एक ठन गांव मा भाटा के बारी रहिस।ओमा किसिम किसिम के भाटा फरे रहिस। खई खाए के चकर म उही म बिला बनाके रहे लगिस।एति ओति किदरत मुसुवा कांटा के झारी म अरझ गे तहां ले ओकर गोड़ म बमरी के कांटा, बने आधा असन बोजागे। मुसुवा पीरा म कल्ला गे, एति ओति कुदत लागे कि कौउनो ए कांटा ल निकाल देतिस।पीरा म कल्लात मुसुवा ल न उ ठाकुर के दुकान दिखिस।नउ ल मुसुवा कहिस – ए भाई न उ ठाकुर – मोर गोड़ म काटा गड़गे हे, भारी पीरा…
Read MoreCategory: कहानी
हतास जिनगानी : नान्हे कहिनी
आज संझौती बेरा गांव के सडक तीर के एक ठन दुकान कोती घूमे बर गयेंव।नवा-नवा दुकान खुले रहय त संझौती बेरा म बहुत अकन मनखे के रेम लगय।काबर कि उंहा डिस्पोजल अउ चखना के बेवस्था घलो रहय। दुकानवाला ह कंगलहा दरुहा बर फोकट के हंडिया वाला पानी अउ पूरताहा बर फिरिज के पानी रखे रहय। में हा पेपर ल बिहनिया नी पढे रेहेंव तेकरे सेती पेपर पढे बर ओकर कना बइठ गेंव। ओतका बेरा बने अंजोर रीहिसे।फेर जइसे सुरूजदेव बूडिस।मनखे सकलाय लगिस।फेर मोला देखके ओमन अचरित म पडगे रहय।ओमन दुकानवाला…
Read Moreगऊ रक्छक : नान्हे कहिनी
काली बिहाने के बात हरे। दांत म मुखारी घसरत तरिया कोती जावत रहेंव। उदुप ले रद्दा म बैसाखू ममा संग भेंट होगे। बैसाखू ममा ह बइला कोचिया के नांव ले पुरा एतराब म परसिध हे। ममा ह देखिस ताहने पांव परिस। पांव पैलगी के बाद पूछेंव-कस ममा बिकट दिन म दिखेस ग! मनमाने नोट छापे म लगे रेहेस काते? तोर बिजनिस बनेच जोर पकडे हे लागथे!! मोर दिल्लगी ल सुनके ओहा खिसियावत किथे -तोला हरियर उसरे हे परलोखिया!! हम का भुगतना भुगते हन। हमीं जानबो अउ वो ऊपर वाला मालिक…
Read Moreनवा बच्छर के गोठ
नौ बच्छर के संतराम डबल रोटी खाय बर सतरा दिन ले दू कोरी रुपया जमा करेबर ऐती ओती हाथ लमावत हे। जब ले डबल रोटी के नांव ल सूने हे तब ले ओकर मन उही में अटक गे हावय, फेर गरीब के लईका बर दू कोरी माने चालीस रुपया चार लाख आय।दाई ददा तो पहिलीच ले नई हे। मंदहा ममा के घर रहिके बाढ़त हे। मामी के हिरदे मा ममता ह कहां लुकाय हे तेला संतराम दू बच्छर ले खोजत हे।गांव के सरकारी इस्कूल मा बिहनिया ले मध्यान भोजन के…
Read Moreमोर छत्तीसगढ़ के किसान
मोर छत्तीसगढ़ के किसान, जेला कहिथे भुंइया के भगवान । भूख पियास ल सहिके संगी , उपजावत हे धान । बड़े बिहनिया सुत उठ के, नांगर धर के जाथे । रगड़ा टूटत ले काम करके, संझा बेरा घर आथे । खून पसीना एक करथे, तब मिलथे एक मूठा धान । मोर छत्तीसगढ़ के किसान, जेला कहिथे भुंइया के भगवान । छिटका कुरिया घर हाबे, अऊ पहिनथे लंगोटी । आंखी कान खुसर गेहे , चटक गेहे बोडडी । करजा हाबे ऊपर ले , बेचागे हे गहना सुता । साहूकार घर में…
Read Moreपूस के रात : प्रेमचंद के कहानी के छत्तीसगढ़ी अनुवाद
हल्कू हा आके अपन सुवारी ले कहीस- “सहना हा आए हे,लान जउन रुपिया राखे हन, वोला दे दँव। कइसनो करके ए घेंच तो छुटय।” मुन्नी बाहरत रहीस। पाछू लहुट के बोलिस- तीन रुपिया भर तो हावय, एहू ला दे देबे ता कमरा कहाँ ले आही? माँघ-पूस के रातखार मा कइसे कटही? वोला कही दे, फसल होय मा रुपिया देबो। अभी नहीं। हल्कू चिटिक कून असमंजस मा परे ठाढ़े रहीगे। पूस मुँड़ उपर आगे,कमरा के बिन खार मा वोहा रात कन कइसनो करके नइ सुत सकय। फेर सहना नइच मानय,धमकी-चमकी लगाही,गारी-गल्ला…
Read Moreबइला चरवाहा अउ संउजिया
अचानक वो दिन मैं अपन मूल इसकुल म जा परेंव। टूरी मन मोर चारोखुंट जुरिया गे। मैं ह टूरी मिडिल इसकुल के हेडमास्टर हरंव न। टूरी मन अपन-अपन ले पूछे ल धर लिन- “कहाँ चल दे रेहे बड़े सर, इहाँ कइसे नइ आवस? हमर मन के पढ़ई- लिखई बरबाद होवत हे। चर-चर झिन सर मन इसकुल म आना बंद कर दे हव?” “काय करबे नोनी हो, बइला चरवाहा मन हड़ताल म चल दे हे। कतको बरदी मन बइलच चरवाहा के भरोसा चलत हे। सरकार ह बरदी ठोंके बर संउजिया मन…
Read Moreअंधविसवास
असाढ के महिना में घनघोर बादर छाय राहे ।ठंडा ठंडा हावा भी चलत राहे। अइसने मौसम में लइका मन ल खेले में अब्बड़ मजा आथे। संझा के बेरा मैदान में सोनू, सुनील, संतोष, सरवन, देव,ललित अमन सबो संगवारी मन गेंद खेलत रिहिसे। खेलत खेलत गेंद ह जोर से फेंका जथे अऊ गडढा डाहर चल देथे। सोनू ह भागत भागत जाथे अऊ गडढा में उतर जथे। ओ गडढा में एक ठन बड़े जान सांप रथे अऊ सोनू ल चाब देथे ।सोनू ह जोर जोर से अब्बड़ रोथे अऊ रोवत रोवत बेहोस…
Read Moreछत्तीसगढ़ी कहानी : सजा
आज जगेसर कका ह बिहनिया ले तियार होके पहुंचगे रहय। “ले न भांटो कतका बेर जाबो ते गा!दस तो इंहचे बजा डारे हव।सगा मन घलो काम बुता वाला आदमी हरे ,कहूं डहर जाएच बरोबर हरे।” काहत रामसिंग ल हुदरिस।आज रामसिंग के बेटा अनिल बर छोकरी देखे बर जावत हे।दू झिन नोनी के पाट के बाबू हरे अनिल ह !दू बछर पहिली मंझली नोनी मोतिन के हांत पिंवरा डरीस। देखते देखत अनिल घलो काम बूता म हुसियार होगे अउ जाने सुने के लइक होगे ।बर बिहाव के संसो कोन दाई ददा…
Read Moreनान्हे कहिनी : बदना
भव्यता के इतिहास लिए मनखे मनखे ल अँजोर करत जनमानस में अथाह बिसवास के नाव बदना के दाई बोहरही माई सबो मनखे बर एक तारनहार आय। आज ये जगा ह लोगन के आसथा अऊ भक्ति के प्रतीक माने जाथे, एक बार जेन ह ठाकुर देव बोहरही माई ल सुमर के बदना बदथे त जरूर ओकर मनोकामना ह पूरा होथे। अईसन बिसवास के नाव आय, सोजे सोज गोठ ये, मनोकामना पूरा होथे तभे मनखे मन आके ईहा बदना ल बदथे। पुरखा जमाना ले चलत आवत हे कोनों धन संपति, कोनों संतान…
Read More