सत् मारग म कदम बढ़ाके, देश-धरम बर करीन हें काम। वीर सुराजी वो हमर गरब आय, नांव जेकर हे अनंतराम।। देश ल सुराज देवाय खातिर जे मन अपन जम्मो जिनिस ल अरपन कर देइन, वोमन म अनंतराम जी बर्छिहा के नांव आगू के डांड़ म गिनाथे। वो मन सुराज के लड़ाई म जतका योगदान देइन, वतकेच ऊँच-नीच, छुआ-छूत, दान-दहेज आदि के निवारण खातिर घलोक देइन, एकरे सेती एक बेरा अइसे घलोक आइस के अनंतराम जी ल अपन जाति-समाज ले अलग घलोक रहे बर लागिस। अछूतोद्धार के कारज खातिर गाँधी जी…
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बोरे-बासी के दिन आगे..
दही-मही संग बोरे-बासी के लगिन धरागे रे गोंदली संग सुघ्घर झड़के के दिन आगे रे………. http://mayarumati.blogspot.in/2013/03/blog-post_29.html
Read Moreये भोले तोर बिना….
ये भोले तोर बिना…. जिनगी के चार दिना, कटही कइसे मोर जोंही गुन-गुन मैं सिहर जाथौं, ये भोले तोर बिना….. हांसी हरियावय नहीं, पीरा पिंवरावय नहीं जिनगी के गाड़ी, तोर बिन तिरावय नहीं श्रद्धा के गांजा-धथुरा, ले के तैं हमरो ल पीना… ये भोले… उमंग अब उवय नहीं, संसो ह सूतय नहीं बिपदा के बैरी सिरतोन, छोरे ये छूटय नहीं तुंहरे हे आसा एक्के, घुरुवा कस झन तो हीना… ये भोले… तन ह तनावय नहीं, आंसू अंटावय नहीं मया के कुंदरा जोहीं, छाये छवावय नहीं भक्ति म भगवान बिना, मुसकिल…
Read Moreबसंत गीत : सुशील भोले
बसंती रंग झूम-झूम जाथे… बगिया म आगे हे बहार, बसंती रंग झूम-झूम जाथे पुरवइया छेड़ देहे फाग, मन के मिलौना ल बलाथे मउहा ममहाथे अउ तीर म बलाथे मंद सहीं नशा म मन ल मताथे संग म सजन के सोर करवाथे….बसंती रंग…. परसा दहक गे हे नंदिया कछार झुंझकुर ले झांकत हे मुड़ी उघार लाली-लाली आगी कस जनाथे… बसंती रंग…. अमरइया अइसन कभू नइ सुहाय उल्हवा पाना संग मउर ममहाय कोइली तब मया गीत गाथे… बसंती रंग… लाली-लाली लुगरा के छींट घलो लाल राजा बसंत जइसे छींच दे हे गुलाल…
Read Moreछत्तीसगढ़ी : कामकाज अउ लेखन के रूप : सुशील भोले
जबले छत्तीसगढ़ी ल राजभाषा के दरजा दे के ए भरोसा जगाये गे हवय के अवइया बेरा म ए ह शिक्षा के संगे-संग राजकाज के भाषा बन सकथे, तबले एकर साहित्यिक लेखन के रूप अउ कामकाज माने प्रशासकीय रूप ऊपर भारी गोठ-बात अउ तिरिक-तीरा चलत हे। ए संबंध म राजभाषा आयोग ह एक ठ विचार गोष्ठी के आयोजन घलोक करे रिहिसे, जेमा ए बात प्रमुखता ले आइस के कामकाज के भाषा ल आम बोलचाल के रूप म ही लिखे जाना चाही। ए विचार ले लगभग महूं सहमत हवंव। काबर के प्रशासनिक…
Read Moreहीरा गंवा गेहे बनकचरा म…
ये ह छत्तीसगढ़ महतारी के दुर्भाग्य आय केवोकर असर हीरा बेटा मनला चुन-चुनके बनकचरा म फेंक अउ लुकाए के जेन बुता इहां के इतिहास लिखे के संग ले चालू होय हे तेन ह आजो ले चलते हे। एकरे सेती हमला आज हीरालाल काव्योपाध्याय जइसन युग पुरुष ल जनवाय के उदीम करे बर लागत हे। ये ह कतेक लाज के बात आय के छत्तीसगढ़ी लेखन के जेन गंगोत्री आय तेने ल इहां के इतिहास लेखन ले दुरिहाए के उदीम करे गे हवय। मोला लागथे के अइसन किसम के उजबक बुता ल…
Read Moreतोर मेहनत के लागा ल…..
तोर मेहनत के लागा ल….. तोर मेहनत के लागा ल, तोर करजा के तागा ल उतार लेतेंव रे, मैं ह अपन दुवार म……… देखत हावौं खेत-खार म जाथस तैं ह मंझनी-मंझनिया देंह ठठाथस तैं ह जाड़ न घाम चिन्हस, बरखा न बहार देखस ठउका उही बेर तोला पोटार लेतेंव रे, मैं ह अपन……. कहिथें बंजर-भांठा हरियाथे उहें तोर मेहनत के पछीना बोहाथे जिहें परबत सिंगार करय, नंदिया दुलार करय ठउका इही बानी महूं दुलार लेतेंव रे, तोला अपन…. तैं तो दानी म बनगे हस औघड़ दानी भले नइए तोर बर…
Read Moreएक डंडिय़ा : माटी के पीरा…
ए माटी के पीरा ल कतेक बतांव, कोनो संगी-संगवारी ल खबर नइए। ए तो लछमी कस गहना म लदे हे तभो, एकर बेटा बर छइहाँ खदर नइए।। कोनो आथे कहूँ ले लाँघन मगर, इहाँ खाथे ससन भर फेर सबर नइए।… अइसे होना तो चाही विकास गजब, फेर खेती ल उजारे के डगर नइए।… धन-जोगानी चारों खुँट बगरे हे तभो, एकर कोरा म खेलइया के कदर नइए।… दुख-पीरा के चरचा तो होथे गजब, फेर सुवारथ के आगू म वो जबर नइए।… अइसन मनखे ल मुखिया चुनथन काबर, जेला गरब-गुमान के बतर…
Read Moreअस्मिता के आत्मा आय संस्कृति
आजकाल ‘अस्मिता’ शब्द के चलन ह भारी बाढग़े हवय। हर कहूँ मेर एकर उच्चारन होवत रहिथे, तभो ले कतकों मनखे अभी घलोक एकर अरथ ल समझ नइ पाए हे, एकरे सेती उन अस्मिता के अन्ते-तन्ते अरथ निकालत रहिथें, लोगन ल बतावत रहिथें। अस्मिता असल म संस्कृत भाषा के शब्द आय, जेहा ‘अस्मि’ ले बने हे। अस्मि के अर्थ होथे ‘हूँ’। अउ जब अस्मि म ‘ता’ जुड़ जाथे त हो जाथे ‘अस्मिता’ अउ ये दूनों जुड़े शब्द के अरथ होथे- ‘मैं कोन आँव?’, मैं कौन हूँ?, मेरी पहचान क्या है?, मोर…
Read Moreकवयित्री के गुण / कवयित्री धोंधो बाई
माईलोगिन मन के मुँह ह अबड़ खजुवाथे कहिथें। एकरे सेती जब देखबे तब वोमन बिन सोचे-समझे चटर-पटर करत रहिथें। हमरो पारा म एक झन अइसने चटरही हे, फेर ये चटरही ह आजकल ‘कवयित्री’ होगे हे। बने मोठ-डाँठ हे तेकर सेती लोगन वोला ‘कवयित्री धोंधो बाई’ कहिथें। वइसे नांव तो वोकर ‘मीता’ हे, फेर ‘गीता’ ह जइसे गुरतुर नइ होवय न, वइसने ‘मीता’ ह घलो मीठ नइए। एकदम करू तेमा लीम चढ़े वाला। वइसे तो माईलोगिन होना ह अपन आप म करू-कस्सा ल मंदरस चुपर के परोसने वाली होना होथे, तेमा…
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