दुसर के दुख ला देख : सियान मन के सीख

सियान मन के सीख ला माने म ही भलाई हे। संगवारी हो तइहा के सियान मन कहय-बेटा ! दुसर के दुख ला देख रे! फेर संगवारी हो हमन उॅखर बात ला बने ढंग ले समझ नई पाएन। काबर उमन कहय के दुसर के दुख ला देख। संगवारी हो ये दुनिया में भांति-भांति के मनखे हे। कोनो मन दुसर के दुख ला नई देखे सकय त कोनो मन दुसर के सुख ला नई देखे सकय यहू हर अड़बड़ सोचे के बात हरय। तइहा के मनखे मन के मन में जम्मों जीव-जन्तु…

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आगे चुनई तिहार

तैं मोला वोट भर दे दे, मैं तोला सब देहुँ.. एक माँगबे, चार देहुँ, साल में बहत्तर हजार देहुँ, खाये बर चाउर देहु, पिये बर दारू देहुँ, चौबीस घंटा बिजली देहुँ, फूल माँगबे तितली देहुँ तैं मोला वोट भर दे दे, मैं तोला सब देहुँ, रेंगे बर सड़क देहुँ, जेला कहिबे,हड़क देहुँ, रहे बर घर- दुवारी देहुँ, नरवा,गरूवा,घुरुवा,बारी देहुँ, बोए बर बीजा देहुँ, बिन पढ़े नतीजा देहुँ, भाई अउ भतीजा देहुँ, सारा अउ जीजा देहुँ, तै मोला वोट भर दे दे, मैं तोला सब देहुँ…. धीरज भर धरे रहिबे, पांच…

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नवा चाउर के चीला अउ पताल के चटनी

सियान मन के सीख सियान मन के सीख ला माने म ही भलाई हे। तइहा के सियान मन कहय-बेटा ? नवा चाउर के चीला अउ पताल के चटनी अबड़ मिठाथे रे। फेर हमन नई मानन। संगवारी हो हमर छत्तीसगढ़ राज ला बने 18 बछर हो गे। ए 18 बछर में हमर छत्तीसगढ़ हर बहुत आगू बढ़िस। हमर छत्तीगढ़ में नवा-नवा उद्योग-धंधा खुल गे, नवा-नवा सड़क बनगे, बिजली के उत्पादन में हमन अगुवा गेन, हमर लोक कला अउ संस्कृति घलाव अगुवाइस फेर हमर छत्तीसगढ़ी पकवान हर खुल के हमर छत्तीसगढ़ के…

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सियान मन के सीख : ए जिनगी के का भरोसा

सियान मन के सीख ला माने म ही भलाई हे। तइहा के सियान मन कहय-बेटा! ए जिनगी के का भरोसा रे। फेर संगवारी हो हमन उॅखर बात ला बने ढंग ले समझ नई पाएन। लइकई उमर से ले के सियानी अवस्था तक मनखे के रूप रंग हर अतेक बदलथे जेखर कल्पना नई करे जा सकय। केवल रूप रंग भर बदलथे अइसे नई हे समय हर घलाव बदलत रहिथे अउ समय के अनुसार हमर बानी बिचार हर घलाव बदलत रहिथे। अइसे मा कहे जा सकथे के समय के घलाव कोनो भरोसा…

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दुसरो के बाढ़ ला देखना चाही : सियान मन के सीख

सियान मन के सीख ला माने मा ही भलाई हे।संगवारी हो तइहा के सियान मन कहय-बेटा! परेवा कस केवल अपनेच बाढ़ ला नई देखना चाही रे दुसरो के बाढ़ ला देख के खुश होना चाही। फेर हमन उॅखर बात ला बने ढंग ले समझ नई पाएन। ए दुनिया में अइसे बहुत कम मनखे हावय जउन मन ला दूसर के तरक्की बर्दाश्त होथे। देखे जाय तो हमन सहीं मनखे के अउ सहीं काम के जतका विरोध करथन ओतके विरोध कहूं गलत मनखे के अउ गलत काम के करन तब तो ये…

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सियान मन के सीख: कथा आवय ना कंथली

सियान मन के सीख ला माने म ही भलाई हे। संगवारी हो तइहा के सियान मन अपन घर अउ पारा परोस के जम्मों लइकन मन ला एक जघा सकेल लेवय अउ जहॉ संझा होवय तहॉ कथा कहानी के दौर शुरू हो जावत रहिस हावय फेर शुरूवात कतका सरल तरीका ले होवय यहू हर अड़बड़ सोचे के बात हरै। घर में रांधे-पसाय के बुता घर के बहुरिया मन करय अउ दार-भात के चुरत ले कथा-कहानी कहे के बुता घर के बूढ़ी दाई, बबा नई तो फुफू दाई के राहय। कहानी के…

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रमजान अउ पुरूषोत्तम के महीना : सियान मन के सीख

सियान मन के सीख ला माने म ही भलाई हे। संगवारी हो तइहा के सियान मन कहय-बेटा ! अधिक मास के हमर जिनगी म भारी महत्तम हावय रे ! फेर संगवारी हो हमन उॅखर बात ला बने ढंग ले समझ नई पाएन। हमन नानपन ले सुनत आवत हन-“हिन्दु मुस्लिम सिख इसाई, आपस में सब भाई-भाई।” हमर भारत देस के यही विशेषता हवय कि इंहा अनेकता में एकता के वास हावय। इंहा भांति-भांति के धर्म, रीति-रिवाज अउ संस्कृति के मेल हावय एखरे सेती हमर भारत जइसे देस पूरा विश्व मे अउ…

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नंदावत हे रूख-राई : सियान मन के सीख

सियान मन के सीख ला माने मा ही भलाई हे। संगवारी हो तइहा के सियान मन बने-बने स्वादिश्ट फल के बीजा ला जतन के धरे राहय। उॅखर पेटी या संदूक ला खोले ले रिकिम-रिकिम के बीजा मिल जावत रहिस हे। जब हमन छोटे-छोटे रहेन तब हमर दाई-बबा के संदूक ले कागज के पुड़िया में रखे कोहड़ा, रखिया, तुमा, छीताफल अउ कई परकार के बीजा मिल जावत रहिस हे। देख के बड़ अचरज होवय के दाई-बबा मन बीजा ला अतेक सम्हाल के काबर धरे हावय। पूछन तब बतावय। कहय-बेटी! जब पानी…

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किताब कोठी : सियान मन के सीख

भूमिका रश्मि रामेश्वर गुप्ता के “सियान मन के सीख” म हमर लोकज्ञान संघराए हे। ऋषि-मुनि के परंपरा वेद आए अउ ओखर पहिली अउ संगे-संग चलइया ग्यान के गोठ-बात सियान मन के सीख आए। हमर लोकसाहित्य अउ लोकसंस्कृति म ए गोठ समाए हे। कबीरदास जी लिखे हें- तुम कहियत हौ कागद लेखि, मैं कहियत हों ऑखिन देखि। “सियान मन के सीख” कागद लेखि ले जादा ऑखिन देखि बात आए। जिनगी के पोथी आए “सियान मन के सीख” कमिया-किसान मन के गीता आए “सियान मन के सीख”। रश्मि रामेश्वर गुप्ता घर-परिवार अउ समाज के सियानी…

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छत्तीसगढ़ी भाषा : समस्या अउ संभावना

छत्तीसगढ़ी भाषा के अपन अलग महत्तम हवय जइसे कि हर भाषा के होथे। छत्तीसगढ़ी भाषा में गोठियाय ले हमन ला अड़बड़ आनंद के अनुभव होथे काबर कि ये हर हमर माई भाखा आय। जब ले जनमें हावन ये भाखा हर तब ले हमर कान में घर कर ले हावय। अपन दाई-बबा के अउ महतारी-बाप के गोठ-बात ला हमन यही भाखा में सुने हावन। अपन अंतस के सुख अउ दुख ला हमन यही भाखा में बताथन तभे हमर जीव ला संतोष मिलथे फेर जइसे-जइसे हमन तरक्की करत जावत हावन हमन अपने…

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