छत्तीसगढ़ी कहानी : सजा

आज जगेसर कका ह बिहनिया ले तियार होके पहुंचगे रहय। “ले न भांटो कतका बेर जाबो ते गा!दस तो इंहचे बजा डारे हव।सगा मन घलो काम बुता वाला आदमी हरे ,कहूं डहर जाएच बरोबर हरे।” काहत रामसिंग ल हुदरिस।आज रामसिंग के बेटा अनिल बर छोकरी देखे बर जावत हे।दू झिन नोनी के पाट के बाबू हरे अनिल ह !दू बछर पहिली मंझली नोनी मोतिन के हांत पिंवरा डरीस। देखते देखत अनिल घलो काम बूता म हुसियार होगे अउ जाने सुने के लइक होगे ।बर बिहाव के संसो कोन दाई ददा…

Read More

नान्‍हे कहिनी : बदना

भव्यता के इतिहास लिए मनखे मनखे ल अँजोर करत जनमानस में अथाह बिसवास के नाव बदना के दाई बोहरही माई सबो मनखे बर एक तारनहार आय। आज ये जगा ह लोगन के आसथा अऊ भक्ति के प्रतीक माने जाथे, एक बार जेन ह ठाकुर देव बोहरही माई ल सुमर के बदना बदथे त जरूर ओकर मनोकामना ह पूरा होथे। अईसन बिसवास के नाव आय, सोजे सोज गोठ ये, मनोकामना पूरा होथे तभे मनखे मन आके ईहा बदना ल बदथे। पुरखा जमाना ले चलत आवत हे कोनों धन संपति, कोनों संतान…

Read More

कहानी : मंतर

अहिल्या हॅं दुये चार कौंरा भात ल खाये रिहिस होही। ओतकेच बेरा परमिला झरफिर झरफिर करत आइस । ओरवाती के खालहे म बैठ गे। अहिल्या देखते साथ समझ गे। परमिला हॅ आज फेर अपन बेटा -बहू संग दू -चार बात कहा -सुनी होके आवत हे। अहिल्या परमिला के नस -नस ल टमर डारे हवय। जब कभू परमिला बेरा -कुबेरा अहिल्या घर आथे। थोथना फूले रहिथे। मुड़ी -चुंदी बही बरन छरियाये रहिथे। मार गोटारन कस बड़े -बड़े आॅखी ल नटेरत ,परेतीन बानी अपने अपन बुड़ुर- बुडुर करे लागथे त अहिल्या फट्ट…

Read More

सबले बढ़िया – छत्तीसगढ़िया

नानकुन गांव धौराभाठा के गौंटिया के एके झिन बेटा – रमेसर , पढ़ लिख के साहेब बनगे रहय रइपुर म । जतका सुघ्घर दिखम म , ततकेच सुघ्घर आदत बेवहार म घला रहय ओखर सुआरी मंजू हा । दू झिन बाबू – मोनू अउ चीनू , डोकरी दई अउ बबा के बड़ सेवा करय । बड़े जिनीस घर कुरिया के रहवइया मनखे मन ल , नानुक सरकारी घर काला पोसाही , नावा रइपुर म घर ले डारिन अउ उंहीचे रेहे लागिन । कलोनी म , किसिम किसिम के , अलग…

Read More

अपन-अपन समझ

जब मेहा अपन चार बछर के बेटा रामसरूप ला बने तउल के देखथंव, त जान परथे के वोमे भोलापन अउ सुनदरई नई रहि गे, जउन दू बछर पहिली रिहिस हे। वो अइसे लागथे जाना-माना अपने गुस्सेलहा बानी म लाल आंखी मोला देखावत हे। वोकर ये हालत ला देख के मोर करेजा कांप जथे अउ मोला अपन वो बचन के सुरता आ जथे जउन दू बछर पहिली मरन सैय्या म परे वोकर महतारी ल दे रेहेंव। मनखे अतेक सुवारथी अउ अपन इंद्री के गुलाम हे के अपन फरज ला कोनो बखत…

Read More

सरद पुन्नी के सार कथा

चार महीना चौमास के बीते ले सरद रितु के शुरुवात होय ला धर लेथे ता गुरतुर जाड़ हा तन मन ला मोहे ला धर लेथे। इही कुनकुनहा जाड़ मा सरद पुन्नी के वरत हा आथे। घर परवार जुरमिल के पुन्नी के रतिहा चंदा ले बरसे अमरित ला पाये खातिर रातभर एके जगा जुरिया जाथें। ए पुन्नी के वरत हा मन के सब्बो कामना ला पुरा करइया वरत हरय। सरद पुन्नी के गुन अउ महत्तम के कारन एखर अब्बड़ अकन नाँव घलाव हे। एला कोजागरी वरत, रास पूर्णिमा, कुमार वरत, अउ…

Read More

लघु कथा : पितर नेवता

आवव पितर हो आज तुंहर बर बरा सोंहारी तसमई बने हे, का होइस पहिली तुमन ला खाय बर नइ मिलिस त आज खा लेवव। जीयत के दुःख ला भुला जावव वो समे के बात अलगे रिहिस, दाई ददा हो जवानी म तुंहर बहु के मूड़ तुमन ला देखत पिरावय अउ तियासी बासी अउ चार दिन के भरे पानी ल देवय, फेर अब बने होंगे हे, तुंहर बर फुलकसिया थारी अउ पीढ़ा मा रोजे आरूग पानी मढ़ाथे। अउ बोली भाखा हा घलो बने होगे हे। डोकरी-डोकरा ले अब सियान-सियानिन कहे लग…

Read More

गदहा के सियानी गोठ

पहिली मेंहा बता दौ घोड़ा अउ गदहा म का फरक हे, घोड़ा ह बड़ होशियार, सयाना अऊ मालिक के जी हजूरी करईया सुखियार जीव ये। आँखी कान म टोपा बांध के पल्ला दऊड़ई ओकर काम ये, भले मुड़भसरा गिर जही, मुड़ी कान फूट जही, माड़ी कान छोला जही फेर पल्ला भागे बर नई छोड़य। रद्दा ह चातर रहय फेर चिखला सनाय राहय मालिक ह जेती दऊड़ा दय उही कोती दऊड़े बर परही। माने होशियार होके दूसर के दिमाग अऊ दूसर के बताय रद्दा म चलईया आज के समे मा इही…

Read More

बाल लेखक सार्थक के कहानी : संगवारी

बोड़रा नाम के गांव रिहिस जी। उहां दू झन संगवारी रिहिस। एक के नाव बल्लू, दूसर के नाव स्याम। दूनो संगवारी जब समे मिलय, सनझाती बेरा, घूमे बर जाये। बल्लू अनपढ़ गंवार रिहीस, फेर सरीर ले बढ़ तगड़ा। दूसर कोती स्याम पढ़हे लिखे रिहीस, फेर सरीर ले कमजोर। एक दिन, सांझकुन जावत जावत दूनो झिन गोठियावत रिहिस। स्याम किथे – गनेस चनदा मांगे बर काली गांव के लइका मन आये रिहीन जी। में कहि पारेंव, बल्लू जतका दिही ततके महूं देहूं कहिके। मे जानत हंव, तोर मोर हैसियत एके बरोबर…

Read More

सोलह सिनगार

सावन के महिना ल, सहराती महिला मन, बछर भर अगोरय। रंग रंग के पहिर ओढ़ के चटक मटक किंजरय। एक बछर, सावन म, महिला मन बर, नावा किसिम के परतियोगिता राखीस – जे महिला, सावन भर, सोलह सिनगार ले, सजे धजे रहि तेला, सावन के आखिरी दिन, भारी पुरूसकार देके सममानित करे जाही। सिनगार के नाव, कतको उमड़गे। तरी उप्पर गहना जेवर बनवा डरीन। नावा नावा फेसन के लुगरा लाद डरीन। सेंट के सीसी के खपत बाढगे। सावन के आखिरी म, बहुत बड़े जलसा राखे गीस, बिजेता ला, सममान समेत…

Read More