Tag: Rijhe Yadav

जतन करव तरिया के

पानी जिनगी के सबले बड़े जरूरत आय।मनखे बर सांस के बाद सबले जरूरी पानी हरे।पानी अनमोल आय।हमर छत्तीसगढ़ म पानी ल सकेले खातिर तरिया,डबरी अउ बवली खनाय के चलन रिहिस।एकर अलावा नरवा,नदिया अउ सरार ले घलो मनखे के निस्तारी होवय। तइहा के मंडल मन ह अपन अउ अपन पुरखा के नाव अमर करे खातिर तरिया डबरी खनवाय।जेकर से गांव के मनखे ल रोजगार मिले के संगे संग अपन निस्तारी बर पानी घलो मिलय। छत्तीसगढ़ मे बेपार अउ निवास करइया बंजारा जाति के मनखे मन जघा-जघा अबड अकन तरिया खनवाय हवय।

एक समे म तरिया ह पूरा गांव के मनखे के जरूरत रहय।नान्हे लइका मन तंउरे बर उंहचे ले सीखय।पार के रुख राई म डंडा पचरंगा खेलय।तरिया पार के पीपर के पीकरी अउ बर के लाहा के झूलना कतको झन ल अभी ले सुरता होही।कातिक नहई के समे तो भीड हो जावय घठौंदा मन म।पीतर पाख म पुरखा ल रोज तरिया म ही तो पानी देथे।कतको झन सियनहा मन सुरूज देव ल कनिहा भर पानी म बूडके अरघ देके पुन्य कमावय। गांव के जम्मो  मनखे नहवई-खोरई से लेके कपड़ा-लत्ता ल उंहे कांचे धोवय।देवी देवता के विसर्जन घलो तरिया म होवे।मरनी-हरनी के कारज म नाहवन के काम अउ अंतिम संस्कार के बाद मरईया मनखे के जम्मो कारज तरिया पार म ही निपटाय जथे।

समे धीरे-धीरे बदलत हे।अब सरकारी योजना के अंतर्गत गांव-गांव मे नल के सुविधा होगे हे।मनखे सरी बुता ल घर भीतर करत हे तेकर सेती अब तरिया के बिनास होवत हे।तरिया म अब मनखे अब नहाय खातिर नी जावय।अब तरिया ह कचरा फेंके के जघा बन गेहे।जम्मो कचरा ल मनखे तरिया म लान के डार देथे।तरिया के पानी अब नहाय के लइक नी रहिगे हे।जब मरनी हरनी के कारज मे नाहवन के बेरा मे नहाय के मजबूरी रथे त मनखे लटपट नहाथे।नहाय के बाद मनखे दोष लगाथे कि तरिया के पानी ले खस्सू खजरी होथे।मनखे अपन करनी ल भूला जथे।तरिया ल घुरवा बना डरे हे तेला।

एक समे म तरिया ह कभू सुन्ना नी रहय।दिनभर गांववाले मन के रेम लगे रहय।कपडा-लत्ता से लेके गाय-गरू के धोवई ह तको तरिया म होवय तभो ले तरिया के पानी ह निरमल रहय।बाद मे सरकार ह निस्तारी तरिया ल मछरी पालन के कारोबार बर दे दिस।मनखे ओमा लालच के मारे आनी बानी के जिनिस डारे के चालू कर दिस जेकर से मछरी भोगावय अउ फयदा जादा मिले किके।उही मेर ले दुरगति चालू होगे तरिया मन के।कतको जघा तरिया ल पाट पाट के घर बनावत हे मनखे ह।

बिन जतन के कोनो भी जिनिस के दुरगति हो जथे।आज तरिया मन घलो उही हालत म हवय।ए तरिया मन छत्तीसगढ़ के धरोहर आय।एला जतने के जरूरत हे।जम्मो मनखे अउ सरकार ल एकर जतन बर उदीम करे के जरूरत हे।नीते एक समे अइसे अही जब लोटा भर पानी म घर भीतर ले पुरखा ल पानी देबर लागही।

रीझे ‘देवनाथ’
टेंगनाबासा (छुरा)

कविता : वा रे मनखे

वा रे मनखे
रूख रई नदिया नरवा
सबो ल खा डरे
रूपिया- पैसा
धन-दोगानी, चांदी-सोना
सबो ल पा डरे
जीव-जंतु, कीरा-मकोरा
सब के हक ल मारत हस
आंखी नटेरे घेरी बेरी
ऊपर कोती ल ताकत हस
पानी नी गीरत हे
त तोला जियानत हे
फेर ए दुनिया के सबो परानी
ऊपरवाला के अमानत हे
तोर बिसवास म
पूरा पिरथी ल तोला दे दिस
अउ तें बनगे कैराहा-कपटी, लालची
अब भुगत
अपन करनी के सजा
ऊपरवाला ल लेवन दे मजा!!

रीझे यादव
टेंगनाबासा (छुरा)

सुरता : प्रेमचंद अउ गांव

मुंशी प्रेमचंद हिंदी साहित के अनमोल रतन आय। उंकर लिखे कहानी अउ उपन्यास आज घलो बड चाव से पढ़े जाथे। उंकर कहानी ल पढत रबे त अइसे लागथे जानो मानो सनिमा देखत हैं। उंकर कहानी के पात्र के हर भाव ल पाठक ह सोयम महसूस करथे। गांव अउ किसान के जइसन चित्रण उंकर कहानी म पढ़े बर मिलथे वइसन दूसर कहानीकार मन के कहानी म देखब म बहुत कम अथे। गांव ल संउहत गांव बरोबर उही मन कागज म उतारे हे।

नानुक रहंव त बड संउक लागे महूं अलगू चौधरी अउ जुम्मन शेख वाला बइठका म जतेंव किके। अतेक सिरतोन लगे उंकर कहानी मन ह। दू चार ठन कहानी तो अंतस म समा गे हवय।

पंच-परमेश्वर कहानी म जुम्मन शेख अउ अलगू के कहानी ह कतेक सुग्घर हे। गांव के मनखे के छोटे-मोटे समस्या अउ झगरा ल आज घलो उही ढंग ले चार सियनहा मन मिलके समाधान करथें। हिंदू-मुस्लिम मितानी ह वइसनेच चलत हे। हमर गांव म घलो वइसने महापरसाद बधे हवय एक झन ह! नियाव के रसदा म नता गोता ल बीच म नी लाना चाही ए सिक्छा मिलथे पंच-परमेश्वर कहानी ले।

ईदगाह कहानी में गांव के नानुक लइका हामिद के जिम्मेदार सियनहा बरोबर बिचार के बड सुग्घर वर्णन करे हे प्रेमचंद ह। नानुक हामिद अपन खेल-खिलौना अउ खई-खजाना खाय के बिचार ल तियाग के अपन डोकरी दाई के जरूरत ल सुरता राखथे। उंकर हांथ रोटी रांधत मत जरय किके चिमटा लानथे।कतेक बड़े सिक्छा हामिद के माध्यम ले कहानीकार ह दे हवय।

‘परीक्षा’कहानी मे हाकी के खेल के अतिक बढ़िया वर्णन करे हे जानो-मानो लेखक घलो हाकी के खिलाड़ी हरय। कहानी ल पढबे त अइसे लागथे कि महूं वो खेल ल देखे बर बइठे हंव। फेर ए कहानी म मनखे ल परखे के जेन गुन बताय हवय वो ह अद्भुत हे। सुजानसिंह ऊपरी गुन नहीं बलुक अंतस के गुन जेमा आन बर दया-मया अउ सहयोग के भावना रथे ओला महातम देथे।

‘बूढी काकी’ कहानी म एकझन डोकरी दाई अउ ओकर नतनीन के मया के बड सुग्घर वर्णन करे हे कहानीकार ह। बुढापा के तकलीफ अउ मुंह मे सुवाद पाय के लालच कइसे होथे ए कहानी म देखे बर मिलथे। उम्मर बाढथे ताहन बेटा बहू के बेवहार सियनहा मन के संग कइसे बदल जथे।ए कहानी म बड मार्मिक विवरण हवय। सियान मन ल मान सम्मान देय के सिक्छा ए कहानी ले मिलथे।

‘कफन’ कहानी मे दूझन कोढिया बाप-बेटा के जेन मनोवैज्ञानिक ढंग ले चित्रण करे हे उंकर बर लेखक ल परनाम हवय। मनखे के मनोभाव कइसे बदलथे अउ ओहा अपन आप ल दोषमुक्त करे बर कैसे मनगढ़ंत बात बनाथे ए कहानी म पढ़े बर मिलथे। दूनों कोढिया के सेती एकझन छेवरिया ल मरे के बाद कफन तको नी मिल सकय।

प्रेमचंद ह किसान के दुर्दसा ल देखके बड बियाकुल रहय। ओहा अपन कहानी के माध्यम ले घेरी बेरी किसान के हालत ल समाज के आगू म रखे के परयास करय। गांव अउ गांव के किसनहा के हालत के सबले जोरदार वर्णन पढ़े खातिर मिलथे ‘पूस की रात’ कहानी मे। हलकू अउ झबरा नांव के कुकुर ह कभु नी भुलावय। कतिक मिहनत ले किसान ह अन्न उपजाथे अउ ओला सेठ साहूकार मन कइसे हडप लेवय तेकर वर्णन बड सुग्घर ढंग ले करे हवय मुंशी जी ह।हाडा कंपात जाड मे हलकू के हलाकानी ल पढत रबे त खुद के देंहे घलो घुरघुराय लागथे।

कुल मिलाके जेन मनखे ह भारत देश के गांव ल नी देखे होही। गांव के रहन-सहन अउ रीति रिवाज के बारे म नी जानत होही ओहा मुंशीजी के कहानी ल पढ़के जान डरही। गांव के किसान के हालत अभी घलो खराब हवय। देश म बाढत किसान आत्महत्या के मामला ह एकर सबूत आय। गांव के जेन चित्रण मुंशी प्रेमचंद ह अपन कहानी म करे हवय अब ओकर रुप म बड बदलाव आगे हे। गांव के मनखे ह घलो सहर के रंग म रंगे हे। गांव-गांव टावर खडे़ होगे हे। घर ले कोठा नंदागे हे। गाय,गरवा,नदिया-नरवा के बिनास होवत हे। मनखे ह अपन लालच के सेती जम्मो जीव-जंतु के हक ल मारत हे।

भगवान करे मुंशीजी के कहानी वाला मयारूक गांव फेर लहुटे फेर ओमा गरीबी अउ दुख झिन रहय।

रीझे ‘देवनाथ’
टेंगनाबासा(छुरा)
8889135003

रफी के छत्तीसगढ़ी गीत

रफी साहब….. हिंदी सनिमा जगत के बहुत बड़े नाम आय। जिंकर गुरतुर अउ मीठ अवाज के जादू के मोहनी म आज घलो जम्मो संगीत परेमी मनखे झूमरत रथे। उंकर अवाज के चरचा के बिना हिंदी सनिमा के गीत-संगीत के गोठ ह अधूरहा लागथे।
जम्मो छत्तीसगढ़िया मन भागमानी हवय के अतिक बड़े कलाकार ह हमर भाखा के गीत ल घलो अपन अवाज दे हवय। रफी साहब के अवाज म छत्तीसगढ़ी गीत सुनना अपन आप म बड गौरव के बात आय।

बछर 1965 के आसपास म जब छत्तीसगढ़ी सनिमा जगत के दादा साहेब मनु नायक जी ह पहिली छत्तीसगढ़ी फिलीम बनाइन त ओमे ओहा हिंदी सनिमा जगत के बड़े-बड़े नामही कलाकार मन से गीत गवाय रिहिन। “कहि देबे संदेश” नाव के ए फिलीम म रफी साहब के अवाज म “तोर पैरी के झनर-झनर” अउ “झमकत नदिया बहिनी लागे” ह जीव ल जुडा देथे। खास करके “तोर पैरी के झनर-झनर” गीत म गीत के पहिली के अलाप अउ गीत म उंकर अवाज के पाछू म दंउडत बांसरी के स्वर।
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ये फिलीम मे डॉ हनुमंत नायडू ‘राजदीप’ के गीत अउ मलय चक्रवर्ती जी के सुग्घर संगीत रिहिसे। ए फिलीम के बाद बछर 1971 मे “घर-द्वार” नाव ले दूसर छत्तीसगढ़ी फिलीम अइस। यहू फिलीम के गाना म रफी साहब ह अपन अवाज के मंदरस घोरे हे। छत्तीसगढ़ के नामही साहित्यकार हरि ठाकुर के लिखे गीत ह जमाल सेन के संगीत म बनेच धूम मचाय रिहिस। ए फिलीम म रफी साहब के अवाज म “गोंदा फूलगे मोर राजा” गाना ह बड सुग्घर लागथे जेला उन बड़ मस्ती के साथ गाए हवय।एकर अलावा एमा ”आज अधरतिहा” अउ ”सुन सुन मोर मया पीरा के संगवारी रे” ह घातेच मया पाइस। अतेक साल बीते के बाद घलो सुन सुन मोर मया पीरा के संगवारी गीत ह छत्तीसगढ़ के तीन ठ नामही छत्तीसगढ़ी लोककला मंच म अपन जादू बरकरार रखे हवय। ए गीत ल जब गुनगुनाबे तब गोड़ ह थिरके लागथे।

जेन मिहनत अउ धन लगाके छत्तीसगढ़ी फिलीम ल ओ समे के कलासाधक मन बनाय रिहिन ओ मुताबिक फिलीम ह बेपार नी कर पाइस तेकर सेती छत्तीसगढ़ी सनिमा के सफर ह उही मेर थमगे। नइते अउ कतको अकन गीत आज छत्तीसगढ़ के धरोहर रतिस।रफी साहब ल उंकर पुण्यतिथि के बेरा मे नमन हवय…

रीझे ‘देवनाथ’
टेंगनाबासा (छुरा)

सुरता

गिनती, पहाड़ा, सियाही, दवात
पट्टी, पेंसल, घंटी के अवाज
स्कूल के पराथना, तांत के झोला
दलिया, बोरिंग सुरता हे मोला।
बारहखड़ी, घुटना अउ रुल के मार
मोगली के अगोरावाला एतवार
चउंक के बजरंग, तरियापार के भोला
भौंरा, गिल्ली-डंडा सुरता हे मोला।
खोखो, कबड्डी अउ मछली आस
भासा, गनित, आसपास के तलाश
एक एकम एक, चार चउंके सोला
चिरहा टाटपट्टी सुरता हे मोला।
गाय के रचना, चिखला मे सटकना
बियाम के ओखी एती ओती मटकना
अलगू, जुम्मन अउ कांच के गोला
कंडील के अंजोर सुरता हे मोला।
चोर-पुलिस,आदा-पादा
खी-मी, कुकुरचब्बा आधा
स्कूल के देरौठी बलाथे तोला
दाई-ददा के मया सुरता हे मोला।
रीझे यादव
टेंगनाबासा (छुरा)

कुछ तो बनव

आज अंधियारी म बितगे भले,
त अवइया उज्जर कल बनव।
सांगर मोंगर देहें पांव हे,
त कोनो निरबल के बल बनव।
पियासे बर तरिया नी बनव,
त कम से कम नानुक नल बनव।
रूख बने बर छाती नीहे,
त गुरतुर अउ मीठ फल बनव।
अंगरा बरोबर दहकत हे जम्मो,
त ओला शांत करे बर जल बनव।
कपट के केरवस मे रंगे रहे जिनगानी,
त अब तो थोरिक निरमल बनव।
रीझे यादव
टेंगनाबासा(छुरा)

माटी के काया

माटी के काया ल आखिर माटी म मिल जाना हे।
जिनगी के का भरोसा,कब सांस डोरी टूट जाना हे।
सांस चलत ले तोर मोर सब,जम्मो रिश्ता नाता हे।
यम के दुवारी म जीव ल अकेला चलते जाना हे।
धन दोगानी इंहे रही जही,मन ल बस भरमाना हे।
चार हांथ के कंचन काया ल आगी मे बर जाना हे।
समे राहत चेतव-समझव,फेर पाछू पछताना हे।
मोह-माया के छोड़के बंधना,हंसा ल उड जाना हे।
नाव अमर करले जग मे,तन ल नाश हो जाना हे।
सुग्घर करम कमाले बइहा,फेर हरि घर जाना हे।
रीझे यादव
टेंगनाबासा(छुरा)

ददा

बर कस रूख होथे ददा
जेकर जुड छांव म रथे परवार
बइद बरोबर जतनथे
नइ संचरन दे कोनो अजार।
चिरई-चुरगुन कस दाना खोजत
को जनी कतका भटकथे
माथ ले पसीना चुहथे त
परवार के मुंहु म कौंरा अमरथे।
परवार के जतन करे बर
अपन जम्मो सुख ल तियागथे।
खुद के गोड भले भोंभरा म लेसावय
फेर अपन लइका बर पनही लानथे।
ददा के सम्मान बर एक दिन का
पूरा बच्छर घलो कमती हे।
संउहत देवता के जीते जी
सम्मान नी करन ये हमर गलती हे।
भरम होथे मनखे ल अपन बडे होय के
अपन गियान अउ संपत्ति के।
फेर ददा के आगू म खडे होबे त पता चलथे
अपन सही कद अउ नान्हे मति के।
ददा ह सगरो अगास हरे
ओकर महानता के ओर न छोर हे!
ददा के मया ककरो बर नोहर मत होवय
मोर बिनती कर जोर हे!!!

रीझे यादव
टेंगनाबासा

कहानी – सुरता

इसकूल ले आके रतन गुरजी ह लकर-धकर अपन जूता मोजा ला उतारिस अउ परछी म माढे कुरसी म आंखी ल मूंदके धम्म ले बइठगे। अउ टेबुल म माढे रेडियो ल चालू कर दिस। आज इसकूल के बुता-काम ह दिमाग के संगे संग ओकर तन ल घलो थको डारे रिहिस। आंखी ल मुंदे मुंदे ओहा कुछु गुनत रिहिस वतकी बेरा रेडियो म एक ठ ददरिया के धुन चलत रहय-धनी खोल बांसरी
तोला कुछु नइ तो मांगो रे!
मया के बोली का हो राजा! खोल बांसरी
पानी रे पीये पीयत भर के
कैसे छोडे दोसदारी रे
जियत भर के हो राजा! खोल बांसरी
अउ आंखी ल मुंदे मुंदे रतन बीते बेरा के सुरता म बिलमगे।
बीस बच्छर पहिली के तो बात आय जब रतन ह बारमी किलास पढे के बाद घर आइस। ननपन ले रतन ह अपन नानी-नाना के घर म रहिके पढे बर चलदे रिहिसे। फेर मनखे के परिस्थिति कतका बेर बदल जही कोन जानथे। रतन के बाबूजी के तबियत अचानक बिगडगे। रतन के बडे भैया ह अपन नौकरी के सेती बाहिर म राहय। चार भाई बहिनी के परवार म रतन ह दूसरा नंबर म रहय। बडे भैया के घर ले बाहिर रेहे के सेती अब पूरा परवार ल संभाले के जिम्मेदारी उदुप ले रतन के मुडी ऊपर खपलागे। फेर ओहा हिम्मत नी हारिस। दस एकड के खेती के भार ल अपन खांध म बोही डरिस। दाई-ददा के जतन अउ दूझन छोटे भाई बहिनी के पढई-लिखई के जिम्मेदारी ल ओहा अपन धरम बना डरिस। बिहाने ले नूनचटनी अउ बासी ल धरके जाये तो संझौती बेरा म लहुटे।



सब बुता ह तो बने होवत रिहिसे फेर रांधे खाय के बुता ह बनत नी राहय। दाई ल बाढत उम्मर के सेती रांधे गढे म परसानी होवय अउ ओकर छोटे बहिनी राधा ह रांधे गढे के बुता करय त ओकर पढई-लिखई के नकसानी होय।
फेर बिधाता के लीला घलो अपरंपार हे। काकरो बनौकी बनाना रथे त कतको ओखी रच देथे ओहा। जेन समे म रतन के परवार ह हलाकानी म परे रहय उही समे म रतन के घर तीर म एकझन गुरजी ह किराया म रेहे बर आगे। गुरजी के एकझन नोनी अउ एकझन बाबू राहय। नोनी ह रतन के छोटे बहिनी राधा के जहुंरिया नीते एको बछर के बडे रिहिस होही अउ बाबू ह रतन के छोटे भाई संग एके किलास म पढय। नोनी के नाव सरला रहय। दसमी पढे के बाद ओहा पढाई ल छोड दे रिहिसे। जइसे नाव वइसने बेवहार घलो राहय नोनी के। घर म अपन दाई संग घर के बुता काम मे मदद करय अउ घरे म रहय। नवा-नवा जघा म आय रहय त ककरो से गोठ-बात घलो नी होवय।
धीरलगहा दू चार दिन के बाद सरला अउ रतन के छोटे बहिनी राधा के बीच बने चिन-पहिचान बाढगे। अब सरला ह रतन के घर म घलो आय-जाय लागिस। बेरा-बेरा म सरला ह रतन के घर म कुछु मांगे बर नीते अमराय बर आवय त ओकर दाई के बुता काम म घलो मदद करदय।
थोरिक समे के पाछू धीरे धीरे ओला रतन के बारे म जाने बर मिलिस। फेर कभू ओकर संग भेंट नी होय रिहिसे। काबर कि रतन ह जादा घर म रहिबे नी करय। खेत-खार म ओकर दिन खप जाय। संझौती बेरा म लहुटय।




एक दिन के बात आय। रतन ह संझौती घर आइस त अपन दाई ल चाय बनाय बर आरो देइस। त ओकर छोटे बहिनी राधा ह बताइस कि दाई ह सुकारो मामी घर कुछु बुता म गेहे। ओहा खुदे चाय बना के लानत हंव कहिके चलदिस। ओतकी बेरा सरला घलो आगे त दूनोंझन रंधनी कुरिया म चलदिन। एती रतन ह चाय ल अगोरत रहय। सुधा ह चाय लानके रतन ल दिस। चाय ल पीये के बाद रतन किथे-‘आज तो चाय पीके हिरदे जुडागे नोनी!बढिय़ा चाय बनाय हस!’। त ओकर छोटे बहिनी ह हांसत बताथे कि चाय ल तो सरला ह बनाय रिहिसे। रतन ह ओकर ले कलेचुप उठ के चल देथे।
एती सरला ह नोनी ल पूछथे कि इही ह तोर भैया हरे का ? त राधा ह हव काहत मुडी ल हला देथे। ताहने ओहा अपन पढई म बिलम जथे अउ सरला ह अपन घर चलदेथे। बेरा बुलकत जथे। रतन के जांगरटोर मिहनत ल देख के सरला ल बड दुख लागय। फेर ओहा काकरो से कुछ नी बोलय। फेर कोसीस जरूर करे कि कुछु न कुछु ओखी से ओहा रतन के मदद कर सकय।
अइसने करत छे महिना बीत जथे। एकदिन अचानक रतन के बाबूजी खतम हो जथे। रतन ह अपन बाबूजी ल सुरता करत कलेचुप बैठे रहय। ओकर भाई -भउजी मन दसगात्र के कारज ल निपटा के अपन डिप्टी म फेर लहुटगे रहय। उही समे म सरला ह आथे। तीर-तार म कनो नी दिखय त रतन ल किथे-तें काबर संसो करत हस राधा के भैया!ऊपरवाला के मरजी के आगू ककरो नी चलय। फेर खुद ल घलो तो संभाले बर लागही। दाई,राधा अउ अपन छोटे भाई ल घलो संभाले बर लागही का!अइसन उदास मत रहव। अतका कहिके अपन आंसू ल पोंछत चलदिस सरला ह।




एती पहिली घांव आने मनखे के मुंहु ले अपन बर अतेक मया अउ फिकर के गोठ सुनके रतन ह सरला के मया म बंधागे। ओहा फेर अपन काम बुता म रमगे। समे के धार नदिया बरोबर बोहावत गीस। ए बीच म मनेमन रतन अउ सरला ह एकदूसर ल अपन मान डरे रहय। बिना कोनो ढोंगाही के कलेचुप दुनों ह अपन मया के बंधना ल निभावत रहय। सालभर के बीते ले राधा बर बढिय़ा सगा आइस ताहने रतन ह ओकर बिहाव करदिस। अउ छोटे भाई ल पढाय खातिर साहर के हास्टल म भरती कराके बडेजनिक स्कूल म नाव लिखादिस।
एती जब सरला के संगी राधा के बिहाव होगे ताहने सरला के दाई ददा मन घलो सरला के बिहाव खातिर दौडभाग म लगगे। बिहाव खातिर लडकी देखे बर सगा उतरे के चालू होगे। एला देखके सरला ह रतन ले अलग रेहे के संसो म बियाकुल होगे। एक दिन मौका पाके ओहा रतन ल किथे-राधा के भैया!अब मे तोर बिना नइ जी संकव। तैं मोला अपन बनाले नीते मोला जाहर-महुरा लानके देदे। अतका काहत ओहा फफक के रो डरिस। रतन ह ओकर आंसू ल पोंछत किथे-तें काबर रोवत हस बही!मे आजे दाई अउ भैया से एकर संबंध म बात करहूं। रातकुन रतन ह अपन भैया कना फोन म अपन हिरदे के बात ल बताथे त ओहा गुस्सा हो जथे। एती दाई ल बताथे त वहू ह नराज हो जथे। रतन जान डरिस कि ओला परवार के सहारा नइ मिलय।



आखिर म रतन ह अपन घर परवार अउ दुनियादारी के परवाह नी करके सरला संग कोर्ट मेरिज कर लेथे। उंकर बिहाव के गोठ ह जंगल म ढिलाय दांवा बरोबर गांव भर म बगर जथे। रतन-सरला के बिहाव के गोठ ल सुनके सरला के दाई-ददा मन बड नराज होथे। जब बिहाव करके असीस लेयबर दुनों परानी सरला के घर म आइन त ओमन सरला अउ रतन ल सरापथे-बखानथे। सरला के दाई अपन बेटी ल सरापे बर धर लेथे-हमर आत्मा ल दुखाय हस रे दुखाही!हमर नाक ल कटवा दे हस। तोला भरे तरिया म पानी झन मिलय। तोला रोग-राई खा दय। जा! तोला अजार आ जाय। कभु तुमन ल सुख झन मिलय।
उंहा ले आके रतन अपन घर म जाथे त रतन के परवार वाले मन घलो ओला घर ले निकाल देथे। उंकर बिहाव के सेती गांव -समाज म बइठका सकलागे। आने-आने जात-समाज के बिहाव के बात ह गांव अउ समाज के सम्मान के बिसय बनगे। बइठका मे सियान मन दूनोंझन ल फेर अलग अलग रहव किके आदेस दे दिन। दुनों झन नी मानिन त ओमन ल गांव ले निकाल दिन।
जब दुनों के घर-परवार ले ओमन ल कोनो नइ अपनाइन त अपने गांव के परोसी गांव म एक ठ नानुक कुरिया बनाके दूनोंझन बनीभूति करके अपन जिनगी के गाडी चलाय लागिन। डेढ साल म दूनोंझन एक सुंदर अक नोनी के दाई-ददा बनगे। दुनों झन के कोरा म फूल कस नोनी भारती ह खेलय लागिस। उही समे पंचायत म गुरजी के भरती चालू होगे। सरला के कहई म रतन घलो फारम भरदिस। ओकर नौकरी लगगे। अब दुनों के जिनगी ह बने अराम से कटत रिहिसे। दूनोंझन घरदुवार ल बढिया बनाडरिन। घर म सुख सुविधा के जम्मो जिनिस आगे। समे के साथ समाज अउ परवार के नजरिया घलो बदलिस। रतन के परवार वालामन दूनोंझन ल समाज मे दांडबोडी देके फेर समाज म मिलालिन।




अब रतन अउ सरला ल लागिस की उंकर जिनगानी म फेर सुख के दिन आगे। फेर सुख के दिन ह सिरिफ लटपट चार-पांच बच्छर पुरोती होय रिहिसे तभे सरला ल बिमारी धरलिस। आनी-बानी के जांच करे के बाद पता चलिस सरला ल केंसर के बिमारी ह धरले हे। रतन के जिनगी म कुलुप अंधियारी हमागे। सरला ल बचाय बर ए अस्पताल ले ओ अस्पताल। ए बैद ले वो बैद ल देखाय के दौड सुरू होगे। डाक्टर मन ह बतादिन कि एकर जिनगी ह सिरिफ छे महिना बांचे हे। अतका गोठ ल सुनके रतन के आंखी के आगू म अंधियारी छागे। ओहा चक्कर खाके गिरगे। फेर बिधाता के लिखे लेख ल स्वीकार करके ओहा ओला अपन घर म लानके ओकर जम्मो इच्छा ल पूरा करे के उदिम म लगगे। सरला के हर इच्छा ल पूरा करना अब ओहर अपन जिनगी के धरम बना डरिस। नौकरी ले छे महिना बर छुट्टी लेके सरला के जतन म लगे रहय। कभू कभू ओला डाक्टर के बताय बात म बिसवास नी होवय जब सरला ह मुस्कावय। नानुक नोनी ल पोटार के खेलावय। एती सरला ल अपन जिंनगी के दिन कम होय के अंताजा होगे रहय। सरला के आंखी ले रातदिन आंसू झरय नानुक भारती अउ ओकर पापा ल देखके। ओला अपन मौत के दुख कम अउ अपन परवार से दूरिहाय के दुख जादा रहय। ओला रोज बुखार नीते कोनो न कोनो परसानी होते रहय। फेर एकदिन ओकर बुखार ऐसे बढिस कि कम होय के नांव नी लिस। तुरते ओला रयपुर के बडका अस्पताल म भरती कराइन। डाक्टर मन ओला इमरजेंसी वार्ड म भरती कर दिन। थोरिक समे के बाद डाक्टर मन चुपचाप लहुटिन त सरला के लास ह बाहिर आइस। रतन के ऊपर जइसे गाज गिरगे वोहा भडाक ले गिरगे। सरला के दाई ददा मन ल खबर मिलगे रहय। त वहूमन आगे रहय। सरला के दाई कलप-कलप के रोवत काहत रहय-तोला मोर सरापा लगगे बेटी!मोर जीभ ह कटा जतिस। काबर मे ह अपन बेटी के सुख म आगी लगा डरेंव।
सनिमा बरोबर चलत बीते समे के एक-एक सुरता ह ओला बियाकुल करत रहय। ओकर आंखी ले आंसू निथरे लगिस। तभे भारती आगे।
“पापा! पानी अउ चाय पी लव!” -भारती के आरो ल पाके रतन ह झकनकाके उठिस। अउ अपन आंखी के आंसू ल पोंछिस।
“का बात हे पापा! मम्मी के सुरता आगे का ? “भारती के गोठ ल सुनके रतन ओला अपन छाती म पोटार लिस।

रीझे यादव
टेंगनाबासा (छुरा) 493996


लघुकथा – आटोवाला

बड़ दिन बाद अपन पेंशन मामला के सेती मोहनलाल बबा के रयपुर आना होइस। घड़ी चौक म बस ले उतरिस ताहने अपन आफिस जाय बर आटो के अगोरा म खड़े होगे। थोरकुन बाद एक ठ आटो ओकर कना आके रूकिस अउ ओला पूछिस -कहाँ जाओगे दादा!!
डोकरा अपन जमाना के नौकरिहा रहय त वहू हिंदी झाडिस -तेलीबांधा मे फलाना आफिस जाना है। कितना लोगे?
आटोवाला बताइस -150रु. लगेगा।
बबा के दिमाग ओकर भाव ल सुनके भन्नागे। वोहा तुरते वोला पूछिस -कहां रहते हो रयपुर मे।
आटोवाला ओला अपन पता ठिकाना बताइस ताहने ओला डोकरा कथे -जब तोर जनम नी होय रिहिस होही न बेटा! तबके मे ह रयपुर के कोंटा-कोंटा ल सइकिल चलावत नाप डरे हंव। मोर जिनगी के आधा समे ह इंहे नौकरी बजावत गुजरे हे। अब जांगर ह थक गेहे त तुंहर आटो के सहारा लेवत हंव।
तोर भाव महंगा हे बेटा। जा! मे ह कोनो दूसर संग चल देहूं। फेर मोर एक ठ बात ल सुरता रखबे बेटा! ए रयपुर साहर म गांव ले जतेक मनखे अथे तुंहर भरोसा म अथे। इंहा अवइया कतको मनखे के इंहा कोनो चिन-पहिचान नी रहय। ओमन अतका बस जानथे कि रयपुर के आटोवाला मन पैसा देबे ताहन मन मुताबिक ठीहा मे पहुंचा देथे। तोर परवार ह जिकर मन से चलथे उंकर संग बइमानी मत कर! तोर जतका वाजिब बनथे वतकी लेयकर। मोर सलाह ल रिस झन करबे बेटा! ले जा तोला देरी होवत होही।
बबा के गोठ ल सुनके आटोवाला चुप होगे। वोहा तुरते बबा के बेग ल आटो म डारिस अउ किहिस -ले बबा!50रू. देबे।
ताहने दुनों आटो म बइठके चल दिन।

रीझे यादव
टेंगनाबासा (छुरा)