सहदेव गुरूजी के ओ दिन इसकूल में पहिली दिन रहीस। ओहा पहिली कक्षा में लइका मन के हाजिरी लेवत रहीस। ओतके बेरा इसकूल में लइका मन गोहार पारे बर धर लीन। ”बेर्रा टूरा बेर्रा टूरा अपन दाई बर जठाथे पैरा” कहीके। गुरूजी कक्छा ले बाहिर निकल के देखीस तव उहां एक झन सोगसोगवान गड़हन के लइका अपन महतारी संग कक्षा के बाहिर खड़े रहीस। गुरूजी हा लइका मन ला दपकार के चुप करइस। लइका हा तो सुसक सुसक के रोवत रहीस। ओकर महतारी के आंखी हा घलो डबडबा गे रहीस।…
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कहिनी : लछमी
मास्टर ह रखवार ल कथे- चल जी मंय तोला परमान भीतरी दूंहू आ कहिके रखवार अऊ रऊत संग गुरुजी ह भीतरी म जाथे, गरूआ मन ओला देख के बिदके ल लगथे एती-ओती भागे ल धरथे त रखवार ह हांसथे- ले जम्मो तो तोला देखके भीतरी म भागथे बड़ा गाय वाला बनथस। मास्टर कथे अभी देख न जी परमान ल अऊ मास्टर ह हूंत कराथे- अरे सुकवारो, लछमी गायत्री, बुधियन्तीन, सुक्रती, सुती आओ लछमी दाई हो। गाय मन ओरी पारी आगे मास्टर के चारो कोती झूम जथे। भभगवान ह सिरीस्टी ल…
Read Moreकहिनी : ममता
ममता एक झन ल पूछिस जेहा गाड़ी म बइठे रीहिस। का होगे? कइसे लागत हे एला ओ मनखे ह थोरिक ढकेलहा कस जुबान दिस मोर गोसईन हरे। कालीचे भात रांधत-रांधत लेसागे। उही ल अस्पताल लाने हावन। म मता नांवेच ल सुनके पता चल जथे कि कतिक मया ल समोय हे अपन भीतरी। ममता अऊ मया के अगम दहरा हरे ममता बेटी के अंतस ह। नपन ले पढ़ई-लिखई म गजब हुसियार। अइसन गुणवंतीन बेटी ल काकरो नजर झन लग जाय कहिके घेरी-बेरी काजर आंजे ओकर दाई रमोतिन ह। फेर करिया काजर…
Read Moreजयंत साहू के कहिनी : मनटोरा
चइत बइसाख के महिना तो बर बिहाव के सिजन आय। जेती देखबे तेती गढ़वा बाजा ह बाजत रइथे। किथे न मांग फागुन मे मंगनी जचनीए चइत बइसाख म बर बिहाव अउ काम बुत न उरका के सगा घर लाड़ू बरा बर रतियाव। चडती मंझनीया के बेरा आमा बगइचा के तिरे तिर दु तिन ठन बइला गाड़ी आवत रिहीस। गाड़ी ह गजब सजे धजे रिहीस। बइला के सिंग म चकमकी रंग लगायए पीठ म मखमल के लादना लदाय अउ टोटा म कांसा के बड़े बड़े घांघड़ा पहिराय। टोटा के घांघड़ा अउ…
Read Moreलहुटती बसंत म खिलिस गुलमोहर : कहिनी
स्वाति ह मां ल पोटार के रोय लगिस। थोरिक बेरा म अलग होके कथे। मां मेंहा तोर दुख ल नइ देख सकंव। मेंहा तोर बेटा अंव। तोर पीरा तोर दुख अउ पहार कस बिपत ल समझथंव। बाबूजी ह अब कभू नइ लहुटय। ये जिनगी ह सिरिफ सुरता म नइ कटय ओ अम्मा। जिनगी म सबो ल हर उमर म कोनो साथी के सहारा के जरूरत परथे। जिनगी के एक-एक छन सहारा ह भगवान के दे हुए वरदान ये। ये ल हांसे जिए बर चाही। तैंहा परकास अंकल ल अपन साथी…
Read Moreलाली चूरी
तुलसी ह अंगना के धुर्रा ल रपोट रपोट के परदा रुंधे। पारा भर के लोग लइका सेकला के घरघुfधंया खेले। एक झन नोनी के दाइ बने एक झन बाबू के दाई। सुघ्घर पुतरी पुतरा के बिहाव ल रचै। लइकुसहा उमर के लइकुसहा नेंग जोग। उही बरतीया उही घरतीयाए उही लोकड़हीन उही बजनीया। नान नान पोरा चुकिया म साग भात चुरय। कमचिल के मड़वा म तेल हरदी चड़हय अउ भांवर परय। टूरा मन कनिहा म नंगारा बांधे। रोंगो बती अउ पानवाला बाबू गाना गा गा के गुदंग गुदंग नाचे। ये ठट्ठा…
Read Moreकहिनी : करनी दिखथे मरनी के बेरा
सुकवारो अब बस्ती में किंजर-किंजर के साग-भाजी बेचय अउ कुरिया में राहय। ओला एक बात के संतोष रहीस कि ओकर दूना लइका मन ओकर आंखी के आघु में हावय। ओहा अपन लइका मन के खाय पीये ले लेके कपड़ा लत्ता तक के खरचा उठाय बर धरलीस। ओ दिन मेहा पटेवा बाजार म गिंजरत रहेंव ओतके बेरा मोर सुखदेव भइया संग भेंट होगे। राम रमउवा होय के बाद मेहा ओला पूछ परेंव बने बने गा सुखदेव भइया। अतका ला सुनीस अउ सुखदेव भइया जोर जोर से रोय बर धर लीस। मै…
Read Moreदाई अउ बबा के वेलेन्टाइन डे – कहिनी
”सुफेद बबा हा अतेक सुंदर बंसरी बजावय कि ओकर सोर दस कोस ले बगरे रहीस। का रामायन मण्डली, का नाचा मण्डली, कीर्तन, राम सप्ताह सबे जगह ले बबा बर बुलावा हा आवय। एती दाई ला बबा के बंसरी नई सुहावय। वइसने बबा ला घलो दाई के घेरी-बेरी दखल देवई हा नई सुहावय। दाई हा तो रीस के मारे बबा के बंसरी ला एक बेर चुल्हा म जोर घलो डारे रहीस। ये झगरा के मतलब ए नई रहीस कि दूनो के बिल्कुल नई बनत रहिस हे।” झगरा तो सबो झन होथें…
Read Moreकहिनी फूल सुन्दरी राजकुमारी
ओकर बइसाखी मन फेंका गय रहिन। पीछू-पीछू एक झन टूरी आत रहिस तेन ह ओकर तीर म आइस। ओला उठा के बइठारिस अउ बइसाखी मन ल ला के दिस। लतेल के साबूत गोड़ म लागे रहिस तेला देखके ओहा कहिस- ‘अरे तोला तो बने लाग देहे हे।’ अतका बोल के ओकर घाव ल पोंछे अउ सहलाय लगिस।ओ हा अपंग रहिस। लइकई म पोलियो होगे रहिस। डेरी गोड़ के माड़ी खाल्हे ह पतला अउ कमजोर हो गे रहिस। दाई-ददा मनके पेट-पीठ बरोबर रहिस त का ओकर इलाज करातिन। वइसे भी गांव…
Read Moreनान्हे गम्मत : झिटकू-मिटकू
किताब, डरेस अउ मंझनिया के जेवन के संगे संग कई ठन सुविधा देवत हे। छात्रवृत्ति पइसा तको देथे। जेन ह जादा गरीब हे अपन लइका मन ल नइ पढ़ा सकंय उंकर बर जगा-जगा छात्रावास आसरम अउ डारमेटरी इसकूल चलावत हे।‘दिरिस्य पहला’(मिटकू ह छेरी-पठरू चरावत रहिथे उही डहर ले झिटकू ह इसकूल जाथे। मिटकू ह झिटकू ल देखके दऊंड़ के ओकर मेर आथे अउ कहिथे):मिटकू: अरे यार झिटकू, तैं तो साहेब असन दिखत हस। यहा दे जूता-मोजा, बेल्ट अउ ये ह काय हरे यार?झिटकू: अरे! मोर संगवारी, ये ल टाई कहिथे…
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