पितर पाख मा पंदरा दिन पुरखा मन बर सरद्धा तन मन मा कोचकीच ले भर जाथे। दाढ़ी-मेछा हा अइसे बाढ़ जाथे जइसे सियान मन के सुरता मा सुध-बुध गवाँ गे हे। लिपे-पोते खुँटियाय अँगना-दुवाँर, चउँक पुराय मुहाँटी, तरोईपान अउ फूल ले हूम-जग देवाय घर हा चारों खूँट बरा-सोंहारी के माहक मा महर-महर करत रथे। सिरतोन मा अपन सियान अपन पुरखा के सरद्धा के परमान एखर ले बड़े अउ का होही। आज नरवा मा सवनाही पूरा कस छकबक अपन पुरखा बर सरद्धा ला देख के मोर बया भुलागे। जब सियान हा…
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पितर पाख के असल मान राख : जीयत मा डंडा-मरे मा गंगा
सावन के लगते साठ वातावरन हा भक्ति भाव ले भर जाथे। मन मा सरद्धा बतरकीरी कस जाग जाथे। तीज तिहार के घलो रेला-पेला लग जाथे। सरी देवी-देवता मन के आरी-पारी लग जाथे अउ संग मा पुरखा मन के सुरता अउ सरद्धा समे आ जाथे। भादो महीना के पुन्नी ले शुरु हो के कुँवार महीना के अँधियारी पाख के आवत ले कुल सोला दिन के सुग्घर समे हा पितर पाख कहाथे जेमा पुरखा मन के मान-गउन करे के बखत रथे। ए पाख हा सरद्धा ले सुरता करे के सुग्घर समे होथे।…
Read Moreसिक्छक सिखही तभे सिखाही
हमन नान्हेंपन ले पढ़त आवत हन के सिक्छक हा मोमबत्ती कस होथे जेन हा खुद जर के, खुद खुवार हो के दुसर ला अंजोर देथे। ए बात सोलाआना सिरतोन हरय के सिक्छक हा अपन आप ला परहित मा निछावर करइया जीव हरय। जिनगी भर सरलग सिखइया हा ही सिरतोन मा सिक्छक आय। सिखथे अउ सिखोथे अपन बिद्यार्थी मन ला अइसन सिक्छक मन हा। अपन सोच ला, बिचार ला समे के संगे संग सुधारत रहँय, सवाँरत रहय उही सिक्छक हा एक सफल सिक्छक कहाथे। सिक्छक सिखे के सरी उदिम ला अपन…
Read Moreमाटी के गनेस बइठारव-पर्यावरण के मान बढ़ावव
माटी के मुरति सबले सुग्घर, चिक्कन-चाँदन अउ श्रेष्ठ माने गए हावय। माटी के मुरति हा जिनगी के सुग्घर अउ सिरतोन संदेश ला बगराथे के जौन जिहाँ ले आये हे उँहें एक दिन खच्चित लहुठ जाथे। नदिया के चिक्कन माटी ले बने देबी-देवता मन के मुरति हा उही पानी मा जा समाथे। सार गोठ हे के जइसे जनम होथे जग मा वइसने मृत्यु होथे जम्मो परानी के। ए गोठ हा अटल अउ असल गोठ हरय। माटी के मुरति हा हमर जिनगी के अधार पर्यावरण बर घलाव बड़ सुग्घर सहायक अउ हितवा…
Read Moreहमर हरेली तिहार
[responsivevoice_button voice=”Hindi Female” buttontext=”ये रचना ला सुनव”] हमर हिन्दू धरम मा बच्छर भर के पबरित महीना सावन ला माने गे हे। भक्ती, अराधना, आस्था अउ बिसवास के पावन महीना सावन हा कहाथे। असाढ़ महीना हा जेठ के जउँहर जीवलेवा गरमी ले अधमरा अउ अल्लर परे जम्मों जीव जगत ला हबेड़ के उठाथे। सावन महीना धूमधाम ले आके सबो परानी मन के तन मन के पियास ला बुझाथे। सावन महीना सुग्घर रिमझिम फुहार ले खुशी के बिरवा ला पोसथे। चारो खूँट धरती दाई के कोरा हा हरियर-हरियर भर-भर दिखे ला धर…
Read Moreसोनहा सावन सम्मारी
सोनहा समे हे सावन सम्मारी, भजय भगद हो भोला भण्डारी। सोनहा समे हे सावन सम्मारी, भजय भगद हो भोला भण्डारी।। नीलकंठ तोर रूप निराला, साँप-डेरू के पहिरे तैं माला। जटा मा गंगा,माथ मा हे चंदा, अंगरक्खा तोर बघवा छाला।। भूत,परेत,नंदी हे संगवारी। सोनहा समे हे सावन सम्मारी।।१ भजय भगद हो भोला भण्डारी।। कैलासपती तैं अंतरयामी, तीन लोक के तैं हर सुवामी। सिचरन संग सकती साजे, देबी देवता के तैं देव धामी।। जगत म जबर तैं जटाधारी। भजय भगद हो भोला भण्डारी।।२ सोनहा समे हे सावन सम्मारी।। सिव संगीकर बड़ बरदानी,…
Read Moreशिवशंकर के सावन सम्मार
[responsivevoice_button voice=”Hindi Female” buttontext=”ये रचना ला सुनव”] हमर हिन्दू पंचांग के दिन तिथी के नामकरन हा कोनो ना कोनो देवी-देवता मन ले जुड़े हावय। सब्बो सातो दिन के नाँव के कथा हा अलग-अलग हावय। सनातन धरम मा जम्मों तिथी के नाँव हा देवता मन ले जुड़े मिलथे। सातो दिन पहिली मा सबले पहिली दिन इतवार के संबंध भगवान सूरुज नरायन ले माने जाथे। तीसरइया दिन मंगलवार के संबंध हा संकट मोचन हनुमान ले माने जाथे। कोनो कोनो जघा मा कोनो कोनो मन हा ए दिन गनेस देवता के दिन मानथे।…
Read Moreप्रकृति के पयलगी पखार लन
आवव, परकीति के पयलगी पखार लन। धरती ला चुकचुक ले सिंगार दन। परकीति के पयलगी पखार लन।। धरती ला चुकचुक ले सिंगार दन।।। रुख-राई फूल-फल देथे, सुख-सांति सकल सहेजे। सरी संसार सवारथ के,, परमारथ असल देथे।। धरती के दुलरवा ला दुलार लन। जीयत जागत जतन जोहार लन।। परकीति के पयलगी पखार लन।।1 रुख-राई संग संगवारी, जग बर बङ उपकारी। अन-जल के भंडार भरै, बसंदर के बने अटारी।। मत कभु टँगिया,आरी,कटार बन। घर कुरिया ल कखरो उजार झन।। धरती ल चुकचुक ले सिंगार दन।।2 रुख-राई ला देख बादर, बरसथे उछला आगर।…
Read Moreअसाढ़ के आसरा हे
सूरुज नरायन ला जेठ मा जेवानी चढ़थे। जेठ मा जेवानी ला पाके जँउहर तपथे सूरुज नरायन हा। ताते-तात उछरथे, कोनो ला नइ घेपय ठाढ़े तपथे। रुख-राई के जम्मों पाना-डारा हा लेसा जाथे, चिरई-चिरगुन का मनखे के चेत हरा जाथे। धरती के जम्मों जीव-परानी मन अगास डाहर ला देखत रथें टुकुर-टुकुर अउ सूरज हा मनगरजी मा मनेमन हाँसत रथे मुचुर-मुचुर। सूरुज के आगी ले तन-मन मा भारी परे रथे फोरा,आस लगाय सब करत हें असाढ़ के अगोरा। गरमी के थपरा परे ले सबो के तन मा अमा जाथे अलाली अउ असाढ़…
Read Moreनमस्कार के चमत्कार
हमर पुरखा-पुरखा के चलाय मान-सम्मान परमपरा मा सबले जादा एक दुसर के अभिवादन ला महत्तम दे गे हावय। ए परपपरा हा आज घलाव सुग्घर चले आवत हे फेर चाहे एखर रकम-ढकम हा बदलत जावत हावय। हमन ए अभिवादन परमपरा मा देखथन के एक दुसर ला नमस्ते या नमस्कार करथन फेर एखर का अरथ हे सायदे जादा झन मन जानथन। आवव आज ए लेख के माधियम ले जाने के परयास करबो के अभिवादन मा नमस्ते कहे के का मतलब हावय। हिन्दू धरम सास्त्र मन के हिसाब ले ले अभिवादन के कुल…
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