महतारी शब्द के अर्थ ला संसार के जम्मो जीव-जन्तु अउ परानी मन हा समझथें। महतारी के बिन ए संसार के कल्पना करना बिलकुल कठिन हे। महतारी हमन ला सिरिफ जनम भर नइ देवय बलकि करम ला घलाव सिखाथे। वो करम जेखर बिन हमर एक पाँव रेंगना असंभव होथे। मया पियार दुलार के संगे-संग अमोल संस्कार ला घलो सिखोथे। जिनगी जीये के बीज बोथे। नौ महीना लइका ला अपन ओदरा मा बोह के सरी बुता-काम ला सरलग करइया एके झन जीव ए जगत मा हे जेखर नाँव हरय महतारी हावय। वो…
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महतारी दिवस विशेष : महतारी महिमा
महतारी महिमा (चौपई/जयकारी छन्द 15-15 मातरा मा) ईश्वर तोर होय आभास, महतारी हे जेखर पास। बनथे बिगङी अपने आप, दाई हरथे दुख संताप।।१ दाई धरती मा भगवान, देव साधना के बरदान। दान धरम जप तप धन धान, दाई तोरे हे पहिचान।।२ दाई ममता के अवतार, दाई कोरा गंगा धार। महतारी के नाँव तियाग, दाई अँचरा बने सुभाग।।३ काशी काबा चारों धाम, दाई देवी देवा नाम। दाई गीता ग्रंथ कुरान, मंत्र आरती गीत अजान।।४ भाखा बोली हे अनमोल, दाई मधुरस मिसरी घोल। महतारी गुरतुर गुलकंद, दाई दया मया आनंद।।५ दाई कागज…
Read Moreगरमीं के छुट्टी मा ममा गाँव
कलकूत गरमी मा इस्कूल मन के दु महीना के छुट्टी होगे हे। अब फेर इस्कूल खुलही असाढ मा। लइका मन मा टी.वी.,मोबाइल, कंप्यूटर, लेपटाप, विडियो गेम, देख-खेल के दिन ला पहाही अउ असकटाही घलाव। एकर ले बाँचे बर दाई-ददा मन हा गरमी के छुट्टी बिताय खातिर कोनो नवा-नवा जघा मा घुमे जाय के उदिम करहीं। कोनो पहाड़, कोनो समुंदर , कोनो देव-देवाला अउ कोनो पिकनिक वाले जघा मा जाँही अउ सुग्घर समे बिता के आहीं। ए हा अच्छा बात हे के नवा-नवा जघा देखे अउ घुमे ला मिलही,ओखर बारे मा…
Read Moreअकती तिहार : समाजिकता के सार
बच्छर भर के सबले पबरित अउ सुभ दिन के नाँव हरय “अक्षय तृतीया” जउन ला हमन अकती तिहार के रुप मा जानथन-मानथन। अक्षय के अरथ होथे जेखर कभू क्षय नइ होवय,जउन कभू सिरावय नही,कभू घटय नही अउ कभू मिटय नही। एखरे सेती ए दिन हा हिन्दू धरम मा सबले परसिद्ध अउ लोकपिरिय दिन माने गे हावय। अकती तीज के तिहार हा बइसाख महीना के जीज के दिन मनाय जाथे एखर सेती ए तिहार ला अकती तीजा घलो कहे जाथे। ए तिहार हिन्दू अउ जैन मन के एकठन सोनहा दिन के…
Read Moreहोरी हे रिंगी चिंगी : रंग मया के डारव संगी
फागुन के महिना रिंगी चिंगी रंगरेलहा अउ बेलबेलहा बरोबर हमर जिनगी मा समाथे। जिनगी के सुख्खा और कोचराय परे रंग मा होरी हा मया-पिरीत,दया-दुलार,ठोली-बोली,हाँसी-ठिठोली के सतरंगी रंग ला भरथे। बसंत रितु हा सरदी के बिदा करे बर महर-महर ममहावत-गमकत गरमी ला संगवारी बनाके फागुन के परघनी करथे। फागुन के आये ले परकीति मा चारों खूँट आनी-बानी के रिंगी-चिंगी रंग बगर जाथे। गहूँ के हरियर रंग,सरसों के पिंयर रंग,आमा मँउर के सोनहा रंग,परसा के आगी बरन लाली रंग,जवाँ,अरसी फूल अउ अँगना मा गोंदा, गुलाब,किसिम-किसिम के फूल घलो छतनार फुले फागुन के…
Read Moreसन्त रविदास जयन्ती माघी पूर्णिमा 10 फरवरी
सन्त रविदास गियान के जघा हा जग मा सबले ऊँच अउ अव्वल हावय। गियान हा मान,सम्मान अउ गरब गुमान हरय। गियान जिनगी के सबले खच्चित जीनिस हरय,एखर बिना मनखे पसु के समान होथे। अगियानी आदमी हा आँखी रहीके अंधरा कहाथे। गियान मनखे के तीसरइया नयन हरय। गियान अंतस के वो अंजोर हरय जेखर ले समाज मा फइले अंधबिसवास, छुआछूत, जातपात, ऊँचनीच, ठग-जग, लाचच-लबारी जइसन जीवलेवा अंधियार हा दुरिहा भागथे। समाज मा ग्रहन कस धरे ए अंधियारी मन ला अपन गियान के बल मा भगाय के, दुरिहाय के बूता समे-समे मा…
Read Moreमहतारी भाखा के मान करव
मनखे हा जनम धरे के बाद जउन भाखा पहिली सीखथे उही हा ओखर महतारी भाखा कहाथे। इही महतारी भाखा हा वो मनखे के जीयत-मरत समाजिक चिन्हारी होथे, एखर बिन वो हा अधूरा रथे। महतारी भाखा हा मनखे के असल अउ मउलिक पहिचान होथे। महतारी भाखा के जघा ला अउ कोनो दुसर भाखा हा नइच ले सकय। जइसे गाय के दूध हा कभू दाई के दूध नइ बन सकय वइसने महतारी भाखा के बरोबरी कोनो नइ कर सकय। मनखे के सरी बिचार,बेवहार अउ बिकास के जरी ओखर अपनेच महतारी भाखा मा…
Read Moreछेरछेरा : समाजिक समरसता के तिहार
जिनगी मा दान दक्छिना के घातेच महत्तम हावय, असल सुख-सान्ती दान पुन मा समाय हावय। हमर देश अउ धरम मा दान अउ तियाग के सुग्घर परमपरा चले आवत हे, भले वो परमपरा मन के नाँव अलग-अलग रहय फेर असल भाव एकेच होथे- दान अउ पुन। अइसने एकठन दान पुन करे के सबले बङ़े लोक परब के नाँव हे छेरछेरा परब। लोक परब एकर सेती कहे जाथे के एहा जन-जन के जिनगी मा रचे बसे हे, समाय हे। हमर छत्तीसगढ के जीवन सइली मा तो छेरछेरा हा नस मा लहू रकत…
Read Moreनवा बछर म देखावा झन करव तुमन
नवा बछर मं नवा बिचार अउ संकल्प के संग सबके भलई के काम करना हे सबले पहिली आप सबो ला नवा बछर के नंगत बधई अउ शुभकामना हावय। मोर अंतस के इही उद्गार हे के सरी संसार हा हांसत-गावत अउ मुसकावत नवा बछर के सुवागत करयं अउ पूरा बछर भर हा बिघन-बाधा के बिन बित जावय। कोनो हा पाछू साल के कोनो गलती ला कोनो गलती ले झन दोहरावय। नवा साल हा दगदग ले, रगरग ले सूरुज कस अंजोर हम सबके जिनगी मा बगरावय अउ अगियान के, गरब-गुमान के अंधियारी…
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