पथरा के मोल

पथरा मन, जम्मो देस ले, उदुप ले नंदाये बर धर लीस। घर बनाये बर पथरा खोजत, बड़ हलाकान होवत रेहेंव। तभे एक ठिन नानुक पथरा म, हपट पारेंव। पथरा ला पूछेंव – सबो पथरा मन कती करा लुकागे हे जी ? में देखेंव – नानुक पथरा, उत्ता धुर्रा उनडत रहय। मे संगे संग दऊंड़े लागेंव। झिन धर लेवय कहिके, उहू पथरा, अपन उनडे के चाल, बढ़हा दीस। में हफरत हफरत हाथ जोरत पूछेंव – थोकिन अगोर तो, कतिंहा दऊंड़त हस लकर धकर। ओ भागते भागत किहीस – मोला अपन हाथ…

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सबले बढ़िया – छत्तीसगढ़िया

नानकुन गांव धौराभाठा के गौंटिया के एके झिन बेटा – रमेसर , पढ़ लिख के साहेब बनगे रहय रइपुर म । जतका सुघ्घर दिखम म , ततकेच सुघ्घर आदत बेवहार म घला रहय ओखर सुआरी मंजू हा । दू झिन बाबू – मोनू अउ चीनू , डोकरी दई अउ बबा के बड़ सेवा करय । बड़े जिनीस घर कुरिया के रहवइया मनखे मन ल , नानुक सरकारी घर काला पोसाही , नावा रइपुर म घर ले डारिन अउ उंहीचे रेहे लागिन । कलोनी म , किसिम किसिम के , अलग…

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पोल खोल

पोल खोल देबो के नारा जगा जगा बुलंद रहय फेर पोल खुलत नी रहय। गांव के निचट अड़हा मनखे मंगलू अऊ बुधारू आपस म गोठियावत रहय। मंगलू किथे – काये पोल आये जी, जेला रोज रोज, फकत खोल देबो, खोल देबो कहिथे भर बिया मन, फेर खोलय निही। रोज अपन झोला धर के पिछू पिछू किंजरथंव …..। बुधारू हाँसिस अऊ किहीस – पोल काये तेला तो महू नी जानव यार, फेर तोर हमर लइक पोल म कहींच निये अइसन सुने हंव। मंगलू किथे – तैं कुछूच नी जानस यार …….,…

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बोनस के फर

जबले बोनस नाव के पेड़ पिरथी म जनम धरे हे तबले, इंहा के मनखे मन, उहीच पेंड़ ला भगवान कस सपनाथे घेरी बेरी…….। तीन बछर बीतगे रहय, बोनस सपना में तो आवय, फेर सवांगे नी आवय। उदुप ले एक दिन बोनस के पेंड़ हा, एक झिन ला सपना म, गांव में अमरे के घोसना कर दीस। गांव भर म, ओकर आये के, हल्ला होगे। ओकर आये के भरोसा म, गांव म बइसका सकलागे। बोनस के सवागत म, काये काये तियारी करना हे तेकर रूप रेखा, बने लागीस। बिपछ के मन…

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व्‍यंग्‍य : रोटी सेंकन मय चलेंव………

छत्तीसगढ़िया मन के आदत कहां जाही। बिगन भात बोजे पेट नी भरय। फेर कुछ समे ले मोर सुवारी ला को जनी काये होगे रहय, कोन ओकर कमपयूटर कस बोदा दिमाग ला हेक करके, रोटी नाव के वाइरस डार दे रहय, फकत रोटीच सेंके के गोठ करथय। भाग के लेखा ताय, अनपढ़, निच्चट सिधवी अऊ नरम सुभाव टूरी संग बिहाव होय रिहीस मोर। फेर कुछ समे ले, होटल के रोटी कस चेम्मर, टेड़गा, पेचका होवत जात रिहीस । अखबार म कोन जनी काये पढ़हय, फकत इहीच पूछय, हमर देस म, अतेक मनखे मन रोटी सेंकत…

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व्‍यंग्‍य : कब मरही रावन ?

गांव म हरेक पइत, दसरहा बखत, नाटक लील्ला खेलथे। ये दारी के लील्ला, इसकूल के लइका मन करही। लइका मन अपन गुरूजी ला पूछीन – काये लील्ला खेलबो गुरूजी ? गुरूजी बतइस – राम – रावन जुद्ध खेलबो बेटा। मेंहा रात भर बइठ के पाठ छांट डरे हौं। कोन कोन, काये काये पाठ करहू ? अपन अपन हिसाब ले देख लौ। हां, एक ठिन गोठ जरूर हे, जेन लइका जे पाठ करहू, वो पाठ ल अइसे निभाहू के, देखइया मन के मुहूं, आंखी अऊ कान, खुल्ला के खुल्ला रहि जाय।…

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गनेस के पेट

हमर गांव के लइका मन, गनेस पाख म, हरेक बछर गनेस बइठारे। गांवेच के कुम्हार करा, गनेस के मुरती बनवावय। ये बखत के गनेस पाख म घला, गनेस मढ़हाये के अऊ ओकर पूजा के तियारी चलत रहय। समे म, कुम्हार ला, मुरती बनाये के, आडर घला होगे। एक दिन, गांव के लइका मन ला, कुम्हार आके बतइस के, गनेस भगवान के पेट ला, कोन चोरा के, लेग जथे। जे घांव बनाथंव ते बेर, ओकर पेट गायबेच हो जथे, जबकि मुरती बनाके, रात भर पहरा देथंव। बिहिनिया ले ओकर पेट करा…

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कइसे झंडा फहरही ?

  पनदरा अगस्त के पहिली दिन, सरपंच आके केहे लागीस ‌- डोकरी दई, ये बछर, हमर बड़का झंडा ल, तिहीं फहराबे या …..। मोर न आंखी दिखय, न कान सुनाये, न हाथ चले, न गोड़, मेहा का झंडा फहराहूं – डोकरी दई केहे लागीस ? सरपंच मजाक करीस – ये देस म जे मनखे ला दिखथे, जे मनखे ला सुनाथे, जे अपन हाथ ले बहुत कुछ कर सकत हे, जे अपन गोड़ के ताकत ले दुसमन के नास कर सकत हे तेमन ला, आज तक झंडा फहराये के हक नी मिलीस। जे कुछ करय…

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आऊटसोरसिंग

[responsivevoice_button voice=”Hindi Female” buttontext=”ये रचना ला सुनव”] मंगलू अऊ बुधारू खुसी के मारे पगला गे रहय। लोगन ला बतावत रहय के, हमर परदेस के किरकेट टीम ल रनजी टराफी म खेले के मउका मिलगे। गांव के महराज किथे – ये काये जी ? एमा खुस होये के काये मतलब हे ? सरकार ल खुस होना चाही। किरकेट के समान बेंचइया अऊ खेलइया ल खुस होना चाही। बुधारू कहत रहय – हमर बेटा मन कालेज के बड़े किरकेट खेलाड़ी आय, ऊंखर खेल ल देखके, ऊंखर चयन, परदेस के टीम म होवइया…

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सोलह सिनगार

सावन के महिना ल, सहराती महिला मन, बछर भर अगोरय। रंग रंग के पहिर ओढ़ के चटक मटक किंजरय। एक बछर, सावन म, महिला मन बर, नावा किसिम के परतियोगिता राखीस – जे महिला, सावन भर, सोलह सिनगार ले, सजे धजे रहि तेला, सावन के आखिरी दिन, भारी पुरूसकार देके सममानित करे जाही। सिनगार के नाव, कतको उमड़गे। तरी उप्पर गहना जेवर बनवा डरीन। नावा नावा फेसन के लुगरा लाद डरीन। सेंट के सीसी के खपत बाढगे। सावन के आखिरी म, बहुत बड़े जलसा राखे गीस, बिजेता ला, सममान समेत…

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