एती बकठी दाई के मिहनत के हाथ रहीस। ओहा बिहानिया ले रतिहा सुतत तक काहीं न काही बुता करते राहय। ओकर घर के मन घलो मिहनत करे म बरोबरी ले ओखर संग देवयं। तीर- तार के गांव म इज्जत बाढ़गे, लइका मन ल बने संस्कार मिलीस।कोनो माई लोगन ला अगर कोनो बकठी कही देही तो ओहा गुस्सा में आगी असन बरे बर धर लिही। फेर बकठी दाई ला कभु ये बात हा खराब नई लागिस। सिरतोन में बिचारी हा बकठी रहिस। बिहाव होय के बाद दस बच्छर तक आगोरिस ओकर…
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नान्हे कहिनी – दहकत गोरसी म करा बरसगे
ये बखत कतका जाड़ परिस अउ कतका गरमी रही येला प्रकृति के नारी छुवइया मन बने बताही। रेडियो अउ टीबी वाला मन ओकरे बात ल पतिया के सरी दुनिया म बात बगराथें। टीबी म संझा के समाचार सुन के मैं मुड़ी गोड़ ले गरम ओनहा पहिरेंव अउ रातपाली काम म जाय बर निकलेंव। गर्मी होवे चाहे ठंड, खाय बर कमाय ल परथे। दस बजती रात म पूरा शहर कोहरा ले तोपा गे रिहीस। गली म एक्का-दुक्का मनखे रिहीस। हमन गली के आखिरी कोन्टा म रिक्सा वाला के परिवार रिथे। कोनो…
Read Moreपरोसी के परेम
डोकरी-डोकरा के एक-एक सांस नाती नतरा ल देख के भीतर बाहिर होथे। जानों मानो ऊंकर परान नाती-नतरा म अटके रहिथे।’ ‘ये दुनिया मया पिरित म बंधाय हे तभे ये जुग ह तइहा-तइहा ले चले आत हे। एक सादा सुंतरी म गूंथे रंग-बिरंग के फूल कस सरमेट्टा गुंथाय हे। मया बर जात लगे न कुजात। घर-परिवार, पारा-परोस, गांव मुहल्ला सब नत्ता-गोत्ता मानत एक दूसर के सुख-दुख म काम आवत, अपन करज निभावत, हंसी-खुसी से जियत रेहे के सिक्छा देवत रहिथे ये मया-परेम। जिंकर हिरदे म जतेक परेम हे तेला कभू आंसू…
Read Moreनान्हे कहिनी: लइकाहा बबा
नउकरी ले रिटायर होये के बाद गांव ले ये सोच के अपन बेटा कना शहर आ गे कि बांचे जिनगी बेटा कने नाती मन संग खेलत खावत कट जाही। संझा सात बछर के नाती संग सहर के एक मात्र बगीचा मा घूमे बर आ गिन। वो हा देखिन बगीचा मा जम्मो मइनखे घूमत-फिरत हावय, कोनो-कोनो बइंच मा या भुंइया के घांस मा बइठ के गोठियावत हावय। नान-नान लइकामन घांस मा घोंडत हावय। सूरज देवता पछिम मा डूबत हावय। चिरई-चिरगुन मन अपन-अपन खोदरा तनि लहुटत हावय। वो ह अपन नाती संग…
Read Moreछत्तीसगढ़ी तिहार : छेरछेरा पुन्नी
एक समे कोसलपति राजा कल्याण साय दिल्ली के महाराजा के राज म रहिके राज-पाठ, राजनीत अउ लड़ई के सिक्छा पाये बर आठ बरिस ले रहिन,ओखर बाद सरयू नदी तिर ले बाम्हन महराज मन के टोली ल संग लेके छत्तीसगढ़ के तइहा के राजधानी रतनपुर पहुंचिन। कोसल के परजा आठ बरिस म अपन राजा ला आवत सुनके अड़बड़ खुस होगे, परजा मन राजा ला परघाये बर गाड़ी-घोड़ा, पैइदल रतनपुर कोती दौउड़ चलिन। राज के जम्मो 36गढ़ के राजा मन कोसलपति के सुवागत म रतनपुर पहुच गए। छत्तीसगढ़ के जम्मो राजा – परजा, कल्याण साय के जय-जयकार करत महल के दुवारे म सकला के नाचे गाए लगिन।…
Read Moreकहिनी : ईरखा अउ घंमड के फल
– भगवान कृष्ण मंझनिया के आराम करत राहय। घमण्ड से चूर दुरयोधन भगवान के मुड़सरिया कोती बइठ के कृष्ण के नींद खुले के इंतजार करे लगथे। ओतके बेर अर्जुन घलो मदद के नाम से पहुंचथे। ओला देख के दुरयोधन के मन में भय समा जाथे के अर्जुन तो कृष्ण के फुफेरा भाई ए अउ ओखर झुकाव घलो पाण्डव कोती हे। दुरयोधन के जनम-जनम के सकलाय इरखा उबले लगथे।– अइसे कोन भारतवासी हो ही जेला रामायन अउ महाभारत के किस्सा बने नई लगत हो ही। ये दूनों ग्रंथ हरेक भारतवासी के…
Read Moreनान्हे कहिनी : डोकरा-डोकरी के झगरा
डोकरा-डोकरी के झगरागांव म एक ठन घर में डोकरा-डोकरी रहय। एखर मन के लोग-लइका नई रहिस। डोकरा-डोकरी अतका काम-बुता करय के जवान मनखे मन नई कर सकंय। अपन खेत-खार ल अपनेच मन बोवय अपनेच मन निंदय-कोंड़य। बुता-काम ले थोर-बहुत ठलहा होवय त छांव म थोर-बहुत संगवारी मन करा गोठ-बात करे के मन होथे। एक दिन डोकरा हर बुता-काम ले आइस घर म बढ़िया खा के निकलिस बर छांव मेर। जिंहा एक घुमक्कड़ टुरा मन बइठे रहयं। उही मेर रमेश (धोनी) नाम के लपरहा पुच-पुचहा टुरा तको बइठे रहय। अब येती…
Read Moreकहिनी : हिरावन
‘हिरावन बारवीं म मेरिट म पास होईस। फेर नेमसिंग, हिरावन ल आगू नई पढ़इस। सोचिस ‘जादा पढ़े-लिखे ले मनखे अलाल हो जाथे। नउकरी त मिलना नइ हे।’ ईतवारी, हिरावन ल पढ़ाए बर नेमसिंग ल फेर किहिस। फेर नेमसिंग उहू ल नइ घेपिस उल्टा कहि दिस, ‘भंइसा के सिंग ह भंइसाच ल गरू लागथे’ गा। तोर का हे? पइसा त मोल पटाना हे।’ पूस के महीना रिहिस। जाड़ बनेच जनात रिहिस। परसू के किराना दुकान के आगू म लइका मन कागद, पैरा मन ल सकेल के, भुर्री बार के आगी तापत…
Read Moreकहिनी : लंगड़ा भिखारी के इच्छा
शहर म एक झन लंगड़ा भिखारी रहय। जम्मो मनखे मन ओला लंगड़ा भिखारी कहिके पुकारय। भिखारी ह हमेशा खुसी-खुसी के जीवन बितावय, कभू घुस्सा नई करय। भिखारी शहर के दुरिहा म एक ठन झोपड़ी म राहय। झोपड़ी ह कुड़ा-करकट के ढेर के बीच म एक ठन पेड़ के तरी रहिस हे। लंगड़ा भिखारी के झोपड़ी म खाना पकाय के टूटे-फूटे बरतन अउ एक दू ठन चिरहा कपड़ा रहय। भिखारी ह हर दिन बिहनिया नहा-धो के आठ बजे ले अपन भोजन खातिर सहर के जम्मो दरवाजा म भीख मांगे बर जाय…
Read Moreकहिनी : नोनी दुलौरिन
टूरी कहूं लछमी, त कहूं दुरगा देवी के रूप म जनम लेथे। डीह डोंगर, ससुरे-मईके दूनो कुल के मरियादा होथे। ये ह मोर अंगना के फूल-फुलवारी, मोर बेटी मोर हीरा ए। येला लिखाहूं-पढ़ाहूं बड़े साहेब बनाहूं, इही मोर डीह-डोंगर के दिया बरईया ए। खद्दर के छानी म, दूनो परानी, अपन जिनगी के सुख-दुख ल घाम छइहां के खेल सही खेलत राहय। बने-बने म समय बीतत जल्दी पहा जथे, सुख के दिन पांखी लगा के लऊहा उड़ा जथे। बर-बिहाव संग-संग गवन-पठौनी होगे। भगवान जाते सांठ चिन डरिस। उही दिन के आवत…
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