ग़ज़ल छत्तीसगढ़ी

भैया रे, तै हर नाता, अब हमर ले जोड लेबे, जिनगी के रद्दा उलटा हे, सँझकेरहा मोड़ लेबे। पहती सुकवा देखत हावै, सुरुज अब उगइया हे, अँधियारी संग तै मितानी, झप ले अउ छोड़ देबे। बिन छेका-रोका हम पर घर आबोन-जाबो जी, बड़का मन ल करे पैलगी, कहिबोन बबा गोड़ देबे। कइसनो राहय सरकार इहाँ, हमला का करना हे, समरसता लाये बर संगी, जम्मो डिपरा कोड़ देबे। कौनो परोसी निंदा करथे, अपने घर में आ के, मन हर कहिथे भाई संग, तैं ह नाता तोड़ देबे। बलदाऊ राम साहू संझकेरहा=शीघ्रतापूर्वक,…

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छत्तीसगढ़ी बाल गीत

कुतर-कुतर के खाथस मुसवा, काबर ऊधम मचाथस मुसवा। चीं-चीं, चूँ-चूँ गाथस काबर तैं, बिलई ले घबराथस काबर तैं । काबर करथस तैं हर कबाड़ा, अब तो नइ बाँचे तोरो हाड़ा। बिला मा रहिथस तैं छिप के, हिम्मत हे तब देख निकल के। कान पकड़ के नचाहूँ तोला, अड़बड़ सबक सिखाहूँ तोला। बलदाऊ राम साहू

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छत्तीसगढ़ी गज़ल

अब नगरिहा गाये नहीं, काबर ददरिया। संगी ला बलाये नहीं, काबर ददरिया। बेरा-कुबेरा खेत-खार म गुंजत राहय, हमला अब लुभाये नहीं, काबर ददरिया। मन के पीरा, गीत बना के जेमा गावन, अंतस मा समाये नहीं, काबर ददरिया। कुहकत राहय ओ कोयली कस जंगल मा, पंछी कस उड़ाये नहीं, काबर ददरिया। करमा, सुआ अउर पंथी के रहिस संगी, अपन तान उचाये नहीं, काबर ददरिया। –बलदाऊ राम साहू

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बलदाऊ राम साहू के छत्‍तीसगढ़ी गज़ल

1 झन कर हिसाब तैं, कौनो के पियार के । मया के लेन-देन नो हे बइपार के । मन के मंदिरवा मा लगे हे मूरत ह, कर ले इबादत, राख तैं सँवार के । मन के बात ला, मन मा तैं राख झन, बला लेते कहिथौं, तैं गोहार पार के। दिन ह पहागे अउ होगे मुँधियार अब, देख लेतेस तैं हर मोला निहार के। ‘बरस’ के कहना ल मान लेतेस गोई, काबर तैं सोचथस कान हे दिवार के । 2 तरकस ले निकल गे तीर, कइसे धरन मन मा धीर।।…

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गजल

जम्मो नवा पुराना हावै। बात हमला दुहराना हावै । लूट सको तो लुट लौ भैया, सरकारी खजाना हावै । झूठ-लबारी कहि के सबला सत्ता तो हथियाना हावै। कतको अकन बात हर उनकर लागे गजब बचकाना हावै। पेट पलइया मांग करे तब, रंग – रंग के बहाना हावै। सब के मुँह म बात एके हे, उलटा इहाँ जमाना हावै। अब भाई के गोठ- बात मा घलो सियासी ताना हावै । रंग-रंग के =तरह-तरह के बलदाऊ राम साहू

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ग़ज़ल : उत्तर माढ़े हे सवाल के

हो गे चुनाव ये साल के। उत्तर माढ़े हे, सवाल के। बहुत चिकनाईस बात मा चिनहा ह दिखत हे, गाल के। आज हम कौन ल सँहरावन जम्मो हावै टेढ़ा चाल के। किस्सा सोसन के भूला के, रक्खौ लहू ला उबाल के। झन धरौ कौनो के पाँव ल, अपन ला रक्खौ सँभाल के। बलदाऊ राम साहू

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गजल

सुरुज नवा उगा के देखन, अँधियारी भगा के देखन। रोवत रहिथे कतको इहाँ, उनला हम हँसा के देखन। भीतर मा सुलगत हे आगी, आँसू ले बुझा के देखन। कब तक रहहि दुरिहा-दुरिहा, संग ओला लगा के देखन। दुनिया म कतको दुखिया हे, दुख ल ग़ज़ल बना के देखन। बलदाऊ राम साहू

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छत्तीसगढ़ी नवगीत

चलव गीत ल गा के देखन, चलव गीत ल गा के देखन, अंतस ल भुलिया के देखन। सुख अउ दुख तो आथे-जाथे, कभू हँसाथे कभू रोवाथे। मन के पीरा ला मीत बना ले अपने अपन वो गोठियाथे। ये सब के पाछू मा का हे ? चिटिक हमू फरिया के देखन। चार दिन बर चंदा आथे फेर अँधियारी समा जाथे ये जिनगी के घाम-छाँव हर दुनिया भर ला भरमाथे। जिनगी के मतलब जाने बर दुख-पीरा टरिया के देखन। जिनगी सरग बरोबर होथे सुख हर जब सकला जाथे मन उछाहित हो जाथे…

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छत्तीसगढ़ी गज़ल

भाषण सबो देवइया हावै। सपना गजब देखइया हावै। कौन इहाँ जी सच ला कहही सब के सब भरमइया हावै। काकरो मुँह में थाहा नइ हे मर्यादा कौन निभइया हावै? देस के चिंता हावै कौन ल, गड़बड़ गीत गवइया हावै। सबरी कस रद्दा हम देखथन राम कहाँ ले अवइया हावै? थाहा=नियंत्रण बलदाऊ राम साहू

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ग़ज़ल

हममन बस गोहरइया1 हावन2। उनकर पानी भरइया हावन।। देस के देवता-धामी मन के। पूजा हममन करइया हावन। उही मन समरथ, ग्यानी, पंडित। हम तो पाँव परइया हावन। राम-राज हर आही कहाँ ले पाछू-पाछू रेंगइया3 हावन। दुनिया हर आगु रेंगत हावै। उनकर पूछी धरइया4 हावन। बलदाऊ राम साहू 1. चिचोरी करने वाले, 2. हैं, 3. चलने वाले, 4. पूँछ धरने वाले

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