हमर गांव डाहर झलप के तीर म ढेलवा डोंगरी हे। एकर ले संबंधित भीम अउ हिरमिसी कैना (हिडम्बनी) के एक कथा हे। ये डोंगरी म ओ कैना के महल रिहीस अउ झूले बर बड़े जनिक ढेलवा रिहीस। पंडो मन के बनवास के समय घूमत घामत एक दिन भीम ह ओ डोंगरी म आगे। ढेलवा झूलत हिरमिसी कैना ओकर ऊपर मोहागे। भीम ल किहीस बड़ सुग्घर अउ बल्कहार दीखत हस। लेतो मोला बने ढेलवा झुला। भीम ह वो कैना ल ढेलवा झुलईस। झूलावत झुलावत उत्ती कोती ढेलवा ह जाय तब जोंक…
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माटी बन्दना – बंधु राजेश्वर राव खरे
(इस कविता का हिन्दी अनुवाद आरंभ में देखें) माटी के हमर घर-कुरिया माटी हमर खेती-खार हे जय हो महतारी माटी महतारी तोला हमर जय जोहार हे। माटी मं सबके उपजन-बाढन माटी मं जिनगानी माटी जनम-करम के संगी माटी हावय अनपानी माटी सबके तन-मन के सिंगार हे। माटी के बनथे नंदिया बईला माटी के जांता-पोरा माटी के गनपति अउ दुरगा माटी के गौरी-गौरा छत्तीसगढ मं बारों महिना माटी के तिहार हे। माटी के बनथे कुडेरा-तउला दुहना-ठेकवा-कनौजी लाली करसी, खपरा, हंडिया परई-दीया-कलौरी इन जम्मों के गढइया भईया कुम्हार हे! जय हो महतारी…
Read Moreपईसा म पहिचान हे
रामदास ह समय के संगे संग रेंगे के सलाह सब झन ल देवत रथे। ”जइसे के रंग, तइसे के संगत” अभी के समय मं पईसा के बोलबाला हावय। एक समय रिहिस जब लाखों के काम एक भाखा मं हो जावय। एक जमाना येहू रिहिस कि गांव के नेता हर गली खोर मं परे डरे कागज, सिगरेट के खोखा मं लिख के देवय कि अमुख के मास्टरी बर आर्डर कर दो, अमुख ल पटवारी के नौकरी मं भरती कर दो तहां तुरूते आर्डर मिल जावय। काबर कि ओ बखत के नेता…
Read Moreतीजा के लुगरा – बन्धु राजेश्वर राव खरे
”सालपुर तीजहा लुगरा के गिरत दसा ल देखके एसो ओला नइ सहइस। लुगरा ल अपन तन म मन मार के लपेटे रिद्धहस फेर ओखर मन हर नंगत काच्चा होगे। ओखर ले नई रेहे गीस तब अपन भाई ल सुना दीस, मैं अभी पाठ के भाई होतेंव तब ये पुरखौती जहिजाद के दू बांटा होतीस। मैं अभी अंड़ जाहंव तब कान्हून घलों अभी ऐ जहिजाद के दू भाग कर देही। सालभर म तीजा के नाव लेके एक बेर बेटी, बहिनी के आना होथे। हमरो मान-सनमान के नेग रथे सवाल रथे। तीजा…
Read Moreहाथी बुले गांव – गांव, जेखर हाथी तेखर नाव
नाव कमाय के मन, नाव चलाय के संऊख अउ नाव छपाय के भूख सबो झन ल रथे । ये भूख हर कउनो ल कम कउनो ल जादा हो सकथे, फेर रथे जरूर । एक ठन निरगुनिया गीत सुने बर मिलथे – नाम अमर कर ले न संगी का राखे हे तन मं । कतकोन झन नाम अमर करे के चक्कर मं नाम नहि ते बदनाम कहिके गलत-सलत काम घला कर डारथें । अइसन मन पटंतर घला दें डारथे कि राम के नाव हावय तब रावन के घला नाव हावय ।…
Read Moreअब बिहाव कथे, लगा के देख
केहे जाथे कि जन्म बिबाह मरन गति सोई, जो विधि-लिखि तहां तस होई । जनम अउ मरन कब, कहां अउ कइसे होही ? भगवान हर पहिली ले तय कर दे रथे । वइसने ढ़ंग के बिहाव कब, कहां अउ काखर संग होही ए बात के संजोग भगवान हर पहिली ले मढ़ा दे रथे । फेर अइसन सोच के घर मं बइठे रेहे ले काम नइ चलय । दाने – दाने पे लिखा है खाने वाले का नाम कहिके चुप बइठे रहिबे तब दाना तोर पेट मं नइ जावय । नसीब…
Read Moreइही तो आजादी आय
गनपत अउ धनपत दुनो झन रेडियो सुनत बइठे राहंय । रेडियो हर नीक-नीक देसभक्ति के गीत गावत राहय अउ बोलत राहय कि हमर आजादी साठ बरीस के होगे । तब गनपत हर धनपत ल पूछथे कि- रेडिया हर अजादी ल साठ बरीस के होगे कथे फेर हम तो आज ले ओखर दरसन नइ करे हावन । कइसना होथे ये आजादी हर ? ये अजादी के बिसय मं तैं का जानथस कुछु बतातेस ? तब धनपत बोलथे- पहिली हम अंगरेज के गुलाम रेहेन । आज अंगरेज मन ल हमर देश ले…
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