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गुने के गोठ : मोर पेड़ मोर पहिचान

वासु अउ धीरज ममा फूफू के भाई ऑंय। दूनो झन चार छ: महिना के छोटे बड़ेआय। दूनो तीसरी कक्छा मा पढ़थें। वासु शहर के अँगरेजी इस्कूल मा पढ़थे अउ धीरज गाँव के सरकारी स्कूल मा। धीरज के दाई ददा किसानी करथँय अउ वासु के दाई ददा नउकरिहा हावँय। गर्मी के छुट्टी माँ एसो वासु हा ममा गाँव गइस। आजी आजा खुश होगे। ममा मामी के घलाव मया दुलार पाय लगिस।फेर सबले बढ़िया ओला धीरज लगिस। लइका अपन खेलबर संगवारी खोजथे। ओला अपन जँहुरिया संगवारी मिलगे। दू दिन वासु के महतारी हा मइके मा रहिस फेर छोड़के अपन नउकरी मा आगे।

अब वासु धीरज के जोड़ी हा खेले कुदे लगिस। एक दिन खेलत खेलत दूनो झन तरिया ओ पार आमा बगइचा मा पहुँचगे। धीरज ओला तीन चार ठन आमा पेड़ अउ अमली, चिरइजाम, बीही के पेड़ ला देखावत कहिस – ये तीनों आमा पेड़ अउ अमली ला हमर बाबू के बबा हा जगाय रहिस। एला मंडल बगइचा कहिथे।चिरइजाम ला मोर बबा हा नान्हेपन मा लगाय रहिस ता ए पेड़ ला ओकरे नाम ले जाने जाथे।जब मोर बाबू नान्हे रहिस ता ओखर बबा हा एक दिन ओला बीही खायबर दिस। वो हा आधा ला खाइस अउ बाचे ला छानी उपर फेंक दिस। दिन बीतिस चउमासा आगे। कब के फेंकाय बीही हा हवा पानी पाके नानकून आठ दस पाना के पेड़ बनगे।

ओखर बबा हा सुरता करके ओला पेड़ ला धराके बगइचा मा गड़वा दिस।आज हमन हरियर पींयर बीही जेकर लाल लाल गुरतुर गुदा ला खाथन अउ बबा के सुरता करथन। दूनो झन ला इहाँ अपन धुन मा खेलत मँझनिया होगे। ओती वासु अउ धीरज ला खोजत ओकर बबा हाथ मा सुटी धरे पसीना पसीना होय आइस। दूनोंझन ला खिसयाइस अउ आमा के छइहाँ मा बइठ गे।कोन जनी कहाँ ले हावा चलिस कि काय होइस, दू ठन पक्का आमा उपर ले गिरिस।जानो मानो अपन बेटा ला भुखाय देख बाप हा कुछु खायबर देत हवय।बबा हा दूनोझन ला आमा ला बाँटिस अउ चलो घर कहिके हाँकिस। घर आवत तरिया मा नहाय बर रुकिन। धीरज हा वासु ला बताइस कि येला गौउँटिया तरिया कहे जाथे। हमर बबा के बबा के संगवारी गौउँटिया हा एला खनवाय रहिस कथे ।

नहा खोर के घर जाके भात खाके सूतीन। संझा वासु के आजा हा गाँव के गली डहर घुमायबर लेगिस।गली मा जावत बर , पीपर , हनुमान मूरती , शिव मंदिर अउ दूसर मंदिर के गोठ करत बताइस एला अमुख अमुक मन जगाय अउ बनाय रहिस हे। वासु के नानकुन बुद्धि ए नइ समझ पाइस कि जब ओ मनखे मन नइ हे तब ले ऊँखर नाम कइसे जानथे। पाछू घर आके अपन आजा आजी ला फेर आमा बगइचा के पेड़ जगाय के किस्सा ला पूछिस। ओखर आजा बताईस कि पेड़ हा हमर जिनगी बर कतका महत्तम होथे। नानकन ले पेड़ के लकड़ी के सहारा लेवत ,खटिया, पीढ़ा, टेबुल, कुर्सी, माची, झूलना, खिड़खी, कपाट, चूल्हा चौका बर सब इही पेड़ ले मिलथे। मरे के पाछू घलाव चिता जलाय बर लकड़ी लागथे।

वासु के नानकुन बुद्धि हा थाहा नइ पात रहय कि एक ठन पेड़ हमर कतका बुता आथे।वासु के मन मा एकेच बात बइठ गे कि मनखे के पहिचान पेड़ ले चलाव हो सकत हे। महिना भर के छुट्टी बिता के वासु अपन सहर मा आगे। दिन बीतिस इस्कूल खुलगे। असाढ़ महिना आगे। एक दिन इस्कूल ले आय पाछू संझा वासु नानकन आमा पेड़ ला धर के अपन घर के फुलवारी मा जगायबर खोचका खनत रहिस। ओखर महतारी हा ओला खिसयात पूछिस- तँय ये काय बूता करत हस वासु? अपन महतारी ला वासु हा कहिस- मँय अपन पहिचान अउ नाम बर आज पेड़ लगावत हँव। मोर पेड़ मोर पहिचान रही। अइसने काहत गाँव के जम्मो किस्सा ला बताईस।ओखर महतारी अड़बड़ खुश होइस अउ कहिस कि अपन प्रचार्य ले पूछ के एक ठन पेड़ इस्कूल मा घलाव लगाबे। पढ़ के निकले जब दस बीस बच्छर पाछू ओ रद्दा ले आवत जावत देखबे तब मन गदगदा जाथे।

आज पर्यावरण ला शुद्ध रखेबर पेड़ के जरुरत हे। हम सबला घलाव अपन कार्यालय, घर के तीर तखार जिहा खाली जगा भुइँया मिलय एक पेड़ अपन पहिचान अउ नाम राखे खातिर जगोना चाही।

हीरालाल गुरुजी “समय”
छुरा, जिला- गरियाबंद

बेरा के गोठ : फिलिम के रद्दा कब बदलही

आजकल जौन ला देखबे तौन हा फिलिम, सिरियल अउ बजरहा जिनिस बेचइया विज्ञापन करइया मनके नकल करेबर अउ वइसने दिखेबर रिकिम रिकिम के उदिम करत हे।सियान मन कहिते रहिगे कि फिलिम विलिम ला देखव झिन, ये समाज अउ संस्कृति के लीलइया अजगर आय जौन सबो ला लील देही। आज वइसनेच होत हावय। हमर पहिराव ओढ़ाव, खाना पीना, रहना बसना, संस्कृति, परंपरा, तीज तिहार, बर बिहाव सबो फिल्मी होगे।
देस मा जब फिलिम बनेबर सुरु होइस तब कोंदा फिलिम अउ करिया सफेद (ब्लेक एंड व्हाइट) फिलिम हा हमर देबी देवता के लीला, पूजा पाठ ला देखावत होइस। फेर रद्दा बदलिस अउ देस के अजादी बर देसभक्ति वाला फिलिम बनिस।इही संगे संग बीर राजा महराजा, रानी महरानी जौन मन अपन देस, समाज अउ परजा बर भलई के बुता करिन उँखर उपर फिलिम बनिस। जब देस अजाद होगे होइस एखर पाछू फेर रद्दा बदलिस ।देस के ओ बखत के जवान चेलिक पीढ़ी मन करा मनोरंजन के साधन अपन संस्कृति,नाचा, गम्मत के पाछू फिलिम हा बनिस। बड़े सहर अउ गाँव के संस्कृति के अंतर देखाय वाले फिलिम बनिस। बड़का छोटे सहर मा टॉकीज, टूरिंग टॉकिज, के संग मेला मड़ई मा फिलिम के आनंद लेवत गिन।किसानी, मालगुजारी, बड़हर मन के अड़दली पन बर फिलिम बनिस अउ लोगन ओला परिवार संग देखिन अउ पसंग करिन।
एखर पाछू एक घाँव फेर रद्दा बदलिस चोर, डाकू, तस्कर, हफीम, गाँजा, हिरोइन, हीरा दलाली,मूर्ति चोरइया, परदेस मा बेचइया मन के उपर घलाव फिलिम बनिस। ओ बखत के लइका सियान, चेलिक जवान मन हीरो हिरोइन ला भगवान बरोबर मानय। फिलिम मा मनोरंजन के संगे संग परिवारिक, देसभक्ति, संस्कृति के अउ गाँव, पढ़ाई के महत्तम अउ गाँव सहर के अंतर ला देखाय। देबी देवता,भूत परेत, भगवान मानता, सिक्छा के संदेस वाला फिलिम घलाव बनिस। सौ बात के एक बात ओ बखत के मनखे ला जौन किसम के सीख के जरुरत रहिस ओइसने किसम के फिलिम बनिस।ओ बखत संस्कृति, परंपरा ला तोड़े फोड़े के जादा हिम्मत फिलिम मा घलो नइ रहय। एखर पाछू कहानी लिखइया अउ ओला फिलिम बना के बेचइया मन फेर अपन रद्दा बदलिस। नाचा गाना वाला फिलिम आयबर लगिस। इही करा ले हमर चेलिक लइका मन दूसर रद्दा धरे लगिस।रिकिम रिकिम के पहिरई ओढ़ई ला फैसन के नाम मा परचारित करे लगिन। फेर आईस कालेज पढ़ईया लइका मनके प्यार मोहब्बती वाला फिलिम ।जौन हा अमीरी गरीबी जाति धरम संस्कृति ला आगी धरा के चूल्हा मा डार दिस। देस के भविष्य मन दूसर रद्दा धर डारिस।सबो प्रांत मा परिवार मनके दाई ददा मनके मुड़ी नवइया लइका मन आज ले अपन सियान मनके पागा ला छोरत हे। चेलिक टूरा टूरी मन आन जात,धरम वाले संग मोहब्बती मा फँस जाथे। कुछु कही जानबो हो जाथे ताहन मार पीट, हइता, बलत्कार, आतमहइता अउ बैरी भाव बन जाथे। एमा हमर देस के अंतर्जातीय बिवाह कानून हा घीव के काम करथे। देस ला अजाद होय सत्तर बच्छर ले जादा होगे फेर भारत पाकिस्तान के बीच कोनों न कोनों संबंधी फिलिम आज ले बनत हे अउ हमर चेलिक मन इहीच मा मगन हे।
आजकल जतका प्रांतीय भाखा मा फिलिम बनत हे ओमा जादा अइसने प्यार मोहब्बती वाला फिलिम हावय जौन ला परिवारिक फिलिम के नाम मा परोसत हे।नान्हे नान्हे कपड़ा लत्ता,देह उघार के रेंगना, नाचना, घुमना, पढ़ेबर जाना सब फैसन होगे। जेठ हा भैया अउ डेड़सास हा दीदी इही फिलिम मनके देय नत्ता होगे। मुड़ी ढाँक के रेंगना अब तइहा के बात होगे नवा नवा गाड़ी मोटर भर्र भर्र चलाय बर हमर नवछटहा लाइकामन ला फिलिम हा देखावत अउ सिखावत हे। अइसने बनत फिलिम मन हमर जात, समाज, संस्कृति, धरम बर खतरा होवत हे। दाई ददा मन जाँगर टोर मेहनत करके लइका मनला पढ़ाई करे बर,नउकरी करेबर आने जगा अपन ले दूरिहा भेजथे।फेर ओमन पढ़ाई करे के जगा अपन भविष्य ला इही फिलिम कस प्यार मोहब्बती मा झिंगरा कस फाँस लेथे। अउ अपने गोड़ मा टंगिया मारथे।
अब देस दुनिया मा नवा रद्दा के फिलिम बनाय के जरुरत हे। बहुत होगे संस्कृति ला बिगाड़े, परिवार ला टोरे फोरे के फिलिम। देस अउ प्रांत मा बेरोजगारी, बिमारी, भ्रष्टाचार, समिलहा परिवार के पुरखौती परंपरा के बिनास हा हाथ गोड़ लमावत हे। एला बने करे के जरुरत हे। व्यावसायिक फिलिम के नाव मा हमर लइकामन करा काय काय परोसत हे एला देखे समझे के जरुरत हे। नवा जुग के नवा किसिम के फिलिम बनत हे जेमा रोबोट, कम्प्युटर, रिमोट हे। फेर एमा घलाव प्यार मोहब्बती , नारी हिनमान, ला मिंझार देवत हे। जनता ला काय मिलत हे। अब बेरोजगार बर रोजगार के उदिम वाला, देस मा डाक्टर के कमती ला दूर करे के उदिम, घर घर मा पानी बचाय के उदिम, खेती किसानी ले दुरिहात पढ़े लिखे चेलिक ला जोड़े के उदिम, पर्यावरण ला सुधारे मा चेलिक मन के सहयोग के उदिम वाला फिलिम बनाय के जरुरत हे।
कहे जाथे फिलिम हा समाज ला रद्दा देखाय के बूता करथे।फेर आज के फिलिम मनके रद्दा खुदे भुलवाही खुंद डरे हे।एक्कइसवीं सदी मा हमर चेलिक लइका मन ला काय देना हे, ओला फिलिम बनाइया मन बिचार नइ कर पावत हे। प्यार मोहब्बती मा फाँस के राख दे हावय। समाज मा बदलाव अउ नवा रद्दा देखाय के बूता फिलिम हा घलाव करथे। तब ये फिलिम मन अपन रद्दा कब बदलही, कब तक दूसर के जात धरम ला मोहबती के नाम मा बिगाड़े के बूता चलते रही,नवा पीढ़ी के चेलिक मन ला कब उबारही इही अगोरा हे।

हीरालाल गुरुजी “समय”
छुरा, जिला-गरियाबंद

सुरता मा जुन्ना कुरिया

पच्चीस बच्छर बीत गे हावय। हमर आठ खोली के घर के नक्सा नइ बदलिस। चारो मुड़ा खोली अउ बीच मा द्वार। एक खोली ले बाड़ी डहर जाय के रद्दा। पच्चीस बच्छर पहिली कुवाँर कातिक मा ये नवा घर ला नत्ता गोत्ता संग मिलके सिरजाय रहिन। संगे संग मोर बिहाव करेबर टूरी खोजेबर बात चलात रहिन। मोरो लगन फरियाय रहय। माघ महिना मा घर सिरजगे। फागुन महिना के आखिर मा वो परिवार मिलगे जौन अपन बेटी देयबर तियार होगे। चइत मा चुमा चाटी,पेज पसिया, पइसा धरई होगे। बइसाख नम्मी मा भाँवर माढ़गे। सगा सोदर, नत्ता गोत्ता, चीन पहिचान, अरोसी परोसी, अरपरा परपरा सबला नेवता हिकारी पहुँचगे। लगन दिन सबो नेग जोग बने बने निपट गे। चौथिया घलाव बलाय रहेन तब आइन। दूसर दिन नवा घर के पूजा मा सतनारायण कथा होइस। उही खोली ला तीसर दिन ले हमर नवा गृहस्थी बर सौंप देइस। सात बच्छर तक वो कुरिया हा हमर रहिस। दूनो बेटी के जनम अउ रोवइ हँसई इही खोली हा सुने हावय। कतको रात ला जाग के, सास ससुर के गारी बखाना के सेती गोसाइन के बइठे बइठे बिन नींद के काटे हावय। सात बच्छर पाछू छोटे भाई मन के बिहाव पाछू ये कुरिया उँखर गृहस्थी बर छोड़ेबर परिस। बिधि के बिधान हा अइसे बनिस कि दसवाँ बच्छर मा घरेचला छोड़ेबर परगे। नउकरी करत अब पन्दरा बच्छर अउ पूरगे। सब भाई मन के दू-दू झन बाल गोपाल होगे। सबअपन अपन काम बुता,रोजी पानी खातिर घर ले बाहिर चल दिन। सियान मन घर रखवार होगे। घर मा आना जाना अब तिहार बार मा होथे।

पच्चीस बच्छर पाछू जब गर्मी मा परिवार सहित घर जाना होइस तब हमर झोला ला उही कुरिया मा उतारे के मउका एक घाँव फेर मिलिस। आज घलाव ये कुरिया मा एकठन पलंग उही जगा जठे हावय। आलमारी नवा होगे हावय फेर जगा उहीच हे जेकर हमर दाइज के आलमारी ला रखे रहेन। जइसे हमर नान नान बेटी के जगा बड़े चेलिक होगे। फुला पठेरा, दर्पन, के जगा घलाव पच्चीस बछर मा नइ बदलिस। टेबल पंखा के जगा स्टैंड पंखा रखाय हवय। गणेश , लक्ष्मी , सरसती के फोटू के जगा मा जगत जननी दुर्गा बइठगे हावय, फेर जगा उहीच हे। दाई के कोरा,लीम-बर के छँइहा अउ नानपन के नाव सुने के सुख बरोबर सुख ये जुन्ना कुरिया मा आज मिलिस। मोर बड़े बेटी के नानपन के फ्राक जौन ला ओकर पहिली देवारी बर लेय रहेंव वो हा मुड़सरिया भीतरी ले सिलना टोर के मोला झाँकत रहिस मोर बेटी बर मोर कमाई के अँगरखा लेय के वो बेरा के सुख आज मोर आँखी ले आँसू बनके निकले लगिस। रतिहा गसाईन ला उही कुरिया मा भात खावत देख जुन्ना बेरा सुरता आगे दूनो झन एक दूसर ला देख के हाँस डारेन। जुन्ना कुरिया मा नवा दिन तसमई कस मिठावत हे।

हीरालाल गुरुजी”समय”
छुरा, जिला-गरियाबंद

लमसेना प्रथा चालू करव

आज मँय एक ठन अलकरहा गोठ करेबर जात हँव। आजकल हमर देस, प्रांत सबो डहर एकेच गोठ सुनेबर मिलथँय कि बहूमन अपन सास ससुर ला अबड़ तपथँय दुख देथँय। एहा समाजिक समस्या बनत जावत हावय। सास ससुर मन सियान होय के पाछू जब कुछु कमाय नइ सकय पइसा कउड़ी के आवक बंद हो जाथय, तब बहू मन के टेचरही गोठ सियानमन बर पहाड़ हो जाथय।कतको घर तो एक एक टिकली बर तरसथे। बड़हरमन तो वृद्धाश्रम भेज देथय। एकर इलाजबर जुन्ना दवई माने लमसेना लाय के परथा ला शुरू करे जाय। काबर कि देखे सुने मा आथय कि बेटीमन अपन दाई ददा के दुख तकलीफ ला देख के सहीच नइ सकय अउ भाई भउजी ला गारी बखाना करथँय। दूसर ये कि बेटीमन दाई ददा ला बड़ मया करथे भले सास ससुर ला कतको तपय। ए समस्या के एकेच समाधान हे लमसेना लाना।

लमसेना लाने के परथा ले समाज के दू ठन समस्या हा दुरिहा हो जही। एक तो बेटी बचाव बेटी पढ़ाव ला बल मिलही अउ दूसर ये की कोनों जगा सियान मन ला दुख तकलीफ नइ मिलही। लमसेना ला घरजियाँ घलाव कहे जाथे। बेटीमन अपन दाई ददा के सुग्घर सेवा करही ता बहूमन के उपर ले सास ससुर के हिनमान अउ दुख देय के बोझा उतर जही। अब तो हमर देश के कानून, संविधान हा बेटीमन ला बँटवारा देय के अधिकार दे हवय ता दाई ददा ला पाले पोसेबर घलाव कोनों परकार के रोकछेक नइ करय। अइसे दमाँद मनके ससुरार मा जादा बिरोध नइ रहय। ललचहा अउ मँदहा दमाँद ले दू तीन प्रतिशत मन हा दुखी होही फेर बहू के संग देवइया बेटा ले नब्बे प्रतिशत मन दुखी हावय। एकर सेती लमसेना लाय से सब सासमन ला बहू के दुख देवई ले अउ बहूमन ला सास के तपई ले मुक्ति मिल जही। कहे जाथे मनखे ला देस काल परिस्थिति के संग रेंगना चाही।

आज सास बहू के जगा महतारी बेटी संग राखे के परथा शुरू करे के जरुरत हावय। नब्बे प्रतिशत ले जादा घर आज मंदिर नइ रहिगे। बेटी लक्ष्मी होथय ता ओला महतारी के संग राखय। सासमन लक्ष्मी के मानगउन नई करे एखर सेती हर घर मा लड़ई झगरा माते रहिथे। हर जाति समाज मा घलाव एखर बर गोठबात होना चाही। बेटी मन दू कुल ला तारथे फेर समाज मा अइसन कम दिखते। एक कुल ले टरथे।दूसर कुल मा आके टारथे। मइके मा झगरा लड़ाथँय अउ ससुरार मा झगरा करथँय। लमसेना राय से माइके अउ ससुरार के मया बाढ़ही। दू चार दिन बर आय बहू के, सास हा , ननद डेढ़सास हा मानगउन करही। बहू घलाव उँखर मन संग मइके के दुख सुख ला बाँटही। दूनो परिवार मा मया बाढ़ही। समाज मा नवा संदेश जाही।

हीरालाल गुरुजी “समय”
छुरा, जिला-गरियाबंद

नानकिन किस्सा : प्याऊ

गाँव के गरीब किसान के लइका सुजल बी ए के परीक्षा ला प्रथम श्रेणी ले पास कर डारिस। गाँव के गुरुजी हा ओला यूपीएससी के परीक्षा देवाय के सुझाव देइस। परीक्षा के फारम भरेबर ओला बड़े शहर मा जायबर परिस। सुजल बिहनिया ले सायकिल मा सड़क तीर के गाँव आइस अउ साइकिल ला उहींचे छोड़ बस मा बइठ के शहर आ गे। फारम लेवत, भरके डाकघर मा जमा करावत ओला अड़बड़ बेरा होगे।मंझनिया के अढ़ई बजगे रहय। ओला घर घलावलहुटना रहिस।फारम भरे के सुध मा पानी तक पीये के समय नइ मिलिस। टोंटा सुखाय लगिस।मई महिना के मंझनिया होय के सेती सबके कपाट ओधाय रहय।दुकानवाला मन दुकान मा ऊँघात बइठे रहय। इखरो तीर पानी के कोनों साधन नइ दिखत रहय। होटल मा पानी कुछु खाय के पाछू मिलतीस ता बस छुटे के डर रहय। डाकघर के आजू बाजू पानी के कोनों बेवस्था नइ दिखिस ता रेंगत रेंगत चऊँक मा आगे। बस टेसन ले निकले पाछू इही चऊँक करा थोकिन रुक के अउ सवारी बइठारके आघू जाथे। चढ़े मंझनिया मा ये चऊँक मा दर्जन भर ले जादा नर नारी, लइका पिचका सवारी खड़े रहय।

सबोझन इही गोठियात रहय कि अतिक बड़े शहर मा पानी के कोनों बेवस्था नइ हे।लइकामन पानी पानी कहिके सियानमन ला तँगात रहय।बस आ गे तहान सुजल चढ़के घर आगे। फेर ओकर मन मा ओ पानी के कमती हा बइठ गे। अपन परीक्षा के तैयारी मा लगगे। सात बच्छर बीत गे। अब सुजल नायब तहसीलदार बन गे हावय। अप्रैल महिना मा ओखर तबादला उही बड़े शहर के तहसील मा होय हे। जिहाँ फारम भरे के बेरा मा पियासे रहेबर पड़े रहिस। सात बच्छर मा शहर तो बनेच बदल गे हावय। बड़े बड़े तीन मजिल, पाँच मंजिल बेल्डिंग बनगे हावय। फेर नइ बनिस ते पानी के बेवस्था।आज घलाव पानी के बेवस्था मा कमती ला देख के ओखर मन भरभरा गे। एक दिन चरबज्जी मुख्य नगर पालिका अधिकारी ला बुलावा के अपन मन के बात ला फोरिया के बताइस अउ जनता के सुविधा बर चऊँक चऊँक प्याऊ खोलेबर कहिस। सीएमओ साहब हा पाइसा के कमती बता के दू तीन चऊँक मा बेवस्था कराय के बिस्वास दे के चल दिस। दूसर दिन फेर चरबज्जी शहर के सामाजिक, धार्मिक अउ व्यापारिक संस्था मन के पदाधिकारी मन ला बुलाके गर्मीभर प्याऊ खोले अउ जनता के सेवा करके पुण्य कमाय के गोठबात करीस। बने काम मा भगवान के घलाव असीस मिलथे। सबो संस्था अपन अपन पसंग के जगा मा प्याऊ लगाय बर राजी होगे। पन्द्रही होय पाय रहिस एक दिन मंझनिया सुजल अपन सरकारी गाड़ी मा बइठे उही चऊँक ले निकलत रहय कि मनखेमन के भीड़ ला देख गाड़ी रोकवा दीस। देखिस ता चऊँक मा लगे फ्रीजर मा पानी पियइया के लइन लगे रहय। अपन आप ला रोक नइ सकिस। गाड़ी ले उतर के अपनो हा लइन मा खड़े होगे। पारी आइस ता सोसन भर के पानी पी डारिस। ओखर आँखी ले खुशी के आँसू ढर गे। आज ये पानी ला पी के सुजल के सात बच्छर के पियास बुझागे। ओखर आँखी ले खुशी के आँसू ढर गे।

हीरालाल गुरुजी
छुरा, जिला गरियाबंद

पुण्य सकेले के दिन आय अक्ती

हमर देस मा तिहार मनाय के परंपरा आदिकाल से चले आवत हे। भगवान ले मनौती करेबर, अशीस पायबर अउ मनौती पूरा होय के धन्यवाद देयबर तिहार मनाय जाथे। अइसने एक समिलहा तिहार बइसाख महिना के तीज के दिन मनाय जाथे जौन ला अक्ती तिहार कहे जाथे। अक्ती तिहार के छत्तीसगढ़ मा घलाव अबड़ मानता हे। घर परिवार,खेती किसानी, बर बिहाव आदि बर ए दिन ला बहुतेच शुभ मानथे। नउकर अउ मालिक के बीच गठजोड़ होय के तिहार आवय। अक्ती ला अक्षय तृतीया के नाम से जाने जाथे।जेकर मतलब होथे जौन कभू नइ सिराय।अक्तिहा से अक्ती बने हे ,अक्तिहा माने जादा।कहेे जाथे कि अक्ती के दिन जौन भी शुभ काम करही ओखर अक्तिहा फल मिलही। हमर शास्त्र अउ पुरान मन ओकरे सेती बताथे सिखाथे कि अक्ती के दिन जादा ले जादा दान धरम करव।एखर अक्तिहा पुण्य मिलही जौन बछरभर मा नइ सिराय।




हमर छत्तीसगढ़ मा ए दिन ला भक्ति भाव से मनाथे।ए दिन ला देव महुरत मानथे। काबर कि अक्ती के दिन ला अन्नपूर्णा माता के जनमदिन माने जाथे अउ मनाय जाथे। घर मा बरा भजिया, सोंहारी, तसमई बनाय जाथे।अन्नपूर्णा माता के पूजा करे जाथे। कहे जाथे कि बइसाख तीज अक्ती के दिन द्वापर युग मा युधिष्ठिर ला अक्षय पात्र मिले रहिस।ओखर खासियत सहिस कि एमा रंधाय भात साग कभू नइ सिराय अउ जौन माँगे उही मिल जाय। द्वापर के कथा में यहू कहे जाथे कि इही अक्ती के दिन सुदामा अपन नानपन के संगवारी भगवान कृष्ण से मिलेबर एक मुठा कनकी धरके गय रहिस। कृष्ण भगवान ओखर भोग लगाइस अउ ओखर घर भंडार भर दिस।




छत्तीसगढ़ मा अक्ती के तिहार ला किसान मन अबड़ धरम ले मानथे।बिहनिया ले नहाखोर के खेत मा दोना चढ़ाय बर जाथे। मानता हे कि धरती माता ला दोना चढ़ा के कोठी भर धान पाय के मनौती माँगथे। बड़े किसान मन जौन पहटिया ,नउकर चाकर सौंजिया रखथँय, अक्ती के दिन बदलथँय। नवा जुनी करथे। गाँव मा नाऊ, धोबी, चरवाहा, सौंजिया लगाय के परंपरा हे।गाँव मा अक्ती के दिन इँखरो नवा जुनी करे जाथे। छत्तीसगढ़ आदिवासी गाँव वाला राज्य हवय।गाँव परम्परा ला हर तिहार बार मा निभाय जाथे। गाँव के बइगा हा अक्ती के दिन गाँव के देबी देवता,शीतला के पूजा करके दोना चढ़ाथे अउ अरजी बिनती करथे कि बछर भर कोनो किसम के दुख तकलीफ, बिमारी महामारी, हमर गाँव मा झन आवय।



छत्तीसगढ़ मा एकठन अउ बढ़िया परम्परा हे पुतरी पुतरा के बिहाव।जौन निरबंशी रहिथे उहू मन ला कन्या दान करे के मउका मिलथे।पारा भर,गाँव भर मिलके उछाह मनाथे। एक मानता अउ हे कि जेन बेटी बेटा के भाँवर अक्ती के दिन परथे ओखर गृहस्थी कभू नइ टूटे।ये दिन देबी देवता संग पुरखा मन आके असीस देथँय।ये दिन बिहाव मा मिले असीस हा जिनगी भर नइ सिराय। ओखरे सेती छत्तीसगढ़ मा दाई ददा मन बेटी बेटा के अक्ती भाँवर मा बिहाव मढ़ाय के ओखी करते। छत्तीसगढ़ मा अक्ती मिलाय के परंपरा हावय।घर परिवार ले जिनगी भर बर बीते अक्ती के पाछू बछर भर अलग होय माने सरग सिधारे परिजन मन ला अक्ति पानी देय के मिलाय के परंपरा हवय।मर के देवता बने पुरखा मन के असीस पाय बर सब सगा सोदर ला बलाय जाथे अउ मरे सदस्य के निमत से सबो ला अपन पूरत ले भोग प्रसाद बाँटथे।पुरखा मन आके असीस देथय जौन कभू नइ सिराय। एखरे सेती कहे जाथे कि अक्ती के दिन जादा ले जादा दान धरम अउ शुभ फल पाय के उदीम करव।ये दिन मिले असीस हा कभू नइ सिराय।

हीरालाल गुरुजी”समय”
छुरा, गरियाबंद



राम जन्म : सबके बिगड़े काम सँवारथे श्रीराम

तुलसीदास हा रामचरित मानस लिखके,गाके अपन जिनगी ला तो सँवारिस अउ संगे संग कलियुग के राम नाम लेवाइया मन के बिगड़ी ला बना दिस।हर कल्प मा राम हा उँखर नाम लेवइया मनके उद्धार करे हे,भाग्य सँवारे हे। प्रभु राम के नाम जपत अहिल्या ला एक जुग पखरा बने बीतगे रहिस।ओकर गृहस्थी हा थोकिन गल्ती मा बिगड़ गे।राम जब ऋषि विश्वामित्र के संग जावत रहिस तब ओकर उद्धार करिस।भीलनी शबरी के जिनगी घलाव बिगड़े रहिस वहू हा अबड़ बच्छर ले राम नाम लेवत रद्दा जोहत रहिस।आखिर मा राम प्रभु उनला दरस देखिके जीनगी ला पबरित करके ओकरो बिगड़ी बना दिस।नवधाभक्ति के ज्ञान दिस। सुग्रीव के बिगड़े गृहस्थी ला राम जी हा सँवारिस हे।बिना गल्ती के भाई हा बैरी बनगे, सुखी गृहस्थी हा छुटगे,परिवार ले अलग रहेबर बिवस होगे।धन ओ ऋषमुख परबत जिहाँ श्राप के सेती बालि नइ जा सकय नइते ओला भाई के हाथ मा मरे बर परतीस।बालि ला मार के सुग्रीव के डर ला भगाईस पाछू प्रभु राम से सुग्रीव के मितानी होगे , ओकरो बिगरे गृहस्थी ला सँवार दिस।



अइसने देव ऋषि दधिची के बिगड़ी ला बना दिस।देवता अउ राक्षस मन के लड़ई बेरा तपस्वी ऋषि दधिची हा देवता मन के गोहार सुनके अपन हाँड़ा ला धनुष अउ वज्र बनाय बर देय रहिस।देवता मन जब लड़ई जीतिस ता धनुष ला शंकर भगवान राख लिस।उही धनुष त्रेताजुग मा मिथला के राजा जनक के घर मा रहिस। हर युग मा प्रान के स्थान अलग अलग बताय गे हवय।जइसे सतजुग मा हाँड़ा, त्रेता मा रकत, द्वापर मा मास, अउ कलजुग मा अन्न। ऋषि दधीचि के प्रान धनुष मा अटके अबड़ बच्छर होगे।प्रभु राम जब धनुषयज्ञ मा धनुष तोड़िस तब ऋषि ला मुक्ति मिलिस।




केंवट के जिनगी के संगे संग ओकर निषाद राजा, परिवार, गाँव के सबोझन के बिगड़ी प्रभु राम बना दिस। गिद्धराज जटायु जौन निरबंशी हँव कहिके राजा दशरथ करा अपन बेटा ला दे देते कहिके गोहार करे गय रहिस। 14 बच्छर के वनवास के आखिरी बेरा मा जब डोकरा होगे रहिस, तब ओकर डेना ला रावन काट दे रहिस, जब घायल होके पीरा खावत परे रहिस तब सीता ला खोजत प्रभु राम रद्दा मा पीरा खात जटायु ला देख के ओकरो उद्धार करिन अउ बेटा बनके ओकर चिता ला आगी दिन अउ पिंड दान करिन।



विभीषण हा श्रापा के सेती राक्षस कुल मा जनम धरे रहिस फेर ओहा हरदम राम नाम लेवत रहिस।लंका मा राक्षस के बीच मा जीयत ओकर जिनगी नरक बरोबर बनगे रहिस।ओकर भाई रावण हा ओकर समझाय ला नइ मानिस उपर ले लात मार के देस निकाला कर दिस। प्रभु राम ओकरो बिगड़ी ला बनाइस अउ ओला लंका के राजा बना के जिनगी सँवार दिस। सोना के लंका ला तियागना छोटे मोटे काम नोहय।




राम प्रभु हा सबके उद्धार करे बर धरती मा अवतार लेय रहिस। देव, दनुज, किन्नर, गंधर्व, धरती, नाग, गाय ,सबके उद्धार करिन।तुलसीदास बाबा हा रामचरित मानस ला लिखके कलयुग के करोड़ो मनखे उपर किरपा कर दिन। आज तो भारत देश के राजनीति मा घलाव श्रीराम के नाम ले सत्ता के डोगा मा चढ़के पार लगा लीन।ओकरे सेती कहे जा सकत हे राम सबके भाग्य सँवारथे।

हीरालाल गुरुजी “समय”
छुरा, गरियाबंद


चुनाव अउ मंदहा सेवा

चुनाव तिहार के बेरा आवत देख मंदहा देवता हा अइलाय भाजी मा पानी परत हरियाय बरोबर दिखे लगथे।थोकिन अटपटहा लगही कि मेहा मंदहा ला देवता कहि परेंव फेर चुनाव के बेरा मा सबके बिगड़ी बनइया काम सिधोइया इहीच हा आय। जइसे चुनाव के लगन फरिहाथे दिन तिथी माढ़थे तब गाँव के मंदहा समूह के खुशी ला झन पूछ ,शेर बर सवा शेर हो जाथे।
मंदहा ला का चाही, तीन बेर पीना शेर बरोबर जीना।
अब तो कोनो संस्था , समाज, लोकतंत्र के चुनई हा बिगर मंद, मंदहा के निपट जाही कहिबे ता लबारी आय।चुनाव बेरा आइस तहान मंदहा देवता के पूजा शुरु। अन्ते बेरा मा जेन ओकर घर मा थूँकेबर नइ जाय चुनाव मा चाटे बर जथे।आज हर पार्टी हा मंदहा के सेवा बर दूनो हाथ जोड़के एक पाँव मा खड़े हो जथे। ओहा जेन चढ़ावा माँगथे , देयबर तैयार हो जथे।
मंदहादेव मन त्रिदेव, पंचपरमेश्वर के समूह घलाव बना लेथे।एक गाँव मा दू-तीन समूह ले जादा घलाव रहिथे।हर पार्टी बर अलगेच अलग समूह मन बूता करथे। चुनाव तिथि के घोषणा पाछू पार्टी के जिला, ब्लाक पदाधिकारी मन इकर सेवा करे अउ मेवा पाय बर खोजत दउड़त आथे। जौन पार्टी संग भाव ठस जथे उँकर भाग खुल जथे। मंदहा मन के पंन्दरा महिना दिन के पीये खाय के बेवस्था हो जथे। घर वाले मन कुछ बोल नइ सकय काबर कि अब एमन पचास पचीस माँगे के जगा घर मा ओतकी लान के देथे अउ भामाशाह बन जथे। घर के सब बूता छोड़ छाड़ के चुनाव के बूता ला राष्ट्रीय धरम समझके निभाय बर समूह मा भिड़ जथे।
बिहनिया ले तैयार होके पार्टी कार्यालय जाके अपन पहिचान बर टीशर्ट, टोपी, गमछा, पहिरथे।बेनर, पोस्टर, पाम्पलेट, पर्चा,स्टीकर, झंडा,बेनर, अउ जरुरत के जतका जिनिस रथे ओला गाड़ी मा जोरथे। नास्ता पानी के संग बिहनिया के तरपनी लेथे।अउ निकल जथे परचार मा।मंदहा मन जतका दिन तक पार्टी मा बने रथे ओतका दिन ले ईमानदारी ले चंदन मा लपटाय साँप बरोबर संग देथय। सादा मनखे हा तो पार्टी ले गाय अउ शेर असन दुरिहा बनाय रहिथे।
सब जानथे आज के बेरा मा कोनों रैली, सभा ला सफल करेबर कतका पसीना बोहायबर परथे। फेर मंदहा समूह के रहे ले ये बोझा कतका हरु हो जथे।सादा मनखे रैली मा एक तो आवय नइ दूसर कोनों ला लावय नइ। ये बखत मंदहा समूह हा हनुमान बरोबर आके संजीवनी बूटी के पहाड़ लान देथे।मंदहा समूह हा सब बूता मा निपुण रहिथे। बेनर पोस्टर लगाना, पर्चा पाम्पलेट बाँटना , नारा लगाना, अपन उम्मीदवार के बखान करना सब एक पाव चढ़े के पाछू लघियाँत हो जथे। मंदहा मन अपन उम्मीदवार के अतका गुण बताही जइसे बचपना ले एके तरिया मा नहाय हे, एके पतरी मा भात खाय हे।घर मा रोजेच आना जाना हे।सादा मनखे मन नारी परानी, बेपारी, बड़हर, निच्चट गरीब कर परचार मा जाय बर छिनमिनाथे।मंदहा बर ये सब एक बरोबर आय।गहिरा बरोबर सबो ला एक ला उडठी मा हाँक डारथे।
गाँव मा कभू कभू ये मंदहा समूह मन लड़ई घलाव करवा देथे।अपन मालिक के वफादार कुकुर दूसर गली के कुकुर ला आवत देखतेच गुरेरथे, भुँकथे अउ झपट पड़थे अइसने अलग अलग पार्टी बर सेवा देवइया मन लड़ पड़थे। सेवा मा कोनों परकार के कमी हो जाय तब ये देवता मन भस्मासुर बन जथे।कतको घाँव पार्टी वाले मन ला अंगठा अउ डुँड़ी अंगठी देखावत धमकी घलाव दे देथे। अब मंदहा के काय बिगाड़ लेहीं।मंदहा मन बिगड़ जहीं ता पार्टी अउ उम्मीदवार के सबो बिगड़ जही।ऐकरे सेती सबो पार्टी मन मंदहा देव के पूजा करथेअउ नराज झन होवय तेकर उदिम करथे।

हीरालाल गुरजी “समय”
छुरा, जिला-गरियाबंद

नान्हे कहानी – सुगसुगहा

राजेश बड़ सुगसुगहा आय। थोरको मौसम बदलिस कि ओखर तबियत बिगड़ जातीस। धुर्रा माटी हा ओखर जनम के बैरी रिहिस होही। राजेश हा अइसे तो बड़का कंपनी मा नउकरी करथे। तनखा घलो बनेच मिलथे। दाई ददा ले दुरिहा, कंपनी के घर मा रहिथे। फेर एकेच ठन दुख मा गुनत हवय। उमर 35 पूरगे हवय अउ बिहाव नइ होय हवय।संग संगवारी मन बिहाव करेबर काहय तब मुच ले हाँस दय। भँइसा के सींग भँइसा ला भारी अइसने ओखर दुख हा दिनोंदिन ओला भारी होवत रहय।अइसे वो भगवान के भक्ति मा कमी घलाव नइ करय।हर मंगल अउ शनिच्चर के हनुमान मंदिर जाय मा नाँगा नइ करय।फेर भगवान घलाव कतका दिन ले नइ मानही ? ओखरो लगन फरियाइस.,। ओखरे कंपनी मा काम कराइया संगवारी हा अपन दुरिहा के नत्ता मा सटका बनके जोग मढ़ा दीस। गोठबात, मन पसंद होगे। दिनतिथी मढ़ाके सुग्घर बिहाव होगे।बने गोसाइन पाइस। वहू हा पारबती बरोबर बड़ तपस्या करे रहिस तब 32 बच्छर मा राजेश ला पाइस।अब दूनो झन बजार हाट ले लेके मंदिर तक जावय। सुख के दिन पूस बरोबर कइसे बीतथे पता नइ चलय।देखते देखत तीन बच्छर बीतगे। सब बनेच बने चलत हे , फेर एक दुख मा ओमन घेरात हवय। तीन बच्छर बीते पाछू उखर घर बालगोपाल नइ खेलिस। दुनिया के रीत आय कि काखरो सुख ला देख नइ सकय अउ दुख ला आगू आगू मा लानथे।जौन सगा संगवारी मिलय एकेच भाखा पूछय।कोनो जगा देखा सुना नइ कराय हव?फलाना बईद हा… उहाँ के डाक्टर हा… फलाना मन फलाँ जगा गीन अउ चारेच महीना मा…।

सुन सुनके दुख कमती होय के जगा बाढ़य। चँवथा बच्छर पाछू राजेश अउ सरिता के घर भगवान खुदे जेठौनी के दिन आइस। चातुर्मास के पाछू भगत हा भगवान के दरस करके जतका खुश होथय वइसनेच राजेश ला होइस।छट्ठी मनाय बर सब सगा सोदर अरपरा परपरा नेवत के बफर पार्टी रख के मनाइस।पइसा के कमती तो नइ रहय , छत्तीसगढ़ी कार्यक्रम घलाव कराइस।जतका झन आय रहीन सबोमन खुश होगे। अधरतिया ले जादा बेरा तक अवइया जवइया लगे रहीस।का छोटे का बड़का सबो किसम के मनखे मन आइन, लइका ला असीस दीन। फेर किस्मत के रेखा ला कोनों मेटाय नइ सकय। दूसर दिन लइका के तबियत बिगड़ गे। डाक्टर मन कहिस कि निमोनिया होगे हावय।राजेश के जी धकधकागे।डाक्टर कहिस-कि जादा डर्राव झन, बस लइका ला धुर्रा, माटी, पानी-बरसात,जुड़-तात, ले बचा के राखहू। लइका थोकिन सुगसुगहा रही। राजेश ला फेर उही सुरता आगे जौन कई बच्छर पाछू ओकर दाई ददा ला डाक्टर कहे रहिस।

हीरालाल गुरुजी”समय”
छुरा, जिला- गरियाबंद

मानस मा प्रयाग

तीर्थराज प्रयाग मा कुंभ मेला चलत हावय।एक महिना तक ये मेला चलथे। छत्तीसगढ़ मा एक पाख के पुन्नी मेला होथय। ये बखत यहू हा प्रयाग हो जाथय। तुलसीदास बाबा हा तीर्थराज प्रयाग के महत्तम ला रामचरित मानस मा बने परिहाके बताय हे।मानस के रचना करत शुरुआत मा जब बाबा तुलसी वंदना करधँय तब साधु संत के वंदना अउ उँखर गुनगान करथँय।संत मन के समाज हा कल्याणकारी असीस देवइया अउ आनंद देवइया होथँय।संसार मा जौन जगा साधु संत सकलाथँय उही जगा मा सक्षात् तीर्थराज प्रयागराज हा खुदे आ जाथय। इही ला तुलसीदास हा मानस मा गढ़े हावय-

मुद मंगल मय संत समाजू, जो जग जंगम तीरथराजू।

अइसने प्रयाग के विसय मा बतावत कहिथँय कि प्रयाग मा रामकथा, रामभक्ति, शिवभक्ति अउ ब्रम्हभक्ति होथँय।इही तीनों हा गंगा, जमुना अउ सरसती के त्रिवेणी संगम आवँय।जिहाँ ये तीनों मिल जाथँय उही हा प्रयाग बन जाथय।अइसे तो रामचरित मानस हा घलाव प्रयाग आवय।जौन एकर पाठ करथे,कथा सुनथे, कथा कहिथे ओला प्रयाग के त्रिवेणी संगम के नहाय के पुण्य मिल जाथय।
बाबा तुलसी कहिथँय कि प्रयाग मा भरद्वाज मुनि के बसेरा हावय।जिहाँ रामकथा रोजेच होथय।संत मन एला अइसे घलाव कहि सकथन कि जिहाँ रामकथा होथय उही प्रयाग हो जाथय। मानस मा लिखाय हे-

भरद्वाज मुनि बसहिं प्रयागा,तिन्हहिं राम पद अति अनुरागा।

तुलसीदास जी मानस मा बताय हावय कि जब माघ महिना मा सुरुज देवता हा मकर राशि मा आतँय तब सब देवी देवता, राक्षत, किंनर अउ मनखे मन खलाकुजर के त्रिवेणी संगम मा नहाय बर आथँय।ओकरे सेती जिहाँ रामचरित मानस के कथा होथय उहाँ घलाव सबो देवी देवता मन ला बलाय जाथय।नवग्रह मन ला आसन देके बइठारे जाथय।मानस मा तुलसीदास लिखे हावय-

माघ मकर गत रबि जब होई, तीरथ पतिहिं आव सब कोई।
देव दनुज किंनर नर श्रेणी, सादर मज्जहिं सकल त्रिवेणी।

जौन मन माघ महिना मा प्रयाग मा आथँय ओमन अक्षयवट ला छुथँय। त्रिवेणी माधव के पूजा पाठ करथँय अउ असीस पाथँय।तीर्थराज प्रयाग मा जतका साधू संत मन आथँय ओमन भरद्वाज मुनि के आश्रम मा रहिथँय।पहट बिहनिया गंगा मा नहाथँय, पाछू भगवान के कथा कहिथँय सुनथँय अउ सत्संग करथँय।

जहाँ होई मुनि रिषय समाजा,जाहि जे मज्जन तीरथराजा।
मज्जहिं प्रात समेत उछाहा, कहहिं परस्पर हरिगुन गाहा।।

एहि प्रकार भरि माघ नहाहीं,पुनि सब निज निज आश्रम जाहीं।
प्रति संबत अति होई अनंदा , मकर मज्जि गवनहिं मुनिवृंदा।

बाबा तुलसीदास कहितँय- हर बच्छर साधू संत मन सकलाथँय।माघ महिना भर बिहनिया नहाथे,यज्ञ, पूजा करके कथा सुनथँय।पाछू सब अपन अपन आश्रम मा चल देथँय।

संकलन
हीरालाल गुरुजी”समय”
छुरा, जिला गरियाबंद