जस गीत – काली खप्परवाली

काली खप्परवाली आगे ,काली खप्परवाली लप लप लप जीभ लमावत, रूप धरे विकराली सब दानव ल मरत देख के, शुम्भ निषुम्भ गुस्सागे चंड मुंड कहाँ हौ कहिके , जल्दी तीर म बलाए जावव पकड़ के तुम दुर्गा ल , लावव मोर आगू म साम दाम अउ दंड भेद से , ले आहू काबू म सीधा सीधा नइ आही त , बाल पकड़ के खीचैं नइच मानही तुरते ओकर , लहू बोहाहू लाली शेर उपर बइठे हे माता , अउ मुच मुच मुसकावय ओतके बेरा चंड मुंड हॅ , सेना लेके…

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गजल : दिन कइसन अच्छा

दिन कइसन अच्छा आ गे जी। मरहा खुरहा पोक्खा गे जी ।। बस्ती बस्ती उजार कुंदरा महल अटारी तना गे जी ।। पारै हाँका हाँसौ कठल के सिसका सिसका रोवा गे जी ।। पीए बर सिखो के हमला अपन सफ्फा खा गे जी।। हमला देखावै दरपन उन मुँह जिन्कर करिया गे जी ।। कोन ल इहां कहिबे का तै जम्मो अपनेच लागे जी ।। बाते भर हे उज्जर निर्मल तन मन मुँह बस्सागे जी ।। धर्मेन्द्र निर्मल 9406096346

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छत्‍तीसगढ़ी हाईकुु संग्रह – निर्मल हाईकुु

रचना कोनो बिधा के होवय रचयिता के अपन विचार होथे। मैं चाहथौं के मोर मन के बात लोगन तीर सोझे सोझ पहुंचय। चाहे उनला बदरा लागय के पोठ। लोगन कहिथे के भूमिका लेखक के छाप हँ किताब ऊपर परथे। अइसन छापा ले कम से कम ए किताब ल बचाके राखे के उदीम करे हौं। कोनो भी रचनाकार जेन देखथे, सुनथे, अनभो करथे उही ल लिखथे। एकर मतलब मनखे के अलावा बहुत अकन जीव जिनावर अऊ परिस्थिति घलो प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रचना लेखन म प्रेरित करके यथायोग्य अपन अपन योगदान दिये रहिथे। मैं…

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मोर गाँव के बिहाव

नेवता हे आव चले आव मोर गाँव के होवथे बिहाव। घूम घूम के बादर ह गुदुम बजाथे मेचका भिंदोल मिल दफड़ा बजाथे रूख राई हरमुनिया कस सरसराथे झिंगुरा मन मोहरी ल सुर म मिलाथे टिटही मंगावथे टीमकी ल लाव।।1।। असढ़िया हीरो होण्डा स्प्लेण्डर म चढ़थे मटमटहा ढोड़िहा अबड़ डांस करथे भरमाहा पीटपीटी बाई के पाछू घुमथे घुरघुरहा मुढ़ेरी बिला ले गुनथे चोरहा सरदंगिया डोमी खोजै दांव।।2।। बाम्हन चिरई मन बने हे सुहासीन अंगना परछी भर चोरबीर चोरबीर नाचीन कौंआ चुलमाटी दंतेला बलाथे झुरमुट ले बनकुकरी भड़ौनी गाथे झूमै कुकरी कुकरा…

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छत्तिसगढि़हा कबि कलाकार

पानी हॅ जिनगी के साक्षात स्वरूप ये। जीवन जगत बर अमृत ये। पानी हँ सुग्घर धार के रूप धरे बरोबर जघा म चुपचाप बहत चले जाथे। जिहाँ उतार-चढ़ाव, उबड़-खाबड़ होथे पानी कलबलाय लगथे। कलकलाय लगथे। माने पानी अपन दुःख पीरा, अनभो अनुमान अउ उछाह उमंग ल कलकल-कलकल के ध्वनि ले व्यक्त करथे। पानी के ये कलकल- कलकल ध्वनि हँ ओकर अविचल जीवटता, सात्विक अविरलता अऊ अनवरत प्रवाहमयता के उत्कट आकांक्षा ल प्रदर्सित करथे। ओइसने मनखे तको अपन सुख-दुख ल, अंतस के हाव भाव ल गा-गुनगुना के व्यक्त करथे। वोहँ अपन…

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मोर गाँव ले गँवई गँवागे

मोर गाँव ले गँवई गँवागे बटकी के बासी खवई गँवागे मुड़ ले उड़ागे पागा खुमरी पाँव ले पनही भँदई गँवागे सुग्घर दाई बबा के कहिनी सुनन जुरमिल भाई बहिनी करमा सुआ खोखो फुगड़ी लइकन के खुडवई गँवागे खाके चीला अँगाकर फरा जोतै नाँगर तता अरा रा दूध कसेली खौंड़ी म चूरै मही के लेवना लेवई गँवागे आगे मोबाइल टीबी पसरगे राग सुमत ल सबो बिसरगे तीज तिहार म घर घर घुम घुम ठेठरी खुरमी खवई गँवागे करधन एैंठी खिनवा पहुँची फँुदरी माहुर बोहागे गऊकी लीखपोहना अउ ककवा ले मुड़ के…

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व्‍यंग्‍य : बवइन के परसादे

कोनो भी बाबा के सफलता के पछीत म कोर्ह न कोई बवइन के पलौंदी जरूर होथें। मैं अपन चोरी चमारी के रचना सुना सुनाके तीर तखार के गाॅव म प्रसिध्द होगे हौं। फेर घर म जोगडा के जोगड़ा हौं। उही चिटियाहा चड्डी बनीयइन, बिन साबुन तेल के खउराहा उखराहा हाथ गोड़। चिथियाए बगरे भुरूवा भुरूवा बड़े बड़े चुंदी। गर म कुकुर के पट्टा कस ओरमे मोहनजोदड़ो युग के टेटकू मोबाइल। उहू मोबाइल के स्क्रीन टूटहा हे। उपरौनी म ओकर पछीत के ढकना टूटहा। जेला मैं रंगीन रब्बड़ में लपेट के…

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कहानी : मंतर

अहिल्या हॅं दुये चार कौंरा भात ल खाये रिहिस होही। ओतकेच बेरा परमिला झरफिर झरफिर करत आइस । ओरवाती के खालहे म बैठ गे। अहिल्या देखते साथ समझ गे। परमिला हॅ आज फेर अपन बेटा -बहू संग दू -चार बात कहा -सुनी होके आवत हे। अहिल्या परमिला के नस -नस ल टमर डारे हवय। जब कभू परमिला बेरा -कुबेरा अहिल्या घर आथे। थोथना फूले रहिथे। मुड़ी -चुंदी बही बरन छरियाये रहिथे। मार गोटारन कस बड़े -बड़े आॅखी ल नटेरत ,परेतीन बानी अपने अपन बुड़ुर- बुडुर करे लागथे त अहिल्या फट्ट…

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तुँहर जउँहर होवय : छत्तीसगढी हास्य-व्यंग संग्रह

छत्तीसगढी सहज हास्य और प्रखर ब्‍यंग्य की भाषा है। काव्य मंचों पर मेरा एक एक पेटेंट डॉयलाग होता है, ‘मेरे साथ एक सुखद ट्रेजेडी ये है कि दिल की बात मैं छत्तीसगढी मे बोलता हूँ, दिमाग की बात हिन्दी में बोलता हूँ और दिल न दिमाग की यानि झूठ बोलना होता है तो अंग्रेजी में बोलता हूँ।’ हो सकता है कुछ लोगों को इसमें आत्म विज्ञापन की बू आए। मगर ऐसा नहीं है, जिसे आप मेरे श्रेष्ठता बोध की विशेषता समझ रहे हैं, दरअसल वह हर भारतीय आम आदमी की…

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नशा मुक्ति के गीत

1.नशा हॅ नाशी होथे नशा हॅ नाशी होथे सुख के फाॅसी होथे घिसे गुड़ाखू माखुर खाए दाँत हलाए मुँह बस्साए बीड़ी म खाँसी आथे गुटका खाए पिच पिच थूके दारू पीए कुकुर अस भूँके धन के उद्बासी होथे चिलम तिरैया के आँखी धँसगे जवान बेंदरा सहीन खोखसगे जग म हाँसी होथे ए तो सुनेव बाहिर कहानी घुना जथे संगी जिनगानी लइका लोग करलासी होथे बिनती हे मोर कहना मानव नशा छोड़े के अभी ठानव देखव उल्लासी होथे। 2. नइ बाँचय तोर चोला रे नइ बाँचय तोर चोला रे नइ बाँचय…

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