हमर संस्कृति म भारी पड़त हे मरनी भात खवाना

हमर देस म सांस्कृतिक परम्‍परा के संगे-संग कई प्रकार के सामाजिक कुरीति मन के घलोक भारी भरमार हे, जेमा एक हे मरनी भात (मृत्‍यु भोज) खवाना जेन ह समाज के सोच अउ विकास ल पाछु करत जात हे। कई बछर पाछु के बेरा ले चले आत ये परम्‍परा हे कि कोनो भी मनखे मरथे त ओखर मरे के बाद सगा-संबंधी ल भात खवाये ल लगथे। ओहु एक घव नई दु या फेर तीन घव खवाये ल लगथे। येहि ल दशगात्र, तेरही, बरसी कथे जेमा संबंधी मन ल भात खवाये ल लगथे।



भात खावये के ये परम्‍परा महाराज मन ले जुड़े हे। सियान मन के गोठियाये गोठ ल सुनबे त पाबे की पाछु के बछर म कोनो मनखे के मरे के बाद उखर आत्मा के सन्ति बर पंडित मन ल दान दे के पूजा-पाठ करे जाथे अउ भात खवाये जाथे, जेखर ले मरने वाला मनखे के आत्मा ल शांति मिल सके, अइसे माने जाथे। अब मरने वाला मर गे उखर नाव ले दूसर आदमी ल पेट भर के खाये ल मिलथे। ओहु म सब्बो परकार के पकवान बनथे जेमा पूड़ी सोहारी जरूरी हे। अउ तो अउ लाडू घलोक बांटे जाथे। मराईया के मरे के बाद अतना कुछ घर म बनाके दूसर ल खवाथे के जतका मरने वाला मनखे ह जियत म नई खाये रहिस होही। ओहु म जो मर गे हे तेला मिलहि कई के दूसर ल खवाथे अब ओ ह ये सब ल कहा ले पाही, ओ हा तो राख होंगे। जो सरीर ह खाये-पिये के मजा लेथे ओ हा रहिबे नई करीस।
अउ तो अउ हमर संस्कृति म कोनो जनम लेथे त भात खवाथे, मरथे त भात खवाथे, बिहाव करथे त भात खवाथे, चाहे कुछु होवय भात खाये ल लगथे, येहि सोच ल बदलना जरूरी हे, काबर की समय के संग सब्बो ह बदलथे त अइसने गलत सोच ल सब्बो समाज ल मिल के बदलना चाही।
विचार– अउ अगर ये प्रथा ल चलान हे त अइसे मनखे मन ल भात खवाना चहि जोन गरीब हे जोखर पास खाये बर कुछु नई रहे। अउ ओहु मन ल सादा दाल-भात खवाना चाही पकवान बना के नई खवाना चाही। येमा पुन्य के पुन्य अउ पइसा के बचत घलोक होही।

अनिल कुमार पाली
तारबाहर बिलासपुर
प्रशिक्षण अधिकारी
आई.टी.आई मगरलोड धमतरी
मो.न.7722906664
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