पहिली घांव रूपिया ल रोवत देखिन लोगन। जंगल म आगी लगे जइसे खबर फइल गे। कतको झिन ल बिसवास नि होइस । सचाई ल जाने बर कतको मनखे बेचेन होए लागिन। सरी दुनिया ल अपन तमासा अउ करतब ले रोवइया ल, उदुप ले रोवत सुनना अउ देखना, आसचर्य अउ सुकुरदुम होए के, बिसे रिहीस। जम्मो सोंचे लागिन काबर रोवत हे रूपिया, काए बिपत्ती परे हे ओकर उप्पर। सकलागे उही जगा म कतको मनखे। पूछे गऊंछे लागिन। काए पीरा खावत हस या तेमे, डेंहक डेंहक के रोवथस? बड़ किरोली के पाछू…
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