के विचारों में समानता कैसे आ सकती है?लेकिन लोक कथाकार ने एंेसा करवा दिया है। इससे यह स्पश्ट हो जाता है कि छत्तीसगढ़ की संस्कृति आदि काल से व मूल रूप् से श्रम संस्कृति ही रही है। अतः छत्तीसगढ़ी संस्कृति के प्रत्येक पहलू पर लेखन व अनुशीलन करते वक्त विद्वानों को चाहिए कि वे अपनी स्थापनाओं के केन्द्र में यहाँ की श्रम संस्कृति को रख कर ही कार्य करें , अन्यथा उनकी स्थापनाएँ झूठी और भ्रामक समझी जायेगी।

                                         इस कथा का सौंदर्यशास्त्र ‘‘हम’’ अर्थात किसान और गरीब श्रमिक वर्ग के क्रियाकलापों में दिखाई देता है। यह वर्ग मुगालते में नहीं है। वह अपनी स्थिति व नियति को भलिभांति जानता ,समझता है। इसीलिए वह झूठे शानों-शौकत से बचकर रहता है।यही कारण है कि वह छोटा बांस(कनई) काटता है। छोटा गुलेल (गुलेलिया) बनाता है। छोटी चिड़िया (लिटिया ) का शिकार करता है। भूनने के लिए बछड़े के गोबर का छोटा छेना (कन्डों या खरसी) बीनता है। भूनी चिड़िया को खाने के लिए पीढ़ा के बजाय जमीन पर ही बैठ कर खा लेता है।उंचे वर्ग के लोग घोड़ा खरीदते हैं क्योंकि उन्हें सवारी करना है।गरीब किसान और श्रमिक को घोड़े की सवारी से क्या मतलब ? इसीलिए वह गदही खरीद लेता है।गदही पर सवारी नही कह जा सकती बल्कि उसे अर्थोपार्जन में सहायक बनाकर कामलिया जा सकता है।अन्य वर्ग के घोड़े अच्छे जलाशयों में पानी पीकर सकुशल लौट आते हैं किन्तु इनकी गदही कीचड़ (दलदल) में फंस जाती है।कथाकार ने बहुत ही सटीक प्रतीक को चुना है । यहाँ के किसानों और श्रमिकों का जीवन भी उसी तरह नाना प्रकार की मुशीबतों के दलदल में फंसा हुआ है।

                                           अंत में चारों पात्र आम खाने के लिए बगीचे में जाते हैं । ईर ,बीर और दाउ पेड़ पर अच्छी तरह पके हुए मीठे आमों को खाते हैं लेकिन गरीब किसान या मजदूर ऐसे आमों को नहीं खाता हैं । उसे मालूम है कि वह बगीचा किसी अन्य व्यक्ति की मिल्कियत है । उसकी सम्पत्ति को नुकसान पहुँचाना अनैतिक कार्य है। इसीलिए वह जमीन पर गिरे हुए अधपके (कचलोइया) आमों को खाकर संतुश्ट हो जाता है। जब बगीचे का मालिक वहाँ पहुँचता है और उन्हें चोरी करते हुए देखता है तब उनको वह दण्डित करता है। ईर को एक लाठी मारता है , बीर को दो तथा दाउ को तीन लाठी मारता है। किसान या श्रमिक दण्डित होने से इसलिए बच जाता है क्योकि उसने बगीचे को किसी तरह का नुकसान पहुँचाये बगैर गिरे हुए आमों को खाया था। इस कथा का अंतिम सार यही है कि सुविधा भोगी वर्ग अतिरिक्त आय (सरप्लस मनी) कमाने के फेर में बेहिचक अनैतिक कार्यों को अंजाम देते हैं।

                                       निश्चित रूप से इस कथा के दार्शनिक गूढ़ार्थ की उपेक्षा नहीं की जा सकती क्योंकि भारतीय दर्शन (इंडियन फिलासफी) की परिव्याप्ति सर्वत्र है।शिक्षित-अशिक्षित,अमीर-गरीब,शहरी- देहाती सभी में भारतीय दर्शन का प्रभाव यत्किन्चित रहता ही हैं फिलहाल उस पर चर्चा करना आवश्यक प्रतीत नहीं होता हैं

 

पता- ग्राम -फरहद , पो.-सोमनी ,जि.- राजनांदगाँव

मोबा-  9406138825

Samiksha Chhattisgarhi Katha Kanthali

छत्तीसगढ़ी गज़ल के कुशल शिल्पी: मुकुन्द कौशल

डॉ. . दादूलाल जोशी ‘फरहद’

जब भी गज़ल विधा पर चर्चा होती है , तब कतिपय समीक्षकों का यह मत सामने आता है कि गज़लें तो केवल अरबी , फारसी या उर्दू में ही कही जा सकती है। अन्य भाषा ओं में रचित गज़लें अधिक प्रभावी नहीं हो सकती । शायद इसीलिए अन्य भाषा ओं और खासकर हिन्दी में कही गई गज़लें सहजता से स्वीकार नहीं की गई। चाहे वह दुश्यन्त कुमार हो या कुँवर बेचैन , रामदरश मिश्र या फिर चन्र्ससेन विराट , सभी को सहमति – असहमति के झंझावातों से गुजरना पड़ा। सभ्यता , संस्कृति और भाषा समाज केfन्र्गत होती हैं। इनके सृजेता तो मानव समाज ही है। जिस समाज या जाति की सभ्यता ,संस्कृति और उनके विचार जितने अघिक उदात्त और श्रेष्ठ् होंगे , उनकी भाषा भी उतनी ही सक्षम और सशक्त होगी । अब इसे पूरा विश्व स्वीकारता है कि हिन्दी भाषा अत्यन्त सशक्त है और उसमें किसी भी तरह के विचार और भाव को सार्थक सम्रेताशणीयता के साथ प्रकट करने की क्षमता है। यही करण है कि अब हिन्दी में कही गई गज़लों को पूरी मान्यता मिल रही है। विधाएँ किसी भी परिवेश या भाषा की हो , हिन्दी में उनका प्रयोग सटीकता के साथ हुई है। अंग्रेजी की सानेट-विधा पर कवि त्रिलोचन ने हिन्दी में काफी सानेट लिखा है। जापान की विधा हाईकू का अब बहुतायत प्रयोग हिन्दी में होने लगा है। उर्दू की रूबाईंयाँ हिन्दी में लिखी गई तो वह बहुत लोकप्रिय हुई ,जिनमें डॉ. . हरिवंशराय बच्चन की मधुशाला विशेष उल्लेखनीय है।

हिन्दी में गज़ल लिखने की परम्परा काफी पुरानी हो चुकी है। यह सुखद प्रसंग है कि अब छत्तीसगढ़ी में भी गज़ल की रचना की जाने लगी है। छत्तीसगढ़ी के अनेक कवियों ने सुन्दर और सशक्त गज़लें लिखी हैं किन्तु शिद्दत के साथ और बड़े स्तर पर छत्तीसगढ़ी भाषा में गज़ल लिखने का श्रेय कवि मुकुन्द कौशल को जाता है। उनकी गज़लों का एक संग्रह बहुत पहले प्रकाशित हो चुका हैं। दूसरा संग्रह सद्यः प्रकाशित ‘‘मोर गज़ल के उड़त परेवा’’ है। इस संग्रह में उनकी चौवन गज़लें संग्रहित हैं। इस कृति का यथेश्ट स्वागत हुआ है तथा इस पर पाठकों और लेखकों की समीक्षाएँ एवं टिप्पणियाँ भी पढ़ने को मिली है। प्रायः सब में प्रशंसा के पुल बाँधे गये हैं। प्रशंसा का ग्राही और आकांक्षी सभी होते हैं। तारीफ के शब्दों से सबको खुशी होती है। आलोचना से दुख पहुँचता है। जब कोई कृति, पुस्तकाकार छप कर सुधी पाठकों के हाथों में पहुँच जाती है, तब समाज निर्णायक की भूमिका में सन्नद्ध हो जाता है। उसकी अच्छाई या बुराई का निर्णय समाज ही करता है। लेकिन यह तथ्य भी विशेष ध्यातव्य है कि अतिशय प्रशंसा और अतिरिक्त निन्दा के बीच एक अन्य कार्य भी होता है ,जिसे नीर क्षीर विवेक आधारित समालोचना कहते हैं । इस तरह की समालोचना से कृति , कृतिकार और समाज तीनों का भला होता है।

छत्तीसगढ़ी गज़लगो मुकुन्द कौशल की कृति ‘मोर गज़ल के उड़त परेवा ‘ का मूल्यांकन प्रारम्भ करते हैं, तब हमारा ध्यान सर्वप्रथम शीर्शक पर जाता है। उन्होनें अपनी गज़लों को परेवा अर्थात कबूतर का प्रतीक दिया है। यह सर्व विदित है कि प्राचीन काल में कबूतर से संदेश वाहक का काम लिया जाता था। कबूतर चिट्ठी-पत्री लाने ले जाने का दायित्व निभाता था। यहाँ कौशल जी का आशय है – ‘ गज़ल रूपी कबूतर उनके हृदय के भावों और विचारों को जन-जन तक पहुँचाने के लिए उन्मुक्त उड़ान भर रहा है। कवि की यह परिकल्पना सुधी पाठकों के मन को भाती है –

कौसल के संदेस लिखाए मया दया के पाती ला ,
मोर गज़ल के उड़त परेवा गाँव गली अमरावत हे।

गज़ल का सृजन करते वक्त इसके शिल्प और रूप (फार्म) का विशेष ध्यान रखा जाता है। उर्दू गज़लों के निर्धारित मानदण्डों का पूरा-पूरा अनुपालन भले ही न किया जा सके किन्तु उसके पारम्परिक शिल्प और रूप (फार्म) का अनुपालन अनिवार्य होता है। कहने की आवश्यकता नहीं कि उनके बिना गज़ल , गज़ल हो ही नहीं सकती । कौशल जी ने उसका बखूबी निर्वाह किया है और इसमें वे सफल हैं । इस दृष्टि से उनका यह प्रयास निश्चित रूप से प्रशंसनीय है। संग्रह की गज़लों के अध्ययन से पता चलता है कि उन्होंनें इसके लिए काफी परिश्रम किया है-

‘गज़ब पछीना गार गज़ल के खेत पलोए हे कौसल’
शिल्प और रूप का सुन्दर प्रयोग प्रस्तुत गज़ल में बखूबी हुआ है –
जे आरूग अंटियावै तेला , अंटियावन दे छोड़ बुजा ला।
बिन मतलब मेछरावै तेला , मेछरावन दे छोड़ बुजा ला।।
जागौ – जागौ कहिके मै हर ,काकर काकर करौं पैलगी,
सुते राहा तनिया के मोला खिसियावन दे छोड़ बुजा ला।।
कहे सुने के मजा तभे हे जब सकेल के कहिबे कौशल,
बिन मतलब फरियावै तेला फरियावन दे छोड़ बुजा ला।।

छत्तीसगढ़ी भाषा में काफी संख्या में ऐसे शब्द समूह हैं, जो आम बोल चाल में ‘ठेही’ की तरह इस्तेमाल होता है, जैसे – अलकरहा हे, करलई हे , भाग भईगे , जान दे , जउंहर होगे , हला-हला के ,पूछ तो रे , जय हरि ,इत्यादि। इन शब्दों का प्रयोग छत्तीसगढ़ी गज़ल लिखने में किया जाता है तो शेर अत्यन्त प्रभावी बन जाते हैं। मुकुन्द कौशल ने ‘छोड़ बुजा ला ‘ शब्द समूह का प्रयोग करके इस गज़ल में छत्तीसगढ़ी रंग और रस भर दिया है। इसी तरह ‘जै भगवान’ शब्द की ठेही लेकर रचित उनकी निम्नांकित गज़ल कीबानगी अत्यन्त रोचक एवं प्रभावी बन पड़ी है-

एक घांव उन तुँहर पाँव ला परिन तहां ले जै भगवान ।
उचक उचक के पांच बछर ले छरिन तहां ले जै भगवान।।
काए फिकर हे, का चिन्ता हे , जनता भलुन पियास मरै,
सबले आगू अपन बगौना , भरिन तहां ले जै भगवान ।।

स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान देश के महान नेताओं ने निश्ठा , नैतिकता और ईमानदारी को अपना जीवनादर्श बनाकर जनसेवा और राश्ट्र के लिए सर्वस्व त्याग करने की जो मिशालें गढ़ी थी, वो सब आजादी मिलने के बाद तहस-नहस होती चली गईं। वर्तमान में राजनीति जनसेवा का नहीं बल्कि मेवा खाने और मौज़ उड़ाने का माध्यम बन गई है। राजनीतिक गलियारे में सर्वत्र भ्रश्ट्राचार की धूम और विद्रूप चेहरों की भरमार है। इन्हीं विसंगतियों को यह शेर बहुत तल्खी के साथ बयान करता है –

कांदी हर तो एक्के हावय ,खूंटा सबके अलग अलग ,
एक छोड़ के दूसर खूंटा , धरिन तहां ले जै भगवान।।

मुकुन्द कौशल छत्तीसगढ़ी शब्दों के पारखी हैं। शब्द संयोंजन में कुशल हैं। इसीलिए उनके शेरों में ध्वन्यात्मकता और र वानी देखते ही बनती है । प्रस्तुत पंक्तियाँ दृष्ट्व्य है-

पारा पारा झगरा माते ,का सुमता के बात करौं,
गली गली मा ताल ठोकइया चारों कती अखाड़ा हे।।
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बात बात मा आनी बानी बात बगरगे पारा भर ,
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गजब पछीना गार गजल के ……………………….
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भीतर भीतर पझरै पीरा आंखी सुक्खा नदिया हे ।
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धरे कलारी कातिक रेंगिस,धान ओसावत आगे अगहन ।
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सूपा धरे बिहनिया आके , किरनन ला छरियावत हे।

इन पंक्तियों में अनुप्रास अलंकार के कई रूप देखने को मिलते हैं। इनकी विशेष ता है कि ये जुबान पर तुरंत चढ़ जाते हैं किन्तु इस तरह के प्रयोग में कहीं कहीं कौशल के भीतर का गीतकार दखल देता हुआ प्रतीत होता है, फलस्वरूप शेरों के अनेक अद्धाली , गीतों के छंद की तरह आस्वाद देते हैं। जैसे –

तैं हिरदय के दीया बार ,
( मन हो जाही जगर मगर)
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कईसे बिसरै वो दिन बादर ,
( सुरता आथे रहि रहि के )
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मन के डोली मा तोरे बर,
जागे हावै मया दया
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सूवा रे झन कहिबे पीरा
( कठुवा जाही उन्कर तन-मन)
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तोर सुरता मने मन म साने रहेंव
मै मनौती घलो तोर माने रहेंव
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साध संवरे लगिस
मन ह मउरे लगिस
काल ह आज आंखी म तंउरे लगिस ।।
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अल्लर परगे मन के बिरवा ,हांसी तक अइलावत हे।

मुकुन्द कौशल के इस संग्रह की गज़लों में कथ्य और रस की विविधता है। एक तरफ श्रृंगार , सौन्दर्य और माधुर्य है तो दूसरी तरफ राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक विसंगतियों के दंश की पीड़ा है। जन-जन में प्रचलित पारम्परिक दर्शन की अभिव्यक्ति भी यत्र तत्र शेरों में हुई है। जब कौशल श्रृंगार को लेकर गजल लिखते हैं, तब सौन्दर्य और माधुर्य पूरे शवाब पर होते हैं । इन्हें रूमानी गज़ल भी कह सकते हैं । इन गज़लों के शेर शिल्प कथ्य और भाव की दृष्टि से बेहतरीन हैं। इनमें श्रृंगार रस की उद्दाम पयस्विनी अनायास प्रवाहित हुई है। शेर दृष्टूव्य है –

राहेर कस लचकत कनिहा, रेंगत हावस हिरनी कस,

देंह भला अइसन अलकरहा , लचक कहां ले पाये हे।।

यहाँ ‘‘राहेर कस लचकत कनिहा ‘‘ अनुपम श्रृंगारिक सौन्दर्य की सृश्टि करता है। अतिशय
तन्वंगी की क्षीण कटि का बलखाना ,फलियों की भार से झुलता हुआ अरहर के पौधे के
समान है। यह उपमा सर्वथा नवीन हैं। इससे छत्तीसगढ़ की कृशि संस्कृति का साक्षात्कार होता है।इसी क्रम का अगला शेर भी श्रृंगार का बढ़िया नमूना है-

देंह ला वोहर घेरी बेरी , अंचरा ले तोपत रहिथे ,
अंचरा भीतर जाना मानो , चंदा सुरूज लुकाए हवै।।

किसी युवती के कंधे से आँचल का सरक जाना और उसे तत्परता से पुनः कंधे पर स्थापित करना ,यह कार्य व्यापार श्रृंगार रस की उत्पत्ति करता है किन्तु जब कौसल यह कह देता है:- ‘‘ जानो मानों चंदा सुरूज लुकाए हवै’’ तब श्रृंगार रस का स्त्रोत प्रबल वेगवान हो जाता है।

गज़लगो कौसल की पैनी दृष्टि और गहन अनुभूतियाँ विलक्षण है। निम्नांकित शेर से यह बात सिद्ध हो जाती है –

जब ले तैं हर मूड़ मींज के ,हांसत कूदत निकरे हस ,
तबले बदरी खोपा छोरे , केस अपन छरियाए हवै।।

इस शेर में मुकुन्द कौशल ने छत्तीसगढ़ी के जिस विशिश्ट शब्द समूह को संजोया है, वह है:- ‘‘मूड़़ मींज के’’। मूड़ मींजना सहज क्रिया है किन्तु छत्तीसगढ़ी संस्कृति में इसकी लाक्षणिकता एक खास अवसर को द्योतित करती है। कवि लिखता है ‘जब ले तैं मूड़ मींज के ‘ अर्थात जब से तू रजस्वला हुई है, माने जवान हुई है। रजस्वला युवती के हाव भाव को पकड़ना और उनके सौन्दर्य बोध को सहजता से प्रस्तुत करना कौशल जी का अद्भुत कौशल है। इस शेर में ‘बदरी खोपा छोरे ‘ का रूपक सुन्दर बन पड़ा है। संग्रह में श्रृंगार परक गज़लों की संख्या कम है , परन्तु जितनी भी है ,सभी रसोद्रेग में सफल हैं।

‘मोर गज़ल के उड़त परेवा’ की अनेक गज़लों में कौशल ने देश और समाज की मौजूदां हालातों को कथ्य और विशयवस्तु के रूप में पिरोया है। उन्होंने सम सामयिक संदर्भाें को बड़ी बेबाकी और कहीं कहीं तल्खी के साथ अभिव्यक्ति दी है। देश की वर्तमान प्रजातांंत्रिक राजनीति के स्वरूप , निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के चरित्र , जनता के तथाकथित सेवक कहे जाने वाले नौकरशाहों की क्रियाविधि , शासन – प्रशासन में काबिज़ प्रभावशाली व्यक्तियों की कथनी और करनी के बढ़ते अन्तर तथा इन्हीं के चलते पल-पल कश्ट और दुख झेलती जनता की पीड़ा को कवि मुकुन्द कौसल ने बहुत गहराई के साथ महशूश किया है –

बने पलो के जे नेता मन , खेती करहीं वोट के ,
ललहुं पिंवरा नोट जागही उन्कर खेती खार मा ।।

जाहिर है , टूटी चप्पल पहन कर चलने वाला व्यक्ति जब राजनीतिक दल का पदाधिकारी बनता है या चुनाव जीतकर विधायक या सांसद बन जाता है , तब पाँच साल के भीतर वह अकूत संपत्ति का मालिक बन जाता है। आखिर ऐसा चमत्कार कैसे हो जाता है?

ये कइसन सरकार हवै ,का अइसन ला सरकार कथें ?
हमरे बिजली बेच के हमला राखत हे अंधियार मा।।
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साहेब बाबू , नेता जुरमिल , नाली पुलिया तक खा डारिन ,
गरूवा मन बर काहीं नइये , मनखे सब्बो चारा चरगे।।
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बड़का नेता मन कहिथें , हम अंजोर घर-घर पहुँचाबों ,
काए करन कुरसी मा बइठे , बाबू ,साहेब मानत नइयें।।
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साहब ला देंवता चघथे , त हूम दिये बिन नई उतरै,
हूम घलो के मांहगी चाही , पातर-पनियर चलै नहीं ।।

सरकार की दोहरी नीति , नौकरशाहों की मनमानी ,और रिश्वतखोरी का कोढ़ इत्यादि की दारूण व्यथा-कथा उपर्युक्त शेरों में मुखर हुई हैं। कौसल जी ने कहते-कहते एक बड़ी बात कह दी है। एक ऐसी सच्चाई की ओर इशारा किया है , जिस पर अब तक किसी का ध्यान ही नहीं गया है –

एक्कड़ डिसमिल के मतलब ला ,बसुंधरा मन का समझै ,
का जाने डेरा वाला मन , का रकबा खसरा होथे ।।

छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद सर्वाधिक परेशानियों का सामना यहाँ की आदिकाल से निवासरत खानाबदोश किस्म की जातियाँ कर रहीं हैं , जिनमें देवार जाति प्रमुख है। सरकार ने देवारों को अनुसूचित जाति की श्रेणी में रखा है। उनका जाति प्रमाण पत्र इसलिए नहीं बन पा रहा है क्योंकि उनके पास पचास सालाना खसरा नहीं है। उनके पास तो कभी जमीन थी ही नहीं । सदियों से डेरा डाल कर जीवन यापन करते आए हैं। फलस्वरूप उन्हें अनुसूचित जातियों को मिलने वाली सुविधाएँ नहीं मिल पा रही है। ऐसी जातियों के जाति प्रमाण पत्र बनवाने की किसी तरह की वैकल्पिक व्यवस्था छत्तीसगढ़ सरकार ने नहीं की है। मुकुन्द कौसल ने सर्वथा नई बात की ओर संकेत किया है,इसके लिए वे बधाई और प्रशंसा के पात्र हैं।

यह ऐतिहासिक सच्चाई है कि यहाँ के कर्मठ धरती पुत्रों ने पृथक प्रांत और खुशहाल छत्तीसगढ़ का पावन सपना देखा था। रचनाकारों और संस्कृतिकर्मियों ने छत्तीसगढ़ महतारी की अस्मिता और स्वाभिमान का अलख जगाया था । छत्तीसगढ़ राज्य बन गया । सरकारें आनी जानी शुरू हुई । एक दसक बीत गया । मूल छत्तीसगढ़िया आज भी अपने सपनों को छत्तीसगढ़ के गाँव गली में ढूंढ रहा है। देख रहा है औचक भौंचक । शायद इसी की बानगी है ,यह शेर –

सुने रहें हन , छत्तीसगढ़ मा, सुरूज नवां उवइया हे ,
खोजौ वो सपना के सुरूज, कोन दिसा मा अटक गईस।।

यह शेर चिन्तन – मनन करने का आग्रह करता है। प्रस्तुत संग्रह में कुछ शेर निश्चित रूप से शाश्वत भावों वाले ,उम्दा और आला दर्जे के हैं , जिनमें से कुछ इस प्रकार हैं –

जे हर बोले सकै नहीं ते , आगी ला पोसे रहिथे,
बाहिर निच्चट जूड़ जनाथे, भीतर ले अंगरा होथे।।
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चारों मुड़ा ले खुद ला तैं रूंधे हावस,
तहीं बता अब कोन डहर ले मैं हर आवौं।।
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मैं दंग – दंग ले बरहूं जे दिन ,
ओ दिन तैं पतियाबे मोला ।।
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तुम जिन्कर किरपा ले संगी , सफल भये हौ जिनगी मा ,
वो मन के सन्मान करौ, अउ उंकर पांव पखारौ जी ।।
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झन खेदौ येती ओती , कोनो ला बिचकावौ झन ,
चाहत का हौ , भटके गइया ,कभू अपन घर जावै झन ?
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हम्मन भइगे पुरखा मन के , जस ला चगलत बइठे हन ,
हम सब जिन के जीभे चलथे , जांगर उंगर चलै नहीं ।।
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एक्को जिन त होतिस जेहर बांचे रहितिस ,
सब माते हें , कोन कोन ला हूंत करावौं।।

इस संग्रह की गज़लों में कवि की निर्भयता , साफगोई और जनपक्षधरता साफ-साफ झलकती है जोकि श्लाघनीय है। ऐसा करके उन्होंने जहाँ एक ओर अपनी सामाजिक जिम्मेदारी का ईमानदारी पूर्वक निर्वाह किया है, वहीं दूसरी ओर श्रेष्ठ् और महनीय कवित्व धर्म को निभाया है। इस तरह वे एक सिद्ध गजलगो के रूप में अपना वरीय स्थान बनाने में सफल हुए हैं। बावजूद इन सबके उनकी गज़लों के अनेक शेर उनके द्वारा हड़बड़ी और जल्दबाजी में लिखने की प्रवृत्ति की ओर इंगित करते हैं क्योंकि उनके अनेक शेरों में शब्दों के अपारम्परिक और असंगत प्रयोग के दर्शन होते हैं, जैसे –

डबकत आंसू ले कब्भू तो तैंहर ,हाथ अंचो के देख,
दुनिया खातिर होम करत तैं ,अपनों हाथ जरो के देख।।

यहाँ आंसू का खौलना और उससे हाथ धोना , अजीबो गरीब प्रयोग है। दूसरी पंक्ति में होम करते हुए हाथ जलाने की बात करना , मुहावरे के वास्तविक अर्थ को पलटने जैसा है। इसी तरह यह शेर भी विरोधाभाशी अर्था वाला है –

बर पीपर अउ करगा कांदी , मानै चाहे झन मानै,
दुरिहा दुरिहा तक बगरे हे मोर महक मैं जानत हौं ।।

वट , पीपल , घांस पात और विजातीय धान के पौधे से खुशबू का सम्बन्ध बनाना विचित्र खयाल है।

‘ झन करबे तैं कभू भरोसा ,बइहा भूतहा नेता के ‘

इस पंक्ति में नेताओं के लिए बइहा भूतहा शब्द की लाक्षणिकता सटीक नहीं बैठती क्योंकि नेता धूर्त और कुटिल होता है।

क्रौंच मरत देखे ले कइसे बालमीकि हर कवि होगै,
जिहां पुजावै कुकरा वो लंग , कोन कवि बन पाये हे।।

इस शेर को पढ़कर यह कहना पड़ता है कि कौसल जी को क्रौञच बध प्रसंग की वास्तविक जानकारी नहीं है। इसीलिए मुर्गा का उदाहरण देकर उसका सतहीकरण कर दिया है जोकि असंगत उल्लेख है। आदि कवि बाल्मीकि के प्रथम श्लोक के भावार्थ को गहराई के साथ समझने और अनुभव करने की जरूरत है –

मा निशाद ! त्वं गमः शाश्वती समः।
यत्रौंीकच मिथुनादेकमवधी काम मोहितम्।।

इनके अतिरिक्त उनके द्वारा रचित दार्शनिक भावों वाले प्रायः सभी शेर बासी और उबाऊ लगते हैं क्योंकि वे सब सैंकड़ो बार पढ़े और सुने जा चुके हैं। केवल उनका छत्तीसगढ़ी अनुवाद कर देने से वे सब रोचक और ग्राह्य नहीं हो सकते । कुछ उदाहरण प्रस्तुत है –

जे घर भीतर सुमता होथे , लक्षमी घलो उन्हें आथे ।
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— 7 —

काया के का गरब करत हस ,जब तक चलै चला ले,
एक्केदारी घुर जाही ये काया हवै बतासा ।।
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वइसे रोज रमायन गीता बांचत हावौं।
तभो अढ़ाई आखर ला समझे नई पावौं।।
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आज नही ते काली करबे ।
तैं ये घर ला खाली करबे ।।
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कासी मथुरा कहाँ किंजरबे ,
तोर कठौती मा गंगा।।

इसी बात को संत रविदास जी ने कहा है – ‘‘मन चंगा तो कठौती में गंगा ‘‘। लगता है कौसल जी को यही नही मालूम कि कठौती किस बर्तन का नाम है और यह विशेष रूप से किस काम में आता है? काठ का बना यह बर्तन सभी के घर में नहीं होता है।
बहरहाल ! कुछ कमियों के कारण ही मुकुन्द कौसल की सलामी गज़लगोई को खारीज नहीं किया जा सकता । कौसल जी इनसे भी बेहतरीन गज़ल लिख सकते हैं , इसमें थोड़ा भी शक-ओ -सुबहा नहीं है। उम्मीद ही नहीं यकीन है , आगामी समय में कौसल जी के शेरों में बढ़िया बांकपन, उक्ति वैचित्र्य ,अन्योक्ति और एकदम ताजापन देखने -पढ़ने को मिलेगा। आखिर में उनका ही एक शेर लिखकर अपनी बात समाप्त करता हूँ –
अपन समे मा कतको रचना , अच्छा लिखिन लिखइया मन ,
कौशल असन घलो ए जुग मा गीत अउ गज़ल लिखइया हे।।
साधुवाद! साधुवाद !!

डॉ. . दादूलाल जोशी ‘फरहद’
ग्राम – फरहद, पोस्ट – सोमनी
तह $ जिला – राजनांदगाँव (छ.ग.)
मोबा – 9406138825 /9691053533