Category: Chhattisgarhi Gazal

अशोक नारायण बंजारा के छत्‍तीसगढ़ी गज़ल

आंखी म नावा सपना बसा के रखव
अपन घर ला घर तो बना के रखव।
आंखी ले बढ़के कूछू नइये से जग मा
ए-ला अपने मंजर ले बचा के रखव।
सोवा परत म कहूं झनिच जाबे
अंगना म चंदैनी सजा के रखव।
बड़ कोंवर हे जीयरा दु:ख पाही
गोरी के नजर ले लुका के रखव।
दिन महीना बछर कभू मउका मिलही
अंतस ला अपन ठउका के रखव।
बड़ दूरिहा हे- केई कोस हे रेंगना
गोड़ ला फेर अपन थिरका के रखव।

अशोक नारायण बंजारा
सिविल लाईन, बलौदाबाजार, जिला रायपुर
मो. 94252 31018

सनत के छत्‍तीसगढ़ी गज़ल

1

डहर-डहर मं घन अंधियार होगे,
बिहनिया हमर नजर के पार होगे।
जेखर उपर करत रेहेंन विसवास,
वो हर आजकल चोर-बटपार होगे।
पहिरे हावय वो हर रंग-रंग के मुखउटा,
चेहरा हर ओखर दागदार होगे।
जॉंगर टोरथन तभोले दाना नइ चुरय,
जिनगी हमर तो तार-तार होगे।
मर-मर के जीना कोन्‍हों हमर ले सीखय,
हमर बर जीत ह घलो हार होगे।
गलती करके मूड़ मं चघा पारेन,
वो ह हमरेच्‍च मुड़ के भार होगे।
घर गोसिया ल पहुना ह डरवावय,
अब तो जेखर मार तेकर सार होगे।

2

इहॉं आके संगी तैं का पाबे,
अलकरहा जिनगी पहाबे।
आसा के महल धसक जाही,
सपना ला देखत रहि जाबे।
कतको कमाबे नई पुरही,
तैं पेट के आगी मं झंपा जाबे।
लोटा-लोटा पीबे आसुवासन,
बटकी-बटकी भासन ला चबाबे।
छोड़ दिहीं जम्‍मो अमीर ल,
तैं गरीब होरा असन भुँजाबे।
आघू बढ़बे कि छेकइया ठाढे़ हे,
तैं सुखर्रा कइसन उल्‍हाबे।
बचोइया लहुटिन मरोइया,
पीरा ला काखर मेर गोहराबे।

सनत
साहित्‍य निकेतन,
जूट मिल थाना के पीछे, रायगढ़

बसंत राघव के छत्‍तीसगढ़ी गज़ल

1


ओखर आंखी म अंजोर हे दया-मया के
जिंहा ले रद्दा हे डोर उहां लमाथे
उंचहा डारा ले ओहर उडि़स परेवा कस
धरती ला छोडि़स त गिरीस बदाक ले
ओखर ले दुरिहा के जानेंव मैं सब ल
सुरता लमिस त भगवान कस जानेव
मरहा जान के ओला डेहरी बइठारेंव
हांडी-बटकी ले गइस तभे पहिचानेंव
फरै ना फूलै कतको डारा ल सींच ले
जरी ला सींचबे तभेच सेवाद ला पाबे।

2


सड़क म जगा जगा कुआ खोदागे
अंधवा हे सरकार ओमा बोजागे
डूब मरिस सुख्‍खा डबरी म कमइया
पेट ला मारे म ठेकेदार हे आगे
तैं अपन पीरा ला काला गोहराथस
पुलिस के बल म ओ जादा इतराथे
निर्भय चलथे पगड़डी म मनखे
सड़क म चले बर ओहर डेराथे
सड़क हवै चाूनी रफ्तार म
देख के चले घलोक म हपचाथे
मनखे म एक पइत सैतान ल पा जाबे
पथरा ल देबे त भगवान कहां पाबे।

बसंत राघव
पंचवटी नगर, रायगढ़

छत्‍तीसगढ़ी गज़ल – जंगल ही जीवन है

जम्‍मो जंगल ला काटत हन गॉंव सहर सम्‍हराए बर।
काटे जंगल किरिया पारत गॉंव सहर जंगलाये बर।।
जंगल रहिस ते मंगल रहिस, जंगल बिन मंगल नइये।
पौधा रोपन गम्‍मत करथन, फेर मंगल ला मनाये बर।
हरियर रूख, कतको सोंचेन, भितरी म बड़ हरियाबो।
बपरा ते दुनिया छोड़न, रोथन काबर हरियासे बर।
रिसा गइन करिया बादर मन, नास देखके जंगल के।
पहिली बरसे, अब तो रोथें, मन ला बस फरियाये बर।
कुरसी मन जंगल के बदला सकुनी सही चुकावत हे।
उदिम करत हे मनखे कतरके, जंगल फेर बनाए बर।
जंगल छोड़े बंदर भालू सहर म अउ खूंखार बनिन।
दांत अउ नख खुरसी बनगे, लगिन देस ला खाये बर।
जंगल सही बड़े मन ह अब, छोटे मन ला खावत हें।
देस भक्ति अब धंधा बनगे, धन रूपिया ला कमाये बर।
मदरस भरे लबालब छत्‍ता, फेर माछी मन भूख मरंय।
चूहकत हें भालू मन सत्‍ता चढ़के अबड़ मोटाये बर।
अब रजधानी जंगल बनगे, सबो जानवर जुरियागे।
कोनो खोजंय सिकार, लुकाये कोनो, जान बंचाए बर।
बेंदरा मन कूदत हें, धरके हॉंथ म सत्‍ता के हथियार।
ऑंखी खोलव मन ला जोरव देस ला अपन बचाये बर।
मनखे बनके फेर जगावन जंगल जीवन के खातिर।
अलगे राखव सहर ल, जीवन ला हरियासे खातिर।

डॉ. प्रभंजन शास्‍त्री
बागबहरा

छत्‍तीसगढ़ी गज़ल – कागज म कुआं खनात तो हे

मनखे मनखे ल मठात तो हे
अन कइसे मनखे बतात तो हे।
मोर हाथ म टंगली नइते ह,
कोनो जंगल फटफटात तो हे।
मोर पियास के सुन के सोर,
कोनो तरिया के पानी अंटात तो हे।
सेयर घोटाला मेच फिक्सिंग चारा घोटाला चल,
कुदु कर के देख के नांउ करा त तो हे।
इहां इमानदार के कमी नइये,
बैंक के किस्‍त ला पटात तो हे।
ये मचहा वाला ले तो कोंडा ह बने हे,
चल दुदुकाही गोठियात तो हे।
रन रन रन वाली मिलही करेंठ
कागज म कुआं खनात तो हे।

नारायण बरेठ
गोपिया पारा, अकलतरा, 
जिला – बिलासपुर, छ.ग.

छत्तीसगढ़ी गज़ल : पीरा संग मया होगे

अइसन मिलिस मया सँग पीरा,
पीरा सँग मया होगे.
पथरा ला पूजत-पूजत मा,
हिरदे मोर पथरा होगे.

महूँ सजाये रहेंव नजर मा
सीस महल के सपना ला ,
अइसन टूटिस सीस महल के
आँखी मोर अँधरा होगे.

सोना चाँदी रूपया पइसा
गाड़ी बंगला के आगू
मया पिरित अउ नाता रिस्ता
अब माटी – धुर्रा होगे.

किरिया खाके कहे रहे तयं
तोर संग जीना-मरना हे
किरिया तोड़े ,सँग ला छोड़े
आखिर तोला का होगे .

जिनगानी ब्यौपार नहीं ये
मया बिना कुछू सार नहीं
तोर बिना मनभाये- संगी
जिनगानी बिरथा होगे.

अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर,दुर्ग
(छत्तीसगढ़)


अरूण कुमार निगम जी के ब्‍लॉग –

अरुण कुमार निगम (हिंदी )
SIYANI GOTH
mitanigoth
अरुण कुमार निगम (हिंदी कवितायेँ)

मुकुन्‍द कौशल के छत्‍तीसगढ़ी गज़ल

चुनई के हांका परगे भईया बेरा हे तय्यारी के।
अटक मटक के नाचै बेंदरा देखौ खेल मदारी के ।।
गॉंव गँवई के पैडगरी हर सड़क ले जुर गेहे तब ले।
गँवई-गॉंव मॉं चलन बाढ़गै मधुरस मिले लबारी के।।
बोट के भुखमर्रा मन अपन गरब गुमान गॅवा डारिन।
इन्‍खर मन के नइये जतका इज्‍जत हवै भिखारी के।।
गॉंव के छेंव म भट्ठी खुलगे, धारो धार बोहा लौ रे।
पानी भलुक मिलै झन तुँहला, अपन-अपन निस्‍तारी के।
निरमल रहिस सियानी तेमां, राजनीति के हबरे ले।
घर-घर मा करखाना खुलगे, निच्‍चट गिल्‍ला-गारी के।।
ये हॉंसी के मड़ई मा संगी, कोन बिसाही पीरा ला,
चारो मुढा हाट लगे हे, आरूग चुगली-चारी के।।
मंदिर मा मुह देख के पूजा, खीसा तउल मिले परसाद।
खुद भगवान बेंचावत हे तो, का हे दोस पुजारी के।।
ये पहरो के खेल मा संगी, पारी आ गै जे मन के।
का गोठियाबे खेल-खेल दिन बोमन हमरो पारी के।।

000

मया पिरित संग हॉंसै-बोलै, ओखर दिल दरिया हो थे।
जे हर मूंह फुलाए रहिथे, मन ओखर करिया हो थे।।
सिधवा मनखे सुख अउ दुख ला, फरिया के गोठिया देथे।
लेवना चुपरे कस गोठियावै, ते हर मिठलबरा होथे।।
पहिली घर के नेत मढ़ा ले, तेखर पीछू मिलकी मार,
मछरी उंखरे हाथ म आथे, जेखर तिर चुरवा होथे।।
करिया कपड़ा पहिरेकर अउ, झुलुप घलो छरिया के राख,
दारू पी के झूपै जे हर, वो पक्‍का बइगा होथे।।
एक्‍कड़-डिसमिल के मतलब, इन डेरा के मन का समझैं,
का जानै इन बसुंदरा मन, का रकबा खसरा होथे।।
कुरसी पा के नेता मन अउ, साहेब बाबू भईया मन
अपन ददा ला तक नई चीन्‍हें, तौ हमला पीरा होथे।
कटहल के पसरा म कौशल, मोल लिमउ के का करबे,
सबले चुरपुर होथे तेहर, नानेकुन मिरचा होथे।।

000

तहीं बता ये कुदरा मन ला घर कहिथें
चिरहा-फटहा जठना ला बिस्‍तर कहिथें
बोलत खानी सोंच समझ के बोले कर,
बइहा मन बम्‍हरी के रूख ला बर कहिथें।
जियत बाप ला डेड कथें वो लेड़गा मन
जे मन अपन पुजेरी ला फादर कहिथें।
झिमिर झिमिर बरसिस ते का ब‍रसिस संगी,
ठाढ़ दमोरे तउने ला बादर कहिथें।
खरही ला राखे रहिथे रखवार असन
ब्‍यारा के वो रूंधना ला राचर कहिथें।
मुस्किल के दहरा म बूड़े मनखे ला,
जे उबार लै तउने ला ईस्‍वर कहिथें।
जिव हर बने जुड़ावै ‘कौशल’ जेखर ले,
अइसन बोली भाखा ल मंतर कहिथें।


000

दिन अलकरहा लागत हावय

मन के मया नंदावत हावय।।
रेंगत रेंगत लगिस थकासी,
समे घलव सुस्‍तावत हावय।
पतरी चांटत हावय मनखे मन
कुकुर ह गंगा जावत हावय।
मिठलबरा, अब चेत के रहिबे
बेरा हर अंटियावत हावय।
सूपा धरे बिहिनिया आके
किरन ला परियावत हावय।
मन हर फींजे कस लागत हे,
कौशल पंहुचो गावत हावय।

मुकुन्‍द कौशल
एस.एम. 516,
पद्मनाभपुर, दुर्ग, छ.ग.

सी.पी.तिवारी ‘सावन’ के छत्‍तीसगढ़ी गज़ल

गरिबहा मन ला रोजे रोज अपन करम उठाना हे
संहीच मा भइया बडहरे मन के ये जमाना हे।
का कोनो ला दीही ओ बपुरा भिखमंगा हा
जुच्‍छा-जुच्‍छा गाना हे, जुच्‍छा अउ बजाना हे।
बाप के कमई मा भला बेटा ला का लागही
फोकट के खाना हे अउ गुलछर्रा उड़ाना हे।
जेखर उठना, बइठना हे मंतरी, संतरी संग
जेखर गोठ हा भईया इंहा सोला आना हे।
बने के संगति बने अउ गिनहा के गिनहा
गहूं के संग किरवा ला घलो पिसाना हे।
चलव सब्‍बो जुर मिल के करन हमन परन
छत्‍तीसगढि़या भाखा ला चारो मुड़ा फईलाना हे।

X X X

जीव ला कखरो कलपा के तंय दुन्‍नो खीसा भरबे का।
घूस घलव हे चोरी डाका ले नरक म परबे का।।
बने असन फोरिया ले तै हा का सच हे का झूठ हवय।
सक सुबहा म बिन फोकट के घर मा झगरा करबे का।
ये नसा नास के जर होथे तेला तहूं तो जानथस।
मरे जिये ले दारू पीके जियत जियत मरबे का।।
येती वोती चारो कोती देख ताक के रेंगें कर।
कहूं हपटबे पथरा म तब पथरा संग तै लड़बे का।।
जतका आमद तोर हवय तेखर ले जादा ,खरचा हे।
घर परिवार चलाए बर अब करजा बोड़ी करबे का।।
पारा परोसी के बढ़ती ला फूटे आंखीं नई देखे।
ईरखा डाह जलन के मारे लकड़ी कर तैं बरबे का।
खेत खार के जोखा करले बेरा आगे पानी के।
नहीं त खेती परिया परही गांव गवतरी गिंजरबे का।
ये दुनिया के सागर मा तो दया मया हा डोंगा हे।
बिना डोंगा के सावन भईया बीच भंवर मा बुड़बे का।।

X X X

पहिली अपन रद्दी आदत ला सुधार ले
तेखर पाछू कागज के रावन ला मार ले।
अभी का बिगड़े हे तंय जीयत ले बना,
पाप के रद्दा ला पुन मा चतवार ले।
राम के कथा हवय तियाग के कथा,
इरखा ला तियाग के चोला ला उबार ले।
पढ़ के अउ सुन के रमायन ला गुन,
गियान के उजियार मा आजा अंधियार ले।
छोड़ के मारामारी, लबारी अउ चारी,
सत ला बिसा ले तंय इमान के बजार ले।
कहां जाबे राम ला तैं खोजे बर भाई,
मन के मंदिर मा आरती ला उतार ले।
रावन कस झन हो बइमान अउ घमंडी,
इही सीख ले ले अब दसरहा तिहार ले।
पाछू पछताबे तब का होही ‘सावन’
चार दिन के जिनगानी हे सोंच ले विचार ले।

सी.पी.तिवारी ‘सावन’

श्रीयुत् लाला जगदलपुरी जी के छत्तीसगढ़ी गजल – ‘दाँव गवाँ गे’ अउ ‘जहर नइये’

दाँव गवाँ गे

गाँव-गाँव म गाँव गवाँ गे
खोजत-खोजत पाँव गवाँ गे।
अइसन लहँकिस घाम भितरहा
छाँव-छाँव म छाँव गवाँ गे।
अइसन चाल चलिस सकुनी हर
धरमराज के दाँव गवाँ गे।
झोप-झोप म झोप बाढ़ गे
कुरिया-कुरिया ठाँव गवाँ गे।
जब ले मूड़ चढ़े अगास हे
माँ भुइयाँ के नाँव गवाँ गे।


जहर नइये


कहूँ सिरतोन के कदर नइये
लबरा ला कखरो डर नइये।
कुआँ बने हे जब ले जिनगी
पानी तो हवे, लहर नइये।
एमा का कसूर दरपन के
देखइया जब सुघ्घर नइये।
बिहान मड़ियावत काहाँ चलिस
बूता ला कुछू फिकर नइये।
देंवता मन अमरित पी डारिन
हमर पिये बर जहर नइये।

लाला जगदलपुरी



श्रीयुत् लाला जगदलपुरी जी के छत्‍तीसगढ़ी गज़ल ला हल्‍बी-भथरी भाखा अउ संपूर्ण बस्‍तर के लोक संसार के बिद्वान बड़े भाई हरिहर वैष्‍णव जी ह हमला गुरतुर गोठ खातिर टाईप करके पठोये हावय. उंखर असीस अउ परेम हमला अइनेहे मिलत रहय. बड़े भाई हरिहर वैष्‍णव जी ल पइलगी – संजीव तिवारी