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छत्‍तीसगढ़ी शब्‍द के हिन्‍दी अर्थ और प्रयोग

Shabdkoshपिछले दिनों कुछ शब्‍दों पर आपस में बातें होती रहीं-
अखरा
कोतल
बाहुक
गेदुर
अगवारिन
फाता
डमरुआ
देवारी
लमना
अरमपपई
फुंडहर
सिलयारी
तिरही

गरीबा महाकाव्य (तीसर पांत : कोदो पांत)

३. कोदो पांत

अपन स्वार्थ बर सब झन जीथंय परहित बर कम प्राणी।
पर के सुख बर जउन हा जीयत ते प्रणाम अधिकारी ।।
विनती करों शहीद के जेमन हमला दीन अजादी ।
संस्कृत – साहित्य अउ समाज ला उंकरे लहू बचाइस ।।
“”चलो चलो दीदी ओ
आगू आओ बहिनी मन
काम करे बर हम जाबो ।
धरती के सेवा करबो तब
खाबो अउ खवाबो ।।
घर बइठे मं काम बरकथय
देह हलाए परथय
कामिल मनसे के आए ले
आलस पट ले मरथय.
टोर के जांगर – गिरा पसीना
झींक सरग ला लाबो – – ।।
खेती हा मिहनत ला मंगथय
सब झन जानत एला
तभो लुका के बइठे हव तुम
जइसे नरियर भेला.
उचे काम ला पूरा करके
सुवा ददरिया गाबो – – ।।
आगू असन भेद नइये
औरत – मर्द बरोबर
नवा जमाना आय हमर बर
रखबो दू मन आगर.
हिरदे मं उत्साह ला रख के
आगू पांव बढ़ाबो – – ।.
चलो चलो दीदी ओ
आगू आओ बहिनी मन
काम करे बर हम जाबो – – ।”
इसने गुनमुनात दुखिया हा, आगू तन जावत धर राह
धनवा के खटला हा अभरिस, जानव ओकर फगनी नाम.
फगनी हा खखुवा के कहिथय – “”किरही, कते डहर तंय जात
हमर खार के कांदी लूथस, चोरी करत सरम नइ आय !
सब कांदी के रांड़ बेचागे, तिंहिच हा करथस खुंटीउजार
अगर घुसरबे फेर खेत मं, चुंदी झींक के झड़िहंव खूब.”
फगनी के कहना सुन दुखिया, हाय करत मुड़ ला धर लीस –
गोई, तंय हा समझदार हस, पर काबर बोलत हस अंैठ !
तुम्हर खेत मं कभू गेंव नइ, कभू काट लानेंव नइ घास
टार दई, तब ले झड़कत हस, डारत हवस व्यर्थ के दोष.
अपन राह धर आथंव जाथंव, मुड़ी उठा झांकव नइ भूल
बहिनी, खूब बखानत फोकट, कोचकत हस बात के तिरछूल.”
फगनी बोलिस -“”कलबेंदरी अस, बन निछंद घूमत हस गांव
गली – गली मं गीत सुनावत, युवक ला मोहिनी थापत रोज.
तंय हा “पैंठू’ घुस के रहिबे, जान लेन हम तोर चरित्र
ग्राम सभा मं नाक कटा गिस, थोरिक कर ले एकर याद !
मंय हा जब सच ला बोले हंव, हंसिया अस लूवत हस गोठ
चाल मं कीरा परय दुखाही, मरद बनाबे तंय दस – बीस.
भूले हवस गरीबा संग तंय, खबर ला जानत सब अतराप
नाट कटागे तभो उपरहा, देत प्रमाण – नेक मंय आंव.”
हाथ उचा अउ झुला शक्ति भर फगनी करत लड़ाई ।
दुखिया ओ तिर खड़े कलेचुप – नइ कर सकत चढ़ाई ।।
उहां खड़े कई मांई लोगन, केजा हा कहिथय कर व्यंग्य –
“”दुखिया दुश्चरित्र नवयुवती, ओकर पास लाज ना शर्म.
गांव गली मं घूमत रहिथय, गाथय सुवा – ददरिया गीत
ओहर लोकगायिका होगिस, एकर साथ करत हे नाच.”
फेंकन बोलिस -“”मंय बतात हंव – जेकर रहिथय पतित चरित्र
ओहर कई ठक नाटक करथय, अइसन गुण दुखिया मं खूब.
एहर गलत राह पर चलथय, यदि दूसर हा करिहय साथ
ओमन घलो पतित हो जाहंय, बिगड़ के रहिहय ओकर चाल.
दुखिया ला का बद्दी देवन, कहां गथेलही ला कुछ लाज
खुद बिगड़त अउ पर ला धोहय, एक जगह ले पर ठंव खाज.”
सोनू हा फगनी ला छेंकिस -“”बहू मचा झन फोकट शोर
छोटे मन संग मुंह टकरा के, अपन हाथ खुद पत झन बोर.
एमन दू कउड़ी के होथंय, इंकर जाय नइ इज्जत – आन
पर हम बड़े गोसैंय्या होथन, इहिच वजह घट जाहय मान.”
मण्डल आभा मार बकत हे, ऊपर ले ललियावत आंख
मगर कोन हा ओला छेंकय, सोनू बिफड़ के करही खाख.
उहां बिलमना हवय निरर्थक, दुखिया चलिस छोड़ फरफंद
घास लाय बर ओहर चल दिस, काबर करय काम ला बंद!
हंसिया मं कांदी लू डरथय, बना लीस बोझा बड़े जान
बोझा ला उठाय बर सोचत, पर आखिर मं खावत हार.
ओहर फूलबती ला देखिस, पास बलाय दीस आवाज –
“”तंय हा झपकुन पहुंच मोर कर, तोर पास आवश्यक काम.
बोझा हवय गंज अक भारी, तब उठाय बर मुस्कुल जात
तंय हा मोर मदद कर थोरिक, बोझा ला रख दे सिर मोर.”
फूलबती हा तिर मं अमरिस, दुखिया के संग करत मजाक –
“”ऊहुंक, मोला नेम कुछुच झन, तंय झन राख आसरा मोर.
तंय हा कांदी लुए हवस अभि, फगनी के चक के ए घास
यदि फगनी हा सच ले वाकिफ, ओहर बना दिही गत मोर.”
दुखिया कथय -“”डरा झन मोला, तुरूत पहुंच फगनी के पास
मंय हा नीयत ला बोरे हंव, खोल दे सफ्फा ओकर पोल.
मोर विरूध्द गवाह घलो बन, एकर बदला अमर इनाम
यदि तंय कहूं ले लाभ ला पावत, मंय हा सब ले अधिक प्रसन्न.”
फूलबती हा दीस पलोंदी, दुखिया के सिर रख दिस घास
फूलबती हा करिस दिल्लगी -“”मंय हा देवत नेक सुझाव –
फगनी के घर तन ले झन जा, फेर लड़ई उठ सकत तड़ाक
तंय हा दूसर तन ले घर जा, खुद ला बने सुरक्षित राख.”
दुखिया कथय -“”बंड हंव मंय हा, मंय होगेंव बहुत बदनाम
एक बार जब नाक हा कटथे, ओकर नाक बढ़त हे लाम.”
दुखिया जब घर मं पहुंचिस पूछत हे अंकालू ।
मंय हा एक खबर अमरे हंव ओहर सच के झूठा ।।
तंय अउ फगनी लड़ई करे हव, सोनसाय तक बोम मचैेंस
आखिर तोर कुजानिक कतका, झगरा के कारण ला फोर. ?”
दुखिया कथय -“”सुने हस तंय हा, बिलकुल सच ए पवन समान
सोनू – फगनी – गांव के महिला, ताना मार लड़िन हें खूब.”
अंकालू हा कथय क्रोध कर -“”वाकई दिखत तोर अन्याय
बकचण्डी डांटत का मेचकी, काबर लेगेस ओ बल पांव !
खेत जाय बर राह बहुत ठक, तंय हा धरते दूसर राह
मण्डल मन ले दुरिहा रहिते, उठ नइ पातिस लड़ई – बवाल.
लेकिन तंय हा जिद्द करत हस, पूरा करे अपन भर टेक
तंय हा कतको मार सफाई, पर सब गल्ती हा बस तोर.”
पुत्री हा बदनाम होय झन, दंहसत देवत बखलत बाप
दुखियावती सुकुड़दुम ठाढ़े, ओकर ऊपर दुख के ताप.
इही बीच मेहरुकवि पहुंचिस, अंकालू ले मंगिस जुवाप –
“”दुखिया ला तंय काबर डांटत, आखिर बपरी के का दोष ?
मानव सदा शांति ला भावत, दूर रखत हे उग्र – तनाव
पर जब तंय हा बोम मचावत, कुछ ना कुछ कारण हे ठोस ?”
अंकालू हा सत्य निखारिस -“”मोर तर्क ला तंय सुन साफ
कतको गल्ती करंय दुसर मन, मगर हमर पर दोष के मार.
चक्कू ला कोंहड़ा पर मारो, चक्कू पर कोंहड़ा ला राख
चक्कू के उद जरय कुछुच नइ, कोंहड़ा हा कट के कई भाग .
आज लड़िन दुखिया अउ फगनी, दुनों पक्ष तन गल्ती होय
पर फगनी पर दोष आय नइ, ओहर हवय सदा निर्दाेष.
दीन – हीन पर गल्ती आथय, तब दुखिया पर आहय दोष
एकरे बर मंय करत प्रताड़ित, दुखिया खुद मं लाय सुधार.
“”मेहरू कथय – “”विचार हे उत्तम, पर ला झन बांटव उपदेश
एकर बदला खुद ला बदलव, अपन मं लानव सुघर सुधार.
सोनसाय ला घलो देख तंय, पर ला समझत हे निकृष्ट
धनवन्ता मन इसनेच होथंय, जश्न मनाथंय पर पत लूट.
मण्डल अपन ला पुंजलग समझत, बेढ़े जावत हवय अकास
धन हा ओला अंधरा कर दिस, ओढ़े हवय गरब के खाल.”
अंकालू कहिथय -“”ठंउका अस, सच रहस्य खोले हस आज
सोनू के धन उरक जहय तंह, रांड़ बेचा जाहय सब टेस.”
“”बात उही तंय समझ पाय नइ, मोर डहर दे थोरिक कान
जेकर तिर धन तेहर करथय, खो खो भूंज खाय इंसान.
सोनू अभी पइसहा मनखे, करत भयंकर अत्याचार
यदि दूसर तिर ओ धन जाहय, उहू करय नइ कुछ उद्धार.
मानव हवय अपंग – विवश अस, पूंजी करत गलत या नीक
जहां समान सबो तिर बंटिहय, ककरो मुड़ पर नइ बदनाम.”
मेहरुकतको फुरियाइस पर नइ मानिस अंकालू ।
बोलिस -“”काबर कहत लबारी – तेल दीस कब बालू ।।
तुम कवि मन असत्य ला लिखथव, विचरण करत कल्पना लोक
जउन बात हा रथय असम्भव, यत्न करत हव सम्भव होय.
मृगतृष्णा जल हरिण हा पीथय, पर बुझाय नइ ओकर प्यास
तब पूंजी ला कोन बांटिहय, कहां सबो झन एक समान !
अमृत असन झूठ बोले हस, अमृत हा यथार्थ नइ होय
पर ओहर हा होथय कहि के, मनसे करथंय झूठ प्रचार.
मोर अउर सुन बात एक ठन – सोनू जब लानिस विद्धान
ओमन हांक बजा के बोलिन – कोन हा करही एक समान !
पुरबल कमई ले बड़हर हिनहर, करनी भोगत जइसन भाग
मनसे पास कहाँ कुछ ताकत, कर दे एक देवारी फाग !
बेर दिया तारा में अंतर, कमती अति हे उंकर प्रकाश
उंकर प्रकाश कोन हा बांटय, बंटन सकय नइ एक समान.”
“”इही विडम्बना हे समाज मं, शिक्षित मन फइलावत भ्रांति
अटपट तर्क रखत ते कारण, सफल होन पावत नइ क्रांति.
तुम किसान मन जांगर पेरत, तभे हाथ मं आत अनाज
उसने भाग्य के बात ला छोड़व, भेद के शासन खुंटीउजार.”
ए चर्चा हा उरक जथय तंह, मेहरुलेत एक ठक भेद –
“”जेकर घर सगियान छोकरी, ओ मनखे ला जेवत फिक्र.
दुखिया के शादी जमाय बर, खोजे हस का कहूं दमांद
अगर मिलिस तब बता भला तंय – हलका करत हवस कब खांद?”
अंकालू कल्हरिस -“”का बोलंव, घुप अंधियार सुझत नइ राह
मोर अस कंगला के लड़की संग, कोन झपात करे बर ब्याह !
लाहो लेत टुरा वाले मन, मांग रखत सक – अधिक दहेज.
करना पूर्ति कठिन काबर के – मंय रूपिया नइ रखेंव सहेज.
जम्मों कमई पेट के चइ गिस, ऊपर ले टोंटा भर कर्ज
दुखिया के बिहाव हा बिलमत, पूर्ण होत नइ पिता के फर्ज.”
मेहरुदीस समर्थन -“”सच हस, एकरे कारण गिरत समाज
लड़की, लकड़ी असन भुुंजावत, बपरी के बेचात मरजाद.
पहली युग भी रिश्ता जोड़िन, तुलसी – बाल्मिकी ब्याह रचैन
ओमन अड़बड़ योग्य ज्ञानधर, पर दाईज मं कुछ नइ पैन.
वर – वधु दुनों बरोबर किमती, होय चही नइ उनकर मोल
लेकिन पूंजीवाद केयुग तब, मानवता के पेट मं खोल.
एकर मतलब अइसन नइ के खो देवन जिनगानी ।
एहर कायरता नासमझी खुद चोला के हानी ।।
रूढ़ि नियम संग बजनी बाजव, अनियायी के संग संघर्ष
तब जग नवा – प्रगति हा दुगना, कदम चूमिहय खुद सुख हर्ष.
अउ फिर सब नइ एक बरोबर, हर झन कहां लालची भ्रष्ट !
कतको समझदार आदर्शी, फूलत कमल फूल जस कीच.
इही गांव मं हवय गरीबा, जेकर चाल आचरण ठीक
ओकर संग संबंध जुड़त हे, लड़का लड़की जोड़ी नीक.”
अंकालू हा स्वीकृति देइस -“”बने कहत हस दिल ला खोल
यदि दुखिया के हाथ हा पींयर, आय हाथ मं भागत ओल.
पर सुध्दूु तिर बात होय नइ, ओकर ले नइ मंगेव जुवाप
खोजत बुद्धिमान अस सटका, काम बनावय रिश्ता खाप.
एक बात बर मन डर्रावत, लगा सकंव नइ दाइज रास
यदि राहू अस बीच मं बाधा, मोर दीन बर जग अधियार.”
“”सुध्दू तिर मंय थहा लगाहंव, होय गोठ के करिहंव जिक्र
खुशी के कलेवा मंय पाहंव, अगर समाप्त तोर सब फिक्र.
ओमन घलो कमइया मनखे, गिरा पसीना पावत खाय
रखत उंकर पर बिकट भरोसा – लालच नइ मरिहंय धन पाय.”
अंकालू ला दीस आसरा, अब मेहरुहोवत चुपचाप
अंकालू के मन हा फूलिस , लगत खतम चिंता संताप.
मेहरुउसल चलिस ओ तिर ले, हो गिस भेंट गरीबा – साथ
मेहरुहंसिस – “”याद आवत मं, भूत हा हाजिर होत दड़ांग.
गोठिया आय तोर संबंधित, एक ठउर मं हार जबान
रखत तोर पर बहुत भरोसा – मोर बात के रखबे मान.”
कथय गरीबा – “”सफा फोर – झन छितरा शंका लाई।
तोर वचन ला मान दुहूं – यदि दिखिहय मोर भलाई।।
मेहरुमन मं लुका नइ राखिस, सम्मुख खोल दीस सब हाल
सुनत गरीबा हा मुसकावत, ओकर मुंह पताल अस लाल.
कहिथय -“”एक प्रश्न मंय ढीलत, करबे झनिच मोर पर क्रोध
पाय पारितोषिक बिहाव पर, करत हवस का कोई शोध ?”
मेहरुबोलिस -“”ठीक गहत हस, मंय हा करत “विषय’ पर सोच
काबर के लघु बात छुटई मं, देश समाज मं परगे लोच.
जानत हवस फिरत ला तंय हा, जेहर दुश्चरित्र इंसान
ओकर संग इसने चर्चा तंह, ललिया गीस जेठ कस घाम.
बोलिस “”कभू बिहाव करंव नइ, जग मं अउर गंज अक काम
रहि स्वतंत्र जन सेवा करिहंव, चहत उठाना गिरे समाज.”
अइसे ओकर मुंह बोलिस पर, कतको अबला साथ कुकर्म
कतको झन ला नरख ढकेलिस, फोर बताय मं आवत शर्म.”
कथय गरीबा -“”सच बताय हस, कथनी करनी मं हे भेद
मगर मोर पर राख भरोसा, मानवता पर करों नइ छेद.
दुखिया हा पसंद हे मोला, हमर दुनों के फबिहय जोड़
अंतिम क्षण तक रबो एक संग, अन तन नइ जावंव मुंह मोड़.”
मेहरुरखे एक ठक दैनिक, जेकर नाम हे – ग्रामोत्थान
एक चित्र हा छपे हे ओमां, फट ले परिस गरीबा के आंख.
कथय गरीबा – “”छपे पत्र मं, ओहर हा भारत के चित्र
पर उपकार करिस ते कारण, महमहात हे यश के इत्र.
मुढ़ीपार मं कतको जन पर यहू एक झन प्राणी ।
जेहर अपन देश बर खोइस रतन असन जिनगानी ।।
जीयत रिहिस बांकुरा भारत, भेंट करेंव मंय ओकर साथ
बात ढिलिस मदरस अस मिट्ठी, सुन के मंय हो गेंव सनाथ.
यद्यपि भारत पुन& मिले बर, करिस प्रतिज्ञा कई – कई बार
लेकिन ओकर मुख दर्शन नइ, जय जोहार तक नइ एक बार.”
मेहरुकथय -“”गरीबा भइया, मत हो दुखित – ना मर अफसोस
भारत पर अपराध लगा झन, झनिच डार ओकर मुड़ दोष.
भारत बपुरा कहां ले आतिस, दुश्मन करिस चढ़ई तनतीन
उहिच युद्ध मं मृत्यु शत्रु हा, हमर ले भारत ला छिन लीस.
छेंक गरीबा बात उठाथय -“”मोर कुजानिक करबे माफ
भारत – कथा ला जानत थोरिक, मगर पता नइ फरिहर साफ.
यदि तंय जमों कथा ला जानत, खोल भला जीवन के पृष्ट
मंय हा दोष ढिलत भारत पर, तउन भूल के होय सुधार.”
मेहरुकिहिस – “”जमों कहिहंव पर रखत कहानी बाकी ।
ओकर पूर्व देखाय चहत भारत के जीवन झांकी ।।
मुढ़ीपार मं मिल जुल मानिन, हर्षित कर पुन्नी तिवहार
काम धाम हा कड़कड़ रुकगे, कोन करय मिहनत जा खार !
जउन जगह बाजार हा लगथय, उहां युवक मन सकला गीन
उंकर बीच टीकम हा बोलिस -“”तुम्हर लइक हेरत मंय गोठ.
बुजरुक मन हा दौड़ सकंय नइ, तब ओमन भंजात हें न्याय
लेकिन हम हा खेल सकत हन, काबर गप झड़ समय गंवान !
यदि सब के मन खेल करे बर, खेल कबड्डी होवन देव
जेन आदमी ला नइ भावत, ओहर छेंक सकत बिन भेव.”
भारत स्वीकृति दीस तड़ाका -“”तुम सुझाव देवत हव नेक
इसने खेल, खेल सकथन हम, कभु नइ खेलन सकन क्रिकेट.
ओकर बर कंस रुपिया लगथय, चले जात हे समय बेकार
बने रहय सुर पूक कबड्डी, एमां कहां होत धन ख्वार !”
सब जवान मन फट रजुवा गिन, हर्ष जमाय कबड्डी खेल
दू दल बंट के शुरुकरिन अब, एक – दुसर के हेरत तेल.
दउड़त तूकत पकड़त झींकत, जमों खिलाड़ी मन मं जोश
कतको थके पिरावत तन पर, उझले परत उंकर उत्साह.
भारत हा खुडुवाय गीस अउ कूदिस दूसर कोती ।
दुसरा दल ला झुझकावत हे खिरखिंद एती – ओती ।।
अरि दल भारत ला पटके बर, करत यत्न एक सुम्मत बांध
तभे उदुप भारत हा झुझका, छुइच दीस देवलू के खांद.
प्रतिद्वन्दी मन बिकट खार खा, पकड़ लीन भारत के गोड़
भारत गिरगे तभो बढ़त हे, ताकि हार झन जावय होड़.
शक्ति लगा – पेटघंइया घसलत, पहुंच के छू दिस डांड़ टपाक
भारत अपन विरोधी दल के, बुचुवा कर दिस लम्हा नाक.
प्रतिद्वन्दी टीकम हा बोलिस -“”भारत, तंय हमला झन हांस
तंय मरगे काबर के टुटगे, डांड़ छुए के पहिलिच सांस.”
हार गीन प्रतिद्वन्दी तब ले, जीत गेन कहि करत लड़ई
भारत उंकर गोठ फांकिस तंह, ओकर ऊपर करत चढ़ई.
भारत ला मारत जबरन भिड़, बंगी पढ़त अनाप शनाप
भारत के दल निर्बल हे तब, प्रतिद्वन्दी नइ पावत ज्वाप.
तभे विरोधी बोंगडू हा खब, भारत के अधिकार मं अ‍ैस
ओला भरता असन बनावत, ओकर उपर उतारत झार.
तुरुत विरोधी दल हा भिड़थय, करा लीस बोंगड़ू ला मुक्त
देवलू हा भारत ला बोलिस -“”होवत इहां प्रेम के खेल.
तंहू हा अपने खेल देखा ले, एकर बाद लहुट घर जाव
लेकिन तंय हा खूब लड़ंका, हमर गड़ी ला रचका देस.
हमर ले झगड़े मं का मिलिहय एक गांव के भाई ।
नता मया ला भूल के कोड़त हस दुश्मनी के खाई ।।
यदि खरथरिहा वीर बांकुरा, समझ तहस खुद ला हुसनाक
होव सम्मिलित सेना मं तुम, ककरो तिर बताय बिन हांक.
भारत माता के सेवा कर, बाहिर शत्रु ले बचवा देश
पर उपकार करे बर भिड़बे, तंहने कोन मारिहय ठेस !”
बोंगडू हा गुचकेला खाईस, तब ओकर आवत हे याद
ओहर कथय व्यंग्य के भाषा -“”मंहू देत हंव नेक सलाह –
अगर देश बर जिनगी चंदन, ओकर घलो सुखद अंजाम
तोला मान बड़ाई मिलिहय, नाम अमर जब तक हे चाँद.”
प्रतिद्वन्दी मन देवत ठोसरा, भारत एल्हई सुनत चुपचाप
खेल जमाय आय भारत हा, इहां परत हे बद के थाप.
बात के बान हा बेध करेजा, करिस घाव – गोदर बड़े जान
पर कोई ला कुछ नइ बोलिस, मुड़ निहरा के गीस मकान.
अंतस दरद प्रकाश लात नइ, चेहरा रौनक कर मुसकात
खटला अमरउती झन जानय, तइसे गुरतुर बात चलात.
पहिली गवन आय अमरउती, धीरे अस बोलत मर लाज
भारत डहर देख के तिरछा, मुच मुसका के काम बजात.
इही बीच दुन्नों झन देखिन – चिरई गोड़ेला मन एक ठौर
नर – मादा मन चोंच जुड़ो के, चारा बांट उड़ावत कौर.
तब नर भड़क के मादा ऊपर मारिस चोंच दुधारी ।
मादा रुठ दुसर ठंव गे तंह नर ला फिक्कर भारी ।।
गिड़गिड़ात मादा के तिर मं, क्रोध खतम बर करत उपाय
पर मादा के रिस अउ भड़कत, नर कोती देखत कर लाल.
किसनो कर भुरिया मादा ला, कर दिस खुश ढिल गुरतुर बोल
मादा के मन मैल धोवा गिस, फेंकिस कपट दुराव टटोल.
दुनों चिरई फिर चिंव – चिंव चहकत, प्रेम सिंधु बुड़ डुबकी लेत
भारत, अमरउती ला नोखिया, केंवरी गाल चिकोटी देत.
भारत हा पत्नी ला बोलिस -“”देखे हवस चिरई के हाल
मादा के रिस बढ़े पुरा अस, नर हा मना लीस कहि मीठ.
पर तंय हा कभु क्रोधित होबे, मंय हा नइ मनांव कभु भूल
ऊपर ले तंय जेवन देबे, मोर बात के करबे मान.”
अमरउती हा हंस के बोलिस – “”तोर बात हे अस्वीकार
यदि तंय मोला नइच मनाबे, मंय हा रुठ हटहूं दूर.
तंय हा कतको जेवन मंगबे, पर मंय नइ मानंव आदेश
तंय हा परेशान यदि होबे, मोर हृदय मं खिलिहय फूल.”
“”तंय पांडादह ला जानत हस, ओहर हा ऐतिहासिक ठौर
अगर उहां के मंड़ई अउ मेला, तब का करबे कहि तंय साफ ?”
“”वइसे रिस मं चूरत रहिहंव, मगर मंड़ई मं जाहंव साथ
मनसे हा यदि लाभ ला पावत, छोड़य तुरुत शत्रुता – क्रोध.”
उदुप बिलई हा चिरई के तिर गिस, अउ नर ला धर लीस खबाक
पकड़ शिकार बिलई हा भागत, ठउर सुरक्षित कोती ताक.
बिलई ला भारत हा कुदाइस अउ, दोहनिस रगड़ के कमचिल एक
बिलई दरद मं करला भागिस, धरे तेन तन चिरई ला फेंक.
मगर चिरई के जीव कतिक अस, तुरूत निकल गिस ओकर जीव
मादा निज जोड़ी तिर पहुंचिस, खूब विलाप करत भर शोक.
भारत देखिस दारुण घटना, बात करत अमरउती साथ –
“”चिरई बिचारी बाय बियाकुल, जोड़ी बिन असहाय अनाथ.
ओमन का सोचिन भविष्य बर, पर सब सपना सत्यानाश
अब मादा के जीवन दूभर, ओकर हालत दिखत हताश.”
अमरउती बोलिस -“”सच मं बुड़गे चिड़िया के नैया ।
जिनगी के कुछ कहां ठिकाना घरी घाम – पल छैंहा ”।।
भारत देख के उत्तम अवसर, अमरउती ले मंगत जुवाप –
“”मंय हा एक प्रश्न पूछत हंव, झनिच समझबे बात खराब.
अगर तोर ले बिछड़ जात हंव, या बन जहंव काल के ग्रास
तंय का उदिम या रउती करबे, सच ला फुरिया फोंक ला छोड़ ?”
“”काबर अशुभ गोठ हेरत हव, का मतलब पहिली कर सोच
जीवन बाग लहलहावत मं, पतझड़ ला झन लाव खरोंच.”
“”घट सकथय बिन सोचे घटना, कभु उड़ सकथे जीव अमोल
अपन जिये बर तंय का करबे, हृदय खोल के सच ला बोल ?”
“”वइसे मंय कह सकत लबारी – जीवन मोर, तोर बिन लाश
अगर तुम्हर पर मृत्यु ही विजयी, झटका जहय भविष्य प्रकाश.
मछरी हा जल बिन पटियाथय, पानिच बिगर सुखाथय धान
तइसे पति विहीन मंय अबला, क्षण अंदर तज देहंव प्राण.
पर तुम सच उछराय चहत तब, उत्तर देवत सोच विवेक –
तुम्हर उपस्थिति मं मंय पावत, अनसम्हार अक सुख आनंद.
पर कहुं तुम हो जाहव चंदन, तब ले प्राण देंव नइ भूल
पर का उदिम उमझ नइ आवत, रवन निकाल देव अनुकूल ?”
भारत किहिस -“”तोर अस जग मं मिलथय बिरला नारी।
जेहर छल प्रंपच ले दुरिहा नइ झड़काय लबारी ।।
छाती गर्व से लफ लफ फूलत, खुश कर देस सच भात परोस
तोर अस खटला अमर धन्य मंय, संसो खतम – पूर्ण संतोष.
रुढ़ि विचार ला भगवाये बर, मांईलोगन मरद समान
ककरो ऊपर बोझ बनय मत, तब कर सकत अपन कल्याण.
जे संघर्ष ले लुका के भगथय, ओकर मिलत बुरा परिणाम
अपन हाथ मं जिनगी छिनना, डरपोकना कायर के काम.
लक्ष्मीबाई विधवा होगिस, सती होय कूदिस नइ आग
ओहर दुश्मन साथ युद्ध कर, दुश्मन के निकाल दिस कांच.
तिसने मोर बिना साहस कर, मिहनत बजा पाटबे पेट
गिरे सर्वहारा संग सुंट बंध, शोषक संग भिड़बे नकसेट.”
भारत हा गंभीर हवय अउ, बोलत तेन हा वजनी ठोस
अमरउती ला अचरक होवत, समझ ले बाहिर बात के अर्थ.
अमरउती पूछिस -“”तुम काबर, असमय देत ज्ञान उपदेश
काय कार्यक्रम ला जोंगत हव, साफ सुनाव अगर नइ क्लेश ?”
भारत किहिस -“”रहस्य ला खोलत, मोर बात सुन कान ला खोल
अपन देश बर होय समर्पित, मन जोसियात देत हिचकोल.
मंय हा सैनिक बनना चाहत, तंय सम्मुख रख मन के भेद
यदि पठोय बर स्वीकृति देवत, मोर उड़ाहय चिंता खेद.”
“”सेना मं अवश्य तुम जावव, करना चहत काम जब नेक
भले मोर पर दुख हा आये, पर बन ढीठ करंव नइ छेंक.”
भारत ला कर्तव्य पूर्ण बर राह दीस अमरौती ।
भारत के शंका मिटगे तंह चमकत आंख के ज्योती।।
वाकई एक दिवस भारत हा, छोड़िस औरत मया मकान
सेना मं नियुक्ति पत्र पा लिस, निज योग्यता के राख प्रमाण.
पूर्ण प्रशिक्षण अमर के भारत, जीतिस देशभक्ति वि·ाास
ओकर बल ईमान बुद्धि के, समता बिरले जन के पास.
उदुप एक ठक शत्रु राष्ट्र हा, हमर देश संग युद्ध उठैस
भारत देश परिस अचरझ मं, कते डहर ले आफत अ‍ैस ?
आखिर काय करय भारत हा, देवत हे अन्याय के ज्वाप
सेना ला आज्ञा कर भेजिस – अरि के रगड़ा टोरो छाप.
सब सैनिक मन संग भारत हा, दुश्मन ला जुवाप कंस देत
बोइर सहि भर भर झर्रावत, बइरी मन पटात रण खेत.
तभे वीर भारत पकड़ा गिस दुश्मन मन दिन धोखा ।
जस अभिमन्यु बांकुरा ला तिर लिस अरि के सोखा हा ।।
दुश्मन के अधिकार मं भारत, पात कष्ट खावत कंस मार
बइरी मन रहस्य ला पूछत, भारत ला बनाय गद्दार.
कहिथंय – हमर पास तंय फुरिया – अपन फौज के जम्मों राज
बता महत्व के ठंव जेमां हम, बम ला पटक सिधोवन काम.
अगर बेंझाय रहस्य लुकाबे, निछ देबो हम चमड़ी तोर
फोकट जान गंवाये परही, बिन कसूर कट गिरथय पेड़.”
भारत सोचिस – “”यदि बतात नइ, एमन चमड़ी लिहीं ओदार
बन परपन्ची भेद ला उगलत, अपन हाथ मं देश हा ख्वार.
एक डहर हे गहिरी खाई, दुसर डहर मं कुआं खनाय
पर आवश्यक पार के नहकइ, ताकि सफल होवय उद्देश्य.
देश के रक्षक समझ के भेजिन, तेमां लगिच जाय झन दाग
कर कर्तव्य देश पत राखंव, बोवत बिरता लगा दिमाग.
कहिथय -“”तस्कर चोर बिकत यदि, अनसम्हार अक झोरत नोट
पर मंय हा रहस्य ला देवत, पाहव तुमन जीत लहलोट.
मोला जब गद्दार बनावत, तुम्हर वजह मंय हा बदनाम
एकर एवज तुमन का देहव, सुनना चहत कतिक अस दाम ?”
भारत के कहना ला सुन खुश होवत अरि – अधिकारी ।
सोचत – यदि ए समय गंवावत – नइ मिलिहय अउ पारी।।
बोलिन -“”अगर हमर तंय सुनबे, तंय पाबे धन मरत अतेक
कतको खर्च तभो नइ उरकय, सुख पाहंय संतान जतेक.”
दुश्मन दीन बहुत लालच तब, भारत किहिस -“”मोर संग आव
मंय तुमला ओ जगह मं लेगत, जिंहा हवय सैनिक ठहराव.
जीतव चौकी ला बिन डर भय, जीतव निधड़क भारत देश
झंडा अपन गाड़ देवव खब, जगय जगत मं उंचहा टेस.”
सुन के शत्रु खूब खुश होवत, भारत संग मिलात हें हाथ
कहिथंय -“”शुभ कारज मं देरी, करिहय कते मुरुख इंसान !
कृषक हा सुघ्घर पाग अमरथय, नांगर ला दउड़ाथय हांक
आय हमर बर उत्तम अवसर, तब हम पूर्ण करन उद्देश्य.”
अरि मन भारत के तोलगी धर, मारत लुहंगी जावत राह
रण मं विजय अवश्य हवय कहि, उंकर हृदय उझलत उत्साह.
खुसुरपुसुर आपुस मं बोलिन -“”देखव घरकुलुवा के हाल
अपन देश के जर खुद कोड़त, लालच मं बिगाड़ लिस चाल.
धोखा देवत अपन देश ला, ओकर कतेक असन वि·ाास !
पाछू हमर ले धोखा करिहय, एहर नइ ईमान के दास.
हमर काम यदि पात सफलता, जियत दफनबो एला आज
ताकि सीख पावंय दूसर मन, बिसरंय राष्ट्र घात के काम.”
दुश्मन चाल चलत शतरंजी, भारत घलो चलत हे दांव
एमां कोन होत हे विजयी – सांस रोक देखव परिणाम.
भारत हा सुरंग तिर पहुंचिस, कहिथय -“”पुछी चाब सब आव
सुजी गिरे तक पांव बजय झन, वरना बुड़िहय रण के नाव.
बहुत अकन सैनिक हें अंदर, उंकर कान झन जाय अवाज
अमर कलेचुप मार बिछावव, तहां बजाव शोर कर साज.”
भारत के कहना सुन दुश्मन करिन कलेचुप बोली ।
अंदर चलत अश्त्र पिचका धर खेले लहू के होली ।।
अंदर पहुंच सबो तन देखत, पर दउहा नइ मनखे एक
दुश्मन पूछिन – “”कहां हमर अरि, सब ला हमर पास मं लान.
लबरा, हमला धोखा देवत, तंय निकले सब ले बइमान
दुश्मन मन के दउहा नइ तब, अब हम लेबो जीवन तोर.”
भारत बोलिस – “”सुनव घातिया, तुम सोचत भारत डिग जाय
पर भारत हा परलोखिया नइ, जेहर रुपिया मं बिक जाय.
लेकिन तुम हताश झन होवव, मंय हा चहत लेंव कुछ सांस
तंहने तुम्हर शत्रु ला लावत, ओकर कर दव बिन्द्रा बिनास.”
भारत हा माचिस हेरिस अउ, खर्र मार बारिस तत्काल
बस आंखी झपकावत भर मं, पकड़ लीस आगी बिकराल.
उहां रिहिस गोला बारुद अउ, विस्फोटक पदार्थ भण्डार
तेन दनादन देत धमाका, मचिस भयंकर हाहाकार.
कहूं भगे बर समय मिलिस नइ, करे विचार खतम अवसान
जमों आदमी स्वाहा होगिन, हूम बर बांचिन नइ इंसान.
भारत देश के रक्षा बर भारत खोइस जिनगानी ।
जइसे बरदी ला बचाय बर प्राण देत चरवाहा ।।
भारत के चरित्र हे जतका, मेहरुकवि हा साफ बतैस
अतिशयोक्ति साहित्य मं होथय, एकोकन नइ करिस प्रयोग.
सुन के कथा गरीबा पूछिस -“”अमरउती के अभि का हाल
काय काम कर जिनगी पालत, यदि तंय जानत सफा निकाल ?”
मेहरुकिहिस -“”काय बतावंव मंय, अमरउती के स्थिति दीन
मिहनत बजा के जिनगी पालत, काटत समय घरी पल छीन.
जेकर पति हा देश बर मरगे, तेन पात नइ खाय अनाज
लेकिन जेहर देश ला लूटत, इन्द्र असन भोगत सुख राज.”
एकर बाद गरीबा मेहरु, हट गिन दूनों ओ तिर छोड़
घर मं अमर गरीबा देखत, बुढ़ुवा बाप करत खेर खेर.
कथय गरीबा -“”ददा, बता तंय, काय लगत का धरे अजार
बला चिकित्सक मंय अभि लावत, ताकि तोर होवय उपचार.
मंय पलाय हंव बालक पन ले, जिनगी ला बचाय कर कर्ज
मंहू घलो सेवा सटका कर, करना चहत अदा कुछ कर्ज.”
सुद्धू कथय -“”अजार झपाथय आथय जहां सियानी ।
मंय जी गेंव अपन रउती भर सुख ला पाय जवानी ।।
“”मंय जावत हंव लाय चिकित्सक, लेकिन कहां मिलत ए गांव
यदि प्रबंध तब जिये लइक मन, काबर मरतिन दवई अभाव !
सुन्तापुर मं कुछ प्रबंध नइ, पर ढारा मं एक इंसान
दुधे नाम ओकर परसादे, कतको झन नव जीवन पैन.
ओकर पास आदमी भेजत, या फिर मंय हा खुद चले जात
सुनते साठ दुधे हा आहय, कतको काम तउन ला थेम.”
अतका बोल गरीबा निकलिस, लकर – धकर तजदीस मकान
दू आड़ी भुंइया बसे नापे, सुखी छेंक दिस चिल्ला तान.
सुखी के आर्थिक मध्यम स्थिति, ना धनपति ना हवय गरीब
पर ला उभरा खुद डर भागत, ढुलमुल नीति केकरा चाल.
सुखी कथय -“”मंय मदद मंगत हंव, कुसुवा धन ला धरे अजार
ओकर दवई अगर तंय जानत, मोर माल के कर उपचार.
बइला हा पागुर नइ भांजत, मुंह तक मं नइ लेगत घास
पसर पसर गजरा ला फेंकत, बहुत कष्ट मं लेवत सांस.
ओकर जोड़ी पुट ले मरगे, महिना पहिली आप सरूप
सपड़गे शनि अउ राहु मोर पर, अब उबरंव कइसे दुख कूप !”
कथय गरीबा -“”पास समय नइ लकर धकर हे मोला ।
लेकिन तोर साथ नइ जाहंव गुस्सा लगिहय तोला ।।
सुखी गरीबा दुन्नों झन गिन, केंघरत कुसुवा धन के तीर
ओकर पेट फुले कोंहड़ा अस, दुख मं छटपटात तरमीर.
हालत देख गरीबा कहिथय -“”हाय करे नइ बचय परान
यदि धन ला बचाय बर सोचत – मेथी, जुन्नागुड़ झप लान.
असगंद कांदा, जाली हरदी, सोंठ, फिटकरी, अरसी तेल
केऊ कांदा अउ हुरहुरिया, तुरते दवई बनावत मेल.”
सुनते सुखी सब जिनिस लानिस, अउर गरीबा – पास मड़ैस
उसरंउहा कुट पीस गरीबा, धन खाये बर दवई बनैस.
माल के मुंह ला उला खवा दिस, जउन दवई ला रखे बनाय
धन हा गुटक पेट मं लेगिस, थोरिक बाद लगिस पगुराय.
कांदी खाय लमावत मुंह अउ, फुरसुद अस झटकारत देह
ओकर हटत अजार देख के, सुखी हा सारत जता के प्रेम.
किहिस – “”मित्र तंय बचा डरे हस, एकड़ा धन के जावत प्राण
जेन मदद उपकार करे हस, ओकर कब करिहंव उमछान !”
किहिस गरीबा -“”का गोठियाथस, मंय नोहंव उपकारी ।
तीर मं तुक्का लगिस निशाना तब हटगे बीमारी ।।
अड़बड़ दुख के बात हमर बर, आगू डहर बढ़िस संसार
पर हर जिनिस गांव बर कमती, वितरण नीति मं बहुते दोष.
शासन आ·ाासन भर बांटत, जनहित मं जमाय नइ काम
जे दिन पूंजीवाद खत्म तंह, जमों जगह मं सुख के राज.”
अतका बोल गरीबा नेमिस -“”मोर काम धर ढारा रेंग
दुधे ला धर के लान अपन संग, सुन पुकार पारे बिन बेंग.
कहिबे – भेजे हवय फलाना, ओकर बुढ़ुवा बाप बिमार
ओला जांचे बर बलाय अभि, चल तुरंत कर दे उपचार.”
“”मदद के बल्दा मदद चहत हस, सोचत होय सोर हर ओर
पर अरझे मोर बुता बहुत ठक, तब नइ साथ दे सकहूं तोर.”
पर के गोड़ मं कोन हा रेंगत, सिधो काम ला खुद के हाथ
लुंहगी मार पहुंच जा ढारा, दुधे ला पकड़त झपकुन लान.”
सुखी के कहना सुन कट खा गे, कथय गरीबा हा कर रोष –
“”यद्यपि निंदा करना अनुचित, लेकिन मंय हेरत हंव दोष.
तोला अपन हितू मानत हंव, पर तंय हस सब ले बेइमान
जेन समय तंय नाश करे हस, एहर आय शत्रु के काम.”
पानी रूतोे सात पुरखा मं, सुखी के घर ला छोड़िस शीघ्र
पाछू पलट निंघा नइ फेरत, आगुच डहर बढ़ावत गोड़.
सोचत हवय गरीबा – एहर मध्यम वर्ग के चाला ।
देश समाज ला घालत जइसे – खड़े फसल ला पाला ।।
मित्र बना के धोखा देथंय, एमन होत महागद्दार
पिछू कोत ले छुरा भोंकथंय, इनकर कोन हा पाही पार !
आगू मं मिल जथय गुहा हा, गाड़ी मं बइठे हे जेन
बोलिस गुहा हा गरीबा ला -“”काय बात हे फुरिया साफ?
तंय हा परेशान हस नंगत, चोंई असन दिखत मुंह तोर
लगथय – दूसर गांव जात हस, तभे हड़बड़ावत हस खूब !”
कथय गरीबा -“”का दुख रोवंव, बाप हे अंधनिरंध बीमार
ढारा जावत लाय चिकित्सक, ताकि ददा के होय इलाज.”
“”तंय हा बइठ मोर गाड़ी मं, मंय हा जावत कलकसा गांव
बीच मं ढारा गांव हा परथय, उहां उतर करबे तंय काम.”
गाड़ी मं बइठीस गरीबा, तंह गाड़ी आगू बढ़ गीस
बइला मन हा बड़ फुर्तीला, लुंहगी चाल ले मारत दौड़.
किहिस गरीबा -“”मंय देखत हंव – जमों व्यक्ति निष्ठुर नइ होंय
एक तराजू मं यदि तउलत, निश्चय गलत बहुत अंधेर.
थोरिक पूर्व के बोलत घटना – सुखी ले मंय हा मदद मंगेंव
पर ओहर हा छरक के भागिस – करिस हइन्ता बन के क्रूर.
लेकिन तंहू एक मनसे अस – मोर बिपत पर प्रश्न करेस
गाड़ी मं बइठा के लेगत, हरत कष्ट ला बन के मित्र.”
गुहा कथय -“”मंय सुखी ला जानत – ओहर हवय स्वार्थ के खान
यदि ओकर कुछ काम हा अड़थे, तब तो परत धोकर के पांव.
लेकिन ओकर स्वार्थ सधत तंह – आंखी ला देखात हे लाल
ओकर आलोचना या स्तुति, कुछ भी करना बिल्कुल व्यर्थ.”
गांव करेला के आगुच मं, हे चौरस्ता शुभ स्थान
दुनों करेला के मनसे मन, उही जगह मं करथंय भेंट.
उहिच चौंक मं खड़े हे चिंता, ओला पारिस गुहा हा हांक-
“”यदि तंय ढारा डहर जात हस, गाड़ी मं पिचरिंग ले बैठ.
मंय हा बहुत उदार आज हंव, खुद बलात हंव मार अवाज
आव मोर गाड़ी मं बइठव, फोकट मं आनंद उठाव.”
चिंता हा ठट्ठा मं बोलिस -“”मंय नइ आदिम युग के जीव
पहिली मंय हा ढारा जाहंव, फेर नहक देवकट्टा गांव.
यदि मंय गाड़ी पर बइठत हंव, मोर शान के कटही नाक
मंय आधुनिक युग के मनसे अंव, बइठत हंव जहाज या कार.”
किहिस गरीबा -“”विषय हे उत्तम, पर पहिली गाड़ी मं बैठ
काय पूर्व अउ काय आधुनिक, जमों विषय मं करबो गोठ.”
चिंता हा गाड़ी मं बइठिस, किहिस गरीबा हा कुछ सोच-
“”घोड़ा चढ़ना – गाड़ी बइठइ, हकर हकर पैदल के चाल.
एमन पिछड़ा पन के चिन्हा, यने मात्र इतिहास के चीज
लेकिन एमन हें लाभदायक, बांटय नइ एकोकन हानि.
वातावरण ला नाश करे बर, कभु नइ छोड़ंय घातक चीज
भूमि के गर्भ सुरक्षित रहिथय, दुर्घटना के खतरा दूर.”
चिंता कथय -“”फेर बोलन दे मंय झपात हंव झोझा ।
इंकर कमी ला मंय गिनात – तंय सुन चुप रख के बानी।।
एमन ठिहां देर मं पहुंचत, मानव पास कमी हे टेम
ओमन लक्ष्य पाय बर चढ़थंय, हेलीकाप्टर कार जहाज.
मानव चढ़त चांद मंगल ग्रह, खोजत हवय नवा ग्रह रोज
गाड़ी ले उहां जाना मुश्किल, मात्र आधुनिक वाहन ठीक.”
कथय गरीबा -“”उचित कहत हस, पर ओमन मं बड़का दोष
वातावरण प्रदूषित होथय, सब तन फइलत विष के गैस.
ओमन मं पेट्रोल ला भरथय, जे हो जहय अवश्य समाप्त
अइसन जिनिस प्रयोग होत नइ, जेन हा अमर रहाय सदैव.
वाहन के निर्माण करे बर, पृथ्वी ला खोदत प्रण ठान
एकर फल विनाश मं मिलिहय, जमों खनिज हो जहय समाप्त.
पृथ्वी के तन अंग भंग अस, बिना जान के ओकर देह
सड़क – वायु दुर्घटना होथय, ओमां मर जाथंय कई जीव
अंधरी दौड़ मं मानव सामिल, खुद के बलि देवत खुद हाथ
बपुरा बइला खड़े कलेचुप, तेला बला लेत – आ मार.”
“”हम हा आगू बढ़त चलत हन, पाछू लहुटइ मुश्किल काम
गाड़ी मं बइठे बर कहिबो, उच्च समाज हा देही हांस.
हमला कहही – देहाती हव, तभे करत अड़हा अस गोठ
नवा – नवा वैज्ञानिक साधन, तब गाड़ी मं बइठन कार !”
“”आदिम युग मं फेर लहुटना, वाजिब मं मुश्किल के काम
मंय तक हा विकास वादी अंव, देखत हंव आगू के दृश्य.
अब हम नवा उपाय ला खोजन, प्रकृति के विनाश झन होय
जउन पदार्थ सिराही एक दिन, ओकर होवय कम उपयोग.”
गुहा कथय -“”हम स्वार्थ पूर्ति बर, सब धरती ला देबो कोड़
ओकर जिनिस ला बाहिर लाबो, अंदर ला कर देबो खाख.
हमर पुत्र बर कुछुच बचय नइ, उनकर बर हर जिनिस अभाव
ओमन हर सुख सुविधा पावंय, एकर बर हम जिम्मेदार.”
चिंता सोचिस – मजा आय अब, वातावरण मं उपजय हास्य
कहिथय – “”तंय हा अपन ला सोचत, पत्नी बेटा पर आ गेस .
पुनऊ, थुकेल के करथस चिंता, तब हम छोड़न कार जहाज
तोरेच गाड़ी बइठ गेन हम, ताकि तोर वंशज सुख पाय.
अब तंय हा निÏश्चत असन रहि, वातावरण हा रहही साफ
पृथ्वी के सब खनिज सुरक्षित, जमों काम प्रकृति अनुसार.
हम तोला आ·ाासन देवत – तोर पुत्र पाहंय सुख खूब
भावी जीवन पूर्ण सुरक्षित, हरदम बर बुतही दुख दीप.”
तीनो झन खलबला के हांसिन, फेर पहुंच गिन ढारा गांव
बोलिस गुहा -“”दयालू हव तुम, खुशी मोर बर लाथव खोज.
तब फिर मोरो फर्ज हा बनथे, मंय हा करंव तुम्हर अस काम
ढारा लाये बर करेंव वादा, ढारा मं पहुंचा तक देंव.”
ढारा मं उतरीस गरीबा, पहुंच गीस बर पेड़ के पास
सड़क श्रमिक मन उहां हें हाजिर, चलत रिहिस हे बैठक नेक.
बुल्खू झनक अउ बलवन पहरु, श्रमिक-श्रमिक नेता के भीड़
बुल्खु हा सब ला सम्बोधिस -“”साथी, तुम हव हाजिर आज.
तुमला देख प्रसन्न खूब हंव,जमों कर्मचरी हव एक
तुम्हर संगठन हे बलशाली, काम ला करो राख ईमान.
अपन कर्मपथ पर जब चलिहव, हक हा बनत रखे बर मांग
शासन घलो मांग ला मानत, कर्म के हरदम इज्जत मान.”
पहरुहा बुल्खू ला बोलिस -“”हमला बता साफ अस गोठ
हमर मांग का – काय चहत हम, आगू डहर करन का काम !
सबो श्रमिक ला समझा के कहि, एको कनिक गुप्त झन राख
तब प्रस्ताव हा पारित होये, श्रमिक करंय सहमति के दान.”
बुल्खू दस्तावेज निकालिस, पहरुके सुपूर्द कर दीस
कहिथय -“”जतका असन तथ्य हे – जानय श्रमिक बिना कुछ भेद.
लेना भइ तंय स्वयं पाठ कर, श्रमिक ला सुनवा बिल्कुल साफ
तोर बात ला साफ समझिहंय, श्रमिक – श्रमिक के जीवन एक.”
पहरुहा अब मांग पढ़त हे, सब साथी ला साफ बतात-
“”शासन पास मांग भेजत हन, हमला हे आवश्यक जेन.
हम्मन सड़क – श्रमिक छोटे अन, वेतन मं पावत कम नोट
जीवन स्तर सुधर जाय कहि, भेजत हवन निम्न प्रस्ताव.
हमर मूल वेतन हा बाढ़य, बोनस मिलय नवा जब साल
नवा मकान बनावन जब हम, बिगर ब्याज के ऋण मिल जाय.
हमर खून मन शिक्षित होवंय, शासन हा उठाय सब खर्च
सेवा ले हम मुक्ति पान तंह, पेंशन के होवय भुगतान.”
बुल्खू पूछिस – शासन तिर हम भेजत मांग के सूची !
यदि आक्षेप या त्रुटि कुछ शंका, तुरुत सामने खोलो ”
झनक किहिस -“”हम मांग रखे हन, ओहर हे कम अकन – अपूर्ण
मांग के संख्या ला बढ़ाव अऊ, कम से कम चालीस पचास.”
बुल्खू हा सब ला समझाइस -“”अगर रखत हम सूची लाम
एकर ले कुछ लाभ होय नइ, सब प्रयत्न हा जाहय व्यर्थ.
हम्मन मूल मांग ला राखन, ताकि बात ला समझंय साफ
शासन पर बोझा झन आवय, हमर मांग हा स्वीकृति पाय.”
बलवन कथय -“”ठीक बोलत हस – हम्मन रखत पांच ठन मांग
मगर मांग पूरा नइ होहय, तब फिर करबो काय उपाय ?”
झनक हा सनकत टांठ बोलथय -“”मंय हा खोलत गूढ़ रहस्य
जमों दोष अधिकारी मन के, शासन ला रखथंय अंधियार.
मंहगू साहब ला तुम देखव, अनुविभागीय अधिकारी आय
ओहर सब कर्तव्य ला त्यागत, सदा श्रमिक के करथय हानि.
पर अब श्रमिक ला मिलिहय घाटा, हम करबो ओकर घेराव
मंहगू ला दोंह दोंह ले पिटबो, खत्म होय इज्जत सम्मान.”
बुल्खू हा समझौती बोलिस -“”तंय हा सन्ना जथस तड़ाक
मारपीट बर तुरुत उठत हस, झगड़ा ला मानत हस मित्र.
अधिकारी या मंत्री ला तंय, झोर सकत हस थपरा – लात
गलत काम बर समय लगय नइ, पर एमां खुद के नुकसान.
हमर विरुद्ध मं थाना जाहंय, होहय उहां प्राथमिकी दर्ज
न्यायालय मं प्रकरण चलिहय, खूबेच बढ़ही धन के खर्च.
हम खुद कम वेतन झोंकत हन, सहन पान नइ आर्थिक बोझ
तब मंय हा समझे बर बोलत, दूध अउ दुहना ला झन फोर.
अपन आंख मं हम देखे हन, करिन श्रमिक मन कइ हड़ताल
कल कारखाना तोड़ फोड़ दिन, मालिक तक ला गचका दीन.
पर परिणाम हा गलती निकलिस, मिल मं तारा हा लग गीस
जमों श्रमिक के काम हा रुकगे, दाना दाना बर मुहताज.
तब अब ले आंदोलन करबो, अपन जीविका ला रख ठीक
पेट मं अन्न – हाथ मं रुपिया, तब मनसे करथय हर काम.”
सब प्रस्ताव हो जाथय पारित, गीस गरीबा पहरुपास
कहिथय -“”तंय हा फिकर मं झन मर, निश्चय पूर्ण तुम्हर जे मांग.
तंय रुपिया के लाभ कमाबे, खाबे बोबरा पप्ची खीर
पर अग्रिम मं लान मिठई तंय, मंय लगांव पहिलिच ले भोग”
पहरुकिहिस -“”खूब खबड़ हस, मिठई खाय बर टपकत लार
लेकिन अभी हवय कुछ मुश्किल, एकर बर तंय धीरज राख.
हमर गांव ला जानत हस तंय – जेकर रानीगंज हे नाम
उहां के मंडई जग जहरित हे, देखे बर तुम निश्चय आव.
तोला उहें मिठाई देहंव ओकर संग मं रवाना !
देवत हवंव निमंत्रण अभि ले मंड़ई मं निश्चय आना !!
“”तोर निमंत्रण मंय स्वीकारत, लाबे कोन गांव के नाच
तुम कंजूसी मं मत मरना, लाव नाच उंचहा विख्यात ?”
“”हवय रवेली नाच’ एक ठन, उही ला लाबो नेवता भेज
कलाकार जे कला देखाहंय, उंकरेच नाम बहुत विख्यात.
लालू – फीता – मदन – मंदराजी, बुलुवा – बोड़रा – ठाकुरराम
उनकर कला करत आकर्षित, दर्शक देख देत हें दाद.
ओमन चेहरा एदे निकालत – चपरासी, बुढ़ुवा के ब्याह
“सूरा वाले कजुवा’ निकलत, अउ “सीका जोती के राह.”
“”मंहू सुनेंव रवेली के नाचा, देखे बर हे प्रबल विचार
तुम्हर मंड़ई म निश्चय आहंव, मोर साद हा होही पूर्ण.
अब चर्चा आगू तन जावत, कथय गरीबा बन गंभीर-
“”बुल्खू के सब नीति हे उत्तम, ओकर कार्य हा अनुकरणीय.”
पहरुहा स्वीकार के कहिथय -“”तंय सुन बुल्खू के सिद्धान्त
उग्र कार्यक्रम ला टरियाथय, चलथय सदा धैर्य के राह.
पहिली चिंतन मनन ला करथय, फिर सोचत एकर परिणाम
एकर बाद काम ला करथय, तब उद्देश्य हा सुफ्फल होत.
छेरकू नेता हा मंत्री हे, ओकर हर सिद्धान्त मं स्वार्थ
ओहर काम उही बस धरथय, जेमां बचय शान पद मान.
तंय हा जब ए पास आय हस, बुल्खू साथ भेंट कर लेव
अपन अपन सिद्धान्त ला खोलव, ताकि बाद मं आवय काम.”
गीस गरीबा हा बुल्खूू तिर, कहिथय -“”जब तंय करथस काम
हिंसा – गुस्सा ला त्यागत हस, शांति अहिंसा ला अपनात.
मगर प्रश्न के उत्तर दे तंय – भिड़ के करत कार्यक्रम जेन
ओमां सफल अवश्य हो जाबे, यदि “हां’ तब फुरिया दे साफ. ?”
बुल्खू बोलिस -“”तंहू पढ़े हस, सबो जगह के हर इतिहास
लड़ई के वर्णन ले पटाय हे, खूब बोहाय खून के धार.
रामायण – महाभारत पढ़ लेस, होय उहू मं हिंसा – मौत
मानव के दुश्मन मानव बन, एक दुसर के लाश बिछैन.
मगर समस्या बचे अभी तक, मानव बनिस क्रूर ले क्रूर
तब हम धरेन शांति के अंचरा, हमर राह हा बिल्कुल ठीक.
लेकिन तंय काबर पूछत हस, मंय हा रखत जउन सिद्धान्त
यदि ओमां कुछ दोष या गल्ती, रहि निÏश्चत बता तंय साफ ?”
पहरुहा स्पष्ट बताथय -“”वैज्ञानिक जब करथय शोध
साफ प्रतिक्रिया ला जाने बर, लेवत वरिष्ठ से मंतव्य.
तोर राह पर चलत – चहत हे सुम्मतराज ला लाना ।
एकर शंका खत्म करव – अउ काम के होय समीक्षा ।।
बुल्खू हा गरीबा ला बोलिस -“”तोर कर्म अउ पथ हा ठीक
एमां धीरज समय हा लगथे, तंह उद्देश्य हा निश्चय पूर्ण.”
कथय गरीबा – “”मोर दोष सुन – यद्यपि मंय नइ बोलंव साफ
पर अंदरूनी गुस्सा करथंव, हिंसा तक बर करत विचार.
करथंव प्रण – धनवा ला मारंव, ओहर आय पाप के मूल
यदि ओकर बिन्द्राबिनास तब, खत्म हो जाहय अत्याचार.”
बुल्खू कथय -“”ठीक बोलत हस, एकर बर तंय हा निर्दाेष
मनसे समय देख के चलथय, होवत उग्र करत हे क्रोध.
तंय सोचत – धनवा ला मारंव, पर हत्या के काम अनर्थ
कोई प्रश्न के हल नइ निकलय, अउ हो जथय समस्या गाढ़.
सोनू मण्डल डोकरा हो गिस, छूट जहय अब ओकर जीव
तब धनवा के राज आ जाहय, करिहय जन विरुद्ध के काम.
यदि धनवा के जान मारबे, पर नइ होय कुछुच कल्याण
ओकर बेटा मनबोध तेहर, जनता ला देहय तकलीफ.
एकर ले उत्तम तंय ए कर – जलगस धनसहाय के प्राण
अपन कार्यक्रम ला चालू कर, पश्त करो ले जन सहयोग.
धनसहाय ला आकर्षित कर, गांव के मुख्य धार मं जोड़
ग्राम व्यवस्था मं सामिल तब, ओकर होय पूछ – सम्मान.
सनम के पुत्र गली ला जानत, धनवा के बेटा मनबोध
एमन ला तंय स्नेह बांटबे, दुनों ला बइठाबे जब खांद.
तभे तोर उद्देश्य हा सुफ्फल, सुम्मत राज व्यवस्था नीक
सब मनसे अधिकार ला पाहंय, खतम सदा बर भेद के राज.”
पैस गरीबा राह नेक अस, उहां ले हट डाक्टर तिर गीस
दुधे ला बोलिस – “”मोर साथ चल, मोर ददा के प्राण ला राख.
अंधनिरंध रोग जम्हड़े हे, रनबन परे स्वास्थय हा हीन
घर के धारन मोर ददा ला, मोर साथ चल के कर ठीक.”
दुधे कथय -“”अउ हवंय अजरहा, ओमन ला मंय देवत जांच
तेकर बाद तोर संग चलिहंव, झन मर फिकर – आय नइ आंच.”
दुधे अजरहा मन ला जांचिस फिर कर दीस दवाई ।
अब सुन्तापुर जावत हे करना हे उंहो भलाई ।।
दुधे – गरीबा गांव पहुंच गिन, ठाड़ होत सुद्धू के पास
ओहर बिसुध परे – नइ बोलत, नइ लेवत एको कल्दास.
दुधे हा देखिस रोगी के पय, दवई करत फिर आवय होश
छिन छिन रुक नारी ला देखत, रोग हा झन मारे कुछ रोष.
सुद्धू के तन दवई हा भींजिस, सांस लेत अब कल्थीमार
दुधे कथय -“”बिल्कुल झन घबरा, रोग हार जाहय सब दांव.
दवई होय ते लाभ बता दिस, अउ औषधि मंय जावत छोड़
एला समयानुसार खवाबे, यदि शंका तब प्रश्न उछाल ?
अभी जान दे तंहा फेर मंय आवत हंव संगवारी ।
अपन समझ के जतन ला करिहंव तंहने खतम बिमारी ।।
दुख भर बिनती करिस गरीबा -“”अभी सियनहा परे बिचेत
ओहर थोरिक होय टंच अस, तंय हा बिलम जा घंटा एक.
ए बपुरा सग बाप मोर नइ, ना मंय बिंद – न अंव औलाद
तब ले अपन लहू सहि पालिस, पूरा करिस मोर सुख – साद.
अगर उदुप एला कुछ होवत, मंय हो जहंव बहुत बदनाम –
यदि सग पुत्र गरीबा होतिस, करतिस जतन अपन ला बेच.
सुद्धू बपुरा ताप खूब दुख, एला जिया करिस परमार्थ
पर के पुत्र गरीबा हा तब, देखत हे बस खुद के स्वार्थ.
काकर कोख ले अंवतरे हंव मंय, कते मनुष्य मोर सग बाप !
एकर भेद कुछुच नइ जानंव, मंय हा अंव मानव के पुत्र.
सुद्धू पोंस के राखिस जीवन, तब सेवा कर छूटंव कर्ज
तंय कर ठीक तभे जा ढारा, अतिक कष्ट बर करथों अर्ज”
दुधे उदेल लहुट नइ पाइस, जहां गरीबा जोड़िस हाथ
सुद्धू के हालत ला जांचत, बात चलावत ओकर साथ.
दुधे कथय -“”एक बात सुने हंव – तिजऊ जेन सोनू के भृत्य
ओहर फांसी लगा के मरगे, काबर करिस अबुज अस काम ?”
“”हर मनसे जीये बर चाहत, पर सब डहर कुलुप अंधियार
जब उत्थान के कुछ आशा नइ, तब निराश मं देवत जान.”
देत गरीबा हा फिर उत्तर -“”तिजऊ रिहिस हे कंस परेशान
अपन कमई के अन्न पाय नइ, दुख मं हरिस स्वयं के प्राण.
सोनसाय पर दोष हा जातिस, लेकिन बाच गीस बेदाग
धन मं नंगत ताकत होथय, तब सोनू हा बच गिस साफ.
तिजऊ के लागा बचिस तेन ला छूटत ओकर बेटा ।
कातिक घलो उबर नइ पावत – जस पुजवन के घेंटा ।।
बात चलत ते बीच मं सुद्धू, ऊंऊं करके खोलिस नैन
स्थिति सुधरत देख दुनों मन, मन मं पैन चैन संतोष.
हालत पूछत दुधे – गरीबा, सुद्धू ढिलत साफ अस बोल-
“”वइसे मोला बने जनावत, पर कमजोरी अंतस खोल.”
“”बने करे बर दवई करे हंव, तंय झन कर एको कन फिक्र
ताकत फेर लहुट के आहय, नवा पान सहि हरियर कंच.”
दुधे दीस सांत्वना तंहा फिर, अपन गांव जावत हे लौट
अपन पिता ला छोड़ गरीबा, दूसर बल लेगत नइ पांव.
कुछ दिन तक औषधि खा सुद्धू, स्वास्थय लाभ पा – किंजरत खोर
पहिली अतिक तन मं ताकत नइ, मगर चले के लइक सजोर.
सुद्धू रिहिस अपन घर मं तंह, लइका मन पहुंचिन दोर दोर
रंगी जंगी गज्जू मोंगा, गुन्जा के संग पुनऊ थुकेल.
सुद्धू ला चिढ़ाय बिजरावत, कूद करत हल्ला चिरबोर
लइका मन ला मना के छेंकत, तभो उदबिरिस मारत जोर.
गज्जू हा सुद्धू ला बोलिस -“”हम तोला बोचकन नइ देन
आज “जनउला कथा’ जमाबो, कुछ दिन पूर्व गुने हन जेन.
कथय गरीबा -“”आज बनय नइ, कुछ दिन रुक के आना।
तंहने ददा सुनाहय तुमला कथा – बिस्कुटक – हाना ।।
ललिया आंख थुकेल घघोलिस -“”हमर बीच मं तंय झन बोल
पूछत हवन अपन संगी ला, हमर आंतरिक चर्चा आय.
यदि हंसिया अस लफ ले लूबे, या हमला कहिबे – भग जाव
तब तो बहुत बुरा हो जाहय, हमर तोर मं झगरा जोर.”
सुद्धू घलो मरत समझाइस -“”मोर शरीर हवय कमजोर
थक – थक थक थक लगत ते कारण, खेले बर हिम्मत नइ मोर.”
रंगी किहिस -“”अगर दुर्बल हस, घिंव गांकर काबर नइ खाय !
नखरा झनिच मार वरना हम, खटिया ले गिरा देबो धांय.”
सुद्धू सोचिस – यदि नइ मानत, सच मं गिरा दिहीं चेचकार
बेलबेलहा इतरवला मन ले, कोन सुजानिक पाइस पार !
सुद्धू हा खटिया ले उतरिस, बइठिस बालक मन के पास
ओमन हा उत्साहित होये, सुद्धू बोलत भर उत्साह –
“”होय “जनउला कथा’ हा शूरू, प्रश्न जवाब ला होवन देव
जेन जुवाप देन नइ पावय, ओहर लाय खजानी खाय.”
लइका हुंकी भरिन हर्षित भर, गज्जू कथय बढ़ा के जोश-
“”हमर बात ला तंय माने हस, पहिली प्रश्न तिंही हा पूछ.”
सुद्धू हा लुकलुका जथय अब, ओहर करिस प्रश्न बरसात –
“”आय लुलू अउ जाय लुलू पर, पानी ले डर्रावत कोन ?”
एक दुसर के मुंह ला ताकत, बालक मन उत्तर नइ देत
बहुत सोच के रंगी फोरिस -“”पनही आय कहत हम नेत.”
रखत सवाल टुरा जंगी अब -“”लाल तूस अउ करिया तूस
एकर उत्तर ला झपकुन दे, नइ जानत तोर ददा ला पूछ.”
सुद्धू हा सकपका गीस सुन, बालक मन कइसे हकरैन !
पर उत्तर देना आवश्यक, तब बोलत बालक मन साथ-
“”दाई अउ ददा ला जोहारत- वह इतरौला बच्चा ।
कान खोल के सुन लव – गोमची – एहर उत्तर सच्चा ।।
सुद्धू हा तड़ ढिलिस प्रश्न अब – “”देव जुवाप गिनत बस बीस
नदिया पास चरत बोकरा हा, पानी खतम तहां मर गीस.”
बच्चा परिन सोच मं अड़बड़, बुढ़ऊ बिया कर दिस बकवाय
मोंगा किहिस -“”समझ मं आगिस – पूछे हस ते – दीपक – आय.”
“”ए एकटंग – काय जी चरटंग ? कते डहर चल दिस दूटंग ?”
“”छोड़ के चरटंग डरपोकना ला, अभिच गीस दस टंग ला लाय ?”
रंगी किहिस – “”बोल ए बुढुवा, अपन बुद्धि के मारत टेस
बइठक मं तंय न्याय भंजाथस, कतको के काटत हस नाक.
हमर प्रश्न के उत्तर देबे, हम हा देबो बड़े इनाम
नांदगांव ले मिठई ल मंगवा, तोला देबो सक भर खाय.”
लइका मन बेंझाय ला, रखिन सवाल बहुत बिकराल
सुद्धू हा घोरवत हे अड़बड़, पर नइ देवन पात जवाब.
कथय गरीबा ला – “”रे बाबू, एकर उत्तर बता तड़ाक
अगर मदद तंय नइ पहुंचाबे, काट लिहीं लइका मन नाक.”
अरकट्टा कट भगिस गरीबा -“”तुम्हर बीच कइसे गोठियांव !
अगर कूद मंय चुट ले लूवत, मेकरा मन करिहंय हांव हांव.”
सुद्धू सोचे रिहिस अपन मन, दिही गरीबा निश्चय ज्वाप
लेकिन उल्टा धुरा पटक दिस, सुद्धू हारत अपने आप.
करिस बहाना -“”मितवा सुन लव, तुम कल पहुंच के उत्तर लेव.
यदि तुम जानत – तुम्हीं बता दव, खाये बर खजानी लेव.”
सुद्धू जहां थथमरागे तंह मरगे ओकर नानी ।
लइका मन हा विजय पाय बर आगू कहत कहानी ।।
जंगी बोलिस -“”साफ कथा सुन, एकटंग के मतलब चटवार
दूटंग मनसे – चरटंग बघवा, दसटंग हा केकरा सरकार.
एक किसान मेड़ बांधे बर, धर चटवार फजर गिस खेत
ओतकी बखत बाघ पहुंचिस तंह, कृषक के उड़गे चेत दिमाग.
मेड़ मं झप चटवार गड़ा दिस, अपन लुका गिस जीव बचाय
बाघ गीस चटवार के तिर मं, पर धथुवा गे बिगर शिकार.
बघवा हा चटवार ला पूछिस -“”तंय उपकारी – कर परमार्थ
एक आदमी तउन कहां गिस, खाय चहत हंव ओकर मांस ?”
हंस चटवार बताथय फरिहर -“”तंय अबूज हस यथा नदान
तोर ले बली कृषक हा हावय, खंइच दिही तोर जीयत प्राण.
मोला छोड़िस इही मेर अउ, निकल गीस दसटंग ला लाय
मनसे हा दसटंग ला खाहय, कचम कचम जस स्वादिल साग.
यदि तंय हा ए पास बिलमबे, आहय तोरो बर भी काल
कृषक हा तोला गप गप खाहय, तोर मांस के बढ़िया स्वाद.”
बघवा डर मं कांप के सोचत-दसटंग ला बनात जब लाश
काबर चार टांग वाले मंय, बनंव ग्रास भिड़ मनखे साथ.”
बघवा एको क्षण नइ बिलमिस, सल्टिस तुरुत उठा के पूंछ
मरत व्यक्ति के जीवन बच गिस, छाती अंड़ा के टेंड़त मूंछ.”
लइका पूछिन -“”बता सियनहा, हार गेस नइ बाजी आज !
हमर खाय बर लान खजानी, सब झन खाबो बांट बिराज.”
सुद्धू स्वीकारिस -“”तुम्मन सच, लइका ले जीतत हे कोन!
थोरिक थया रखव – मंय लावत, तुम्हर खाय बर चरबन मीत.”
सुद्धू लान खजानी बांटिस लान गचक भर ओली ।
लड़का मन खावत लहुटत हें कूदत करत ठिठोली ।।
कथय गरीबा -“”बालक मन तिर, तंय गोठियाय हवस दिल खोल
अनुभव बता – राह दे मोला, ताकि जान लंव जग के पोल ?”
सुद्धू कथय – “”संगठित होवव, झोंकय भाड़ चना नइ एक
तइसे एक जूझना मुश्किल, जलगस सुंट नइ बंधिहव एक.
डढ़ियल बर के तरी मं जइसे, हिनहर घास सकय नइ जाम
बर हा पर हक के रस पीथय, नइ जानय परमार्थ के काम.
ओ बुर्जुआ हा चिड़िया मन ला, अपन तिलिंग मं रखथय पाल
पेड़ गिराय शत्रु मन आहंय, कोतल दिहीं मदद तत्काल.
बर के निसनाबुत करना हे, पर नइ बनत कुछुच बेवसाय
उद नइ जरा सकत एक टंगिया, बुड़ना चहत धार बिच नाव.
यदि बिन्द्राबिनास करना हे, टंगिया झुण्ड फेंट बंध जाय
चारो तन ले झूम के पहटंय, बर भर्रस गिर जहय जमीन.
ए बिस्कुटक अकड़दन्ती ए, पर व्यवहार मं सच जस बेर
करो काम तब भविष्य फरिहर, सिर्फ सोच मं बढ़थय क्लेश.”
सुन के बात गरीबा सोचत – ददा देत हे नेक सलाह
एकर बिन सब बुता हा गड़बड़, सुम्मत बंध धरना हे राह.
सुद्धू तिर ले ज्ञान मांग के, काम करे बर जावत खेत
पिनकू साथ भेंट होइस तंह, थोरिक रुकिस करे बर बात.
मुसका पूछत हवय गरीबा -“”लम्हा चलत कते तंय गांव
बड़े काम मं फंसे जनावत, फुरिया का लगाय हस दांव ?”
पिनकू कथय -“”ठीक बोलत हस, मुश्किल थमई देर तक पांव
हमर महाविद्यालय मं अभि, छात्र संघ के होत चुनाव.
देत पलोंदी छात्र मित्र मन, टक्कर लेवत मंय कंगाल
मोर विरुद्ध हठील लड़त हे, जउन आय धनपति के लाल.
करत हठील प्रचार खर्च कर, धन ला पानी असन बोहात
मगर तोर तिर धन के कमती, का परिणाम – उमंझ नइ आत !”
पिनकू हकन के कह नइ पावत, ओकर हृदय हा धक धक होत
पिनकू के उमंग बाढ़े बर, भरत गरीबा हा उत्साह-
धन वाले से लड़ना याने डबरा – सिन्धु लड़ाई ।
लेकिन बिन संघर्ष करे हिनहर के कहां भलाई ।।
भले हार के हार तोर गल, पर मन मं तंय भय झन पाल
होहय नाम – बड़े अदमी संग, टक्कर लीस एक कंगाल ”
दीस गरीबा हा हिम्मत ला, पिनकू धरिस जाय बर राह
नांदगांव मं जहां पहुंचथय, ठंडा परिस जति उत्साह.
चौक – चौक मं टंगे हे पोस्टर, ओमां लिखे हवय संदेश
मित्र हठील चुनाव लड़त हे, करत छात्र मन पर वि·ाास.
ओला सब मिल देव पलोंदी, जुर मिल के निश्चय जितवाव
एकर सहि प्रतिभा नइ पर तिर, सब के मदद करत हे दौड़”
तभे उहां नंदले हा आइस, ओहर पिनकू ला कहि दीस-
“”तंय हा इहां पढ़त हस पोस्टर, पर ओ डहर काम कुछ और.
तोर विरुद्ध प्रचार होत हे, जमों छात्र मन ला उकसात
हवय हठील हा उत्तम मनखे, ओकर हृदय हा बिल्कुल साफ.
चहत महाविद्यालय के उन्नति, यदि तुम चहत पाय अधिकार
तब हठील ला देव अपन मत, वरना नइ ककरो उद्धार.
हठील भइया बड़े गोसंइया, एकर मदद कोन नइ पाय !
जमों छात्र के इही सहायक, एकर मुड़ी तरी झन जाय.
पिनकू ला मत, मत देवव तुम, खुद भुखमर्रा – महादलिद्र
अपन टोंड़का सिल नइ पावत, कहां मूंद सकिहय पर – छेद !
याने जब पिनकू नइ पावत, अपन पेट भर खाय अनाज
तब पर – मदद का थोथना करिहय, व्यर्थ रखई ओकर मुड़ ताज.”
पिनकू हा मुसका के बोलिस -“”एकर अर्थ जान मंय लेंव
मोला सब हराय बर सोचत, एकर बर कंस करत प्रयास.
लेकिन नंदले, फुरिया सच तंय – चल दिस कहां छात्र के हेट !
खोजेंव मरत मगर दर्शन नइ, धन तो अभर गेस तंय मात्र ?”
नंदले कथय “” बतावंव का मंय ठग दिन सब विद्यार्थी ।
लालच दे के हठील बनगे सब झन ले परमार्थी ।।
जतिक छात्र पाती दबाय बर, खाय रिहिन किरिया कई घांव
तेन तोर ले भागत दुरिहा, टकटक दिखत के बुड़ही नाव.
मोर पास मं हठील हांकिस -“” तंय मंय आन अभिन्न मितान
समझ भरोसिल आय तोर तिर, दुसरा अस तंय देबे साथ.”
लेकिन नट – इंकार देंव मंय – हम अन मितवा ध्रुव अस ठीक
यदि मित्रता के चाहत बल्दा, प्राण ले सकथस निज तिर झींक.
पर असमस मत ला संउपे बर, एमां हवय बहुत जड़ राज
कतको झन के रांड़ बेचाहय, जे निर्दाेष के मुड़ पर गाज.
प्राध्यापक ला बहुत सताबे, गलत बात के करबे मांग
जमों छात्र ला अपन पक्ष कर, ओमन ला करबे गुमराह.”
मोर बात ले हठील भड़किस, कूद कूद के लात जमैस
बइला अस कुचरई झेले हंव, ते कारन तन मरत पिरात.
अंउ उपरहा हठील जोहारिस – “”खतम होन दे होत चुनाव
मंय तोला केंघरा के रहिहंव, घुसड़ जहय जतका अस ताव.
तोला नइये जग के अनुभव, तभे कहत उंचहा सिद्धांत
आज सत्यवादी अस बोलत, खोलत हवस मोर सब दोष.
लेकिन बाद मं पता हा चलिहय – वास्तव मं संसार हा काय !
तंय जब दुख – अभाव ला पाबे, सब सिद्धांत हा होही नाश.
तंय खुद गलत राह पर चलबे, करबे निम्न – निम्नतर काम
कतको बद्दी तोर मुड़ी पर, नक्टा अस रहिबे चुपचाप.”
पिनकू दुख मानिस ओकर सुन, नंदले के हिम्मत संहरात-
“”मंय हा भले चुनाव ला हारंव, पर दुंख माने के नइ बात.
तोर असन सैद्धान्तिक मनखे, अमरा होवत अड़बड़ नाज
मुड़ी गर्व मं ऊपर जावत – मंय पहिरे हंव विजय के ताज.
लेकिन मोला समझ आत नइ – चल दिन कहां पढ़ैया ।
उंकर साथ मंय मिलना चाहत – ज्ञात होय सच भैय्या ।।
नंदले फोरिस -“”जमों छात्र ला, रखे हठील अपन घर धांध
जइसे बिन मुंह के गरुवा ला, रखथंय गेंरवा मं कंस बांध.
यदि हठील तिर तंय हा जाबे, मढ़ देहय फोकट के दोष
कुछुच असम्भव नइ ओकर बर, काबर के चुनाव के रोष.”
“”बहना मं मुड़ डार चुके हंव, मूसर ला काबर डर जांव !
मंय हठील तिर निश्चय जाहंव, चाहे उहां होय अनियाव.
ओकर ले कुछ भय खाये बिन, सफा सफा मंय लुहू जुवाप –
विद्यार्थी ला बेंड़ रखे हस, काबर देवत हस संताप !”
अतका असन बोल पिनकू हा, ओहिले बल दिस गोड़ उसाल
जब हठील के घर तिर पहुंचिस, उहां के लेवत सुनगुन हाल.
जे हठील के मांई चमचा, तेन अंजोरी देखिस झांक
पिनकू ला ओहर देखिस तंह, फेंकत घृणा – सिकोड़त नाक.
गीस अंजोरी हा हठील तिर, कहिथय -“”मित्र, बात सुन मोर
जेकर मुंह ला अशुभ हे कहिथस, संउहत आय विरोधिल तोर.”
कथय हठील व्यंग्य भाषा मं – “”उत्तम खबर लाय हस आज
पिनकू बर हे बेंस हा खुल्ला, अंदर लाव मान के साथ.”
खुद हठील दरवाजा खोलिस, हंसत गीस पिनकू के तीर –
“”कोन मोर अस भाग्यवान हे, प्यासा पास आत खुद नीर !
परबहिरा अस कार खड़े हस, अंदर चल करबो हंस गोठ
कभूकाल रद्दा बिसरे हस, दुहूं खाय बर गांकर रोंठ.”
पिनकू थोरको ध्यान दीस नइ ओकर कपटी बोली ।
अंदर गीस बिगर भय चाहे मृत्यु मंगे बिन झोली ।।
जइसे गरी मं फँस के आथय, बिन अन्हो मीन सुएम
तइसे पिनकू पर दुख आवत, चांटी आथय धर के रेम.
उहां रिहिन हें छात्र बहुत झन, खावत पियत करत हें मौज
ओमन जब पिनकू ला देखिन, मुच मुच करत नचा के आंख.
पिनकू के अपमान करे बर, सोचत हे हठील हा खूब
व्यंग्य शब्द मं छात्र ला बोलिस -“”पिनकू झन अवहेलित होय.
बपुरा तुम्हर शरण मं गिर गिस, एकर करो खातरी – मान
एकर काम हवय तुम्हर तिर, स्वयं अभर के दर्शन देव.
खोजत हवय पेज पसिया धर, खुद के सुध बुध सब ला खोय
तुम अब कृपा करो ओकर पर, कर के घृणा भगव झन छेंव.
पिनकू डारत दोष मोर पर – तुमला मंय धांधे हंव बेंड़
पिनकू चहत स्वतंत्र कराना, चहत लेगना तुरूत खखेड़.”
विद्यार्थी मन थपड़ी पीटत, पिनकू के कंस हंसी उड़ात
मींधू किहिस -“”मित्र, तंय हा सुन, इहां आय हस धर के आस.
हमर पास मं हे जतका मत, लेना चहत अपन के ओर
याने तंय चुनाव जीते बर, मंगत हवस हम सब के वोट.
जइसे हठील हा खर्चा कर, हमला खूब खवात पियात
तइसे तंय हा खवा – पिया अउ, नगदी रूपिया के कर भेंट.”
हंसिस हठील -“”कहां दे सकिहय, पिनकू खुद मांई कंगाल
पर के मुंह ला जोहत रहिथय, अपन ला पालत मुश्किल बाद.
मंय जानत हंव साफ भेद ला, पिनकू काबर करत विरोध –
के हठील हा रूपिया गिनिहय, तंहने बइठ जहंव मनबोध.
पर मोला एकोकन भय नइ – पाहंव नइ चुनाव के पार
बहुत भरोसा जमों छात्र पर – गला डारिहंय विजय के हार.
अपन ला बेचे बर पिनकू हा, मोर द्वार मं हंफरत आय
उचित दान मर सोग देत हंव – कड़कड़ रूपिया गिन दस लाख.”
पिनकू कथय -“”मंहू समझत हंव तोर एल्हई के भाषा ।
अंदर भरे करुविष लेकिन ऊपर लगत बतासा ।।
तुम धनवन्ता धन के बल मं, हम गरीब ला नीच बनात
बइला जइसे मोल करत हव, पर पत लूट अनंद मनात.”
पिनकू के खिल्ली उड़ाय बर, कथय अंजोरी घुमा के आंख-
“”सुन हठील, तंय हा गिरात हस, भले मनुष्य के इज्जत साख.
पिनकू अस सैद्धान्तिक अउ नइ, जांच लेंव मंय जगत टटोल
भूल कुराह चलय नइ तब फिर, कहां ले बिकही नोट के मोल !”
पिनकू किहिस अंजोरी ला खब -“”सुरो झनिच तंय उल्टा दांव
तंय हठील के पक्ष ला लेवत, लेकिन करत हवस अन्याय.
हम तुम भिना फूट ते कारन, धनी लेत लाहो टिंग पांच
सुम्मत बंध विरोध जब करबो, इंकर निकलिहय शेखी कांच.”
अतका सुन हठील पगला गे, झोरत पिनकू ला बन शेर
बकथय -“”मोर साथ लड़थस तब, फल ला चीख तुरूत ए मेर.
समझउती ला फॉक देत हस, मोरे घर घुस मारत टेस
तोर प्राण ला लुहूं क्रूर बन, कुछ परिणाम फिकर नइ लेश.”
मरते दम हठील थूरत बंगी पढ़ गावत होरी ।
तिसने मं बचाय पिनकू ला कूदिस बीच अंजोरी ।।
किहिस अंजोरी हा हठील ला -“”व्यर्थ भिड़त माछी के साथ
एकर ले तोर सोर उड़य नइ, ऊपर ले गंधाहय हाथ.
तंय पिनकू संग झंझट करबे, तोर स्वयं के इज्जत नाश
तोला कोन हरान सकत अब, राई दुसर – हठील पहाड़.
यदि पिनकू ला कुछ हो जावत, होत चुनाव मं परिहय आड़
अभी छात्र मन तोर पक्ष मं, ओमन बिदक के होहींे दूर.
ओमन तोला हरा दिहीं भिड़, तोर जीत हा हो जहि हार
तंय हा पिनकू ले दुरिहा हट, अपन साख ला बना के राख.”
हठी हठील बहुत मुश्किल मं, पिनकू ऊपर दया देखैस
पिनकू ला चींगिर चांगर धर, घर के बार फेंकवा दीस.
पिनकू टेंग टेंग कर रेंगत, पत्रकार टैड़क संग भेंट
ओकर तिर हर भेद खोल दिस – कइसे होत रिहिस आखेट !
टैड़क किहिस -“”मंय जम्मों जानत – हवय हठील कतेक चण्डाल
कोनो ला घेपय नइ थोरको, कीरा परे हे ओकर चाल.
अपन लाभ – यश भर ला देखत – जबकि हवय मरखण्डा – क्रूर.
लेकिन मंय हठील अस नोहंव, मंय हा पत्रकार जागरुक
देवत हंव समाज ला एका, दीन हीन के करत सहाय.
सत्य खबर के करत सूचना, जन दुश्मन के खोलत पोल
यदि तंय मोर मदद ला चाहत – मोर साथ चल मोर निवास.
एक चिकित्सक बला के लाहंव, दवाई खवा के करिहय ठीक
तेकर बाद कहूं जा सकबे, फुरिया – गलत कहत ते नेक !”
“”एक व्यक्ति हा भूख मरत हे, ओकर तिर मं थारी अ‍ैस
ओमा सजे हे स्वादिल जेवन, भुखहा कहां ले सरका पैस !
तइसे तंहू दयालू हस जी, मोर मदद बर आगू आत
तोर बात ला कइसे मेटंव, मंय तैयार तोर संग जाय.”
पिनकू हा अतका अस बोलिस, तंहने टैड़क के घर अ‍ैस
ओहर अपन दिमाग मं सोचत – इही बचाहय जावत प्राण.
खटिया दसा सोवा पिनकू ला, टैड़क हेरिस मंदरस बोल
“”मंय जावत हंव लाय चिकित्सक, तोर स्वास्थय ला कर दे ठीक.
सेवा तोर बजाय भिड़े हंव मुंह झन लान उदासी ।
टंच खड़ा नइ होबे तलगस कहां ले खाहूं बासी ।।
टैड़क चल दिस लाय चिकित्सक, पिनकू उहां हवय बस एक
ओहर करत विचार अपन मन – हर इंसान एक नइ होंय.
सब के कुथा कुथा हे बूता, क्रूर हठील हा बिखहर नाग
कंस फुँफकार जहर ला उगलिस, जान हरे बर करिस प्रयास.
पर टैड़क हा बहुत दयालू, अमृत अस करथय उपकार
मोर प्राण के रक्षा खातिर, उदिम उचावत भोजन त्याग.”
पिनकू हा मन मन मं घोखत, पत्रकार टैड़क हा अ‍ैस
ओकर संग मं दू आरक्षक, लौह हथकड़ी उनकर हाथ.
आरक्षक मन पलक के झपकत, पिनकू के मरूवा धर लीन
कलमा पढ़िस एक आरक्षक -“”अरे चोर, तंय कर कुछ लाज !
तंय बजरंगा असन युवक हस, श्रम के लइक हवय तन तोर
पर टैड़क के घर घुसरे हस, ओकर जिनिस करे बर साफ.
कते मेर सब जिनिस रखे हस, मोर पास मं तुरते लान
यदि आज्ञा के करत उदेली, सोझिया देहूं थपरा मार ?”
दूसर कथय -“”मंहू जानत हंव – ए चोरहा के गलत सुभाव
चोरी करना एकर धंधा, जुन्ना अनुभव एकर पास.
सूनसान घर मं फट घुसथय, करत सेंधमारी ए ताक
टैड़क ला गैरहाजिर पाइस, चोरी बर फट ले घुस गीस.
देखव भला बहाना एकर – हमला देखिस घर मं आत
तंह खटिया पर सोगिस चटपट, हाय हाय कर बिपत बढ़ात.
पर आतंकी क्रूर अपराधी, गुण्डा अउ असमाजिक जीव
एमन कतको देत छटारा, आखिर हमर हाथ मं आत.
ए चोरहा हा करिस चलाकी, जान लेन हम नकली रूप
मछरी एतन – ओतन सल्टत, मगर जाल मं फंसथय बाद.”
पिनकू हा अचरज मं फंस गिस, कहां ले मुड़ पर बिपत पहाड़ !
कृषक ला बोना हवय धान ला, जोहत हे वर्षा के राह.
लेकिन वर्षा ऋतु हा ठग दिस, सीधा पहुंच गीस ऋतु जाड़
तइसे पिनकू धोखा खा गिस, दुख के वर्षा आपसरूप
बीते दुख ला ओरिया बोलिस -“”तुम्हर बात कर दीस अवाक
मंय हा अपराधी चोरहा नइ, वास्तव मं कालेज के छात्र.
यदि मंय हा कुछ कहत लबारी, टैड़क ला पूछव तुम साफ
मोला शरण दीस बपुरा हा, तब ओकर घर करत अराम.”
टैड़क टप फांकिस -“”रे लबरा, तोर मोर कब के पहिचान
चोरी करत मोर घर घुस अउ, मेटत हस मोर सच ईमान !”
प्रथम आरक्षक ललिया बोलिस -“”हम जानत हन चोर सुभाव
पकड़े बाद बनत हें सुधुवा, अउ ऊपर ले झड़थंय ताव.
रंगे हाथ तंय हाथ आय हस चल तंय पहिली थाना ।
कतका तर्क तोर तिर तेला उंहचे अमर बताना ।।
पिनकू हा टैड़क ला बोलिस -“”तंय समाज के धारन आस
तंय जनता मं लात चेतना, गलत काम ले मारत रोक.
पर खुद भटकेस गलत राह पर, कथनी कर्म अलग हे तोर
लाय चिकित्सक गेस दया मर, पर आरक्षक मन ला लाय.
मोला स्वस्थ कराय केहे तंय, पर अभियुक्त के लग गे दाग
पत्रकारिता तोर क्षेत्र हे, तेमां लग गे करिया दाग.
पर मोला अफसोस हे एकर – होय बहुत धोखा षड़यंत्र
दैनिक पत्र मं खबर हा छपतिस , लेकिन कहुंचो छप नइ पाय.”
टैड़क किहिस -“”जउन तंय सोचत, पूर्ण हो जाहय सबो विचार
तोर खबर हा निश्चय छपिहय, प्रथम पृष्ट पर अक्षर मोठ.
सुन्तापुर के एक युवक हा, जेहर लगत सरल ग्रामीण
ओहर हा अपराधी बन गिस, गलत जगत मं करिस प्रवेश.”
आरक्षक मन पिनकू ला धर, अपन साथ थाना मं लैन
दू असाढ़ दुब्बर बर होवत, मरते दम हलात छे हाल.
उहां उपस्थित रिहिस हे अगमा, जेहर महिला थानेदार
ओला आरक्षक हा बोलिस -“”मैडम, तंय सुन हमर गोहार.
पिनकू आय बड़े अपराधी, ओला हम हा पकड़ के लाय
टैड़क के घर घुसे रिहिस हे, ताकि चोराय कीमती चीज”
अगमा हा पिनकू पर बफलिस -“”मानव ला चहिये धन अर्थ
ओला पाय करय कंस मिहनत, गलत राह ले कभु झन पाय.
पत्रकार हा अलख जगाथय, ओला तंय हा देतेस लाभ
पर ओकर घर डाका डारत, आखिर कार करत अपराध ?”
पिनकू अपन पक्ष ला रखथय -“”मैडम, सुनव कलपना मोर
मंय कालेज के विद्यार्थी अंव, छात्र संघ के लड़त चुनाव.
रच षड़यंत्र फंसावत मोला, मंय बलि के बोकरा निर्दाेष
करो भरोसा मोर काम पर, मोला झप कर देव अजाद.”
अगमा बोलिस -“”चालबाज हस, भितर लुकात स्वयं के दोष
तोर विरोधी हार जाय कहि, ओकर मुड़ डारत सब दोष.
मंय हा अंव कानून के रक्षक, तोला कर नइ सकंव स्वतंत्र
हवालात मं लेग के धांधत, अपन कर्म के फल ला भोग.”
पिनकू हवालात मं चल दिस, थोरिक मं मीधू हा अ‍ैस
अपन साथ मं लाय चंदाही, ओमां हे जेवन स्वादिष्ट.
मींधू कथय -“”लाय हंव जेवन, मीठ कलेवा ऊंच पदार्थ
जमो फिकर ला तंय हा टरिया, पहिली सक भर जेवन झोर.
दुख – सागर मं बुड़े हठिल हा, लेवत हवय तोर बस नाम –
पिनकू काबर धरिस कुरद्दा – काबर चहिस होय बदनाम !
तोर खाय जेवन लाने हंव, ओला भेजिस मित्र हठील
यदि आग्रह ला लतिया देबे, तब हठील पाहय दुख दून.”
पिनकू कथय -“”मोर भाई अस, तोर ओसला मोर समान
पर हठील ला देत पलोंदी, ओकर कोतल तक बन गेस.
तंय हठील के यश फइलावत, लेकिन मोर बात रख याद
पाछू चल के धोखा खाबे, बोम पार के परिहय रोय.
मंय अनाज ला नइ दुर्रावंव, सुत उठ परथंव ओकर पांव
मंय हा गांव के रहवइया अंव, जानत उहां के वाजिब हाल.
कृषक श्रमिक मन मरत कमाथंय, तेकर बाद अन्न उपजात
तब अनाज के इज्जत होवय, एकर कृपा ले बचथय प्राण.
तंय हा जेवन अभी लाय हस – लपटे हे छल – कपट के खून
मोला निश्चय धोखा मिलिहय, तब ए जेवन ला नइ नांव ”
पिनकू के बोली ला सुनथंय, होगिन दंग उहां के लोग
वाकई काय बात ए कहि के, थारी जांचत खोल के नैन.
मींधू हा पिनकू पर झपटिस -“”तंय हस चलवन्ता इन्सान
तोला धरे भूत बयरासू, तब तो बोलत ऐन बैन.
काबर बोलत झूठ कहां जेवन मं रकत ललामी ।
वास्तव मं तंय करना चाहत हठील के बदनामी ।।
पिनकू कथय -“”जउन बोले हंव, ओहर सत्य असन सच गोठ
मोर बात ला साफ समझ तंय, कान के कनघौवा ला हेर.
पर के श्रम के हक ला खाथय, ओहर लहू पियइया जोंख
खुद उठाय बर पर ला पाटत, हे चलाक पर सच मं धूर्त.
हे हठील हा अवगुण के घर, पर के खून कमई ला खात
ओकर जेवन ला यदि खाहंव, दीन आह चढ़िहय मुड़ मोर.
अगर हठील खवाये चाहत, कर मिहनत चुहाय श्रम बूंद
निरपराध ला झन फंसाय कभु, पर ला करय झनिच गुमराह.
विजय पाय बर ओहर सोचत, पकड़य तुरूत सत्य के मार्ग
तब ओकर जेवन ला खाहंव, काबर के अनाज निष्पाप.”
“”कंगला काबर गरब देखावत, तोर भरे हे ओंटइट पेट
पर अनाज ला फेंकन कइसे, हम्मन भिड़ के देत चहेट.”
अतका कहि आरक्षक मन हंस, भोजन बांट उड़ात गफेल
अउ पिनकू ला टुहू देखावत, बपुरा ला सड़ात कर एल.
तभे हठील हा उहंचे आथय, मींधू हा कई चुगली खैस –
“”भेजे रेहेस तंय जउने जेवन, ओला पिनकू हा नइ खैस.
उल्टा ओकर करिस हइन्ता – जेवन मं सनाय हे खून
तब मंय ओला कइसे खावंव, लहुटा देव हठील के पास !”
लानिस मुंह ऊपर नकली दुख, कथय हठील केंघर के खूब –
“”पिनकू हा जेवन झन खावय, जमों दोष डारय सिर मोर.
रखत सहानुभूति ओकर पर, हम दूनों सहपाठी आन
साथ साथ हम हलत चलत हन, ओकर दुख हा ए दुख मोर.”
पिनकू ला हठील हा कहिथय -“”मित्र, उचाय आज का काम
सिरिफ तोर नइ होत हइन्ता, तोर साथ हम तक बदनाम.
कोकड़ा के सफेद झक पांखी, दिखत उपर ले साधु समान
लेकिन भितरंउधी मन करिया, टप लेवत मछरी के प्राण.
तइसे तंय हा सुघुवा लगथस, तोर आचरण पर वि·ाास
पर धोखा दे हस ते कारण, जमों छात्र मन होय हताश.
यदि रूपिया के अतिआवश्यक, मोर पास रखते तंय मांग
मंय करतेंव मदद हरहिन्छा, बता भला कभु जुच्छा गेस !”
करत दया के वर्षा मानों हठील हा परमार्थी ।
हाय हाय अउ शर्म शर्म कहि थूंकत सब विद्यार्थी ।।
पिनकू कथय – “”हाथ जोड़त हंव, तंय झन भुरक घाव में नून
चक्रव्यूह रच खुद धंसाय अउ, दउड़े हस जराय बर खून.”
किहिस हठील -“”पियत हंव मानी, मित्र समझ मंय आय छोड़ाय
पर तंय उल्टा बिफड़त तब रहि, दानव किला सदैव धंधाय.”
– “”मंय भर नइ अउ कतको साथी, सत बर भोगत कारावास
जगलस ले उद्देश्य पूर्ति नइ, अपन राह पर चलिहय पांव.”
– “”सोचत तेन कठिन तेकर ले, किला ला बनवा अउ सुदृढ़
पहरादार ला लगा पलोंदी, छकते तक झड़ बोबरा – खीर.”
“”हम नइ – मगर हमर कुछ साथी, किलादार ला देवत साथ
फुलगी चढ़ दीपक बारत तब, जेन बसुन्दरा तेन अनाथ.
लेकिन तंय धोखा मं झन रहि, किला भर्र गिरिहय मुंह फार
पहरेदार हा चपका मरिहय, तब सब पाहंय अन्न के थार.”
जब हठील के ज्वाप सिरागे, थाना के बाहिर मं अ‍ैस
उहां अंजोरी – पौना हाजिर, उंकर साथ कई छात्रा – छात्र.
पाय हठील हा सुघ्घर अवसर, ओहर किहिस छात्र तन देख-
“”तुम परखव पिनकू के करनी, ओकर चाल गलत के नेक !
मितवा समझ समोखे आएंव, पर बरनिया आंख ललियात
खोटहा काम करिस खुद लेकिन, हमर मुड़ी पर डारत दोष.
दिखथय – व्यर्थ चुनाव लड़ई – जब बिन कारण बरबादी।
मुखिया दुसर बनाव – तुम्हर ले लेना चहत सलामी ।।
अब हठील हा थथमराय अस, ओहर दिखत दुखी मायूस
ओमा फिर उत्साह भरे बर, आगू रखिन नवा प्रस्ताव.
किहिस अंजोरी -“”सच मं बदरा, तेन धान हा दिखब मं ठोस
विद्युत तार चमक मन मोहत, लेत जीव ला खुद आगोश.
तइसे पिनकू छद्य आदमी, ओकर ले समाप्त वि·ाास
समय – पूर्व सब चरित्र फरिहर, होन पैस नइ भावी नाश.”
पौना घलो दबाथय पाती -“”सुन हठील, तंय हमर विचार
तोला – पिनकू ला तउले हन, होगिस पता कोन हे नेक !
तंय एकोकन संसो झन मर, मन आगर कर जीत चुनाव
खावत कमस – बनाबो विजयी, उसलय नइ अंगद के पांव.”
दीन छात्र मन हा हठील ला, आ·ाासन हिम्मत प्रण ठान
थुवा – थुवा करथंय पिनकू ला, ओकर मेट दिन पत – मान.
विद्यार्थी मन संग हठील हा, ओ तिर ले लहुटिन तत्काल
जब उद्देश्य हा पूरा हो गिस, काबर करंय समय बर्बाद !
पिनकू हा निर्दाेष सत्य अस, लेकिन कोन करत वि·ाास
आरक्षक मन हा बेली भर, लेग बेड़ दिन कारावास.
पिनकू हा निरघा कर जांचत – चौमुन्दा मजबूत हे जेल
बाहिर भगना कठिन हे जइसे – दीन, धनी ले हारत खेल.
एला देख उहां के कैदी मन ला आगे हांसी ।
चलव एक अउ संगी आगे चढ़े हमर संग फांसी ।।
द्वासू कथय -“”तंहू जानत हस – होथय कई प्रकार अपराध
हत्या डाका बलवा चोरी, मारपीट धोखा अउ लूट.
ऊपर मं मंय नाम टिपे हंव, तंय हा करेस कते अपराध
अपन अपन हन – इहां दुसर नइ, रख जुवाप बिन भय निर्बाध ?”
पिनकू किहिस -“”कहां डर मोला, ककरो घर लगाय नइ सेंध
लेकिन एकर फिकर बियावत, कारागृह धंधाय बिन दोष.”
बंदी बेदुल खलखला हंसिस -“”वाकई तंय बुद्धू इंसान
पहिली बखत इहां पहुंचे हस, तभे फिकर कर देवत जान.
कान खोल सुन हमर कहानी – जेल ले हमला नंगत प्यार
एक गोड़ हा जेल मं रहिथय, दूसर गोड़ हा बाहिर पार.
हमर मकान – ठौर नइ दूसर, कारागृह हा ए ससुराल
इहां कर्मचारी तेमन हा, लगथंय जस – सग रिश्तेदार.
यदि बंदी मन इहां नइ आहंय, इंकर जीविका खत्म बलात
तब मर सोग इहां हम आवत, ककरो पेट परय झन लात.”
बुल्खू लड़त श्रमिक के हित बर, देत हीन दुर्बल ला साथ
उहू धंधाय हवय कारागृह, पर के कारण भोगत जेल .
बुल्खू हा सब ला सम्बोधिस – “” पर के मदद करत हे जेन
जे शोषण विरुद्ध निर्दाेषी, निरपराध मन इहें धंधात.
शोषक अत्याचारी घालुक, जेकर ले दुख पात समाज
छेल्ला किंजरत पात प्रतिष्ठा, दुनिया भर के भोगत राज.
चाहत कोन बनंव अपराधी – कोन निबुद्धि चहय नइ शांति
पर समाज के रूप हा बिगड़त, तब बदले बर करथंय क्रांति.”
जेवन नाय बुलउवा होइस, बंदी मन कतार बंध गीन
जउन जिनिस ला पशु नइ सूंघय, तइसन चीज खाय बर पैन.
बंदी मन मुंह मं नइ बोलिन, निंदा करिन इशारा मार
उहां रिहिन कई झन आरक्षक, उंकरे भय हा चुप रख दीस.
बंदी मन हा का कर सकथें – इगिल चिगिल कर भोजन लीन
एकर बाद लहुट गिन बैरक, उहां चलत हे उंकर जबान.
बेदुल किहिस -“”खाय हव तुम अभि, खूब हिनत हव ओकर स्वाद
पर शासन हा पेट ला भर दिस, ओकर कृपा के कर लव याद !
जेवन रिहिस मोर बर अमृत, कुछ तो मिलगे जीव बचाय
यदि मंय कारागृह ले बाहिर, काम अन्न बिन जातिस प्राण.”
बुल्खू हा बेदुल ला बोलिस -“”मंय समझत हंव भाषा व्यंग्य
शासन पर कटाक्ष मारत हस – ताकि व्यवस्था आय सुधार.
तंय हा क्रांतिकारी अस लगथस, फुरिया भला अपन उद्देश्य
जनता ला सुख शांति पाय कहि, कोन किसम के उदिम उठात ?”
बेदुल उग्र रूप धर कहिथय -“”मंय जनता के सेवक आंव
हिनहर असक के मदद ला करथंव, तभे मोर मन पाथय शांति.
शोषक अत्याचारी मन ला, मानत नाग सांप अस शत्रु
धर्म नाम मं जउन हा लूटत, ओला यम बन देथंव दण्ड.
याने शोषण खत्म करे बर, मंय धर सकत क्रूर अस राह
हिंसा मारपीट तगड़ा कर, देश शत्रु के टोरत रीढ़.”
बुल्खू किहिस -“”मंय स्वीकारत हंव, बिल्कुल ठीक तोर सिद्धांत
हिनहर – दीन ला देत पलोंदी, देशभक्त अस रत कर्तव्य.
पर शोषण ले टक्कर लेथस, तेकर राह भरे हे खून
हिंसा मात्र क्रूरता बांटत, एकर ले नइ सही सुधार.
शासन से संघर्ष करत यदि, चहत व्यवस्था मं बदलाव
बुद्धि कर्म संगठन शक्ति पर, गलत नीति से टक्कर लेव.”
बेदुल फांकिस -“”रहत सुरक्षित, सब खतरा ले जन के शत्रु
पूंजी पद कानून उंकर तिर, सब तन ले सक्षम बलवान.
नीति साथ यदि टक्कर लेवत, अरि के जीत सुनिश्चित होत
तब हम हिंसा के पथ धरथन, एकर सिवा राह नइ और.”
“”लात के देव बात नइ मानय, लोहा ले लोहा कट जात
ऊपर के सिद्धान्त भी हमला, झगरा हिंसा तन बंहकैस.
वरना शोषक साथ लड़े बर, खोज सकत अउ अन्य उपाय
मुड़ी दरद पर परय न पथरा, चुपरे जाथय ठंडक तेल.”
बुल्खू मीठ उल्थना देवत, पर बेदुल ला करुजनात
मित्र नराज झनिच होवय, कहि, बुल्खू करथय बहस समाप्त.
जहां रात हा आथय तंहने सब तन करिया कारी ।
किंजरे बर नइ जान सकत काबर के पहरा भारी ।।
सोय बखत बंदी मन सोइन, पर दसना के घलो अभाव
काकर करा अपन दुख रोवंय, कोन उबारय इनकर नाव !
अउ मन नाक बजावत घड़ घड़, मगर जगत पिनकू के आंख
अटपट बात बहुत मन सोचत, इसने मं अधरतिया राख.
घोण्डू प्रहरी देवत पहरा, जेन हा हावय अंड़ के ठाड़
लोहा के कपाट हे बड़जक, उही बीच मं आवत आड़.
पिनकू हा कपाट के तिर गिस, घोण्डू ले कर दीस सवाल-
“”एक प्रश्न के उत्तर मांगत, झन हो जबे भड़क के लाल.
जब मनसे पर चिंता आथय, ओकर नींद भगाथय दूर
ककरो साथ करय नइ चर्चा, ओहर करत स्वयं से बात.
तंहू ला टकटकी लागे हावय , सोचत हस पर बंद जबान
आखिर तोला चिंता काकर, काय दबाव हवय मुड़ तोर ?”
घोण्डू गुर्राइस बघवा अस -“”अपन पेट भर दोंह दोंह खाय
सब तन ले निश्चिन्त सुखी हंव, मोला एकोकन नइ फिक्र.
सब बंदी मन नाक बजावत, तंहू हा चुप सुत मिटका आंख
मोर कान ला बिल्कुल झन खा, मोला करन दे खुद के काम.”
“”वास्तव बात बतावत हंव अब, मंय हा रखत प्रश्न गंभीर
एकर उत्तर लान सामने, तंहने मंय सुतिहंव चुपचाप –
हम्मन अन जघन्य अपराधी – धोखाबाज, क्रूर बदनाम
तब बेंड़ाय हम कारागृह मं, अधम कर्म के फल ला पात.
पर तंय का अपराध करे हस, ठाड़ खड़ा रहि जागत आंख
आखिर कोन सजा देवत हे, तोला कोन रखे हे धांध ?”
प्रहरी हा खखुवा के बोलिस -“”हम हा अपराधी नइ आन
हमला कोन सजा दे सकिहय, हमला कोन सकत हे धांध !
तुम्मन इहां ले झन भग जावव, तुम्हर रखे बर हम तैनात
इहिच हमर कर्तव्य आय सुन, हम कर्तव्य ला करथन पूर्ण.”
“”कहि असत्य पर लाभ ले वंचित, तंय नइ आस हमर रखवार
तंय करिया कानून के रक्षक, कुकुर असन पोंसे सरकार.
तभे जेन शासन तिर जाथय वाजिब हक ला मांगे ।
तेला तुम भूंकत कुदात हव कोकने चाबे पांगे ।।
घोण्डू हांव हांव कंस करथय, पिनकू पर हो गीस नराज
झोरे बर आगू तन बढ़थय, पर ओकर सब यत्न बेकार.
लगे हवय लोहा दरवाजा, तेहर बीच मं परगे आड़
धोण्डू हा हड़बड़ा के रहिगे, पिनकू पास पहुंच नइ पैस.
पिनकू पीछू डहर सरक गिस, इसने मं कटगे कुछ टेम
प्रहरी हा पिनकू ला बलाथय, ओतका बखत बहुत गंभीर.
बोलिस -“”तंय हा उत्तर मांगत, तब मंय देवत साफ जवाब –
वास्तव मं तंय नइ अपराधी, मंय नइ करेंव कभुच अपराध.
जग मं हवय एक अपराधी – ओकर नाम हे पापी पेट
ओला पाले बर हम मानत, शासन के हर एक आदेश.
अच्छा बुरा – निघरघट साऊ, आथंय इहां जउन इंसान
ओकर गुण अवगुण नइ देखन, कर के बंद राखथन मात्र.
एकर बल्दा पाथन रुपिया, ओकर एवज बिसात अनाज
खा के अन्न पेट ला भरथन, तब बच जाथय तन के प्राण.
पापी पेट अगर नइ होतिस, रहि के खड़ा जागतेन कार !
होथय रात अराम करे बर, हमूं हा लेतेन गहगट नींद.”
घोण्डू लम्हा सांस खींचथय, फेर करत पहरा के काम
पिनकू हा खुस खुस मुसकाथय, एकर बाद सोय बर गीस.
पिनकू हा मिटका के ढलगिस, जाने बिगर लगिस चप नींद
नींद करत उपकार सबो पर, कृपा ला कर मारय नइ डींग.
रात के शासन हे सब मुंहड़ा, घुघुवा रहि रहि देत अवाज
सच मं लात खात पिनकू हा, पर सपना मं भोगत राज.
जीते हे चुनाव अलखेली, मन प्रसन्न मुसकावत ओंठ
नव अध्यक्ष बने ते कारण, गरब मं मुड़ हा ऊपर जात.
लड़का लड़की मन प्रसन्न हें, पिनकू गला मं डारिन हार
पिचरिंग कूद नाच के गावत, एक दुसर पर चुपर गुलाल.
पिनकू ला नइ तजत छात्र मन, आंवर भांवर किंजरत झार
जइसे दंवरी के बइला मन, घूमत असलग लग मेड़वार.
थोरिक दुरिहा मं हठील हा, चुप ठाढ़े मुड़ गड़ा – हताश
अब तक लहुट के जातिस तिसने, पिनकू पहुंचगे ओकर पास.
कहिथय -“”का होगे मंय विजयी, चलिहंव मगर तोर बुध मान
कभू नमूसी तोर होय नइ, गिरन देंव नइ तोर जबान.”
किहिस हठील क्रोध ला उगलत -“”तंय हस कपटी धोखाबाज
मोर पक्ष मं रिहिन छात्र मन, पियत सबो झन मानी तोर.
घाव बनाय हवस घायल कर, अब मलहम चुपरे बर आय
तोर जरूरत नइये मोला, मोर आंख ले भग जा दूर.”
भड़क हठील हा हटथे दुरिहा, पर पिनकू हा ढाढस देत
ओकर बंहा ला हांसत झींकिस, ताकि निकल जावय हठील.
सपना मं हठील ला तीरत पर सच दुसर कहानी ।
बेदुल तिर मं सोवत तेकर कर दिस नींद के हानी ।।
बेदुल हा रकमका के उठगे, बोमफार सक भर चिल्लैस-
“”दउड़व दउड़व जीव बच दव, मोला कोन हा कबिया लीस !”
कैदी मन भी झझक के उठगें, द्वासू हा रख दीस सवाल-
“”कइसे पिनकू, काय बात ए – बेदुल ला झींके हस कार ?”
पिनकू हा चुरमुरा के कहिथय -“”अपन भूल मंय काय बतांव –
मंय हा हाथ मं सोना रखथंव – लेकिन सच मं ढेला गोल.
सपना मं चुनाव जीते हंव, अउ हठील हा खा गिस हार
पर सच ला तुम टकटक जानत – मंय भोगत हंव दुख के जेल.”
बंदी मन बिखेद ला जानिन, बुल्खू किहिस धैर्य के साथ –
“”वाकई हम अंधियार के वासी, दुरिहा भगथय सुबह – प्रकाश.
पेट भरत मन के लडुवा मं, स्वप्न मं लेवत सुख के सांस
आवत हाथ गुलाब के कांटा, पर तिर जाथय फूल गुलाब.”
बंदी मन फिर नींद मं सुत गिन, जागत हे पिनकू के आंख
बारा तन के फिकर बियापत, इसने कटत हवय दिन – रात.
होगिस खतम चुनाव के झगरा, अउ हठील विजयी मैदान
तब पिनकू ला मिलिस अजादी, झुक्खा फसल मं बरसा तान.
बन्दी मन ला नमस्कार कर, कारागृह ले हटिस बेहाल
“जांव महाविद्यालय के नइ ! सोच – चलत केकरा अस चाल.
तभे एक ठक घटना घट गिस – ओतिर रिहिस सुंदरिया भैंस
ओहर रेंगत रिहिस सड़क पर, इही बीच एक ट्रक हा अ‍ैस.
ओहर भैंस ला टक्कर मारिस, गिरिस सुंदरिया भैंस दनाक
ओकर तन ले लहू बोहावत, चोट आय तब बन गे घाव.
पिनकू हा ए दृश्य ला देखिस, ओकर हृदय मं भर गिस पीर
दीस बरदिहा मंगतू शिक्षा, फट ले आ गिस ओकर याद –
यदि असहाय या घायल पशुधन, आवारा अस भटकत पास
ओकर सेवा जतन तंय करबे, ओकरेच कमई रखे हे जान.,
मनखे मन हा आवत जावत, उंकर ले पिनकू मंगिस सहाय –
“”भाई बहिनी, मोर ला सुन लव – एक भैंस ला पर गे चोट.
एहर दरद मं बहुते केंघरत, एला उठा खड़ा कर देव
सेवा जतन होय आवश्यक, मोला कोई मदद तो देव.”
पिनकू अड़बड़ करत केलवली, पर प्रार्थना जात हे व्यर्थ
तभे उहां पर चुनू हा आथय, जेहर दिखिस सरल इंसान.
चुनू कथय -“”काबर चिल्लाथस, कते व्यक्ति के करत पुकार
आय तोर पर काय कष्ट दुख, उत्तर ला तंय रख विस्तार ?”
पिनकू बोलिस -“”देख भैंस ला, एकर हालत मरे के लैक
मंय जनता से मदद मंगत हंव, पर सब देवत हें दुत्कार.”
“”भइया, तंय हा स्वयं बता भइ – ककरो मदद करय इहां कोन
हर दिन मरत जानवर मनसे, टक्कर दुर्घटना हर रोज.
मनसे मन दुर्घटना देखत फेर बढ़त हें आगू ।
खुद के काम के चिंता हे तब कहां ले करहीं सेवा ।।
तभे चुनू हा उभे ला देखिस, ओला किहिस मार आवाज –
“”देख तो थोरिक ए भैंसी ला – एहर आय सुंदरिया तोर.
दुर्घटना मं होय हे घायल, एला अपन साथ झप लेग
बपरी के जीवन रक्षा बर, तुरूत करा दे दवई इलाज.”
उभे हा दूनोंे हाथ ला जोड़िस – “”भाई, मोला कर दे माफ
ए सुंदरिया फुरिस नइ मोला, मंय हा सहेंव गंज नुकसान.
मंय बारा हजार खर्चा कर, ए भैंसी ला लाय खरीद
पर एकर गोरस बेचे हंव – अधिक से अधिके सात हजार.
पांच हजार लगे हे घाटा ऊपर ले तंय देत दबाव –
करो सुंदरिया के सेवा अउ, ओकर करो उचित उपचार.
लेकिन तुम्हर बात नइ मानंव – अगर भैंस पर करिहंव खर्च
परलोदसा मोर हो जाहय, सबो धनदोंगानी हा नाश.
मंय दूकान एक खोले हंव, यदि ओकर पर देहंव ध्यान
दुनों ज्वार भोजन हा मिलिहय, ऊपर ले बचिहय अउ नोट.”
उभे उहां ले झपकुन खपकिस, मरत भैंस ला ओतिर छोड़
चुनू जोहारत हे पिनकू ला -“”अपन आंख मं हालत देख –
इहां खवाथंय मनसे मन हा, ताकि लाभ मं रुपिया आय
सेवा ला करथंय ए कारण, आवय “मानपत्र’ हा हाथ.
जलगस भैंस दूध ला देइस, उभे हा ओकर गुण ला गैस
ओकर नाम सुंदरिया रख दिस, दीस खाय बर दाना – भूंस.
मगर दूध के देवई बंद तंह, खेद दीस भंइसी ला मार
ओकर प्राण सड़क पर छूटत, पर थोरको नइ दया न आह.”
पिनकू खुद थथमरा के कहिथय -“”अपन हाल मंय काय बतांव –
सेवा करे बढ़े हंव आगू, दया करेंव भैंस पर खूब.
लेकिन सब हा व्यर्थ बोहा गिस, अब का करंव उमझ नइ आत
बचे सुंदरिया के जीवन हा, फुरिया तिंहिच नेक अस राह ?”
कहिंथय चुनू -“”एक ठन संस्था – हे “गौ सेवा सदन’ सुनाम
जे दुर्घटनाग्रस्त बिमरहा, बिगर पुछन्ता अति लाचार.
याने सब असहाय जानवर, उंहचे रहत सुरक्षा साथ
संस्था सेवा जतन ला करथय, एकर साथ उचित उपचार.
तंय ए भैंस ला उंहचे पहुंचा, तब पा सब झंझट ले मुक्ति
एकर बर मंय मदद दे सकहूं, तोर बोझ हा हल्का होय.”
पिनकू हा उत्साहित होथय -“”मंय हा पहिली होय निराश
ककरो ऊपर दया दिखाना, ओहर लगिस मुरूख के काम.
तोर आसरा के लउठी धर, बढ़ गिस दून मोर उत्साह
धान के पौधा अब तब मरतिस, तंय जल छींच हरा कर देस.
चल संस्था मं दुनों चलन हम, उहां भैंस ला पहुंचा देन
बपरी के इलाज हा होवय, बन के स्वस्थ जियय कुछ और.”
दूनों झन तनिया के आखिर उठा दीन भैंसी ला ।
एमन आगू तन सरकिन संस्था मं मिलिस ठिकाना ।।
उहां बेवारस घायल पशु हें, गदहा घोड़ा छेरी गाय
ककरो उंकर टांग हा टूटे, ककरोे पेट बड़े जक घाव.
एमन उंकर कष्ट ला देखिन, इंकर हृदय ले चलिस कराह
तभे उहां सुंखमा हा अभरिस, जे संस्था के कर्ता आय.
सुखमा हा अब चुनू ला पूछिस -“”तंय हा इहां आय हस कार
यदि संस्था मं तोर काम कुछ, मोर पास तंय फुरिया साफ ?”
चुनू हा सुंदरिया ला देखिस, कहिथय -“”ए निरीह ला देख
एहर दुर्घटना मं घायल, दरद के कारण तलफत खूब.
बहुत परोपकारी तोर संस्था, होय भैंस के इंहे इलाज
हमर कलपना ला तंय सुनबे, इही सोच हम एला लाय.”
सुखमा हा स्वीकार लीस फट -“”हमला तुम्हर बात स्वीकार
ए पशु ला तुम इहंचे छोड़व, ओकर हम करबो उपचार.
बपरी सुधर ठाड़ हो जाहय, एकर उम्र हा बढ़ही और
एला मिलिहय नवा जिन्दगी, हम पाबो मन मं संतोष.”
उहें के कमैया नीयत ला, सुखमा हा बलैस भर हांक-
“”अपन साथ ए भैंस ला लेगव, एकर करा उचित उपचार.”
नीयत हा भैंसी ला लेगिस, पिनकू के उतरिस सब बोझ
ओहर सुखमा के जस गावत -“”तंय हस नेक दया के खान.
असक बेसहारा रोगी पशु, एमन ला खेदत सब मार
पर तंय तन मन धन ला खरचत, तंय हस धन्यवाद के पात्र.”
सुखमा हा खलखला के हांसिस -“”मंय हा खोल कहत सब भेद
यदि आधच बिखेद ओरियाहंव, तंय हा वास्तव समझ ले दूर.
कोई मनसे क्रूर होय नइ – मंय नइ आंव दयालू जीव
पहिली मंहू हा इसने सोचंव, पर ला कहंव निर्दयी क्रूर.
पशु के बदतर हालत देखंव, मंय हो जांव द्रवित अंधेर
मगर बाद मं सत्य ज्ञात तंह, मोर जमों भ्रम हा मिट गीस –
“मनसे मन तिर समय के कमती, पर ला देखंय कतका टेम
उंकर पास मं बहुत समस्या, उही ला सुलझावत दिन रात.
शहर के मनसे तिर घर नइये, नभ के नीचे करत निवास
तब पशु मन ला कतिंहा राखंय, पर उपकार कठिन हे काम.’
पशु के होवय ठीक सुरक्षा, एकर बर हम करेन उपाय
बना लेन एक संस्था जुरमिल, बनिन सदस्य मनुष्य उदार.
संस्था ला सुचारुलेगे बर, आर्थिक मदद करे हन मांग
एको अदमी नइ दुत्कारिन, हरहिन्छा कर दिन सहयोग.
“मंगलिन मिल’ के प्रमुख हे मंगलिन-ओहर दान मं दीस जमीन
भवन बनाये के जरूरत मं, दीस मुख्यमंत्री अनुदान.
हवंय श्रमिक खलकट अउ भाना, करिन उहू मन आर्थिक भेंट
इसने सब सहयोग ला करदिन, तब संस्था हा चलत हे ठीक.”
पिनकू – चुनू निकालिन रूपिया, ओला सुखमा ला दे दीन
पिनकू कथय -“”बहुत ठन संस्था – मानव हित मं जोंगत काम.
पर पशु मन के जतन करे बर, तुम्मन करत यत्न भरपूर
तुमला धन्यवाद एकर बर, तुम हव सराहना के पात्र.
हमर डहर ले राशि देत हन, ओला तुम कर लव स्वीकार
पशु निरीह के देखभाल बर, हमर हवय अतकिच सहयोग.”
सुखमा प्राप्ति रसीद काट दिस, पिनकू चुनू के असगल दीस
उनकर सब उद्देश्य पूर्ति तंह, उहां ले रेंगिन आगू कोत.
पिनकू गीस महाविद्यालय, देखत हवय उहां के हाल –
सब चुनाव ला हठील जीते, बनगे छात्रसंघ अध्यक्ष.
जमों छात्र – छात्रा उत्साहित, खुशी मं भर आनंद मनात
रंग गुलाल सबो के तन पर, नाचत गावत लगा अवाज.
तभे अंजोरी के आंखी हा, झझक गीस पिनकू ला देख
किहिस अंजोरी हा हठील ला -“”आवत हवय तोर पर क्रोध.
जीते हस तब करत घमंड – बिना अंकुश के हाथी ।
आंखी खोल देख तो पहुंचे इहां तोर प्रिय साथी ।।
जेहर तोला विजय देवाइस, तउन मित्र ला तंय बिसरेस
हार ला पहिरा के स्वागत कर, काम करे बर मंग उपदेश.”
करत अंजोरी रिस हठील पर – अउ पिनकू के लेवत पक्ष
मगर व्यंग्य के छुरी मं मारत, ताकि परय पिनकू पर घाव.
पौना हा हठील ला बोलिस -“”कहत अंजोरी बिल्कुल ठीक
तंय कृतध्न अस बुता जोंग झन, पिनकू के मानो उपकार.”
गीस हठील तुरूत पिनकू तिर, कहिथय -“”होय मोर ले भूल
एकर बर मंय क्षमा मंगत हंव, करबे क्षमा हवय वि·ाास.
तोर कृपा – निश्छल उदारता, मोला विजय देवा दिस आज
तोर याद कई बार करे हंव, मंय हा करत तोर सम्मान.”
अपन गला के हार ला हेरिस, पिनकू के टोंटा दिस डार
मिठई जबरवाली मुंह नावत, कबिया उठा करत जयकार.
पिनकू हा हठील ला बोलिस -“”तंय हा मोर करत हस मान
या फिर एहर मात्र दिखावा – मंय नइ जानंव एकर भेद.
पर मंय अतका कहना चाहत – हानि होत तब दुख अउ फिक्र
नफा होत तब मन खुश होथय, काम करे बर बढ़थय जोश.
अपन हार मं पाय निराशा, तोर विजय पर ईष्र्या होय
पर चुनाव ला जीते हस तब, गरब मं झन जाबे तंय भूल.
एकर ले सब काम बिगड़थय, गलत दिशा मं चलथय गोड़
मनसे जहां सफलता पाथय, ओहर हा होथय गुमराह.
तंय कालेज के चाहत उन्नति, एकर बर तंय मंगत सलाह
तब मंय हा अतकिच बोलत हंव, रखबे अपन हृदय मं धांध –
इहां छात्र – छात्रा हें जतका, छोटे भाई बहन तुम्हार
उंकर भविष्य सुरक्षित रखबे, गलत काम ले रखबे दूर.”
मींदू हा हठील ला टोंकिस -“”तंय सुन लेस बहुत उपदेश
अब ले गलत काम झन करबे, रहिबे साधू संत समान.
हम पर कभू बिपत हा छाहित, तब तंय आगू आबे धांय
अपन प्राण के बलि ला देबे, हमर कष्ट ला करबे दूर.”
विद्दार्थी मन ताना मारत, एल्हत खेलत थपड़ी पीट
पिनकू चुप रहि जगा ला छोड़त, अउ काबर बिलमय बन ढीठ !
बइसाखू व्याख्याता तिर गिस, मुंह उतरे अस हे गंभीर
बइसाखू हा ओला देखिस, पिनकू ला बोलिस कुछ हांस-
“”नेपोलियन अपन मन सोचिस, करंव आल्प्स पर्वत ला पार
पहिली ओहर नहक सकिस नइ, पर अंतत& सफल हो गीस.
जग मं कतको काम बड़े जक, होत पूर्ण श्रम धैर्य के बाद
पर चुनाव हारेस ततकिच मं, मरे के लाइक दिखत उदास.
नान्हे पोटा के मनसे अस, अगर तोर हिम्मत कमजोर
तरी नाक कर बइठ जा कोन्टा, ककरो साथ लगा झन जोर.
देख-तोर कारण हठील हा, करत मोर पर अड़बड़ जिद्द
लोफड़ छात्र ला धर के लानिस, कलमा पढ़त करिस खिरखींद.
बोलिस-मंय तोला जानत हंव, पिनकू तन हे तोर झुकाव
सोचत हस-कंगला हा जीतय, अउ हठील हार जाय चुनाव.
पिनकू के तंय लेत संरोटा, तउन तोर बर बहुत खराब
मोर राह ले हट जा वरना, चुनवा देहंव करा सिलाप.
दू कउड़ी के व्याख्याता हस काबर डारत आड़ा ।
कोलिहा हा बच सकथे का यदि घुसरत बाघ के माड़ा ।।
तंय लेखक अस तहू ला जानत, बनत समीक्षक सब ले श्रेष्ठ
मगर लिखे ले का होवत हे, एकर ले नइ जग उद्धार.
रचनाकार बिकिन हें धन मं, तंय झन अंड़ा टांग कंगाल
बेर के संग दीया लड़थे पर, जीतत बेर-दीप के हार.”
पढ़िस हठील हा बिक्कट बंगी, अपन मित्र संग रेंगिस राह
ओकर संग संबंध बिगड़ गिस, मुश्किल दिखत होय निर्वाह.
तभो ले हिम्मत टांठ रखिन्गे, भले मुड़ी पर कष्ट पहाड़
करबो युद्ध कुचाली मन संग, टोर के रहिबा ओकर हाड़.
जउन छात्र मन गलत राह पर, अपन भविष्य करत बर्बाद
ओमन मं सुधार लाने बर, हम्मन देबो नेक सलाह.
ठीक बात ला यदि बिजराहंय, तब हम चलबो दूसर राह
मगर छात्र मन ला सुधारबो, हम किरिया खावत प्रण ठान.”
पिनकू किहिस- “”मदद तुम देवत, सर सर बढ़त मोर उत्साह
अरि के नख्शा मार के रहिबो, हम्मन पाबो निश्चय जीत.”
-“”लेकिन एक बात तंय अउ सुन-इंहा आय हव शिक्षा पाय
राजनीति लामकलेड़ी मं, तुम्हर भविष्य नाश झन होय.
काबर के कई विद्यार्थी मन, चलत कुपथ होके गुमराह
हो जावत समाज बर घातक, सुख के एवत देत दुख दाह.
पिनकू हा सतमार्ग चलय कहि समझाइस व्याख्याता ।
अधिक बोलना अनुचित तब छेंकिस भाषण के खाता ।।
उहां ले हट के पिनकू रेंगिस, पत्रकार चइती मिल गिस
चइती किहिस-“”तुम्हीं ला खोजत, मुश्किल बाद होय हे भेंट.
तंय चुनाव मं हार खाय हस, अउ हठील हा जीत ला पैस
ओकर बारे मं कुछ कहना तुरूत बोल तंय बिन संकोच.
“शान्तिदूत’ मं काम करत हंव, छपिहय उहां खबर हा तोर
हम्मन तथ्य ला कुछ नइ टोरन, जे वक्त्व्य छपत उहि मात्र.”
पिनकू हा कलबला के बोलिस- “”मंय जानत हंव तुम्हर सुभाव
मन के बात कोड़ के पुछत, बाद मं कर देवत बदनाम.
तुम्मन खुद लगात हव आगी, फिर बुझाय दउड़त धर नीर
तन मं आग लगन भर पावय, तुम्ही भुरक देवत हव नून.
मंय वक्त्व्य करंव नइ जारी, मन मं रखत अपन सम्वाद
मंय चुनाव मं हार खाय हंव, कोन देवा सकिहय फिर जीत !”
चइती हा अब साफ खोल दिस- “”तंय झन राख व्यर्थ के क्रोध
सब मनसे नइ होंय एक अस, कुछ हा गलत अउ कुछ हा नेक.
तंय चुनाव मं हार खाय हस, मंय जानत हंव कारण साफ
“शांतिदूत’ मं मंय कमात हंव, पत्रकार टैड़क के साथ.
शांतिदूत के मालिक जहरी, जेकर नाम हवय विख्यात
गीस हठील तुरूत ओकर तिर, मदद मंगिस डारे बर जाल.
जहरी हा टैड़क ला बोलिस-रच षड़यंत्र एक ठन ठोस
तब टैड़क हा फांदा खेलिस, तोला कारागृह डरवैस.
जहरी छेरकू हठील टैड़क, इन चारों के सुम्मत एक
पर के रांड़ बेचथंय जुरमिल, करथंय सबो डहर खुरखेद.
छेरकू मंत्री हा हठील हा, देत पलौंदी अइसे सोच-
“जेन बखत चुनाव मंय लड़िहंव, एहर मदद दिही घर बेच.’
पिनकू के तरूवा हा सुखगे, मंगथय क्षमा हाथ ला जोड़-
“”मंय सुक्खा व्यवहार करे हंव, मिट गिस शंका मन के मैल
अपन कर्म पर मंय शर्मिन्दित, मोर भूल ला कर दे माफ.”
चइती कथय- “”अपन समझे हंव, तब मंय फोर देंव सच तथ्य
एतन मोर बिखेद घलो सुन, मंय हा का भोगत तकलीफ-
सच या झूठ कुछुच हो लेकिन, छपिहय पत्र मं खबरे तोर
जिनगी नाव चलत हे कइसे-जानत कोन बेवस्ता मोर!
पत्र पत्रिका के मालिक मन, कहिंथय के सुधरय संसार
मगर हमर दुख चिन्हय नइ जइसे-दिया के खाल्हे घुप अंधियार.
दूसर मन हड़ताल मं जाथंय, एमन उंकर पक्ष ला लेत
पर हम अपन मांग ला रखथंन, हमर निवेदन ला चिर देत.
प्रेस मं जेन कर्मचारी हें, ब्रायलर के मुर्गा अस आंय
मुर्गा के जीवन निश्चित नइ, ओला कभू मार के खात.
तइसे प्रेस के जेन कमइया, काम करत हें रख ईमान
प्रेस के लाभ ला सोचत हरछिन, मालिक के दाबत हे पांव.
पर ऊंकर पर बिपदा आथय, कर देथय सेवा ले मुक्त
जेहर रोटी दार ला खातिस, तेहर खावत दुख अउ भूख.
पिनकू हा पूछत जावत अउ साफ बतावत चैती ।
दूनों अपन राह ला धरलिन रोक के निंदा गैंती ।।
३. कोदो पांत समाप्त

४. लाखड़ी पांत
धरती माता सबके माता-सब ले बढ़ के गाथा ।
मोर कुजानिक ला माफी कर मंय टेकत हंव माथा।।
अन्न खनिज अउ वृक्ष हा उपजत तोर गर्भ ले माता ।
सब प्राणी उपयोग करत तब बचा सकत जिनगानी ।।
“”कहां लुका-भागे डोकरा?
तोला खोजत हन सब कोती
सुन्तापुर के सब छोकरा ।
कहां लुका भागे छोकरा…?
चुंदी पाक गे सन के माफिक
अंदर घुसगे आंखी
बिना दांत के बोकरा डाढ़ी
पक्ती – पक्ती छाती.
झड़कत रथस तभो ठोसरा…।।
हाथ गोड़ के मांस हा झूलत
कनिहा नव गे टेड़गा
कउनो डहर जाय बर होथय
धरथस कुबरी बेड़गा.
सरकस के भइगे जोकरा…।
हमर मितान आस तब तो हम
आथन तुम्हर दुवारी
घर ले निकल तुरुत आ वरना
खाबे नंगत गारी
अउ हम्मन खाबो बोबरा ।
कहाँ लुका-भागे डोकरा ।।
लइका मन हा नाच गीत गा अब तक खड़े दुवारी ।
पर सुद्धू के पता लगत नइ- कहाँ गीस संगवारी ।।
रंगी जंगी गज्जू गुन्जा, मोंगा संग मं पुनऊ थुकेल
बाहिर मं रहि काय करंय अब, अंदर जाय बढ़ा दिन गोड़.
छोकरा मन घर अंदर घुसरिन, सब ठंव जांचत चोर समान
मुंह रख हाथ इशारा देवत, बंद रखे हें अपन जबान.
देखिन – सुद्धू सुते खाट मं, आंख बंद कर अल्लर देह
हला – हला झींकत चिल्लाइन, पर सुद्धू देवत नइ स्नेह.
लइका मन गुदगुदा डरिन पर, सुद्धू हा नइ लिस कल्दास
नाक मं अंगरी ला रख देखिन, मगर बंद हे ओकर सांस.
अतिक बखत तक लइका मन हा, रहि के बिधुन करत हें यत्न
जेन गरीबा हे अनुपस्थित, ओहर पहुंच गीस ए बीच.
कथय गरीबा बच्चा मन ला – “”काबर करत उदबिरिस व्यर्थ
मोर ददा ला झन केंदरावव, चले फिरे बर हे असमर्थ.
तुम नटखट हठ करे रेहे हव – होय जनउला कथा तड़ाक
तब ओ खेल हा खतमे हो गिस, मोर ददा ला झन केंदराव.”
रंगी कथय -“”डांट झन हमला, ढंगी हवय तोर खुद बाप
ओहर एकोकन नइ बोलत, सोय हवय बिल्कुल चुपचाप.
हाथ गोड़ ला रखे हे अकड़ा, चलती सांस ला रख लिस रोक
ओहर आज बतात बहाना, तब हम अचरज मं हन ठाड़.”
का होगे ? कहि तुरूत गरीबा, देखिस अपन बाप के हाल
जानिस जहां बाप हां मरगे, आंसू हा ढर आइस गाल.
यद्यपि अंतस मं दुख नंगत, पर नइ रोइस धर के राग
लइका मन आंसू ला देखिन, उंकर जीव बस एक छटाक.
गज्जू बोलिस -“”हम सुद्धू संग, एकोकन नइ करेन मजाक
तभो गरीबा आंसू ढारत, हमला समझ लड़ंका खूब.
लेकिन सच बिखेद हम जानत – सुद्धू हवय स्वयं चरबांक
ओहर अइसे ढचरा मारत – लइका मन होवंय बदनाम.”
मोंगा किहिस -“”लहुट हम जानत, पर तंय आंसू ला झन डार
इहां पहुंच के जुरूम करे हन, तेकर बर छोड़त हन द्वार.
हमर पुकार करिस सुद्धू हा, दल बल साथ आय हम दौड़
पर अब खुद हा ढचरा मारत, हमर खेल मं पारत बेंग.
ओहर हा बुजरूग मनखे तब, ओकर लाख दोष हा माफ
इही कुजानिक यदि करतेन हम, नाक कान ला खिंचतिस जोर.”
सुनिस गरीबा केंवरी भाखा, कबिया धरिस मया के साथ
कहिथय -“”यदि तुम बिफड़ के जाहव, तंहने मंय हो जहंव अनाथ.
तुमला फोर बतावत हंव मंय – ददा के निकले हे अब प्राण
तुम्हर साथ खेलन नइ पावय, मिट्टी मिलिहय ओकर देह.”
लइका मन सच स्थिति समझिन, रोय धरिन कलपत बोमफार
कतको छेंक लगात गरीबा, तभो बहत आंसू के धार.
मेहरुला बलवैस गरीबा, पर ओहर नइ अपन मकान
दूसर मनसे कर कलपिस पर, ओमन छरकिन ढचरा मार.
दुब्बर बर असाढ़ दू ठक – कारज कइसे निपटाये ।
लइका मन ला उंहे छोड़ के रेंगिस कपड़ा लाने ।।
डकहर नाम एक झन मनसे, जेन हा पहिली रिहिस गरीब
लांघन भूंखन समय ला काटय, दुख अभाव हा ओकर मित्र.
आखिर मं हताश खा गिस तंह, खाय कमाय मुम्बई चल दीस
लगा दिमाग करिस डंट महिनत, तेकर मिलिस लाभ परिणाम.
अड़बड़ रूपिया उहां कमा लिस, सुन्तापुर मं लहुट के अ‍ैस
इहां भूमि घर फेर बिसा लिस, खोलिस एक ठन बड़े दुकान.
जम्मों जिनिस दूकान मं रखथय – ग्राहक रिता हाथ झन जाय
एमां लाभ मिलत मन माफिक, डकहर के धन बाढ़त खूब.
डकहर तिर मं गीस गरीबा, ओहर कर दिस बंद दुकान
लगथय – उहू दुसर तन जावत, हाथ धरे पीताम्बर वस्त्र.
डकहर पूछिस -“”काय बात हे, दिखत हवस तंय खिन्न उदास
तोर काम का हवय मोर तिर, जमों प्रश्न के उत्तर कोन ?”
कथय गरीबा हा दुख स्वर मं -“”अपन कष्ट मंय काय बतांव
मोर ददा हा सरग चलेगे, मुड़ पर गिरिस बिपत के गाज.
जलगस ओहर जग मं जीयत, मंय आनीबानी सुख पाय
लेकिन आज साथ छोड़िस तंह, ओकर बिन मंय होय अनाथ.”
परिस अचम्भा मं डकहर हा -“”तंय बताय हस दुख के बात
बपुरा सुद्धू भला आदमी, सब संग रखिस मधुर संबंध.
पर ए बात समझ ले बाहिर – सोनू घलो आज मर गीस.
एक दिवस मं दू झन मनसे, क्रूर काल के चई मं गीन.
लगथय के दई हा खिसिया गिस, दिखत गांव के हाल बेहाल
अब काकर पर करन भरोसा, गांव हा बदलत हे शमसान.”
“”मोला देव कफन के कपड़ा, मदद करे बर तंय चल साथ
शव ला उठा लेगबो मरघट, एकर बर जरूरत हे तोर.”
डकहर पीताम्बरी देखाथय -“”मोला तंय बिल्कुल झन रोक
एला सोनू के शव रखिहंव, तब मंय हा जावत ओ ओर.
धनवा अउ मंय भाई अस अन, मंय हा ओकर आहंव काम
जानबूझ के अगर बिलमिहंव, धनवा करिहय तनकनिपोर.
अपन काम साधारण निपटा, व्यर्थ खर्च ला झन कर भूल
ढोंग धतूरा छोड़ गरीबा – रकम बचा के भविष्य सुधार.”
करिस गरीबा अड़बड़ करलइ, पर डकहर कपड़ा नइ दीस
आखिर हार गरीबा हा अब, अपन मकान लहुट के अ‍ैस.
होत कोन दुर्बल के मितवा, सक्षम के सहायक संसार
बरसा जल समुद्र मं गिरथय, खेत हा देखत मुंह ला फार.
अपन ददा के शव पर डारिस, चिरहा धोती एक निकाल
बांस कहां खटली बनाय बर, होन चहत अब शव बेहाल.
ओतिर हवय उपाय एक ठक – झींकिस कांड़ लगे ते बांस
खटली बना रखिस ओकर पर – मरे हवय सुद्धू के लाश.
लाश उठाय के क्षण आइस तंह, करत गरीबा एक विचार-
यदि लइका मसानगंज जाहंय, पालक नइ रहिहंय थिरथार.
मनसे मन बिफड़े पहिलिच के, एमां धरिहय तिजरा रोग
बालक मन ला इहां ले भेजंव, दुख ला लेंव मंय खुद हा भोग.,
शंका ला फुरियैस गरीबा, लइका मन ला चढ़गे जोश
जंगी कथय बढ़ा के हिम्मत -“”तंय डरपोकना अस डर गेस.
तंय हा अड़िल जवनहा लेकिन, हिम्मत तोर बहुत कमजोर
तंय हा हमला मदद नइ मांगत, शक्ति हमर तिर मरघट जाय.
सुद्धू कथा कहानी बोलिस, ओकर संग मं हंसी मजाक
यदि अंतिम क्षण मं हम हटबो, हमर ले बढ़ के कपटी कोन !
यदि डर्रात तिंही घर मं रूक, कैची बन इच्छा झन काट
अपन मित्र के थिरबहा करबो, तब करतब हो जहय सपाट.”
छेंकिस खूब गरीबा पर नइ मानिन बालक बाती ।
मरघट जाय तियार होत काबर के जावत साथी ।।
बालक लघु अउ ऊंच गरीबा, ऊपर नीचे खटली होत
शव उठाय बेवसाय बनत नइ, कइसे करन करत हें सोच.
आगू ला बोहि लीस गरीबा, लइका मन तोलगी धर जात
उंकर खांद हा बहुत पिरावत, बदबद गरुहोत हे लाश.
एक दुसर के मदद करत हें, काबर बोझ उठावय एक !
लइका मन के करनी परखव – करत अनर्थ के करनी नेक !
लइका मन ला बुद्धिहीन कहि, एल्हत आत जवान सियान
लेकिन सूक्ष्म दृष्टि से अब सब, करो भला इनकर पहिचान.
जेंन अपन ला कहत सुजानिक, कहत शांतिवादी मंय आंव
आय उहू मन जनता के अरि, जर ला खोद करावत युद्ध.
पर उपकार के बात ला करथंय, पर करथंय पर के नुकसान
याने कथनी अउ करनी मं, अमृत अउ विष ततका भेद.
लइका मन के हृदय हा निश्छल, अगर सबो झन कोमल शुद्ध
दंगा कपट लड़ाई रिपुता, सब दिन बर हो जहय समाप्त.
मरघट पहुंच उतारिन खटली, कोड़त दर दफनाय बर लाश
साबर रापा बिकट बजावत, थक गिन पर नइ होत हताश.
आधा काम होय अतकिच मं, आत दिखिस सोनू के लाश
रूपिया नावत लाई छितत लाश पर, सोनू रिहिस गांव के खास.
टहलू, रमझू झड़ी उहां हें – डकहर सुखी भुखू धनसाय
बन्जू बउदा हगरुकातिक, केजा बहुरा गुहा ग्रामीण.
मानो सब के ददा हा मरगे, कुल्ह के रोवत आंसू ढार
बदल बदल के खटली बोहत, जइसे के श्रद्धालु अपार.
लाश रखाय नवा खटली मं, ओढ़े हे नव उंचहा वस्त्र
फूल गुलाल छिंचाय बहुत अक, सुद्धू अस नइ हे कंगाल.
जहां लाश हा मरघट पहुंचिस, फट उतार नीचे रख दीन
देख गरीबा अउ बालक ला, मनसे मन कुब्बल खखुवैन.
कातिक अउ बहुरा दूनों झन, अ‍ैन गरीबा के तिर दौड़
बहुरा झड़किस – “”अरे गरीबा, काबर करत अबुज अस काम.
लइका होथंय भोला भाला, नइ जानंय फरफंद कुचाल
इहां लाय ओमन ला भुरिया, का कारण देवत हस दण्ड !”
कातिक बोलिस -“”अरे गरीबा, लइका मन ला काबर लाय
अपन ददा के संग एमन ला, चहत हवस दर मं दफनाय !
तंय जानत मरघट मं रहिथंय – रक्सा दानव प्रेतिन भूत
तंय खुद ला हुसनाक समझथस, पर तंय काबर आज बिचेत !
पर के पिला ला धर लाने हस, कते व्यक्ति हा दिस अधिकार
बालक मन ला इहां ले भगवा, वरना तोर अब खुंटीउजार.”
लइका मन ला हटा गरीबा, जोंगत काम अपन बस एक
जब सब मदद ले भागंय दुरिहा, मनसे करय स्वयं के काम.
धनवा डहर बहुत झन मनसे, अपन अपन ले जोंगत काम
सब ग्रामीण मदद पहुंचावत, ताकि कहय धनवा हा नेक.
लकड़ी रच के चिता बना दिन, फिर रख दिन सोनू के लाश
धनवा किंजर करत परकम्मा, लेवत फुस फुस दुख के सांस.
चिता के आगी धकधक बरगे, तब धनसाय दीस मुंह दाग
आंसू गिरा के रोवत धड़धड़ -“”ददा, मोर अब फुट गे भाग.
तंय मोला छोड़त तब करिहय मोर कोन रखवारी ।
छल प्रपंच नइ जानंव कइसे कटिहय विपदा भारी ।।
डकहर किहिस -“”शांत रह धनवा, वाकई आय तोर पर कष्ट
लेकिन मन ला सम्बोधन कर, तभे हमर दुख होहय नष्ट.
सोनू मण्डल भला आदमी, सिरिफ तोर नइ रिहिस सियान
ओहर सब अतराप के पुरखा, मनसे मन हा पुत्र समान.”
केजा घलो सांत्वना देइस -“”जग मं होथय कई इंसान
मगर कर्म के अंतर कारण, यश मिलथय – होथय बदनाम.
पर उपकारी तोर ददा हा, करिस जियत भर भल के काम
तभो ले कतको जलकुकड़ा मन, मुंह पाछू कर दिन बदनाम.
जेन व्यक्ति हा दुश्मनी जोंगिस, सोनू मदद करिस हर टेम
सबके खातिर हृदय साफ झक, नइ जानिस कुछ छल या झूठ.”
मनखे मन मुंह देखी बोलत, काबर के धनवा धनवान
यदि ध्रुव असन सत्य बोलत हें, धनवा हा लेहय प्रतिशोध.
सोनू रिहिस लुटेरा घालुक, ए रहस्य जानत अतराप
कोन घेपतिस मनसे ला पर – पूंजी के भय करथय खांव.
शासन निहू हे धन के आगू, ए बपुरा मन हवंय अनाथ
सोनू के मरना ले खुश हें, बाहिर मन से देवत साथ.
सिरिफ गरीबा हे दुसरा तन, एको झन नइ ओकर पास
खंचुवा कोड़िस मात्र अपन भिड़, पर कइसे दफनावय लाश !
मदद मंगे बर गीस दुसर बल, करूण शब्द मं हेरिस बोल –
“”अब दर मं शव ला रखना हे, लेकिन होवत मंय बस एक.
अंड़े काम पूरा करना हे, दे के मदद करा दव पूर्ण
मोर ददा हा साऊ अदमी, थिरबहा लागे ओकर लाश.”
टपले सुखी बात ला काटिस -“”तोर शर्म कतिहां चल दीस –
“”सोनसाय के जीव का छूटिस, तंय बिजराये बर धमकेस.
टेम सुघर अक आय तोर बर, मिलगे मुफ्त गांव के राज
अपन थोथना इहां ले टरिया, खुद सम्हाल मरनी के काम.”
भुखू कथय -“”तंय हा जानत हस – हम्मन अभी दुखी गमगीन
जब गंभीर बखत हा होवय, कभू भूल झन होय मजाक.
जेन कार्यक्रम एती होवत, ओला छोड़ अन्य नइ जान
तंय हा अपन काम कर पूरा, हमर आसरा बिल्कुल छोड़.”
गंगा हा जब बहत छलाछल, कोई भी धोवत हे हाथ
जमों गरीबा ला दंदरावत, टहलू तक हा मारत डांट –
“”अतका बखत ले खरथरिहा अस, करत रेहेस उदिम बस एक
काम अधूरा तब दउड़े हस, चल अब पुरो अपन सब काम.”
हटिस गरीबा हा काबर के – हिनहर के नइ हितू गरीब
भंइसा बैर छत्तीस गिनती अस, तलगस ले सुर्हराहय जीब.
जब असहाय होय मानव हा, खुद हा करय लक्ष्य ला पूर्ण
खात गरीबा कहां हार अब, देत परीक्षा होय उत्तीर्ण.
यथा ढेखरा खर खर तीरत, लाश ला लानिस दर के तीर
एकर काम देख के हांसत, दूसर तन के मानव – भीड़.
अपन बहा मं खने जेन दर, उही मं घुस के झींकत लाश
अपन ददा ला भितर सुता के, होत गरीबा दुखी उदास.
बाहिर निकल पलावत माटी, धांसत पथरा मं बड़ जोर
दुसर डहर के मनसे मन अब, चलिन उहां के रटघा टोर.
धनसहाय के घर तिर पहुंचिन, धोइन एक – एक कर गोड़
एकर बाद अपन घर जाये, उहां ले रेंगिन मुँह ला मोड़.
शाम के अउ बैठक जुरियाइस, धनवा बोलिस दुखी अवाज –
“”मंय असहाय अनाथ होय हंव, मोला परिस बज्र के मार.
अड़बड़ जहरित रिहिस बाप हा, कुब्बल उदगरे ओकर काम
ओकर आत्मा पाय शांति सुख, एकर बर मंय करंव उपाय.
लेकिन कते काम ला जोंगव, मोर दिमाग उमंझ नइ आत
नेक सलाह देव तुम मिल जुल, सुलिन लगा के होवय काम.”
सुखी कथय -“”तंय राज ला करबे, अपन बाप के धन में।
ओकर आत्मा शांत होय, तइसे कारज धर मन में ।
मंय उत्तम सलाह देवत हंव – तंय खवाय “भंडारा’ खोल
मनसे जहां कलेवा खाहंय, तृप्ति अमर गाहंय जस तोर.
मृतक के आत्मा तुष्ट हो जाहय, भटकत आत्मा तक हा शांत
यद्यपि होवत नंगत खरचा, पर होवत हे सद उपयोग.”
बन्जू कथय -“”असामी अस तयं, भरे बोजाय चीज घर तोर
तब हम तोला उम्हयावत हन – तंय हा निश्चय कर परमार्थ.”
यद्यपि हगरुहा खुद कंगला, पर असहाय के छोड़त साथ
करत गरीबा के जड़ खोदी, ताकि स्वयं उठ जावय ऊंच –
“”अन्न खाय नइ पाय गरीबा, कंगला हाथ कहां जस – काम
करत अधर्म पुत्र पापी हा, पर सुद्धू हा गिरिहय नर्क.”
धनसहाय स्वीकार लीस सब -“”मंय मानत हंव तुम्हर सलाह
मंय भण्डारा खोल के रहिहंव, खाय पेट भर सब अतराप.
मगर कार्यक्रम हे बड़ भारी, सफल बनान सकंव नइ एक
एकर बर तुम देव आसरा, मंय हा चहत तुम्हर सहयोग.”
डकहर बोलिस -“”तंय निफिक्र रहि, गिरन देन नइ इज्जत तोर
अगर कार्यक्रम मं कुछ गल्ती, हम सब मनखे तक बदनाम.
दस झन के लकड़ी के बोझा, एक के मुड़ पर कभु नइ जाय
तोर काम ला सफल बनाबो, तोर बोझ हा हमरो बोझ.”
बातचीत मं टेम खसक दिस, कब ले खलस रेंग दिस शाम
बइठक उसल गीस तंह रेगिन – मनसे मन हा खुद के धाम.
पल – पल बढ़त रात के फंदा, बाहिर नइ निकलत इन्सान
अपन प्रथम पारी निपटा लिस, कर अवाज कोलिहा परधान.
बिरबिट करिया चारों मुंहड़ा, डर मं सांय सांय अतराप
दूझन जीव गाँव ले निकले, सुद्धू अउ धनवा के बाप.
जे मनसे के नींद हा परगे, सपना मं डर के बर्रात
ओकर तिर मं एकोझन नइ, मगर झझक का का गोठियात.
बहुरा डर मं दुबक के सोये, भूंकिन कुकुर खूब ए बीच
हवलदार बुतकू केंवरी ला, बहुरा हा कर दीस सचेत-
“”टोनही मन हा मंतर मारिन, सोनू सुद्धू पर अजमैन
ओमन ला फिर जीवित कर दिन, धर लिन दुनों कुकुर के रूप
ओमन ला भगाय झन सोचव, तुम झन निकलव बाहिर पार
अगर बात के करत उदेली, तुम पर आहय बड़े बवाल –
सोनू अउ सुद्धू दूनों मिल, रूप बदल के बनिहंय बाघ
तुम्हर प्राण लेहंय थपोल झड़, तंहने बाद मं खाहीं मांस.”
सोय झड़ी हा ओढ़ के चद्दर टकटक देखत आंखी ।
ओहर भय मं लद लद कांपत चुप हे मुंह के बोली ।।
तभे सामने ओहर देखिस – ललिया आंख खड़े सोनसाय
झड़ी कठिन मं बक्का फोरिस -“”मालिक, तोर सदा मंय दास.
बइठक अउ पंचायत होइस, तोर पक्ष मंय भिड़ के लेंव
तोर ले निहू रेहेंव हमेशा, तोर विरूद्ध कभू नइ गेंव.
धनवा ले बाढ़ी मांगे हंव, ओकर ऋण बइठे मुड़ मोर
मंय हा ओला खतम पटाहंव, मोला जिये के अवसर देव.”
थोरिक बाद झड़ी हा देखिस, आगू कोती आंख नटेर
मगर उहां पर एको झन नइ, वातावरण हवय सिमसाम.
ओढ़िस झड़ी हा तुरते चद्दर, मुड़ ले गोड़ रखे हे ढांक
मन मन मं प्रार्थना करत हे – हे प्रभु, बचा मोर अब जान.”
भगवानी तक डर मं कांपत, आगू तन देखत टक एक
तभे एक ठक आकृति उभरिस – सुद्धू खड़े हवय भर क्रोध.
भगवानी रोनहू बन बोलिस -“”लड़िन गरीबा अउ धनसाय
तंहा गरीबा फंस जावय कहि, मंय हा देंव गवाही झूठ.
मंय हा गल्ती गजब करे हंव, पर ए डहर भूल नइ होय
हाथ जोड़ के माफी मांगत, मोर कुजानिक ला कर माफ.”
लघु शंका बर निकल पात नइ, मुश्किल होत रूके बर वेग
तब ले मनखे सुतत कलेचुप-मुड़ ऊपर चद्दर ला लेग.
दू झन वृद्ध गांव मं पहुंचिन, दीन अवाज मंगे बर भीख-
“”हम भिक्षुक अन – भूख मरत हन, हमला देव खाय बर भात.”
उंकर अवाज ला गुहा हा सुन लिस, तंह कैना ला करिस सचेत –
“”सोनू अउ सुद्धू एं एमन, धमकिन इहां बदल के रूप.
ओमन अब बन गीन भिखारी, मांगत भीख गली हर द्वार
भिक्षा दान करे बर जाबो, ओमन हमला दिहीं दबोच.
मरघट तक ले जाहंय झींकत, जिंहा अभी के उंकर निवास
पुनऊ थुकेल झझक झन जावंय, दूनों ला रख बने सम्हाल”
हम कतको शिक्षित ज्ञानिक हन, पर मजबूत अंधवि·ाास
जलगस नइ विज्ञान के शिक्षा, छू मंतर नइ भ्रम के भूत.
हर दरवाजा गीन वृद्ध मन, पर कड़कड़ ले बंद किवाड़
भूख मं आंटीपोटा बइठत, कंस करलावत इनकर जीव.
आखिर एक मकान पास गिन, बइठ गीन होके लस पश्त
बुड़ुर बुड़ुर का का गोठियावत, एक दुसर के बांटत कष्ट.
जब देखिन अब जीव हा छूटत, मुंह ला फार दीन आवाज-
“”मंगन मन ला देव खाय बर, वरना पटिया मरबो आज.”
बेंस खोल के अ‍ैस गरीबा, पूछिस -“”रथव कते तुम गांव
परगे बिपत का बोम मचावत, जाय चहत हव काकर छांव ?”
उनकर हाल गरीबा देखिस -“”अंधरा एक – दुसर विकलांग
कुष्ट रोग हा छाय दुनों पर, घिनघिन कपड़ा लटके देह.
अंधरा हवय जेन डोकरा हा, अपन रखे हे “मंसा’ नाम
जेन वृद्ध टेंग टेंग लंगड़ावत, ओकर नाम “पुरानिक’ जान.
किहिस पुरानिक -“”हम मंगन अन, कंगलई करत हमर पर राज
मुंह चोपियात पिये बिन पानी, पेट हा कलपत बिगर अनाज.”
लाला लपटी देख गरीबा, दया देखात – मरत हे सोग
पर सुद्धू मरगे तेकर बर, काठी छुआ अशुद्ध समान.
शंका ला सुन मंसा बोलिस -“”अपन चोचला रख खुद पास
शुद्ध अशुद्ध ला हम नइ मानन, काठी छुआ ला रखथन दूर.
एला अगर मान्यता देबो, ककरो इहां सकन नइ खान
तब तो हमर जीव तक जाहय, तन असक्त पर बहुत अजार.
जे सम्पन्न शक्ति धर – सक्षम, चलथय नियम धियम ला मान
उंकर बुराई कोन हा करही, बेर हा हरदम बर बेदाग.”
अंदर लान सियनहा मन ला दीस गरीबा बासी ।
दूसर मन दुत्कारिन लेकिन खुद काबर दे फांसी ।।
बड़े कौर धर खात वृद्ध मन, कभू खाय नइ तइसे लेत
बुड़त सइकमा मं डाढ़ी हा, तेकर घलो कहां कुछ चेत !
कथय गरीबा -“”देव ज्वाप तुम – काबर किंजरत पर के द्वार
तुम्हर सहायक जेन व्यक्ति हे, का कारण उठाय नइ भार. ?”
किहिस पुरानिक -“”का बतान हम – यद्यपि हवंय हमर संतान
लेकिन कुष्ट रोग के कारण, करथंय घृणा-भगावत दूर.
पुरबल कमई के कारण हमला, घृणित रोग हा सपड़ा लीस
हम ए बखत रतेन निज छंइहा, किंजर के खोजत बासी – छांय.”
किहिस गरीबा -“”कोन हा कहिथय, पाप के कारण कुष्ठ अजार
भ्रम के बात कभू झन मानो, एकर होथय खुंटीउजार.
कुष्ठ रोग ला खतम करे बर, निकल गे हावय दवई प्रसिद्ध
ओकर सेवन करो नियम कर, तंहने तन हो जहय निरोग.”
किहिस पुरानिक -“”बुरा मान झन – तंय बतात हस बिल्कुल झूठ
ज्ञानिक ग्रंथ जेन ला बोलिन, उंकर तथ्य पर मारत मूठ.
पर तंय हा विद्वान बनस नइ, तंय हमला भरमा झन व्यर्थ
जउन हा सच ते दिखत हे संउहत, कुष्ठ रोग नइ होय समाप्त.”
मंसा अपन तर्क ला रखथय -“”मानव पास शक्ति भण्डार
बात असम्भव रहिथय तेला, संभव बर कर देत प्रयास.
धन हा सम वितरण नइ होवय, रहिथंय दीन धनी इंसान
तीर मं तुक्का लग जावय कहि, करथंय समाजवाद के बात.
कुष्ठ रोग हा अजर अमर हे, ओला खतम करत हे कोन
मगर रोग हा मिट जाये कहि, मनखे सक भर करत प्रयास.
एकर ले नइ होय निराशा, जीवन जियत आस के साथ
दूध समुद्र होय नइ जग मं, तभो ले ओकर पर वि·ाास.”
कई ठक तर्क गरीबा रख दिस, तभो वृद्ध मन फांक उड़ैन
ओंड़ा आत पेट हा भर गिस, हाथ अंचोय बर उदिम जमैन.
अन्न के नशा छपाइस तंहने, सोय चहत हें दुनों सियान
बोलत हवय गरीबा टुड़बुड़, पर एमन देवत नइ ध्यान.
सिरिफ गरीबा करत जागरण, ओकर मन मं चलत विचार-
“अब मंय हा मनमरजी करिहंव, भल दुसर बोलंय गद्दार.
सब के मान चलत आवत हंव, लेकिन मिलिस मात्र नुकसान
ओमन चहत गरीबा भागय, बेच के अपने माल मकान.’
मनसे जब निराश हो जाथय, या सब डहर ले दुख – बरसात
ओहर मन मं अनबन सोचत, क्रोध देखात – करत आक्रोश.
कतका बखत आंख हा लग गे, कहां गरीबा जानन पैस !
ओकर सुते आंख खुलथय जब, शासन सुरूज देव के अ‍ैस.
लेथय टोह वृद्ध मन कोती, उनकर छैंहा मिल नइ पैस
घर ला जांचिस जहां गरीबा, कतको जिनिस नदारत पैस.
घर ले निकल गरीबा खोजिस, दूनों वृद्ध ला नंगत दूर
लेकिन उंकर मिलिस नइ दउहा, आखिर विवश आत हे लौट.
तभे गुरुझंगलू हा मिल गिस, ओहर रख दिस एक सवाल-
“”तंय फिफियाय हवस का कारण – करत हवस तंय काकर खोज !
मनखे दुख ला कभु बलाय नइ, दुख आ जाथय तब परेशान
तोरो कोई जिनिस गंवा गिस, तभे दिखत अड़बड़ परेशान ?”
कथय गरीबा -“”तंय भांपे हस सोला आना ठौंका ।
ओकर कतका चर्चा छेड़न इहां रोज दिन घाटा ।।
मगर रात के घटना ला सुन, अ‍ैन हमर घर दू झन वृद्ध
उनकर नाम पुरानिक मंसा, कुष्ठ रोग के रिहिस मरीज.
ओमन अपन विचार ए राखिन – पुरबल जनम होय जे काम
ओकर फल ए जनम मं पावत, ई·ार हा देवत हे दण्ड.
पर मंय उंकर बात फांके हंव – कुष्ठ रोग हा दैहिक रोग
खतम करे बर औषधि बन गिस, मोर वाक्य पर कर वि·ाास.
पर डोकरा मन अड़बड़ अंड़ियल, कैची अस काटिन सब गोठ
मंय समझाय करे हंव कोशिश, मगर बोहा गिस जमों प्रयास.”
झंगलू हा समझाय बर कहिथय -“”एमां बुजरूक के नइ दोष
जे मान्यता पूर्व ले आवत, ओहर तुरूत खतम नइ होय.
भूत प्रेत जादू अउ टोना – एमन मात्र काल्पनिक चीज
यदि हम इंकर हकीकत कहिबो, हमर बात पर हंसिहंय लोग.
बैगा तोला टोनहा कहि दिस, मनखे मन कर लिन वि·ाास
धन तो दुधे उहां पर पहुंचिस, वरना तंय खाते कंस मार.”
“”वाकई मं हम मुंह मं कहिथन – भूत प्रेत बिल्कुल नइ होय
खुद ला वैज्ञानिक बताय बर, रखथन एक से एक प्रमाण.
लेकिन मन मं स्वीकारत हन – जग मं होथय प्रेतिन प्रेत
तंत्र मंत्र जादू अउ टोना, इंकर शक्ति के रहत प्रभाव.”
एकर बाद गरीबा हेरिस, शुद्ध सोन के चूरा एक
ओहर झंगलू गुरुला बोलिस -“”मोर बात ला सुन रख ध्यान-
मोर ददा हा बचा के राखिस, इहिच सोन के चूरा एक
कतको कष्ट झपैस हमर पर, ओला नइ बेचिस कर टेक.
ददा किहिस के जब मंय मरिहंव, बेच देबे तंय चूरा मोर
श्रद्धा संग गत गंगा करबे, तोर उड़ाहय इज्जत – सोर.
पर चूरा ला तुमला देवत, ले दव पट्टी कलम किताब
ओला दीन छात्र ला बांटव, ओमन पढ़ लिख शिक्षित होय.
भूल करंव नइ खात खवई ला, कोन जाय अब तीरथ धाम
अइसी के तइसी मं जावय – जमों खटकरम गंगा धाम.”
अतका किहिस गरीबा हा अउ, अपन वचन ला तुरूत निभात
झंगलू ला चूरा ला देथय – नगदी दान होत महादान.
झंगलू किहिस -“”होत हे अक्सर – मनखे करत घोषणा बीस
सत्तर ठक आ·ाासन देवत, मदद करे बर अस्वीकार.
पर तंय लबरा बादर नोहस, जेन बताय करे हस काम
दीन छात्र मन मदद ला अमरें, पढ़ लिख के बनिंहय गुणवान.”
झंगलू हा चूरा ला रख लिस, एकर बाद छोड़ दिस ठौर
अब ओ तन के कथा बतावत, जेतन होत काम हे और.
सब अतराप के मनखे मन हा, धनवा घर मं जेवन लेत
बपुरा मन हा सदा भुखर्रा, पर अभि पाय सुघर अक नेत.
पेट तनत ले झड़किन कोंहकोंह, हिनिन बाद मं धर के राग
बोकरा के जिव जाथय लेकिन – खबड़ू कथय अलोना साग.
सोचिन के जब सोनसाय हा, पर धन लूट बनिस धनवान
हम्मन बढ़िया पांत पाय हन, काबर छोड़न मूर्ख समान !
यथा सिन्धु के कुछ पानी ला, झटक के खुश हो जथय अकाश
इसने एमन थोरिक उरका, लेवत बपुरा सुख के सांस.
मुढ़ीपार के पुसऊ निवासी, बन्दबोड़ रमझू के गांव
सुन्तापुर के वृद्ध फकीरा, भण्डारा मं भोजन लीन.
पुसऊ हा दूनों झन ला बोलिस -“”धनवा करिस खर्च कंस आज
सब अतराप के नर नारी मन, ओकर घर मं जेवन लीन.
धनसहाय ला पुण्य हा मिलही, सबो डहर ले यश जयकार
सोनू के आत्मा नइ भटकय, ओहर करिहय स्वर्ग निवास.”
रमझू कथय -“”देख झन पर तन, तंय हा बता स्वयं के हाल
धरमिन के शादी रचेस तब, तंहू करे हस अड़बड़ खर्च.
खैन बराती पेट के फूटत, समधी सजन खैन पकवान
हम रहि गेन बाट ला जोहत, मिठई कलेवा कुछ नइ पाय.”
पुसऊ हा मुसका दीस ठोलना -“”जब धनसाय निमंत्रण दीस
तंय भण्डारा मं उड़ाय कंस, मगर अभी तक खाली पेट.
ठीक हे भई, अभी बचे निमंत्रण, तंय हा पहुंच गांव मुढ़ीपार
तोला उंहचे खूब खवाहंव – करी के लड़ुवा – पप्ची – खीर.”
तभे फकीरा प्रश्न फेंक दिस -“” तंय हा बता एक ठन बात
छुईखदान गीस धरमिन हा, जेन आय ओकर ससुराल.
धरमिन अ‍ैस तोर घर मं कभु, या मइके के भूलिस याद
ओहर सुखी या कुछ दुख पावत, बता अपन पुत्री के हाल ?”
किहिस पुसऊ हा मुँह चोंई कर-“” तंय पूछे हस कठिन सवाल
साफ व्यथा मंय कहां ले बोलंव, मंय खुद नइ जानत हंव साफ.
छुईखदान ले धरमिन आइस, झुखे रिहिस हे ओकर देह
जउन हा पहिली हंस हंस चहकय, पर ए बखत बहुत गंभीर.
बेटी ला मंय पूछेंव वाजिब -“”धरमिन, तंय कोंदी अस कार
तोर स्वास्थय हा घलो गिरे अस, यदि तकलीफ बता सच खोल ?”
धरमिन किहिस -“”ददा गा तंय सुन, गलत विचार भूल झन सोच
मइके के जब याद हा आवय, तब सुरता करके मंय रोंव.”
“”कइसे हें तोर सार ससुर मन, हंस बोलिन या करुजबान
ओमन तोला तपे भुंजे यदि, फोर मोर तिर सत्य बयान ?”
मंय हा जब पूछेंव धरमिन ला, तब बोलिस थोरिक मुसकात-
“”सास ससुर मन देवी देवता, सदा करिन सुख के बरसात.
यदि मंय बुता करे बर सोचंव – ओमन छेंकय आगू ।
अपन सामने मं बइठा के खूब खवांय सोंहारी ।।
“”नोनी, तंय अभि जउन कहत हस, ओकर ले कई शंका होत
जब तंय सब प्रकार सुख पावत, एकोकन नइ सहत अभाव.
तब काबर करिया लुवाठ अस, कांटा असन सूखगे देह
तोला का अजार सपड़े हे, वाजिब बात मोर तिर बोल ?”
धरमिन बोलिस -“”ददा मोर सुन, शंका के तरिया झन डूब
मोला संउपे हस धनपति घर, फेर कहां मिलिहय तकलीफ !
मंय जब रेहेंव अपन मइके मं, तब तंय हा भुखमरा गरीब
खाये पिये बर कमती होवय, हुकुर हुकुर मंय भोगंव भूख.
पर ससुराल अचक पूंजीपति, उहां भराय खाय के चीज
मंय हदरही खूब खाए हंव, एक दिवस मं कई कई बार.
आखिर मं नुकसान बता दिस, मोला धर लिस अपच अजार
एकर कारण सुखा गेंव मंय, समझगे होबे तंय सच बात !”
धरमिन हा अतका अस बोलिस, एकर बाद रोय धर लीस
ओकर बहत छलाछल आंसू , कलकल बहिथय नदी के धार.”
रमझू हा अचरज भर पूछिस -“”तंय हा करत बात दू रूप
एक डहर धरमिन सुख पावत, पर तन रोवत आंसू ढार.
आखिर धरमिन हा सुख पावत, या झेलत हे कष्ट अपार
एकर उत्तर साफ बता तंय, ताकि जमों शंका मिट जाय ?”
पुसऊ किहिस -“”शंका उठात हस – मंय तक अचरज मं पर गेंव
धरमिन तिर मंय प्रश्न रखेंव कई, पर ओहर नइ दीस जुवाप.”
किहिस फकीरा -“”पुसऊ आज सुन – मंय बतात हंव जग के गोठ-
मनसे तिर छोटे दुख होथय, ओहर राज खोलथय चौक.
मगर असह्य कष्ट हा आथय, या इज्जत लग जाथय दांव
तब मनुष्य सब भेद लुकाथय, साफ कहय नइ ककरो पास.
यदि धरमिन नंगत दुख पावत, लुका के रख लेथय सब हाल
तब तंय वाजिब तथ्य पता कर, अपन हृदय के शंका मेट.”
पुसऊ किहिस -“”तंय ठीक कहत हस – मंय करलेंव गलत या नेक
धरमिन के शादी रचाय हंव, एकोकन नइ पर के हाथ.
ओहर अब ससुराल मं रहिहय, दुख ला पाय या सुख उपभोग
अगर मोर तिर बिपत बताहय, पर मंय कहां ले करहूँ दूर !
धरमिन हा ससुरार मं अभि हे, मंय हा जाहंव छुईखदान
ओकर बारे पता लगाहंव, आखिर ओकर का हे हाल ?”
अपन गांव तन पुसऊ लहुट गिस, बढ़िन फकीरा समझू शीघ्र
गीन फकीरा के घर तिर मं, करिस फकीरा हा ए गोठ –
“”बन्दबोड़ हा हवय पास मं, काबर करत तड़तड़ी जाय
तंय थोरिक क्षण बिलम मोर कर, कुछ सवाल के लान जुवाप.
एकर पहिली रहत रेहे हस, राजिम नाम तीर्थ स्थान
पर अब ओला छोड़ डरे हस, इही क्षेत्र मं करत निवास
स्वर्ग नर्क के कथा ला जानत, कर्मकाण्ड के जानत पोल
कतका लूट तीर्थ मं होथय, सब के भेद बता तंय खोल ?”
“”स्वर्ग नर्क के झूठ ला रच के, जग ला लूटत कर व्यापार
पाखण्डी के नीच कर्म पर – दूसर ला बांटत उपदेश.
होत तीर्थ मं लूट भयंकर, कर्म निष्ठ करथंय खुद पाप
स्वर्ग धर्म यदि तीर्थ बिरजतिस, काबर आतेंव ए अतराप !”
एकर बाद फकीरा रमझू, दूनों घर के अंदर अ‍ैन
उहां रिहिस ढेरा अउ पटुवा, ओमां गिस रमझू के आंख.
किहिस फकीरा ला रमझू हा -“”ढेरा पटुवा हे घर तोर
मोर इहां हे गाय एक ठक, पर “गेंरवा’ के बहुत अभाव.
तंय गेंरवा बनाय बर जानत, डोरी बटे – कला के ज्ञान
एक गेंरवा बना मोर बर, अपन कला के कर विस्तार.”
मुसका मुचमुच कथय फकीरा -“”तंय लालची बहुत हुसियार
धनवा के घर देखेस जेवन, उहां खाय ओंड़ा के आत.
ढेरा पटुवा पाय मोर घर, तब “गेंरवा’ बनाय कहि देस
ठीक हे भई “गेंरवा’ बनात हंव, तोर बात के होवत मान.”
धरिस फकीरा हा ढेरा ला, पटुवा गुच्छ ला दाबिस कांख
गुच्छा ले पटुवा ला हेरिस, ढेरा मं फांसिस तत्काल.
ढेरा ला घुमात ताकत कर, डोरी के होवत निर्माण
करत फकीरा हा कंस मिहनत, साफ दिखत छाती के पांत.
कड़कड़ आंट चढ़िस डोरी मं, फेर पूर के “भांज’ चढ़ैस
बाद कंसाकस फांसा मारिस, डोरी तिन भंजन बन गीस.
नरियर बूच मं सोंट साफ कर, गेंरवा बांधिस मुड़ी ला बांध
जउन काम के उदिम उचाइस, आखिर देखा दीस कर पूर्ण.
दीस फकीरा हा रमझू ला, अदक नवा गेंरवा बस एक
कहिथय -“”श्रम मं देह पिराथय, पर वास्तव मं मिलथय लाभ.
धनवा के घर खूब खाय हंव, एकर कारण असमस पेट
पर मिहनत मंय हंफर करे हंव, हल्का असन पोचक गे पेट.”
रमझू कथय -“”मिहनती हस तंय, वृद्ध होय जस बर के पेड़
पर तंय कभू व्यर्थ बइठस नइ, तभे ठोस हे अब तक देह.
जे मनसे मिहनत ले भगथय, रहन सकय नइ कभू निरोग
अनबन रोग मं फदके रहिथय, आखिर मरत बिपत ला भोग.”
रमझू पूछिस -“”बता भला तंय – तंय हा करबे बइठ अराम
या कोई अउ काम बचे हे, तेला भिड़के करबे पूर्ण.”
कथय फकीरा -“”जलगस जीवन, तलगस मिहनत सक भर काम
हमर इहां हे मोट्ठा लकड़ी, पर बारे बर मुश्किल होत.
ओमन ला मंय पतला चिरहूँ, ताकि होय बारे के लैक
लकड़ी सिपच के बरही भरभर, बारत तेन कष्ट झन पाय.”
“”तंय हा अब लकड़ी ला चिर भिड़, मंय हा जावत खुद के गांव”
अइसे बोल निकल गिस रमझू, करत फकीरा भिड़ के काम.
लकड़ी चीरत हवय फकीरा धर के घन अउ टांचा ।
साथ मं टंगिया छिनी मदद बर ताकि रुकय झन बूता ।।
लकड़ी ला लकड़ी पर रखथय, टंगिया मार बनैस सुराख
छिनी घुसा के – लगा निशाना, ओकर पर घन मारत ठोस.
लकड़ी कतका एेंठ बतावय, फर फर फटत लगत बर्रास
पात फकीरा के काम सफलता, ओकर मन उमंग उत्साह.
निपटा काम फकीरा बइठिस, पटका मं पोंछत श्रम बूंद
दुनों हथेली भर फोरा हे, तेला देखत टकटक आंख.
ओकर पुत्र सनम हा पहुंचिस, जउन बुड़े हे दुख के ताल
ओकर डहर हथेली रखथय, ताकि देख ले फट ले साफ.
कथय फकीरा -“”देख हथेली, फोरा उपके हे कई ठोक
चंगचिंग दरद हाथ भर घुमरत, मिहनत के तंय देथ कमाल !”
सनम निकालिस गोठ टेचरही -“”तोर हाथ फोरा पर जाय
मिहनत मं चुर चुर थक जावस, या फिर दरद मं कल्हरत जास.
तोर प्रशंसा कभू करंव नइ, तंय हा भोग खूब तकलीफ
तंय हा जइसे कर्म करे हस, फल ला चीख उही अनुसार.”
परिस फकीरा हा अचरझ मं -“”तंय हा विकृति कहां ले लाय
तोर दिमाग गरम हे काबर – बिन छल कपट तंय फुरिया साफ
“”सोनसाय हा बना के राखिस, अपन पुत्र बर धन बेशुमार
तब तो धनवा हा सब झन ला, देइस नेवता झारझार.
धनवा कतको खर्चा करही, मिलिहय तभो दूध घी भात
पर तंय पूंजी नइ जोड़े हस, मारत हे अभाव हा लात.
चरचर परत हाथ भर फोरा, तभे पेट मं अन्न बोजात
करे हवस तंय हा चण्डाली, ओकर दुख हम भोगत आज.”
गोठिया सनम हा मुंह ओथरा लिस, दांत काट फेंकत नाखून
वृद्ध फकीरा थथमरात अब, मानों – ओकर उसलत खाट.
जीवन भर सिद्धान्त बनाइस, एक घरी मं होवत नाश
जइसे बंधिया फूट जथय तंह, जमों नीर हा बोहा खलास.
कथय फकीरा -“”तंय भोजन कर – हेर बड़े टाठी भर भात
पेट जहां पोटपिट ले होवय, तब फिर बाद हाथ कर साफ.”
डोकरा के अंटियहा गोठ सुन, सनम भड़क गे कर के रोष-
“”धनवा घर के नेवता मं मंय, हाही बुतत ले लेंव दमोर.
ओंड़ा तक ले अन्न बोजाये, कइसे सहय पेट अउ भार
तंय हा अटपट काबर बोलत – जब कि हवस बुजरूक हुसियार ?”
जइसे मारे जथय दंतारी, कोरलग असन पाग ला देख
काबर चूक फकीरा जावय, जब सपड़ाय सुघर अक टेम.
कथय फकीरा -“”तंय हा जइसे, सक बाहिर अनाज नइ खास
उसने मंय जरूरत ले बाहिर, धन नइ रखेंव स्वयं के पास.
पर के बांटा के अनाज ला, तंय खाये बर कनुवा गेस
मंय हा स्वयं के स्वार्थ पूर्ति बर, करन पाय नइ पर के घात.
सोनसाय – सुद्धू अउ मंय हा, एक गांव के अन इन्सान
सुद्धू – मोर राह एके ठन, पर सोनू मचैस कंस लूट.
बर के पेड़ – चरोटा अउ अन, जाम खड़ा होथंय संग एक
लेकिन बर हा शोषक होथय, पर के वृद्धि करत हे छेंक.
मात्र अपन उन्नति बर करथय – पाट के भाई के नुकसान
रस अउ जगह झटक के होथय, कई काबा के रूख बड़े जान.
इसने पर के हक ला झींकिस, सोनसाय हा सकलिस माल
हम सब ला अपने माने हन, निछन पाय नइ ककरो खाल.”
रखिस फकीरा हा सुतर्क तंह, सनम के शंका सब मिट गीस
निंदई करे ले खेत हा सुधरत, बन दूबी के घुसरत टेस.
सनम हा उठ नांगर सम्हरावत, करना हे ओलहा के काम
दूसर दिन हा आय चहत तंह, सनम छोड़ दिस करे अराम.
कथरी ओढ़ कोन अब सोवय, मुंह झुलझुल पर पछल गे रात
सुकुवा ऊग ठाड़ होगे अउ, कुकरा कुकरूँग कूं चिल्लात.
गांव गंवई के घड़ी इही मन, बता सकत के समय कतेक !
सरका काम कभू नइ मांगय – हमर मंजूरी देव अतेक.
खटिया छोड़ कृषक मन उठगें, आय टेम ओलहा निपटाय
आंख धोवई ला घलो छोड़ के, धन ला देवत पयरा खाय.
“”मंय बासी ला कभू खांव नइ, कहां तात ला सकत अगोर !
अगर नंगरही टेम मं बिलमत, खरथरिहा कहिहंय – कमचोर.”
बइला मन के पेट हा भरगे, तंहने सनम होत तैयार
जोंता नांगर लउड़ी गांकर, तुमड़ी भर जल धर लिस साथ.
ककरो ले झन पिछुवा जावय, तइसे बढ़त रबारब पैर
धन मन मार कदम्मा दउड़त, भर्री पहुंच के ठहरन पैन.
कांसी बन दूबी बउछाए, हल नइ रेंगत धर के रास
आखिर “राउत’ मड़ा के रेंगत, तब धरती मं धंसथय नास.
कोरलगहा धर चलत सनम हा, पर पठले भुंइया अंड़ जात
हल के मुठिया जमा के दाबत, ढेला मन ऊपर आ जात.
बइला मन हा खंइचत नांगर, उंकरो लोढ़िया – भरगे पांव
तब ले कोंघर के काम बजावत, हारत कहां काम के दांव !
गांकर ला अब उड़ा सनम हा मारत दूसर हरिया ।
नंगत ताकत ला खावत – तब निकलत माटी करिया ।।
देवत देह पछीना कारी, नस मन चरचर दर्शन देत
मुंह चोपियात पियास जनावत, यद्यपि जल ला रूक रूक लेत.
करत क्वांर के घाम बदरहा, होत सनम के चकचिक आंख
पेट पोचक के अंदर चल दिस, मुंह झोइला जस करिया राख.
पाठक मन ले एक निवेदन – तुमन सनम पर दया देखाव
बपुरा कतका देह हा टोरय, अब तो नांगर ला ढिलवाव.
नास लुका के ढेला अंदर, सनम हा वापिस होत मकान
तिही बीच डकहर हा आथय, रोक लीस फट सनम के पांव.
कहिथय -“”जइसे तोर माल मन, काम करे बर बहुत सजोर
उसने बने सपुतहा धन ला, लान लेंव मंय घर मं मोर.
बुतकू ऊपर अ‍ैस बेवस्ता, ओला नाप देंव मंय कर्ज
लेकिन ओहर पटा सकिस नइ, बढ़त चलिस ऋण ब्याज के रोग.
ऋण के बल्दा मं बिसाय हंव, बुतकू के बइला ला आज
अब तो निश्चय सिद्ध तोर अस, बचे हवय जे ओलहा काज.”
डकहर बड़नउकी ला मारत, खुद ला सिद्ध करत हे ऊंच
ओतका तक मं तुष्टि मिलिस नइ , तब अब करत अपन तारीफ –
“”अपन कथा ला मंय बतात हंव, यद्यपि तंय जानत सब भेद
ई·ार छाहित हवय मोर पर, तब मंय बढ़ेंव बिपत ला छेद –
एकर पूर्व तोर अस कंगला, बिन पूंजी के रेहेंव गरीब
सप सप भूख पेट हा झेलय, स्वादिल जिनिस चिखय नइ जीब.
घर कुरिया तक बिक गिस तंहने, मंय बम्बई कमाय चल देंव
चुहा पसीना मिहनत करके – अड़बड़ अक धन ला सकलेंव.
अब मंय वापिस गांव मं आके, बने चलावत हवंव दुकान
मोला कष्ट दीस तेकर ले, मंय प्रतिशोध लेत हंव तान.”
अतका कहि के डकहर सल्टिस, सनम अपन घर सरसर जात
थोरिक मं बुतकू हा मिलथय, जेकर मुंह दुख के बरसात.
बुतकू रोथय -“”का बतांव मंय, डकहर छीन लेग गे जान
जउन माल मन मोर जिन्दगी, ओमन होगिन आज बिरान.
दूनों धन मन कुबल सपुतहा, लखिया – धंवरा उनकर रंग
लइका मन फोड़ी बदथंय तस, चारा चरंय दुनों मिल साथ.
उनकर पूंछ लाम पतरेंगा, सरग पतालिया मोहक सींग
उनकर मुंह हा लमचोचका नइ, कमई मं ताफड़ टींगे टींग.
ओमन ला वन मं चराय बर, एक दिवस मंय धर के गेंव
एक शेर हा आइस तंहने, मंय हा डर मं चुप छुप गेंव.
बइला मन ला देख शेर हा, पहुंच गीस खब उंकर समीप
देख शेर ला बइला मन हा, आगू बढ़िन खिंचे बर जीब.
आंख बरनिया – पांव ला खुरचत, क्रोध मं भर फर्रेटिन जोर
शेर सुकुड़दुम हो के खसकिस, तब बच पाइस जीवन मोर.
दूनों बइला मन फुरमानुक, काम करे बर त्यागंय ढेर
बिगर मुंहू के रिहिन जानवर, चलन पियारुकाम बजांय.
तेन कमइया ला डकहर हा, लउठिच लउठी झड़किस तान
धन मन सींग हला के रहिगें, पर नइ छोड़िन मोर मकान.
हकिया के डकहर हा बोलिस -“”जब्दा हवय तोर ए माल
करत डायली – खुर ला रोपत, अपन माल ला तिंही निकाल.”
मोरेच सम्मुख मोर प्राण के, डकहर करिस हइन्ता खूब
पर मंय कहां देव कुछ उत्तर, यद्यपि क्रोध हा कंस उफनैस.
दुनों कमइया मन हा मोला, चांटे लग गिन जीब निकाल
ओतका बखत आत्मा कलपिस, मोर शरीर करा अस सून.
धरती माता हा फटतिस ते धंसतेंव तन के सुद्धा ।
अइसन क्रूर समय नइ आतिस – कहां ले दुख के हुद्दा ।।
जब बइला मन हा नइ निकलिन, तब डकहर हा करिस उपाय
बइला मन ला मोठ डोर मं, एकदम कंस के बंधवा लीस.
गाड़ा ऊपर लाश असन रख, धन ला लेगिस डकहर क्रूर
का करतिन बपुरा मूक पशु मन, बन मजबूर – बिगर मन गीन.
जब ले धन मन घर ला त्यागिन, खांव खांव घर कुरिया होत
अन महराज सुहावत नइये, आत्मा रोवत बिगर अवाज.”
चेत लगा के सनम हा सुनिसे, कहिथय -“”कृषक के जीवन बैल
यदि एमन हा हाथ ले निकलत, गिरत कृषक पर दुख के शैल.
डकहर के कुछ कहां ओसला, पहिली रिहिस बहुत कंगाल
लेकिन बम्बई पहुंच के जोड़िस, देखे तक नइ ततका माल.
जतका बिपत अपन हा भोगिस, अब पर ला देवत हे कष्ट
डकहर हा आनंदित होथय, जब दूसर हा होथय नष्ट.
एमां हे मनुष्य के गलती, मगर साथ मं धन के खेल
जेकर पर लक्ष्मी हा छाहित, ओहर देथय पर ला एल.
डकहर कथय -“”जोड़ के धन ला, मंय हा करे बड़े जक क्रांति
लेकिन ओकर तर्क निरर्थक, ओकर सोच भरे हे भ्रांति.
एक दीन हा अगर बाद मं, रूपिया जोड़ बनत धनवान
अइसन कथा एक के होथय, सर मं सती करत उत्थान.
पर समाज मं बचत अउर जन, इनकर जीवन पद्धति हीन
ऊपर के सिद्धान्त तेन हा, इनकर बर बिल्कुल बेकार.
हम हा अइसन चहत व्यवस्था – सब पावंय सम हक कर्तव्य
घृणित होय झन एको मनसे, एक पाय मत मान विशिष्ट.”
चर्चा उरक गीस तंह बुतकू हा चल दिस निज छैंहा ।
उहां दुनों बइला मन हाजिर – मुड़ी निहू कर ठाढ़े ।।
बुतकू हा धन मन पर भड़किस -“”तुम्मन इहां कार आ गेव
स्वामी तुम्हर आय डकहर हा, ओकर घर रहि काम बजाव.
तुम दूनों कोढ़िया डायल हव, मोला अब बनात बइमान
काबर आय – इहां ले भागव, वरना पीट के लेहंव प्राण.
तुम्हर चाल मं परे हे कीरा, काम के डर मं आएव भाग
कइसे रेंगव ऊंच नाक कर, तुम्हर कर्म ले आवत लाज.”
बुतकू हा धन मन पर भड़किस, रूखा स्वर ले करिस प्रहार
मगर उंकर पर प्रेम रिहिस हे, तब दुख मानिस थोरिक बाद.
बइला मन के पीठ ला सारिस, दीस खाय बर पैरा – घास
कहिथय -“”मोर बात ला मानो – मोला झन बनाव बइमान.
तुम्मन अतिथि असन आये हव, तब पेटभरहा खा-पी लेव
पर डकहर के घर फिर लहुटव, करव अंत कर उंहे निवास.”
ओतकी मं डकहर हा दंत गिस, गांव के पंच ला धर के साथ
चोवा नथुवा केजा फेंकन, सुखी साथ मं कई ग्रामीण.
फेंकन हा बुतकू ला बोलिस “”तोर माल मन धोखाबाज
ए दूनों धन ला डकहर हा, रखे रिहिस हे कड़ कड़ बांध .
लेकिन एमन अ‍ैन तोर घर, होय स्वतंत्र टोर के छांद
तहूं हा उंकरे पीठ ला सारत, देत खाय बर कांदी – घास.
एकर अर्थ साफ ए झलकत – एमां हवय तोर बस चाल
बइला मन हा भगा के आगिन, एकर बर हे खुशी अपार.”
भड़किस सुखी -“”माल मन ला जब, बेच देस डकहर के पास
यदि ईमान तोर तिर रहितिस, हिले लगातेस धर के नाथ.
डकहर बइला ला ढूंढत हे, धर के पसिया ला हर ओर
तंय हा खुद धन ला अमराते, तोर सब डहर उड़तिस सोर.”
बुतकू किहिस -“”माल मन आ गिन, तेकर मोला कुछ नइ ज्ञान
इनकर गलत कर्म ले होवत, मोला निहू पदी के भान.
जे उपाय मं एमन जावंय, धर के जाव मरे बिन सोग
यदि मंय बाधा बनत आड़बन, बोंग देव तुम मोर शरीर.”
डकहर किहिस -“”बहुत साऊ हस, हवय तोर दिल चकचक साफ
हम फोकट लगाय हन लांछन, हमर कुजानिक ला कर माफ.”
व्यंग्य शब्द ला सुन के बुतकू, खूब कलबला – लउठी लीस
बइला मन ला कुचर ढकेलत, घर के बाहिर दीस खेदार.
पर धन मन प्रतिशोध लीन नइ, चल दिन डकहर संग चुपचाप
अब बुतकू हा मुड़ धर बइठिस – मानों स्वयं करे महापाप.
आत कमइया मन के सुरता, ब्यापत दुख हराय हे चेत
जे तिर धन के गिरे हे आंसू , एकर आंस गिरिस उहेंच.
हवलदार – केंवरी अउ बहुरा, शहर ले वापिस अ‍ैन हताश
भाई – भौजी अउ महतारी, बुतकू के लागमानी आंय.
हवलदार घर फूल नइ फूलत, याने ओ हे बिन संतान
दउड़त हवय चिकित्सक तिर मं, केंवरी संग मं जांच करात.
बुतकू पूछिस -“”कहि सब स्थिति, तुमन सफलता कतका पाय
जउन चिकित्सक तिर दउड़त हव, ओहर का आ·ाासन दीस ?”
हवलदार बोलिस खुजात मुड़ -“”भइगे तंय हालत झन पूछ
रूपिया भर बोहात पूरा अस, पर मृगतृष्णा अस हे आस.
हमर चिकित्सक अनुभवी हावय, जांच करत अउ देत सलाह
मगर लाभ – फल हाथ आत नइ, अब हम होवत हवन हताश.”
केंवरी किहिस -“”रोक देवत हन, अउ कहूं डहर देखाय – सुनाय
जब नइ पुत्र हमर किस्मत मं, व्यर्थ दिखत हे करई प्रयास.”
बहुरा कहिथय आस बढ़ाके, “”तुम सब भले पश्त हो जाव
पर अब तक मंय करत भरोसा – रहिहंव नाती के मुंह देख.
मानव हार जथय सब तन ले, होत बंद हर आस – कपाट
आखिर देव के शरण गिरथय, तब पावत इच्छित फल मीठ.”
केंवरी ला बहुरा उम्हियावत -“”ककरो इहां “जंवारा’ बोय
तब तंय ओकर रखबे सुरता, उही बखत हम देव मनाब.
नीर रूतोबे तंय जमीन पर, चिखला पर सुतबे रख – पेट
करबे देव के स्तुति मन भर, तंहने मोर मनोरथ पूर्ण.”
बुतकू अब तक हवय कलेचुप, पर अब धीरन बात लमात –
“”अगर मनोरथ पूर्ण हो जातिस, रोतिस कार कल्हर इंसान ?
खूब बेवस्ता आय हमर पर – ओला काट सकत हे कोन
सुख – प्रकाश ला भिड़ के खोजत, पर अमरावत दुख – अंधियार.”
बुतकू फोर बता दिस सब तिर, एकर पूर्व घटिस जे दृष्य
सुन के सब झन दुख ला मानत, कोइला अस मुंह हा करियात.
जग के कथा हवय अनलेखे, ओकर ले दुख – कथा अपार
अब हड़ताल करत नौकर मन, नइ जावत धनवा के द्वार.
हगरुकातिक टहलू पोखन, एक जगह मं करत विचार
फूलबती – बोधनी अउ बउदा, यने जमों नौकर हें साथ.
कातिक कहिथय -“”सब जानत हव – मंय हा तिजऊ के अंव औलाद
धनवा मन के काम ला करके, मोर बाप गिस मरघट घाट.
अब मंय धनवा के नौकर अंव, यहू तथ्य तुमला हे ज्ञात
याने पीढ़ी दर पीढ़ी हम, धनवा के पूजत हन लात.
लेकिन उन्नति हमर होत नइ, दिन दिन भटत – होत बर्बाद
हमर बेवस्ता हा पहिलिच अस, कब तक चलन गरीबी लाद ?”
टहलू कथय -“”मोर ला सुन लव, धनवा – हमर मं अड़बड़ फर्क
ओहर स्वर्ग – राज ला भोगत, अउ हम भोगत दुख के नर्क.
धनवा रहिथय महल अटारी, हमर पास बस फुटे मकान
धनवा खाथय खीर सोंहारी, हम हा पेज घलो नई पान.”
बउदा कथय -“”जमों मिल हेरव अइसन सुघर तरीका ।
होय भविष्य उजागर – हालत हा झन होवय फीका ।।
धनवा हा बढ़ाय मजदूरी, ताकि निफिक्र अन्न हम खान
कपड़ा पहिरे बर झन तरसन, होय हमर बर बसे मकान.
अगर मांग ला धनवा मानत, काम बजाबो उठा कुदाल
यदि इंकार करत धनवा हा, हम नइ खतम करन हड़ताल.
जे प्रस्ताव अभी भाखे हन, ओकर परिणति होवय काम
मुंह के थूंक मं बरा चुरय नइ – ना रेमट मं मीठ गुराम.”
होत संगठित जमों श्रमिक मन, इनकर गोठ सुखी सुन लीस
ओहर हंफरत धनवा तिर गिस, जतका बात सुना दिस साफ.
कहिथय -“”कते जगत मं रहिथस, मोर डहर दे थोरिक कान –
चिखला माटी संग जे लड़थय, उही असल मं आय किसान.
जतका अस कमाय के ताकत, ओतका धरती ओकर आय
जेकर तिर सक – बाहिर धरती, देश के दुश्मन ओहर आय.
मेड़ मं बइठ कराथय खेती, कुब्बल अक धर के बनिहार
ओहर ना किसान – ना पोषक, वास्तव मं शोषक गद्दार.”
अतका बोल सुखी अउ बोलिस -“”मंय बताय हंव ऊपर जेन
ओला तोर भृत्य मन बोलत, कृषक के परिभाषा ओरियात.
अपन मांग ला झटके खातिर, नौकर तोर करत हड़ताल
उनकर धुमड़ा ला खेदे बर, बने सोच के राह निकाल.”
धनवा हंसिस -“”मौत जब आथय, छानी पर कुक्कर चढ़ जात
नौकर इतरावत तिनकर पर, मंय करिहंव बम के बरसात.
छेरकू मंत्री तिर पठोय हंव, इहां आय बर खबर अनेक
मोर समस्या उही खेदिहय, उही एक झन रक्षक मोर.
जब छेरकू चुनाव ला लड़थय, धर पसिया मंय करत प्रचार
ओकर सिरी गिरय झन कहि के, अपन पुंजी तक करथंव ख्बार.
एन बखत मंय मदद ला देथंव, तब छेरकू पर हे वि·ाास
मोर बनउकी उहू बनाहय, होन देय नइ कभू निराश. ”
मेचका हा बरसा सोरियाथय, धनवा हा छेरकू के याद
वास्तव मं छेरकू आ धमकिस, मरत धानबर बरसा – खाद.
छेरकू किहिस – “”हताश होव झन, काबर फिकर मं तंय बिपताय !
तोर बिपत के टंटा टुटिहय, झख मारे बर मंय नइ आय.
अगर तोर खमिहा हा उखनत, बोहा जहंव मंय धारो धार
जइसे नास बिना नांगर हा, धथुवा बइठ जथय मन मार.”
छेरकू हा फिर सुखी ला नेमिस -“” जमों श्रमिक ला धर के लान
ओमन ला अइसे झुझकाबे – अब नइ खावव दुख के बाण.
छेरकू चाहत तुम्हर दर्शन, आय कठिन मं समय निकाल
जतका दुख पीरा सब खोलव, छेरकू लेहय बिपत सम्हाल.
तुम्हर भविष्य बनाये खातिर, शासन हा निकाल दिस राह
अइसन जिनिस ला फोकट बांटत, जेमां तुम पाहव सुख – छांय.”
पोखन केजा बउदा हगरु, झड़ी भुखू डकहर मन अ‍ैन
टहलू कातिक साथ बोधनी, फूलबती तक संग मं अ‍ैस.
गल मं गुंथे गेंगरूवा रवाथय, तब मछरी के जीवन नाश
नौंकर संग ग्रामीण पहुंच गिन, छेरकू अउ धनवा के पास.
छेरकू किहिस – “”गोहार ला सुन लव, आय हवंव जे करे हियाव
धर्म के काम कराय चहत मंय, छेंक देव यदि कुछ अन्याय.
मंय हा धनवा ला गोहरावत – तंय हा बनवा मंदिर एक
यदि भगवान ला पधरावत हस, धरमी कहिहंय – काम हे नेक.
जिंहा रहय नइ मंदिर देवा, मरघट असन लगत हे गांव
नंदा जथय लक्ष्मी इमान हा, धुंकी बंड़ोेरा करथय रवांव.
ई·ार – पूजा जिंहा होत नित, लाहो नइ ले मरी मसान
पुछी उठा – सब विघ्न भगाथय, काबर के छाहित भगवान.”
धनवा कथय -“”कसम बइठक के, तुम्हर गोठ नइ सकंव उदेल
धर्म – काम मं सब तियार तब, जाहंव कहां एक झन पेल !
शासन खुशियाली के होवय, हमर गांव बाढ़य दिन रात
दुख ला हरंय देवता धामी, ओमन कभु झन छोड़य साथ.”
केजा हा धनवा ला बोलिस -“”करत हवस जब नेकी ।
तब काबर पुच पुच करथस – कूटत शंका के ढेंकी ।।
देबो मदद अपन ताकत भर, हमरो सुधर जाय परलोक
धर्म के झण्डा ला उचाय हस, बरगलांय तब ले झन रोक.”
छेरकू समय अमर के बोलिस -“”मगर समस्या आवत एक
धनवा के नौकर मन कर दिन, मजदूरी बढ़ाय बर टेक.
जब ओमन मिहनत ले भगिहंय, उठे काम मं परिहय आड़
जइसे सनसन बढ़त धान ला, चरपट करत हे गंगई कीट.
अगर श्रमिक के मांग ला मानत, ओमन सब धन लेहंय लूट
तब धनवा हा कहां ले करही, मंदिर ला बनाय बर खर्च ?
एकर बर तुम राह निकालव – पूर्ण होय ई·ार के काम
कष्ट प्राकृतिक कभू आय झन, होय सुरक्षित गांव तुम्हार. ”
भुखू जउन धनवा के कोतल, समझगे छेरकू के छल छिद्र
कथय “”सुनव धनवा के नौकर, काबर तुम फुलोय हव गाल !
धनवा के तुम पांव छुएव तब, अपन मांग नइ राखेव कार
मगर काम के गाड़ा रूकगे, थोथना ला ओरमात दड़ांग !
मन के अंदर सत्य सोच लव, करिहव झन पाछू बदनाम
देव – काम मं विध्न करत हव, चुमुक ले बुत जाहय सब नाम. ”
“”ई·ार हा बनाय हे जग ला, जानत सबके हृदय के बात
ओहर रखे तभे फूलत हन, तोप रखे सबके मरजाद.”
अतका बोल कथय अउ फेंकन -“”तुम बइठे हव तज के काम
एकर तुमला दुष्फल मिलिहय, दैविक सजा हे ओकर नाम.”
“”ई·ार से झन द्रोह करव तुम, वरना मिलिहय दुष्परिणाम
तुम्हर पिला पर पाप उतरिहय, चुहक पाव नइ सुख के आम.”
झड़ी के बात सुनिन नौकर – डर मं कांपत जस पाना ।
मुड़ ला निहरा दुबक के मानों चहत जान हा जाना ।।
हंफरत हें – मुंह गोठ ढिलत नइ, उंकर करत नइ अक्कल काट
ई·ार ला मनाय नौकर मन, बदना बदत हवंय प्रण ठान.
फूलबती हा कांप के कहिथय – “”हम जावत हन बारा बाट
हे प्रभु, हमला तिंही बचा अब, हमर कुजानिक ला कर माफ.”
हगरू कथय- “”कराहंव पूजा, भले खर्च लग जावय तान
एकर ले मन शांति पा जाहय, जमों कष्ट के बिन्द्राबिनास”
कातिक हा प्रण ठान के बोलिस- “”मंय कर लेंव भयंकर पाप
एकर प्रायश्चित ला करहूं, मंय खुद ला देहंव तकलीफ.
“सोला सम्मारी’ जे होथय, निश्चय रहिहंव उही उपास
एकर ले सब कष्ट नंदाहय, धनवा तक कर देही माफ.”
टहलू कथय- “”जंवारा बोहंव, भले खर्च मं घर बिक जाय
मोर खेत हा हाथ ले निकलय, पर संकल्प हा खत्तम पूर्ण.
तहां बाद मं देवता छाहित, घर खेती आ जाहय लौट
ई·ार पहिली लेत परीक्षा, तंहने देवत सुख आनंद.”
कथय बोधनी हा टहलु ला- “”मंय हा तोर छांय अस आंव
तंय हा धार्मिक काम उचाबे, मंय बनहूं सहभागी तोर.
तंय हा जभे “जंवारा’ बोबे, ठंडा करे के जभ्भे टेम
“जोत जंवारा’ ला मुड़ पर रख, हलू चलत मंय जाहंव ताल.”
पोखन घलो अपन ला फोरिस- “” मंहू दुहूं सब झन ला साथ
लोहा के जे होत खड़ौवा, ओकर पर चढ़ चलिहंव चाल.
लोहा के खीला मन चुभहीं, दर्द भयंकर-बहही खून
लेकिन मंय चिंता ले दुरिहा, आगू बर बढ़ जाहय पांव.
दैविक कारज मं ए होथय- पहिली तुमन परीक्षा देव
तंहने देव प्रसन्न हो जाथय-तब फिर मिलत सुखद परिणाम.”
डकहर पैस टेम सुघ्घर अक, नौकर मन ला करिस सचेत-
“”तुम्मन सरल ह्रदय के मनखे, अपन काम पर रखत इमान.
लेकिन अब का भूत पकड़ लिस-बन के उग्र करत हड़ताल
रेंगत राह गलत निर्णय कर, आखिर कते जीव उभरैस ?”
कातिक अपन पोल ला खोलिस- “”हम धनवा के नौकर आन
काम करत पीढ़ी दर पीढ़ी, मानत आत जमों आदेश.
क्रांति काय तेला नइ जानन, हम संघर्ष ले हन अनजान
खूब लड़ंका हगरू टहलू, उहिच दुनों हमला बहकैन.”
टहलू हा सब तर्क ला कोटिस- “”कातिक हा बोलत हे झूठ
खुद ला बिल्कुल साफ करे बर, दूसर पर डारत आरोप.
ओहर दीस उग्र भाषण अउ, धनवा के विरूद्ध भड़कैस
याने जमों दोष कातिक के, हम निर्मल जल अस निर्दाेष.”
नौकर मन मं फूट परे हे, एक दुसर पर डारत दोष
क्रांति करे बर राजू तिनकर, चुपेचाप भगगे सब रोष.
केजा हा अब थाह लगावत, नौकर मन ले मंगत जुवाप
“”खुद ला सब साऊ बतात हव, पर वास्तव मं सब पर दोष.
पर गल्ती ला माफ करत हन, अब बिल्कुल सच उत्तर देव-
तुम हड़ताल अभी टोरत हव, या फिर क्रांति बढ़ावत और ?”
मुंह रोनहू कर टहलू बोलिस- “”उभरउनी मं आयेन आज
हम पापी मन चलत कुरद्दा, हमर कुजानिक ला कर माफ.
धर्म अधर्म कुछुच नइ जानन, अकल पुरिस नइ तुम्हर अतेक
हम्मन आय तुम्हर कोरा मं, पत ला रख दो इहां जतेक.
धनवा के घर काम बजाबो, नइ लगान हड़ताल के आग
मन्दिर ला हम खुद सिरजाबो, अपन मांग पर मांगत रोक.”
सब नौकर मन शरण गिरिन-पर, धनसहाय टरका दिस कान
ऊपर ले सेखी मं अंइठत, मुंह ले छोड़त करू जबान-
“”नौकर मन ला मंय अपना के, कइसे करंव अधर्म के काम !
ई·ार साथ द्रोह यदि फांदत, मिल नइ पाय शांति आराम.”
ग्राम के वासी मन समझावत, धनवा नइ लेवत कल्दास
डायल बइला हा कर देथय, कृषक के मन ला खूब हताश.
आखिर मं छेरकू पुचकारिस- “”सुन धनवा तंय नेक सलाह
इंकर कुजानिक ला समोख अब, तभे ठीक होहय निर्वाह.
पाल श्रमिक ला बन के घुरूवा, यद्यपि चाबिन बन के नांग
पिला, ददा पर गंदला करथय, पर नइ कटय पुत्र के जांग.”
बड़ मुशकिल मं मुड़ी उठा के धनवा बोलिस ऐसे-
“”गंगा-बीच बइठ के एक झन करंव उदेली कैसे ?
नौकर के मानी तुम पीयत, मोर गोहार घलो सुन लेव-
जतका अभि मजदूरी नापत, ओकर ले ऊपर नइ देंव.”
छेरकू हांक बजा के बोलिस- “”सुनव गांव के श्रमिक किसान
धनवा ला मंय मना डरे हंव, एकर झन करिहव हिनमान.
टिंया ले सुंट बंेध आवत तइसे, जुरमिल रहव इहिच वि·ाास
आंटाटिर्रा छोड़ देव तुम, तंहने खतम फूट के बास.
चुगली भेद ला गोरसी भर दव, आपुस रखव मित्रता नेम
मोर कुजानिक क्षमा देव तुम, तुम्हर खाय मंय किमती टेम.”
सब ग्रामीण उसल के रेंगिन, नौकर मन अब काम बजात
धनवा – छेरकू मुड़ ला जुरिया, गुरतुर गुरतुर बात चलात.
धनवा कहिथय – “”कृपा करे हस, तेकर कर्ज होय नइ गोल
लेकिन छुपे रहस्य ला फुरिया, लुका राख झन हृदय के खोल.
नौकर मन के मांग ला ठुकरा, मंदिर ला बनाय कहि देस
दुनों बात मं तालमेल नइ, तब ले तंय हा एक करेस ?”
छेरकू अपन जहर ला बिखनिस – “”कूटनीति के तंय रख ज्ञान
अगर टिंया तक राज चहत हस, जनता संग कर छल बल तान.
मंदिर मठ ला बनवा के हम, लूट सकत हन धर्म के आड़
ई·ार – नाम मं डरा भुताबो, नवही लोहा लाट अछाड़.
नौकर मन अंटियात रिहिन अउ, करत रिहिन सुंट बंध हड़ताल
मगर धर्म के नाम मं चमकिन, अपन हाथ नीछिन खुद खाल.
काम बजाहंय रटाटोर अब, नइ बइठंय एको छन धीर
बइला ला जहं परत तुतारी, मेड़ फोर चलथय तरमीर.
अगर श्रमिक के मांग पुरोते, अउ खई मंगतिन मुंह ला फार
इसने उनकर मान करत मं, तोर जमों धन होतिस ख्वार.
इंकर भरोसा – मार परोसा, बस तंय फइलावत रह भ्रांति
श्रमिक ला जेवा कमती कमती, भोंक मं जाहय उनकर क्रांति.”
धनवा बोलिस – “”नीतिवान तुम, मोर पास हे बुद्धि – अभाव
ज्ञानिक संग फुल फुलवारी बद, आज लेंव मंय नीति रपोट.
यदि मंय तोर मदद ले वंचित, मंय रहि जातेंव दांत निपोर
नंगरा तक बुढ़ना झर्रातिस, गांव के दुश्मन हंसतिस खोर.”
मंत्री पास काम कतको ठक-तुरते रेंगिस छेरकू ।
कोदई ला निकियाथय ते बेरा – छंटिया जाथय मेरखू ।।
भुखू सुखी मन करिन दलाली, तब धनवा हा बांटिस नोट
डकहर सुखी भुखू तीनों मिल, अभिन जमात कार्यक्रम मोठ.
बोलिस सुखी – “”लोग मन कहिथंय – होत मंद हा बहुत खराब
ओकर पिये मं बहुत बुराई, मनखे के जीवन बर्बाद.
तब वास्तव मं काय बुराई, लेन परीक्षा ढोंक शराब
फेर मंद मं जेन बुराई, मनखे मन ला करन सचेत.”
तीनों झन खलखला के हांसिन, भिड़ के पीयत खूब शराब
नशा बढ़त गनगना के तंहने, उंकर चेत हा होत बिचेत.
आंख के पुतरी ऊपर जावत, लड़भड़ लटकत उंकर जबान
काय बकत तेकर सुरता नइ, भुला गीन इज्जत अपमान.
भुखू लड़भड़ा उठ जाथय अउ, छुअत हवय डकहर के गोड़
डकहर कथय -“”कलंक लगा झन, गोड़ छोड़ भइ-छोड़ तंय गोड़.”
काबर सुनय भुखू मंदी हा, कोन जनी का का तोतरात
आखिर ओ – ओ उल्टी कर दिस, मन्दी के गुन ला ओरियात.
भुखू खूब चलना चाहत – पर, भुंइया मं भर्रस गिर गीस
जेन जगह उछरे हे छर छर, ओकरे ऊपर पटिया गीस.
डकहर ला अब सुखी हा बोलिस – “”अब तो भुखू के उड़गे चेत
मंद ढोकम के पशु अस सोवत, धर चेचकार – खार मं फेंक.”
डकहर हा छिनमिना के कहिथय – “”बहुत हुलास देत हे यार
हमर नाक हा सूंघ पात नइ, नर्क कुण्ड ले तिंहिच उबार.
जमों मंद ला भुखू ढोंक दिस, सुध बुध खो के शव अस सोय
हम तंय पाय मंद एक एक कन, तब तो नशा कुछुच नइ होय.”
सुखी किहिस – “”तंय चिंता झन कर, बचे मंद अउ बोतल एक
ओहर नंगत नशा बताहय, ओला थोरिक पी के देख.”
कभू पिये नइ तइसे ढक ढक, दारुढारिन रख के ग्लास
पिये – बाद मं नशा जनावत, काय करत तेकर नइ भास.
मंदबसी मं कहिथय डकहर – “”मोला तंय दुर्बल झन जान
अगर शक्ति ला अजमे चाहत, बला लान एक अड़िल जवान.
कतको अखरा जानत होहय, तब ले मंय करिहंव मलयुद्ध
टंगड़ी मार – गिरा धरती पर, ओकर वक्ष मं चढ़हूँ कूद.”
सुखी हा काबर पिछू रहय अब, बात मं बढ़ गिस बार हाथ –
“”असली रूप मोर नइ जानस, चल तंय अभिच सुखी के साथ.
मोर शक्ति जाँचे चाहत तब, पंड़वा एक खोज के लान
रद्दा मार के केंघरा ओला, नाथ दुहूं मंय धर के कान.”
अतका बोल सुखी हा खींचिस, डकहर के दू कान ला जोर
तंहने डकहर हा खखुवा के, सुखी ला रचका दिस पंचलोर.
भड़किस – “”मोला तंय का समझत, तोर ले मंय हा धनी सजोर
तोर असन ला बिसा सकत हंव, जेमां करत हवस सिरजोर.
मुंह करिया कर रेंग इहां ले, वरना बिगड़ जहय संबंध
कर हुरमुठी कुकुर अस रूकबे, झड़का दुहूं गिन के दस लात.”
सुखी अकबका फुसफुस रोवत, ढलंग गे भुंइया पटकत गोड़
आंसू ढार कल्हर मिमियावत – “”तोला छोड़ कहां मंय जांव !
भले पेट मं छुरी भोंक दस, चिल कौंवा के जे बर छोड़
पर तन रहत मुहूँ नइ टारों, तोर मित्र के बस ए टेक.”
डकहर ला आ गीस दया अब, कलप के ढारत आंसू धार-
“”गल्ती ला तंय क्षमा दान कर, बल्दा मं फटकार ले लात.
मंय हा रखत शत्रुता पर तंय मित्र मानथस मोला ।
लेकिन आज तोर संग झगरत – कइसे होगे मोला ।।
डकहर सुखी के नश््शा भड़कत, का डम्फाएन के नइ चेत
दूनों एक दूसर ला कबिया, करत हवंय समधी अस भेंट.
उनकर आंसू गिरत टपाटप, कलपत खूब गला ला फाड़
दृष्य उहां के अइसन दिखथय – करूण हास्य रस सौंहत ठाड़.
बहुत समय इसने बीतिस तंह, भुखू जाग के जांचत हाल
दूनों ला हांसत हे मानो – खरी खाय नइ एकर चाल.
जहां कुकर्मी फरी हो जाथय, पर ला देत ज्ञान उपदेश
भुखू दुनों ला पहिली डांटिस, करत हे अब शिक्षा के दान –
“”तुम ए गांव के मुखिया मनखे, जग हंसाय बर जोंगत काम
जब तुम गलत राह पर रेंगत, थू थू कर होहव बदनाम.
तुम्मन करव सही अस करनी, दूसर संहरा के जस गांय
तुम मर के परलोक जाव तब, मनसे मन मुड़ धुन पछतांय.”
देखिस भुखू अपन कपड़ा ला, चप चप होत – देत दुर्गंध
कहिथय – “”मोर देह बस्सावत, घृणा जनावत अंधनिरंध.
कोन मोर पर गंदलो फेंकिस, काकर अनसम्हार अपराध !
एकर भेद अगर नइ खुलिहय, खूब झोरिहंव खुंटा मं बांध.”
डकहर बोलिस – “”हमर दोष नइ, नशा मं तंय खुद करे उछार
हम गवाह के बात मान तंय, करव खलिन्द्री झन सरकार.”
यदपि भुखू ला लाज लगिस – पर ओहर हांसत अइसे ।
हार चुनाव ला नेता पहिरत – फूल हार ला जइसे ।।
भुखू उहां अब काबर बिलमय, लिड़िंग लड़ंग कर चलिस सरेर
जुआ ला हार जुआड़ी भगथय, देख पाय नइ पलट के फेर.
जेन आदमी मिलत तिंकर तिर, भुखू हा मारत अड़बड़ टेस
अपन करे हे निंदित बूता, पर – पर ला देवत उपदेश.
मुंह मं जउन आत फरकावत, समझत स्वयं ला बड़ विद्वान
यदि कोई मनसे हा रोकत, तब ओकर होवत हिनमान.
भुखू ला जाना कहां – कहां गम, बयचकहा अस पांव बढ़ात
हुंकी देवइया एको झन नइ, हरबोलवा अस झुल गोठियात.
भुखू के तिर लइका मन पहुंचिन, रंगी जंगी पुनऊ थुकेल
गज्जू गुन्जा मोंगा तक हें, भुखू ला चिड़हावत हें एल.
गुन्जा कथय – “”सयाना हस तंय, तोर चाल हे अनुकरणीय
तब हम तोर राह पर चलबो, तंहने हम कहवाबो नीक.
तंय हा अभी शराब पिये हस, तब हम्मन तक पिये शराब
तोर पांव हा डगमग होवत, लड़खड़ात हे हमरो पांव.”
रंगी किहिस – “”मंद पीबो हम, मनसे करंय भले बदनाम
घृणा से देखंय – थू थू बोलंय, करबो इही काम हम नेक.
मंद पिये बर हम नइ छोड़न, भले बिकय घर खेत कोठार
उहू ला पिया देबो दारू, हमर शौक ला झिंकिहय जेन.”
मोंगा किहिस – “”पिये हन अमृत, एकर ले बढ़ जथय दिमाग
काम करे के शक्ति बढ़ाथय, मानव के डर – भय हा नाश.
मंय हा आज सत्य बोलत हंव – हे शराब हा गुण के खान
हम हा अभी शराब पिये हन, अउ हम पीयत रबो सदैव.”
सुन्तापुर के लइका मन हा, झुमरत हें लड़भड़ कर गोड़
मंदी मन के नकल उतारत, मुंह तोतरात – किंजारत आंख.
भुखू के बाढ़िस नशा गनागन, क्रोध ला भभका भड़किस जोर-
“”तुम्मन काकर टूरा अव रे, काबर इनसठ करथव मोर !
गुरुपढ़ात हवय का अइसन – मुंह मारव बुजरूक के साथ
यदि शिक्षक तुमला भड़काहय, देख सकत मंय ओकरो टेस.”
भुखू अपन नक्सा बचाय बर, लइका मन तन दौड़ लगैस
पर खुद किंजर गिरिस भूमी पर, एकोकन सम्हलन नइ पैस.
जकर बकर देखत अउ सोचत – मनखे झन पहुंचय नजदीक
वरना नंगत फदिहत होहय, फुर्र थूंकिहय मुंह के पीक.
तभे कोन जन एक कुजानिक, मारिस छींक के ऊपर छींक
भुखू के मुड़ पर गाज हा गिरगिस, चंवतरफा टंहकत चकमीक.
भुखू उठिस हड़बड़ कर हुरहा, जकर बकर देखत जस काग
आगू डहर हबाहब रेंगत, शायद पाय ओलहा के पाग !
मुचमुच हंसत गरीबा पूछिस -“”तंय कइसे गिर गेस दनाक
भूत उठा के पटक दीस या, ऊंचा कूद लगात भड़ाक ?”
बचे नशा हा उड़े चहत अब, सुनिस गरीबा के जब बोल
जइसे ठीक राह पर आथय, मार ला खा के मूरख ढोल.
फट ले भुखू हा ढचरा मारत – “”तोर पास आवत धर – काम
तड़ तड़ चलई मं गोड़ छंदा गिस, तंहने मंय गिर गेंव धड़ाम.
धनवा खभर पठोय तोर तिर – मोर साथ कर ले मिल भेंट
ओकर साथ मित्रता बदिहंव, अपन साथ मंय लुहूं समेट.
मंदिर जउन बनावत तेकर, ओकर हाथ होय बस जांच
लगे हाथ मं धर्म कमाहय, लग नइ पाय पाप के आंच.
करय गरीबा हा झन फिक्कर – के आ जाहय खर्च के भार
सब लागत मंय पूरा करिहंव, कतको रूपिया सकत ओनार.”
किहिस गरीबा -“”हवय खबर शुभ, पर काबर धनवा नइ अ‍ैस
ओकर ले मंय कहना चाहत – वाकई सुघ्घर उदिम उचैस.
लेकिन जेकर तिर मं घर नइ, ओकर बर मकान बन जाय
जेन पोटपोट भूख मरत हे, बिगर फिक्र जेवन मिल जाय.
जीवन ला आवश्यक होथय, तेन जिनिस के होवय पूर्ति
तब धनवा मंदिर सिरजावय, अउ पधराय सोन के मूर्ति.
मोर बात ला धनवा सुनिहय, ओकर बात लुहूं मंय मान
मेहरुकवि तिर लिखवा देहंव, धनवा के नंगत यशगान.”
एकदम भड़कत भुखू हा बोलिस – “”वाकई तंय राक्षस – अवतार
तोर असन के मरना उत्तम, काबर के धरती बर भार.
तब तो तंय हा जन्म लेस तंह उठा के फेंकिन तोला ।
दाई के तंय दूध के वंचित – तंय हस पापी चोला ।।
धर्म विरुद्ध बात हेरत हस, खूब जलत पर के धन देख
तभे तोर तिर मं पूंजी नइ, धनसहाय तिर हवय जतेक.”
कथय गरीबा – “”तंय पुण्यात्मा, खुले हृदय ले मानत धर्म
काबर तरहा तरहा के हस, बता भला तंय एकर मर्म ?
धरती के सेवा ला करथंय, लहू सुखा हंसिया बनिहार
ओमन काय कुकर्म ला करथंय, जेमां पेट सकंय नइ तार ?
असल रहस्य मोर ले सुन तंय – सक्षम धनी करत गुमराह
अपन स्वार्थ ला पूर्ण करे बर, पर ला देथंय गलत सलाह.
जे दिन भेद के खाई पटिहय, तब सदधर्म के वास्तव राज
ई·ार घलो प्रसन्न हृदय तक, जब सब खाहंय बांट बिराज.”
“महिला पुरूष रात दिन सुख दुख, प्रकृति हा बनाय खुद भेद
तब फिर कहां ले मूंदन सकिहय – कंगला पूंजीपति के छेद ?”
“”प्रकृति के तंय गोठ करत हस, प्रकृति कहां करत हे भेद !
हवा प्रकाश अनाज खनिज ला, सब के हित बर रखे सहेज.
पर कुछ बुद्धिमान स्वार्थी मन, पर के जिनिस ला करत लूट
अपन बनत पूंजीपति सक्षम, याने समाज के सिरमौर.
वाद विचार कला अन जन धन, राजनीति साहित्य विज्ञान
जतिक प्रचार तंत्र सब ताकत, मानत सक्षम के आदेश.
तब सक्षम हा स्वार्थ पूर्ति बर, अउ वर्चस्व सुरक्षित होय
ऊंच नीच पूंजीपति कंगला, भेद के तर्क ला फइला देत.
तब हम ओकर पाछू दउड़त, अपन बुद्धि ला निष्क्रिय राख
अपन जिन्दगी गर्त मं डारत, भावी बर भविष्य अंधियार.
यदि हम सबो यत्न करबो तब, “”सुम्मत राज” ला सकथन लान
वर्ग समाज मं होवय हाजिर, तभो ले सम्भव वर्ग विहीन.
हवा – प्राण नइ दिखय आंख मं, मगर उंकर निश्चय अस्तित्व
ऊपर दिखिहय वर्ग बद्धता, राज ला करिहय वर्ग विहीन.
एक राष्ट्र मं देख सकत तंय, उहां समानता के साम्राज्य
उच्च – निम्न श्रेणी के खाई, मगर भेद मिटिहय कल ज्वार.”
रखिस गरीबा तर्क बहुत ठक, मगर भुखू हा दीस उखेल
परय तुतारी डायल धन ला, पर ओकर पर कहां प्रभाव ?
इही बीच चिंता हा पहुंचिस, जेहर बसत करेला गांव
हाथ मिलैस गरीबा के संग, आगू डहर बढ़ावत गोठ –
“”पथरा पर जल – खातू छिचबे, पर उबजन नइ पाय अनाज
तइसे भुखू ला तंय समझाबे, पर ओकर बर हे बेकार.
अपन बुद्धि ला खर्चा झन कर, मोर बात ला पहिली मान
तोर शब्द के इज्जत होवय, अपन तर्क ला उंहचे राख.”
कथय गरीबा हा मुसकावत – “”एकर अर्थ जान मंय लेंव
मोर पास हे तोर काम कुछ, हां, अब बता – काय हे काम ?
चिंता बोलिस – “”झन टकराबे, तंय चल हमर करेला गांव
सांवत – भांवत दुनों लड़त हें, एक दुसर के देखत दांव.
यथा महाभारत झगरा हा, वास्तव मं पारिवारिक युद्ध
मगर राष्ट्र हा चरपट होगिस, उन्नति मार्ग तुरूत अवरूद्ध.
तइसे दूनों भाई झगरत, झंझट उंकर गांव पर गीस
ग्रामीण मन मं फूट परे अउ, क्रोध देखात दांत ला पीस.
बीच बचाव अगर नइ होहय, गांव हा बनही मरघट घाट
मोर साथ तंय हा चल झपकुन, बचा गांव ला कर के न्याय.”
चलिस गरीबा हा चिंता संग, गांव के बाहर दिखिस तलाब
चिंता कथय -“”पार कर एकर, मंय हा दुहूं इनाम निकाल.”
कथय गरीबा – “”डुबक लेत हंव, पर धनवा के बात कुछ और
मेहरु- सनम घलो तउरत पर, धनवा हा उंकरो सिरमौर.
एक बार हम सब हुम्मसिहा, आएन इहां करे इसनान
एक दुसर ला एल्हत हांसत, डुबक डुबक लग गेन नहान.
तब मेहरुहा चंग चढ़ा दिस – “”तुम्मन सुन लव लटका मोर-
जे तरिया ला प्रथम नहकिहय, पाहय उहिच इनाम सजोर.”
सब जवान तउरत ताकत कर, धनवा तरकत सांस ला खींच
सक ले अधिक जोर मारिस तंह, पहुंच गीस तरिया के बीच.
धनवा के पाछू मंय तउरत, पर नइ पावत ओकर पार
मंय बोलेंव – “”अगोर ले थोरिक, मोला करन दे पहिली पार.
यदि मंय बाजी हार जात हंव, मोला हंसिहंय जमों मितान
जिते इनाम तोर मन होवत, ओकर पूर्ति ला करहूँ लान.”
लेकिन धनवा काबर मानय, बढ़ सर्राटा कर लिस पार
ओहर स्पर्धा जीतिस अउ, हमर गला मं हार के हार.”
चिंता कथय -“”समझ नइ आवत, धनवा – तोर चलत हे द्वन्द
ओकर करतेस मरत खलिन्द्री, लेकिन लिखत प्रशंसा छंद.”
किहिस गरीबा – “”हे धनवा हा, ठंउका मं तारीफ के लैक
ओहर रथय नशा ले दुरिहा, अउ चरित्र हा दगदग साफ.
ओकर – मोर शत्रुता कुछ नइ, ओकर बर मन फरिहर – शुद्ध
पर धनवा हा शोषण करथय, तब होथय सैद्धान्तिक युद्ध.”
बोल गरीबा हा चुप हो गिस, पहुंचिस जहां करेला गांव
यद्यपि सांवत घर जाना हे, पर चल दिस दसरुके छांव.
होत गरीबा के विचार हा दसरुला झुझकाना ।
बसदेवा मन गाथंय तिसने गात गरीबा गाना ।।
“”छेरी के पुछी भठेलिया के कान
बुढ़ुवा बैला ला दे – दे दान.
जय गंगा . . . ।
तंय दसरू के बेटा आस
मंय सुद्धू के बेटा आंव .
जय गंगा . . . ।
निश्छल हिरदे दुनों मितान
तइसे हम तुम एक परान .
जय गंगा . . . ।
तंय हा बसत करेला गाँव
नाम करू पर मीठ सुवाद.
जय गंगा . . . ।
तोर पास मंय आय मितान
मोर खाय बर बासी लान
जय गंगा . . . ।
ओमां अमसुर मही ला डार
चिखना बर चटनी ला लान .
जय गंगा . . . ।
भरे पुरे हे घर हा तोर
झन मर एको कनिक कनौर.
जय गंगा . . . ।
कोठी भर भराय हे धान
Ïक्वटल एक हेर के लान.
जय गंगा . . . ।
पर मंय जानत तंय कंजूस
अगर गलत सब झन ला पूछ.
जय गंगा . . . ।
यदि तंय हा नइ करबे दान
छिन के लेग जबो सब धान.
जय गंगा . . . ।
गावत हवे गरीबा हंस हंस, मारत हवय व्यंग्य के फूल
दसरुहा भाखा ला ओरखिस, जानिस तंह मुसकत दिल खोल.
एल्हत हवय गरीबा ला अब – “”तोला कुछुच सरम नइ आय
सांगर मोंगर अस जवान हस, तब ले घर घर मांगत भीख !
मोर सलाह मान ले तंय हा – “”गिरा पसीना महिनत जोंग
तेकर बाद पेट भर जे तंय, इज्जत साथ जिन्दगी पाल.
मोर मकान मं झन घुस तंय हा, जाव मंगे बर पर के द्वार
तुमला मंय हा नइ पहिचानंव, बइठे रहव झनिच मुंह फार.
तुमला कार बलांव मंय अंदर, तुम्मन हा अव चोर – चिहाट
यदि सांई पूंजी धर भगिहव, चले जहंव मंय बाराबाट.”
किहिस गरीबा – “”ए घरखुसरा, परघउनी बर बाजा लान
बहुत दूर के सगा आंव मंय, तंय कर मोर बहुत सम्मान.
सोचत हस के घर झन आवय, पर मंय आवत टोर के बेंस
यदि तंय हा नुकसान चहत नइ, मान तुरूत तंय आज्ञा मोर.”
काबर रूकय गरीबा बाहिर, भितरा गिस दसरुके पास
दसरुओकर स्वागत करथय, खुल खुल हंसत – मनावत हर्ष.
बोलिस – “”मंय मुसुवा ला कहिथंव – बासा अपन रखव घर मोर
लेकिन ओमन झूठ मानथंय, पलट घलो नइ झांकय थोर.
लेकिन आज कमाय खूब अक, सगा खवाय रखाय अनाज
चल तंय पहिली जेवन ला कर, तोला देखत अन महराज.”
तब आइस सांवत हा रोवत – “”भइया, काय कहंव निज हाल
मोर बात भांवत नइ मानय, अलग होय बर ठोंकत ताल.
ओकर खटला रजवन आइस, तब ले लगे फूट के आग
सुम्मत हमर रटारट दरकिस, पोल बताय मं आवत लाज.
भांवत के सब भार सहत हंव, पर अब काबर सहंव प्रपंच !
तंय हा बांटा हमर करा दे, बने आय हस बन के पंच.”
एकर बाद हेर के रूपिया, दीस गरीबा ला तत्काल
कहिथय -“”मंय रि·ात नइ देवत, देत खाय बर मीठ पदार्थ.
पुत्र तखत फुरनाय पाय नइ, ओकर पर देखाव तुम प्यार
नाट – छांट के तंय हा कर दे, मोर नाम मं खेत कोठार.”
सांवत करत विचार अपन मन-देकर घूंस करे हंव नेक
मोर पक्ष ला लिही गरीबा, करिहय पूर्ण मोर जे टेक.
सांवत गीस प्रसन्न ओंठ धर, पाछू चल भांवत हा अ‍ैस
ओहर पंच के तिर मं कलपत – “”सांवत हवय निसाखिल क्रूर.
मंय हा ओला देव मानथंव, लछमन अस मानत आदेश
तब ले गरुगाय अस पिटथय, ऊपर ले करथय धन नाश.
ओकर खटला बेलगहिन हा, मोला लड़थय शत्रु समान
चना गहूं ला चोरा बेंचथय, हमला थोरको नइ डर्राय.
खटिया सेवत रहिथय हर छिन, चांय चांय कर लूथय बात
सूनंव नइ बारागण्डाएन, सांवत के संग रहि नइ पांव.”
दीस गरीबा ला भांवत हा, कड़कड़ रूपिया झपकुन हेर
सोचत – एला पटा डरे हंव, अब नइ होय मोर नुकसान.
कहिथय -“”घर धरती ला करबे, बने छांट लाखा मं मोर
टुरी चुटुम हा फुदरत खाहय, हो कृतज्ञ जस गाहय तोर.”
दीस गरीबा हा आ·ाासन – “”तंय हा अपन फिकर ला टार
तोर टुरी के जीवन बनिहय, ओहर खाहय सुख के आम.
जउन सनातन मं नइ होइस, तइसन बूता करिहंव आज
तोर भविष्य बना के रहिहंव, कभू परय नइ दुख के घाम.”
मीठ बात ला करिस गरीबा, तंह भांवत के मन दलगीर
मुड़ ला उठा के लहुटत जइसे – युद्ध जीत लहुटत रणवीर.
किहिस गरीबा हा दसरुला – “”तंय हा बता – करंव का काम
यदि दूनों रूपिया खावत, बट्टा लग जाहय तन मोर.
जब एमन हा धन ला छींचत, लगथय के हें पुंजलग ठोस
पुरखा जोर के धन ला छोड़िन, तभे करत नइ एमन मान ?”
दसरू किहिस “” गलत सोचत हस, इंकर पास गिनती के खार
फसल अभी हे खेतखार मं, ओकर ऊपर लेत उधार.
जब कोठार मं अन्न पहुंचिहय, दन्न ले आहय साहूकार
जमों अनाज रपोट के लेगिहय, सांवत मन हो जहंय खुवार.
परउभरवनी मान के बाजत बजनी भाई भाई ।
इंकर लड़ई हा गांव बगर गिस, जस खजरी अउ लाई ।।
कथय गरीबा -“”दुनों मुरूख मन, जानत नइ जीवन के नेत
एमन ला मंय पाठ पढ़ाहंव, ताकि रहंय झन कभू बिचेत.”
दसरुकथय -“”वसूलत हस तंय, दूनों पक्ष ले कड़कड़ नोट
परिहय चोट न्याय ऊपर अउ, होबे परलोखिया बइमान.
तंय हा अपन इमान खोय हस, कइसे करबे सुघर नियाव
तोर चाल हा समझ ले बाहिर, मोला बता खोल के साफ ?”
सिर्फ हंसत रहि गीस गरीबा, ओहर सांवत के घर गीस
सांवत – भांवत स्वागत करथंय, राखिन खाय मिठई नमकीन.
कथय गरीबा – “”इहां आय हन, जउन काम ला धर के आज
ओहर पहिली सफल होय तंह, खानच हे फिर बांटबिराज.
अपन खेत ला चलो देखावव, उंकर करन हम पहिली जांच
तब निष्पक्ष हो सकथय बांटा, काबर निकलय ककरो कांच.”
ओतिर मनखे मन सकला गिन, जेमन सांवत भांवत आंय
चिंता – मानकुंवर अउ बांके, हवय गरीबा तक हा साथ.
जमों धान के खेत पहुंच गिन, हवय टंगरहा उनकर खेत
खोधरा डिपरा – समतल तक नइ, उहू मं बन मन लाहो लेत.
ओमन “परसा खेत’ ला देखिन, अरझे रिहिस अधिक अस धान
ओला निज हक मं लाने बर, सांवत भांवत देवत जान.
देत गरीबा डहर इशारा, अलग अलग आंखी चमकात –
“”तोर खिसा ला भरे हवन हम, इहिच खेत झन होय बेहाथ”.
काबर पाछू रहय गरीबा, मुड़ ला हला के उत्तर देत
मुंह ले कुछ नइ बोलत लेकिन, हाव भाव ले समझा देत.
भर्री देख दंग रहि गिन सब, उहां गड़े नइ हल के नास
जबकि पास के दुसर कृषक मन, जोंतई काम ला करिन खलास.
सोयाबीन बोहावत आंसू, बन बंखर जमाय अधिकार
जमों पंच मन भाई मन ला, सुंट बंध के देवत दुत्कार.
मानकुंवर हा दीस ताड़ना -“”कोन कथय – तुम आव किसान !
सच मं कोन किसान कहाथय, ओकर परिभाषा ला जान-
अपन देह के सुध बुध खोथय, करथय मात्र खेत के फिक्र
ओकर देखभाल करथय अउ, रखथय ध्यान सदा दिन रात.
लेकिन तोर खेत मन बेबस, बिन मालिक के जस असहाय
अइसन मं कभु अन्न होय नइ, तुम पाहव हर समय अभाव.”
गारी देत पंच मन पहुंचिन, सांवत अउ भांवत के द्वार
घर के हालत ला देखत हें, सबो पंच मन आंखी खोल.
भिड़िंग भड़ंग घर होत खंडहर, मुंह उलिया भसकत दीवार
कांड़ – कोरई मन हा गतमरहा, सहत कहां खपरा के भार !
अब का करंय पंच मन ओतिर, लहुट गीन फट अपन मकान
जेन कर्म ले हीन हो जाथय, ओहर घृणा पात हर ओर.
हेरत हवय उपाय गरीबा – इंकर साथ छूटन झन पाय
गिरत गृहस्थी सम्हल जाय अउ, जेवन बर झन मिलय अभाव.
मन मं अरथ भंजात गरीबा, पर नइ निकलत सुघ्घर राह
एक तरीका ला सोचिस पर – ओमां खतम होत उत्साह.
“जब मंय बने चेतलग रहिहंव, रहि हुसियार बढ़ाहंव गोड़
तब काबर होहय दुर्घटना, बुड़ नइ पाय जसी के नाव’
सांवत – भांवत ला फट बोलिस -“”स्वादिल जिनिस खाय रंधवाव
मंय हा बइठ तुम्हर संग खाहंव, तुम्मन घलो प्रेम रख खाव.
एकर बाद मं अलग हो जाही – घर धरती गरुगाय मकान
एक दुसर ला देख थूंकिहव, पर अभि खावव बांट बिराज.
मंय दसरुके घर जावत हंव, ओकर पास करत गप – गोठ
जेवन हा चुर जाहय तंहने, सब झन खाबो बइठ अराम.”
भांवत ला चुप दीस इशारा – ताकि करय अलगेच मं भेंट
समझ के भांवत मुड़ी हलावत, सोचिस – आय लाभ के नेत.
कुछ दुरिहा मं बिलम गरीबा, देखत के भांवत कब आय ?
कुछ बेरा चल पहुंचिस भांवत, अपन साथ दूसर नइ लाय.
चुप चुप का गोठियात गरीबा, भांवत ओरखत कान टंड़ेर
आखिर जब मुरथम ला जानिस, आंख खोल के दीस पंड़ेर.
कहिथय – “”मोर लइक तंय बोलत, एमां कहां मोर नुकसान !
पर तंय जेन राह फुरियावत, चले जहय सांवत के जीव.”
कथय गरीबा – “”संसो झन पर आन देंव नइ बद्दी ।
हम तोला उबार के रहिबो, पाबे सुख के गद्दी ।।
हर्ष मनात रेंग दिस भांवत, तब सांवत आइस चुपचाप
इनकर बात चिरई नइ जानिस, तइसे रचिन दुनों झन पाप.
फुरसुद बाद गरीबा पहुँचिस, दसरुला सब कथा बताय
दसरुसुनिस तंहा घबरागे – मुड़ पर आवत आफत धांय.
कहिथय – “”तंय उपाय सोचे हस, ओहर खतरनाक भरपूर
एमां मंय सामिल नइ होवंव, मोला आफत ले रख दूर.”
कथय गरीबा -“”तंय झन घबरा, मंय हा घोख लेंव हर ओर
काम के सफ्फलता होवत तक, रहिहंव बहुत टंच हुसियार.
मोर बात पर कर यकीन तंय, ककरो पर आफत नइ आय
हमर नियाव सफलता पाहय, भाई मन हा खुशी अराम.”
दीस गरीबा नेक भरोसिल, तंह दसरुहो गिस तैयार
जहां खाय बर अ‍ैस बलौवा, एमन हा नइ बाधिन बार.
भोजन बर जब एमन बइठिन, सांवत मिठई लान लिस हेर
ओला भांवत के तिर रख दिस, ताकि उड़ाय टपाटप हेर.
भांवत घलो अपन कुरिया गिस, उंहचे ले लानिस नमकीन
ओला सांवत के तिर परसिस, ताकि गफेलय झप झप बीन.
सांवत – भांवत मन सग भाई, देखव कतका मया देखात-
लेकिन एमां भेद छुपे हे, धैर्य रखव तंहने खुल जात.
अब तब खाय शुरुकर देतिन, तभे गरीबा हेरिस बोल –
“”काबर लकर लकर लेवत हव, भागत हे का तुम्हर ओल ?
हम्मन जेवन खत्तम लेबो, लेकिन रखव भला कुछ धैर्य
अन्य जीव हा पहिली खाहय, तब मिल जथय पुण्य के लाभ.
अगर इहां हे कुकुर बिलाई, लान बलाके मार अवाज
ओमन ला खावन दव पहिली, तब फिर खाव मनुष्य समाज.
अगर मूक प्राणी ला देहव, भोजन खाय मनुज के पूर्व
तुमला पुण्य लाभ मिल जाहय, भूल के झन छोड़व शुभ नेग.”
भांवत बिलई के आगू रख दिस, मीठ मिठई ला ओकर खाय
सांवत हा नमकीन राख दिस, एक कुकुर के सक भर खाय.
बिलई खैस तंह कहां सुरक्षित, ओकर छुटगे हांसत प्राण
उसने कुकुर घलो टप खाइस, तब चूरी अस तज दिस जान.
एकदम चिल्ला डरिस गरीबा -“”एको झन झन छुवव अनाज
सांवत अउ भांवत दूनों मन, जेवन मं विष डारिन आज.
लाय हवंय नमकीन मिठाई, तेमां जहर हवय सच बात
दुनों बन्धु मन पाप रचिन हे जब प्रत्यक्ष त व्यर्थ प्रमाण.
एमन एक लहू सग आवंय, मगर मुरूख मन चलत कुचाल
एक दुसर के प्राण हरे बर, काल बलावत करके मान.”
सुनिन गरीबा के अवाज तंह, वासी मन भर भर ले अ‍ैन
बांके मानकुंवर अउ चिंता, एमन घलो रूकन नइ पैन.
ओमन जब नाटक ला जानिन, थुवा थुवा कर हंसी उड़ैन
पापी मन के करत खलिन्द्री, ताकि कटाय दुनों के नाक.
कथय गरीबा – “”आज करे हंव, पाठ पढ़ाय बर नाटक एक
नाटक मं कुछ दम नइ लेकिन – मूरख फंस गिन बिगर विवेक.”
किहिस गरीबा ग्रामीण मन ला – “”जानत महाभारत के बात
कौरव – पाण्डव पासा खेलिन, उही खेल हा कर दिस घात.
पासा के घटना ला यदि सब, हंसी उड़ा के देतिन पेल
युद्ध भयंकर तेहर रूक तिस, द्धेष के बदला होतिस मेल.
तइसे इंकर बात झन मानो, वरना मिलिहय दुष्परिणाम
तुम सब मन मं फूट हो जहय, प्रेम बीच लग जहय विराम.”
मानकुंवर खखुवा के बोलिस – “”सच मं इनकर नीति खराब
इंकर चाल हा घृणा के लाइक, एमन फूट करा दिन गांव.
अ‍ैस गरीबा ठीक समय पर, हमला कर दिस तुरूत सचेत
अब ले इंकर बात नइ मानन, दूर ले देख के परबो पांव.”
किहिस गरीबा दुनों बन्धु ला – “”वास्तव मं तुम बहुत अलाल
तभे खेत मन परिया पलटत, घर के हालत हा दयनीय.
एमां पर के कुछुच दोष नइ, तुम कमचोर के आव प्रमाण
स्वयं गरीबी ला बलात हव, अपन हाथ मं मंगत अभाव.
बली हवव पर श्रम ले भगथव, पर के ऊपर मढ़थव दोष
अब ले अपन काम ला देखव, तुम्हर लहू ले उझलत जोश.
जब तुम भिड़ के महिनत करिहव, खेत उबजहिय बहुत अनाज
तुम सम्पन्न सुखी हो जाहव, दूसर तक करिहंय तारीफ.”
मुंआ धरे सांवत भांवत ला, ओमन करे हवंय अपराध
उनकर नसना टूट गिस रट, मुंह हा लटकिस खाल्हे कोत.
मगर गरीबा प्राण बचा दिस, ऊपर ले समझउती दीस
उंकर कपट हा छरिया गिस खब, बैर भाव तक छिन के छान.
एक – दुसर ला बंहा पोटारिन, सांवत किहिस बढ़ा के प्रेम –
“”हम हा हवन बिरिजबंधन मं, कहत पेट के कपट निकाल.
अपन बीच हम द्धेष रखन नइ, अब सुधारबो खेत के हाल
गांव मं रहिबो सग भाई अस, उन्नति बर देबो सहयोग.”
भांवत कथय – “”क्षमा मांगत हंव, हम रखबो एका सदभाव
मिहनत करके बासी खाबो, आलस ला देवत हन त्याग.”
कथय गरीबा – “”हम नइ मानन, आत्मग्लानि अउ पश्चाताप
तुमला अवसर एक देत हन, जेमां चलव एक अस राह.”
चिंता बोलिस – “”पहुंच गरीबा कर दिस आज भलाई ।
भाई मन ला एक बना दिस हम ओकर आभारी ।।
मानकुंवर हा दीस हुंकारु- “”अगर इहां आतिस धनसाय
ओहर न्याय ला घुमवा देतिस, तंह शत्रुता हा बढ़तिस जोर.
बेंदरा अस बांटा ला बांटतिस, माल उड़ाय के धरतिस पांत
दुनों कोत ले मुंहचलका धर, सुन्तापुर चलतिस मुसकात.”
धरे गरीबा नोट तउन ला, दुनों बन्धु ला लहुटा दीस
बोलिस -“”गलत सलाह सुनव झन, अपन हाथ टोरव झन फांस.
कहना मोर अगर जम जाए, करव आज ले अइसन काम-
ओ मनखे ले दूर रहव तुम, जे उभरावय बन के राम.”
उहां हवंय जतका झन मनसे, करत गरीबा के तारीफ
पर दसरुगंभीर अभी तक, रखे बुद्धि ला स्थिर भाव.
दसरुकिहिस -“”न्याय अभि होइस, तेकर फल भविष्य मं मीठ
पर अपराध होय तेकर तन, एको व्यक्ति देव तो ध्यान !
जे नियैक हा नेक न्याय दिस, ओहर पात प्रशंसा – सोर
पर ओहर अपराध करिस हे, तेकर बर का देवत दण्ड ?”
उहां के भीड़ परिस अचरज मं, समझत नइ दसरुके अर्थ
बांके हा नोखिया के पूछिस -“”तोर बात हा समझ ले दूर.
अ‍ैस गरीबा सुन्तापुर ले, ठोस न्याय कर कर दिस एक
पर ओहर अपराध का कर दिस, तिंही बता सब भेद ला खोल ?”
तुरुत गरीबा आशय समझिस, ओकर मुंह करिया के लुवाठ
जमों दोष ओकरेच आवय कहि, अंदर हृदय सहत संताप.
मनसे मन ला कथय गरीबा -“”दसरुरखिस तेन सच गोठ
मंय निश्चय अपराथ करे हंव, अंत&करण करत स्वीकार.
मनसे के हर कष्ट हरे बर, ओकर स्वार्थ सुरक्षित होय
मूक जीव के बलि देवत हन, उनकर प्राण हरत बन क्रूर.
सांवत भांवत एक सुंटी बंध, खाहंय पिहंय लिहीं आनंद
कुकुर बिलई के जान निकल गिस, जेहर कभू लहुट नइ आय.
यदि मनुष्य के हत्या होतिस, मिलतिस आजीवन कारावास
पर पशु के मंय प्राण हरे हंव, एमां सजा मिलत हे काय ?
याने हम्मन स्वार्थ पूर्ति बर, मारत हन पशु पक्षी पेड़
प्रकृति के सन्तुलन हा बिगड़त, जेहर आय महा अपराध.
वास्तव मं मंय जुरूम करे हंव, ओकर फल मं मांगत दण्ड
चार पंच मिल न्याय करव अब, मंय हा कहत क्रोध ला त्याग.”
चिंता बोलिस – “”हम टोटकोर्राे, तोला कहां करन हम माफ !
दण्ड घलो हम कहां ले देवन, भावी बर निर्णय रख देव.
हम अतका सलाह दे सकथन – कुकुर बिलई के “गत’ बन जाय
ओमन बिन कसूर मारे गिन, ओमन ला अब “माटी’ देव.”
गुनत गरीबा मन के अंदर – अब मंय करिहंव कोई काम
काम के पूर्व समीक्षा चिंतन, अउ फल – ऊपर गहन धियान.
पर के नेक सलाह ला सुन लंव, खुद ला श्रेष्ठ समझना बंद
दुश्मन के सदगुण अपनाहंव, तभे सफलता आहय हाथ.”
सब मनखे के साथ गरीबा, कुकुर बिलई के “क्रिया’ बनात
उन ला “माटी’ दिस माटी रख, ओमन दुनों स्नेह के पात्र.
सब रटघा ला टोर गरीबा, लहुट गीस सुन्तापुर गांव
तभे उहां आरक्षक आइस, ओकर रिहिस हे भोला नाम.
ओला जब मनसे मन देखिन, ओ तिर ले छंट के चल दीन
बस बांके हा अंड़े उहां पर, ओहर रिहिस निघरघट जीव.
भोला हा बांके ला बोलिस -“”मंय हा बहुत सरल इंसान
कोई ला दमकाये नइ हंव, एको ला लगाय नइ डांट.
तब ले मनसे मोला देखिन भरभर भागिन पल्ला ।
आखिर मोर काय ए गल्ती फुरिया तुरते ताही ।।
बांके किहिस -“”हटिन मनसे मन, ओमां उंकर कुछुच नइ दोष
हे गणवेश तुम्हर खुद अइसे, एला देख डरत हे लोग.”
“”हम्मन जनता के रक्षक अन, रक्षा करथन खुद ला होम
दंगा लड़ई अगर कुछ होवत, हम्मन जाथन ओतिर दौंड़.
बिगड़े हालत ला सुधारथन, खुद दुख भोग कराथन शांत
तभो ले मनसे यदि डर्रावत, तब तो आय बहुत बेकार.”
“”यद्यपि कतको ठक विभाग अउ, मगर भिन्न हे तुम्हर विभाग
तुम कई ठक अधिकार पाय हव, तेकर कारन तुम हव ऊंच.
कोई ला मुजरिम बनात हव, धारा लगा देत निर्बाध
तुम्हर पिछू न्यायालय चलथय, तुम्हर लेख के करथय जांच.
तुम मुजरिम ला छोड़ सकत हव, सुधुवा ला सकथव तुम धांस
खैर छोड़ बारागण्डाएन, कहां जात तेला कहि देव ?”
“”बन्दबोड़ मं भेखदास हे, ओला देना हे सम्मंंस
बन्दबोड़ के पथ नइ जानंव, तंय हा बता सरल अस राह ?”
“”हम हा इहां जउन ठाढ़े हन, एहर नवा करेला आय
इहां ले जावव जुन्ना करेला, ओकर बाद एक ठक बांध.
ओकर तिर ले होवत निकलव, आगू मं हे बर के पेड़
ओकर असलग जउन गांव हे, ओला “बन्दबोड़’ तंय जान.”
भोला आगू डहर सरक गिस, बन्दबोड़ पहुंचिस कुछ बाद
ओहर बुलुवा ला बलवाथय, जेहर आय गांव कोतवाल.
पल्टन भेखदास अउ बल्ला, मालिक जगनिक तक आ गीन
“आरक्षक हा काबर धमकिस ! अइसे सोच भीड़ बढ़ गीस.
भोला ला पल्टन ला पूछिस – “”भेखदास के का अपराध
तंय ओकर विरूद्ध लिखवाये, थाना पहुंच के ओकर नाम ?”
पल्टन किहिस -“”मोर सच सुन लव – रिहिस मोर तिर कुकरा एक
ओला भेखदास हा लेगिस, बिगर बताय कलेचुप चोर.
कुकरा ला लहुटा देवय कहि, मंय ओला समझउती देंव
लेकिन ओहर घेक्खर मनसे, मोर बात ला मारिस लात.
आखिर मंय हा हार गेंव तंह, थाना गेंव प्राथमिकी लिखाय
भेखदास हा कुकरा लेगिस, सब आरोप उहां कहि देंव.”
आरक्षक के बरनी चढ़थय, भेखदास ला पास बलैस
भड़किस -“”तंय गरूवा अस दिखथस, नीयत के लगथस दस साफ.
कुकरा खाय लार यदि टपकत, तंय ला सकते एक खरीद
लेकिन तंय नीयत के छोटे, कुकरा के चोरी कर लेस.”
भेखदास इन्कार दीस खब -“”सत्य कहत – मंय हा नइ चोर
पल्टन आय पुराना दुश्मन, मोला धांसत रच षड़यंत्र.
मंय निर्दाेष साफ पानी अस, गलत काम ले रहिथंव दूर
मोर भेद “बन्छोर’ जानथय, जेहर सबके रक्षक देव.”
लेकिन भोला बात सुनिस नइ, कहिथय -“”तंय बोलत हस झूठ
पल्टन हा पगला नइ जेहर, डारत हवय तोर पर दोष.
ठंउका मं तंय हा चोरहा हस, मोर साथ चल थाना रेंग
समझउती ला काट देत हस, तंय हा बंड निसाखिल जीव.”
भेखदास हा बिछल गीस फट -“”मंय नइ करेंव जुरूम के काम
तब मंय काबर थाना जाहंव, उहां मोर नइ थोरको काम.
तंय शासन के आरक्षक अस, एकर मतलब ए नइ होय –
तंय कोई ला दपकी मारस, या थाना लेगस धर बांध.”
भेखदास के ओरझटी सुन, भोला के तन लग गिस आग
ओहर भेखदास ला दोंगरत, कोदई ला परथे मूसर मार.
मनसे मन टकटक ले देखत, उंकर हृदय मं ब्यापत सोग
पर डर मं खुद थरथर कांपत, नइ कर पावत बीच बचाव.
भेखदास ला भोला बोलिस -“”सच मं तंय चोरी कर लेस
मोर साथ उठमिलवई करथस, काटेस शासन के आदेश.
तंय हस खतरनाक अपराधी, पर तंय होना चहत अजाद
मोर चई मं तंय ना रूपिया, तब मंय तोला करिहंव माफ.
यदि तंय ओरझटी कुछ करबे, थाना लेग जहंव तब झींक
उहां तोर बुढ़ना झर्राहंव, टोर के रहिहंव नसना तोर.”
भेखदास ला मार परे हे, पश्त होत हे ओकर देह
ओहर जगनिक के तिर पहुंचिस, अपन व्यथा ला खोलिस साफ –
“”तंय हा सत इमान जानत हस – मंय हा अंव बिल्कुल निर्दाेष
पर पल्टन हा दोष लगा दिस, थाना चल दिस मोर खिलाफ.
आरक्षक हा मोला झड़कत, करत हवय रूपिया के मांग
मंय हा चोरी कहां करे हंव, तब ले सजा मिलत भरपूर.”
जगनिक कथय -“”सलाह देत हंव – यदि आरक्षक मांगत नोट
ओकर हाथ राख दे रूपिया, पाछू डहर गोड़ झन लेग.
यदि तंय नहि मं मुड़ी हलाबे, तब तोरेच होहय नुकसान
क्रूर व्यक्ति ले साफ बचे बर, ओकर गलत मांग ला मान.”
भेखदास हा कथय निहू बन -“”तंय हा देवत नेक सलाह
मगर मोर तिर रूपिया नइये, मंय हा अभी विवश लाचार.
अगर तोर कर नगदी रुपिया, मोर मदद कर दे तत्काल
तंय मनमरजी ब्याज लगाबे, मंय हा देहंव बिन इन्कार.”
जगनिक हा रूपिया गिन दिस तंह, भेखदास के बनगे काम
ओहर आरक्षक तिर पहुंचिस, रुपिया रख दिस ओकर हाथ.
बल्ला हा ओकर ले हटथय, पहुंच गीस घुरूवा के पास
भेखदास के ददा ए ओहर, तेकर पास कहत सब बात –
“”तंय निÏश्चत असन बइठे हस, भेखदास के हाल खराब
ओला आरक्षक हा कुचरत, ऊपर ले मांगत हे नोट.”
घुरुवा हा अचरज मं परथय -“”मोर पुत्र के काय हे दोष
आरक्षक हा काबर पीटत, कुछ तो बता – बात ला साफ. ?”
“”तोर पुत्र कुकरा चोराय हे, पल्टन मढ़त हवय आरोप
इही सूचना ला अमरे बर, भोला आरक्षक हा आय.
ओहर हा कत्र्तव्य छोड़ दिस, करत निसाखिल अत्याचार
ओला कोई छेंक सकत नइ, पुलिस के डर तो होथय खूब.”
घुरुवा घटनास्थल पर गिस, ओकर रुंवा हा होथय ठाढ़
आरक्षक भोला हा मिलथय, करथय बरन चढ़ा के बात –
“”ठंउका मं अन्याव करे हस, भेखदास बिल्कुल निर्दाेष
ओला झड़क के मांगे रुपिया, फोकट के बताय हस रोष.
तुम सम्मन्स इहां देतेव चुप – वापिस जातेव भाई ।
शासन के बूता हा पूरा – नइ उठतीस झमेला ।।
पर न्यायालय ला लगाय हव, जबकि तोर अधिकार ले दूर
शासन ले हक पाय हवस का, गांव पहुंच कर अत्याचार !
तंय अभि गल्ती जेन करे हस, ओकर करिहंव अवस रपोर्ट
यदि थाना हा दुरछुर करिहय, पर मंय हा निराश नइ होंव.
उहां के हट न्यायालय जाहंव, करिहंव प्रकरण दर्ज तड़ाक
मगर तोर धुमड़ा खेदे बर, मंय हा पागी कंस तैयार.”
अतका अकन बोल घुरुवा हा, थाना चलत रिपोर्ट लिखाय
ओहर सुन्तापुर पहुंचिस अउ, सब तिर अपन बिपत ओरियात.
उही तीर मं बात सुनत हें, बिरसिंग मगन साथ बिसनाथ
ततके मं भोला हा पहुंचिस, फिकर मं सिकुड़त ओकर माथ.
कहिथय -“”देखव तो घुरुवा ला, थाना जावत मोर खिलाफ
एला रोक के समझा देवव, मोर कुजानिक कर दे माफ.”
कहिथय मगन -“”मंगे हस रि·ात, भेखदास ला थप्पड़ देस
तंय अनियाव करे हस नंगत, पर अब काबर घुसरत टेस !”
भोला लाला – लपटी करथय, तब तीनों झन हेरिन राह
किहिस बीरसिंग हा घुरुवा ला -“”तंय झन धर थाना के राह.
जान लेन हम सच बिखेद ला, आरक्षक के हे अनियाव
पर तंय ओला क्षमा दान कर, ओकर रोटी ला झन छीन.
अगर रिपोर्ट लिखावत तंय हा, सिद्ध हो जाहय सब आरोप
भोला के जीविका छिनाहय, ओकर पर दुख के बरसात.
लेकिन तंय कुछ लाभ पास नइ, तेकर ले जिद्दी पन छोड़
भोला के गल्ती माफी कर, अपन बुद्धि ला रख ले शांत.”
घुरुवा बड़ मुश्किल मं मानिस, भूल गीस खैरागढ़ जाय
तंहने भोला कपट ला मन रख, हाथ मिला के वापिस गीस.
खैरागढ़ मं पहुंच के देखिस, आय बीरसिंग घलो इहेंच
सोचत हे भोला हा मन मन – “”बच नइ पाय मोर अब घेंच.
घुरुवा खैरागढ़ नइ आइस, मगर बीरसिंग ला भेजीस
अब एहर रिपोर्ट लिखवाहय, मोर विरुद्ध मं तथ्य सहेज.
एकर पूर्व जांव मंय थाना, उहां करंव मंय उल्टा जिक्र
तब आफत हा मुड़ी आय नइ, मंय निबरित होहंव सब फिक्र.”
भोला हा थाना मं झप गिस, उहां मुलू हे थानेदार
पन्थू अउ हूमन मन हाजिर, उंकर साथ आरक्षक और.
भोला झूठ शब्द ला मेलिस, प्राथमिकी ला दर्ज करैस –
“”मोला घुरुवा मगन बीरसिंग, अउ बिसनाथ खूब गुचकैन.
तोर प्राण ला हम्मन लेबो, अइसे चारों धमकी दीन
दइया – मंइया घलो खूब बक, शासन काम मं बाधा दीन.
ओतिर रिहिन गांव के मनखे, पल्टन अउ बुलुवा कोतवाल
लेव उंकर ले फुराजमोरवी, मोर बात के दिहीं प्रमाण.”
थाना मं रिपोर्ट लिखवाथय हर दिन कतको प्राणी ।
मगर पुलिस नइ झांकय उनकर होवय नइ सुनवाई ।।
पर भोला हा आरक्षक ए, ओहर कलपिस ढाढ़ा कूट
थानेदार मुलू हा सुनथय, तंहने कथय क्रोध मं कांप –
“”दंगा हा भड़कत आगी अस, तेला दउड़ कराथन शांत
आंदोलन ला हमीं दबाथन, जनता के सेवक हम आन.
लेकिन आज होय हे उल्टा – होय हमर पर अत्याचार
भोला के मरुवा ला धर के, देहाती मन झोरिन खूब.
तब देहाती सजा पांय अब, ओमन ला धर के झप लाव
उंकर इहां रगड़ा ला टोरव, एको कनिक मरव झन सोग.”
पन्थू – हूमन अउ आरक्षक, डग्गा मं बइठिन तत्काल
खैरागढ़ ले वाहन रेंगिस, पहुंचिस बन्दबोड़ देहात.
आरक्षक मन घुरुवा के घर गिन, ओतका बखत रात के टेम
पन्थू हा घुरुवा ला बोलिस, मीठ शब्द मं कपट ला मेल –
“”तंय हा हमर साथ थाना चल, उहां हवय तोर अभी बलाव
हम आरक्षक तोर हितू अन, एको कनिक अहित नइ होय.”
घुरुवा पूछिस -“”बता भला तंय – मंय हा थाना काबर जांव
उहां मोर कुछ बूता नइये, तब का कारण चक्कर खांव !
आरक्षक पर रिहिस हे गुस्सा, जावत रेहेंव रिपोर्ट लिखाय
पर समझौता होगिस तंहने, छोड़ देंव खैरागढ़ जाय.
भोला से नइ कुछुच शिकायत, ओकर दोष क्षमा कर देंव
भोला अगर मोर घर आहय, दुहूं खाय बर गांकर साग.”
हूमन किहिस – “”निष्कपट अस तंय, भोला ला माफी कर देस
लेकिन हम्मन कइसे छोड़न, हम मानत हन अति गंभीर.
आय पुलिस जनता के रक्षक, कई करतब हे ओकर पास
अतियाचारी – अपराधी ले, ओहर करत सुरक्षा दान.
पर भोला ए गांव मं धमकिस, करिस स्वयं अपराधिक काम
ओकर गलत काम ले होवत, पुलिस विभाग बहुत बदनाम.
थानेदार क्रोध मं उबलत, भोला पर हे सख्त नराज
भोला खत्तम सजा पाय कहि, ओहर करत उदिम गंभीर.
साहेब हा बलाय हे तोला, हमर साथ तंय निश्चय रेंग
सत्तम बात ला उंहचे ओरिया, एको कनिक लुका झन राख.”
घुरुवा हा डग्गा मं बइठिस – वाहन रेंगिस आगू ।
आरक्षक मन खुशी मनावत – सफल चले हें पासा ।।
एमन अब सुन्तापुर पहुंचिन, आरक्षक मन खेलत दांव
मगन अउर बिसनाथ ला बलवा, उंकर साथ बोलत हे मीठ.
पन्थू हा ओमन ला बोलिस -“”थाना मं हे तुम्हर बलाव
हमर साथ डग्गा मं बइठव, लेग जबो इज्जत के साथ.”
मगन किहिस -“”हम कहां लड़े हन, ककरो संग नइ होय विवाद
सब मनखे संग हली भली हन, तब फिर काबर थाना जान !”
हूमन बोलिस -“”लुक लेव तुम, पर रहस्य हा खुलगे साफ
गीस बीरसिंग हा थाना मं, खोल दीस भोला के पोल.”
अब बिसनाथ हो जाथय चकरित – “”यदि सच तब बताव तुम खोल
थाना मं अभि बीरसींग हे, मगर करत का ओइसन ठौर ?”
पन्थू पुलिस जाल ला फेंकिस -“”हमर बात पर कर वि·ाास
एतन आय राह पकड़े तब, थानेदार – बीरसिंग साथ.
ओमन हंस – हंस चाय ला पीयत, करत रिहिन भोला के गोठ
उंहे बीरसिंग फोर बता दिस, बन्दबोड़ घटना के हाल.”
बोलिस मगन -“”होय ते होगे, प्रकरण पर अब परगे छेंक
मान – मनौव्वल होय दुनों मं, भोला घुरुवा बनिन मिलान.
तब प्रकरण ला कार बढ़ावत, ओमां अब लग जाय विराम
भोला ऊपर कष्ट आय झन, ओहर सुख के बासी खाय.”
हूमन कथय -“”बोल झन हमला, यदि भोला पर दया देखात
सोचत – बचय जीविका ओकर, तब फिर चलव हमर संग दौड़.
थानेदार ला जम्मों कहि दव, ओहर मान लिही सब गोठ
तब भोला के अहित होय नइ, ओला तुम बचाव मर सोग.”
अब बिसनाथ कथय ताकत कर -“”मनसे के मनसेच मितान
काबर ककरो जीवन बिगड़य, भोला घलो बिपत झन पाय.
चल हम खैरागढ़ तक जाबो, साहब ला समझाबो साफ
भोला भुला कुजानिक कर लिस, ओला करय हृदय ले माफ.”
जब बिसनाथ मगन मन बइठिन, डग्गा धरिस सरसरा राह
अंदर म घुरुवा हा हाजिर, तीनों धोखा ले अनजान.
एमन जहां अमरथंय थाना, भोला दउड़ उंकर तिर अ‍ैस
ओहर घुरुवा ला बकथय अउ, गाल पीठ पर मुटका दीस
भड़किस -“”मोर विरुद्ध लिखा अब, गांव मं बोलेस तेन रिपोर्ट
मोर नौकरी तुरुत छीन अउ, मोला देखा कछेरी – कोर्ट !
कान खोल सुन – एहर थाना, चलथय इहां पुलिस के राज
आज रात गुचकेला खाबे, तेकर हवय कुछुच अंदाज !”
तीनों झन ला हवालात मं डारिन तुरतेताही ।
उहां बीरसिंग हाजिर जेकर मुंह पर दुख के रेखा ।।
थोरिक बखत गुजरथय तंहने, थानेदार मुलू हा अ‍ैस
इंकर बलउवा फिर होथय तंह, एमन पहुंचिन बंधे कतार.
देखा हथकड़ी ओहर कहिथय -“”देखव काम होत शुभ नेक.
अपन हाथ मं बेली पहिरव, मुड़ निहरा न्यायालय जाव
उंहचे होहय तुम्हर जमानत, तेकर बाद अपन घर जाव.”
तब बिसनाथ किहिस घबरा के -“”तंय हा भले मांग ले नोट
लेकिन बेली ला झन पहिरा, वरना पत पर परिहय चोट.
जेकर हाथ हथकड़ी लगथय, अउ यदि ओकर होथय जेल
ओकर हंसी गांव अउ सब तन, मुड़ ला उठा रेंग नइ पाय.”
मुजरिम मन के मदद करे बर, चंदन भुलाराम मन आय
ओमन रुपिया ला गिन दिन तंह, हाथ मं बेली लग नइ पैस.
भुलाराम, मुजरिम ला बोलिस -“”तुम्मन रहव फिकर ला टार
हम्मन तुम्हर जमानत लेबो, तुम्मन होहव आज अजाद.
अजम वकील बहुत गुनवन्ता, रखथय ज्ञान नियम कानून
ओला अपन वकील करे हन, विजय देवाहय हे वि·ाास.”
थोरिक मं आरक्षक संग मं, मुजरिम मन न्यायालय अ‍ैन
पहिली बखत आय ते कारण, मन मं धुकुर पुकुर घबरैन.
अगनू हा ए बैंक प्रबंधक, उहू हा न्यायालय मं आय
ओकर विरुद्ध दर्ज हे प्रकरण, तउन ला खोलत इनकर पास –
“”जल धारा के जउन योजना, पावत कृषक मुफ्त मं नोट
ओमां कृषक कुआं बनवाथय, ताकि खेत मं सिंचई हा होय.
कृषक बिसाल अ‍ैस अगनू तिर, अपन समस्या ला रख दीस –
“नवा कुआं ला मंय बनात हंव, पारित हे ओकर प्रस्ताव.
अब मोला रुपिया भर चहिये, बैंक ले तंय कर दे भुगतान
काम के बदला राशि ला चाहत, गुप्त बात ला कहि दे खोल.”
अगनू किहिस -“”तंहू जानत हस, लेन देन बिन अरझत काम
बी. डी. ओ. अउ ग्राम सहायक, मांगत हें दस प्रतिशत नोट.
अगर शर्त स्वीकार करत हस, तुरते करहूं सब भुगतान
हम्मन आर्थिक लाभ अमरबो, नवा कुआं बन जाहय तोर.”
हुंकिस बिसाल – “”कहत हस ठाहिल, मंय जात रहस्य सब गूढ़
भ्रष्टाचार के विरुद्ध जेहर, अपन बचा के करत कुकर्म.
हे अपराध निरोधक शाखा, उंहचे अगर तोर कुछ काम
ओमन हांक बजा – धन मंगथंय, कोन हा करही उंकर बिगाड़!
चिखला ले जे भगथय दुरिहा, तेन फसल पर भाषण देत
श्रमिक लगा के पेड़ कटाथय, हरियर जग बर किरिया खात.
मनसे करथय गलत आचरण, तेकर जड़ मं धन के मार
अर्थ के बिन हे जगत निरर्थक, मानव हा कोलवा असहाय.
तंय हा मंगत नोट दस प्रतिशत, मंय सब शर्त करत स्वीकार
पर भुगतान देर झन होवय, मोला सच आ·ाासन देव.”
अगनू अउ बिसाल दूनों झन गुपचुप बदिन मितानी ।
पर अगनू पर बिपत झपा गिस – ओहर खा गिस धोखा।।
अगनू घूंस के रुपिया झोंकिस, तभे बिसाल रचिस षड़यंत्र
ओहर अगनू ला पकड़ा दिस, ताकि भविष्य छाय अंधियार.”
अपन बिखेद कलप के अगनू, अपन बिपत ला खोलत फेर-
“”मंय अपराध करेंव तेकर बर, न्यायालय मं प्रकरण ठाड़.
ओकर निर्णय आज हे निश्चित, निर्णय हा लटके अधबीच
मंय निर्दाेष या सजा ला पावत – शंकित हृदय हा धक धक होत.”
अब अगनू अउ मुजरिम मन हा, न्यायालय के अंदर गीन
पक्षकार अधिवक्ता बाबू, उहां रिहिन हें कतको जीव.
उंचहा कुर्सी पर बइठे हे, मोतिम महिला न्यायाधीष
अब ओहर निर्णय ला देवत, जेला सुनत उहां के भीड़ –
“”अगनू हा रि·ात ला मंगिस, याने करिस बहुत अपराध
पांच (एक) (डी) व पांच (दो) धारा, अगनू पर लग गिस निर्बाध.
सब आरोप प्रमाणित होगिस, करन पाय झन शंका – वास
गल्ती कारण दण्ड भोगिहय – गिन दू साल के कारावास.”
इही दृष्य यदि फिल्म मं होतिस, अगनू हा चिल्लातिस जोर –
मंय हा रि·ात नइ मांगे हंव, एको कनिक मोर नइ दोष.
तभो ले मोला दण्ड मिलत हे, मोरे पर होवत अन्याय
अब मंय मोर विरोधी मन ला, पहुंचा रहिहंव यम के धाम.
मगर इहां के दृष्य हे दूसर – अगनू हवय सुकुड़दुम ठाड़
अंदर हृदय बहुत कलपत पर, कहन पात नइ मुंह ला फार.
उहां हमर अभियुक्त खड़े हें, सन खा देखत दृष्य जतेक
अपन जमानत ला करवाइन, नंगत अक रुपिया ला फेंक.
भुलाराम हा लीस जमानत, चंदन करिस मदद बर दौड़
अजम इंकर प्रकरण अधिवक्ता, जेकर बुद्धि हा बहुते तेज.
जहां कार्यवाही हा निपटिस, मुजरिम मन बाहिर मं अ‍ैन
कथय बीरसिंग तुरुत अजम ला -“”हम बिन कारण के फंस गेन.
तब ले हम एक बात चहत हन – भोला संग समझौता होन
ओकर गोड़ तरी गिर जाबो, पर प्रकरण हा वापिस होय.”
अजम कथय -“”तीन सौ एकचालीस, पांच सौ छै (बी) धारा ठोस
तीन सौ तिरपन – दू सौ चौरनबे, ए धारा मन बहुत कठोर.
भोला ला मनाव बिनती कर, या तुम धरव बहुत ठन राह
पर समझौता होन पाय नइ, प्रकरण चलिहय धर रफ्तार.
लेकिन तुम हिम्मत झन हारव, लड़व अदालत पेशी आव
तुमला दण्ड मुक्त होवय कहि, मंय करिहंव हर किसम प्रयास.”
खेदू साथ मगन हा मिलथय, केंघरिस मगन होय गंभीर-
“”हमर गला मं फासी लगगे, तभे आय न्यायालय तीर.
पर तंय काबर प्राण देत हस, तंय का करेस जघन्य अपराध
अपन असन हमला यदि समझत, साफ कथा ला कहि निर्बाध ?”
खेदू चारों तन ला देखिस, कहिथय -“”मोर कथा झन पूछ
बलवा – आगजनी अउ डाका, यने करे हंव कई अपराध.
कई ठक धारा लगे मोर पर, न्यायालय मं घोषित बंड
मंय बेदाग छूट पावंव नइ, मोला निश्चय मिलिहय दण्ड.
पर छेरकू हा आ·ाासन दिस, ओकर ऊपर हे वि·ाास
मोर नाव ला उही बचाहय, सब आरोप ले मंय आजाद.”
घुरुवा फांकिस -“”गलत बोल झन, तंय बन झनिच हंसी के पात्र
छेरकू हा मंत्री राजनीतिक, जानत राजनीति ला मात्र.
तोला कहां ले छोड़वा सकिहय, छेरकू हा नइ न्यायाधीष
अउ ना कुछ दबाव कर सकिहय, जब न्यायालय पूर्ण स्वतंत्र ?”
खेदू बोलिस – “”ठीक कहत हस, हवय भविष्य कुलुप अंधियार
साफ बात ला कोन हा कहही, जीवन जब बोहात बिच धार.”
खेदू हा दुखड़ा रोइस अउ, छोड़ दीस अब इनकर साथ
एमन चारों काबर बिलमंय, इनकर खाय चुरे नइ भात.
कांजी हाउस ले स्वतंत्र हो – रड़भड़ भागत गरुवा ।
एमन घलो उहां ले टसकिन – बचा के अपने मरुवा ।।
४. लाखड़ी पांत समाप्त

गरीबा : महाकाव्य (दूसर पांत : धनहा पांत)

गरीबा

महाकाव्य

नूतन प्रसाद

2. धनहा पांत
ठेलहा बइठे मं तन लुलसा-ऊपर ले बदनामी ।
काम करे मं समय व्यवस्थित-ऊपर मिलत प्रशंसा ।।
काम के पूजा करिहंव जेकर ले होथय जग आगे ।
महिनत मं तन लोहा बनथय-बनन पाय नइ कामी ।।
समय हा रेंगत सुरधर-सरलग, मौसम घलो पुरोथय काम
ओसरी पारी पुछी धरे अस, वर्षा ऋतु-जड़काला-घाम.
नेत लगा-अब पानी गिरगे, अड़बड़ कृपा करिस बरसात
अपन बुता मं किसान भिड़गें, फुरसुद कहां करे बर बात!
छोड़ बिस्कुटक कथा कंथली, नांगर ला सम्हरात किसान
बइला मन ला मसक खवा अब, जावत खेत छिते बर धान.
गीस गरीबा अपन खेत मं, हरिया धर के छीतत धान
नांगर फांद-रेंगावत कोरलग, चलत माल मन छाती तान.
हो हो, तत तत, डिर डिर, चच चच, देत गरीबा रोंठ अवाज
दूुसर डहर के कुछ सुध-बुध नइ, काम पुरोय के करथें फिक्र.
बेर लुकाय हवय बादर मं, कतका टेम ज्ञात नइ होत
मंझन होगिस तेकर गम नइ, अपन काम भर मं बिपताय.
अकता बेर जोंत नांगर ला, आत गरीबा खुद के गेह
सनम के दद्दा नाम फकीरा, तेहर मिलिस देखावत स्नेह.
कहिथय -“बिरता रुप बदलथय, कभू रहय नइ एक समान
जे लइकुसहा तेन युवक हे, अउ जवान हा बुढ़ऊ सियान.
तंय बालकपन मं इतरवला, काजर पोत देस मुंह मोर
लेकिन अब हस अड़िल जवनहा, महिनत करथस मरत सजोर.”
मंदरस भाखा कथय गरीबा -“तंय बढ़ाय प्रेम-अमृत सींच
तोरेच आशीष ले मंय उत्तम, कमल फूल तरिया के बीच.”
“बाबू, तोर आचरण उत्तम, बात के उत्तर निश्छल देत
धान के बीज कहां ले पाये, कोन धनी हा बाढ़ी दीस ?”
“अपन जांग का खोल देखावव, का बतांव जीवन के हाल !
बड़ मुस्कुल मं बांच पाय हम, झेले हवन बिपत-अंकाल.
धनवा तिर ले ऋण उठाय हम, ओकर एवज देय हन खेत
फेर उधार धान लाने हंव, तभे भराइस भूमि हा नेत.”
“एक जानबा ठीक किहिस हे- कृषक हा ऋण मं लेवत जन्म
जीवन भर कर्जा मं जीयत, मरे के छिन मं ऋण हा साथ.
पर तंय ठीक काम जोंगे हस, छींचे हवस खेत भर धान
विपत हा आगू छेंकत रहिथय, पर मनसे हा बढ़य सदैव.”
दुनों सुहातू गोठला करके, ओहिले चलिन ओ तिर ला छोड़
अपन मकाम गरीबा अमरिस, धोइस साफ चिखलहा गोड़.
कोठा गीस माल मन के तिर, पयरा भुंसा ला धर के साथ
धन मन ला पुचकार खवाइस, हलू-हलू सारिस एक सांस.
बइला मन हा बिधुन हो – खावत, मुड़ी हलात – पुछी छटकार
कोंड़हा नून मिले जल पीयत, पागुर भांजत-लेत डकार.
अब ओ ठउर गरीबा त्यागत, ओकर पेट मरत हे भूख
सुक्सा साथ भात ला हेरिस, पाटत पेट जतिक मन साद.
एकर बाद हाथ धोइस सरका भोजन के थारी ।
सुखी नाम एक मनसे आइस बचपन के संगवारी ।।
सुखी कथय -“तंय हवस निफिकरी, तोर चलत हे सरलग काम
लेकिन मोर बुता हा अंड़गे, तेकर कारण नींद हराम”
पीढ़ा रख गोठियात गरीबा- “यहदे तीर सुखी आ बैठ
कइसे फिफिया आय इहां तक, का कारण हस दुखी उदास?”
“अपन बिखेद बतात तोर तिर, झन हंस खुल खुल सुनते साठ
सुर के साथ खेत ला जोंतत, नांगर ला जरकुल धर लीस.
मेड़ मं हावय पेड़ बहुत ठक, ओकर जर फइले हे खेत
जर मं हल के नास हा फंसगे, बइला मन आगुच तन जात.
सेवर नांगर रट ले टूटिस, कइसे ओहिले काम बजांव !
यदि उबरत तब मदद ला कर दे, धर आसरा तोर तिर आय”
मित्र के दुख सुन कथय गरीबा – “मोर रहत तंय झन कर हाय
जउन वस्तु आवश्यक तोला, बिन ढचरा मंय देहंव जल्द.
गुरतुर भाव चिरई के बीच मं, फिर हम बुद्धिमान इन्सान
एक दुसर के बिपत ला टारन, झनिच करन पर के हिनमान.
तोला आज जिनिस के जरुरत, तब मंय हा सहाय कर देत
कल तंय मोर सहायता करबे, इसने होत आदान प्रदान.”
चोक्खा नांगर हेर गरीबा, सुखी के खांदे पर रख दीस
सुखी के मांग हा पूरा होगे, उहां ले निकलिस हे तत्काल.
आगू मिलिस वृद्ध सुद्धू हा, बारी ला रुंधत कर यत्न
साबर मं जमीन ला कोड़त, अंदर तक गड्ढा बन जात.
तंह बबूल के डाल ला खोंचत, गड्ढा मं मट्टी भर देत
मट्टी ला साबर मं धांसत, होत डाल मन अंड़ के ठाड़.
बांस ला दू फलका मं चीरत, डाली मं ओला लपटैस
रस्सी मं कड़कड़ ले बांधिस, होगे सफल रुंधई के काम.
ओकर श्रम ला सुखी ला देखिस, तंहने कहिथय भर आश्चर्य-
“तोर देंह हा थके चुराचुर, आंखी घलो होय कमजोर.
उम्र बचे हे बस अराम बर, जादा महिनत ला झन जोंग,
अगर बुता बर जिद्द धरे हस, अउ कर सकत हवस कल ज्वार”
सुद्धू कथय -“कोन हा जानत, कल के पूर्व निकलगे जान !
कल हा अंधरी गुफा मं छुपगे, ओकर पर झन करव यकीन.
वर्तमान ला महत्व देवव, प्राप्त वक्त के सद उपयोग
तभे मंहू मिहनत बजात हंव, वक्त के चिड़िया झन उड़ जाय.”
“तोर नीति अपनाय के लाइक, मगर मोर हे एक सलाह-
करतिस काम गरीबा हा अब, ओकर खांद डार सब भार.”
“करत गरीबा बुता शक्ति तक, ओहर दबे काम के भार
जीवन भर जांगर पेरे हंव, आज घलो करथंव कुछ काम.
तभे देंह मं फूर्ति लगत-मंय बइठ खांव नइ खाना ।
तभे अटकिहय काम-बुताही ए जीवन के बाती ।।
“तंय बुजरुक रटाटोर कमावत, तब मंय हंव भरपूर जवान
तोर प्रेरणा ले उत्साहित, महिनत ला करिहंव प्रण ठान”
सुखी हा अपने रद्दा रेंगिस, सोनसाय निकलिस ए ओर
फइले रिहिस बबूल के डाली, काँटा हा फइले सब ओर.
ओकर गोड़ चभक गिस कांटा, सोनू दरद मं करथे हाय
कांटा ला हेरे बर सोचिस, पर असफल चल दीस प्रयास.
मण्डल हा सुद्धू पर बिफड़िस – “दरद बढ़ाय धरे हस राह
कांटा ला बगराय सबो तन, ताकि मरय मनसे अनजान.
यद्यपि तंय कांटा गड़ास नइ, तब तंय कहां ले पाबे दोष
बिगर जीव के बपुरा कांटा, फोकट हो जाहय बदनाम.
पर मंय हा दिग्भ्रमित होंव नइ, समझत खूब कपट के चाल
पैर मं कांटा टूटिस रट ले, लहुट जहय गुखरु के घाव.
मोर पांव हा पंगु हो जाहय, चले फिरे बर मंय असमर्थ
मंय स्पष्ट जवाब मंगत हंव – का कारण दुश्मनी उठाय?”
सुद्धू कथय -“भड़क झन मण्डल, तर्क वितर्क के वन झन घूम
तोर मोर शत्रुता कहां कुछ, नइ पहुंचांव दर्द तकलीफ.
तोर पांव मं कांटा गड़ गिस, ओहर तो बस धोखा आय
मोर पास चिमटा पिन तेमां, कांटा ला झप देत निकाल.”
सोनसाय के पांव ला राखिस, सुद्धू निज घुटना पर जल्द
पैर मं कांटा घुसे जउन कर, पिन से कोड़ हलावत खूब.
कांटा हिल के ऊपर आइस, चिमटा मं निकाल दिस खींच
अपन हथेली कांटा ला रख, सोनू ला बन नम्र देखात.
कहिथय- “कांटा बाहिर आ गिस, अपन फिकर ला तंहू निकाल
व्यर्थ गोठशत्रुता बढ़ाथय, फइलत अमर बेल कस नार.”
सोनसाय हा कहिथय रोषहा – यद्यपि कांटा हा निकलीस
लेकिन ओकर दर्द शेष अभि, जेहर कभू मिटन नइ पाय.
मंय अहसान तोर नइ मानों, निंदा लइक तोर सब चाल
कुआं गिराके फेर निकालत, ओहर कहां आय उपकार !
ओहर आय बड़े हत्यारा, प्राण हरे बर उदिम उचैस
तइसे दुख पीरा बांटे हस, करिहय कोन तोर तारीफ ?”
सोनसाय हा उहां ले हटगे, आगू बढ़िस थोरकिन दूर
परस आत टपटप ओकर बल, जउन हा हंफरत लेवत सांस.
परस किहिस- “मंय तोला खोजत, तोर एक ठक मोतीखेत
ओमां नांगर चलत रिहिस तब, उहें फकीरा खब ले अैस.
ओहर रेंगत नांगर रोकिस -“एहर आय मोर प्रिय खेत
सोनू के अधिकार इहां नइ, तुम्मन निकल जाव चुपचाप.”
सोनू मानो सोय ले उठगे, कथय झकनका कर के रोष-
“मोतीखेत आय मोरेच बस, कोन कथय दूसर के आय?
अगर फकीरा हक बतात तब, चल तो देखंव ओकर टेस
ओकर नसना टोर के रहिहंव, तभेच मोर चोला हा जूड़.
मंय हा पटवारी तिर जावत उही दबाहय पाती ।
नाप जोख के उही बताहय – कोन करत गद्दारी ।।
सोनू हा पटवारी तिर गिस, स्वार्थ सिधोय चलिस हे चाल-
“शिक्षक अगर करत आमंत्रित, अस्वीकार तभो ले ठीक.
अगर नर्स हा करत नमस्ते, उहू ला ठुकरा सकत बलात
पर पटवारी मन हा चुम्बक, आत तुम्हर तिर बिगर बलाय.
कृषक के भाग्य तुम्हर तिर होथय, नक्शा कंघी लौह जरीब
जिलाधीष अव गांव के तुम्मन, सुनना परत जमों आदेश.”
पटवारी हां हंस के बोलिस- “मोर प्रशंसा झन कर व्यर्थ
मंय अकास मं उड़त गरब कर, अगर काम तब कहि दे साफ.?”
सोनू कथय -“तंहू जानत हस-हवय एक ठक मोतीखेत
ओमां अन्न उपजथय गसगस, नाम धरे तब मोतीखेत.
गीन भृत्य मन धान बोय बर, ओमन उहां करत हें जोंत
तभे फकीरा उंहचे पहुंचिस, काम के बीच पार दिस आड़”
पटवारी दबके अस बोलिस -“मंहू करत हंव शंका एक
मोतीखेत फकीरा के ए, तभे बतात अपन अधिकार.
तोर पास हे भूमि गंज अक, मोती खेत के मोह ला छोड़
एके गोड़ खजूर के टूटत, तब ले चलत सरसरा ठीक.”
सोनसाय हा रुपिया हेरिस, पटवारी ला पकड़ा दीस
कहिथय -“मोर बात ला चुप सुन, मोतीखेत हा उत्तम खेत.
जइसे तन मं आंख हाथ मुड़, यने सुरक्षित हे हर अंग
मगर प्राण के बिना व्यर्थ सब, यने प्राण के बहुत महत्व.
मोतीखेत मोर बर जीवन, ओला तंय कर हक मं मोर
मंय भुंइया के लाभ ला पाहंव, तुम रुपिया के नफा कमाव.”
धन मं होथय नंगत ताकत, जउन कराय बहुत कम मीत
आत्मा ठोकर देथय तब ले- करथय मनसे गलत अनीति.
पटवारी हा कुटिल हंसी हंस, कहिथय- “ककरो पक्ष नइ लेंव
शासन के वेतन खावत हंव, तब चलिहंव शासन के नीति.
तुम “सीमांकन” करा लेव झप, वाजिब तथ्य हो जाहय ज्ञात
मोतीखेत सही मं जेखर, भूमि हा जाहय ओकर हाथ.
एकर साथ बुता तंय ए कर – पंच ला धर के लेगव साथ
कभू कभार उठाहयझंझट, दिहीं पंच मन सही जवाब.”
सोनसाय हा परस ला नेमिस, परस पंच मन ला धर लैस
उहां अैन अंकालू मुटकी, केड़ू घंसिया झड़ी लतेल.
पटवारी ला केड़ू हा कहिथय- “तंय हमला बलाय हस कार
हमर पास का बुता हे आखिर- एकर सही ज्वाप तुम देव ?”
पटवारी हा बोलिस कुछ हंस- “मोतीखेत ला जानत खूब
सोनसहाय फकीरा दूनों, ओकर पर बतात अधिकार.
पर वास्तव मं खेत हा काकर, नाप के बाद हो सकही ज्ञात
तुम्मन हमर साथ में रेंगव, खेत नाप मंय सच कहि देत.
तुम्हर उपस्थिति आवश्यक यदि बाद मं उठत लड़ाई ।
गलत काम ला रोक सकत- अउ न्याय दुहू बन साक्षी ।।
सोनसहाय पंच पटवारी, राह धरिन नापे बर खेत
नक्शा बांस जरीब उंकर तिर, सब झन पहुँचिन मोतीखेत.
उहां फकीरा पूर्व ले हाजिर, घंसिया हा बोलिस फटकार-
“सोनू मण्डल के धरती पर, तंय काबर अधिकार बतात ?”
कथय फकीरा हाथ बजा के- “एकर स्वामी मंय भर आंव
एकर संबंध मं तुम पूछव, मंय दे सकथंव सही जवाब .
इहां के माटी कोन किसम के, एकर मेड़ कतिक अस पेड़
कते फसल हा उत्तम उबजत, छिचना परत कतिक अस खाद ?
यदि सोनू हा दावा मारत, मोर प्रश्न के उत्तर लाय-
कतका लगत धान के बीजा, कतका लगत चना के बीज ?
यदि सोनू सच उत्तर देवत, कर दव बंद नाप के काम
मोतीखेत सौंप मंय देवत, हार जहंव मंय अपने आप.”
सोनू नांग असन फुंफकारिस -“मोर पास हे कतका भूमि
कतका अन धन सोना चांदी, कतका अस हे गरुवा गाय.
मोला एको कनिक ज्ञात नइ, नौकर रखथंय इंकर हिसाब
मंय हा बस अतका जानत हंव, मोतीखेत आय बस मोर.”
पटवारी हा बीच मं छेंकिस -“तुम्मन बहस करो झन व्यर्थ
मंय हा खेत नाप देवत झप, बता देत स्वामी के नाम.”
पटवारी अउ कृषक पंच मन, किंजरत नाप करत हें खार
यद्यपि उहां जरीब घुमत हे, पर निर्णय हा पूर्व के होय.
पटवारी हा नाप के बोलिस- “भाई पंच तुमन सुन लेव
जिंहा भूमि के लड़ई हा उठथय, मंय जाथंव नापे बर भूमि.
वैज्ञानिक के गणना गलती, शिक्षक के सब ज्ञान हा झूठ
लेकिन मोर नाप सच उतरत, तब पटवारी पर विश्वास.
मोतीखेत रहय सोनू तिर उही हा वास्तविक स्वामी ।
इहां ले तुरते जाय फकीरा खेत ला मार सलामी ।।
पटवारी ला किहिस फकीरा -“तंय हा करेस गलत अन्याय
धन मं तोर ईमान बेचा गिस, पद के गरिमा ला बिसरेस.
मोतीखेत के हर कण मोरेच, माटी के सुगंध तक मोर
अपन प्राण ला गंवा सकत हंव, मगर खेत ला तज नइ पांव.”
मुटकी हा फकीरा ला बोलिस -“तंय कानून ला झन ले हाथ
कंघी नक्शा अउ जरीब मन, जमों जिनिस शासन के आय.
पटवारी के निजी वस्तु नइ, जेमां करय कुछुच अन्याय
ओमन मं जइसन हे अंकित, पटवारी फुरिया दिस नाप.
हमूं पंच मन इहां आय हन, दुनों पक्ष ला बांटन न्याय
सीमांकन हा उचित होय हे, हमर आंख हा देखिस साफ”
झड़ी हा फकीरा पर बमकिस- “यदि तंय हा करबे कुछ आड़
जमों पंच मन दण्डित करिहंय, न्यायालय मं खाबे हार.
दस्तावेज पंच पटवारी, बनिहंय साक्षी तोर विरुद्ध
तंय हा मोतीखेत ला तज अब, इहां ले निकलिच जा चुपचाप.”
बहत फकीरा के आँसू हा, खेत के माटी रख लिस हाथ
कलपिस- “तोला मंय माने हंव, सेवा कर- लगाय मंय माथ.
मगर मोर हक ले बिछले तंय, वास्तव मं तंय धोखा देस
तंय धनवन्ता के पुतरी अस, ओकर हाथ मं खुद चल देस.
मंय तोला वाजिब पूछत हंव- कार व्यर्थ चल दिस श्रम मोर
आय कृषक हा तोर मयारु, कब तक भगबे ओला त्याग ?”
बोम फार रो डरिस फकीरा, धथुवा गे होगिस निरुपाय
धरती के पंइया पर लहुटत, अंतस हृदय करत हे हाय.
पूंजीपति मन तिर कंस पूंजी, बिसा लेत कानून नियाव
सोनू के मुंह खुशी मं चमकत, पइसा भर- पर के हक लूट.
सोनू सब नौकर ला बोलिस- “अब कउनो ला झन डर्राव
मोतीखेत मोर हक लग गिस, नांगर ला बिन थमे चलाव.”
सोनसाय हा दांव जीत गिस, नांगर हा रेंगत निर्बाध
सोनू अउ पटवारी लहुटत, हंस हंस बोलत मित्र समान.
उंकर पिछू मं पंच चलत हें, कहां लुवाठ पूछ सम्मान
जहां जुआड़ी हारत सब धन, ओकर होत नमूसी खूब.
हलू अवाज कथय अंकालू -“आज फेर हो गिस अन्याय
दस्तावेज पंच पटवारी, गलत काम मं सामिल होय.
हमर पास नइ हृदय न आत्मा, पाप पुण्य के भय या त्रास
कृषक गरीब हा नंगरा हो गिस, लेकिन हमन द्रवित नइ होय.
चाहे तुम्मन कुछुच कहव जी सोनसाय गरकट्टा ।
मरहा मन के रकत ला चुहकत होवत हट्टा कट्टा ।।
कथय लतेल- “हमूं जानत हन, सोनू के खराब सब नीति
आज फकीरा के हक छीनिस, कल दूसर ला करिहय नाश.
आखिर हम रउती का जोंगन, सोनसाय तिर धन के शक्ति
ओकर सम्मुख निहू पदी अन, होथय हमरेच बिन्द्राबिनास ”
मुटकी बोलिस- “रहव कलेचुप, सोनू हा ओहिले चल जात
यदि चुगली चारी ला सुनिहय, बफल हमर पर करिहय घात.
गांव हा ओकर भूमि हा ओकर, हम जीयत हन ओकरेच छांव
पानी मं रहना हे हर क्षण, कोन मगर ला शत्रु बनाय !”
गीन पंच मन अपन अपन घर, अंकालू गिस खुद के ठौर
दुखिया हा छानी पर बइठे, करत हवय खपरा ला ठीक.
बन गंभीर कथय अंकालू- “छानी पर बइठे हस कार
यदि ऊपर ले तरी मं गिरबे, तोर देह भर परिहय मार ?”
दुखिया किहिस- “सरक गे खपरा, यदि होवत रझरझ बरसात
पानी हा कुरिया मं घुसिहय, पिल पिल मात जहय घर द्वार.
मंय हा छानी ला छावत हंव, ताकि मुंदाय जतिक हे छेद
अइसन मं पानी हा गिरिहय, तब ले घर अंदर नइ जाय.”
“बेटी, काम करत हस उत्तम, पर शंका ब्यापत हे एक-
यदि छानी पर तोला देखत, मनसे मन हा कहहीं काय ?”
“मनसे मन हा इही बोलिहंय- “अंकालू के टूरी एक
ओहर छानी पर बइठिस अउ, करत रिहिस खपरा ला ठीक.
ददा, तंय अड़बड़ झन सोचे कर, मनसे मन हा बोलत काय
मिहनत कर सुख लाभ ला पावन, पर ला देन मदद सुख चैन.”
“मंय हा तोर ले हरदम हारत, तंय बइला ला नहवा लेत
गाय के दूध ला घलो दूहथस, कठिन काम तक करथस पूर्ण.
अच्छा, नीचे तुरुत उतर तंय, मोला लगत भयंकर भूख
जउन पकाय परस मंय खाहंव, सहना कठिन नींद अउ भूख.”
दुखिया हा नीचे उतरिस तंह, पिनकू के मां कोदिया अैस
दुखिया ओकर स्वागत करथय -“मौसी, आज आय तंय ठीक.
मगर काम बिन कोन हा आवत, अगर तोर कुछ अटके काम
मोर पास तंय सच सच फुरिया, तोर जरुरत होही पूर्ण.”
कोदिया बोलिस- “सच पूछत हस, तब बतात मंय निश्छल बात
मोर पास हे एक ठक बखरी, उहां लगाय चहत हंव साग.
मोर पास नइ तुमा करेला, ना बरबट्टी तुरई के बीज
सब तिर पारे हंव गोहार मंय, पर लहुटे हंव रीता हाथ.
हारे दांव तोर तिर आएंव तंय सब साद पुरोबे ।
जउन जिनिस बर इहां आय हंव तिंहिच मदद पहुंचाबे ।।
दुखिया किहिस -“प्रशंसा झन कर, बिगड़ जहय आदत हा मोर
तंय हा साग के बीजा मांगत, तोर हाथ पाहय सब चीज.”
दुखिया हा कोदिया ला संउपिस, सबो साग के ठोसलग बीज
कोदिया किहिस -“बता तंय कीमत, एकर कतरा रुपिया देंव ?”
दुखिया कथय -“लेंव नइ रुपिया, जहां साग हा फरिहय खूब
मंय चोराय बर बारी जाहंव, करिहंव उहां चोराय के काम.
तंय मोला टकटक देख लेबे, मगर क्षमा करबे सब दोष
खूब साग ला टोरन देबे, कीमत हा हो जहय वसूल.”
“तंय हो गेस अटल युवती पर, बचपन के चंचलता शेष
नवा आदमी धोखा खाही- दुखिया हवय निर्दयी क्रूर.
पर मंय तोर नेरुवा तक जानत, तोर नहीं मं हे स्वीकार
छिपे क्रोध मं सहृदयता हा, छिपे घृणा मं आदर स्नेह.”
कोदिया साग के बीजा ला धर, उहां ले रेंगिस मन संतोष
अंकालू हा दुखिया ला कहिथय- “तोर बहुत झन रिश्तेदार.
लहुट जथय तोर मौसी हा तंह, गप ले आथय मामी तोर
मामी लहुटत स्वार्थ सिधो के, तुरुत तोर काकी हा आत.
आखिर कतका हें संबंधी, गिनती करा गणित ला जोड़
गांव मं जतका बुढ़ूवा बुजरुक, जमों आंय तोर रिश्तेदार ”
दुखिया किहिस- “तिंही बोले हस बुजरुक मन ला आदर देव
तब सब ला प्रणाम करथंव मंय, उंकर ले मंगथंव आशीर्वाद.”
अंकालू ला भूख हा ब्यापत, दुखिया परसिस भोजन शीघ्र
अंकालू हा जेवन नावत, बड़े कौर धर आंख पंड़ेर.
इही बीच मं दुखिया बोलिस -“लड़त फकीरा अउ सोनसाय
उंकर विवाद सुने हस तंय हा, आखिर मं का निर्णय होय ?”
अंकालू बोलिस -“का होहय-उहिच होय जे निश्चय पूर्व
याने सबल ले निर्बल हारत, कपटी ले निश्छल के हार.
मोतीखेत फकीरा के सुन, पर सोनू के हक लग गीस
आज धनी ले दीन हार गिस, हम बोकबोक देखत रहि गेन.”
“तुन जानत अन्याय हा होहय, फिर काबर मुड़ नावत व्यर्थ !
अन्यायी के मदद करत तुम, तुम्हर घलो हे नंगत दोष.”
“अगर अपन घर लुका के रहिबो, कभु अन्याय खत्म नइ होय
हम ओ जगह मं खत्तम जाबो, गलत न्याय अउ अत्याचार.
अन्यायी के काम जांचबो, तौल तौलबो ओकर शक्ति
लगही पता पोल दुर्बलता, उही ला कहिबो पास तुम्हार.
निपटे के उपाय ला सुनिहव, अनियायी संग करिहव युद्ध
थोथना भार उलंडही दुश्मन, युद्ध मं तुम्हर निश्चय जीत.”
“ददा, तंय बतावत हस ठंउका, झप नइ मिलय ठिंहा उद्देश्य
कई पीढ़ी हा आहुति देथय, भावी हा अमरत उद्देश्य.”
“अब मोला विश्वास तोर पर, तंय चुन सकत स्वयं के राह
जइसे मछरी के पीला मन, तउरे बर सीखत हें आप.”
“हां, अब चर्चा बंद करन हम, शांति साथ तुम जेवन लेव
समय शांत हो- बहस होय झन, आत अनंद देह ला लाभ.”
अंकालू हा जेवन नावत, मुंह मं लेगत सरलग कौंर
बस जेवन तक ध्यान ला राखत, बुद्धि जात नइ दूसर ओर.
बछर हा जइसे क्रमशः बढ़थय, घंटा पहट दिवस सप्ताह
होगिस खतम धान के बांवत, कृषक धरत भर्री के राह.
कोदो बीज मं मिला अमारी- तिली बाजरा मूंग उरीद
पटुवा खमस मिंझार छींच दिन, चलत हवय जस जुन्ना रीत.
एकर बाद मं नांगर जोंतिन, हांक दून आंतर नइ होत
जलगस अंड़े बुता नइ उरकिस, मारन कहां सकत गप गोठ !
धान जाम के कुछ अउ सरकिस, हर्षित होत कृषक हा देख
दूबी कांद हेर के फटकत, बिरता ला पहुंचय झन हानि.
ददा अपन बेटा ला पालत, करथय उदिम भविष्य बनाय
कृषक चिभिक कर खेत सजावत, सनसन उठय फसल के बाद.
अपन खेत मं गीस गरीबा देखत धान के पौधा ।
ओमन बढ़त सनसना तंहने होत प्रसन्न गरीबा ।।
पर दूबी अउ कांद घलो हें, जेहर छेंकत फसल के वृद्धि
खरपतवार उखान गरीबा, ओला देखत हेरिस बोल-
“धान के बिरता ला देखेंव मंय, मोर हृदय मं भरिस उमंग
लेकिन जानेंव तोर उपस्थिति, मन मं उभरिस कई ठन प्रश्न.
आतंकी अउ देश के अरि मन, अपन राष्ट्र ला करथंय नाश
उंकरे भाई तुमन घलो अव, उत्तम फसल ला करथव नाश.
मंय किसान बिरता के पालक, पौधा मन मोर पुत्र समान
धान के पौधा के रक्षा बर, मात्र मिंही हा जिम्मेवार.
मोर पुत्र मन बाढ़ंय सनसन, तंय झन देन सकस कुछ हानि
पहिलिच ले तोर बुता बनाहंव, किरिया खाय हवंव प्रण ठोस.”
दूबी कांद उखान गरीबा, बना दीस नींदा के ढीक
बांस के झंउहा मं खब जोरिस, अब उठाय बर करत प्रयास.
झंउहा उठा मुड़ी पर राखिस, चलिस मेड़ तन तन तन दौड़
उंहचे जमों कांद ला खपलिस, झंउहा रीता कर लहुटीस.
कतका टेम पता नइ होवत, सुरुज ला राखे बादर तोप
भूख जनावत तभो गरीबा, करतब पूर्ण करत कर खोप.
इही बीच धनवा हा आइस, जेहर ए सोनू के पुत्र
एकर आदत घलो ददा सहि- जलनखोर गरकट्टा भ्रष्ट.
धनवा चिल्ला हूंत कराइस- “ए खरथरिहा, बूता छेंक
घर चल ओंड़ा आत भात झड़, खटिया सुत लव नींद अराम.”
कथय गरीबा- “धनवा भइया, काय बतांव इहां के हाल
खरपतवार ले खेत पटे हे, ओला खन मंय फेंकत मेड़.
मोर बुता हा बचे हे अधुवन, करिहंव पूर्ण आज सब काम
सैनिक हा दुश्मन ला मारत, तब ओला मिल सकत अराम.”
धनवा हेरिस व्यंग्य के वाणी- “तंय कब ले बइला हो गेस
जलगस जोंतई पूर्ण नइ होवय, जुंड़ा हा रहिथय ओकर खांद.
मोर वचन ला कान खोल सुन- तंय झन झेल व्यर्थ तकलीफ
जीवन पाएस सुख अराम बर, पर तंय हेरत तन के तेल.”
व्यंग्य वचन ला सुनिस गरीबा, सब तनबदन मं लग गिस आग-
“तंय हा सोनू के लइका अस, ओकरे सीख चलत हस राह.
तंय हा छोटे रेहेस जेन दिन, तोर पिता गुरुमंतर दिस
सब के संग हंस खेल मजा कर, पर अस्मिता ला अलगे राख.
उनकर स्तर निम्न गिरे अस, तन के घिनमिन दीन दलिद्र
तंय सम्पन्न धनी के बेटा, तोर ओहदा पद हा ऊंच.
दूसर संग तंय प्रेम बना रख, मंदरस मीठ बोल ला हेर
पर वास्तव मं होय दिखावा, अंदर हृदय घृणा ला राख.
मोर साथ मिट्ठी अस बोलत, मगर हृदय मं मारत बाण
तब तंय मोर बात ला चुप सुन, मंहू बतात जगत के सत्य.
हम्मन नित अभाव ला झेलत, तब फिर कहां मजा सुख पान !
दुर्गति रहिथय गाड़ के खमिहा, तलगस भेदभाव के रोग.
कपड़ा कल मं श्रमिक कमाथय, चुहा पसीना जांगर टोर
सब के तन ढंक के पत राखत, मगर ढंकत नइ खुद के लाज.
पर के भोभस मं भर देवत, रड़ श्रम कर किसान मजदूर
अपन पोटपोट भूख मरत नित, सुख सुविधा ले रहिथंय दूर.
यदि तुम धनवन्ता मन चाहत, होय श्रमिक पर झन दुख भार
अपन धन दोंगानी ला बांटव, लूटव झन पर के अधिकार.”
“तोर ददा हा धन कमाय अउ, मोर चई मं सुपरित दीस
मोर पास आ बांटा देहंव- बोहनी मं थपरा दस बीस.
आज जहर अस बचन ढिले हस, ओकर कसर लुहूं मंय हेर
धधकत आत्मा तभे जुड़ाहय, तब मंय सोनसाय के लाल.”
जरमर करत पढ़त कंस कलमा, धनवा रेंगिस पटकत गोड़
पुनः गरीबा करतब टोरत, कांद अउ निंदा उचात खखोड़.
उदुप एक ठक बिखहर बिच्छी, ओला झड़का दीस चटाक
झार चढ़त सनसना देह पर, ओकर जीव बस एक छटाक.
वापिस होत गरीबा हा अब छोड़ कमाती डोली ।
बाय बियाकुल होगे- मुँह ले निकलत कातर बोली ।।
धनवा ला अमरा लिस तंहने, कहत गरीबा नम्र जबान-
“भइया, तोर मदद मंय मांगत, रंज छोड़ के कर उपकार.
बिखहर टेड़गी हा चटका दिस, झार चढ़त होवत बेहाल
झार उतारे के दवई ला जानत, कर उपचार मोर तत्काल.”
करत गरीबा बहुत केलवली, पर धनवा देवत नइ ध्यान
घाव के ऊपर नून ला भुरकत, देत ठोसरा टांठ जबान.
“खरथरिहा अस मोर बात ला, चुटचुट फांके हस हुसनाक
मोर शरण अब काबर आवत, जा अब बजा काम चरबांक.”
कथय गरीबा- “काम करत मंय, टेड़गी चटका- कर दिस काम
मितवा, बाचिस तोर काम अब- विष उतरे कहि दवई लगाय.”
“यदि तोला बिच्छी तड़कातिस, टांयटांय कइसे धर राग !
आभा मार दुसर ला तंय हा, ए तिर ले पंचघुंच्चा भाग.”
“मंय हा गल्ती करेंव जेन अभि, छोटे समझ क्षमा कर देव
मोला सिरिफ आसरा चहिये, मोर कष्ट ला भिड़ हर देव.
यदि भविष्य मं तंहू अटकबे, मंय हा बनहूं धारन तोर
रेत हा ईंट के मदद ला करथय, तब बन जाथय भव्य मकान.”
“तोर जरुरत होय कभू नइ, तंय जन धन ले कंगलाहीन
अपन मदद मंय स्वयं करत हंव, मंय जन धन ले पूर्ण समर्थ.
बेर हा सब ला रफ ला बांटत, ओकर तिर रफ के भण्डार
चन्दा ले कभु मदद मंगय नइ, चंदा भीख मं मंगत प्रकाश ”
“कोन जीव भावी ला जानत, कभू ना कभु पावत हे कष्ट
ओहर कतको होय शक्ति धर, मदद ला मांगत पर के पास.
होत समुन्दर विस्तृत गहरा, ओकर तिर जल के भण्डार
लेकिन नदी ले पानी मंगथय, आखिर ओहर बनत लचार.
वास्तव मं तंय खूब सबल हस, पर निर्बल ला मंगबे शक्ति
तंय अतराप के धनवन्ता अस, पर गरीब ले मंगबे भीख.”
व्यर्थ बिलमना सोच गरीबा, मीनमेख तज गीस मकान
सुद्धू हा कुब्बल घबरा गिस, अपन टुरा ला केंघरत जान.
सुद्धू चेंध के कारण पूछिस, देत गरीबा सही जुवाप
झार अधिक झन बढ़ जाये कहि, बाप हा सारत दवई ला जोंग.
थोरिक वक्त कटिस तंह सुद्धू, करत पुत्र ले हलू सवाल-
“झार कहां हे- लगत कतिक पन, अपन देह के फुरिया हाल ?”
कथय गरीबा- “झार हा उतरत, कल तक तबियत बिल्कुल ठीक
मगर रहस्य उमंझ नइ आवत, कते दिवस मानवता नीक !
पशु मन एक दुसर ला चांटत, रखथंय सहानुभूति के भाव
चिड़िया मन मं मित्रता रहिथय, चारा खावत आपस बांट.
पर हम मानव बुद्धिमान अन, भाषण देत सुहावन लाम
एकता मैत्री अउ सदभावना, भाषा मीठबंटत उपदेश.
मगर मया हा टूटे रहिथय- मित्र ला देवत घाटा ।
ऊँच नीच हा काबर होथय उत्तर लान तड़ाका ।।
“मोर पास नइ ज्ञान बिस्कुटक, पढ़ नइ पाय ग्रंथ साहित्य
तंय शिक्षित- आधुनिक जानबा, तिंहिच बता-का कारण भेद !”
सुद्धू प्रश्न खपल दिस उल्टा, कहत गरीबा हा कुछ घोख-
“तोला जग के अड़बड़ अनुभव, पर तंय फांसत हस मुड़ मोर.
भेदभाव ले दुरिहा रहिथस, तब तंय मोला उठा के लाय
यदि अंतस मं कपट एक कन, पर के बिन्द ला लातेस कार !
तंय हा प्रश्न के उत्तर जानत, मगर धरेस तंय एक विचार-
बढ़य गरीबा के तर्क क्षमता, तब मंय बोलत मति अनुसार-
एक असन धन के वितरण नइ, छल प्रपंच मानव के बीच
शोषक के पथ बस लूटे बर, शोषक हा चुसात खुद खून.
प्रेम एकता अउ समानता, मानव के जतका गुण श्रेष्ठ
झगरा के चिखला मं फँस गिन, उहां ले उबरई मुश्किल जात.
मनसे देखत अपन स्वार्थ ला, दूसर ला फँसात कर यत्न
तब मानवता राख होत हे, टूटत हवय प्रेम के तार.”
तभे लतेल इंकर तिर पहुंचिस, खोल के बोलत खुद के हाल-
“तीन कांड़ के मोला कमती, तब वन गेंव करे बर पूर्ति.
मोर साथ अउ मनखे तेमन, सोनसाय मण्डल के भृत्य
हम्मन छांटेन पेड़ सोज तंह, बोंग गिराय करेन प्रारंभ.
कट के पेड़ गिरिन भर्रस ले, छांट देन जकना अउ डार
हरु करे बर छंड़ा छालटी, बाद खांद पर रखेन उवाट.
तंहने हम सब वापिस होवत, लुंहगी चल फुरसुदही मार
हंफरत-खांद पिरावत कतको, तभो रुकत नइ हिम्मत हार.
हम्मन मुंह ला चुप कर रेंगत यद्यपि आवत खांसी ।
उदुप सामने दड़ंग पहुंच गिस जंगल के चपरासी ।।
वनरक्षक ललिया के कहिथय- “कइसे जात हलू अस रेंग
खड़े झाड़ बिन पुछे गिराये, वन लगाय का बाप तुम्हार ?
पटकव इहिच मेर सब लकड़ी, तुरुत लिखाव नाम ठंव गांव
यदि आदेश उदेल के भगिहव, एकर बहुत गलत अन्जाम.”
अतका कहि लतेल चुप होवत, सोचत हे घटना के दृश्य
एकर बाद जउन हा बीतिस, कहत उंकर तिर वाजिब बात-
“हम्मन डर मं लकड़ी ला रख, रक्षक पास सुकुड़दुम ठाड़
ओकर शरण गिरेन नीहू बन, पर ओहर हा देत लताड़.
सोनू के नौकर मन बोलिन- “हमला मालिक इहां पठोय
थोरिक मोहलत देव कृपा कर, ठाकुर ला हम लानत शीघ्र.”
रेंगिस परस धरापसरा अउ, खड़ा करिस सोनू ला लान
सोनसाय हा वनरक्षक ला, अलग लेग के लालच देत.
खुसुर पुसुर का करिन दुनों झन, का समझौता सब अज्ञात
हम दुरिहा तब समझ पाय नइ, पर गड़बड़ अतका सच बात.
सोनू मोरे ऊपर बखलिस- “मोर गुमे एक लगता गाय
ढुंढे बर इहां आय भृत्य मन, तेला तंय फंसात हस व्यर्थ.
तंय चोराय डोंगरी झपाय हस, तेकर स्वयं भोग परिणाम
दूसर ऊपर लांछन झन कर, वरना बहुत गलत अंजाम.
सोनू के हुंकी भरिन भृत्य मन, सब जंजाल ले फट बोचकीन
जम्मों दोष मोर मुड़ खपलिन, धथुवा बैठ गेंव धर गाल.
ओमन थोरको सोग मरिन नइ, हार करेंव एक ठक काम-
अपन चीज बस ला बिक्री कर, फट भर देंव दण्ड के दाम.
बिपत कथा ला कतिक लमावंव, गांव मं जब पंचायत होत
सोनसाय के पक्ष लेत मंय, ओला सदा मिलत फल मीठ.
मगर मोर पर कष्ट झपाइस, ओहर मदद ले भागिस दूर
ओकर फाँदा मोर गटई मं, हाय हाय मं मुश्किल प्राण.”
अपन बेवस्ता ला लतेल कहि, होत कलेचुप मुंह ला रोक
कथा ला सरवन करिस गरीबा, जानिस के लतेल फँस गीस.
कथय- “धनी के इही चरित्तर, दया मया नइ उनकर पास
अपन पाप ला पर मुड़ रखथंय, पापी तभो होय नइ नाश.”
इसने किसम बतावत बोलत, संझा होगिस बुड़गे बेर
चलिस लतेल अपन कुरिया बल, मन के व्यथा इंकर तिर हेर.
बइठन पैन बियारी ला कर, कोटवार हा पारिस हांक-
“सुन्तापुर के भाई बहिनी, मोर गोहार ला सरवन लेव.
हे कल ज्वार तिहार हरेली, गांव गंवई के पबरित पर्व
अपन खेत मं काम बंद रख, नांगर फंदई ला राखव छेंक.
भूल के झन टोरो दतून ला, काट लाव झन कांदी घास
परब हरेली ला सब मानो, ओला देव हृदय ले मान.”
सुद्धू कान टेंड़ के ओरखत, राखत हे रक्षित हर बोल
सुनत गरीबा घलो लगा मन, परब हरेली ला संहरात.
सुद्धू हा हरिया के बोलिस- “वास्तव मं ए पर्व हा श्रेष्ठ
जमों क्षेत्र मं हे हरियाली, हरा होत मन हरियर देख.”
रखिस गरीबा प्रश्न कठिन अस- “दीवाली होली तक पर्व
ओमन ला सब कोई जानत, उनकर हवय खूब यश नाम.
मगर हरेली के गुण गावत, देवत सब ले अधिक महत्व
हवय हरेली मं का प्रतिभा- मोर प्रश्न के उत्तर लान?”
“दीवाली होली मन उंचहा, धुमड़ा खेदत करा के खर्च
हर मनसे बर ओमन नोहय, कुछ सम्पन्न के उत्सव आय.
बहुत दयालू परब हरेली, सब झन मना सकत बिन भेद
थोरको आर्थिक हानि होय नइ, हे सजला सुकाल ए पर्व.”
“हाँ, वास्तव मं समझ गेंव मंय, मनसे हा कभु नइ फिफियाय
फोकट मं प्रसन्नता मिलथय, तब तिहार वास्तव में श्रेष्ठ.”
एकर बाद गरीबा सुद्धू लेवत हें खर्राटा ।
बड़े फजर खटिया ला तज के उठगें लउहा लाटा ।।
नित्यकर्म ले निपट गरीबा, गाय गरु खेदिस गउठान
कोठा के गोबर ला हेरिस, खरहेरिस गरुवा के थान.
गंहू पिसान मरकी ले हेरिस, सानिस निर्मल जल मं नेम
लोंदी बनगे तंह थारी रख, जावत हवय खइरखा डांड़.
अमरिस जहां गाय गरुवा तिर, लोंदी ला खवात कर हर्ष
हलू हाथ धन मन ला सारत, धन मन हा कूदत मेंछरात.
“संहड़ादेव” के पास मं पहुँचीस, करिस प्रार्थना श्रद्धासाथ
धरती पर सुत जथय गरीबा, संहड़ादेव ला टेकत माथ.
सुन्तापुर मं जतिक कृषक हें, एकरे असन जमावत काम
गाय गरु एकजई जहां हें, ग्रामीण मन बर तीरथधाम.
हे मंगतू बरदिहा उही ठंव, धरे हे दसमुर-डोंटो कंद
कथय गरीबा ला प्रसन्न मन- “संहड़ादेव ला करेस प्रणाम.
अब ओकर प्रसाद ला खावव, लेकिन सुनव एक सच गोठ-
मलई चाप – मेवा के मिठाई, यने आय नइ उंचहा चीज.
वन के कांदा कुसा ए एहर, नाम हे दसमुर डोंटो कंद
आज के दिवस इही हा बंटथय, तंहू चहत तब कहि के मांग.”
कथय गरीबा- “दे प्रसाद झप, करिहंव ग्रहण प्रेम के साथ
जमों जिनिस मं शुद्धता हावय, पर्व के भी हे निर्मल रुप.
अउ कई ठक हें देवी देवता, ओमन बसथंय मंदिर भव्य
उंचहा वस्तु प्रसाद मं लेवत, गहना पहिरत हीरा सोन.
पर ग्रामीण के ग्राम देवता, जेकर नाम हे संहड़ादेव
खुले अकास के नीचे खुश हे, ओकर तिर नइ कुछ टिमटाम.
देवता हा प्रसाद मं लेथय- जंगल के जड़ी बूटी कंद
एकर देह हवय बिन गहना, आज प्राकृतिक हे हर चीज.”
मंगतू हा प्रसाद ला अमरिस, लीस गरीबा लमा के हाथ
हर्षित मन प्रसाद ला खावत, हृदय मं रख श्रद्धा के भाव.
पिनकू उंहचे रिहिस उपस्थित, जेन आय कालेज के छात्र
कहिथय -“दाई हा इहां भेजिस, ओकर बात मान मंय आय.
धन मन ला लोंदी खवाय हव, याने होय पिसान के खर्च
लेकिन मोर उमंझ ले बाहिर- काबर करत गलत अस काम !
मनसे बर अनाज के कमती, उंकर जरुरत सदा अपूर्ण
तब गरुवा ला कार खवावन, आखिर एकर ले का लाभ ?”
मंगतू तिर मरकी तेमां उबले कांदा के पानी ।
उही नीर ला नरा मं भर के पिया दीस भैंसा ला ।।
मंगतू हा पिनकू ला बोलिस- “पशु के ऋणी आन इन्सान
गाय-भैस मन दूध पियाइन, तभे हमर जीवन बच पैस.
बइला-भंइसा करिन परिश्रम, तब उबजिस हे ठोस अनाज
ओला हम्मन खाय पेट भर, तभे बचान पाय हम जान.
वास्तव मं पशु मन उपकारी, उंकर खवाय ले हमला लाभ
यदि घिव हा खिचरी मं छलकत, खबड़ू पावत उत्तम चीज.”
पिनकू कथय- “ठीक बोलत हस, मंय हा शहर मं देखेंव दृष्य
उहां के स्वार्थी मनखे मन हा, गाय भैंस के दूहत दूध.
लेकिन दूध दुहई रुकथय तंह, मार पीट के देत निकाल
पशु मन किंजरत आवारा अस, दुर्घटना के होत शिकार.
अगर एक के टांग हा टूटिस, दूसर पेट बड़े जक घाव
बिना सुरक्षा के बपुरा मन, असमय जात मौत के गोद.”
“मानव होथय क्रूर भयंकर, उंकर कथा ला फुरिया देस
उंकर स्वार्थ के पूर्ति तभे तक, पशु के सेवा करथंय खूब.
पर पशु मन असहाय हो जाथंय, सड़क मं छोड़त हें मर जाय
एहर सहृदयता के दुश्मन, बिन मुंह पशु पर अत्याचार.”
कुछ रुक मंगतू हा फिर बोलिस- “पिनकू, तंय हस निश्छल जीव
पशु ला भूखा भटकत पावस, उनकर सेवा कर बिन स्वार्थ.
पशु के कमई ला खा के बाढ़ेस, तुम पर हवय कर्ज के बोझ
सेवा करके बोझ उतारो, पशु ला अपन हितैषी मान.”
पिनकू हा स्वीकार लीस फट, तभे उहां धनवा हा अैस
ओकर आंख मं रकत हा छलकत, नाक फुसन अकड़ावत बांह.
देखिस उहां गरीबा ला तंह, बोलिस गरज गिरे अस गाज-
“अरे गरीबा, नाश करत हस, सुन्तापुर के रीति रिवाज.
हम्मन गांव के परमुख मालिक, दीवाली उत्सव जब आत
हमर जानवर के टोंटा मं, सोहई बंधत हे सब ले पूर्व.
यने जतिक अस हवय काम शुभ, हमर हाथ ले होत मुहूर्त
पर तंय हा बुगबुग आगू बढ़, चरपट करेस कार्यक्रम आज.
हमर ले पहिली कार आय तंय, पशु ला लोंदी कार खवाय
संहड़ादेव के कर देस पूजा, आखिर कोन दीस आदेश ?”
कथय गरीबा हा अचरज भर- “धनवा, तंय हा क्रोध ला थूंक
मंय हा आय तोर ले पहिली, तब पहिली पूजा कर देंव.
पूजा-सेवा सहायता मं, स्पर्धा भावना हा व्यर्थ
पूजा मं श्रद्धा भर चहिये, मात्र दिखावा बिल्कुल व्यर्थ.”
“पर एहर हा गांव नियम ए, टोरे के अधिकार मं रोक
पर कानून ला तंय टोरे हस, यने करे हस तंय अपराध.”
“अच्छा ग्राम के नियम बताएस वाह रे धनवा भैय्या ।
होय तोर यश-प्रमुख बनस तंय-बाढ़य स्वार्थ खजाना ।।
लेकिन ओहर ग्राम नियम नइ, ग्राम नियम ला एतन जान
सबला मिलय लाभ बाढ़य यश, होय गांव के उचित विकास.
ग्राम नियम पर सदा चले हंव, संस्कृति के करे हंव सम्मान
संहड़ादेव ला तंय जानत हस, हुड़बुड़हा पथरा भर आय.
यदि ओकर पर मुड़ ला पटकत, मुड़ फुट के बन जाहय घाव
मगर गांव के संस्कृति ए तब, पूजा कर मंय करेंव प्रणाम.”
“तंय रख तर्क होत हस विजयी, पर वास्तव मं गल्ती तोर
मोर सदा हिनमान करे हस, काम के बीच बने हस आड़.”
“तंय हा अइसन किसम के वन अस, जिहांं बिछे हे शिला विशाल
लेकिन हवय हहर हेल्ला अस, एको ठक नइ हरियर पेड़.
तइसे तंय हस धनी प्रतिष्ठित, लेकिन शालीनता के अभाव
बात बात मं लांछन डारत, दूसर ला करथस बदनाम.”
“छोटे मनसे- बात बड़े कर, झन गरमा मोर मथे दिमाग
इहां तोर आवश्यकता नइ, तुरुत हटा थोथना-चल भाग.”
तुरुत गरीबा उत्तर देतिस, इही बीच बइला हा अैस
चांटिस खूब गरीबा ला अउ, मुड़ ला घंसरिस ओकर देह.
कथय गरीबा हा धनवा ला – “टकटक देख ए पशु के काम
लड़ई विवाद ला रोक लगावत, उग्र दिमाग ला कर दिस शांत.
एहर कहत- तिहार ला मानो, पशु पक्षी कीरा इंसान
सदभावना रखव आपुस मं, भेद जाय गोरसी के आग.
पर तंय मोला भगय कहत हस, तब एकर बर झन कर फिक्र
तोर ले पहिली इहां आय हंव, तब मंय लहुटत तोर ले पूर्व.”
अपन मकान गरीबा लहुटिस, साफ करिस कृषि कर्म के अस्त्र
एक जगह मं रेती डारिस, तंहने पुरिस पिसान के चौंक.
उही पवित्र जगह पर रख दिस, नांगर जुंड़ा कुदारी तीन
साबर हंसिया रापा गैंती, उंकर करत हे पूजा पाठ.
बिनती बिनो तियार गरीबा, जंगी पहुंच के खावत मांस-
“कका, बना गेंड़ी मंय चढ़िहंव, स्वयं लगा डोरी अउ बांस.
कुछ लाने बर मोला कहिबे, पर मंय हा बिल्कुल असमर्थ
दया मया कर तिंहिच पुरो सब, काबर के मंय तोर भतीज.”
सुनिस गरीबा तंह मुसकावत, हेरिस बांस मोठ अस छांट
आरी मं दू डांड़ तुरुत चुन, खिला धरा दिस लगा उवाट.
खीला पर घोड़ी पर पाऊ, नरियर बूच रज्जु दिस बांध
ओमां माटीतेल रुतोइस, आग मं सेंकिस कुछ क्षण बाद.
बनगे तंह जंगी चढ़ रुचरुच मचत बिकट के गेंड़ी ।
ओहिले भागत मार कदम्मा उठा थोरकिन एंड़ी ।।
रंगी रज्जू गुन्जा मोंगा- सब के संग मं गिजरत खोर
आगू होय चलत स्पर्धा, जउन प्रथम ते बनत सजोर.
रंगी बेलबेलहा गेंड़ी ला, गज्जू पर अंड़ात टप ताक
गज्जू गेंड़ी मचत तेन हा, चिखला मं गिर गीस दनाक.
गुन्जा-मोंगा टुरी मन हांसत, गेंड़ी मं भागिन कुछ दूर
गज्जू कपड़ा झर्रावत उठ, जम्हड़ धरे बर पीसत दांत.
पर रंगी हा पकड़ाइस नइ, खुद ला साफ बचा रख लीस
इसने लड़-मिल लइका मनहा, मानत सुघर हरेली पर्व.
इही बखत मंगतू मन निकलिन, पकड़े दसमुर-लीम डंगाल
लइका करथंय झींका पुदगा, उंकर काम मं पारत बेंग.
मंगतू कथय- “डाल झन झटकव, मोर प्रश्न के उत्तर देव
मंय खुद तुमला डाली देहंव, ओकर साथ मया चुचकार.
पेड़ ले हमला लाभ का हावय, ओहर देत कतिक ठक सीख
अगर जगत हा पेड़ ले खाली, तब ओकर बिन का परिणाम ?”
रंगी कथय- “शुद्ध पुरवाही, बीज फूल फल कठवा देत
पेड़ के ऊपर खेल करत हम, ओकर बिन जीवन हा शून्य.”
“यद्यपि तुम्मन बेलबेलहा हव, मगर रखत हव बुद्धि कुशाग्र
प्रश्न के उत्तर सही रखे हव, अमर लेव मनचही इनाम.”
मंगतू हा डंगाल बांटिस तंह, लइका मन खिल गिन जस फूल
चरवाहा मन सब घर जावत, उंकर इहां खोचत हें डार.
मगर गरीबा के घर तिर गिन, उंकर ठोठक गे रेंगत पांव
कथय गरीबा -“कार रुकत हव, तुम सीधा मोर घर मं आव.
बेंस ला हरदम खोल के रखथंव, स्वागत पावत हर इंसान
तुम्हर पास हे हरियर डारा, मोर दुवारी मं झप खोंच.”
मंगतू कथय- “का बतावन भई, हम नइ आन सकन घर तोर
अब डाली तक खोंचई हे मुश्किल, याने सब तन ले असमर्थ.”
“तुम्मन अचरज मं डारत हव, तुम्हर साथ मं नित सदभाव
सदा लड़ई झगरा ले दुरिहा, एक जिनिस ला खांयेन बांट.
तंय दैहान मं खुद बलाय अउ देस प्रसाद के बांटा ।
मगर शत्रुता कहां ले आइस – आये बर हे नाही ।।
“तंय हा धनवा संग झगड़े हस, ओकर होय गजब हिनमान
उही हा हमला छेंक लगा दिस, तब नइ आवत हन घर तोर.”
“तुम बोलत तब मंय मानत हंव, मंय हंव खूब लड़ंका बंड
धनवा के तोलगी झींके हंव, ओकर होय नमूसी आज.
मगर तुम्हर संग सदा मित्रता, अभिन बलावत करके मान
आये बर हे ढेकाचाली, एकर कारण ला कहि साफ ?”
“यदि हम तोरे घर मं जाबो, धनवा हा लेहय प्रतिशोध
पशु के चरई बंद कर देहय, तुरुत बंद बरवाही के दूध.
चरवाही हा मिलन पाय नइ, हमर सबो बल ले नुकसान
धनवा के अभि राज चलत हे, तब हम चलबो ओकर मान.”
“यदि तुम मोर मकान मं आवत, तुम्हर होत नंगत नुकसान !
तब बिल्कुल तुम भूल आव झन, मोर ले हरदम दूर भगाव.
वर्तमान मं लाभ दिखत कई, सच मं काटत खुद के गोड़.
धनवा हा दबात हे तुमला, करत तुम्हर पर अत्याचार
सांप दिखब में अति आकर्षक, मगर चाब के लेवत प्राण.”
“ए सच ला हम खुद जानत हन-हमर भविष्य कुलुप अंधियार
पर मानव हा तुरुत ला देखत, तब मानत धनवा के रोक.
गलत राह पर चलत विवश बन, इही मं खावत सुख के जाम
यदि सुख के कुछ समय मिलय तब, मनसे लेवय निश्चय लाभ.”
मंगतू चरवाहा मन चल दिन, करिन गरीबा के अपमान
ओहर खावत अबड़ घसेटा, तभो ले लेगत आगू पांव.
मुड़ी उठा देखिस अकास तन, करिया बादर गहगट छाय
एक के ऊपर दुसर चढ़त हे, मानो लगे विजय बर शर्त.
पानी के बड़े बूंद हा गीरत, तरुत गरीबा अंदर अैस
रमझम पानी दड़दड़ा गीरत, जेला कथंय-सुपा के धार.
परवा छेद गीस भीतर जल, लिपे भूमि ला कर दिस छेद
दउड़ गरीबा टपरत टप टप, पर हर ठौर चुहत रेदखेद.
सुद्धू कहिथय- “जल अंदर निंग, हमला देत सुघर अक सीख-
बिपत के दिन हा निश्चय मिटिहय, अब नइ लगय मंगे बर भीख.
बिजली कड़कड़ चमक के बोलत- जइसे होवत दमक अंजोर
कष्ट के करिया रात भगाहय, बनिच जहव दलगीर सजोर.”
कथय गरीबा-मोर घलो सुन, यदपि भेद नइ प्रकृति पास
पर ओकर बनाय दर्शन ला, मानव करथय चरपट नाश.
सम बरसा कुचरत हे सब तन, होहय फसल कचाकच धान
मगर भिन्नता हवय उपस्थित, वितरण प्रथा मं कई ठक दोष.
एकर कारण अइसे होहय- अन्न हा सरही भरे गोदाम
जेन जिनिस ला मनखे खातिन, ओहर नाश बिगर उपयोग.
दूसर डहर किसान श्रमिक मन, कमती आय के दीन गरीब
अन्न के बिना भूख मर जाहंय, बेर तभो ले करिया रंग.”
“तोर विचार हा हावय उत्तम, पर झलकत निराश के रुप
एकर मतलब इही होत हे- सब झन बइठ जांय चुपचाप.
खेत कमाय कृषक मन छोड़ंय, महिनत छोड़ भगंय मजदूर
दीन आदमी प्राण ला तज दें, जग के जमों बुता रुक जांय ?”
“वास्तव मं मंय अइसे चाहत- महिनत कर पुरोंय सब काम
फल ला पाय के कर लें चिंता, मात्र भाग्य पर झन रहि जांय.
वाजिब जगह मांग ला राखंय, विनती करंय बनंय कुछ बण्ड
तभे उंकर सुख सुविधा मिलिहय, हरदम बर रक्षित अधिकार ”
सुद्धू मन मं करत तरकना- कहत सोच गुन जोखू ।
ग्रहण लइक सिद्धान्त बतावत-मोर पुत्र नइ फोंकू ।।
पाठक मन ले एक निवेदन- आत जात हे क्षण दिन रात
बार-बार बस उहि वर्णन मं, कथा व्यर्थ अस लमिया जात.
नंगत पानी हा बरसिस तब, टिपटिप डबरा खोंचका खेत
अब किसान मन डोली जावत, ब्यासी बर हे सुघ्घर नेत.
नांगर बइला धरे गरीबा, ब्यासी करे चलत हे खेत
धनवा साथ भेंट हो जाथय, जेकर बरन रकत अस लाल.
मेंछा अंइठत-छाती अंड़िया, मोठ असन लउठी के हाथ
भंव किंजार देखत गरीबा ला, जावत नौकर चाकर साथ.
धनसहाय के धन हीरा हा, जोर भुकर के रोपिस पांव
बाद गरीबा के धन ऊपर, कूद गीस मारे बर दांव.
मगर गरीबा के धन “मोहर” व्यर्थ लड़ई ला टारिस खूब.
पर “हीरा” बरपेली झगरत, तंह मोहर तक देवत जोम.
पंजा उठा दुनों टकरावत, एक दुसर पर झड़कत सींग
पिछू डहर कुछ घुंच पंच घुच्चा, फेर दुचेलत बायबिरिंग.
कथय गरीबा हा हगरु ला -“इंकर लड़ई ला बंद कराव
लड़ई करत यदि टांग टूट गिस, या नाजुक स्थल पर वार
एमन घायल-पंगु हो जहंय, कृषि के काम करन नइ पांय
ऊपर ले हम दवई कराबो, आखिर इंकर अउ हमर हानि.”
हगरु हा खेदिस लउठी झड़, इनकर खतम होय तकरार
पर धनवा हा छेंक लगा दिस-लड़न देव धन मन ला आज.
कुकरा के झगरा देखे हन, पहलवान के देखेन युद्ध
बइला मन के घलो देख लन, आखिर काकर होवत जीत.”
धनसहाय हा जोश देत अब, अपन माल हीरा ला जोर –
“मोर शेर, तंय हा झन घबरा, डंटे रहाव युद्ध के क्षेत्र.
यदि तंय लड़ई मं विजयी होबे, मोर तोर होहय यश नाम
तोर ले काम लेवई हा रुकिहय, खाय पिये बर उचित प्रबंध.”
बिजली मं पानी पर जावत, फैल जथय सब डहर करेंट
जोश शब्द हा आग लगा दिस, लड़त माल मन बन खूंखार.
झड़क गरीबा के धन हा अब हीरा के पखुरा ला जमैस
दरद में हीरा कुबल बिलबिला, देत बोरक्की भग गिस हार.
धनवा हा आन्द उठावत, बेसुध देखत लड़ई के होड़
उरभेटटा हो गिस हीरा संग, खुर मं कंस चपकांगे गोड़.
निज मालिक पर क्रोध उतारत, खूब हुमेलत बिफड़े माल
धनवा हा “हीरा” ला ढकलत, पर अउ धुनत बन महाकाल.
धनवा सब ले मदद मांगथय-हीरा हा गुचकेलत तान
कउनो दउड़ बचावव मोला, बुझे चहत जीवन के दीप.”
भाखा ओरख गरीबा दउड़िस, हीरा हा खेदिस दपकार
धनसहाय ला टंच करे बर, सारत देह बिन दवा भेद.
चले लइक धनवा होइस तंह, रोष कर कथय मुंह फटकार –
“अपन हाथ ला घुंचा गरीबा, मंय नइ चहत तोर उपकार.
तोर माल हा बहुत लड़ंका, ओकरेच कारण दर्गति मोर
मोर माल हा साऊ सिधवा, तभो ले भोला दीस पधोर.
मोर देह भर दरद हा घुमरत, पर तंय मन मं एल्हत खूब
घाव के ऊपर नून ला भुरकत, बड़नउकी मारत कंगाल.”
कथय गरीबा -“काबर बकथस मोर का गल्ती भैया ।
मोर प्रशंसा करे के बदला धरथस मैय्या दैय्या ।।
अपन क्रोध मं अपन चुरत हस, मंय बचाय हंव जावत जान
हिलमिल जिये-बिपत बांटे बर, आय हवन बन के इंसान.
धनवा ओकर बात ला काटिस -“तंय रख बंद अपन उपदेश
तोर ले मंय जानबा अनुभवी, मंय खुद बांट सकत हंव ज्ञान.”
धनवा रेचेक रेचेक कर रेंगिस, खेत अमर गिस थोरिक बाद
काम हा जहां शुंरु हो जथय, धनसहाय हा करथय जांच.
ओकर चक के गणना कर लव-ब्यासी होवत हे जे खार
नांगर रेंगत सरलग गदबद, एकर बाद चलावत धान-
परहा लगत जउन चक मन मं, उहां बहुत अक श्रमिक कमात
ओकर असलग खातू छीतत, दिखत जंवारा अस सब पेड़.
नान नान लइका जेमन हा, खातिन पीतिन करतिन खेल
ओमन चिखला घुसर कमावत, खटत हवंय बालक मन जेल.
चरे केंदुवा घुठुवा तक ले, गोड़ उठाय बर मुस्कुल होत
कनिहा नवे – तन पिरावत कंस, पर अराम के पल हा दूर.
झंगलू शिक्षक उहें पहुंच गिस, नम्र बनैस अपन व्यवहार
धनवा ला सलाह देवत अब, सफल बनाय अपन उद्देश्य –
“एक काम धर आय तोर तिर, सुनबे बात रखत हंव आस
लइका मन ला काम झन करा, ओमन पावत हें तकलीफ.
जीवन शिक्षा बिना अबिरथा, नइ जानंय विकास के बात
ओमन ला छेल्ला कर छोड़व, ताकि भविष्य हा पाय प्रकाश.”
धनवा करखा देख के किहिस -“फोकट ज्ञान इहां झन झाड़.
एमन पढ़े बर अगर जांहय, कोन दिही भरपेट अनाज.
इंकर ददां मन भूख मरत खुद, कहां खा सकत बांट बिराज
खूब तरत खा-अबड़ सोग मर, एमन ला मंय देवत काम
मोर भरोसा तीन परोसा, इनकर जिनगी पात अराम.”
“यदि लइका मन शिक्षिका होहंय, तब कृषि क्षेत्र मं रखिहंय ज्ञान
अन्न के उत्पादन पढ़ाय बर, करिहंय खुद नव आविष्कार.
उंकर प्रयत्न हा सफल तंहने, अन्न हा उबजिहय भरपूर
आखिर मं तुम्हरे घर आहय, एमांमात्र तुम्हर हित – लाभ.”
“एक पक्ष भर तंय बताय हस, दूसर ओर मोर हे हानि
यदि लइका मन शिक्षित होवत, तब बढ़ जहय ज्ञान के क्षेत्र.
पूर्ण जगत संग मेल मिलापा, दिहीं अवाज – क्रांति अउ क्रांति
मोर पास वाजिब हक मगिहंय, तुरुत समाप्त मोर वर्चस्व.”
धनसहाय हा मुड़ी उठाथय, लइका मन तन डारिस दृष्टि
कहिथय -“राख जमे अगनी पर, ओला तंय उड़िया झन फूंक.
अगर राख हा उड़के हटिहय, आगू मं बस धधकत आग
आगी हा सब जिनिस ला बारत, बर्फ समान करय नइ शांत.
मोर भविष्य के सुख हा स्वाहा सब तन घाटच घाटा ।
तेकर ले मंय होंव सुरक्षित, बाद होय झन धोखा ।।
यदि तंय मोर नफा देखत हस, बालक मन साक्षर झन होंय
जग के जमों ज्ञान ले वंचित, मात्र कमांय टोर के देह.”
धनवा तर्क ढिलत बेमतलब, सोचत के झंगलू भग जाय
झंगलू चलिस छोड़ओ तिर ला, काबर पथरा पर मुड़ जाय.
ओहिले डहर गीस तंह दिखथय – सनम हा बियासत हें धान
ओकर खटला झरिहारिन हा, कनिहा नवा करत हे काम.
धरे हाथ मं धान के पौधा, दिखत जिंहा पर छटटा ठौर
पौधा उहें खोंच देवत फट, ताकि धान हा सघन चलाय.
तभे सनम के एक माल हा, बइठ गीस चिखला पर लदद
तंह झंगलू हा सनम ला कोचकत -“वास्तव मं मनसे मन क्रूर.
तोर माल के चलना मुश्किल, काबर लेवत काम बलात
बपुरा पशु पर दया मया कर, थोरको झन कर अत्याचार.”
सनम के रिस हा नंगत बढ़गिस, अंइठिस खूब बैल के पूंछ
लउठी ले घलो मरत ढकेलिस, बइला टुडुग हो जथय ठाड़.
सनम हा तंहने मया जनावत, सारत हाथ माल के पीठ
कहिथय – अपन आंख मं देखव – धन हा नइ कोढ़िया असमर्थ.
एहर हवय कमऊ फूर्तीला, पर अंड़ जथय पांव ला रोक
यदि दूसर बइला मिल जावत, उंकरो साथ अंड़ावत सींग.
एहर मोला देत खूब सुख, मोर काम ला करथय पूर्ण
मगर जहां डायली मं उमड़त, मोरा कर देथय परेशान.”
झंगलू गुरु हा हंस के बोलिस -“पहलवान अस हे धन तोर
मूड ठीक तब बैठक मारत, वरना सोवत हे दिन रात.”
उंकर गोठ सुनथय हठियारिन, झंगलू ला कहिथय कुछ हांस –
“गली के ददा ला नइ जानव, पर के निंदा करथय खूब.
अपन दोष ला चुमुक लुकाथय, छोड़त काम बहाना मार
अगर बहाना हा आवश्यक, जानत एक सौ एक उपाय.”
एल्हना सुनत सनम हा भड़किस -“कभू बहाना कोन बनैस
तोर अड़े मं देत पलोंदी, मदद करे बर हर क्षण ठाड़.”
“तोर बोवई मं हल चलात हस, गंहू ला ओनारत मंय साथ.
तंय दौरी ला खेदत तब मंय हा झींकत हंव पैरा ।
धान के बियासी तंय करथस – तब मंय चालत पौधा ।।
झंगलू हा खुश हो के कहिथय -“तुम्मन हव तारीफ के लैक
सुखी गृहस्थ जउन ला कहिथय, ओकर साथ करे हंव भेंट.
तुम्मन पहिली खूब लड़त हव, मगर बाद मं होवत एक
एक दूसरा के पूरक अव, काम पूर्ण करथव बन एक.”
तभे उही डायल बइला हा, नांगर झींकिस लगा के शक्ति
सनम हा हंस झंगलू ला बोलिस -“स्वयं देख बइला के हाल.
मंय हा तोर साथ गोठियावत, तउन ला एहर मारिस रोक
बचे बुता ला झप पुरोय बर, आगू तन लेगत हे पांव.”
झंगलू किहिस – सच बताए हस, ढचरा मारत हे धन तोर
पहली बइठगीस डायल अस, अब लेगत नांगर ला झींक.
अच्छा भैय्या, अपन काम कर, मंय हा चलत हंव अपन राह
जादा बखत व्यर्थ बिलमे मं, काम प्रेम मं अड़चन आत.”
झंगलू हा विद्यालय चल दिस, सनम अपन बूता मं व्यस्त
पुत्र गली के सुध हा आइस, तंह झरिहारिन मंगिस सलाह –
“ए बाबू के ददा, सुन भलुक, काम करे बर जब मंय आय
मोर गली हा नींद मं डूबे, घटकत रिहिस घोटोर कर नाक
पर अब नींद उमचगे होहय, या फिर भूख मं सपसप पेट
ओकर देखभाल बर जावत, इहां बिलमना बिल्कुल व्यर्थ.”
सनम हा तुरुत दीस समर्थन -“तंय हा निश्चय लहुट मकान
बासी खाय विचार आज नइ, रांध के रखबे जेवन तात.”
“मंय हा भात ला बना देहंव, मगर साग मं काय बनांव ?
घर मं कुहुच साग हा नइये, ओकर बढ़े हे घलो दाम.
जिनिस बिसाय के मन हा होवत, पर बिसाय बर हिम्मत पश्त
लगथय – सिर्फ धनी मन जीहंय, ओमन बिसा लिहीं हर चीज.”
“हत रे जकही, काय कहत हस, मनसे पास होय कई शक्ति
भोजन पानी रखय अपन तिर, अन्न ला रखय लौह गोदाम.
मनसे मन हा खूब भूखभरंय, अइसे क्रूर कसम ला खाय
पर प्रकृति हा बहुत दयालू, सब पर छाहित एक समान.
रिता ओदर ला जीवन देथय, रोगीबर हे दवई – प्रबंध
पंगु ला मिलत मदद सहारा, प्रकृति हा ममता के खान.”
सनम हा तुरुत इंगित करथय, जेतन रिहिस चरोटा पेड़
कहिथय – “साग साग चिल्लावत, ओतन देख साग अउ साग.
टोर चरोटा भाजी ला झप, ओला सुघर पका के राख
काम बंद कर मंय घर आवत, तंह जेवन लेहंव भर पेट.”
झरिहारिन हा कहना मानत जाथय एक जगह चिकनौर
उहां गंसागस उगे चरोटा, जिंकर केंवरी पत्ता मौर.
झरिहारिन हा भाजी टोरत, ओली अंदर रखत सम्हाल
सोसन भर भाजी टूटिस तंह, चलत मकान तेज चल चाल.
कुरिया घुसर जांचथय स्थिति-पुत्र गली रोवत हे जाग
बालक गली ला दूध पियावत, एकर बाद सुधारत साग.
भाजी ला झर्रस झर्रस पिट, महिन करिस हंसिया मं काट
सफ्फा जल मं धोइस तब फिर, बेले अस रगड़िस रख खाट.
नरम बनाय चुरोइस गुदगुद, मिरी बघार सुंतई अक तेल
आखिर समय नून ला डारिस, साग बनाय के खेल समाप्त.
ओकर साथ भात हा चुरगे, सनम पहुँच गिस खस लरघाय
झरिहारिन हा जेवन परसत, ताकि मरद हा गप गप खाय.
कभू अन्न नइ देखिस तइसे, सनम सपेटत आँख नटेर
भाजी भात बड़े कंवरा धर, मुँह ले लेगत पेट अबेर.
जल्दी कारण अटक गे तंहने लिलथय पी के पानी ।
भोजन उरक-थार के पइंया परथय उठती खानी ।।
कहिथय सनम- “खाय ओंड़ा तक, कभू खाय नइ जइसन आज
कतेक चहेटेंव साग चरोटा, वर्णन करे मं आवत लाज.
जरमन बर्तन अउर चरोटा, अगर बेसरम पेड़ अभाव
कोन किसम जीवन हा निभतिस, पट पट ले मर जतिन गरीब.”
अपन मकान ले बाहिर आथय, गमछा मं पोंछत मुंह हाथ
झड़ी धान-चरिहा बोहि लावत, पाँच व्यक्ति हें ओकर साथ.
सनम किहिस- “थोरिक तंय रुक जा, धान कहाँ ले लावत बोल
ककरो तिर ले चलऊ लाय हस, नगद नोट मं लात खरीद?”
झड़ी बताइस- धान मंय लावत, एला धनसहाय हा दीस
गांव मं एक झन उही दयालू, करथय मदद कष्ट के बेर.
खेत के निंदई करा डारे हंव, देना हवय श्रमिक ला धान
पत्नी मोर जउन बिस्वासा, ओहर घलो बहुत बीमार.
आधा धान श्रमिक ला देहंव, बचत मं खटला के उपचार
एकर कर्जा ओ दिन छुटही, नवा फसल आहय जे टेम.
खटला पास पैंकड़ा सुंतिया, छूट दुहूं ऋण गहना बेच
मंय हा सत ईमान से बोलत, ऋण ला सीत असन डर्रात.”
झड़ी हा अपने रद्दा चल दिस, मुढ़ीपार के पुसऊ आ गीस
सनम किहिस- “आ बइठ मोर तिर, अपन गांव के फुरिया हाल?”
पुसऊ किहिस- “जे खबर इहां के, मुढ़ीपार तक के समाचार
परहा लगत- बियासी होवत, उहां घलोक काम इहि जोर.
हां, यदि मोर खबर ला पूछत, बाप के फर्ज पूर्ण कर देंव
मोर बड़े छोकरी धरमिन के, बर बिहाव ला निपटा देंव”
सनम हा अड़बड़ हर्षित होथय- ” रिहिस तोर मुड़ बड़ जक बोझ
पुत्री के बिहाव निपटिस तंह, फिकर खतम उतरिस सब बोझ.
समधी अउ दमांद का करथंय, कोन किसम हे आर्थिक हाल
धरमिन हा सब सुविधा पावत, या ओकर होवत छे हाल?”
पुसऊ कथय- “असरु समधी हा, छुईखदान मं हे विख्यात
दूधे खाथय- दूध अंचोथय, भरे बोजाय हे धन सम्पत्ति.
अधुवन कथा सुनस तंय काबर, जमों कथा ला सुन ले आज-
मोर दू टूरी धरमिन- लछनी, एला तंय जानत हस साफ.
धरमिन के बिहाव हा निपटिस, पर लछनी हा बिगर बिहाव
धरमिन के आदत गुण ला सुन, तारिफ लइक मधुर शालीन.
जइसे नाम चाल गुण उसनेच, ना मुंह चनचिन- ना मुंह बांड़
सेवा जतन करे मं अगुवा, कभु नइ बइठय मुहूँ ओथार.
धरमिन हा बिहाव के लाइक, खोजे बर गेंव कमऊ दमांद
जइसे उनुन छुनुन करवइया, निर्मल जल ला पीथय छान.
यद्यपि वर मन मिलंय हजारों, मगर हमर अस कंगला ।
बेटी दुख पाहय कहि के नइ देवंव उत्तर कोई ।।
धर के पसिया मंय हा फिफिया, दउड़ लगाय शहर अउ गांव
धनी दमांद के लालच मं पर, एको कनिक रुकिस नइ पांव.
धरिमन के बिहाव के धुन मं, अइसन काम होय कई बार-
उत्ती डहर भात ला खावंव, बुड़ती करों हाथ ला साफ.
एक जगह मं मिलिस आसरा, सुरु खुरु गेंव छुईखदान
उही मकान गेंव तंह मिल गिस- फंकट नामक एक जवान.
खोजत रेहेंव जउन वर ला मंय, ओहर खड़े हवय मुसकात
अइसे सोच बहुत मन गदगद, भूल गेंव मंय दुख के बात.
ओमन घर बनाय तिनखण्डा, अन धन आय इहें ला खोज
कारोबार देख के चौंकस, मन हा जमगे उंहचे सोज.
फंकट के पालक असरु तिर, मंय हा केहेंव हाथ ला जोड़-
“तोर साथ संबंध जोड़िहंव, अइसे सोच आय हंव दौड़.
जइसे धरमिन हवय बरत अस, दिखब मं फंकट सुंदर रुप
जोड़ तोड़ मं दुनों एक अस, ओमन फबिहंय जस दिन रात.”
असरु गर्व शब्द मं बोलिस- “मंय करिहंव फंकट के ब्याह
पर मन माफिक दाइज लेहंव, तभे काम होहय उत्साह.
फ्रिज कूलर टीवी अउ सोफा, नगदी रुपिया चांदी सोन
हंडा कोपरा पलंग सुपेती, मंय चाहत अतकिच सिरतोन.
यदि दाइज ला पुरो सकत हस, उत्तर देव जेब ला जाँच
यदि इंकार त लहुट जा फट ले, काबर सहस खर्च के आँच?”
सुनते साठ बंधा गे मोर मुंह, नइ दे पाएंव तुरुत जबान
सक ले बाहिर मांग ला देखत, अकबक होगे मोर परान.
पर कुछ बाद लेंव मंय निर्णय- असरु हवय मातबर ठोस
यदि धरमिन ला इहें देत हंव, फूले रहही फूल समान.
मया ला यदि कंगला घर देहंव, ओहर सकय पाट नइ पेट
अपन लगाय बेल ला मंय खुद, हंसिया बन के काटों कार.
धरमिन ला मंय इहें सौंपिहंव, भले खर्च मं मंय भट जांव
पुत्री के भावी बनाय बर, उचित उपाय करों तत्काल.
छाती अंड़ा केहेंव असरु ला- अब तुम देवव आज्ञा ।
जतका असन मांग तंय राखत- तेला करिहंव पूरा ।।
अ्सरु किहिस- “करो तुम जोरा, हम आवत हन पकड़ बरात
सयना सजन के पत ला रखबे, ओमन ला झन होय अघात.”
असरु के घर छोड़ देंव मंय, वापिस मुढ़ीपार आ गेंव
नसना टुटगे जिनिस सकेलत, सब बिखेद ला कतिक लमांव?
ठंउका दिन पहुँचिस समधी हा, मोरेच द्वार बरतिया लैस
ओकर स्वागत करेंव खूब मंय, भर उत्साह नोट ला बार.
बन के निहू बरतिया मन ला, कोंहकोंह जेवन इज्जत देव
तब ले ओमन होले बक दिन, पर अपशब्द ला चुप सुन लेंव.
अब तब भांवर घुमतिस तिसने, घोड़ा अस अंड़ गीस दमांद-
“मोर चढ़े बर फटफटी लानो, वरना मंय नइ करों बिहाव”
पहिली के फुँकाय घर कुरिया, कहाँ पूर्ण होतिस झप मांग
सबो दांत हा टूटगे रीहिस, वरना उही ला देतेंव टोर.
हारे दांव केहेंव मंय केंघरत- “देहूँ बिसा फटफटी एक
लेकिन तुम भांवर ला किंजरो, झन पारो शुभ काम मं बेंग”
बिदा करेंव अपन धरमिन ला, बन के खुद हंसिया बनिहार
अब मंय रहिथंव पर के कुरिया, सदा झांकथंव पर के द्वार.”
पुसऊ के कहना सनम हा सुनथे, एकर बाद देत हे दाद-
“दाई ददा के मन हा होथय, ओकर बिन्द खूब सुख पाय.
यदपि तोर कनिहा हा टुटगे, पर परिणाम मं मिलगे मीठ
धरमिन हा सुख सुविधा पावय, खूब अचक ओकर ससुराल.”
पुसउ तोष- पा उहां ले रेंगिस, तभे गरीबा हा आ गीस
सनम ले कहिथय- “मदद मंय चाहत, फांक उड़ा देबे झन बात.”
सनम हा मुचमुच मुसका बोलिस- “काबर मदद करंव मंय तोर
तोला जब टेड़गी चटकाइस, तंय हा कल्हर करेस हाय हाय.
धनसहाय ला मदद मंगे तंय, पर धनवा कर दिस इंकार
मंय ओकर तोलगी धर चलथंव, तोला कुछुच चीज नइ देंव”
“तइहा के ला बइहा लेगे, ओला तंय सम्मुख झन लान
धनसहाय पर हवय रंज कंस, यदि ओहर अवघट मिल जाय.
ओकर सती गती मंय करहूं, ओकर खटिया दुहूँ उसाल
सपना तक मं मदद करंव नइ, तब साक्षात सदा इंकार.”
“तंय हा बिल्कुल सच बतात हस, धनवा रखत उच्चता भाव
पर ला देख के मुंह मुरकेटत, अंदर रखत घृणा के भाव.
अइसन पेड़ आय धनवा हा, अपन शक्ति पर करत घमंड
ओहर कहिथय- मंय ऊंचा अंव, करथंव बात अकास के साथ.
आंधी पानी कतको आवय, मगर झकोरा ला सहि लेत
कतको बछर के मोर जिन्दगी, अपन मुड़ी ला कार झुकांव!
पर ओहर ए बात ला जानय- जड़ के मदद ले हावय ठाड़
यदि जड़ हा पाती ला तजिहय, पेड़ हा गिर के सत्यानाश.”
एकर बाद सनम हा पूछिस- “काबर आय मोर तिर दौड़
तोला काय जिनिस अभि चहिये, फोर भला तो ओकर नाम?”
“एक दंतारी अगर तोर तिर, मोर पास झप लान निकाल
कोदो फसल दंतारी चलही, ओकर लइक आय हे पाग.
मोर मांग के तुरुत पूर्ति कर, लेहंव तोर मरत तक नाम
दुश्मन तक के मदद ला करथस, तब मंय तोर अभिन्न मितान.”
सनम कथय -“तंय बांस फूल अस, कभू कभू आथस घर मोर
आय हवस तब बिलम टेम तक, अपन हृदय के गोठ निकाल.”
“जानत हस कृषि क्षेत्र मं हावय, समय पाग के बहुत महत्व
अगर किसान पाग ले चूकत, ओकर जमों फसल बर्बाद.”
एक दंतारी दीस सनम तंह गीस गरीबा भर्री ।
उहां माल ला जुंड़ा मं फांदिस – अब होवत हे बूता ।।
धन मन झींकत हवंय दंतारी, आगू बढ़त गरीबा खेद
कोदो फसल मं परत किनारी, ढलगत पेड़ – बचत मन ठाड़.
परत दंतारी तेकर कारण, फसल बाढ़ हा पाहय बाढ़
मानव हा व्यायाम करत तब, ओकर तन बनथय बलवान.
बैठ गरीबा गप नइ मारत, समय हा धन अस देवत मान
धरती के सेवा कंस होवत, ऊपर उठत सनसना धान.
गीस गरीबा खेत एक दिन, जांचे बर बिरता के हाल
धनवा लउठी धरे खड़े तन, नौकर मन हें ओकर साथ.
कातिक हगरु टहलू बउदा – खूब निघरघट उंकर सुभाव
गाय गरु ला खेत मं घुसवा, हरा फसल ला खुद चरवात.
पशु मन फसल ला बिक्कट खावत, राहिद उड़ा – करत बर्बाद
धनसहाय मन देखत तब ले, पशु ला नइ खेदत कर नाद.
ढिलिस गरीबा प्रश्न हलू अस – “चरत तेन मन काकर माल
मोर फसल के रांड़ बेचावत, कार रखंय नइ माल सम्हाल !”
धनवा किहिस किंजार के आंखी- “एमन आय जानवर मोर
चारा एको जगह मिलिस नइ, यद्यपि जांच लेंव हर ओर.
आखिर तोर खेत आए हंव, इहां हवय चारा के ढेर
धान के पाना कोमल गुरतुर, पशु मन खावत चाव के साथ.”
कथय गरीबा निहूपदी बन – “फसल ला राखत हंव दिन रात
मोर भविष्य हवय एकर पर, बिना अन्न के जग अंधियार.
अगर पुत्र पर कष्ट हा आवत, ददा घलो दंदरत हे खूब
अगर फसल हा राख होत तब, देख पाय नइ कभुच किसान.
अपन जानवर ला बाहिर कर, काबर के मंय घलो किसान
मोर फसल के राहिद हा उड़त, कइसे देखंव बन के मूक !”
धनसहाय हा व्यंग्य मं किहिस -“श्रद्धा रखथस पशु पर खूब
परब हलेरी अउ देवारी, पूजा करत नवा के माथ.
स्वयं खवाथस लोंदी खिचरी, आज खान दे धान के पान
महादान के पुण्य अमरबे, ऊपर ले सब तन यशगान.”
“तोर व्यंग्य ला मंय समझत हंव, व्यंग्य काय तेला अब जान –
अगर प्रश्न के उत्तर चाहिये, व्यंग्य थथमरा के असमर्थ.
लक्ष्य के दिल ला आहत करथय, घाव तक बनाथय बड़े जान
मगर घाव ला माड़ जाय कहि, ओकर तिर नइ दवई प्रबंध.
जउन अन्न ला मंनसे खातिन, ओला करत हवस बर्बाद
एहर आय भ्रूण हत्या सुन, तंय हा करत बड़े अपराध.”
बोल गरीबा खेत मं घुसरिस, धन खेदे बर करत उपाय
ओतका मं नौकर चाकर संग, सम्मुख कूद गिस धनसाय.
कहिथय – “अरे गरीबा तंय रुक, गरुवा मन ला झनिच निकाल
अगर बिफड़ ओरझटी ला करबे, निछिहंव तोर देह के खाल.
सोनसाय के पुत्र के संग तंय, कहां सकत हस बजनी बाज !
मन मं मोर जउन सब करिहंव, सुन्तापुर मं हमर हे राज.
उत्ती ला बुड़ती कहवाथन, करु लीम ला स्वादिल आम
हमर बीच झन पर भेंगराजी, वरना मुरई अस परिणाम.”
“मोर खेत अंदर जबरन घुस, आंख देखावत बन हुसनाक
धन ला कांजीहौस लेगिहंव, चल अब बता कतिक हे धाक !
भड़क गरीबा हा उम्मस बन, आगू डहर बढ़ा दिस गोड़
धनसहाय हा उबा के लउठी, बीच पिठवरा उपर जमैंस.
जिव करलाय गरीबा झटकिस, लउठी ला ताकत कर जोर
जहां मइन्ता भोगागीस तंह, धनवा ला कंस दीस पधोर.
“अरे ददा, चोला नइ बांचय, नौकर मन झपकुन तिर आव
अब परिणा कुछुच निकलय पर, गिरा देव गरीबा के लाश.”
धनवाहा नौकर मन ला अब कर दिस आज्ञा जारी ।
उम्हियावत कुचरे बर जड़से – कुकुर लुहात शिकारी ।।
नौकर मन भिड़गिन कुचरे बर, मान अपन मालिक – आदेश
लउठी भंजा कचारत रचरच, पर छेंकात ऊपर सब टेस.
अखरा जानत हवय गरीबा, लउठी थाम ऊपर रख देत
पा अवसान खवा के झुझका, उहू दुहत्था झड़किच देत.
एक डहर बस एक आदमी, दूसर डहर अधिक इंसान
कहां गरीबा हा लड़ सकिहय, आखिर खैस बिकट के मार.
कथय गरीबा हा धनवा ला – “अगर भूल से होवत दोष
तब अपराध हा क्षमा होवत, मनसे पर नइ होवय वार.
मगर जान के गल्ती करथय, रच षड़यंत्र करत नुकसान
तब ओहर के दण्ड के भागी, बढ़त कई गुना ओकर दोष.
बना योजना गलत करे हस, फल ला चीख उही अनुसार
अपन शक्ति भर सम्हल जा तंय हा, मंय हा करत भयंकर वार.”
मरत आदमी काय करय नइ, चभक जमा दिस लउठी एक
धनवा के मुड़ परिस भयंकर, रकत फोहारा देइस फेंक.
हाथ मं टमड़ धनवा देखिस, भगे लगिस घर ओकर गोड
तोलगी धर नौकर मन लहुटत, मालिक संग मं झगरा छोड़.
खाय गरीबा हा कंस झड़कइ, निकलत मुंह ले करुण कराह
ओहर अब पशु मन ला खेदत, सब गरुवा ला दीस निकाल.
दंउचे हवय गरीबा कुब्बल, दरद कुटकुटी चंगचिंग देह
रेचेक रेचेक कर वापिस होवत, मगर चलई तक मुश्किल काम.
धनवा के धन “हीरा” उहिकर, धरिस गरीबा ओकर पीठ
ओकर साध चलत हे धीरे, आखिर गांव गली मं अैस.
कुलुप अंधेरा आंख मं छाइस, गिरिस भूमि मं दन्न बेहोश
दुखियाबती आत उहि बल ले, दृष्य देख के समझिस बात.
धन के पीठ ला सार के कथय -“मनसे के खोलत मंय पोल
ऊपर ले हम स्वागत करथन, पर अंदर ले करथन घात.
हम मनसे मन बुद्धि श्रेष्ठ अन, एकर साथ सहृदय आन
पर बिन स्वारथ मदद नइ करन, मदद के बदला चाहत लाभ.
अगर भूल से देत पलोंदी, तब हम चहत – होय तारीफ
पर – सहायता के बदला मं, हमला होय अर्थ के लाभ.
तुम पशु ला बिन बुद्धि कहन हन, पर वास्तव मं उल्टा बात
तुम्मन सेवा दया करत हव, ओकर एवज मंगव नइ लाभ.
वास्तव मं मनसे मन स्वार्थी, तुम पशु मन उपकारी आव
हमर विचार काम हा नीचा, तुम पशु मन कर्त्तव्य मं श्रेष्ठ.”
धरिस गरीबा ला दुखिया हा, ताकत भर कबियात उवाट
लैस गरीबा ला खुद के घर, ढलगा दीस बिछा टप खाट.
आगी बार गरम पानी कर, बुड़ो निकालत साफ कपास
घाव के बहत लहू ला धोइस, लेत गरीबा नइ कल्दास.
पूरा तन भर डोमटा सूजन, चर चर उपके करिया लोर
घी गोंदली मं दुखिया सेंकत, ताकि दरद झन मारय जोर.
टप टप ताते तात मड़ावत, पात गरीबा हलू अराम
थोरिक बाद नटेरत सब बल, खंइचत सांस पेट ले लाम.
दुखिया कथय -“लगत कतका पन, का दुख होवत देव जुवाप
कोन आदमी तोला दोंगरिस, काय करे तंय काम खराब ?”
दुखिया बती जुवाप ला मांगिस, लगिस गरीबा कथा बतान
थोरिक बाद सेंकई ला रुकवा, जाय चहत हे अपन मकान.
दुखिया कथय -“बिलम अउ थोरिक, मंय हा करत हकन के सेंक
खरथरिहा, तंय टंच असन बन, तोला नइ छेंकव कर टेक.”
दुखिया के सुभाव ला परखिस, तहां गरीबा होत प्रसन्न
करत प्रशंसा मन के अंदर, पर मुंह खुलगे अपने आप –
“तोर नाम दुखिया हे तइसे, देखस नइ पर के तकलीफ
यदि ककरो पर बिपत हा आथय, देथस मदद बिपत कट जाय.”
दुखिया कथय -“गलत बोलत हस, मोला व्यर्थ चढ़ात अकास
अभिच प्रशंसा करत तउन ला, बाद मं करते इहि विश्वास.”
सुर के साथ दुनों बोलत तब, पहुंचिस भीड़ करत चिरबोर
ओमन क्रोधित दिखत भयंकर, अंदर मं निंगगिन दोर दोर.
चोवा कथय – “कहां घुसरे हस हमर गरीबा दादा ।
कतेक निघरघट बली लड़ंका तोर हेरबो खादा ।।
भगवानी बोलिस -“देखव तो – लड़ई करिस धनवा के साथ
पर घर घुस पत लुटे चहत अब, झींकत हे दुखिया के हाथ.
नथुवा कथय -“इहां झन बोलव, तर्क वितर्क रखव तुम छेंक
एहर खुद ला दुखी बताहय, खसक जहय फट धोखा मार.
एला ग्राम सभा मं लेगव, उंहचे घालुक दिही जुवाप
मरत दोहन वाजिब उछरांबो, उफलय बदकरमी के पाप.”
आंख नटेर गरीबा देखत -“एमन काय लगावत दोष
मोला कुछुच उमंझ नइ आवत, काबर करत व्यर्थ के रोष ?”
थोरिक कहना चहत गरीबा, मगर भीड़ पर चढ़े हे जोश
जब दिमाग मं गर्मी रहिथय, समझत कहां न्याय अन्याय !
करिस गरीबा हा विरोध कंस, तभो चिंगिर चांगर धर लीन
मरे मरी अस घिरलावत हे, बइठक बीच लान पटकीन.
जउन व्यक्ति हा कभू आय नइ, ओला कतको देव अवाज
पर ओमन लफड़ा सुन दउड़िन, खावत अन्न के करदिन त्याग.
करत बइसका सइमों सइमों, बोलिस भुखू लगा कंस जोर –
“भाई बहिनी, होव कलेचुप, काम बीच पारो झन आड़.
अगर जेन ला कुछ गोठियाना, बिन भय फोरय अपन बिखेद
हरचंद असन नियाव हा टुटही, मां मउसी सहि भेद नइ होय.”
सोनू बोलिस अमर के अवसर -“छोटे बड़े देव सब कान
अतियाचारी बढ़त दिनों दिन, लाहो लेत कलऊ बइमान.
जांचव तुम गरीबा के करनी – जउन दिखब मं साऊ नेक
ओहर मोर टुरा ला कुचरिस, व्यर्थ – बिना कारण कर टेक.”
धनसहाय हा केंघर के बोलिस -“मोर ददा हा बोलत ठीक
लड़िस गरीबा व्यर्थ मोर संग, जबकिन मंय हा बिल्कुल शांत.
ओहर मोला दोंह दोंह कुचरिस, मुड़ ले बोहत छल छल खून
तुम्मन अपन आंख ले देखव, अउ गवाह ले सच ला पूछ.”
सोनू हा धनवा ला बोलिस -“बंद राख तंय अपन जबान
तंय निर्दोष बताबे खुद ला, मगर तर्क हा अस्वीकार.
साक्षी मन के बात हा चलिहय, प्रस्तुत करिहंय सतम प्रमाण
उंकर तर्क हा मान्य हो सकथे, ओमन ला अब बोलन देव.”
सोनू हा ग्रामीण ला बोलिस -“सुनव गरीबा के सच हाल
धनवा हा बचपन के मितवा, तेला कुचरिस क्रूर समान.
तंहने अंकालू के घर घुस, पत लूटे बर करिस प्रयास
यदि मंय बुढ़ुवा कहत लबारी, पूछव साक्षी ला सच हाल.”
झड़ी हा बउदा ला पूछिस – “झगड़िन धनसाय गरीबा ।
तंय खमिहा अस उहां रेहेस अब फुरिया सत्य कहानी ।।
बउदा किहिस – “निसंख आंव मंय, कोन सकत हे दपकी मार !
मंय ककरो तिर घूंस खाय नइ, जेमां मंय हा बोलंव झूठ.
घटना जगह जउन देखे हंव, ओला मंय बतात हंव साफ
धनसहाय हा गरूवा मनखे, ओकर एकोकन नइ दोष.
यदि ओहर हमला नोखियातिस, खातिस मार गरीबा खूब
हम्मन शांति धैर्य पर निर्भर, मगर गरीबा मं अति क्रोध.”
झड़ी हा भगवानी ला पूछिस -“तंय अंकालू के घर गेस
उहां गरीबा रिहिस उपस्थित, देखे हवस उहां के हाल.
करिस गरीबा हा का करनी, ओहर दुश्चरित्र के नेक
ग्राम सभा मं सच सच फुरिया – निर्भय बन के बिगर दबाव ?”
भगवानी बइठक ला बोलिस -“मंय जब दुखिया के घर गेंव
उहां रिहिन चोवा नथुवा मन, उंकर साथ कतको ग्रामीण.
दुखिया के इज्जत लूटे बर, उहां गरीबा करत प्रयास
एकोकन अनर्थ झन होवय, लाय गरीबा ला हम झींक.”
केजा हा घलो सभा मं हाजिर, किहिस गरीबा ला भर क्रोध –
“साक्षी मन के बात सुने हन, अब तंय अपन पक्ष ला बोल.
मगर ध्यान रख सत्य बताबे, क्षमा दान करबो मन सोग
यदि एकोकन करत छमंछल, हरदम बर बनबे विकलांग.”
अपन बात ला रखत गरीबा -“घटना जउन सुनव विस्तार
गंगा बीच झूठ नइ बोलंव, भले गांव ले खुंटीउजार.
पहट निंगाय खेत मं धनवा, स्वयं खड़े रहि बिकट चरात
गरुवा ला भगाय बर बोलेंेव, तंहने जबरन लड़ई उठैस.
नौकर संग मिल मोला दोंगरिस, अपन बचाय मंहू कुचरेंव
झगरा बाद जहां मंय लहुटत, मुरछा खा भर्रस गिर गेंव.
दुखिया बती सोग मर कबिया, लेगिस घर बचाय बर जान
मोला सेंकत तेन बीच मं, भीड़ घुसर गिस भितर मकान.
हाथा बैंहा कहां धरे हंव, जेमां लगत गलत इल्जाम
अगर झूठ गोठियात बचे बर, दुखिया धरय बिगर भय नाम.”
दुखिया खूब सोच के बोलिस -“कहत गरीबा हा सच बात
हम महिला मन दोष मढ़त हन, नर के होत चरित्तर नीच.
महिला के इज्जत ला लूटत, होत उंकर पर अत्याचार
महिला सहानुभूति ला पावत, परत पुरूष पर हर एक दोष.
मगर पुरूष मं कहां हे ताकत, महिला ला छू सकत बलात !
महिला हा स्वीकृति देवत तब, पुरूष के साहस हा बढ़ जात.
याने मंय कहना चाहत हंव – हवय गरीबा हा निर्दोष
गलत प्रयास भूल नइ जोंगिस, किरिया खा के सच कहि देंव.”
केजा ला आपत्ति हो जाथय, ओहर कथय व्यंग्य के साथ –
“दुखिया तोला वाह वाह हे, खूब कमाल करे हस आज.
अगर गरीबा दोसिल होतिस, बपुरा हा होतिस बदनाम
तंय हा दुश्चरित्र कहवाते, तोर ददा के इज्जत नाश.
आज गरीबा ला बचाय हस, ओला तंय कर देस बेदाग
एकर संग मं तहूं सुरक्षित, तंय हा चरित्रवान बन गेस !”
अब सोनू मण्डल सन्नावत -“मंय गोठियात तेन सच बात
देख – गरीबा अउ दुखिया मन, मुड़ देके पेलत सब गोठ.
सुन्ता प्रेम हवय इनकर मं, आज जान हम उदुप अवाक
अंकालू के इज्जत जाही, कटा के रहही ओकर नाक.”
अंकालू के मइन्ता भड़किस, कथय गरीबा ला कर क्रोध –
“तंय हा परे डरे बेर्रा अस, काटत हस हम सब के नाक !
ऊपर ले सिधवा अस दिखथस, पर किराय भितरंउधी चाल
जतका तोर खराय जवानी, बीच बइसका दुहूं निकाल.”
अंकालू के क्रोध ला देखिस, तंहने भुखू करत हे शांत –
“तंय आगी मं अभी कूद झन, रख दिमाग ला बिल्कुल शांत.
आय पंच मन न्याय करे बर, ओकर दुर्गति होहय आज
पता गरीबा के लग जाहय, कतेक असन बकचण्डी छाय !”
सोनू बोलिस – “सुन अंकालू, तोर टुरी – मोर टुरी समान
ओकर चाल ले महूं दुखी हंव, काकर तिर मं करों बखान !
यद्यपि मंय प्रतिशोध ले सकथों, मार गरीबा ला बिछा जमीन
पर अइसन मं न्याय मिटाहय, सुघर राह के खुंटीउजार.”
सब मनसे ला आरो देइस -“अपन विचार कहव तुम साफ
बुता बनात गरीबा के – या, कहि निर्दोष – करत हव माफ ?”
सब ग्रामीण सुंटी बंध बोलिन – “देव गरीबा ला कंस दण्ड
ओहर कर्म के फल ला चीखय, क्षमा पाय झन ओकर पाप.”
किहिस झड़ी हा – “अरे गरीबा, मोर न्याय सुन खोल के कान
धनवा साथ लड़े हस फोकट, आज जमाय कुजानिक काम.
यदि हम तोला क्षमा करत हन, तोर नीति सुधरन नइ पाय
तेकर कारण दण्ड देत हन, ताकि खूब डर झिंकस लगाम.
दुखिया साथ अगर गोठियाबे, टोर देब हम मुंह ला तोर
मुंह करिया कर हमर गांव ले, भग कहुंचों सुन्तापुर छोड़.”
बन्जू हा खुश हो के बोलिस -“बिगर संरोटा झड़े नियाव
मुरूख गरीबा अस मनसे ला, गांव ला छोड़वा के टसकाव.”
नवागांव ले सुध्दू लहुटिस, मार पाय नइ थोरको सांस
खबर ला सुन बइठक तिर दउड़िस, मनसे मन से मंगत जुवाप.
कहिथय – “मंय हा कुछ नइ जानंव – तुम सत्तम समझाओ ।
करिस गरीबा काय कुजानिक – मोर पास फुरियाओ ।।
सब बिखेद ला चोवा फोरिस, सध्दू सुनिस कान ला टेंड़
कहिथय -“काबर सोग मरत हव, एला भेज देव अभि जेल.
कार जबरवाली ककरो संग, लड़िस गरीबा बन हुसनाक
एकर पक्ष लेंव नइ मंय कभु, नाक काट रख दिस चरबांक.”
कथय गरीबा – “ददा, मोर सुन, मंय हा हंव बिल्कुल निर्दोष
मछरी अस फंस गेंव जाल मं, होत नमूसी – पत पर घात.”
सोनसाय हा जोर से घुड़किस -“कहत गरीबा बिल्कुल झूठ
मात्र इही एक झन सतवन्ता, लबरा हन हम बुढ़ुवा ठूंठ!
सुन सुध्दूु, तोर टुरा ला खेदत, एला हम छोड़ात हन गांव
मोर एक झन के आज्ञा नइ, सब मिल टोरिन एक न्याय.”
सुध्दूु बायबियाकुल होवत, हवय गरीबा पर अति प्रेम
सुख दुख सहि बचपन ले पालिस, पुत्र छुटत हे मरे के टेम.
सुध्दूु किहिस -“अगर लइका हा, गंदला कर देवत हे जांग
तब सियान हा कभु काटय नइ – अपन मया के कोमल जांग.
अगर गरीबा गल्ती कर लिस, ओकर बल्दा जुरमिल लेव
जमों ओसला टूट जाय कहि, डांड़ लेव जतका मन दाम.
मोर टुरा ला दुश्मन समझत, इहां ले खेद देत हव तूल
दूसर ठंव तक इसने लड़िहय, करिहय सदा भूल पर भूल.
मुड़ी उचा के झन चल पावय, तइसे नसना टोरो खूब
सरलग जोंतई निंदई ले होथय, बन बनखर के बिन्द्राबिनास.”
सुध्दू के करलई केंघरई हा, मनखे के आत्मा पिघलैस
करत नियाव पंच मन जुरमिल, बाद झड़ी हा फोर बतैस –
“देवत क्षमा गरीबा ला हम, गांव छोड़ावत नइ मर सोग
लेकिन एकर बल्दा मं तंय, दण्ड लान जुर्माना भोग.
बइठक उसलय ओकर पहिली, लान नोट गिन सात हजार
यदि असमर्थ – अनाज ला भर दे, फोकट झन कर समय ला ख्वार.”
सुद्धू कथय -“हाल अभि खस्ता, टिकली तक नइ विष ला खाय
अविश्वास तब जांच लेव घर, मंय खोलत हंव खुद के पोल.”
बन्जू कथय -“बचे बर चाहत, हेर उपाय स्वयं तंय सोच
जइसे नाविक हा जहाज ला, बीच सिंधु ले लात निकाल.”
सुद्धू कथय -” फसल नव आहय, तब मंय ऋण ला देहंव छूट
कागज लिख दसकत मंय देवत, मगर हमर पत ला रख देव.”
सात हजार ऋण के कागज म,ं टिकिट रसीद घलो चटकैस
ओमां सुद्धू हस्ताक्षर दिस, काबर के नइ दुसर उपाय.
बद्दी पावत हवय गरीबा, जबरन भरिस दण्ड के दाम
एकर बाद बइसका उसलिस, मनखे मन गिन अपन मकान.
बेटा बाप अपन घर मं गिन, तंह सुद्धू हा रखिस सवाल –
“तंय खुद ला निर्दोष बतावत, दूसर पर डारत सब दोष.
सोनू अउ धनवा दूनों मिल, तोर विरूध्द रचिन षड़यंत्र
लेकिन अइसन काबर होवत, ओमन ला का होवत लाभ ?”
कथय गरीबा – “मोर बात सुन, कभू कभू दिखथय ए बात –
टक टक लाभ दिखय नइ सम्मुख, पर परिणाम मिलत हे बाद.
सोनू हा अभि लाभ पाय नइ, मगर प्रतिष्ठा हा बढ़ गीस
यद्यपि गलत काम हे ओकर, लेकिन चाल सफल होगीस.
सत्य राह पर हम रेंगे हन, तब ले होय व्यर्थ बदनाम
हम हा घाटा खूब खाय हन, तब ले झुके विवश हो गेन.”
“एक लुटुवा मंय भूत बरोबर, पर कुछ बाद उइस तकदीर –
तोला उठा लाय मंय जइसे – नीरु हा गुनवान कबीर.
तोला कभुच छोड़ नइ सकिहंव, आखिर समय के लउठी आस
तंय संहराय के रद्दा पर चल, भले दुसर मन करंय हताश.
यद्यपि वर्तमान दुख देवत, पर भविष्य बर दिखत प्रकाश
मन्न प्रसन्न हृदय रख हरियर, बिपत तभो झन रहव उदास.”
सुद्धू अपन पुत्र ला देवत हवय उजागर रस्ता ।
ताकि गरीबा के हो जावय हल्का दुख के बस्ता ।।
कथय गरीबा हा सुद्धू ला -“एक प्रश्न के उत्तर लान
तंय जानत निर्दोष हवंव मंय, होय मोर पर अत्याचार.
तंय हा मोला बोले रहितेस – शोषण करिन करिन अन्याय
उंकर साथ तंय हा टक्कर कर, क्रांति लाय बर कर संघर्ष.
पर तंय कायर असन झुके हस, तंय हा टोरत भरभस मोर
तोर नीति हा सही के गलती, बिन छल कपट भेद ला खाले ?”
सुद्धू हा गंभीर बन कहिथय – “वर्तमान मं दिखत अनीति
पर भविष्य मं लाभ सुखी हे, छुपे रहस्य ला खोलत साफ.
कहां तोर तिर पद धन जन मन, कहां एक झन समरथ पूर्ण
अगर तंय अभिचे हमला करबे, तब परिणाम मं मिलिहय हार.
शोषण अत्याचार ला तंय सहि, जुटा जन समर्थन श्रम जोंग
जब हो जास पूर्ण सक्षम तंह, शोषक मन संग टक्कर लेव.
जब दुशमन के नसना मरिहय, हक ला पाहय हर इंसान
“सुम्मत राज” लाय बर सोचत, एकदम पूर्ण तोर उद्देश्य.”
सुध्दू हा जब भेद खाले दिस, पैस गरीबा सही जवाब
आगू डहर सफलता पाये , खोजत हवय उचित अस राह.
संगी, सुख दुख आथय जाथय, कतिक करन हम ओकर याद
गोठ पुराना सोचत बइठत, भावी जीवन हा बर्बाद.
जहां गरीबा टंच हो जाथय, तंहने अपन बजावत काम
खेत के मेेड़ साफ चतरावत, भिड़े तान नइ लेत अराम.
दसरु जउन करेला वासी, ओकर तिर आ ढिलत जबान –
“तोर समान कोन अउ दूसर, खरथरिहा महिनती किसान.
मुसकेनी बन दूब गोड़ेली, सांवा बदौर ला कर देस नाश
धान पेड़ मन रिहिन हें छट्टा, करे गसागस ओला चाल.
बेमची कुथवा अउ चिरचीरा, हेर मेड़ ला साफ बनात
सिरिफ काम झन देख लकर्रा, बइठ मोर तिर कर ले बात.”
चिखला हाथ गरीबा धोइस, आथय मुसकत दसरु – पास
कहिथय -“कहां कमावत हंव मंय, तंय फोकट झन चढ़ा अकास.
घास उठन नइ देत चरोटा, इहिच वजह चतरावत पेड़
यदि चारा बढ़ जाहय सनसन, धन मन खाहंय खूब खखेड़.
उदुप आय तंय तिसने पहुंचिस, सेना के एक अड़िल जवान
ओहर मुढ़ीपार के वासी, भारत नाम रिहिस हे जान.
ओहर मोला खभर बताइस – देश के ऊपर संकट आय
शत्रु राष्ट्र हा हक बताय बर, अपन फौज ला लान दंताय.
जेन हमर बर पाट के भाई , ओहर जबरन लड़ई उठात
ओकर ले अब लोहा लेहंव, टूट जाय रट भरभस गर्व.”
भारत ले मंय करेंव केलवली – युद्ध करे बर मोर विचार
जेवनी भुजा टपाटप फड़कत, करिहंव अरि के खुंटीउजार.”
“मितवा, तोर बोलना ठंउका, देश के नाम मं चढ़थे जोश
ओकर पुत्र मया डिग्री हम अन, जीवन रखिस सुरक्षित पोंस.
यदि सीमा मं सब डंट जाबो, करिहय कोन खेत मं काम
बिन अनाज सब झन पटियाबो, दुश्मन घुसर खींचिहय चाम.
संगी, मान मोर कहना तंय, इंहचे करतब ला कर पूर्ण
हमर देश के शक्ति भयंकर, दुश्मन के निश्चय मद चूर्ण.”
भारत अपन साथ नइ लेगिस, यद्यपि मंय नंगत कलपेंव
ओकर कहना मान कलेचुप, मन मसोस इंहचे रूक गेंव.
चलत बखत भारत के मुंह ले, हकरस “जय किसान” निकलीस
उसने मोर जबान ले घल्लोे, भकरस “जय जवान” बिछलिस.
ओकर गुरतुर बोली के सुरता रहिहय जिनगानी ।
जउन बताय बात मंय तेहर – नोहय कथा कहानी ।।
दसरु कथय -“देश उन्नति बर, जीवन देत किसान जवान
लेकिन मुट्ठी भर घालुक मन, देखत अपन स्वार्थ अउ शान.”
कथय गरीबा -“सत्य कहत हस, देख हमर खुद गांव के हाल
सोनसाय हा अपन बढ़े बर, पर ला करिस दीन कंगाल.”
दसरु टोंकिस -“बता साफ तंय – काबर डांड़िन जुरूम का खोल
का अनियाव करे हस तंय हा, चहत हेरना रस पिचकोल ?”
देत गरीबा समाचार सच – “जउन बुर्जआ धन धनवान
ओमन न्याय ला घुमवा देथंय, तब तो चलत उंकर यश गान.
ककरो घात करेंव नइ मयं हा, तब ले करिन सुंटी बंध डांड़
जेमन शोषित हवंय तहू मन, टोरत हें रगड़ा ला मोर.
सोनू नाथे हे सब झन ला, उवत बुड़त बाढ़ी ऋण नाप
तेकर कारण डरत सबो झन, सोनू के नइ करत खिलाफ.”
तभे गरीबा नजर घुमाथय, कातिक हा दिख जथय फटाक
कथय गरीबा हा दसरु ला -“कातिक हा ओरखत सब बात.
यदि सोनू तिर चुगली खाहय, मोर विरूध्द मं भरही कान
सोनू हा दुश्मनी भंजाहय, मोर मुड़ी पर दुख के गाज.”
दसरु हंसिस -“वाह संगवारी, समझ आय नइ तोर दिमाग
सोनू के नौकर ला डरथस, कातिक कब से ए हुसनाक !
ओला लगा तीन थपरा गिन, का कर सकिहय ओहर तोर
ओला तंय फोकट डर्रावत, का उखानिहय कातिक चोर !”
“कोन ला दोंगरंव – कोन ला कुचरंव, सब मनसे मन हितू मितान
हमर बीच मं भिनाफूट तब, लड़ के होवत अपन – बिरान.
कुथा कुथा हम राह चलत हन, एक बुद्धि नइ शोषित – बीच
जहां सर्वहारा मन एकजई, भर्रस गिरही शोषक – शक्ति”
बहुत बेर तक इसने गोठिया, दसरु गीस करेला गांव
कमा गरीबा वापस होवत, अब आवत घर जाय के याद.
गुनमुनात चले आत गरीबा, धनवा मिलिस भूमि पटियाय
ओहर बिखहर साँप ला देखिस, ओकर जीव सुकुड़दुम सांय.
बिखहर सांप सरसरा भगगे, करत गरीबा मन मं सोच –
धनसहाय ला बेल हा छू दिस, लेकिन बचे हे एकर जान.
यदि मंय धनवा ला छोड़त हंव, जहर हा भिनही जमों शरीर
तंहने धनवा बचन पाय नइ, समा जहय मिरतू के गाल.
जमों कलंक मोर मुड़ आहय तब जोंगंव ए बूता ।
धनवा ला मंय साथ मं लेगंव बांच जाय जिनगानी ।।
धनवा ला उठाय लेगे बर, जहां गरीबा करिस उदीम
फट प्रतिरूप खड़ा हो जाथय, ओकर काम के करत विरोध –
“अरे अरे, तंय काय करत हस, धनसहाय हा दुश्मन तोर
तोर विरूध्द मं षड़यंत्र रच दिर्स , मेटिस तोर मान सम्मान.
तोला जब बिच्छी हा चाबिस, तोर मदद ले भागिस दूर
आज पाय हस उत्तम अवसर, शत्रु – साथ तंय ले प्रतिशोध.
धनसहाय ला छोड़ मरे बर, ओकर मदद करो झन भूल
पर बर जेन हा गड्ढा कोड़त, करूलीम अस फल ला पाय.”
दीस गरीबा हा झिड़की कई -“शत्रु के परिभाषा ला जान
होय समर्थ – करय टक्कर भिड़, छाती अंड़ा खड़ा हो जाय.
पर धनवा हा अभी शत्रु नइ, ओहर परे हवय असहाय
ओला मरत देख यदि जाहंव, तब मंय हा कायर डरपोक
धनसहाय के मदद मंय करवं, ओहर होय स्वस्थ अतिशीघ्र
तब मंय जोम के टक्कर लेवंव, इही बहादुर नर के काम.”
“धनवा कभू मदद नई मांगिस, तोर ले घृणा करिस सदैव
तब तयं काबर आगू जावत, अपन पांव ला पाछू लेग.”
” ओहर धनवा के घमंड बस, जेहर टूट गिस जस सूत
मंय हा आज प्रमाण रखे हंव- ओला मोर जरूरत खूब.
मंय हा ओकर करत सहायता, तब परिणाम ला तंहूँ जान
धनसहाय हा खेल हार गिस, मोर गला मं जीत के हार.”
धरिस गरीबा हा धनवा ला, ओकर घर के तिर मं लैस
समाचार हा गांव मं फइलिस, लग गिस उहां कसाकस भीड़.
सोनू अपन पुत्र ला देखिस, तंह पूछत हे आंख नटेर-
“धनवा रिहिस हे टाटक टौहा, हंसत फूल अस ओकर देह.
सगर कहां ले राहु सपड़गे, उदुप झपागे कोन अजार
लाश असन हिल डुल नइ पावत, एको झन जुवाप सच देव ?”
भीड़ मं रिहिस परस हा घलो, हांक बजा बोलिस फटकार-
“धनसहाय के दुर्गति होइस, ओमा हवय गरीबा के हाथ.
रखत गरीबा कपट ह्रदय मं, तब मारे बर करिस उपाय
मगर चलाकी साथ मं चलिस, धनवा ला खुद धर के लैस.
अब ओकर पर दोष आय नइ, बचिस गरीबा दगदग साफ
सांप हा डस के प्राण ला हरथय, लेकिन चमकत ओकर देह.”
परस हा कई ठक दोष लगाइस, तंह कातिक हा हुंकि भरीस-
“कहत तउन पतियाय लइक हे, एमा हवय गराबा के हाथ.
थोरिक पूर्व गरीबा दसरू, बोलत रिहिन एक ठक ठौर
अपन दुश्मनी ला भंजाय बर, रच षड़यंत्र हेर लिन दांव”
सोनू सनकिस – “यदि धनवा के जीवन हा कुछ घाटा ।
“तंय हा खूब बंड – बेंवट हस, किंजरत मुड़ मं ना के राख .
अपन काम के त्याग करे हस, छयलानी मारत दिन रात
मोर नाक ला फिर कटवाबे, अइसे भुरभुस जावत आज.
काय काम मं अरझे बाहिर, जेमां होगिस अड़बड़ बेर
के ठक डोंगरी फोर ओदारेस, मारे हस कतका ठक शेर ?”
पहिलिच घाव बने तेमां अब, मिरचा भुरक के चुपरत बाप
मगर गरीबा शांत बुद्धि रख, देइस बिल्कुल स्वच्छ जवाब –
“मंय हा ककरो मदद करे हंव, या पर के कर देंव उपकार
अइसन बात बताय चहत नइ, बस अतका अस चहत बताय –
तंत्र मंत्र अउ अंध भरोसा, गलत काम के खुल गिस पोल
ओहर आज लड़ई मं हारिस, विजय पैस वैज्ञानिक दृष्टि.
मंय हा अब विश्वास करत हंव, गांव हा चलिहय राह नवीन
सब ग्रामीण रूढ़ि ला तजिहंय, रखिहंय दृष्टिकोण ला साफ.”
समाचार सुन सुध्दू बोलिस -“जान पाय नइ वाजिब भेद
पर अब ठंउका खभर ज्ञात कर, गलत जोहारेंव तेकर खेद.”
कथय गरीबा – “उमंझ आय नइ – अपन काम ला रखथंव ठीक
पर हित करथंव तब ले काबर, सब हो जाथंय मोर खिलाफ.”
सुद्धूु सुनिस पुत्र के कलपई, देत सांत्वना भर उत्साह –
“समय ले बढ़ अउ कोन परीक्षक, उहि अनुसार करो निर्वाह.
जइसे बार बार गिर मकड़ी, आखिर मं जीतत हे होड़
कतको विपदा आय तोर तिर, मगर भाग झन करतब छोड़.
प्रतिक्रियावादी ले झन डर्रा, अंड़िया के ले लोहा ।
वर्तमान टेंटें बोलत पर उनकर भविष्य सोहा ।।
धनहा पांत समाप्त

गरीबा : महाकाव्य (पहिली पांत : चरोटा पांत)

गरीबा

महाकाव्य

नूतन प्रसाद

1. चरोटा पांत

बिना कपट छल के प्रकृति ला मंय हा टेकत माथा ।
बुद्धिमान वैज्ञानिक मन हा गावत एकर गाथा ।।
बाढ़ सूखा अउ श्रृष्टि तबाही जन्म मृत्यु मन बाना ।
बेर चन्द्रमा नभ पृथ्वी अंतरिक्ष सिंधु मन माला ।।
बालक के हक हे दाई संग कर ले लड़ई ढिठाई ।
बायबियाकुल शक्तिहीन के प्रकृति करय भलाई ।।
बेर करिस बूता बेरा तक, बड़बड़ाइस नइ ठेलहा बैठ
बद्दी मुड़ पर कहां ले परही, बढ़ा डरिस जब करतब काम.
बूता के छिन सिरा गीस अब, ब्यापत दर्द देह भर खूब
बढ़ना चहत अपन बासा बल, बेंग परत नइ पर के बीच.
बेर गुनिस – “”बिलमत बिन बूता, बरपेली होहूं बदनाम
बढ़ना अब बढ़िया काबर के, बढ़ागे जब करतब सब काम.
बरजत हवंव रात अउ दिन ला, बेंवट मन नइ धरिन धियान
बुजरुक ला बेंझुवा बिजराथंय, बढ़े चढ़े लइका बइमान.
बस नइ चलय बंड के सम्मुख, बिन कारण काबर बिपतांव !
बरगलात नइ बनत त बोचकंव, बर पीपर के बिसर नियाव.
बनत रात अउ दिन मन वर – वधु, बेंग परय मत खुशी मं गाज
बपरा बपरी ब्याह करंय अउ, बासी झड़कंय बांट बिराज.
बेर बेर शुभ मुहरुत बेरा, बिया, बलाये मं नइ आय
बर्तन बांस बांसुरी बिजना, बचकरी बाजा मिल नइ पाय.
बरा बरी बटरा बंगाला, बरके मं बर जहय बिहाव
बजनी बजना बुधमानी नइ, बुड़बुड़ चुपकर बढ़ंव अबेर.
बोरिया बिछना बांध सुरुज घर चलिस चुको के पारी ।
बाद रात – दिन मन बिहाव कर खुशी मनावत भारी ।।
दिन हा ठोसरा दीस रात ला – “”उच्छा कर मंय करेंव बिहाव
पर ए बात उमंझ नइ आवत, कोन किसम जीवन निर्वाह –
मंय ओग्गर गोरिया सुन्दर हंव, लकलक बरत असन तन मोर
पर तंय हवस मोर ले उल्टा – कोइला अस करिया तन तोर.
अब यदि मंय हा चलत तोर संग, सब झन करिहंय हंसी मजाक-
जुग जोड़ी नइ फभत एक कन, उत्तर दक्षिण दिशा समान”
पति – एल्हना सुन रात हा बोलिस – “”जानत तोर कपट के चाल
बगुला असन देह मनमोहक, मगर ह्मदय मं रखत मलाल.
मंय हा कोइला अस करिया हंव, लेकिन ह्मदय हवय झक साफ
छलप्रपंच ले रहिथंव दुरिहा, सब ला करथव शीतल शांत.”
दिन बोलिस – “”तंय समझदार हस, तभो देत हंव नेक सलाह
बिन मिहनत मांई असाद अस, मत करना जीवन निर्वाह.
सुरुज सियान के राह चलन हम, पीछू डहर पांव झन जाय
जतका काम भाग मं आवत, पूरा जोंगन रहि के टंच.
हमला फुरसद टेम मिलय तंह, दूनों मिलन फजर अउ शाम
झगरा करके मया करन हम, दुख ला काटन दुख सुख भूल.
हम तंय सदा एक संग रहिबो, बढ़िहय घृणा शत्रुता बैर
बहुत समय के बाद भेंट तब, बढ़िहय आकर्षण रुचि प्रेम. ”
रात किहिस – “”तंय समझावत हस, दर्जा देवत अपन समान
तोर बात ला मंय हा मानत, मंय चलिहंव तोर मति अनुसार. ”
एकर बाढ़ रात हा सोचिस – प्रथम मिलन के पबरित टेम
दिन के साथ करंव मंय ठठ्ठा, ताकि बढ़य ए प्रेम प्रवाह –
“”अबला के कब चलिस सियानी, चलिहंव सुन पति के आदेश
पर तुम “सातो वचन’ निभाहव, तंह नइ ब्यापय विपदा क्लेश.”
रातबती हा अंचरा ला धर, परथय अपन मरद के पांव
चिरई, पेड़ ला अंखिया बोलिस – “”सुघ्घर निपटिस इंकर बिहाव.
नाचत भड़त वक्त हा कटगे, हम सोसन भर आनंद पाय
पर अब इहां निरर्थक बिलमत, इंकर प्रेम मं परिहय आड़.”
पेड़ घघोलिस – “”का समझाथस, जानत हमूं भेद के बात
कोन मुरुख हा बीच मं छेंकत, चटरी, चुट लू – जीव जरात ! ”
बपरी चिरई गपगपागे तंह भागिस खोंधरा कोती ।
पेड़ कलेचुप होगे तंहने बरत प्रेम के जोती ।।
मिलिन रात अउ दिन बिन बाधा, प्रेम प्यार के कतरा माप
दिन हा ओ तिर ले सल्टिस तंह, करिया होय धरिस अतराप.
राज करत हे रात सबो तन, अंधनिरंध कुलुप अंधियार
पेड़ लगत हें भूत बरोबर, भांय भांय बोलत सब खार.
चिंहुर अवाज शांत हे बिल्कुल, सांय सांय हा कंस डर्हुवात
बिरबिट करिया हाथ सुझत नइ, रात शक्ति पल पल बढ़ जात.
अंधविश्‍वासी मन कहि देतिन – भूत प्रेत मन करत निवास
भगव इहां ले जीव बचावव, अब नइ दिखत प्राण के आस.
नइ अंजोर – सिमसाम सबो दिश, पेड़ पान मन सन गप खाय
समय रात ला अधुवन अक लिल, अउ जादा बर मुंहू लमाय.
उही बखत खोभा अउ चुम्मन, उही निझाम ठउर मं अैन
उंकर पास हे एक नवा शिशु, जउन दिखत हे बरत समान.
खोभा कथय – “”हवय सन्नाटा, अपन काम ला कर लन पूर्ण
जे नानुक ला लाय हवन हम, इंहे छोड़ के झप भग जान.”
चुम्मन किहिस – “”कहत हस ठंउका, इहां दिखत नइ एको जीव
हमर पाप ला कोन देखिहय, हम अब झपकुन बुता सिरोन. ”
खोभा अउ चोवा मन निष्ठुर, करिन धरापसरा ए काम –
नानुक शिशु ला उंहे छोड़ दिन, अपने मन लहुटिन चुपचाप.
जे बालक पलका पर सोतिस, जठना बिगर भूमि पर सोय
देखे बर कतको झन आतिन, पर अब लगत अपन दुख रोय.
मोहरी दमऊ अउ दफड़ा बजतिस, मगर इहां सुनसान सतात
महतारी के दूध ला पीतिस, इहां खुद के आंसू मुंह जात.
एकरे रोना सुन के आइस, सुद्धू नामक एक किसान
बालक उठा के मुंह ला चूमत, कथय – “” इहिच बालक भगवान.
नारफूल के साथ फेंक दिन, दया मरिन नइ निर्दयी जीव
दुनिया भटही तइसे लगथय, छल धोखा मानवता बीच. ”
सुद्धू अपन हाथ ला देखिस, लाल रकत कतिंहा ले अैस !
शिशु के गला कटे जानिस तंह, होय सुकुड़दुम गप खा गीस.
तुरुत फूल ला लान लीस घर, तंहने बुड़गे फिकर के ताल-
होय स्वस्थ बालक के तबियत, मंय अब रखिहंव एला पाल. ”
अंकालू ला बला के लानिस, कहिथय – “”एकर कर उपचार
फूल असन शिशु के जीवन ला, दवई जोंग के तिंहिच उबार. ”
अंकालू हा शिशु ला देखिस, प्यार करत हे मर के सोग
कहिथय – “”शिशु हा मन ला मोहत, प्रकृति के अनुपम उपहार.
नानुक के मुंह नव चंदा अस, लेबना अस केंवरी हे देह
लसलस गरु गोलेन्दा भांटा, बालक पर आवत हे स्नेह. ”
अंकालू उपचार करत हे – धोइस घाव ला कुनकुन नीर
घाव मिटाये दवई ला जोंगिस, कर लिस पूर्ण मदद के काम.
अंकालू हा लहुट गीस घर, सुद्धू किंजरत नानुक पाय
नानुक हा कुछ क्षण सोवय तंह, दरद के कारण झप जग जाय.
सुद्धू फिकर मं लेत नींद नइ – टहल करत जगवारी ।
रुई फहा मं दूध पियावत थम थम देखत नारी ।।
अपन काम मं सुरुज उपस्थित, सब अतराप बगर गे घाम
सुद्धू शिशु के देखभाल मं, चेत जात नइ दूसर कोत.
सोनू हा सुद्धू तिर पहुंचिस, जउन गांव के प्रमुख किसान
सुन्तापुर ला कांख मं राखत, ओकर दब मानत ग्रामीण-
जइसे धुंका बंड़ोरा आथय, तब उड़ जात धूल कण पान
सुद्धू हा सोनू ला देखिस, धक ले होवत ओकर प्राण.
सोनू बोलिस -“”खरथरिहा अस, मुंह झुलझुल त्यागत हस खाट
खेतखार के बिरता जांचत, मेड़ पार के करत सुधार.
पर आश्चर्य मं डारत मोला – तंय घर मं रबके हस आज
कुरिया घुसर काम का जोंगत, मोर पास तंय हा कहि साफ ? ”
सुद्धू अपन बचाव करे बर, सोनसाय तक खुश हो जाय
स्वागत करत देत हे आदर, शिशु ला देखा पाय उकसात.
सुद्धू हा बालक ला देवत, पर सोनू छिटकिस कुछ दूर
कथय – “”टुरा ला कहां पाय तंय, काबर मुड़ पर लाय बवाल !
कहुंचो ले तंय चुरा लाय हस, तब घुसरे हस भितर मकान
अगर बेदाग बचे बर सोचत, सच घटना ला फुरिया साफ ? ”
सुद्धू मरिस सोग बालक पर, बन के रक्षक उठा के लैस
पर बलाय बिन लांछन आवत, सुद्धू कलबलात हे खूब –
“”मंय निर्दोष – गिरे नइ नीयत, काबर व्यर्थ कलंक लगात !
बालक परे रिहिस बिन पालक, तेला मंय हा धर के लाय.
मोर सहायक एको झन नइ, ठुड़गा पेड़ असन मंय एक
बालक पालत मन बोधे कहि, अब मंय सकिहंव बिपत खदेड़. ”
सुद्धू के सुन सोनू बिफड़िस- “”सब ले दयावान तंय एक
काकर अंस कहां तंय जानत, मन अनुसार करत हस टेक.
गांव के रीति नीति ला जानत – अगर एक पर दुख हा आत
ओला जमों गांव भर भोगत, भोगत कहां कष्ट बस एक !
लाय बवाल सबो झन बर तंय, ओकर ले तंय बच निर्दोष
अगर टुरा ला पास मं रखबे, तब फिर डांड़ के रुपिया लान.”
एेंच पैंच नइ जानत सुद्धू, बला ले रक्षा के हे चाह
रखे अपन तिर नगदी रुपिया, सोनसाय के असलग दीस.
सोनू हा रुपिया धर रेंगिस, तंह ग्रामीण घलो आ गीन
बालक के संबंध मं पूछत, सुद्धू के चिथ खावत मांस.
घंसिया बोलिस -“”सुन सुद्धू तंय, बालक ला लाने हस व्यर्थ
तंय सोचत हस – बने करे हंव, लेकिन काम कुजानिक खूब.
लइका जहां युवक हो जाहय, मात्र देखिहय खुद के स्वार्थ
तोर मदद ले भगिहय दुरिहा, कभू करय नइ सेवा तोर.
मानव जीवन हा निश्चित नइ, मृत्यु पहुंच के हरही प्राण
तेकर ले तंय रहि एके झन, ए बालक ला कभु झन पोंस.”
उही ठउर मं केड़ू हाजिर, ओहर हा करथय कुछ क्रोध
कहिथय -“”मोला उमंझ आत नइ-जग हा काबर निष्ठुर खूब !
ए शिशु हा मानव के वंशज, एहर नइ कुछ घृणित पदार्थ
जेमां सब झन घृणा करत हव, फेंके बर सब देत सलाह !”
केड़ू हा सुद्धू ला बोलिस -“”तोर नाम होवत बदनाम
तंय हा सबले दोषी मनखे, पर तंय जमों बात ला भूल.
बस बालक के रक्षा ला कर, ओला खुद कर रख के पाल
अंतिम बखत के लउठी बनिहय, मदद के ऋण ला देहय छूट.”
मुटकी किहिस -“”मंहू मानत हंव-केड़ू हा बोलत हे ठीक
हम मानव पशु पक्षी पालत, उंकर साथ मं स्नेह दुलार.
यदि ओमन बीमार परत हें, उंकर करत सेवा उपचार
याने उनकर कष्ट हरे बर, हम रहिथन हर क्षण तैयार.
तब ए शिशु मानव के कंसा, एला तंय कभु झन दुत्कार
एकर जीवन के रक्षा बर, अपन धर्म के रक्षा राख.”
सुद्धू हा सांत्वना पैस तंह, ओला मिलिस खुशी संतोष
सुद्धू किहिस – “”मोर ला सुन लव, तज आलोचना सब तारीफ.
शिशु के मंय सेवा बजात हंव, पर ए मरत खूब जम भूख
एकर पेट पोचक के घुसरे, रहि रहि करथय करुण विलाप.”
कथय सुकलिया -“”जान लेंव मंय, लइका ला ब्यापत हे भूख
ओला मोर गोद मं देवव, पिया दुहूं मंय सक भर दूध.”
लीस सुकलिया हा बालक ला, लुगरा मं रखलिस मुंह ढांक
तंह बालक हा दूध ला पीयत, पेट भरिस तंह सोसन शांत.
किहिस सुकलिया हा सुद्धू ला – “”लइका हा जब भूख मं रोय
मोर पुकार ला करबे तंय हा, ओला पिया दुहूं मंय दूध.”
केड़ू हा सुकलिया ला बोलिस -“”तंय हा करे हवस उपकार
एहर सच्चा धर्म आय सुन, बालक के दूध दाई आस.
बालक ला तंय दूध पियाबे, बचा के रखबे ओकर प्राण
मानवता के रक्षा होहय, प्राणी मन पर हे अहसान.”
कथय सुकलिया -“”मोर बात सुन – मंय नइ चहंव मान यशगान
मोर हवय एक बालक सुघ्घर, ओला मंय पियात हंव दूध.
ओकर साथ यहू लइका ला, पिया दुहूं हरहिंछा दूध
देखरेख ला सुद्धू करिहय, सच मं उही हा पालक आय.”
अब मनसे मन उहां ले लहुटिन, सुद्धू हा बंधाय हे प्रेम
शिशु के रक्षा करत हे ओहर, इसने निकलिस कुछ दिन रात.
एक दिन सुद्धू खेत ले लहुटत, तब अंकालू हा मिल गीस
अंकालू हा ठट्ठा मारिस -“”दुर्लभ होगे दर्शन तोर.
लगथय-तंय लइका ला राखत, ओकर सेवा करथस खूब
ओकर तबियत अभि कइसे हे, क्षेम खबर ला फुरिया साफ?”
सुद्धू कथय -“”कुशल हे बालक, तोर कृपा बस तोर प्रयास
तंय ओकर उपचार करे हस, तभे बचे हे ओकर जीव.
तोर राह पर मंहू चलत हंव, लइका ला राखत हंव पाल
यदि एको छिन दूर रहत हंव, मन हा अकुला जाथय खूब.
थोरिक पहिली खेत गेंव मंय, उहां रिहिस हे गंज अक काम
पर बालक के याद हा आइस, तंहने लहुट जात घर कोत.”
अंकालू हा हंस के बोलिस -“”तोला झींकत पुत्र के प्रेम
अपन मकान रबारब जा तंय, ओकर सेवा कर तंय नेम-
शिशु के पालन होत कठिन मं, बड़े परीक्षा एहर आय
पर तंय सफल होत हस मितवा, एकर फल मं मिलिहय मीठ.”
अंकालू हा अपन राह गिस, सुद्धू खबखब पांव बढ़ैस
ओहर अपन ठिंहा मं अमरिस, पहुंच गीस बालक के पास.
छोकरा चमक उठे हे हुरहा, रोत नयन-जल बाहिर आत
सुद्धू पुचकारत दउड़िस अउ, चुमुक उठा लिस नानुक बाल.
बालक पवई हा मंहगा परगे, परिस चिची पर बथबथ हाथ
घिनमिन करत नाक भन्नावत, तंहने खुद हंस-पीटत माथ.
कथरी जठा-पुनः ढलगा अब, सुद्धू गंदला करथे साफ
कउनो काम तियारत नइ पर-मया हा खुद देवत आदेश.
पिता पुत्र मं चलत अइसने सुघ्घर गदामसानी ।
पौधा क्रमशः बढ़थय तिसने मंय सरकात कहानी ।।
मुरहा ला भुरियाय ददा हा गावत सुर धर गाना ।
कहां लुका गेंव सुवा ददरिया कहां बिस्कुटक हाना ।।
बालक के मुंह देखत सुद्धू, बोलिस -“”मोर मयारु फूल
तोर नाम मंय धरे चहत हंव, आय समय उत्तम अनुकूल.
राम कृष्ण ध्रुव राख सकत हंव, पर ए कारण अरझत बात-
ओमन कुंवर बड़े अदमी के, गरीब-जिनगी संग का साथ !
परे डरे अउ हिनहर निर्बल, सब संग चलबे देख अगोर
झन असकटा बतावत हंव सुन-फोरत नाम “गरीबा’ तोर.
पुत्र हा सोय बाप के कोरा, तुलुल मुलुल कर गोड़ हलात
मुड़ी हलात आंख मटकावत, मानो नाम करत स्वीकार.
दिन अउ रात नियम बंध चलथंय, बइठ पांय नइ गाड़ के खाम
बढ़त गरीबा घलो समय संग, करत ददा के नींद हराम.
जब टिकटाक चले बर धरथय, अंदर कहां रहत थिरथार !
सुद्धू हलाकान हो दउड़त, पावत नइ उदबिरिस के पार.
चिमटत कभू-दुलारत कुछ रुक, क्रोध मया उपजत एक साथ
अगर गरीबा बुद गिर जावत, तुरुत उचा लेवत धर हाथ.
सुद्धू के घर अैस फकीरा, देखत गम्मत रहि चुपचाप
बाप ला बाती केंदरावत कहि, आत हंसी हा अपने आप.
सुद्धू हा बिपताय नइ देखिस, पर मेचकू कूदिस अंटियाय
पीछू तन ले झटक फकीरा, डेड़ बिता ला कबिया लीस.
उझल गरीबा थपरा मारत, मूंछ चुंदी के बुता बनात
सुद्धू ला तब कथय फकीरा -“”बिन कारण तोर टुरा सतात.
बिजनेवरा मन बुजरुक तक ला, ठंउका थोरको नइ डर्रांय.
सांप आग ला हंस के धरथंय, अनुचित उचित समझ नइ पांय.”
छुइस गरीबा के तन ला तंह, कथय फकीरा हा मुंह फार-
“”चढ़े बुखार तोर छोकरा ला, बयचकहा, बइठे हस कार !
नजर डीठ हा गपगप पकड़े, काजर लान आंख पर आंज
छेना राख लान मंय फुकिहंव, तुरुत करंजा-ऊपर गाज.”
सब समान पाइस तंह आंजत एकदम जोरव फकीरा ।
मगर गरीबा काजर मेटत वह बिजनेवरा खीरा ।।
देख गरीबा के मुंह करिया, दुनों सियान हंसत बेहाल
बेलबेलहा हा उंकरो मुंह पर, करिया रंग तुरुत दिस पोत.
अब दूनों झन कठल के हांसत, हंसत पेट हुलकी धर लीस
सुद्धू कथय -“”गरीबा बोलत-तुम्हर बुद्धि भुलकी दस बीस.
तुम शंकालु रुढ़िवादी हव-जग ला लेगत पाछू कोत
नजर डीठजादू टोना नइ, तब ले करत खटकरम मंत्र.”
“”वास्तव मं नइ टोनही रक्सा, ठुंवा ठामना प्रेतिन भूत
हमला ठग मन टिंया ले ठग दिन, लेकिन कहां चढ़िस कभु चेत !”
अतका कहि अउ कथय फकीरा -“”दर्पण एक खोज टुप लान
अपन रुप ला देख गरीबा, कइसन खेल करत हो भान !”
जोजिया डरिस फकीरा कतको, पर सुद्धू हा ढंग लगात-
“”तंय जानत हस मोर हाल सब, धन रुपिया के रहत अभाव.
पानी आय हमर बर दर्पण, जेहर मिल जावत हर ठौर
यदि तंय पानी ला मांगत हस, निपटा सकत तोर मंय मांग.”
“हवभई’ ला सुन सुद्धू झपकुन, एक सइकमा जल धर लैस
पानी देख गरीबा डरगे, धर नइ पात एक क्षण धीर.
देखिस अरन बरन खुद के मुंह, निश्छल ह्मदय टुरा डर्रात
गदफद जल जा पीट दीस अउ, अबड़ जोर रोवत चिल्लात.
सुद्धू अपन पुत्र ला पाथय, गाथय गीत कराथय शांत-
“”पानी हा नुकसान बताहय, एक तो लइका अइसे क्लान्त.
देख फकीरा तंत्र मंत्र हा, एको कनिक दीस नइ लाभ
तंय खटकरम करे हस जे अभि, मोर पुत्र ला परसिस हानि.
एकर तन पानी मं भींगिस, डर हे स्वास्थय बिगड़ झन जाय
मंय एला अब दवई पियाहंव, ताकि ठीक रहि करय किलोल.”
कहि के सुद्धू दवई पियावत, गाय दूध मं सरपट मेल
कुछ पश्चात जपर्रा सुतगे, अपन ददा ला मार लतेल.
सनम के याद फकीरा ला आवत, जउन सनम ओकर संतान
दीस फकीरा हा आशीष अउ, उहां ले सरके करत उपाय.
“”तोर टुरा के नाक बजत अब, कृषक फसल रक्षक अरा राख
रउती भर सुख पाय गरीबा, बने कटय दिन हफ्ता पाख.”
दे आशीष चिमट चूमा मंग, चलिस फकीरा ओ तिर छोड़
सोनू बइठे आंख लाल कर, तेकर तिर मं बिलमिस गोड़.
तिजऊ जउन पहिलिच के अमरे, करत प्रार्थना हलू अवाज-
“”एक आसरा धर आये हंव, किसनो कर निफरा भई काज.
पांच हजार नोट मांगत हंव, ओकर संग दू Ïक्वटल धान
महिनत कर मंय लहुटा देहंव, गिरन पाय नइ मोर जबान.”
सोनू कहिथय -“”दार गला झन, फुरसुद कहां सुने बर टेस !
मंग उधार तंय गपक जबे चुप, तोर पास कुछ धन नइ शेष.”
“”अपन चई भर लेस मोर धन, बद मितवारा कर के प्रीत
जरुरत बखत देखावत ठेंगवा, तब फिर हम तुम कइसन मीत”
“”मोर पास अटपट झन गोठिया, फोकट बात बढ़ा झन लाम
चल तो भाग इहां ले झपकुन, कंगला के ए तिर नइ काम.
मोर मित्र हें धनी प्रतिष्ठित, मंय खुद हंव पुंजलग विख्यात
कंगला संग यदि करत मितानी, भर्रस गिरही गरिमा मोर.”
सुनते तिजऊ सुकुड़दुम होवत, थमना मुश्किल अइसन ठौर
अब सोनू के डेहरी त्यागत, लाचारी वश-मरत कनौर.
सोनसाय के पुत्र एक झन, जउन हवय बालक के रुप
बहुत सुरक्षा प्यार मं पालत, धनसहाय हे ओकर नाम.
धनसहाय ला परस पाय हे, ओला धर आथय ए पार
धनवा कूदत हे फकीरा तन, मार कुलच्ची पाय दुलार.
बालक पाय फकीरा अभरिस, परस ला बरजत सोनसहाय-
“”बइकुफ, किलकत धनवा ला तंय, घर के बाहिर काबर लाय !
कते मनुष्य के कइसन आदत, पर के मन के कोन ला ज्ञान
नजर भूत ला चढ़ा देत यदि, कतका हलाकान-कुछ भान ?
काम अंड़त नइ तोर बिगर सुन, ए तिर नइ होवत शुभ नेंग
धनवा ला कुछ होय के पहिली, ओला धर के अंदर रेंग.”
यद्यपि सोनू, परस ला डांटत, मगर परस ला परत नइ घाव
लगत फकीरा ला बरछा अस, अंदर ह्मदय करत हे हाय.
काबर रुकय फकीरा-छोड़त सोनू के दरवाजा ।
एक घरी नइ रुकना चहिये-जब अपजस अंदाजा ।।
मगर स्वार्थ हा पूर्ण होय या भविष्य मं कुछ आशा ।
तब अपमान ला सहना चहिये-सुनना चहिये गारी ।।
रुकिस फकीरा ढीठ बने तब, अंकालू हा उंहचे अैस
ओहर सोनसाय ला बोलिस- “”तोर पास मंय हा ऋण लेंव.
ओकर मूर ब्याज कतका अस, कहि हिसाब ला एकदम साफ
मोर कष्ट मं तंय चलाय हस, तब पटाय बर मोरो फर्ज.
जउन जमीन रहन राखे हंव, वापिस चहत पटा सब नोट
सकले हंव मुश्किल मं रुपिया, कष्ट झेल मर दुख सहि भूख.”
सोनू अंतर कंतर जोड़िस, कुटिल हंसी हंस करत हिसाब-
“”जतका रकम धर के लाने हस, कोन्टा तक बर पुर नइ पात.
तोर भूमि तो पहिलिच बुड़गे, भइगे रख-भग जतका लाय
बचत कर्ज ला छोड़ देत हंव, तोर बुती अब जुड़ नइ पाय.”
अपन जमीन उबारे खातिर, रुपिया धर अंकालू आय
लेकिन उपक बुड़ा मं बुड़गे, ओकर ह्मदय करत हे हाय.
अंकालू हा तुरते गिन दिस, बसनी के रुपिया ला हेर
सोनसाय के नाम खेत लिख, ओतिर ला तज दीस अबेर.
चलिस फकीरा ओकर पाछू, अंकालू केंघरिस दुख साथ-
“”अपन जमीन छोड़ाय आय मंय, मगर जमीन पूर्व बुड़ गीस.
मोर पास मं रिहिस हे रुपिया, उहू ला हड़पिस सोनसहाय
मोर दूध अउ दुहना फूटिस, जमों डहर ले लगगे हानि.”
कथय फकीरा- “”तंय ठंउका हस, वास्तव आज होय बर्बाद
मगर काम ला नेक करे हस-अपन दिमाग रखे हस शांत.
दुखड़ा रोय अदालत दउड़त, खाहंय मांस वकील-दलाल
पूरा अस धन समय बोहाहय, हरिया भूमि बचत ते नाश.”
अंकालू के क्रोध भड़क गे- “”बिन कारण जावत हे जान
तंय आगी मं घिव डारत हस, ताकि होंव मंय सत्यानाश.
चहत हवस-मंय रहंव कलेचुप, सोनवा के झन होय विरोध
पर अन्याय के पक्ष लेत हस, कार देत हस गलत सलाह ?”
कथय फकीरा -“”मोर तर्क सुन-हम जनता मन हन असमर्थ
सोनसाय ला गारी देवन, या छीनन हम ओकर भूमि.
पर कल्पना मं सार्थक एहर, पर प्रत्यक्ष असम्भव बात
सोनसाय हे पुरे गोसंइया, ओकर कोन हा करे बिगाड़ !
सोनू ले तंय उबर आय हस, वास्तव होय नेक अस काम
खुद ला लाय सुरक्षित हस तंय, एहर आय बड़े उपलब्धि.”
फिक्र हटा अंकालू कहिथय -“”तोर बात जस करुहा लीम
यद्यपि छेद करिस कांटा बन, पर पथ ला देखाय तंय ठीक.”
एमन अपन राह ला पकड़िन, सोनू हा मचात हे लूट
पर, पर ला घालत हे तेला, जेवत उम्र तेन नइ याद.
सोनसाय के बुद्धि हे चंचल, चिंतन करत रथय दिन रात-
अपन डहर आकर्षित होये, चलंव कते शतरंज के चाल ?
सब ग्रामीण ला बला के बोलिस -“”मंय हा जोंगे हंव शुभ काम
अपन गांव सुन्तापुर मं मंय, चहत बलाय सात विद्वान.
पर कठिनाई आत इहिच बस-परत खूब अक खर्च के मार
बोझ उठाय तुमन यदि राजू, तुम्हर साथ मंय तक तैयार.”
ग्रामीण झड़ी हर्ष कर बोलिस -“”कहत तेन अति उत्तम गोठ
तोर तोलगी सदा धरे हन, तब अब घलो होय नइ घात.
जतका व्यय हमला कबूल-पर, भेज निमंत्रण-ज्ञानिक लान
गूढ़ गोठअमरे उत्साहित, सरहा तन के हो कल्याण.”
किहिस लतेल -“”आन हम मेचका, कहूं आन ना कहुं तन जान
होय ज्ञान विज्ञान बात नइ, हम रहिथन सत्संग ले दूर.
तंय विद्वान बला ले निश्चय, हम स्वागत बर हन तैयार
मात्र तोर पर बोझ आय नइ, सब पर परत खर्च के भार.”
एेंच पैंच ले दूर गंवइहा, समझिन नइ सोनू के चाल
जइसे सिधवी मछरी जाथय-जान गंवाय जउन तन जाल.
सब ग्रामीण ला लहुटा सोनू, भोजन कर-कुछ लीस अराम
एकर बाद खेत बल जावत, किंजरे असन भरत डग लाम.
कुछ ओहिले अउ गिस तब मिलगे, सुद्धू बुता करत खुद खेत
सोनू हा एल्हत ओतिर थम -“”कार कमावत बिधुन बिचेत !
परे डरे बेर्रा लइका बर, फोकट बोहा डरत श्रम बूंद
तोर लहू नइ आय गरीबा, तभो सुतत नइ आंखी मूंद ?
छोड़ गरीबा के सेवा ला, देख अपन भर स्वार्थ अराम
ओंड़ा आत ले जेवन ला कर, नाक बजा के नींद ला भांज.”
सुद्धू चक ले बात ला काटिस -“”यदपि गरीबा मम नइ पुत्र
ओकर पर सदभाव रखत हंव, उहू आय मानव के वंश.
पर के तन मं लहू हा दउड़त, चलत गरीबा के तन खून
लेकिन तंय हा भेद करत हस, क्षुद्र विचार करिच दिस दंग.
कड़कड़ महिनत कर के पाथंव, पपिया पेट मं नाय अनाज
अगर तोर अस लहू चुसइया, तब कहुं भोग सकत सुख राज !”
सोनू किहिस – “”कर्म ला भोगत, सदा रखत हस क्षुद्र विचार
तब तंय पूंजी जोड़ पास नइ, रहत अभाव पात दुख खूब.”
सुद्धू किहिस -“”अगर मंय घालुक, लूट मचातेंव सब अतराप
तोर असन मंय झिंकतेंव धरती, ब्याज मं रुपिया लेतेंव खूब.
तभे तोर अतका मंय पुंजलग, मोर पास मं वैभव पूर्ण
जिनिस उड़ातेंव आनी बानी, पर ला टुहू देखातेंव खूब.”
सोनसाय ला बानी चढ़गे, ओहर बोलिस कर के क्रोध-
“”छोटे नदिया खल बहुराई, तइसे करत टेचरहा गोठ.
काकर संग कइसे गोठियाना, हमर पांव ला पर के सीख
यदि उजड्ड आदत ला रखबे, गिर के रहिबे मुड़ के भार.
तोर अन्जरी बात बाण घुस, अंतस ह्मदय मं कर दिस घाव
उही बखत ए ऐब मिटाही, हेर लुहूं जब एकर दांव.”
सुद्धू कथय – “”खूब जानत हंव, तंय ले सकत हवस प्रतिशोध
अउ तंय निश्चय बल्दा लेबे, जब तंय पाबे ओकर टेम.
मगर मोर सच गोठ घलो सुन, मृत्यु के ताकत ला पहिचान
करत प्रदर्शन विद्धता के अउ, धन के करबे खूब घमंड.
पर सब चाल हो जाहय असफल, जहां मृत्यु ले जाहय झींक
करत घमंड देखावत ताकत, जमों शक्ति के चरपट नाश.
याने मंय कहना चाहत हंव-जलगस तन मं तलफत प्राण
हल्का बात मुंह ले झन हेरो, झन छीनव पर के अधिकार.
हवय गरीबा हिनहर लड़का, ओकर साथ घृणा झन होय
ओकर पर तंय स्नेह प्यार कर, सब झन पर रख निश्छल भाव.”
सोनू मण्डल रकमका बढ़गे, बंगी पढ़त लेत मरजाद
सुद्धू कान धरत नइ एको, काबर व्यर्थ बुद्धि बर्बाद !
आत गरीबा के सुरता अब, भूल पात नइ ओकर याद
सुद्धू लहुटत हवय अपन घर, शेष काम के अंतिम बाद.
दरवाजच तिर मिलिस गरीबा, जेहर चिखला देह लगाय
सदबदाय माटिच माटी मं, मात्र आंख भर हा बच पाय.
सुद्धू किहिस -“”अरे तुलमुलहा, काबर चिखला ला चुपरेस –
अगर तोर तबियत हा बिगड़त, कुछ उवाट कतका अस क्लेश ?”
पिता-डांट सुन कथय गरीबा, थोरिक गुन ठुड्डी धर हाथ-
“”लेलगा, मंय तिथला नइ बोथे, मंय लदाय थाबुन ममहात.
अबल तमइया थते ददा ते, थेवा तरे पलन हे आद
बाथी ततनी थवा पेत भल, नींद थुताहंव लोली दात.”
तोतरावत चटरु हा खींचिस, एकदम जोर बाप के कान
सुद्धू हंस के पुत्र ला लानिस, चढ़ा खांध पर भितर मकान.
ऊपर मटकत कथय गरीबा -“”मंय थब धन ले हंव बलवान
दर हत्थी आ दही इही तिल, मुटका माल के लेहूं प्लान.
पहलवान के दाप दलीबा, तेला दानत हल एत दांव
मोल बात ला लबला थमझत, बता थकत मंय तौथल दांव.”
तोतरी बात ला सुनथय सुद्धू, लगत सुहावन ह्मदय उमंग
करु होत हे साग करेला, मगर खाय मं हे स्वादिष्ट.
“”तोर लबारी बात सुने बर, मात्र एक सुद्धू हा पास
कूंद कूंद गोठियात सुवाअस, खांद ले उतरो चल बदमाश.”
अतका कहि सुद्धू चटरु के, रगड़ के धोइस तन के मैल
बाद पेज धर कोठा घुसरिस, जिंहा बंधाय कृषक धन बैल.
मन प्रसन्न मदमस्त गरीबा किंजरत एती ओती ।
तभे अचानक आंखी जमगे चांटी के बिल कोती ।।
चांटी मन के रेम लगे हे, बिल अंदर ले बाहिर आत
उही पास जा टुडुंग गरीबा, थपड़ी झड़ बड़ मजा उड़ात.
कतको बुबू ला धर तुलमुलहा, मारिस जहां चपक पुटपूट
चांटी-झुण्ड घलो जुरिया के, लइका ला चाबिस चुट चूट.
अब कलबला गरीबा रोवत, चिल्ला चिल्ला पटकत गोड़
आखिर डर के पल्ला भागत, चांटी अरि के ठंव ला छोड़.
झप आ सुद्धू देत ठोलना -“”काबर भगत छोड़ मैदान
तंय हस सब झन ले बलशाली, दिखा अपन अब ताकत शान !
अरे उदबिरिस, करत टिमाली, कष्ट मिलय तस धरथस काम
मानस नइ सियान के बरजइ, अपन हाथ लावत तकलीफ”
सुनत गरीबा मुंहबोक्का बन, समझ गे तइसे मुड़ी हलात
सद्धू हा कोरा पर बइठा, गिनत गरीबा के दूध-दांत.
पिता के मन ला हरियर राखत, लइका खेल कूद कर नाच
फुरनावत गरीबा हा जइसे, गिनती एक दो तीन चार पांच.
पढ़े लइक जब होय गरीबा, विद्या मन्दिर लेगत बाप
एकर नाम उहां लिखवाथय, शिक्षक मिलतू ला कहि बोल.
मिलतू हा सुद्धू ला बोलिस -“”तंय नइ करेस पढ़ाई ।
मगर गरीबा ला शिक्षित कर ओकर होय भलाई ।।
मगर गरीबा उहां रुकत नइ, बस्ता धर-धर उड़े विचार
मगर पढ़े बर परिस बिलमना, मिलतू के सुन डांट दुलार.
अपन बुता मं सदा उपस्थित, करतब नइ त्यागय आदित्य
उसने शाला पहुंच गरीबा, पावत ज्ञान चिभिक कर नित्य.
अउ सहपाठी टुरा तिंकर संग, कभू लड़ई झगरा-कभु मेल
फुरसुद बखत अमर के खेलत, गंवई मं जइसन चलथय खेल.
घर मं बइठे लिखत पहाड़ा, आज आय छुट्टी इतवार
तभे मित्र मन तीर बला लिन, जोर जोर से कुहकी मार.
मटका आंख गरीबा पूछिस -“”मितवा, तुम्मन कार बलाय-
मोर बिगर का काम अटकगे, पिया जुवाप कान मं मोर ?”
नांगर देखा सनम हा बोलिस -“”इही तिर बिलम के झन एल
आज पाय अवकाश सुघर अक, चल खेलन नांगर के खेल.
बुजरुक मन गुरुमंत्र पियाथंय-खेल ले होथय देह बलिष्ठ
तब चलना हम दौड़ मचाबो, बुजरुक के मानन उपदेश.”
सनम-गरीबा जुंड़ा मं फंदगें, धर के मुठिया सुखी दबात
खोर बीच हरिया धर जोंतत, नांगर हा आंतर नइ जात.
बरसा हा कुचरे रनझाझर, खोर बोहाय छलाछल नीर
चिखला सदबदाय धरती भर, तभे चलत नांगर के खेल.
सुखी हंकालत डिर तोतो कहि, लउड़ी उबा-बढ़ावत गोड़
बइला मन बल भर हल झींकत, भागत कहां काम ला छोड़ !
ओतन सुद्धू हा कंस खोजत-पुत्र गरीबा हा कंह गीस ?
बालक मन तिर पहुंच के देखत, एमन खेल करत सब भूल.
कथय गरीबा ला सुद्धू हा- “”चल घर सुस्ता-जोंतई ला त्याग
थोरिक बाद भले अउ भिड़बे, तब तक ले नइ बिगड़य पाग.
तंय हा अड़बड़ समझदार हस, पढ़लिख के बन जा हुसियार
मगर आज तोला का होगिस-नांगर झींकत बन के बैल !
तंय महिनत नंगत जोंगत हस, पीरा भर जाहय सब देह
इहां के टंटा टोर के घर चल, सोसन भर खा के कर मौज.”
सुद्धू हा लुभात हे कतको, करत गरीबा हा इंकार-
“”अभी इहां ले टरना मुश्किल, अंड़े हवय नंगत अक काम.
अगर काम ला छोड़ के भगिहंव, मोर नाम होही बदनाम
मंय कमचोर हो जाहंव सब ले, बिगड़ जहय जोंते के पाग.”
सुद्धू हा कतको भुरियाइस, मगर गरीबा चेत नइ देत
सब उपाय ला हार बाप हा, अपन पुत्र ला लालच देत-
“”ओरझटिया-घेक्खर नइ मानस, तब तसमई खांहव मंय एक
खतम-बाद तंय रंच पास नइ, रेंद मचाबे करके टेक.
कहना मान-उदेली मत कर, वरना पछताबे तंय बाद
अपन मित्र ला घलो साथ धर, गुरतुर जिनिस खाव भरपेट.”
जुंड़ा ला बोहि के कथय गरीबा -“”कंझट झन कर-चल तो भाग
हमला सनम खाय बर देहय, पेट फुटत तक बासी साग.
मिट्ठी तसमई तंय पकाय हस, पर मंय मीठ ले भागत दूर
एकर खाय रोग हा बढ़थय-पेट मं होथय लम्बा क्रीम”
सनम संरोटा झिंकिस -“”काम कर तिनों हमर घर जाबो।
बासी अउर चरोटा भाजी, खूब रबाचब खाबो ।।
सुद्धू बुड़बुड़ात वापिस गिस, लइका मन के सुम्मत जांच
लइका मन ले सब झन हारिन, एकर कहां चलय टिंगपांच !
बाधा बिगर-निफिकरी बन अब, नांगर चला-उकालत खोर
भूख लगत अऊ देह पिरावत, तभो उदबिरिस मारत जोर.
कुछ पश्चात सनम लरघा गे, सरकत इसने पेल ढपेल
तभे गरीबा अगुवाये बर, लउहा रेंगिस जुंड़ा उझेल.
जब पंचघुंच्चा घुंचिस सनम तंह, इरता कोचकिस जोर सुखी
करला के सन्नात सनम हा -“”चक चक – चिक चिक – चुकी चुकी.
बउग लगा के मंय रेंगत हंव, तेला ताकत भर हकराय
शत्रु गरीबा ला सारत हस, लेवत हवस तउन अन्याय.”
यदपि सनम हा सुखी ला बोलिस, मगर गरीबा पर गे आंच
अपन पक्ष ला पोख करे बर, हेरत हवय सनम के कांच-
“”डायल, स्वयं धुरा पटकत हस, अउ दूसर पर डारत दोष
कायर ला अब कोन खेलाहय, सिरी गिराय-मरे अफसोस.
सुखी कोचक के सीख देत हे, तिंही खेल ला करत खराब
वास्तव मं तंय खूब आलसी, काबर करन तोर संग खेल !”
जहां गरीबा अतका कहिथय, जुंड़ा पटक के सनम जोसात –
“”मोला तिरयावत बिन कारण, तुम्हर पेट के अंदर दांत.
अगर शत्रुता हवय मोर संग, वापिस कर दव नांगर मोर
अन के साथ खेल लेबो हम, तुम्हर गरज करना अब व्यर्थ.”
जहां सनम हा सेखी मारिस, सुखी – गरीबा करथंय क्रोध
मजा चखाये बर सुंट बंध गें, एकदम डंटिन सनम के पास.
सुखी – गरीबा मन चेचकारिन, सनम भूमि गिर गीस फदाक
फफक-फफक ओकर रोना सुन, अैस फकीरा दउड़ तड़ाक.
उहां के दृष्य फकीरा देखिस, तुरुत समझगे कारण साफ
सुखी – गरीबा ला दमकावत, सनम ला समझत हे निर्दोष-
“”तुम बाती मन ला पूछत हंव, तुम्मन कब के संडा आव
अभिच जाम के खड़ा होय पर, पुरखा तक हे हेरत दांव.
खयटहा मन के तुम लइका अव, जानत तुम्हर ददा के हाल
ओमन सदा सबो संग झगरिन, फिर तुम कहां ले करहू प्रेम ?
अब कभु मोर सनम संग लड़िहव, रोटी अस पो देहंव गाल
कनबुच्ची धर के केंदराहंव, भले होय तकरार-बवाल.”
सुन चिरबोर पहुंचगे सुद्धू, एक बड़े लउठी धर हाथ
तभे गरीबा पास मं अमरिस, लिखरी लिखत झूठ ला मेल-
“”आय फकीरा गांव के बुजरुक, पंचायत मं निर्णय देत
मगर आज खुद गलत राह पर, ओहर करिस गजब अन्याय.
ओहर मोला थपरा मारिस, अंइठिस कान-पटक दिस दोंय
यदि मंय कुछ असत्य बोलत हंव, वास्तव गोठ सुखी ला पूछ.”
जहां गरीबा ढाढ़ा कूटिस, सुद्धू ला चढ़गे कंस जोश
टिंया के मितानी टोरत अउ, जोमिया लड़त फकीरा साथ-
“”तंय बुढ़ुवा टूरा संग लड़थस, थोरको असन भला कर शर्म
तोर टुरा अंधेर लड़ंका, तभो संरोटा लेवत खूब !
मोर गरीबा ले अब लड़बे, या अटपट अस भाखा टांठ
पहटा टोर दुहूं मंय नसना, देव ला सोझियावत पिट सांट.”
सुद्धू हा जहां अतका बोलिस, चढ़िस फकीरा पर बिख-खार
मिरचा होय बड़े के छोटे, मगर खाय मं चढ़थय झार.
ओहिले कूद फकीरा बखलत-“”मोर मरइया होथस कोन !
तोर गरीबा खयटहा बिक्कट, मोर मयारु सनम हा सोन.
दही जमे नइ मोर हाथ मं, तोर मार खाहंव चुपचाप
अगर अपन पत चहत बचाना, मुंह करिया कर-घर पग नाप.
लड़त फकीरा अउ सुद्धू मन, बायबिरिंग हो मुंह फरकात
टूरा मन तक ठाड़बाय नइ, लड़ई बढ़य कहि कुबल लुहात.
केड़ू दुनों पक्ष ला बोलिस – “”करो समाप्त लड़ाई ।
बच्चा झगड़ के फिर मिल जाथंय जइसे पाट के भाई ।।
जब ग्रामीण बीच मं अंड़ गिन, शांति रखे बर करिन बचाव
तभो दुनों झन क्रोध मं हंफरत, एक-दूसर ला देखत लाल.
अपन गरीबा ला हेचकारत, सुद्धू लेगत हे घर कोत
लहुट फकीरा सनम ला देखत, कहत गरीबा ला कंस डांट-
“”मंय हा तोला सीख देत हंव, यदि खेले बर तोर विचार
तंय “ढारा’ चल खेल सकत हस, उहां के मनखे सरल उदार.
मगर फकीरा-सनम शत्रु अस, मन मं रखत कपट के दांत
उनकर छंइहा कभू खूंद झन, उंकर ले दुरिहा रहि प्रण ठान.”
सनम ला फकीरा चेचकारत -“”बड़ उठमिलवा बेटा-बाप
उंकर साथ तंय अड्डी रहिबे, मढ़त हमर पर अटपट दोष.”
बनिन हेरौठा अउ घर लहुटिन, कुरबुरात मुंह करु बनात
सुद्धू घर आइस तब मिलगे, बिसरु अपन पुत्र के साथ.
बिसरु अपन पुत्र ला देखत, कहिथय -“”एकर दसरु नाम
आय गरीबा-संग खेले बर, फूल बदे बर-बदे मितान.”
सुद्धू, दसरु के अंगरी धर, अंदर घर लेगिस तत्काल
बिसरु ला खटिया पर बइठा, अब सुनात मितरंउधी हाल-
“”काय बतांव अपन लेड़गई ला, मोला लगत घलो बड़ लाज
मंय बिपताय बाल झगरा में, फोकट नाश होत दिन आज.”
बिसरु कथय- “”तोर बाबू हा, अड़बड़ कंइया हवय मितान
चिभिक लगा-कहुं बने पढ़ाबे, बनिहय समझदार गुणवान.”
सुद्धू बिसरु गोठमं भूलेे, बालक मन के बिधड़क हाल
आपुस मं टक बांध के देखत, होवत ललक करे बर मेल.
अपन जंहुरिया जान गरीबा, तुरुत गीस दसरु के पास
ओकर “बुगई’ ला खन दिस चुट चुट, पर तन देखत खुल खुल हांस.
दसरु घलो कलबला गे तंह, खींचिस जोर गरीबा के बाल
बिन कारण झगरा जर बढ़गे, होवत दुनों मध्य चिरबोर.
इंकर तीर सुद्धू दउड़िस अउ, शांत करिस-कर बीच बचाव
लान खजानी दीस खाय बर, तंह लइका खावत बड़ चाव.
दसरु कहत गरीबा ला अब -“”चल दिन कहां तोर सब मित्र
चलना उंकर साथ खेलिन्गे, कउनो जाय हार या जीत.”
“”इहां मोर कतको संगवारी, जेमन नइ बोलंय नकसेट
सुखी सनम मन मोर मित्र प्रिय, चल अउ उंकर साथ कर भेंट.”
बोल गरीबा हा दसरु ला, संग लेगिस परिचय करवाय
सुखी सनम मिलगें आगुच मं, खेल करत “लउठी के खेल’
कथय गरीबा – “”सुनव मोर तन, आय एक झन नवा मितान
उहू खेलना चहत तुम्हर संग, का विचार तुम उत्तर देव ?”
“”एकर बर तंय काबर पूछत- हमला कभू कहां इंकार
फोकट समय गंवावव झन तुम, पागी कंस झप होव तियार.”
सनम के कहना सुनिस गरीबा, लउठी लानिस तुरुत तपास
अब चारों साथी मिल खेलत, लेवत नइ एको कन सांस.
लउठी ला ऊपर उठात अउ, चिखला मं धंसात कर शक्ति
लउठी ला लउठी पर पीटत, अमर सफलता होत प्रसन्न.
सुद्धू लइका मन ला खोजत, पर नइ पावत-निकलत तेल
आखिर उंकर तीर जा देखिस-उंकर जमे हे “लउठी खेल’
लउठी उबा घुमैस गरीबा, उदुप घटिस घटना ए बीच-
लउठी बिछल परिस सुद्धू ला, कंझा बइठिस आंख ला मूंद.
बाद चेत लहुटिस तब भड़कत -“”टूरा, तुम मांई बइमान
बुजरुक मन के प्रेम ला टोरवा, तुम खेलत बन एक ठन प्राण.
मंय लइका के लड़ई मं पर के, ठगा गेंव-बन गेंव नदान
मित्र फकीरा ला बक डारेंव, करेंव कुजानिक तेकर लाज.
मित्र फकीरा ला बनाय अरि, आंख मिलाय शक्ति तक खत्म
जउन कुजानिक आज करे हंव, ओकर सजा मार मंय खाय.”
दसरु अउर गरीबा ला धर, लानिस तुरते ताही ।
बच्चा मन नइ जाना चाहत पर नइ बोलत नाही ।।
बिसरु तिर मं सुद्धू केंघरिस -“”का फोरंव मंय अपन बिखेद-
टुरा गरीबा खूब निघरघट, करथय पूर्ण अपन भर रेंद.
नेक सीख ला बिजरा देथय, वाजिब काम ले भागत दूर
एकर कारण मंय घसटाथंव, पुत्र के कारन मयं बदनाम.”
सुद्धू मर मर बिपत ला रोवत, ताकि सहानुभूति मिल जाय
पर बिसरु हा पक्ष लेत नइ, अउ ऊपर डारत हे दोष-
“”बच्चा छल प्रंपच ले दुरिहा, झगरा कर-फिर बनत मितान
इनकर बीच परे तंय काबर, जबकिन तंय हुसनाक सियान.”
गोठ लमावत सोच के बिसरु, बात सुहावन फेंकिस जल्द-
“”मितवा, व्यर्थ फिक्र झन कर तंय, तोर पुत्र के नेक सुभाव.
अच्छा, अब हमला जावन दे, गोटकारी मं कटगे आज
अपन बुता मं मंय पछुवावत, घर मं पहुंच पुरोहंव काम.”
सुद्धू कथय -“”तिंहिच खरथरिहा, तोर बिगर अरझे सब काम
गांव करेला जाबे कल दिन, आज इहां भर कर विश्राम.
जान देंव नइ- रुकना परिहय, तोर गांव हम आबो दौड़
अगर पेल तुम रद्दा नापत, हमर तोर मं लड़ई अवश्य.”
बिसरु खुलखुल हंस के कहिथय-“”ले भई, हम बिलमत ए धाम
मगर आज का जिनिस खवाबे, फोर भला तो ओकर नाम ?”
“”हमर इहां चांउर पिसान हे, हवय तेल गुड़ शक्कर नून
मिट्ठी-नुनछुर सब बन सकही, जउन विचार पेट भर खाव.
सगा जेवाय जिनिस हे छकबक, चुनुन चुनुन हम चिला बनाब
मांईपीला बइठ एक संग, स्वाद लगा भर पेट उड़ाब.”
कहि सुद्धू हा तुरते घोरिस-एक सइकमा असन पिसान
आगी बार तवा रख चूल्हा, डारिस तेल घोराय पिसान.
सुद्धू हा चीला बनात हे, पर चीला हा बिगड़त खूब
ओहर तवा मं चिपके जावत, या फिर जावत पुटपुट टूट.
इही बीच मं अैस सुकलिया, ओहर हंसिस हाल ला देख
कहिथय -“”तंय चीला बनात हस-गदकच्चा अधपके पिसान.
एला यदि लइका मन जेहंय, ओमन ला करिहय नुकसान
मोला तंय चीला बनान दे, मंय हा चुरो सकत हंव ठीक.”
सुद्धू कथय -“”कहत हस ठंउका-जेवन रंधई कला ए जान
जमों व्यक्ति हा निपुण होय नइ, सर मं सती होत हे एक.
खपरा रोटी-गांकर सेंकत, चीला बनई कठिन हे काम
तंय हा चीला आज बना दे, सीख जहंव मंय ओला देख.”
चीला ला पलटात सुकलिया, सुद्धू बिसरु बात चलात
सुम्मत बंधत गरीबा दसरु – चील अस किंजरत चीला-पास.
कथय गरीबा -“”हमन खेलबो-सगा परोसी उत्तम खेल
हमला तो बस चीला चहिये, ओकर बिन नइ आय अनंद.”
कथय सुकलिया -“”धैर्य रखव कुछ, मंय चीला बनात हंव जल्द
एक साथ तुम सब झन बइठव, तंहने जेव लगा के स्वाद.”
भुलवारत हे खूब सुकलिया, तुलमुलहा मन नइ थिरथार
केंदरावत तब दंदर जात हे-बड़ खिसियात चिला-रखवार.
परे हवय चितखान सुकलिया, ओकर ध्यान तवा तन गीस
तिही मध्य दसरु चीला धर, पल्ला भागिस बिगर लगाम.
ओकर तोलगी धरिस गरीबा, तुर तुर तुर तुर अति उत्साह
पुछी चाब दउड़त हे जइसे-कातिक चल के अघ्घन माह.
ओमन दुसरा खंड़ मं पहुंचिन, कथय गरीबा -“”तोर मं फूर्ति
मंय हा जोंगत रेहेंव बहुत क्षण, पर तंय चीला ला छिन लेस.”
दसरु कथय- “”आज नइ खावन, कल बर लुका के चुप रख देत
जब एको झन तिर नइ रहिहंय, हम तुम दुनों झड़कबो बांट.”
ओमन चीला लुका दीन खब, तभे सुकलिया दीस अवाज-
“”चीला चोर कहां हो तुम्मन, मोर पास झप दउड़त आव.
सब चीला मंय बना डरे हंव, तुम्मन पहुंच के जेवन लेव
करहू देर जिनिस ले वंचित, भूख मरत पछताहव खूब.”
लइका मन आपुस मं बोलिन- “”काबर करन टेम ला नाश
अगर बेर- खा लिहीं हुड़म्मा, फिर चुचुवाना परिहय बाद”
सुम्मत बांध-बुंधी के आइन, दीस सुकिलया जेवन खाय
कहिथय- “”मंय वापिस जावत हंव, तुम खा लेव बचत ला हेर.
बिसरु कथय- “”तंहू भोजन कर, तंय चिला बनाय कर यत्न
जब तंय हा मिहनत बजाय हस, जिनिस खाय बर तक हक तोर.”
किहिस सुकलिया- “”मोला खीचिंस- बाल गरीबा के इस्नेह
एकर साथ भेंट जब करथवं, मोर ह्मदय पाथय संतुष्टि.
एक काम अउ बढ़िया होइस- दसरु संग होगिस मिल भेंट
ओहर निश्छल चंचल लइका, सितरा जुड़ा दीस मन मोर.”
गीस सुकलिया अपने घर तन, टुरा गफेलत अउ अउ मांग
तनगे पेट गोल कोंहड़ा अस, तंहने उठिन खवई ला छोड़.
बोलिन- “”कुछुच चीज नइ चहिये अब तो बुतगे हाही।
नंगत लगत उंघास हमन ला दसना खटिया चाही।।
ठंउका में लइका मन झुमरत, सुद्धू दउड़ बिछादिस खाट
उठा सुतावत भर मं भइगे- दूनों झन के आंख हा बंद.
दुनों टुरा मन एकमई ढलगें, उंकर भयंकर घटकत नाक
सुद्धू बिसरु हर्षित होवत, लइकुसहा के मुंह ला देख.
बुजरुक मन तक सुते चहत हें, आंख मूंद के करत प्रयत्न
पर बालक के कंझट कारण, आवत नींद तेन भग जात.
बिसरु टेम कटे बर बोलत- “”तोर कष्ट ले होवत सोग
घर के सरी बुता निपटाथस, तिहिंच एक झन दुख ला भोग.
तेकर ले सलाह मंय देवत, तिरिया बना लान ले खोज
ओकर आय ले दुख हा कमसल, कनिहा नवत तेन हा सोज”
“”भितरंउधी हे आस अतिक अस- बढ़य गरीबा करंव बिहाव
ओकर भलले मोर घलो भल, मात्र पुत्र हा लिही हियाव.
एक रहस्य पुनः फोरत हंव- आय गरीबा हिनहर फूल
ओला मंय गुणवान बनाहंव, ताकि भविष्य प्रकाशित होय”
कहि के सुद्धू आंख ला मूंदत, बिसरु तक सोवत चुपचाप
रतिहा हाजिर काम करे बर, लेत अराम गांव अतराप.
खोर गली मन शांत तिही बिच, दौड़ो दौड़ो चलिस अवाज
ग्राम निवासी झकनका उठगें, अभिन बिगड़गे काकर काम?
सुद्धू बिसरु आरो ओरखिन- सोनू घर तन खदबद होत
बेंस लगा दूनों झन तरकिन, मनसे दल जावत जे कोत.
सोनसाय के घर मं पहुंचिन, उंहा लगे हे गंजमंज भीड़
सब के मुड़ पर प्रश्न के मोटरी, जमों चहत हें सही जुवाप.
सुद्धू पूछिस अंकालू ला- “”तंय हा काबर दउड़ के आय
मनसे भीड़ करत हे कलबल, कुछ तो कारण ला कहि साफ?”
अंकालू छरकिस- “”तंय सच सुन- तोर असन मंय तक अनजान
जोरहा चिहुर कान मं अमरिस, तंहने इंहा दउड़ के आय.”
किहिस परस- “”तुम धीरज राखव, सोनू फुरिया दिही रहस्य
कार रातकुन हांका पारिस, जनता ला का वजह बलैस!”
आखिर सोनसाय हा बोलिस, कलबिल भीड़ के चिल्लई दाब-
“”कान खोल के जम्मों सुन लव, मंय फोरत हंव घटना सत्य.
तुम्मन तिजऊ ला टकटक जानत, दिखब मं साऊ गऊ इंसान
वास्तव खतरनाक अपराधी, जिनिस चोराय घुसिस घर मोर.
एहर आलमारी ला टोरिस, उंहा के हेरिस रुपिया सोन
तभे उदुप मंय पहुंच गेंव अउ, रंगे हाथ खब पकड़िच लेंव.
मंय महिनत कर धन जोड़े हंव, सदा रखे हंव अपन इमान
तभे तिजऊ हा भाग सकिस नइ, रंगे हाथ खब पकड़ा गीस.
एकर कर रुपिया-आभूषण, करो पंच मन झपकुन जप्त
तिजऊ के जुर्म क्षमा-लाइक नइ, एला दण्ड देव सब सोच.”
घंसिया जिनिस ला झटके लेथय , सोनसाय के करिस सुपुर्द
किहिस तिजऊ ला- “तंय चोरहा अस, सब अपराध प्रमाणित होय.
सोचे रेहेस- धनी मंय बनिहंव, कंगला के कंगला रहि गेस
सोचेस- मंय ओंटइट ले खाहंव, पर व्यापत हे सप-सप भूख.
सत्य बिखेद फोर सब-सम्मुख, सोनू के घर घुस गे कार
सिधवा अस-कानून ला डरथस, पर का वजह करे अपराध ? ”
तिजऊ जुरुम फट ला इन्कारिस, “”कोन कथय मंय हा अंव चोर
सोनसाय खुद गलत राह पर, डारत हवय मोर पर दोष.”
सब ग्रामीण क्रोध भर जाथंय, परस हा कई थपरा रचकैस
भड़किस -“”तंय हा स्वयं चोर हस, कोतवाल ला डांटत खूब.
तोर हाथ ले जप्त होय धन, तब ले करत हवस इन्कार
सब अपराध हुंकारु भर दे, वरना तंय खाबे अउ मार.”
आखिर तिजऊ सतम ला उछरिस- “”पहिली मोर पास धन-भूमि
याने मंय हा अतका पुंजलग, चलय सुचारु मोर परिवार.
मोर पास जे मंगय सहायता, मंय हरहिंछा मदद ला देंव
सब के भार लेंव धारन अस, सब अतराप प्रतिष्ठा मोर.
इही बीच होगिस एक गलती, सोनू ला बनाय मंय मित्र
“महाप्रसाद’ बदेंव ओकर संग, दू ठन जीव – एक ठन प्राण.
ओहर शुुरु करिस लूटे बर, अपन चई भर लिस धन-भूमि
सोनसाय हा कंगला कर दिस, मंय बनगेंव हंसिया बनिहार.
हवय अमोल बिजा एक दाना, पोट-पोट भूख मरत परिवार
सोनसाय – तिर ऋण मांंगेव मंय, पर लहुटा दिस खाली हाथ.
मोला प्राण बचाय रिहिस हे, तब चोराय बर निर्णय लेंव
आज अनर्थ करे हंव मंय हा, सोनसाय हा जिम्मेदार.
सोनसाय मण्डल गरकट्टा, जे करिहय एकर वि•ाास
मोर असन कंस धोखा खाहय, अपन हाथ खुद सत्यानाश.”
तिजऊ के अन्जरी गोठ ला सुनते, सोनसाय हा ललिया गीस-
“”वाह रे चोरहा, गलत करे खुद, दोष ला डारत हस मुड़ मोर.
पर ला सदा भलाई बांटेव, नित बांटे हंव नेक सलाह
खुद ला तंय भुखमर्रा कहते, तोला मिलतिस मदद अवश्य.
मगर साफ नइ नीयत- बूता, सदा चले हस राह अनर्थ
उही पुराना ढचरा कारण, आज घलो करे हस अपराध”
सोनसाय बैठक ला बोलिस- “”भाई बहिनी, तुम सुन लेव
तुम्मन सत्य तथ्य ले वाकिफ, तिजऊ आय बड़ घालुक चोर.
जमों जुरुम ला खुद स्वीकारिस, अब तुम एकर निर्णय देव
मोर सलाह हवय बस अतका, कड़ा दण्ड तुम एला देव.
एकर भरभस टूट जाय खब, गलत राह रेंगय झन फेर
पर मन घलो सीख ला पावंय, ओगन रेंगय अपन सुधार.
मोर बोल कांटा अस चुभथय, मगर गांव के होत सुधार
शल्य चिकित्सक तन ला काटत, पर ओहर बचात हे जान”
घंसिया किहिस- “”नेक बोले हस, तिजऊ चोर पर हे सब दोष
ओकर गल्ती क्षमा लइक नइ, निश्चय मिलय कड़ा अस दण्ड”
घंसिया हा तंह तिजऊ ला बोलिस- “”सोनू पर लांछन झन डार
तोर दोष हा होय प्रमाणित, तब निर्णय ला चुप सुन लेव-
लान पांच Ïक्वटल अनाज अउ, कड़कड़ रुपिया बीस हजार
तोला समझ महा भुखमर्रा, तरस मरत तब कमती डांड.
हम्मन निर्णय करे हवन अभि, यदि ओकर होवत हिनमान
तंय हा उचुकबुड़ा मं परबे, लासा डबक बेचा जहि रांड़”
सुन के तिजऊ सुकुड़दुम होवत, आज होय मुड़ बोज नियाव
ओकर जीयत खटिया उसलत, बीच सिंधु मं बूड़त नाव.
बपुरा तिजऊ मुड़ी गड़िया लिस, हेरत मुंह ले करुण अवाज-
“”दण्ड पटाय खात हंव लंगड़ी, मोर पास नइ रुपिया अन्न.
मंय भुखमर्रा-कंगला मनसे, पसिया बिगर मरत पोट-पोट
सोनू हा सब धन ला गटकिस, अब मंय पांव कहां ले नोट!”
सुनते परस ततेरत आंखी – “”वह रे चोर – उचक्का ।
स्वयं करे हस काम खोट अउ सोनू पर बदनामी ।।
सोचत हस के आज धवाहंव, पूरा गांव ला मंय भर एक
लेकिन जान हमर सम्मुख में, चल नइ सकय तोर प्रण-टेक”
देख शिकारी हिरण हा कंपसत, पिंजरा अंदर सुवा धंधाय
तिजऊ फंसे बइठक के चंगुल, बात बंद जस मुवा धराय.
सोनसाय हा भीड़ ला बोलिस- “”सुनव गांव के मजुर किसान
तिजऊ बहुत चलवन्ता मनखे, मारत ढचरा गला बचाय.
जे मुजरिम हा चहत बोचकना, कलपत रोथय मुंहू ओथार
प्रस्तुत करथय झूठ गवाही, अपन पक्ष ला करथय ठोस.
न्यायालय दिग्भ्रमित होत हे , मिल जावत मुजरिम ला लाभ
जमों दोष ले मुक्ति मिलत तंह, अलग बइठ के हंसथय खूब.
पांच पंच कुछ दूर जगा हट, सुम्मत बंध के करो विचार-
चोरहा तिजऊ बोचक झन पावय, ओला मिलय सदा बर सीख”
मुटकी हाथ बजा के बोलिस- “”सोनसाय के नेक सलाह
झड़ी-लतेल-परस अउ घंसिया, बनय फकीरा मन हा पंच.
बइठक ले कुछ दूर जांय अउ, आपुस सुंट बंध – करय विचार
तंह निष्पक्ष न्याय ला देवंय, आलोचना होय झन बाद”
पांच पंच बइठक ले उठ गिन, ओमन निकल गीन कुछ दूर
घेरा गोल बना के बइठिन, उहां करत हेंे मंथन खूब.
किहिस लतेल “उमंझ नइ आवत, आखिर हम का करन नियाव
अगर तिजऊ के पक्ष लेत हन, कंगला कहां दे सकही लाभ !
सोनसाय के पक्ष लेत हन, दिही धान – आर्थिक सहयोग
यदि ओकर विरुद्ध हम जावत, निश्चय बाद लिही प्रतिशोध.
हम्मन अपन भलई ला देखन, भले तिजऊ हा बिन्द्राबिनास
पर सोनू ला लाभ देन हम, परलोखिया ला करन प्रसन्न”
कथय फकीरा -“”पंच बने हव, परमे•ार हा बोलत सत्य
लेकिन तुम खुद गलत राह पर, अइसन मं होवत अन्याय.
सोनू मण्डल करिस कुजानिक, तिजऊ के हड़पिस अनधनमाल
रखव सहानुभूति ओकर पर, ताकि भविष्य सुखद बन जाय”
झड़ी हा थोरिक उग्र हो जाथय “”तुम्मन मोर गोठसुन लेव
अपराधी पर दया मरो झन, कभु झन लेव चोर के पक्ष.
अगर तिजऊ पर दया करत हव, करिहय फिर जघन्य अपराध
तेकर ले भरभस टोरे बर, कड़ा दण्ड तुम निश्चय देव”
बइठक-पास पंच मन लहुटिन, तंह घंसिया हा हेरिस बोल-
“”तुम हम पर वि•ाास करे हव, तभे पंच-पद पर बइठाय.
तब फिर हमर फर्ज हे अतका, ककरो पक्ष भूल झन लेन
निर्णय सही-ठीेक हम देवन, न्याय के इज्जत ला रख लेन.
तिजऊ ला पहिली डांड़ करे हन, पर ओहर हिनहर कंगाल
सोनू के घर काम करे खुद, पर नइ मिलय काम के दाम.
तिजऊ के मांईलोगन जग्गी, करय पहटनिन अस कंस काम
ओला श्रम के कीमत मिलिहय, उही भरोसा सब परिवार.
तिजऊ के लइका नाम हे कातिक, जेहर हा अभि पोल्हुवा बाल
काम ले लाइक अड़िल युवक तंह, सोनू के घर बनही भृत्य.
उहू घलो रटाटोर कमाहय, करिहय बुता जमों परिवार
तभे कर्ज ले मुक्त हो सकही, सब अपराधो ले आजाद”
अब लतेल ग्रामीण ला पूछिस, “”करे हवन हम जेन नियाव
ओहर उचित या अनुचित होइस, बिन संकोच कहव तुम साफ”
हुआं-हुआं ग्रामीण करिन अउ, पोंगू घलो समर्थन दीस-
“”सोच-विचार न्याय टोरे हव, होय सुधार नियम कानून.
अब अपराध मं लगगे अंकुश, अपराधी हा पाइस सीख
दार-भांत हा ठीक चुरिस हे, तब हम काबर करन विरोध”
कउनो उफ तक कहन सकत नइ, चलत हवय सोनू के राज
लीम हा आमा राजबजंत्री, तब ले मानत भरे समाज.
सोनू मण्डल तिजऊ ला बोलिस- “”दीन पंच मन निर्णय ठोस
तंय अउ तोर गृहस्थ जमों झन, आज ले बनगेव नौकर मोर.
तुम निर्णय ला स्वीकारत हव, अगर उदेली कहिदो साफ
मगर एक ठन याद ला राखव, बाद मां मत देना कुछ दोष”
तिजऊ कहां कर सकत उदेली, मान लीस पंच के आदेश
बिन कीमत के श्रमिक अमर के, सोनू मुड़ उठात कर गर्व.
सोनसाय ला तिजऊ हा बोलिस- “”पंच के निर्णय हा स्वीकार
लेव मोर ले कठिन परिश्रम, या तुम मारो हर क्षण लात.
लेकिन मोर पुत्र कातिक ला, प्राण बचाय के अवसर देव
मंय हा कष्ट ले मुक्ति पांव नइ, पर कातिक सुख पावय खूब.
एक बिस्कुटक मंहू सुने हंव, समय हा बदलत गति अनुसार
पेड़ मं पहली पतझड़ लगथय, लेकिन बाद नवा नव पान”
भृत्य बने के रश्म पूर्ण तंह, मनखे चिल्लावत भर जोश-
“”होय पंच परमे•ार के जय, सोनसाय के जय-जयकार.”
सब ग्रामीण अपन घर लहुटिन, सुद्धू – बिसरु खुद घर कोत
तिजऊ इंकर तोलगी धर आवत, अपन दर्द ला तरी दबात.
तिजऊ कथय- “”सोनू हा घर लिस, दुख बद ला डारिस मुड़ मोर
अब मर जाना उचित जनावत, मोर भविष्य मं घुप अंधियार.”
गिरिस तिजऊ के सिरी तरी तन, जीवन जिये ले होत हताश
बिसरु हा ओला जियाय बर, लेवत हवय तिजऊ के पक्ष-
“”जन्म ले कोन बनत अपराधी, मगर अभाव ले गलती राह
अगर जरुरत पूर्ण होत तब, कोन चोराये देतिस जान !
यदपि आत्महत्या के करना, निश्चय आय साहसिक कर्म
ह्मदय कठोर – निघरघट मनसे, अपन प्राण हरे बर दमदार.
लेकिन प्रकृति हा जीवन दिस, रउती भर तंय उम्र ला पाल
सुख-दुख, अच्छा-बुरा झेल तंय, निश्चय यहू साहसिक काम.”
सुद्धू कथय- जमों के दुर्गति, बोकरा माने कब तक खैर !
सोनू राखे खोप मोर पर, निश्चय लिही एक दिन दांव.
पर एकर मतलब नइ अइसन, हतोत्साह भर त्यागन जान
अगर हमर सहि सबो सोचिहंय, मरघट मं परिवर्तित वि•ा.
रखना हे आशा भविष्य बर, जिनगी चला फिक्र – गम ठेल
तोर टुरा कातिक अभि नान्हे, बन के युवक दिही सुख खूब”
सुद्धू हा सम्बोधन देवत, तिजऊ ला ओकर घर पहुंचैस
तत्पश्चात अपन घर आथय, बिसरु ला सब व्यथा बतैस-
“”जे वि•ाास करत दूसर पर, ओहर बाद मं धोखा खात
जेन सह्मदय निश्छल मनसे, कपटी ले छल ला अमरात.
सोनसाय अउ तिजऊ दुनों झन एक जान संगवारी ।
पर सोनू हा धन खंइचे बर मितवा संग गद्दारी ।।
सोनू अगर मदद ला मांगय, तिजऊ हा फोकट मं अमराय
मगर तिजऊ के बखत अंड़य तंह, सोनू बाढ़ी-ब्याज लगाय.
सोनू ला मितान समझिस तब, ओकर चई भरिस सब चीज
तिजऊ के अन – धन हा खिरगे तब, वर्तमान हालत हे दीन.
अपन चीज – बस फूंक ललावत, तिजऊ बिचारा सिधवा आज
कतको के हक छिन सोनू हा, मण्डल बनगे गिधवा बाज.
धन ला कउनो पथ ले सकलय, पर ओहर पूंजी धन आय
ओला जउन रपोटत हे कंस, ओकरेच होत प्रतिष्ठा पूछ.
सोनू हवय भ्रष्ट गरकट्टा, पर ओकर तिर धन के शक्ति
तब ओकर तन न्याय हा घूमत, जमों डहर पावत हे जीत.”
सुद्धू हा फिर कहिथय कुछ रुक- “”हम्मन मरन तिजऊ पर सोग
पर जीवन-स्तर सुधरय नइ, दुख हा रहिहय खमिहा गाड़.
सोनसाय के दोष खोजबो, पर धन ला कभु सकय न बांट
मानव सब ले घृणा करत पर, पूंजी पर हरदम आसक्ति.
मानव हा उपदेश ला देथय, साधु- संत जीवन निर्वाह
पर धन-पद-यश-मान पाय बर, मानव करथय सतत प्रयत्न”
बिसरु कहिथय- “”धन के वितरण, संभव दिखत क्रांति के बाद
मोला जप जप नींद जनावत, भेदभाव नइ एकर पास.
नींद हवा पानी प्रकाश पर, सब झन के रहिथय अधिकार
धन जीविका भूमि पर होवय, स्वर्ग कल्पना तब साकार.”
पुट ले मुंदिस दुनों के आंखी, फजर में खुलगे उनकर नींद
रटपट उठिन गरीबा दसरु, करत हवंय चीला के याद.
दसरु कथय- “”रखे हस सुरता, हम्मन कल लुकाय का चीज
तंय खुद ला हुसनाक समझथस, मोर प्रश्न के बता जुवाप ?”
कथय गरीबा- “”मंय जानत हंव, तोर प्रश्न के उत्तर ठीक
तंय चीला के बात करत हस, जेला चुप लुकाय कल ज्वार.
चलना दउड़ दुसर खंड़ जाबो, चीला हेर के लाबो जल्द
हम तुम दुनों पाटभाई अस, जिनिस उड़ाबो आपुस बांट.”
दुनों मितान गीन दुसरा खंड़, चीला ला खोजत हें खूब
पर चीला हा हाथ लगत नइ, लहुट अैैन पालक के पास.
कथय गरीबा हा सुद्धू ला- “”कोन लेग गीस चीला मोर
शंका जावत हवय तोर पर, अगर चोराय सफा तब बोल !
तंय स्वीकार अपन गल्ती ला, हमर पास मं रख दे चीज
वरना फुराजमोखी होहय, सब के पास खोलिहंव पोल.”
सुद्धू कथय – “”अरे एकलौता, मंय नइ जानंव चीला तोर
कहां रखे हस कोन हा लेगिस, जमों बात ले मय अनजान.
कतको मुसुवा बिलई हमर घर, हो सकथय ओमन खा गीन
सत्य बिखेद ज्ञात कर पहिली, तेकर बाद दोष ला डार.
मोर बाप हा चोर ए कहिके, पीट ढिंढोरा झन हर ओर
वरना मंय बदनाम हो जाहंव, मनसे मन हंसिहय घर खोर.
तुमला चहिये खाय खजानी, मंय कर देवत उचित प्रबंध
चुट पुट चना भूंज देवत हंव, खाव दुनों तुम कूद उछंद.”
कोइला आग में चना ला भूंजिस, मुठा मं भर सुद्धू हा दीस
ठठरिंग चाब दुरा मन बोलिन- “”बुढ़ुवा हा बुुद्धू बन गीस.
यद्यपि ददा उमर मं बड़का, पर ओकर तिर हे कम बुद्धि
मिल्खी मारत नवा चाल चल, हम्मन चतुर ला हरवा देन.”
बिसरु हा सब खेल ला देखत, मन मं होवत खुशी-विभोर
सुद्धू ला केंघराय चिढ़ावत, लइका मन के लेवत पक्ष.
बिसरु हा सुद्धू ला बोलिस- “”लइका ला अऊ नानुक बोल
ठंउका मं तंय उंकर ले बड़का, लेकिन ढोल के अन्दर पोल”
सुद्धू कथय- “”रहस्य ला जानत, काबर लेत संरोटा सोग
यदि तंय उकर पक्ष नइ लेबे, बेंदरा पर घोड़ा के रोग”
“”अपन पास हाना गठिया-रख, हम लहुटत हन चीला-चोर
गप्प-गोठमं बिलम गेन हम, अब बिन कारण झन बिल्होर”
अतका कहि बिसरु हा चल दिस, अपन पुत्र दसरु के साथ
बढ़त गरीबा समय के संग मं, पात पिता के मया-दुलार.
एक दिन सुद्धू हा गैय्या ला, घांस खवा-सारत हे पीठ
दूध दुहे के समय अैस तंह, सिझे कसेली ला धर लैस.
अलग जगा बछरु तेला ढिल, लान थन धराथय पनहाय
बछरु ला अलगात गरीबा, दुहे बखत हुमेलन झन पाय.
बछरु हा छटकारत तब ले झींकत हवय गरीबा ।
सुद्धू दूहत दूध चरर माड़ी पर राख कसेली ।।
काम खत्म कर सूद्धू हटथय, करिस गरीबा पिला अजाद
गाय के थन ला बछरु चीखत, मिट्ठी दूध ला लेगत पेट.
कमती दूध गरीबा देखिस, तंह सुद्धू तिर रखथय प्रश्न –
“”काबर खोंची अस निचोय हस, मोर पिये बर कमती होत”
“”बछरु घलो हमर अस प्राणी, पोंस के करिहंव बली जवान
कृषि के काम ला अड़ निपटाहय, बइला होथय कृषक के मित्र.”
सुद्धू हा कहि दूध चुरो झप, पुत्र ला परसिस दूध अउ भात
बइठ पालथी खात गरीबा, धोइस हाथ छके के बाद.
सुद्धू हा पट्टी-किताब दिस, कथय गरीबा ला कर स्नेह-
“”शाला जाय टेम हा हो गिस, उहां पहुंच के तंय पढ़ खूब.
जमों छात्र मन तोर हितैषी, उंकर साथ तंय रखबे प्रेम
ककरो गुमे जिनिस यदि पाबे, ओकर चीज ला लहुटा देव.
तोर ध्यान ला हरदम रखथव, तब मंय राखत हंव वि•ाास
तोर शिकायत आय कभुच झन, नेक राह पर रैंग सदैव”
तुरुत गरीबा हा चिढ़ जाथय- “”शाला जाय बढ़ाथंव गोड़
चिक चक कर-उपदेश पियाथस, अब ले भाषण ला रख बंद.
एकर बदला एक काम कर- मोला पढ़ा गणित-विज्ञान
तोर समय हा ठीक कट जाहय, विकसित होहय मोर दिमाग”
सुद्धू हा प्रसन्न हो जाथय- “”अब मोला हो गिस सब ज्ञात
विद्या पाय तोर रुचि बढ़ गिस, निश्चय उज्जवल तोर भविष्य.
विषय के प्रश्न के उत्तर खोजत, खोज करत जिज्ञासु समान
जग मं कठिन प्रश्न हे कई ठक, तिहिंच एक दिन देबे ज्वाप.
एक बात मंय कहे चहत हंव – तंय कतको बड़का बन जास
मगर हमर बर नानुक शिशु अस, सदा गाय बर बछरु आस.
हम डरथन- तंय गलत रेंग झन, तब हम देवत रथन सलाह
यद्यपि तोला अनख जनावत, पर आखिर तोरेच भर लाभ”
बुस्ता ला धर लीस गरीबा, कूदत निकल जथय घर छोड़
धनवा घलो आय सहपाठी, तेकर घर मं बिलमिस गोड़.
सोनू अपन पुत्र धनवा ला, देत ताड़ना तिर मं रोक-
“”बेटा, मंय हा जउन बतावत, राख सुरक्षित अंतस- टोंक.
ज्ञान पाय शाला मं जावत, उहां उपस्थित कई झन छात्र
उंकर साथ हंस – खेल – मजा कर, पर अस्मिता अलग मं राख.
उनकर स्तर निम्न – गिरे अस, तन के घिन मिन – दीन – दलिद्र
तंय सम्पन्न – धनी के बेटा, तोर ओहदा – पद हा उंच
छात्र साथ तंय प्रेम बना रख, मुह ले हेर शहद अस बोल
पर वास्तव मं होय दिखवा, अंदर ह्मदय घृणा ला राख.
फिल्म के नायक बहुत सयाना, जेहर चलत कपट के चाल
पर्दा मं पर के मदद करथय, रोथय पर के दुख ला देख.
पर वास्तव मं मदद ले भगथय, पर के दुख ले बेपरवाह
अभिनय करे रथय सर्वोत्तम, फूले रथय ह्मदय के फूल.
तंय शाला जा ज्ञान पाय बर, गठिया राख मोर सब सीख
तब जीवन भर छुबे सफलता, कठिन राह ले लगबे पार.”
बुजरुक हा केंवरी माटी ला देवत गलती शिक्षा।
तभे मनुष्य के बीच विषमता होथय युद्ध – लड़ाई ।।
वर्तमान मं धनवा नानुक, कान देत नइ ददा के बात
पर भविष्य मं निश्चय धरिहय, ददा किहिस ते गलती राह.
देखत हवय गरीबा बोकबोक, कुछ समझत-समझत नइ आध
लेकिन असर अवश्य बतावत, तब मुंह पर परिवर्तन – भाव.
धनवा मनगभरी अस निकलिस, बस्ता ला धर बाहिर पार
धरिस गरीबा के अंगरी अउ, जावत पढ़े कदम्मा मार.
एमन सड़क के पास मं पहुंचिन खावत चरबन-दाना ।
लड़की मन हा फुगड़ी खेलत- गावत सुर से गाना ।।
गोबर दे बछरु गोबर दे
चारों खूट ला लीपन दे
चारो देरानी ला बइठन दे
अपन हा खाथय गूदा गूदा
मोला देथय बीजा बीजा
ऐ बीजा ला काय करिहंव
रहि जाहंव तीजा
तीजा के बिहान दिन
सरी-सरी लुगरा
कांव – कांव करे मंजूर के पीला
हेर दे भउजी कपाट के खीला
एक गोड़ मं लाल भाजी
एक गोड़ म कपूर
कतेक ला मानों मंय देवर – ससुर
फुगड़ी रे फुन . . . . ।।
फुगड़ी रे फुन . . . . ।।
शाला के घण्टी हा बाजिस, भगिन छात्र मन गुण अमराय
उहां बइठथंय पास मं घंसरत, धनी – दीन सब एक समान.
शिक्षक मिलतू सीख देत सम, सब ला हांकत लउठी एक
छात्र लड़त तंह फिर मिल जावत, भूलत तुरुत शत्रुता बैर.
इही बीच एक घटना घटगिस, धनसहाय के गुम गिस पेन
ओहर मिलतू गुरु ला बोलिस – “”मोर समस्या ला सुलझाव-
मोर पेन हा कहां गंवा गिस, ओला मंय खोजत हंव खूब
पर ओकर दउहा नइ पावत, कामें लिखंव उमंझ नइ आत ! ”
मिलतू हा सब छात्र ला बोलिस – “”भाई बहिनी अस तुम आव
एक दूसरा के शुभचिंतक, मोर मान लव नेक सलाह-
धनसहाय के पेन गंवा गिस, तुम्मन खोजव कर के यत्न
यदि कोई ला पेन हा मीलय, धनवा के असलग मं देव”
कथय गरीबा, – प्रश्न रखत हंव, ओकर ज्वाप देव तुम खोल
यदि एको झन पेन पाय तब, ओहर पाय मुफ्त मं लाभ.
ओकर बात गुप्त हे अब तक, सब के नजर मं मनसे नेक
घाव के मूड़ी बंद हे तलगस, बाहिर तन नइ बहय मवाद.
अगर पेन ला लहुटा देहय, ओकर एक पेन के हानि
ऊपर ले बदनाम हो जाहय, सब के नजर मं घालुक चोर.
अब तुम हा बताव ठोसलग अस – जउन पाय धनवा के पेन
ओहर कार जिनिस लहुटावय, यदि लहुटात बड़े तब भूल ?”
मिलतू किहिस – “”तर्क हे उत्तम, ओहर पाय नगद अस लाभ
पर वास्तव मं हानि बहुत ठक, मंय बतात हंव बिल्कुल साफ –
मान लेव “”क” पेन पाय हे, लुका के राखत खुद के पास
ओकर नीयत गिरतेच जाहय, पर के जिनिस मं लालच खूब.
फोकट पाय यत्न ला करिहय, मगर कर्म ले भगिहय दूर
कर्महीन “”क” हा हो जाहय, ओहर सदा दुसर बर भार.
अगर जिनिस ला लहुटा देवत, ओकर सबो डहर सम्मान
महिनत के आदत हा बनिहय, बढ़ही खूब आत्मवि•ाास.
जेन छात्र हा पेन पाय-लहुटावय तुरते ताही ।
ओकर आदत सुधर जहय-पाहय सब ले वहवाही ।।
तुरुत गरीबा पेन निकालिस, सौंप दीस धनवा के हाथ
ओहर मिलतूगुरु ला बोलिस- “” अब मंय हा बतात हंव सत्य.
मंय चोराय नइ पेन काकरो, तरी मं गिर के रिहिस रखाय
देखेंव तंहने लालच मं मर, पेन उठा के झप धर लेंव”
मिलतू अैस गरीबा के तिर, ठोंकिस पीठ करत तारीफ-
“”तंय स्पष्ट बात बोले हस, ओकर ले मंय बहुत प्रसन्न.
मगर प्रश्न के उत्तर ला ढिल- पेन ला तंय काबर लहुटाय
नेक प्रेरणा कहां पाय हस, कते मनुख बांटिस सत सीख ?”
कथय गरीबा- “”पेन कीमती, मंय नइ लहुटातेंव तिनकाल
लुका के रखतेंव ठउर सुरक्षित, जातिस घर छुट्टी के बाद.
मगर मोर संग घटना घट गिस, शाला आय बढ़िस जब गोड़
तभे ददा हा मोला छेंकिस, मुड़ ला सार राह ला दीस-
पर के गुमेे जिनिस यदि पाबे, लहुटा देबे ओकर चीज
ओकर बल्दा श्रम रउती कर, बिसा सकत बढ़िया अस चीज.
ददा के पाठ गांठ बांधेव मंय, अमर देव धनवा के चीज
मुड़ के भार लगत उतरे अस, धकधक ह्मदय घलो अब शांत”
मिलतू हा धनवा ला बोलिस- “”विचलित रथय व्यक्ति के बुद्धि
धरे जिनिस ले ध्यान हटत तब, ओकर जिनिस कभुच गुम जात.
धनवा तंय हा सच ला फुरिया, शिक्षा काम पेन बिन बंद
ओकर याद भुलाये काबर, आखिर काबर गुम गिस पेन ?”
धनवा बोलिस- “”तंय ठंउका अस, बिल्कुल ठीक तोर अनुमान
शाला आय तियार होय तंह, ददा हा मोला रोकिस टोंक.
बोलिस- शाला मं कई लइका, उंकर साथ हंस-पढ़ लिख खेल
पर अस्मिता कुथा रख तंय हा, खुद ला राख उंकर के ऊंच.
उही बात किंजरत दिमाग मं, खुद ला पूछत मंय कई बार-
का वास्तव मं मंय हंव ऊंचा, अउ मनखे मन कीरा – निम्न ?
इही विचार खोय मंय घोखत, पेन डहर ले हटगिस ध्यान
कतका बखत कोन तिर गिर गिस, मोला एकोकन नइ याद”
मिलतू हा सब छात्र ला बोलिस- “”सम्मुख मं मिल गिस परिणाम
सही सीख के मिलिस उचित फल, गलत बुद्धि के करुहा नाम.
सोनू मण्डल गलत सीख दिस, तब धनवा हा टोंटा पैस
सुद्धू हा पथ नेक बताइस, तभे गरीबा इज्जत पैस.
दुख के गोठ तउन ला सुनलव, हम शाला मं बांटत ज्ञान
प्रेम सहिष्णुता अउ समानता, सेवा दया – वि•ा बंधुत्व.
पर पालक मन घर मं देवत, कटुता भेद के गलती सीख
पालक के प्रभाव बालक पर, तब पालक के मानत बात.
लइका भगत लक्ष्य ले दुरिहा नष्ट होत हे भावी ।
करथय काम समाज के अनहित पात घृणा – बदनामी ।।
मिलतू फेर छात्र ला बोलिस – “”मोर तो अतका कहना साफ
कृषक ला मिलथय गोंटी – पथरा, अन्न के दाना अउ कई चीज.
ओहर फेंकत व्यर्थ जिनिस ला, बोवत खेत अन्न के बीज
ओकर ले अनाज हा उपजत, अन्न झड़क सब प्राण बचात.
उसनेच तुम्हर राह भर बिखरे, गुण – अवगुण अउ सत्य असत्य
तुम उत्तम सिद्धान्त ला चुन लव, सकुशल रहि पर हित ला जोंग”
शाला हा जब बंद हो जाथय, जमों छात्र मन बाहिर अैन
धनसहाय सुखी सनम गरीबा, खेल जमाय गीन मैदान.
उंकर हाथ मं गिल्ली डंडा, ओमन चूना तक धर लाय
तुरते घेरा गोल बना लिन, जोंड़ी बने करत हें घोख.
धनवा किहिस – सुझाव देत हंव, अब प्रारंभ खेल हा होय
सनम गरीबा गड़ी एक तन, मंय अउ सुखी दूसरा कोत.”
छेंकिस सनम “”नहीं रे भैय्या, तुम्हर बात हा अस्वीकार
सनम गरीबा गड़ी बनन नइ, ओकर साथ भुगत मंय गेंव.
हम नांगर के खेल करेन तब, बइला बनेंव गरीबा साथ
खेल मं मजा अमरतेन लेकिन, चलिस गरीबा कपट के चाल.
गल्ती करिस दण्ड ला पातिस, पर मंय खाय इरता के मार
एकर ददा दीस कंस गारी, जमों डहर ले मंय बदनाम.
तब अब फेर भूल झन होवय, आज खेल मं मिलय अनंद
मोला तुम दूसर मितवा दव, रहंव गरीबा ले मंय दूर”
खूब खलखला हंसिस गरीबा – “”जुन्ना लड़ई ला झन कर याद
बिते बात गनपत के होथय, वर्तमान पर राख निगाह.
मिलतू गुरु किहिस हे हमला, शांति अशांति मित्रता युद्ध
युद्ध-अशांति ला तज दो तुम हा, शांति मित्रता ला धर लेव.
तंहू बुद्धि मं सदभावना रख, गलत विचार ला बिल्कुल त्याग
“गिल्ली डंडा’ खेल हा उत्तम, खेल भावना रख के खेल.”
मात्र तीन चिट लिखिस गरीबा, सुखी गरीबा धनवा नाम
तंहा सनम ला कथय गरीबा- “”मात्र तीन चिट मंय लिख देंव.
तंय हा हेर एक चिट झपकुन, चिट मं जेन व्यक्ति के नाम
उही खिलाड़ी तोर गड़ी सुन, बचत तेन मन दूसर पक्ष.”
सनम निकालिस तुरुत एक चिट, ओमां धनसहाय से नाम
सुखी कथय- “”अब पूर्ण तोर मन, गीस गरीबा तोर विपक्ष.
तुम धनसाय एक बन खेलव भेद ला डारो लद्दी ।
दूसर डहर गरीबा अउ मंय खेलन छोड़ के बद्दी ।।
धनवा कथय- “”बेर झन होवय, खेल शुरु हो जाय तड़ाक
पहिली दामा कोन हा लेवय, एकर बात साफ कर देव ?”
कथय गरीबा- “”चिट हा निकलिस, पूर्ण होय तब मंसा तोर
अब हमला दामा लेवन दव, दुनों पक्ष के सम अधिकार.”
बोलिस सनम- “”हुंकी हम देवत, हमरे दलके मोंगरा नाम
तुम्हर दल के गोंदादल सुन, अंतः ह्मदय करो स्वीकार”
खेल ला शुरु करिन जम्मों मिल, सुखी रखिस गिल्ली ला भूमि
ओकर छुचकी भाग ला जोखिस, लउठी मं कंस के रचकैस.
गिल्ली हा सनसना के उड़गे, आगू डहर सनम हे ठाड़
करिस यत्न गिल्ली झोंके बर, पर असफल चल दिस सब यत्न.
आखिर गिल्ली गिरिस भूमि पर, सनम हा उठवा लिस तत्काल
फेंकिस गोल घेर के अंदर, उहू लक्ष्य रहि गीस अपूर्ण.
धनवा रिहिस गोल के अंदर, गिल्ली तूकत खोल के आंख
पर गिल्ली हा तीर अैस नइ, बोचक उड़ागे दूसर ओर.
सुखी खड़े घेरा के बाहिर, गिल्ली ला रोकिस फट मार
गिल्ली हा जमीन पर गिर गिस, गोंदा दल हा पावत जीत.
सुखी गरीबा दामा लेवत, दामा देत सनम धनसाय
धनवा कहिथय – “”काय करन अब, धुंकनी असन चलत हे सांस.
तोर उदारता लैस मुसीबत, गोंदादल ला दामा देन
ओहर अब तक रगड़ा टोरत, हम तुम कुटकुट ले थक गेन.
तंय हा हेर उपाय उचित अस, हम पारी ला झपकुन पान
गोंदा दल अस दामा लेवन, हमर सिरी हा ऊपर जाय.”
धनवा अपन गड़ी ला बोलिस, सुनत गरीबा रोकिस खेल
धनवा मन ला समय देत अब, टूटय झन आपुस के मेल.
बोलिस- “”गांव के हम भाई अन, हमतुम कपट भेद ले दूर
तुम्मन अब निराश झन होवव, चलव तुमन भी दामा लेव.”
धनवा हा जंह दामा पाइस, गिल्ली ला रटरट रचकैस
सुखी गरीबा गिल्ली झोंकत, पर आखिर मं पावत शून्य.
मुचमुच हंसत सुखी हा बोलिस- “”भुखहा ला जेवन मिल जाय
ओहर जेवन गटगट लीलत, थारी तक ला चाबत खूब.
धनवा ला दामा का मिल गिस, हमर जान लेवत कर तंग
सोग मरत नइ हम दूनों पर, देखत हे बस अपन अनंद.
धनवा हा मुसकावत बोलिस – “”तुम झन होव व्यर्थ परेशान
सनम ला मंय गिल्ली देवत हंव, उहू ला दामा लेवन देव.”
सनम हा भिड़ के दामा लेवत, इसने कटिस बहुत अक टेम
सनम हा गिल्ली हा रचकाइस, ओहर उड़िस सनसना खूब.
आगू खड़े सुखी हा तूकत, गिल्ली झोंक लीस कुछ कूद
जमों मितान होत अब हर्षित, थपड़ी पीटत भर के जोश.
ठीक बखत मं खेल खत्म तंह, अपन मकान लहुट गिन छात्र
एको झन ला चोट परिस नइ, सकुशल बचिस जमों के देह.
ओ मनखे के जनम अबिरथा जउन अपढ़-अज्ञानी ।
ओकर उंचहा दृष्टिकोण नइ-मेचका के जिंनगानी ।।
जे मनसे श्रमखेल मं भिड़थय ओकर तन हा लोहा ।
मान प्रतिष्ठा मिलत सबो तिर-हिम्मत बढ़थय दूना ।।

चरोटा पांत समाप्त

मक्खी-मच्छर मारो अभियान – कबिता

(कविता-जनहित मा जारी)

जौन गढ्ढा मा जनम धरिसे ,

ओला सपाट बनालव

मक्खी-मच्छर ला मारव

अउ तुम उनला दूर हकालव.

मच्छर के चाबे से होथे

डेंगू अउ फायलेरिया

ऊंकर पेट मा घलो पनपथे

चिकनगुनिया मलेरिया.

इंकर बचाव करना हे तुम्हला

मच्छरदानी लगालव

मक्खी-मच्छर ला मारव……….

मक्खी के स्पर्श से होथे

पेचिस,दस्त अउ पीलिया

ऊंकर पांव मा रहिथे बीमारी

हैजा अउ मोती-झिरिया

इंकर से बच के रहना हे तुम्हला

साफ-सफाई अपनालव

मक्खी-मच्छर ला मारव……….

खाये-पीये के चीज मा अपन

इनला झन बैठारव

खोमचा,ठेला ,खुली जगह के

चीज ला झन तुम खावव

इंकर बीमारी होगे जिनला

ओखर इलाज करावव

मक्खी-मच्छर ला मारव……….

मनखे के दुस्मन हे इमन

बहुत बीमारी के जड़ हे

जौन इंखर से करे दोस्ती

उनला तुम समझालव

मक्खी-मच्छर ला मारव

अउ तुम उनला दूर हकालव

मक्खी-मच्छर ला मारव……….

(डाक्टर चैतन्य निगम के सहयोग ले ये कविता के रचना होय हे)

श्रीमती सपना निगम ,

आदित्य नगर,

दुर्ग (छत्तीसगढ़)

भिनसारे ले हर-बोलवा मन
रूख ले अलख जगावंय!
झुनकी घुंघरू संग मजीरा
धरे खंजरी गावंय!
भाग देख दरवजा आइन
हर गंगा दुहरावंय!
सबके मंगल अपन संग म
मालिक ले गोहरावंय!
अब अपन हित खातिर पर के
गर म छुरी चलावत हें!

बेंदरा भलुवा धरे मदारी
जब गलियन म घूमय !
डमरू के डम डम ल सुनके
लइका पिचका झूमय!
डांग* चढ़ंय डंग-चगहा* कइ ठन
हुनर अपन देखावंय!
गुप्ती के पैसा अउ कोठी
के अन्न हर ले जावंय!
बस्तरिहा ओ जरी बूटी न
बैद सही अब आवत हें!

गोरखनाथी गोदरिया के
सारंगी जब बाजंय!
काम बुता ल छोड़ के लोगन
खोर गली बर भागंय!
भजन भरथरी अउ गोरख के
गा गा गजब सुनावंय!
हटवरिया* पखवरिया* भर
मेड़ो-डाँड़ो* तक जावंय!
अब तो ठगे जगे बर कतको
गलियन अलख जगावत हें!

खदबदहा* असाढ़ अब बरसय
सावन गजब चुरोवय!
पानी खिरत जात हे दिन दिन
भादो महीना रोवय!
अमली छइहाँ खड़े पहटिया*
चकमक चोंगी खोंचय !

मुड़ म खुमरी* तन भर कमरा
रुख म ओठगे सोचय!
गौचर कब्जाओ करवइया के
गौ हर काय नठावत* हें !

बइहा पूरा तइहा के अउ
नदिया-खंड़* के खेती!
पानी बुड़ गय जमो कमाई
लगय राम के सेती!
हाट बाट अउ गांव गंवतरी
सपना लागय जावब!
गरीब दुबर के चिंता बाढय़
का पीयब का खावब!
धंधा पार उतारे के अब
केवट के दुबरावत हें!