धुर्रा (नान्हे कहिनी) जितेंद्र सुकुमार ‘ साहिर’ वैभव प्रकाशन रायपुर ( छ.ग. ) छत्तीसगढ राजभाषा आयोग रायपुर के आर्थिक सहयोग से प्रकाशित आवरण सज्जा : अशोक सिंह प्रजापति प्रथम संस्करण : 2016 मूल्य : 50.00 रुपये कॉपी राइट : लेखकाधीन भूमिका कोनो भी घटना ले उपजे संवेदना, पीरा ल हिरदय के गहराई ले समझे बर अउ थोरकिन बेरा म अपन गोठ-बात ल केहे बर अभु लघुकथा या नान्हें कहिनी ह एक मात्र ससक्त विधा हे। नान्हें कहिनी हा अभु के बेरा म समाजिक बदलाव के घलो बढिया माध्यम हे। समाज…
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ढेला अऊ पत्ता
छोटकू म पहिली कक्षा म भरती होयेन त छोटे गुरूजी बिजलाल वरमा हर ढेला अऊ पत्ता के कहिनी सुनाये रिहिस से तेकर सुरता आज ले हावे। ठेला अऊ पत्ता दू परोसी दूनों म अड़बड़ मया राहय बिपत के बेटा म तको एक दूसर के संग देवे म गूलाझांझटी नई करेय। एक दिन ढेला हर पत्ता ल कहिथे संगवारी असाढ क़े दिन बादर आगे पानी गिरे ल धरही तइसे तैंहा मोर ऊपर तोपा जाबे एकर से मय घुरे ले बांच जाहूं। पत्ता हर ठेला के बात ल मान के हुंकारू भरथे।…
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