[responsivevoice_button voice=”Hindi Female” buttontext=”ये रचना ला सुनव”] सरग म बरम्हा जी के पांच बछर के कारकाल पुरा होगे । नावा बरम्हा चुने बर मनथन चलत रहय । सत्ताधारी इंद्र अपन पारटी अऊ सहयोगी मन के बीच घोसना कर दीस के , ये दारी दलित ला बरम्हा बनाना हे । जबले बरम्हा चुनई के घोसना होये रहय , हमर गांव के मनखेमन मरे बर मरत रहय । जलदी मरबो सोंचके , खेती किसानी के समे , काम बूता खाये पिये ला घला तियाग दीन अऊ दसना म परे परे जमदूत के…
Read MoreTag: Harishankar Gajanan Prasad Dewangan
अपन अपन रुख
[responsivevoice_button voice=”Hindi Female” buttontext=”ये खबर ला सुनव”] रुख रई जंगल के , बिनास देख , भगवान चिनतीत रिहीस । ओहा मनखे मन के मीटिंग बलाके , रुख रई लगाये के सलाह दीस । कुछ बछर पाछू , भुंइया जस के तस । फोकट म कोन लगाहीं । भगवान मनखे मन ल , लालच देवत किहीस के रुख रई के जंगल लगाये बर , मनखे ल , मुफत म भुंइया अऊ नान नान पऊधा बितरन करहूं , संगे संग घोसना करीन के , जे मनखे मोर दे भुंईया म बहुत अकन…
Read Moreजुग जुग पियव
भरे गरमी म , मंझनी मंझना के बेरा । जंगल म किंजरत किंजरत पियास के मारे मरत रहय भोलेनाथ । बियाबान जंगल म , मरे रोवइया नी दिखत रहय । तभे मनखे मन के हाँसे के अवाज सुनई दीस । अवाज के दिसा म पल्ला दऊड़िस । जवान जवान छोकरा छोकरी मन , रन्गरेली मनावत खावत पियत मसतियावत रहय । पहिली सोंचीस के ओकर मन के तीर म कइसे जांवव । पारवती मना करे रिहीस के , मनखे के रूप धर के झिन जा पिरथी म । जतका बेर तक…
Read Moreसवच्छ भारत अभियान
गांव ला सवच्छ बनाये के सनकलप ले चुनई जीत गे रहय । फेर गांव ला सवच्छ कइसे बनाना हे तेकर , जादा जनाकारी नी रहय बपरी ल । जे सवच्छता के बात सोंच के , चुनई जीते रहय तेमा , अऊ सासन के चलत सवच्छता अभियान म बड़ फरक दिखय । वहू संघरगे सासन के अभियान म । अपन गांव ल सवच्छ बनाये बर , घरो घर , सरकारी कोलाबारी बना डरीस । एके रसदा म , केऊ खेप , नाली , सड़क अऊ कचरा फेंके बर टांकी …। गांव…
Read Moreव्यंग्य : नावा खोज
डोकरी दई के छोटे बेटा ला परदेस मे रहत बड़ दिन होगे। चिट्ठी पतरी कमतियागे। बेटा ल बलाये खातिर, खाये, पहिरे अऊ रेहे के निये कही के सोरियावय, डोकरी दई। को जनी काये मजबूरी म फंसे रहय, बेटा नी आवय। तभे मोबाइल जुग आगे, बेटा ओकर बर, मोबाइल पठो दीस। दई पूछीस ये काबर? बेटा बतइस - तोर खाये पिये अऊ रेहे के, सबो समसिया येकरे आगू म गोहनाये कर, समाधान हो जही। दई समझीस के अतेक काम के आय, त येला जतन के राखना चाही। फुला म मढ़हाहूं त,…
Read Moreव्यंग्य : पनही
गुरूजी के पनही, ओकर पहिचान आय। नानुक रिहीस तब ओकर ददा, जे पनही ल पहिने, उही पनही ल गुरूजी घला पहिरथे। खियात ले पहिर डरीस, फेर वा रे पनही, टूटे के नाव नी लीस। येहा, खानदानी गुरूजी पनही आय, जेमा कभूच कभू नावा डोरी धराये बर परय। ओकर उप्पर भाग, हमेसा चकाचक रहय। ओमा कभू कन्हो पालीस नी रंगीस, मइलइस निही त, फरिया घला रेंगाये नी परीस। कतको झिन ओकर पनही ल देखे, सन्हंराय घला फेर, तरी के बदहाली दिख जाय म, बदले के सलाह घला देवय। गुरूअईन घला, खियाय…
Read Moreकहानी : कलम
दू झिन संगवारी रिहीन। अब्बड़ पढ़हे लिखे रिहीन। अलग अलग सहर म रहय फेर एके परकार के बूता करय। दूनों संगवारी एक ले बड़के एक कहिनी कंथली बियंग कबिता लिखय, कतको परकार के अखबार अऊ पतरिका म छपय। हरेक मंच म जावय। फेर दूनों के रहन सहन म धीरे धीरे अनतर बाढ़त रिहीस। एक झिन अबड़ परसिद्ध अऊ पइसा वाला होगिस, ओकर करा गाड़ी बंगला अऊ सरकारी पद होगे। दूसर ल परसिद्धि मिलना तो दूर, अभू घला गोदरी ओढ़इया, चटनी बासी खवइया अऊ फूटहा खपरा के घर ल टपर टपर…
Read Moreनौ हाथ लुगरा पहिरे तभो ले देंहे उघरा
बिकास के चरचा चारों मुड़ा म होये । गांव गंवई के मनखे मन बिकास देखे बर तरसत रिहीन । हमर देस अजाद होही न बेटा तंहंले बिकास आही , सुनत सुनत दू पीढ़ही के मन सरग सिधार दीन । तीसर पीढ़ही के मनखे मन घला बुढ़ाये धर लीन । फेर कइसना होथे बिकास तेकर दरसन नी पइन । जब नावा राज बनीस , नावा सरकार बनीस , उही समे ले , “ बिकास अभू आनेच वाला हे , एदे आतेच हे , तुंहर तीर म अमरीचगे “ एकर खूबेच चरचा…
Read Moreखूंटा म साख निही, गेरवा के का ठिकाना
तइहा तइहा के गोठ। धरमतरई तीर नानुक गांव धंवराभांठा, जेमे रामाधीन नाव के मनखे रहय। ओकर दू झिन बेटा आशा अऊ कातिक। परबतिया अऊ रामाधीन अपन दूनों लइका ल एके बरोबर पालीन पोसीन अऊ एके बरोबर सिकछा दीकछा घला दीन। काकर दई ददा जिनगी भर साथ निभाथे, रामाधीन सरग चल दीस। समे बीते ले, लइका मन के कारोबार घला अलग बिलग होगे। परबतिया अपन छोटे बेटा कातिक तीर रहिके, समे समे म सियानी रसदा सिखावत पढ़हावत बतावत रहय। कातिक घला, पूरवज के रीत रेवाज अऊ सनसकार ल, एकदमेच अंगिया डरे…
Read Moreबियंग: अच्छे दिन
हे भगवान , मोर जिनगी म अच्छा दिन कब आही । कोन्हो मोला , पूछे – गऊंछे काबर निही ? कोन्हो बड़का मनखे मोर कोती झांक के काबर नि देखे ? में भूख , गरीबी अऊ बेरोजगारी के बीच जियत , असकटा गेंव । मोला उबार भगवान इहां ले । भगवान हांसिस । तैं झोपड़ी अस बेटा , अच्छा दिन तोर बर नोहे । तोर बांटा म जेन परे हे तिही ल समेट , अऊ उही म सुख खोज । तेंहा एकर ले अच्छा दिन के हिच्छा झिन कर ।…
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