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राजागुरु बालकदास : छत्तीसगढ़ गवाही हे

भिंसरहा के बात आय चिरइ चुरगुन मन चोंहचीव चोंहचीव करे लगे रहिन…अँजोरी ह जउनी हाथ म मोखारी अउ लोटा ल धरे डेरी हाथ म चूँदी ल छुवत खजुवावत पउठे पउठा रेंगत जात हे धसर धसर।जाते जात ठोठक गे खड़ा हो के अंदाजथे त देखथे आघू डहर ले एक हाथ म डोल्ची अउ एक हाँथ म बोहे घघरा ल थाम्हे दू परानी मुहाचाही गोठियावत आवत रहँय…दसे हाथ बाँचे रहिस होही सतवंतिन दीदी के मुँह माथा झक गय,जोहरीन दीदी के का पूछबे मुँह ला मटका मटका के गोठियई राहय कउ घघरा म भरे झिरिया के कंच फरी पानी छलक-छलक के कुँदाय असन डाढ़ी ले चुचवावत रहय रितउती ओरवाती असन।काहत राहय…भारी सुग्घर राजा बरोबर लइका अँवतरे हे सफुरा घर…छकछक ले गोरियानरिया लाम लाम हाथ गोड़ सूपाभर दई भोकण्ड हे लइका ह काहेक सुघर आँखी करिया करिया घुघरालू चूँदी अँइठे अँइठे बाँह नाक ह तो ऊपरे म माढ़े हे…मुँह के फबित ह मन ल मोहत हे।

पुरखा के आशीर्वाद नइते साहेब के भेजे काँही संदेश होही काहत रहिन सियान दाई मन लइका के छाती म परे चिन्हा ला… जोंकनँदिया के कंकरा म देखे रहेन बघवा के पाँव के चिन्हा ल तइसने डिट्टो दिखत हे लइका के छाती म छपे छप्पा ह…।

बने कब्खन देख के आ गेयेस बहिनी जोहरीन..ए दे महूँ ह पानी ल उतारतेसाट जाहूँ अउ आँखी भर देख के आहूँ अपन घासी के दुलरुवा ला…..।
पाँव परत हँव दीदी कहिथे अँजोरी ह सतवंतिन ला…जीयत रहा के आशीर्वाद अउ खबर ल पा के अँजोरी के अंतस ह गदगदा गय..मने मन मा पुरुषपिता ल सुरता करत मुड़ नवा के भज डरिस अउ गोठिया डरिस तोर महिमा अपरंपार हे पुरुषपिता दुखिया घासी के दुख ला हर लेये तैं..बेटा के बिछोह म कल्पत बपुरी सफुरा के गोदी म बेटा दे देये।

पुरुष तोर महिमा अपार…
गुरू हो तोर महिमा अपार…
बबा हो तोर महिमा अपार…गुनगुनावत गुनगुनावत झोरकी डहर उतर गय अँजोरी ह।

1795 के बछर भादो के अँधियारी पाख आठे के दिन आय सुरुज नारायण आधा घड़ी ठहर गे राहय घासी के अँगना म लइका ल देखे बर..लइका ल टकटक ले निहारिस तेजस्वी होय के आशीर्वाद देइस अऊ घासी संग सतनाम जोहार करत चल दिहिस अपन बूता म।तिहार के दिन परे रहय लइका ल देखे बर गाँव के नर-नारी मन के रेम लग गे घासी के अँगना म..पता नइ चलिस बेरा जुड़ाय लगिस फुरहुर फुरहुर पुरवई तन ल छुवे लगिस,हिरदे म पंथी के धुन उठे लगिस पाँव उसले लगिस हाथ के थपोरी ह लय ताल बनाय लगिस अउ खूंटी म ओरमे माँदर पता नइ चलिस कतका बेर गर म ओरम गे..कण्ठ ले पंथी गीत फूटे लग गे तन मन मा जोश के संचार होगे मँदरहा के चारो-मुड़ा गोल घेरा बन गे पंथी पहुँचे लगिस…अबाध अगास डहर गाँव शहर अउ ओ पुरुष के दरबार डहर…।

सन्ना ना नन्ना..ना नन्ना हो ललना
सन्ना ना नन्ना..ना नन्ना हो ललना

ए घासी के अँगना…ए घासी के अँगना
भेंट होगे संत गुरू राजा संग ना……..।

माँदर के ताल उही दिन अगास म ढिंढोरा पीट के बता दे रहिस गुरु घासीदास के ये ललना आघू चलके अपन पिता के पद चिन्हा म चलही जनमानस म शौर्य अउ सभिमान के भाव जगाही देश राज अउ समाज ल रीति नीति अनुशासन के गुरुमंत्र दीही, एकता के सूत्र म पिरोवत दया मया अउ महिनत के पाठ पढ़ाही,सतनाम पंथ(धर्म)के सादा धजा ला दुनिया दुनिया म फहराही।चारो दिशा म मनखे मनखे एक के संदेश गूँजे लगही…गुरु घासीदास बाबा अउ सतनाम के जय जयकार होय लगही तब समय रूपी शासक शूरवीर बालक के लोकप्रियता नेतृत्व क्षमता अउ सियानी करे के गुण ल देखही अउ देख के ढाल तलवार हाथी अउ लिखित म राजा के उपाधी भेंट करही।सच होगे…. राजागुरु बालक दास साहेब सादा के राजपगड़ी पहिरे हाथ म ढाल तलवार धरे हाथी म असवार हो के आजू बाजू अंगरक्षक महाबली सरहा जोधाई अउ लाव लश्कर के साथ निकले हे भंडारपुरी के महल के सींग दरवाजा ले।

ठँउका सुरता देवाये सुखदेव आज के दिन नेव परगे मानो लोकतंत्र के…छत्तीसगढ़ गवाही हे….।

सुखदेव सिंह अहिलेश्वर
गोरखपुर कबीरधाम छत्तीसगढ़

Rajaguru Balakdas

का जनी कब तक रही पानी सगा

का जनी कब तक रही पानी सगा
कब तलक हे साँस जिनगानी सगा

आज हाहाकार हे जल बूँद बर
ये हरय कल के भविसवाणी सगा

बन सकय दू चार रुखराई लगा
रोज मिलही छाँव सुखदाई हवा

आज का पर्यावरण के माँग हे
हव खुदे ज्ञानी गुणी ध्यानी सगा

सोखता गड्ढा बना जल सोत कर
मेड़ धर परती धरा ला बोंत कर

तोर सुख सपना सबे हरिया जही
हो जही बंजर धरा धानी सगा

तोर से कुछ होय कर कोशिश तहूँ
कुछ नही ता नेक कर ले विश तहूँ

प्रार्थना सुनही ग बादर देव हा
कोन हे ओखर सहीं दानी सगा

सुखदेव सिंह अहिलेश्वर
गोरखपुर कबीरधाम छत्तीसगढ़

बीता भर पेट

तुम बइठे हव मजा उड़ावत, गूगल इंटरनेट के।
हम किंजरत हन बेवस्था मा, ए बीता भर पेट के।

साक्षात्कार बुलाथव जाथे, बेटा हा हर साल के।
खाली जेब कहाँ उत्तर दय, साहब तुँहर सवाल के।

यू मे गो कहि देथव सँउहे, पाछू मुँह मुरकेट के।
हम किंजरत हन बेवस्था मा, ए बीता भर पेट के।

रोजगार के अवसर आथे, मरीचिका के भेस मा।
बेटा भूखन लाँघन उखरा, शामिल होथे रेस मा।


फड्डल नाँव लिखाथे ऊपर,हमर नाँव ला मेट के।
हम किंजरत हन बेवस्था मा,ए बीता भर पेट के।

समाचार टी.वी.पेपर मा, विज्ञापन के जोर हे।
सुनय कोन गोहार हमर गा, राजनीति के शोर हे।

हमर भाग दरखास ह कब तक, बाहिर रइही गेट के।
हम किंजरत हन बेवस्था मा, ए बीता भर पेट के।

सुखदेव सिंह अहिलेश्वर
मु.-गोरखपुर कबीरधाम छत्तीसगढ़



आल्हा छंद – नवा बछर के स्वागत करलन

बिते बछर के करन बिदाई,दे के दया मया संदेश।
नवा बछर के स्वागत करलन,त्याग अहं इरखा मद द्वेष।

आज मनुष्य हाथ ले डारिस,विश्व ज्ञान विज्ञान समेट।
नवा बछर मा हमू खुसर जन,खोल उही दुनिया के गेट।

हंसी खुशी मा हर दिन बीतय,हर दिन होवय परब तिहार।
सदा हमर बानी ले झलकय,सदाचरण उत्तम व्यवहार।

अंतस मा झन फोरा पारन,हिरदे मा झन देवन घाँव।
मिले बखत हे चार रोज के,रहलन दया मया के छाँव।

पूर्वाग्रह के चश्मा हेरन,अंतस मा सम भाव जगान।
पूर्वाग्रह के कारण संगी,मानवता हावय परसान।

छोड़ अलाली के संगत ला,महिनत के सँग नाता जोड़।
नेक सोच के नेव धरन जी,गड़े गोठ नइ हेरन कोड़।

आवव एक परन हम लेवन,नवा बछर के आघू ठान।
सदा हमर कथनी करनी ले,पावय देश राज घर मान।

सुखदेव सिंह अहिलेश्वर
गोरखपुर,कवर्धा छत्तीसगढ़

मतदान : चौपई छंद (जयकारी छंद)

देश करत हावय अह्वान।
बहुत जरूरी हे मतदान।

मतदाता बनही हुँशियार।
लोक स्वप्न होही साकार।

लोकतंत्र के जीव परान।
मतदाता मत अउ मतदान।

मत दे बर झन छूटँय लोग।
कहिथे निर्वाचन आयोग।

उम्मर हो गय अठरा साल।
मतदाता बन करव कमाल।

वोटिंग तिथि के रखलौ ध्यान।
खच्चित करना हे मतदान।

काज जरूरी हे झन टार।
वोट, बूथ मा जा के डार।

सीयू बीयू वी वी पेट।
बिस्वसनी चौबिस कैरेट।

एक बात के राखन ध्यान।
शान्ति पूर्ण होवय मतदान।

पाँच साल मा आय चुनाव।
सुग्घर जनमत दे लहुटाव।

सुखदेव सिंह अहिलेश्वर”अँजोर”
गोरखपुर,कवर्धा छत्तीसगढ़
मोबा-9685216602
sukhdev.singh.ahileshver31@gmail.com

मानसून मा : कुकुभ छंद

फिर माटी के सोंधी खुशबू,फिर झिंगुरा के मिठ बानी।
मानसून मा रद रद रद रद,बादर बरसाही पानी।

छेना लकड़ी चाउँर आटा,चउमासा बर जतनाही।
छाता खुमरी टायच पनही,रैन कोट सुरता आही।

नवा आसरा धरे किसानन,जाग बिहनहा हरषाहीं।
बीज-भात ला जाँच परख के,नाँगर बइला सम्हराहीं।

गोठ किसानी के चलही जी,टपराही परवा छानी।
मानसून मा रद रद रद रद,बादर बरसाही पानी।

मेछर्रा बत्तर कीरा मन,भुलका फूटे घर आहीं।
बोटर्रा पिंयर भिंदोल मन,पँड़वा जइसे नरियाहीं।

अहरू बिछरू के डर रहही,घर अँगना अउ बारी मा।
बूढ़ी दाई टीप खेल ही,लइका के रखवारी मा।

मच्छर बढ़ही गाँव शहर मा,बिकही बड़ मच्छर दानी।
मानसून मा रद रद रद रद,बादर बरसाही पानी।

चूरत भजिया देख बबा हर,चूल्हा तीरन घोर्राही।
लालच लहुट जही बचपन के,दुवे-चार भजिया खाही।

दिन बूड़त खा पी के जिनगी,दसना ऊपर सुसताही।
बिजली करही आँख मिचौली,छिन आही छिन मा जाही।

नदिया नरवा मन उफनाहीं,धरती रँग धरही धानी।
मानसून मा रद रद रद रद,बादर बरसाही पानी।

सुखदेव सिंह अहिलेश्वर”अँजोर”
गोरखपुर,कवर्धा
13/03/2018
मोबा-9685216602
sukhdev.singh.ahileshver31@gmail.com



सार छंद : पूछत हे जिनगानी

घर के बोरिंग बोर सुखागे, घर मा नइ हे पानी।
टंकर कतका दिन सँग दीही, पूछत हे जिनगानी।

नदिया तरिया बोरिंग मन तो, कब के हवैं सुखाये।
कहूँ कहूँ के बोर चलत हे, हिचक हिचक उथराये।

सौ मीटर ले लइन लगे हे, सरलग माढ़े डब्बा।
पानी बर झींका तानी हे, करलाई हे रब्बा।

चार खेप पानी लानत ले, माथ म आगे पानी।
टंकर कतका दिन सँग दीही, पूछत हे जिनगानी।

सोंचे नइ हन अतका जल्दी, अइसन दिन आ जाही।
सोंच समझ मा होगे गलती, अब करना का चाही।

बारिश के पानी ला रोकन, डबरी बाँध बनाके।
सागर मा जावन झन पावै, नरवा नदिया पाके।

पानी रइही तभे निकलही, बोली आनी-बानी।
टंकर कतका दिन सँग दीही, पूछत हे जिनगानी।

भुँइया भीतर के पानी ला, बउरन चेत लगाके।
गलगल गलगल झन बहवावन, फिल्मी गाना गाके।

रुखराई सरलग सिरजावन, भुँइया हर हरियावै।
जनता सँग सरकार घलो हा, आके हाँथ बँटावै।

बिन पानी कइसे चल पाही,चतुरा चतुर सियानी।
टंकर कतका दिन सँग दीही,पूछत हे जिनगानी।

सुखदेव सिंह अहिलेश्वर “अँजोर”
गोरखपुर, कवर्धा (छ.ग.)

विष्णुपद छंद : हे जग के जननी

जुग जुग ले कवि गावत हावँय,नारी के महिमा।
रूप अनूप निहारत दुनिया, नारी के छवि मा।

प्यार दुलार दया के नारी,अनुपम रूप धरे।
भुँइया मा ममता उपजाये,जम के त्रास हरे।

जग के खींचे मर्यादा मा, बन जल धार बहे।
मातु-बहिन बेटी पत्नी बन,सुख दुख संग सहे।

मीथक ला लोहा मनवाये,नव प्रतिमान गढ़े।
पुन्न प्रताप कृपा ला पाके,जीवन मूल्य बढ़े।

धरती से आगास तलक ले, गूँजत हे बल हा।
तोर धमक ला देख दुबक गे,धन बल अउ कल हा।

नारी क्षमता देख धरागे, अँगरी दाँत तरी।
जनम जनम के मतलाये मन,होगे आज फरी।

सुखदेव सिंह अहिलेश्वर “अँजोर”
गोरखपुर,कवर्धा
मोबा-9685216602
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सुरता : जन कवि कोदूराम “दलित”

अलख जगाइन साँच के,जन कवि कोदू राम।
जन्म जयंती हे उँकर,शत शत नमन प्रणाम।

सन उन्नीस् सौ दस बछर,जड़ काला के बाद।
पाँच मार्च के जन्म तिथि,हवय मुअखरा याद।

राम भरोसा ए ददा, जाई माँ के नाँव।
जन्म भूमि टिकरी हरै,दुरुग जिला के गाँव।

पेशा से शिक्षक रहिन,ज्ञान बँटइ के काम।
जन्म जयंती हे उँकर,शत शत नमन प्रणाम।

राज रहिस अंगरेज के, देश रहिस परतंत्र।
का बड़का का आम जन,सब चाहिन गणतंत्र।

आजादी तो पा घलिन, दे के जीव परान।
शोषित दलित गरीब मन,नइ पाइन सम्मान।

जन-मन के आवाज बन,हाथ कलम लिन थाम।
जन्म जयंती हे उँकर, शत शत नमन प्रणाम।

जन भाखा मा भाव ला,पहुँचावँय जन तीर।
समझय मनखे आखरी,बहय नयन ले नीर।

दोहा रोला कुंडली, कुकुभ सवैया सार।
कइ प्रकार के छंद सँग,गीत लिखिन भरमार।

बड़ ज्ञानी उन छंद के,दया मया के धाम।
जन्म जयंती हे उँकर,शत शत नमन प्रणाम।

सुखदेव सिंह अहिलेश्वर”अँजोर”
गोरखपुर,कवर्धा
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सर्वगामी सवैया : पुराना भये रीत

(01)

सोंचे बिचारे बिना संगवारी धरे टंगिया दूसरो ला धराये।
काटे हरा पेंड़ होले बढ़ाये पुराना भये रीत आजो निभाये।
टोरे उही पेंड़ के जीव साँसा ल जे पेंड़ हा तोर संसा चलाये।
माते परे मंद पी के तहाँ कोन का हे कहाँ हे कहाँ सोरियाये।

(02)

रेंगौ चुनौ रीत रद्दा बने जेन रद्दा सबो के बनौका बनावै।
सोचौ बिचारौ तभे पाँव धारौ करे आज के काल के रीत आवै।
चाहौ त अच्छा हवै एक रद्दा जँचै ता करौ नीव आजे धरावै।
कूड़ा उठा रोज होले म डारौ ग होले बढ़ै औ गली खर्हरावै।

सुखदेव सिंह अहिलेश्वर “अँजोर”
गोरखपुर,कवर्धा
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