कविता : पथरा

संगी हो! पथरा तो पथरा होथे फेर विही ह जिनगी के अटघा घला होथे। जानइया मन बर विहिच म प्रेम हे धरम-करम-नेम हे दया-मया अउ पीरा हे जिनगी ल गढ़े बर अनमोल हीरा हे जिये-मरे के सीख हे फेर अड़हा मन बर करिया आखर भंइस बरोबर सबो एकेच् सरीख हे। ये हर सच आवय, कि – मंदिर पथरा से बनथे, मंदिर के सिढ़िया पथरा से बनथे मंदिर के भगवान पथरा से बनथे बांध पथरा से बनथे मकान पथरा से बनथे मरे पीछू मठ पथरा से बनथे रस्ता-सड़क सब पथरा से…

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कथाकार आस्कर वाइल्ड के कहानी द मॉडल मिलियनेअर के अनुवाद : आदर्श करोड़पति

मूल – The Model Millionair (द मॉडल मिलियनेअर) कथाकार – Oscar Wilde (आस्कर वाइल्ड) अनुवादक — कुबेर जब तक कोई धनवान न हो, दिखे म सुंदर होय के कोई फायदा नइ हे। प्रेम करना घला भरे-बोजे, पोट मनखे मन के बपौती आय, निठल्लू मन के काम नो हे। गरीब मन ल तो बस रांय-रांय कमाना अउ लस खा के सुतना भर चाही (व्यवहारिक और नीरस होना चाहिए)। (आदमी खातिर) मनमोहक होय के बदला कमाई के स्थायी साधन होना ही बेहतर हे। इही ह आधुनिक जीवन के परम सच्चाई आय, जउन…

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छत्तीसगढ़िया होटल

कवि – कुबेर छत्तीसगढ राज म एक ठन, छत्तीसगढ़िया होटल बनाना हे। चहा के बदला ग्राहक मन ल, पसिया-पेज पिलाना हे। सेव के बदला ठेठरी-खुरमी, इडली के बदला मुठिया-फरा, दोसा के बदला चिला रोटी, तुदूरी के बदला अंगाकर रोटी खवाना हे। मंझनिया तात पेज, संग म अमारी भाजी, रात म दार-भात अउ इड़हर के कड़ही, बिहिनिया नास्‍ता म आमा के अथान संग, दही बरा के बदला, दही-बासी खवाना हे। कुर्सी के बदला मचोली, टेबल के बदला पिड़हा, प्‍लेट के बदला बटकी, कप के बदला कटोरी, बेयरा ल बस्‍तर के, बस्‍तरिहा…

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अनुवाद : आखिरी पत्ता (The Last Leaf)

मूल रचना – The Last Leaf लेखक – ओ हेनरी अनुवादक – कुबेर वाशिंगटन स्‍क्‍वायर के पश्‍चिम म एक ठन नानचुक बस्‍ती हे जेकर गली मन बेढंग तरीका ले, येती ले ओती घूम-घूम के, एक दूसर ल छोटे-छोटे पट्टी म काटत निकले हे, जउन (पट्टी) मन ह ‘प्‍लेसिज’ (पारा या टोला) कहलाथे। ये जम्‍मों ‘प्‍लेसिज’ मन ह अजीब कोण वाले अउ चक्‍करदार हें। एके ठन गली ह खुद ल दू-तीन घांव ले काटे-काटे हे। एक घांव एक झन कलाकार ह अनमोल कल्‍पना करके अपन ये गली मन के खोज करे…

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मेजाई के उपहार

‘O’ HENRY (WILLIAM SYDNY PORTER) The Gift of the Magi (1862 – 1910) संक्षिप्त परिचय ’ओ. हेनरी’ के मूल नाम विलियम सिडनी पोर्टर रिहिस, इंकर जनम 11 सितंबर 1862 अउ निधन 05 जून 1910 म होइस। आप बैंक क्लर्क के नौकरी करत रेहेव। 1894 म 4000 डालर के चोरी के आरोप म आप ल जेल जाय बर पड़ गे। 1901 म छूटे के बाद आप अपन नाम ल बदल के ओ. हेनरी रख लेव। 1903 ले 1906 तक न्यूयार्क वर्ड मैगजीन बर आप हर हफ्ता एक कहानी लिखव। आपके चार…

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साहित्य की वाचिक परंपरा कथा-कंथली: लोक जीवन का अक्षय ज्ञान कोश

समग्र साहित्यिक परंपराओं पर निगाह डालें तो वैदिक साहित्य भी श्रुति परंपरा का ही अंग रहा है। कालांतर में लिपि और लेखन सामग्रियों के आविष्कार के फलस्वरूप इसे लिपिबद्ध कर लिया गया क्योंकि यह शिष्ट समाज की भाषा में रची गई थी। श्रुति परंपरा के वे साहित्य, जो लोक-भाषा में रचे गये थे, लिपिबद्ध नहीं हो सके, परंतु लोक-स्वीकार्यता और अपनी सघन जीवन ऊर्जा के बलबूते यह आज भी वाचिक परंपरा के रूप में लोक मानस में गंगा की पवित्र धारा की तरह सतत प्रवाहित है। लोक मानस पर राज…

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भाषांतर : एक महिला के चित्र (मूल रचना – खुशवंत सिंह. अनुवाद – कुबेर )

छत्‍तीसगढ़ी साहित्‍य म अनुवाद के परम्‍परा ‘कामेडी आफ इरर’ के छत्‍तीसगढ़ी अनुवाद ले चालू होए हावय तउन हा धीरे बांधे आज तक ले चलत हावय. छत्‍तीसगढ़ी म अनुवाद साहित्‍य उपर काम कमें होए हावय तेखर सेती अनुवाद रचना मन के कमी हावय. दूसर भाखा के साहित्‍य के जब हमर छत्‍तीसगढ़ भाखा म अनुवाद होही तभे हमन दूसर भाखा के साहित्‍य अउ संस्‍कृति ला बने सहिन समझ पाबोन. येखर ले दूसर भाखा के साहित्‍य के रूप रचना अउ अंतस के संदेसा ला हमन जानबोन अउ अपन भाखा के रचना उन्‍नति खातिर…

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भाषान्‍तर : बुलबुल अउ गुलाब (मूल रचना – आस्कर वाइल्ड. अनुवाद – कुबेर )

छत्‍तीसगढ़ी साहित्‍य म अनुवाद के परम्‍परा ‘कामेडी आफ इरर’ के छत्‍तीसगढ़ी अनुवाद ले चालू होए हावय तउन हा धीरे बांधे आज तक ले चलत हावय. छत्‍तीसगढ़ी म अनुवाद साहित्‍य उपर काम कमें होए हावय तेखर सेती अनुवाद रचना मन के कमी हावय. दूसर भाखा के साहित्‍य के जब हमर छत्‍तीसगढ़ भाखा म अनुवाद होही तभे हमन दूसर भाखा के साहित्‍य अउ संस्‍कृति ला बने सहिन समझ पाबोन. येखर ले दूसर भाखा के साहित्‍य के रूप रचना अउ अंतस के संदेसा ला हमन जानबोन अउ अपन भाखा के रचना उन्‍नति खातिर…

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कहा नहीं

चंपा ल आठ बजे काम म जाना हे; वोकर पहिली घर के चौंका-बर्तन करना हे, बहरइ-लिपई करना हे, नहाना-धोना हे अउ येकरो पहिली नवा बाबू के घर जा के चौंका-बरतन करना हे। अँगठा के टीप ले छिनी अँगठी के गांठ मन ल गिन के समय के हिसाब लगाइस; एक घंटा बाबू घर लगही, एक घंटा खुद के घर म लगही, घंटा भर नहाय खाय अउ तैयार होय म लगही; बाप रे! तीन घंटा, तब तो पाँच बजे मुँधेरहच् ले उठे बर पड़ही; बेर तो छै बजे उवत होही? आज पहिली…

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