कातिक पुन्नी के दिन आय। नंदगहिन के घर म गजब उछाह मंगल होवत हे। जम्मांे सगा-सोदर मन सकलाय हें। दूनों बेटी-दमाद, सबो नाती-नतनिन, भाई-भतीज, ननंद-डेड़सास, गंगाजल-महापरसाद, हितू-पिरीतू सब आय हें। बिहिनिया सातेच बजे पोंगा बंधा गे। भांय-भांय बाजे के सुरू घला हो गे। दू ठन खोली अउ एक ठन परछी। घर अतकिच अकन ताय। बखरी म अबड़ दूरिहा ले चंदेवा लगा के रांधे-गढ़े, मांदी-पंगत के बेवस्था बना देय हें। पलास्टिक के कुरसी लग गे हे, दरी-तालपत्री सब जठ गे हे। रंधइया-गढ़इया मन साग-पान, चांउर-दार, लकड़ी-फाटा के बेवस्था म लगे हें।…
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सुकारो दाई
सुकारो अपन घर मुहाटी के आगू आंट म बइठ के मेरखू के गोंटी मन ल बीनत रहय। मेरखू बिनइ हर तो बइठे बिगारी बुता आवय, वो तो नंदगहिन के रस्ता देखत रहय। दिन के बारा बजे के बेरा रिहिस होही, अग्घन-पूस के घाम, बने रुसुम-रुसुम लगत रहय। देखत देखत घंटा भर हो गे, घाम ह घला बिटौना लगे लगिस। नंदगहिन के दउहा नहीं। सुकारो ह गोठियाय बर कलकलात रहय। जी उकुल-बुकुल होय लगिस। मने मन कहिथे – ‘कहां झपाय होही रोगही मन ह आज। नंदगहिन ह नइ हे त नइ…
Read Moreलछनी काकी
सोवा परे के बेरा हो गे रहय फेर सुते कोनों नइ रहय, जइसे ककरो अगोरा म बइठे होवंय। संपत, मुसवा, नानुक अउ एक दु झन जउन मन खुद ल गांव के सियान मानंय, घंटा दु घंटा ले अघात सोंच विचार करिन अउ कोतवल ल हाका पारे के आडर कर दिन। संपत अउ मुसवा ,गांव के fभंयफोर सियान आवंय। इंखर बिना न ककरो नियाव होवय न गांव म बइसका बइठे। संपत ह ता थोडिक़-बहुत पढ़े घला हे, मुसवा तो काला अक्षर भंइस बराबर हेे। फेर गांव के मनखे मन ल बांध…
Read Moreसंपत अउ मुसवा
उतेरा एसो गजब घटके रहय। माड़ी-माड़ी भर लाखड़ी, घमघम ले फूले रहय। मेड़ मन म राहेर ह घला सन्नाय रहय। फर मन अभी पोखाय नइ रहय, फेर बेंदरा मन के मारे बांचय तब। फुलबासन ह सुक्सा खातिर लाखड़ी भाजी लुए बर खार कोती जावत रहय। मेड़ के घटके राहेर के बीच चिन्हारी नइ आवत रहय। हरियर लुगरा, हरियरेच पोलखा, राहेर के रंग म रंग गे रहय। राहेरेच जइसे वोकर जवानी ह घला सन्नाय रहय। फुलबासन, जथा नाम, तथा गुन। फूल कस सुंदर चेहरा। पातर, दुब्बर सरीर। कनिहा के आवत ले…
Read Moreराजा तरिया
भोलापुर गांव के जमीन न तो सरलग अउ सोझहा हे,अउ न चिक्कन-चांदर हे। खोधरा-डिपरा ले पटाय हे, बारा मरोड़ के भूल-भुलइया हे। मंदिर ह डोंगरी के टिप म बने हे त जइत खाम ह खाल्हे तला म। ऊपर डहर ऊपर पारा, खाल्हे कोती खाल्हे पारा अउ बीच म मंझोत पारा। खाल्हे पारा वाले मन बर ऊपर डहर मूंड़ी उचा के देखना तको अपराध रहय,चढ़े के तो बातेच मत सोंच। फेर सारकारी नियम कानून अउ बदलत जमाना के असर के कारण अब बड़े-बड़े खोधरा-डिपरा मन पटावत आ गे हे। ऊच-नींच के…
Read Moreडेरहा बबा
मोर गांव के नाम भोलापुर हे। पहिली इहां सौ छानी रिहिस होही। अब कतको छानी के दू-दू , चार-चार टुकड़ा हो हो के गिनती दू सौ ले ऊपर हो गे होही। छानी बंटा गे, खेत-खार घला बंटा गे। मन तो पहिलिच बंटा जाय रहिथे। मन बंटाइस तंहा ले गांव घला बंटा गे। अब घर अउ घर,, आदमी अउ आदमी के बीच बेर्रा बबूर के ढ़ेंखरा रुंधावत कतका देर लगही। पहिली बखरिच बियारा म रुंधना रुंधाय, बोंता बिरवा के रक्छा खातिर। अब तो भाई ह भाई के मुंह देखना नइ चाहे…
Read Moreकहानी संग्रह : भोलापुर के कहानी – लेखकीय
सोंचव छत्तीसगढ़ी भाषा – साहित्य-लेखन आज पर्याप्त मात्रा म होवत हे। बड़ा शुभ लक्षण हे। फेर छत्तीसगढ़ी समकालीन साहित्य के बात जब होथे तब हमला मुंह ताके बर पड़ जाथे। साहित्य के प्रवृत्ति अनुसार विद्वान मन वोकर नाम घरथें, जइसे -रीतिकालीन साहित्य, प्रगतिशील साहित्य आदि। अइसनेच समकालीन साहित्य ह घला प्रवृत्ति-विशेष के साहित्य होथे, येकरो अपन लक्षण अउ गुण-धर्म होथे। जइसे कोन्हों घला रचना ल प्रगतिशील रचना नइ कहे जा सके वइसनेच कोन्हों रचना ल समकालीन साहित्य घला नइ केहे जा सके। जउन रचना ह सामकालीन साहित्य के विषेशता से…
Read Moreकहानी संग्रह : भोलापुर के कहानी – संपादकीय
भोलापुर के कहानी के का बतावंव। किताब तुंहर हाथ म हे। पढ़ के खुद देख लव। संगवारी हो ! भोलापुर गांव, जेकर कहानी ये किताब म लिखाय हे, कोन जगा हे? कोन तहसील अउ कोन जिला म हे? उहां के आबादी कतेक हे? उहां के रहवइया मन कइसन हें ? उहां का अइसन घटना घट गे कि जेकर कहानी बन गे? कहानी के कलाकार मन कइस-कइसन हें ? सबो झन विहिंचेच के आवंय कि अनगंइहां घला हें ? अबड़ अकन सवाल हे। लेखक के गांव के नांव भोड़िया हे। मोर…
Read Moreकहानी संग्रह : भोलापुर के कहानी
लोक की कहानी (भोलापुर के कहानी, प्रथम संस्करण की समीक्षा; विचार वीथी, नवंबर10-जनवरी11) डॉ. गोरे लाल चंदेल आंचलिक भाषा पर कहानी लिखने की हमारी परंपरा बहुत लंबी है। इंशा अल्ला खाँ की ‘रानी केतकी की कहानी’ यों तो हिन्दी खड़ी बोली की कहानी मानी जाती है पर उस कहानी में आंचलिकता बोध स्पष्ट दिखाई देता है। रेणु की ‘परती परिकथा’ बिहार की लोक बोली के रस से सराबोर दिखाई देती है। उनकी कहानियों में भी इस आंचलिक रंग को आसानी से देखा जा सकता है। बहुत से हिन्दी कहानियों में…
Read Moreकहानी संग्रह : भोलापुर के कहानी
पूर्वावलोकन डॉ. नरेश कुमार वर्मा कुबेर की छत्तीसगढ़ी कहानी संग्रह ‘भोलापुर के कहानी’ में कुल चौदह कहानियां संग्रहित हैं। ये कहानियां वास्तव में किसी एक गांव की कहानी नहीं है अपितु छत्तीसगढिया लोगों की पीड़ा, शोषण , अस्मिता, संघर्ष और स्वाभिमान से ओतप्रोत कहानियां हैं जिनमें डेरहा बबा, राजा तरिया, संपत अउ मुसुवा, लछनी काकी, सुकारो दाई, घट का चौंका कर उजियारा, चढ़ौतरी के रहस, सरपंच कका, पटवारी साहब परदेसिया बन गे, साला छत्तीसगढ़िया, पंदरा अगस्त के नाटक, अम्मा हम बोल रहा हूं आपका बबुआ, मरहा राम के जीव अउ…
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