लोककथा : अडहा बइद परान घात

एकठन गांव म एकझिन लइका रहय। वोहा एक दिन दूसर गांव घूमे बर गीस। रद्दा म वोहा देखिस के ऊंट ह बगुला खात रहय अउ बगुला ह वोकर नरी म फंसगे। ऊंट ल सांस ले म तकलीफ होय लगिस। वोहा भुईंया म घोलंड के छटपटाय लागिस। अतका देखके ऊंट के मालिक ह एकझन बइद ल बला के लानिस। बइद ह जोर-जोर से कहिस- बागुल बारी जाय, थुला जाय कहिके ऊंट के नरी ल जोर- जोर से मारिस। बगुला ह फुट गे अउ ऊंट ह खडा होगे। वो लइका ह सब…

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अपन-अपन समझ

बरसाती दोपहरी म अपन अंगना के परछी म सुभीत्ता बइठे-बइठे दयावती सोचत रहिस- ‘तीजा, हमर मन के सबसे बडे तिहार। ए बछर के तीजा म..।’ दयावती ल एक-एक बात, अपन हिरदय म आरी चले कस लागय। ए दारी नवा कालोनी के नमिता अउ पुरानी बस्ती के अचला तीजा म मइके नइ जा सकिन। त वोला, जउन वोकर मन के दूर के रिस्ता के मौसी होथे, तीजा के बिहान म ‘मइके के पानी’ पिये खातिर, वो दूनो ल घर म बुला ले रहिस। तीजा के निरजला उपास के सेती हालत अइसने…

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अपन सुवारथ रईही त मोहलो मोहलो

आज के समे मा कोनों ककरो नई होवय ग, कोन हितवा ये कोन बईरी ये काकर सुवारथ कामे हे समझ नई परयI बिना सुवारथ के कोनो मनखे ककरो तीर नई ओधय, अईसने मोला लागथेI अब देख ले गाँव मा पिछलेच सरपंच चुनई के गोठ आय, सरपंच बने बर नंदलाल भाई ह पूछत पूछत घर आवय,भिलई ले गाँव जाव त आगू पीछू होवत रहय, आगू आगू ले गोठीयावय,बने बात बेवहार करय। फेर मेंहा समझ गे रहेव, तभो ले मेंहा वोला बोलेव देख ग नंदलाल भाई चुनई मा हार जीत लगे रहिथे,…

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कहिनी : बमलेसरी दाई संग बैसाखू के गोठ

नवरात के बाद के इतवार के बडे बिहनिया बैसाखू ह ऊपर बमलाई पहुंचिस त बमलेसरी दाई वोला देखतेच बोलिस- ये दारी बड दिन म आए तेहा बैसाखू ! कहुं गांव- आंव चल दे रहे का? बैसाखू अचरज म पड गइस- कइसे कहिथस दाई? येदे नवरात म तो मेहा आय रहेंव। अइ…। बमलेसरी दाई, बैसाखू ले जादा चकित होगे- तैं आय रेहे ! फेर, मेहा तोला कइसे नई देखेअंव? बने सुरता कर। ये बखत नवरात म तैं नइ आय पाय। बैसाखू हंस पडिसि- आय रहेंव दाई ! मेहा पक्का आय रहेंव।…

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नान्‍हे कहिनी : दुकालू

जब कभु मोला कहुं जाना होथे त मेहा बुर्जुग दुकालु के रिक्सा मेहि जाथंव। दुकालू से जब कोनो वोकर उमर पूछथे त वोहा इही कहिथे के उमर के बात छोडो बाबू, मेहा तो ए मानथंब जब तक सेहत बने हे, तभे तक जिंदगानी हे। दुकालु ह कभु अपन उमर के रोना नइ रोय। वोकरे सब्द म- ‘न कभु मेहा अपन उमर के रोना रोंव, न मोला रोनहा मनखे मन भांय।’ दुकालु के बात ह कोनो दारसनिक के बात ले कम नई होय। जइसे वोकर ए कहना हे- ‘दिखावा करहूं त…

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दूसरइया बिहाव

जब मेहा अपन चार बछर के बेटा रामसरूप ला बने तउल के देखथंव, त जान परथे के वोमे भोलापन अउ सुनदरई नई रहि गे, जउन दू बछर पहिली रिहिस हे। वो अइसे लागथे जाना-माना अपने गुस्सेलहा बानी म लाल आंखी मोला देखावत हे। वोकर ये हालत ला देख के मोर करेजा कांप जथे अउ मोला अपन वो बचन के सुरता आ जथे जउन दू बछर पहिली मरन सैय्या म परे वोकर महतारी ल दे रेहेंव। मनखे अतेक सुवारथी अउ अपन इंद्री के गुलाम हे के अपन फरज ला कोनो बखत बेरा म…

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लोककथा : कउंवा करिया काबर होईस

एक बखत के बात आय। एक झन मुनि के कुटिया म एकठन कौआ हे तऊन सुग्घर मुनि के तीर म रहिके जूठा-काठा खावत अपन जिनगी ल पहावत रहय। कहे जाथे कि ओ बेरा म कौआ के तन हा सादा रिहिस हे। एक दिन मुनि हा कौआ ल कहिथे, ‘हे कौआ मय तोर बर एक ठन बुता जोंगे हंव करबे का?’ कौआ कहिथे, ‘का बुता आय मुनिजी।’ मुनि कथे, ‘ये एक अइसे बुता आय जेमा पूरा संसार के हित होही।’ संसार के हित ल सुनिस त कौआ खुशी के मारे गदगद…

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अड़हा रईतिस तेने बने ददा

हमन ल सुने म बढ़िया लगथे की फलाना के लईका ह बिदेश में रहिथे अऊ बड़का कंपनी म मेनेजर हाबय, पईसा तको अपन देश ले जादा मिलथे। त अईसने मोर ममा गाँव के एक किसान जेकर नाव हाबय किसुन तेकर लईका परमेश्वर बड़ होशियार, एकलौता रिहिस, किसुन ममा ह ओकर सबो फरमाईस ल पूरा करय। लागा-बोड़ी करके वोला इंजीनियर के पढ़ाई करवईस। इंजीनियर के डिग्री मिलीच तहा ले परमेश्वर ह नऊकरी बर एती-तेती हाथ पाव मारिस। नऊकरी लगय तहा ले कुछ दिन करय फेर छोड़ दय। दाई ददा ह समझावय…

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कहानी : पछतावा

एक गाँव में एक झन बुधारू नाम के मनखे राहे ।वोहा बचपन से अलाल रहे।ओकर दाई ददा ह ओला इस्कूल जाय बर अब्बड़ जोजियाय ।त बुधारू ह अपन बस्ता ल धर के निकल जाय,अऊ चरवाहा टूरा मन संग बांटी भंवरा खेलत राहय।छुट्टी होय के बेरा में फेर बस्ता ल धरके अपन घर आ जाय । बुधारू ह जइसे – जइसे बाढ़त रिहिस ओकर आदत ह बिगड़त जात रिहिस ।वोहा अपन संगवारी मन संग लुका – लुका के बिड़ी अऊ गांजा पीये ।तम्बाकू अऊ गुटखा घलो खाय।कोई कोई लइका मन ह…

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छत्तीसगढ थापना परब अउ बुचुआ के सुरता

सोला साल के राज्‍य के स्‍थापना दिवस बर एक जुन्‍ना कहानी- बुचुआ के गांव म एक अलगे धाक अउ इमेज हे, वो हर सन 68 के दूसरी कक्षा पढे हे तेखरे सेती पारा मोहल्ला म ओखर डंका बाजथे । गांव के दाउ मन अउ नवां नवां पढईया लईका मन संग बराबर के गोठ बात करईया बुचुआ के बतउती वो हर सन 77 ले छत्तीसगढ राज के सपना संजोवत हे तउन ह जाके 2000 म पूरा होये हे । सन 1977 म मनतरी धरमपाल गुप्ता के झोला मोटरा ल धरईया बुचुआ…

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