कुँआ-तरिया मा जलदेवती माता के निवास होथे

सियान मन के सीख ला माने मा ही भलाई हे। तइहा के सियान मन कहय-बेटा! कुँआ-तरिया मा जलदेवती माता के निवास होथे रे। एमा कचरा.पथरा नइ डारय, अबड पाप होथे। फेर हमन नई मानेन। जम्मों कुँआ ला कचरा डार-डार के बराबर कर डारेन अउ तरिया ला तो बना के कई मंजिल के बिल्डिंग तान देन। अब कुँआ अउ तरिया के जघा ला हैंडपंप, मोटरपंप अउ स्वीमिंग पुल हा ले डारिस। सावन के महीना मा बादर ले अमृत बरसथे। ए जम्मो अमृत ला सियान मन कुँआ अउ तरिया मा भर के…

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रूख-राई ला काटे ले अड़बड़ पाप होथे

सियान मन के सीख ला माने मा ही भलाई हे। तइहा के सियान मन कहय-बेटा! रूख-राई ला काटे ले अबड पाप होथे रे। फेर हमन नई मानेन। बिन आँखी-कान के जम्मों रूख-राई ला काटेन। सियान मन कहय-बेटा! रूख-राई लगाए ले संतान बाढथे रे! सही तो आय। अब के संतान मन के खाए पिए बर साग-भाजी घलाव कम होवत हे। का सोंच के हमन तइहा के बात ला नई मानेन। अब मुड घर के पछतात हन। अभी भी कुछु नई बिगड़़े हे। हिन्दी मा कहावत हवै-जभी जागो तभी सवेरा। अभी भी…

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सियान मन के सीख : चोला माटी के हे राम

सियान मन के सीख ला माने मा ही भलाई हे। तइहा के सियान मन कहय-बेटा! चोला माटी के तो आय रे। फेर संगवारी हो हमन उॅखर बात ला बने ढंग ले समझ नइ पाएन। संगवारी हो जब.जब अक्ति के तिहार आथे अउ माटी के पुतरा.पुतरी मन बजार मा दिखथे तब सियान मन के गोठ.बात हर सुरता आए लगथे। का सिरतोन हमर चोला हर ए माटी के पुतरा.पुतरी कस हरै ए बात हर अडबड सोचे के आय। संगवारी हो अक्ति के दिन नान.नान लइकन मन माटी के पुतरा.पुतरी के कतका सुघ्घर…

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आगू दुख सहिले

सियान मन के सीख ला माने मा ही भलाई हे। तइहा के सियान मन कहय-बेटा! आगू दुख सहिले रे! पाछू सुख करबे। फेर संगवारी हो हमन उखर बात ला नइ मानन। जम्मो मनखे मन पहिली सुख पाए के मन रखथे। उमन के सोच अइसे रहिथे के बाद मा दुख ला तो भोगने हावय एखर सेती पहिली सुख पा लेथन। संगवारी हो सुख अउ दुख के सीधा संबंध हावै बने अउ बिगडे करम से। गीता मा भगवान हर कहे हावय के मैं हर ए दुनिया मा कोनो ला सुख अउ दुख…

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सियान मन के सीख- चुप बरोबर सुख नहीं

सियान मन के सीख ला माने म ही भलाई हे। संगवारी हो तइहा के सियान मन कहय-बेटा! चुप बरोबर सुख नही रे। फेर संगवारी हो हमन उॅखर बात ला बने ढंग ले समझ नइ पाएन। आज के जमाना म मनखे मन बोले बर अतका ललाइत रहिथे के उनला पते नइ चलय के उमन बोलत-बोलत का बोल डारिन। जउन ला देखौ तउन गरजे बर तियार रहिथे काबर के उनला ए लगथे के मय बोल-बोल के सारी दुनिया ला जीत लेहूॅ। मोरे चलती रही अउ मोर आगू म फेर कोनो के बोले…

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दूर के सोचथे महामानव

सियान मन के सीख ला माने मा ही भलाई हावय। तइहा के सियान मन कहय-बेटा! मनखे ला हमेसा दूर के सोचना चाही रे। फेर संगवारी हो हमन नइ मानन। हमन हर अतका स्वारथी हो गै हावन के हमन हमेसा आज के बारे अउ अभी के बारे सोचथन अउ कहिथन के मनखे ला जियत भर जिनगी के जतका मजा लूटना हे लूट लेना चाही मरे के बाद कोन जनी का होही? हमर गोठ हर जबर सोचे के हावय। संगवारी हो हमर गोठ अउ तइहा के सियान मन के गोठ जबर फरक…

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