बियंग: निरदोस रहे के सजा

बहुत समे पहिली के बात आय। जमलोक बिलकुलेच खाली होगे रहय। यमदूत मन बिगन बूता काम के तनखा पावत रहय। बरम्हाजी ला पता चलिस त ओहा चित्रगुप्त उपर बहुतेच नराज होइस। चित्रगुप्त ला बरम्हाजी हा अपन चेमबर म बलाके, कमरटोर मंहंगई अऊ अकाल दुकाल के समे म, बिगन बूता के कन्हो ला तनखा देबर मना कर दिस। चित्रगुप्त किथे – पिरथी म पाप करइया मनखे कमतियागे हे तेमा यमदूत मनके काये दोस हे। येमन ला कतिहांच भेज डरंव तिहीं बता भलुक। बरम्हा किथे – अइसे होइच नी सकय, तोर हिसाब…

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बियंग : करजा के परकार

यू पी एस सी के परीकछा म भारत के अरथ बेवस्था ला लेके सवाल पूछे गिस। सवाल ये रहय के करजा के कतेक परकार होथे। जे अर्थसासतरी लइका मन बड़ पढ़ लिख के रटरुटाके गे रहय तेमन, रट्टा मारे जवाब लिखे रहय। ओमन लिखे रहय – तीन परकार के करजा होथे, पहिली अलपकालीन, दूसर मध्यकालीन अऊ तीसर दीर्घकालीन। तीनों ला बिसतार से समझाये रहय। कुछ इनजीनियर किसिम के लइका मन लिखे रहय। करजा तीन परकार के होथे, पहिली किसानी करजा, दूसर उदयोगिक करजा, तीसर घरेलू करजा। तीनों ला उहू मन…

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बियंग: करजा माफी

करजा माफी के उमीद म, किसान मन के मन म भारी उमेंद रहय। जे दिन ले करजा माफी के घोसना होय रहय ते दिन ले, कतको झिन बियाज पुरतन, त कतको झिन मुद्दल पुरतन पइसा के, मनदीर म परसाद चढ़हा डरे रहय। दूसर कोती, करजा माफी के घोसना करइया के पछीना चुचुवावत रहय। मनतरी मन के घेरी बेरी बइठक सकलाये लगिस। किसान मन के करजा माफी बर कतेक पइसा चाही अऊ पइसा कतिहां ले आही अऊ ओकर भरपाई कइसे होही, तेकर हिसाब किताब चलत रहय। एक मनतरी किथे – सहींच…

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लघु कथा – सोज अंगुरी के घींव

ककछा म गुरूजी हा, हाना के बारे म पढ़हावत पढ़हावत बतावत रहय के, सोज अंगुरी ले घींव नी निकलय। जब घींव निकालना रहिथे तब, अंगुरी ला टेड़गा करे बर परथे। एक झिन होसियार कस लइका किथे – गुरूजी ये हाना हा जुन्ना अऊ अपरासांगिक हो चुके हे, अभू घींव हेरे बर अंगुरी ला टेड़गा करे के आवसकता नी परय। गुरूजी किथे – तैं हमर ले जादा जानबे रे …….., कती मनखे, कती तिर, सोज अंगुरी म घींव निकाल सकथे ……….. ? तैं बता भलुक, महूं सुनव ………। लइका किथे –…

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भूख के जात

मरे के जम्मो कारन के कोटा तय रहय, फेर जब देखते तब, सरकारी दुकान ले, दूसर के कोटा के रासन सरपंच जबरन लेगय तइसने, भूख हा, दूसर कोटा के मउत नंगाके, मनखे ला मारय। यमदूत मन पिरथी म भूख ला खोजत अइन। इहां अइन त देखथे, भूख के कइठिन जात। सोंच म परगे भगवान कते भूख ला लाने बर केहे हे। सबे भूख ला लेगे अऊ भगवान के दरबार म हाजिर कर दीस। भूख जइसे भगवान के आगू म खड़ा होइस, भगवान बरस गीस ओकर बर। कस रे तोला कहीं…

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रासन कारड

ऊंखर जउंहर होय, मुरदा निकले, खटिया रेंगे, चरचर ले अंगुरी फोरत बखानत रहय। का होगे या भऊजी, काकर आरती उतारत हस, राम राम के बेरा। नांगर धर के खेत रेंगत पूछत रहय छन्नू अपन परोसीन ल। चुनई लकठियाथे तंहंले कइसे मोहलो मोहलो करथे किरहा मन। तेंहा परिवार के मुखिया हरस कहिके, मोर नाव ले रासन कारड बना दीन। खुरसी पइन, तंहंले कारड निरस करत हे बइरी मन। आहू, ये पइत वोट मांगे बर, तुंहर पुरखा नी देखे होही ततका देखाहूं। भऊजी के गारी बखाना अतरीस त, छन्नू समझावत कहिस –…

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कोउ नृप होउ, हमहि …

हमर राम राजा बनही, ये सपना हा आज के नोहे , तइहा तइहा के आए! त्रेताजुग म, जम्मो तियारी कर डारिन,फेर राम ल राजा नि बनाए सकिन कोन्हो, अउ दसरथ सपना देखत दुनिया ले बिदा घला होगिस! उहां के जनता के चौदा बछर, सिरिफ अगोरा म बीतगे! राम राजा बनही, त ऊंखर समसिया के निराकरन होही, इंखर दुख दरद गोहार ल सुनही, इही आस अभू तक संजोए राखे हे जनता! तभे हर बखत राम ल राजा बनाए के कोसिस करे जाथे! पर राम कोन जनी कहां लुकाहे! अब परस्न ये…

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चरनदास चोर

चरनदास चोर ला कोन नी जानय। ओकर इमानदारी अऊ सेवा भावना के चरचा सरग तक म रहय। अभू तक कन्हो चोर ला, सरग म अइसन मान सममान नी मिलिस जइसन चरनदास पइस। एक दिन के बात आय, चरनदास हा, सरग म ठलहा बइठे भजन गावत रहय तइसने म, चित्रगुप्त के बलावा आगे। चित्रगुप्त किथे – चरनदास, पिरथी म तोर जाये के समे आगे। चरणदास पूछथे – कइसे भगवान ? चित्रगुप्त किथे – बीते जनम म तोर आयु पूरा नी होय रिहीस, उही बांचे आयु ला पूरा करे बर, वापिस जाये…

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अग्यातवास

अपन हक ले बंचित, पांडो मन के भाग म लिखाये अग्यातवास हा, कलजुग म घला पीछू नि छोरत रहय। अग्यातवास के कलजुगी समे म, द्वापर जुग कस, यक्छ ले इंखर मुलाखात, फूल टोरे के बहाना तरिया म फेर हो जथे। कलजुगिया यक्छ , फूल दे के बहाना, इंखर मन के योग्यता के परीकछा के बात घला करथे। बिगन परस्न के जवाब पाए, फूल दे बर मना कर देथे। पांडो मन, एक के पाछू एक, परीकछा म फेल होवत जाथे, अउ मूरछित होके भुंइया म गिरत जाथें। धरमराज हा फिकर करत,…

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माफी के किम्मत

भकाड़ू अऊ बुधारू के बीच म, घेरी बेरी पेपर म छपत माफी मांगे के दुरघटना के उप्पर चरचा चलत रहय। बुधारू बतावत रहय – ये रिवाज हमर देस म तइहा तइहा के आय बइहा, चाहे कन्हो ला कतको गारी बखाना कर, चाहे मार, चाहे सरेआम ओकर इज्जत उतार, लूट खसोट कहीं कर …….. मन भरिस तहन सरेआम माफी मांगले …….। हमर देस के इही तो खासियत हे बाबू …….. इहां के मन सिरीफ पांच बछर म भुला जथे अऊ कन्हो भी, ऐरे गैरे नत्थू खैरे ला, माफी दे देथे। भकाड़ू…

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