एक दीया अउ जलावव

एक दीया अउ जलावव, कखरो अंधियारी कुंदरा ह, अंजोर होजय। सुवारथ के गंवईं मा, मया मा लिपे गली खोर होजय।। एक दीया वीर सिपाही, भारत के रखवार बर। देश के खातिर प्रान गवईंया, अउ ऊंखर परिवार बर ।। देशभक्ति के भाव मा, मनखे मनखे सराबोर हो जय… एक दीया अजादी देवईया, भारत के भाग्य बिधाता बर। एक दीया ओ जम्मो मनखे, जौन ,जियत हे भारत माता बर ।। वन्दे-मातरम् ह, मया म बांधे ,डोर होजय…. एक दीया मोर गाँव किसान बर, जेन करजा ,बाढ़ही म लदाए हे। जांगर तोड़के ,लांग्हन…

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छत्तीसगढ़िया मन जागव जी

जागव जी अब उठव भईया, नो है एहा सुते के बेरा । बाहिर के इंहा चोर घुमत हे, लुट लिही खेतखार अउ डेरा ।। बाहिर ले आके भोकवा मन ह, छत्तीसगढ़ मा हुसिंयार होगे हमन होगेन लीम के काड़ी, उही मन ह खुसियार होगे।। चुहुकत हे हमर धरती मईया ल, सानत हे हमर ,परम्परा अउ बोली। आज रपोटे हे धन खजाना, जेन काली धरय,मांगे के झोली ।। धान बोंवइया भूख मरत हन, इंखर रोज तिहार होगे। परदेश के ,चोरहा मन, इंहा के सरकार होगे।। हमर भाखा संस्कृति ह उंखर बर…

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व्‍यंग्‍य कविता : सफई अभियान

चलव आज फेर, अरछी परछी, कुरिया दुवारी के ,जाला ल झार लेथन। बाहिर कहूं चिकना गिस होही त, अब अंतस ल बहार लेथन ।। गांधी बबा ल घलो , अब देखाए ल परही। एक दिन बर सफई के, ढोंग लगाए ल परही। अपन घर ल बहार के, परोसी के मुंहाटी म फेंक । तब अहिंसा के पाठ ल, डंंडा अउ तलवार म देख ।। गांधी बबा के तीनो बेंदरा मन घलो, उतर जथे लड़ाई मा। अउ दू अक्टूबर के दिन नारा लगवाही, अपने बढ़ई मा।। बड़े बड़े गांधीवादी मन के,…

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आज के रावन

पिये के एके बहाना टेंसन होगे। दारू अउ बियर ह फेसन होगे।। रावन जइसे पंडित ज्ञानी, अड़बड़ पैग लगावत हे। घर मा जाके मंदोदरी बिचारी ल, डंडा खूब ठठावत हे।। एक रुपया के चाउंर ह पेंशन होगे.. पिये के… नशा होइस त सीता दाई बर घलो नियत ह खराब हो जथे। रिस्ता नता सबले बड़े, मउहा के शराब हो जथे।। नशा मा धुर्रा ह बेसन होगे… पिये के….. दारू बर खेतखार बेचागे, अउ लोटा गिलास बटलोही। मंदोदरी के चिरहा लुगरा, अउ अक्षय ह बासी बर रोही।। मुक्ति बर फांसी डोरी…

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कन्या पूजन

नौ दिन ले देबी पुजे, जांहू पितर के लोक मा। बेटा के लालच म अंधरा होके, बेटी ल,काबर मारे कोंख मा।। नइ फूले हे फूल तेन ल, कोंखे म ,काबर बोजत हस। पूजा करे बर कन्या मनके, गली गली मा खोजत हस।। भ्रुन हतियारा कन्या पूजे बर, बेटी कहांँ ले पाबे गा। करम मा बोंए बम्हरी काँटा, त आमा कहाँ ले खाबे गा ।। मार के कोंख मा बेटी ल बेटा पाए बर रोवत हे। मांगे मनौती देवी ले आज बेटी के पांव ल धोवत हे।। ✍ राम कुमार साहू…

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तोर बघवा ल तो ढिल दे दाई

तोर बघवा ल तो ढिल दे दाई, कोलिहा मन हा आवत हे। हमरे दाना पानी खाके, हमी ल गुर्रावत हे..।। जेन ल घर मा सरन देन, हमी ल आँखी देखाथे। बैरी के गुनगान करके, भुईंयां ल गारी सुनाथे जघा जघा आतंक के रुख ल लगावत हे.. तोर बघवा… रोज के उदिम, कुकुर ह, बघवा ल भूंकत हे। बघवा घलो चलाक, बंदूक मा धूंकत हे आजकल कतको कोलिहा कश्मीर म लुकावत हे… तोर बघवा….. हाड़ा चुहकइया कोलिहा, बरमा ले भाग के आवत हे। हमर गांव के कोलिहा मन, उनला परघावत हे।।…

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जागव जी : अपन बुध लगावौ जी

अपन बुध लगावौ जी परबुधिया झन बनौ, अपन बुध लगावौ जी ! मुसुवा नो हौ.गउहा डोमी, अब तो फन उठावौ जी!! सिधवा हन पर भोकवा नही, सब ल बतादौ ! परदेशिया के जुलूम ल, अब ठेंगवा देखादौ !! नेता मंत्री बने बइठे, हावै करिया चोर ह ! अन्न धन ल लुटत हे, परदेशिया निपोर ह !! छत्तीसगढ़िया माटी के रंग अब देखावौ जी… मुसुवा नो हौ………! परबुधिया झन….. पहुना बन आइस, अब घर ल हमर बाँटत हे! हमरे पतरी म खाके, आज गर ल हमर काटत हे !! चोर गरकट्टा…

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पितर के कउंवा

जेन घर मा दाई ददा ह, जियत म आंसू बोहाही ग । ओ घर के तोरई भात, हमला कइसे मिठाही ग ।। बाई के बुध म दाई ददा ल, कलप कलप के रोवावत हे । सरवन बनके उही मनखे, गंगा म हाड़ा बोहावत हे ।। ओ घर मा पितर मन काबर लहुट के आही ग….। जेन घर… जेन घर मा सम्मान सियान के, आसीस देथे बाप महतारी ह। ओ घर ह मंदीर बरोबर परसाद हे बरा सोंहारी ह ।। ऊही मनखे मन पितर-लोक ल पाही ग… राम कुमार साहू सिल्हाटी,…

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हमर छत्तीसगढ़

मैं वो छत्तीसगढ़ के रहईय्या अंव, जिंहा मया के गंगा बहिथे गा! तीरथ ले पावन जिंहा के माटी, भुईंया मा सरग ह रहिथे गा !! दुनिया के पेट भरईय्या जौन, अन्नपूरना दाई के कोरा ए ! सूख समृद्धि ह रहिथे जिंहा, वो हरियर धान कटोरा ए!! गांव गांव म जिंहा रखवारी, करथे सितला महतारी ह! निच्चट सिधवा भोला भाला, जिंहा के सब नर नारी ह!! गुरु घांसी,वल्लभाचार्य जेला बाल्मिकी ह कहिथे गा….. शबरी के बोइर खाए जिंहा, बन बन घुमे रघुराई ह! भोरमदेव अऊ राजिम लोचन, जिंहा बईठे हे बमलाई…

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मैं आदिवासी अंव

जबले बने हे रूखराई .चिरई चुरगुन, तबके मैं निवासी अंव ! हव मैं आदिवासी अंव, हव मैं आदिवासी अंव !! ***** सभ्यता के जनम देवइया, बोली भासा ल सिरजाए हंव ! जम्मो संस्कृति के मैं उपजइया, पर आज असभ्य कहाए हंव !! बघवा भालू मोर संगवारी, मैं रहइया जंगल झाड़ी के ! सबले जुन्ना हमर संस्कृति, मैं पुजइया बन पहाड़ी के !! मही तो नरवा झोरी डोंगर, भुईंया मही मटासी अंव…। हव मैं….. **** रहन सहन ल देख के मोर, पढ़े लिखे मन हांसत हे ! मिठलबरा मनखे दोगला मन,…

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